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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 3

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कुछ राज्यों के नए भर्ती-शुदा पुलिस फोर्स के दिमाग में यह भर दिया गया है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यदि किसी से खतरा है तो वे माओवादी हैं या नक्सलवादी हैं या उनसे सहानुभूति रखने वाले हैं (जो लोग भी हिंसा ग्रस्त लोगों से सहानुभूति रखते हैं वे ‘सस्पेक्ट’ हैं), या मुस्लिम अल्पसंख्यकों में तथाकथित ‘जेहादी’ हैं, इस शब्द का भी का दुरुपयोग किया गया (हालाँकि इस्लाम में इसका अर्थ ऐसे संघर्ष से है जो स्वयं की बुरी भावनाओं के खिलाफ किया जाता है)। यह एक तथ्य है, जैसा कि जस्टिस राजेन्द्र सच्चर कमीशन की रिपोर्ट एवं अन्य रिपोर्टों में माना गया है कि भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों का आर्थिक-सामाजिक विकास अवरुद्ध है और उनका स्तर अनुसूचित जाति के समान है। पुलिस फोर्स में गलत दृष्टिकोण भर देने का प्रभाव यह पड़ा कि गांधीवादी सच्चे अम्बेदकरवादी (डाॅ0 बी0 अम्बेदकर जो अनुसूचित जातियों के मसीहा बने तथा भारतीय संविधान की संरचना करने वाले थे, उनके सिद्धांतों पर चलने वाले) वे लेखक तथा विद्वान जिन्होंने आदिवासियों, अनुसूचित जातियों तथा गरीब किसानों की समस्याएँ उठाईं और वे लोग जिन्होंने नागरिक स्वतंत्रता, समुदाय के स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि के लिए कार्य किया और वे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जिनकी हिंसा और क्रान्ति के मामलों में दूर-दूर तक कोई संलिप्तता नहीं थीं, यही सब लोग माओवादी या जेहादी कहकर बन्दी बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक दशा को कोर्ट ने अपने फैसले में पुष्ट स्रोतों द्वारा संदर्भित किया है, इसमें योजना आयोग के एक ‘एक्सपर्ट ग्रुप’ की रिपोर्ट ‘विकास की चुनौतियाँ-अतिवादी प्रभावित क्षेत्रों में’ भी हंै, जो अप्रैल 2008 में प्रस्तुत की गई थी, इस रिपोर्ट से फैसले के आलोचक घबरा गए हैं- इसके ये अंश बताते हैं:-
‘‘स्वतंत्रता प्राप्ति के आरम्भ से ही विकास के साँचे ने समाज के वंचित वर्ग के असंतोष को अत्यधिक बढ़ा दिया है, जिससे इस वर्ग को अपूर्णीय क्षति पहुँची है। विकास में गरीब ने ही ज्यादा योगदान दिया, परन्तु बड़े वर्ग ने अपने फायदे के लिए उसे ही असमानुपातिक ढंग से वंचित किया, निर्वासित किया, और अमानवीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। जहाँ तक आदिवासियों का मामला है, उनके सामाजिक ताने-बाने को तहस नहस किया, उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटा दिया तथा शोषण किया। विकास एवं उसके कार्यान्वयन के भ्रष्ट तरीकों द्वारा नौकरशाहों, ठेकेदारों, व्यापारियों, बिचैलियों तथा समाज के लालची वर्ग ने उनके
