शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

दीन-बंधु सम होय

किसी गांव में नदी के किनारे एक ज्योतिषी जी लोगों का भाग्य बताने के लिये बैठते थे, सहसा दो लोग (बाप-बेटे) वहाँ पहुंचे, नदी पर पुल नही था न ही नाव थी, उन्हें उस पार के गांव जाना था, यह पता नहीं था कि नदी कितनी गहरी है, ज्योतिषी जी ने उनकी सहायता करने के लिये दोनों का कद़ नापा, बाप पांच फीट तथा बेटा 3 फिट लम्बा था, नदी की गहराई जाकर नापी जो साढ़े तीन फिट थी, दोनों का औसत चार फिट ठहरा, निश्चित भाव से दोनों से कहा बेखौफ उतर जाओ, डूबने का प्रश्न ही नहीं उठता, जब वे गहराई में पहुंचे तो बेटा डूबने लगा। आप ने देखा इस चुटकुले में आंकड़े का दुरूपयोग हुआ है। गणित एवं तथ्य अलग-अलग रास्तों पर हैं।
मानव जीवन आंकड़े के बगैर आगे नहीं बढ़ सकता, जमीन से लेकर आसमान तक ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में इसकी आवश्यकता सर्वविदित है परन्तु इसका दुरूपयोग भी अनेक कारणों से खूब किया गया है, इस दुरूपयोग को हम आंकड़ेबाजी कहते हैं, सरकारें इस बाज़ीगरी में माहिर है, इसीं के सहारे वह बातों को उलटती पलटती रहती है और जनता के दिमाग में वही बाते भरती है जो वह अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये चाहती है।
कुछ वर्षों पहले इण्डिया शाइनिंग के नक्शे आप ने देखे ही थे। प्रति व्यक्ति औसत आय जो आंकड़ों के द्वारा पेश की जाती है वह हजारों में है और प्रतिवर्ष सरकारी आंकड़ों में वह बढ़ जाती है परन्तु धरातल पर जब हम देखते हैं कि आधे से अधिक आबादी को दो जून की रोटी भी नहीं मिल पाती। उधर पूंजीपतियों की पूंजी बढ़ती जाती है, इधर गरीब की गरीबी में बढ़ोत्तरी हो रही है और महंगाई कोेढ़ में खाज का काम कर रही हैं भारत बढ़ रहा है और औसत आमदनी भी बढ़ रही है। फील गुड के लिये क्या यह काफी नहीं है? इण्डिया शाइनिंग का काम अब भी जारी है।
आदिकाल से समाज शोषक और शोषित में विभाजित रहा है, सामन्तवाद अपने चेहरे और वेश को समयानुसार बदलता है और शोषण के नये तरीके अपनाता है, जब भारत आजाद हुआ और ज़मीदारी उन्मूलन हुआ तो आम जनता को ऐसा लगा कि बन्धनों से मुक्ति मिली, ज़मीनों के मालिकाना हक़ मिलने से विकास के रास्ते खुल गये।
आज आज़ादी के छःह दशक पूरे हो चुके हैं। ज़मीदार, राजा, तालुके़दार, महाजन साहूकार से मुक्ति मिली परन्तु नये सामन्तवाद ने जनम लिया नेता, अफ़सर और बाहुबलियों के काकस ने समाज को जकड़ लिया, मंत्री, सांसद विधायक, चेयरमैन, मेयर, प्रमुख, सभापति, सदस्य, सभासद और प्रधानों आदि के एक बड़े वर्ग ने जनता की गाढ़ी कमाई पर हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया, ग़रीब लुटता रहा वह बेचारा नंगा-भूखा ही रहा, मेड़िया में खबर आती रही कि देश तरक्क़ी कर रहा है।
कभी ग़रीबों, दलितों, महिलाओं व अल्पसंख्यकों के सरोकारों को लेकर एक हो जाने वाली संसद ने अपना सुरबदल दिया है। अब वहाँ पूँजीवाद, जात-पात और भाई-भतीजावाद हावी हो गया है। केन्द्रीय योजना आयोग के सदस्य प्रो0 अर्जुन सेनगुप्ता समिति की एक रिपोर्ट के हवालेसे यह तथ्य पेश किया है कि भारत की 74 करोड़ आबादी रोज़ाना प्रति व्यक्ति केवल 20 रूपये में जीवनयापन करती है।
एक तरफ यह तथ्य हैं, दूसरी तरफ सरकारें अपनी तरकीबों से विकास के आंकड़े बड़े-बड़े विज्ञापनों में दर्शाकर जनता को दिवा स्वप्न दिखाती हैं, इन हालत में बेचारा ग़रीब अपनी व्यथा किससे कहे-
दीन सबन को लखत है, दीनहि लखै न कोय,
जो रहीम दीनहिं लखै, दीन-बंधु सम होय।


-डॉक्टर एस.एम हैदर
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