बुधवार, 2 सितंबर 2009

यह रीती-नीति जगपति की...


निर्मम नर्तन है गति का ,
है व्यर्थ आस ऋतुपति की ।
छलना भी मोहमयी है,
यह रीती-नीति जगपति की॥

आंसू का क्रम ही क्रम है,
यह सत्य शेष सब भ्रम है ।
वेदना बनी चिर संगिनी,
सुख का तो चलता क्रम है॥

उद्वेलित जीवन मग में,
बढ़ चलना धीरे-धीरे ।
प्रणय, मधुर, मुस्कान, मिलन,
भर लेना मोती-हीरे ॥

-डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल 'राही'

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

वाह !
अच्छा लगा
बधाई !

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

आंसू का क्रम ही क्रम है,
यह सत्य शेष सब भ्रम है ।
वेदना बनी चिर संगिनी,
सुख का तो चलता क्रम है॥

बेहतरीन पंक्तिया. सत्य और भ्रम समझ में आया.
बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

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