संसाधनों को छीना तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया’’।
राजनैतिक पार्टियों की असफलताओं के कारण केन्द्र एवं राज्यों में सरकारें एक के बाद एक आती जाती रहीं, जमीनों पर मनमाने कब्जे होते रहे जिसके कारण जो आन्दोलन हुए तथा जो समस्याएँ उत्पन्न हुईं, उन पर लोकतांत्रिक तरीके से इन सरकारों ने विचार नहीं किया, यहाँ तक कि संसद में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों तथा बंगाल की ‘लेफ्ट फ्रन्ट’ सरकार ने भी यही ढंग अपनाया। सभी ने जालिमाना तरीके से इन आन्दोलनांे को बुरी तरह से कुचला। कोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकारों पर यह जोर दिया है कि इन आन्दोलनों से निपटने के लिए वे संवैधानिक दायरे में रहकर ही कोई समाधान खोजें तथा इसे केवल ‘‘ला एण्ड आर्डर’ की समस्या न समझें। इस संबंध में योजना आयोग के ‘एक्सपर्ट ग्रुप’ की रिपोर्ट का उद्धरण दिया है-
‘‘आन्दोलन अनेक प्रकार के होते हैं, यह तर्क संगत नहीं है कि केवल अशान्ति या ‘ला एण्ड आर्डर’ की समस्या समझकर इन्हें शक्ति के द्वारा दबाया जाए। असंतोष को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखकर इन्हें वर्गीकृत करना चाहिए और जन-समस्याओं को एजेन्डे में लेना चाहिए, सरकार को ‘विधि के शासन’ के दायरे से बाहर न जाना चाहिए। यह न जानना आश्चर्य की बात नहीं है कि असंतोष का तुरन्त कारण क्या था, आश्चर्य यह है कि राज्य इसकी जड़ नहीं तलाश कर सका।
कोर्ट के फैसले में इस बात की कलई खोली गई कि ऐसे प्रयास होते हैं कि इस प्रकार के आन्दोलनों को राक्षसी आन्दोलनों के रूप में पेश किया जाए। यह भी अन्तर बताया गया कि सरकारी हिंसा के जवाब में वंचित वर्ग प्रति हिंसा के लिए मजबूर किया जाता है। बहरहाल इससे आगे आकर इस वर्ग को नगरीय भारत के लोकतंत्र वादियों से सम्पर्क साधना चाहिए ताकि इन आन्दोलनों को व्यापक रूप दिया जा सके। अब इस बात को मान्यता मिल रही है और आर्थिक व वित्तीय आधिपत्य बनता जा रहा है कि इस व्यवस्था से हम विकसित होंगे, परन्तु सच यह है कि इससे भूमण्डल की समस्त सम्पदा एवं पर्यावरण नष्ट होगा।
चूँकि नगरीय भारत में बौद्धिक एवं राजनैतिक ‘वैकूम’ बनता जा रहा है, इन हालात में कोर्ट का फैसला इस बात की चेतावनी है कि भारतीय संविधान को एक ऐसे पैक्ट का रूप न दिया जाए जिससे राष्ट्रीय आत्महत्या का रास्ता निकलता है और यह न हो कि विनाश कारी नीतियों का विरोध करने वाले वंचितों और शोषितों को हिंसक रूप से कुचला जाए। हिंसक आन्दोलनों को भी सरकारें संवैधानिक तरीकों से ही नियंत्रित करें। कोर्ट के अनुसार मध्य एवं पूर्वी भारत में ‘विधि के शासन’ को तार तार कर दिया गया। जबकि संविधान एक ऐसा अभिलेख है जो सभी नागरिकों के लिए जीविका के अधिकार, जीवन के
अधिकार एवं सम्मानजनक जीवन जीने के प्रति संकल्पबद्ध है। कोर्ट उन लोगों को जो नीति निर्माण करते और लागू करते हैं याद दिलाता है कि अतिवादिता और गरीबी के बीच गहरा सम्बन्ध है जो शस्त्र शक्ति से हटाया नहीं जा सकता। अंत में कोर्ट उन लोगों की प्रंशसा करता है जो वंचित वर्ग हेतु संघर्ष करके मुसीबतें झेल रहे हैं। अमरीका में दासता के उन्मूलनकर्ता फ्रेडरिक डगलस का दृष्टिकोण कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘‘शक्तिशाली वर्ग के सामने जब तक जोरदार ढंग से माँग नहीं रखी जाती, वह मानता नहीं है।’’

समाप्त

-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 2

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी पहले, भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक कमेटी- ‘‘कमेटी आन स्टेट अग्रेरियन रिलेशन्स एण्ड द अनफिनिश्ड टास्क आॅफ लैण्ड रिफाम्र्स’’ ने अपनी जो रिपोर्ट मार्च 2009 मंे दाखिल की, उसमें यह कहा कि आदिवासियों की जमीनें छीनना ‘‘औपनिवेशिक कृत्य है, जिसमें कम्पनियाँ जन सतर्कता सेना- ‘सलवा जुडूम’ की आर्थिक सहायता केवल इस अभिप्राय से कर रही हैं ताकि गाँव के गाँव खाली करा लिए जाएँ, रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘जो कि अधिकारिक रिपोर्ट है, 640 गाँव तो समतल ही कर दिए गए, यह सब बन्दूक के निशाने पर सरकार की मेहरबानी से हुआ, दंतेवाड़ा की आधी से अधिक जनसंख्या के बराबर- 3,50,000 आदिवासी बेघर हो गए, औरतों के साथ व्यभिचार हुआ, युवा अपाहिज बनाए गए, लड़कियों का कत्लेआम हुआ। जो भाग नहीं सके उनको ‘‘सलवा-जुडूम’’ के शरणार्थी शिविरों मंे हँका दिया गया। हाल यह है कि वह 640 ग्राम जो ‘लौह-अयस्क’ पर स्थित थे, अब निर्जन हैं तथा बड़ी बोली लगाने वालों के लिए उपलब्ध हैं।
कोर्ट के फैसले पर हमारे सम्पादकीयों तथा विश्लेषणों का जोर इस बात पर है कि उच्चतम न्यायालय वाक्-पटुता की रौ में विधिक क्षेत्र से आगे निकल गया है, और इसके ब्याख्यात्मक भाग गैर जरूरी हंै। विश्लेषकों के इस रुख ने इस बात को नजर अन्दाज कर दिया कि केन्द्र और राज्य सरकार ने अपने हित
साधने हेतु वहाँ की जमीनी वास्तविकताओं का कोर्ट में खुद ही बखान किया था ताकि उनके द्वारा आदिवासी युवाओं को सिविल मिलीशिया में भर्ती के मामले को न्याय संगत मान लिया जाय, हालाँकि यह भर्ती
संविधान एवं पुलिस एक्ट 1861 का खुला उल्लंघन है। विकास का जो विकृत एजेन्डा पेश हुआ, जो झूठे आश्वासन दिए गए, जो अवैधानिक कार्य किए गए, संवैधानिक
निषेध के बावजूद जिस तरह आदिवासियों की जमीनों को हड़पा गया, जिस तरह से राज्य सरकार के गलत निर्णयों से विद्रोह ने सर उठाया और जिसके दबाने हेतु अन्याय किया गया, उन्हीं संदर्भों में सुप्रीम कोर्ट को आवश्यक रूप से इन बातों पर फोकस करना पड़ा, कोर्ट ने कहा-
‘‘इस समस्या का मूल कारण एवं निस्तारण कहीं और है। आधुनिक नव-उदारवादी आर्थिक विचार ने अनियत्रिंत लालच एवं स्वार्थ को जन्म दिया है। गलत सपने दिखाए गए, यह झूठ कहा गया कि उपभोेग से आर्थिक विकास होगा, जिससे हर एक ऊँचा उठेगा, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से ही विकास सम्भव है, इसी से हम भूमण्डलीय प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर सकेंगे। धन एकत्र करने से ही हम भूख, अस्वस्थता, अशिक्षा एवं गरीबी की समस्या को हल कर पाएँगे। सच तो यह है कि नीति निर्माता या उच्च वर्ग के लोगों के पास गरीबों की समस्या एवं कष्ट के हल का कोई जवाब नहीं है, वे आँखें बन्द किए हुए हैं। इससे बुरी स्थिति यह है कि उन्होंने इस ऐतिहासिक साक्ष्य को भुला दिया है कि जो विकास प्राकृतिक संसाधनों के लूट खसोट पर टिका होता है वह देश को पतन की ओर ले जाता है-’’
विश्व के अनेक भागों में, जिनमें पाश्चात्य उदारवादी प्रजातंत्र भी शामिल हैं, विधि के शासन की बात मात्र प्रतिध्वनि है। वहाँ ‘प्रजातंत्र’, ‘स्वतंत्रता’ तथा ‘संवैधानिक अधिकार’ का शोर मचाना केवल दिखावा है। कोर्ट का यह भी विचार है कि- ‘‘लाभ और मूल्य के समान बँटवारे के बिना निजी क्षेत्र द्वारा संसाधनों के शोषण की जो भी नीतियाँ हैं वह उन सिद्धान्तों के विपरीत हैं जो शासन के लिए आवश्यक मानी गई हैं। जब इस प्रकार के उल्लंघन बड़े पैमाने पर घटित होते हैं तब कानून द्वारा प्रदत्त समानता को, जो आर्टीकिल 14 और सम्मान जनक जीवन जीने के अधिकार को जो आर्टीकिल 21 के अन्तर्गत दिए गए हैं, कमजोर करते हैं। इसके अतिरिक्त जब खनन-माफिया और सरकारी एजेन्टों का शोषण हेतु गठजोड़ बन जाता है तब फिर यही बातें आर्टीकिल 14 तथा 21 को निष्क्रिय करती हैं तथा राज्य के नैतिक अधिकार को भी प्रभावित करती हैं।
भारत के गृह विभाग की रिपोर्ट के अनुसार कुल 607 जिलों में से 120 से 160 तक जिले माओवाद या नक्सलवाद से प्रभावित हैं और यह कि इस आन्दोलन ने लगभग एक चैथाई भारतीय भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है। जहाँ भी कुछ राजनैतिक आन्दोलनों को कड़ाई से कुचलने की जरूरत हुई, माओवादी, नक्सलवादी का लेबिल लगाने हेतु, इस नाम को अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया गया। इस सन्दर्भ मंे कोर्ट ने कहा कि प्रजातंत्रिक राज्य में यह न्याय संगत नहीं है कि आन्दोलनों से निपटने के लिए ऐसे गैर कानूनी तरीके अपनाए जाएँ जिससे
संविधान या विधि के शासन का उल्लंघन हो क्योंकि इससे, जैसा कि सरकारी कमेटियों का भी कथन है, हिंसा और असंतोष बढ़ता ही जाएगा।
आदिवासियों, अनुसूचित जातियों, कृषक वर्ग, मजदूर वर्ग, अल्पसंख्यक तथा अन्य शोषित वर्ग की दयनीय दशा को कोर्ट ने ‘भयानक’ बताया है, परन्तु कोर्ट के फैसले से पूर्व इन्हीं वर्गों की सुरक्षा के नाम पर पास किए गए अनेक कानूनों के अंतर्गत माओवादियों या माओवादियों से सहानुभूति रखने वालों या जेहादी कहकर उनको जेलों में बन्द कर दिया गया, कोर्ट ने यह कहकर ऐसे मामलों की भत्र्सना की है-
‘मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य है कि छत्तीसगढ़ राज्य तथा इसके चाटुकार संवैधानिक वर्जनाओं के ज्ञान के प्रति अपनी आँखें मूँदे हुए हैं। यदि कोई वहाँ की अमानवीय स्थिति पर आपŸिा करता है तो उसे तुरन्त माओवादी या उनका हमदर्द मान लिया जाता है’।
जहाँ तक सरकारी मशीनरी एवं पुलिस का कारपोरेट को लाभ पहुँचाने हेतु दोनों में समन्वय की बात है, यह तथ्य याद रखना चाहिए कि जिन वर्गों- मुस्लिम, ईसाई, अनुसूचित जातियों, महिलाओं और अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से वंचित वर्गों पर फासिस्ट आन्दोलनों तथा राजनैतिक दलों द्वारा बराबर प्रहार किया जाता है वे सभी अभी कुछ दिनों पूर्व तक अछूत की श्रेणी में रहे हैं, इन्हीं को बम विस्फोटों एवं सामूहिक हत्याओं में फाँसा जाता है। बाद मंे जन-आक्रोश को दबाने हेतु जाँच कमीशन बैठाए जाते हैं तथा उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती है। अभी हाल में ‘‘होम लैण्ड सेक्योरिटी’’ का मामला ‘‘चैम्बर्स आॅफ कामर्स एण्ड इन्डस्ट्री’’ द्वारा इस लिए उठाया गया ताकि अधिक मुनाफा कमाया जाए और आन्दोलनों को कुचला जाए। इन मामलों पर आयोजित बैठकों को अधिकतर सेवानिवृत फौजी तथा पुलिस अधिकारी सम्बोधित करते हैं।


-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 1


नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के केस में भारतीय उच्चतम न्यायालय ने ‘‘स्पेशल पुलिस अधिकारियों’’ की भर्ती के फैसले को अवैधानिक एवं असंवैधानिक करार दिया है, जिसके द्वारा राज्य सरकार ने केन्द्र के समर्थन से ऐसी नागरिक सतर्कता सेना, उन जनजाति क्षेत्रों में नियुक्त करनी चाही जो खनिज पदार्थों से परिपूर्ण हैं, ये इलाके पूर्वी एवं मध्य भारत में स्थित हैं। इन खनिज सम्पन्न इलाकों पर भारतीय एवं विदेशी कम्पनियाँ कब्जा जमाना चाहती हैं जिसका विरोध आदिवासी एवं किसान वर्ग कर रहा है। राज्य जो ‘‘फोर्स’’ बना रही है, उसे इन इलाकों में तैनात करके माओवादी, नक्सलवादी आन्दोलनों को, विद्रोही गतिविधियों का नाम देकर, कुचलना चाहती है। इस फैसले का महत्व यह है कि इसके द्वारा कम से कम सुप्रीम कोर्ट की यह मान्यता मिल गई कि इन क्षेत्रों में सरकार एवं जनता के बीच का ‘‘सामाजिक-सम्पर्क’’ तो टूट ही गया है, यह इसलिए हुआ कि भूमण्डलीकरण का विकृत रूप यहाँ लागू किया गया और इसके लिए राज्य द्वारा अवैधानिक एवं असंवैधानिक तरीके अपनाए गए।
कोर्ट का यह कथन है कि- ‘‘समस्या तो यह है कि राज्य ने आर्थिक राजनीति के अनैतिक रूप को मान्यता दी जिसके फलस्वरूप विद्रोही राजनीति पैदा हुई और इसी से हिसंक आन्दोलन की राजनीति ने जन्म लिया। इस बात को माना गया है कि भारत के अनेक भू भागों में जो सशस्त्र विद्रोह हुए उनका कारण सामाजिक आर्थिक हालात और स्थानीय असमानताएँ थीं’’।
कारपोरेट जगत के संगठन तथा उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया ने, जैसा कि अनुमान था, कोर्ट के इस विचारण पर कि आदिवासियों को हिंसक रूप से उजाड़ा गया और सैकड़ों आदिवासी ग्रामों को ‘विकास’ के नाम पर खाली करा लिया गया, प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की। जो समझौता छत्तीसगढ़ सरकार तथा भारतीय एवं सीमापार कम्पनी, टाटा, एस्सार, आरसेलर, मित्तल, डी बियर्स, बी0एच0पी0 बिलियन और रियो टिन्टो व अन्य के मध्य हुआ था और उसी के तहत आदिवासी जनसंख्या में से ही कम वेतन पर भर्ती किए गए सैनिक तथा पुलिस एवं अर्ध सैनिक बलों को इस हेतु इस्तेमाल किया गया। यही कारण था कि अनुसूचित जातियों, किसानों एवं आदिवासियों की मदद से माओवादियों का प्रतिक्रियात्मक हिंसक आन्दोलन उभरा। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सटीक रूप से ‘‘भूमण्डलीकरण का अँधेरा पहलू’’ करार दिया। कारपोरेट जगत की प्रतिक्रिया कुछभी आश्चर्यजनक नहीं थी, क्योंकि कुछ को छोड़कर समस्त मीडिया ने वर्तमान आर्थिक नीतियों के लाभ, उच्च मध्य वर्ग एवं उद्योग जगत की बड़ी आमदनी, अवस्थापना आदि के फायदे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया।
जोसेफ कानरैड की ‘‘हार्ट आफ डार्कनेस’’ में 19वीं तथा शुरू 20वीं सदी में अफ्रीका के उपनिवेशीकरण तथा वहाँ की साम्राज्यवादी, पूँजीवादी, विस्तारवादी भयंकर नीतियों का जो चित्रण है, कोर्ट ने भूमण्डलीकरण के नाम पर आदिवासियों पर जो अत्याचार हुए, इसी से उसकी तुलना की है।
उक्त नीतियों के लागू करने से अनेक गंभीर अनियमितताएँ सामने आई हैं जिनसे संविधान तथा ‘विधि का शासन’ प्रभावित हो रहा है, कोर्ट ने ऐसा सन्दर्भ दिया है। कोर्ट यह भी सन्दर्भ देता है कि आज पूरे विश्व में- मैक्सिको, हैती, मध्य एवं लैटिन अमरीका, अफ्रीका एवं अरब जगत में अर्थ एवं वित्तीय मामलों में दरवाजे के पीछे के निर्णय तथा इतर-संवैधानिक तरीके ही हिंसक उथल-पुथल का कारण बनते हैं। जैसा कि कहा जाता है कि यह ‘‘बैंकर-युद्ध’’ है जो यूरोप एवं अमरीका के नागरिकों को फकीर बनाए दे रहा है तथा सम्पूर्ण विश्व पर प्रभाव डाल रहा है।
अपने औद्योगिक विकास और वित्तीय सहायकों की प्रशंसा के बावजूद चीन और भारत भी इस प्रभाव से बचे नहीं हंै। एशियाई विकास बैंक के अनुसार आय में असमानता के मामले मंे क्षेत्र में चीन का स्थान दूसरे ऊँचे नम्बर पर है। वहाँ के राजकीय प्रबंधन- वर्कर सेफटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतिवर्ष वहाँ एक लाख मजदूर काल के गाल में समा जाते हैं। इसी प्रकार से भारत में जब से यह नीतियाँ लागू हुई हैं, भारत सरकार के ‘नेशनल ब्युरो आॅफ क्राइम स्टैटिक्स’ के अनुसार 1995 से 15 वर्ष की काल अवधि में दो लाख पचास हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली हैं तथा कर्ज के फंदे में जकड़ जाने पर दूसरे तबकों के परिवारों ने सामूहिक आत्महत्याएँ की हैं।
इन नीतियों का भयानक रूप यह है कि मिलिट्री हमलों द्वारा न समाप्त होने वाले ऐसे युद्ध छेड़े जाते हैं कि लाखों आदमी जान से मार दिए जाते हैं और अनेक क्षेत्रों में पूरी मानव जाति की नस्ल समाप्त कर दी जाती है। आण्विक उद्योगों के कचरे से यूरेनियम अस्त्र बना कर इनका इस्तेमाल अतिशक्तिशाली एकाधिकार प्राप्त कम्पनियाँ तथा वित्तीय संस्थाएँ उन युद्धों में करती हैं, जिनका उद्देश्य कभी एक कभी दूसरे समाज के आर्थिक क्षेत्रों पर कब्जा करके, बजट एवं बचत स्रोतों को हथिया कर उन्हें गुलाम बनाना होता है। इसे मुसोलिनी के ‘फासिस्ट बिजनेस माॅडल’ के सन्दर्भ में ‘नवनाजी’ या ‘न्युकान्स’ भी कहते हैं।
नव-उदारवाद की ज़मीनी हक़ीक़त और इन नीतियों की भारत में प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रेक्षण में प्रकाश डालते हुए भर्ती मामले को अवैधानिक एवं
असंवैधानिक करार दिया है और कहा है कि केन्द्र एवं राज्य ने मिलकर विद्रोह को शान्त करने के बहाने आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए ‘‘आदिवासी गरीबों की आधी जनसंख्या’’ को उनकी ‘‘दूसरी
आधी’’ जनता द्वारा मार डालने की नीति बनाई है ताकि कम्पनियों को खनिज-संपदा को लूटने का मौका मिले जबकि आदिवासी भूमि को किसी को देने पर संवैधानिक निषेध लागू है।


-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

मंगलवार, 21 जून 2011

तेरे माथे पे ये आँचल, बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।


असरारुल हक़-मजाज़
(19.10.1911-05.12.1955)

मजाज़ 19 अक्टूबर 1911 ई0 को यू0पी0 के मशहूर कस्बा रुदौली, जिला बाराबंकी के एक इल्म दोस्त ज़मींदार ख़ानदान में पैदा हुए। उनके वालिद चैधरी सिराजुल हक़ क्वींस कालेज लखनऊ में उस्ताद थे। इस के बाद वह महकमए रजिस्टेªशन में मुलाजि़म हो गए और रीजनल इन्सपेक्टर और असिस्टेन्ट रजिस्ट्रार के ओहदे पर पहुँच कर रिटायर हुए। दौराने मुलाजिमत उनका तबादला आगरा और अलीगढ़ भी हुआ जहाँ का कयाम मजाज़ की जि़न्दगी में बहुत अहमियत रखता है। मजाज़ ने हाईस्कूल का इम्तिहान अमीनाबाद स्कूल लखनऊ से पास किया। वालिद के आगरा तबादला हो जाने से वह उनके साथ आगरा चले आए और 1929 ई0 में सेंट जान्स कालेज आगरा में एफ़0एस0सी0 में दाखिला ले लिया। यहाँ कालेज में मुईन अहसन जज़्बी और आले अहमद सुरूर का साथ रहा। इस के अलावा मैकश अकबरावादी और फ़ानी बदायूँनी की सोहबत का इन पर गहरा असर हुआ। वालिद के तबादले की वजह से इन्हें अलीगढ़ आना पड़ा, यहाँ 1935 ई0 में उन्होंने एम0ए0 में दाखिला लिया, लेकिन तालीम मुकम्मल करने से पहले ही इन्हें आल इण्डिया रेडियो देहली में मुलाजि़मत मिल गई और वह देहली चले आए। अलीगढ़ मंे हयात उल्ला अंसारी, सिब्ते इसन, अख़्तर हुसैन रायपूरी, मसूद अख़्तर जमाल, सआदत हसन मिन्टू, असमत चुग़ताई और सरदार जाफरी वगैरह इनके साथियों में थे। यह वह जमाना था जब आजादी की तहरीक अपने शबाब पर थी और ये सब आजादी के सरफ़रोशों और इन्क़लाब के अलम-बरदारों में थे। इसी जमाने में तरक़्क़ी पसंद तहरीक की इब्तिदा हुई। सोशलिज़्म से मुतास्सिर ये सब नौजवान तरक़्की पसंद तहरीक में शामिल हो गए। मजाज़ ने कुछ अरसा बाद रेडियो की मुलाजि़मत छोड़ दी और लखनऊ चले आए जो उस वक़्त तरक़्की पसंद तहरीक का मरकज़ था और जहाँ, रशीद जहाँ, हयात उल्ला अंसारी, सरदार जाफ़री सब जमा हो चुके थे। हयात उल्ला अंसारी हफ़्तावार अखबार ‘हिन्दोस्तान’ और सिब्ते-हसन व सरदार जाफ़री ‘परचम’ निकालते थे। मजाज़ भी परचम की इदारत में शामिल हो गए।
मजाज़ शदीद तौर पर हस्सास और जज़्बाती इंसान थे, इन की शायरी और दिलचस्प जुमलों से तो सब लुत्फ़ अन्दोज़ होते थे लेकिन उनके कर्ब को समझने वाला कोई नहीं था। तरक़्क़ी पसंद तहरीक के साथियों और उन से बेहिसाब मोहब्बत करने वाले लोगों ने भी सिर्फ़ उन्हें खूबसूरत और जि़न्दगी से भरपूर शेर कहने वाला समझा। उनके अंदर जो शिकस्त की आवाज़ थी, उसको कोई नहीं सुन सका। आखि़र बर्दाश्त ने जवाब दे दिया और 1940 ई0 में उन पर जुनून का पहला दौरा पड़ा। पहले दौरे से ठीक हुए तो बंबई (मुम्बई) इन्फ़ारमेशन आॅफिस में मुलाजि़मत कर ली, वहाँ दिल नहीं लगा तो देहली हार्डिंग लायब्रेरी में नौकर हो गए। 1945 ई0 में दूसरा दौरा पड़ा और 1950 ई0 के क़रीब तीसरा। इन सब के बावजूद जब वह ठीक हो जाते तो फिर रौनक़े महफि़ल बन जाते और चाहने वालों की भीड़ में मोहब्बत और इनक़्लाब के नग़मे सुनाते।
3 दिसम्बर 1955 को स्टुडेन्ट्स उर्दू कन्वेंशन की वजह से मजाज़ के बहुत से पुराने साथी सरदार जाफ़री, असमत चुग़ताई, नियाज़ हैदर, साहिर लुधयानवी, डाॅक्टर अब्दुल अलीम, प्रोफ़ेसर एहतेशाम हुसैन जमा थे। रात-सफे़द बारादरी के मुशायरे में मजाज़ ने लहक-लहक कर दो ग़ज़लें सुनाईं। कोई नहीं जानता था कि यह मजाज़ की जि़न्दगी का आखि़री मुशायरा है। 4 दिसम्बर 1955 ई0 की रात में उन पर दिमाग़ी फ़ालिज का हमला हुआ। उन्हें इलाज के लिए बलरामपुर अस्पताल में दाखि़ल किया गया, लेकिन उर्दू शायरी का यह सूरज 5 दिसम्बर 1955 ई0 की उदास रात में 10 बजकर 22 मिनट पर हमेशा के लिए डूब गया। सरदार जाफ़री, असमत चुग़ताई, एहतेशाम हुसैन और बहुत से अदीब व शायर उनके सरहाने मौजूद थे। 6 दिसम्बर 1955 ई0 को पेपर मिल कालोनी, निशातगंज के क़ब्रिस्तान में उन के दोस्तों, अज़ीज़ों और हज़ारों मद्दाहों ने उन्हें सुपुर्दे-ख़ाक कर दिया।
मजाज़ के इन्तेकाल को 50 साल से ज़ायद गुज़र चुके हैं, लेकिन उस आवाज़ का असर, उसकी शखि़्सयत की तरहदारी, उसकी शायरी की रजामियत और हौसलामंदी आज भी उसी तरह है। मजाज़ की यह खुसूसियत है कि वह अपने अहद की आवाज़ भी हैं और आने वाले ज़माने की आवाज़ भी। जब तक इन्सानियत जुल्म, नाइंसाफी, दहशतगर्दी और ऊँच नीच का शिकार है, जब तक नौजवान अपनी मोहब्बत और अपनी जिन्दगी की ताबीर के लिए आवारा है, जब तक ‘चमन-बन्दियये-दौराँ’ के लिए खूने दिल नज़्र करने की जरूरत है, मजाज़ के कलाम की कशिश बाक़ी रहेगी।
मजाज़ तरक़्क़ी पसंद शोअरा में ऐसे शायर थे जिन्हें सब पसंद करते थे और जिन से सब मोहब्बत करते थे। अगर एक तरफ़ सज्जाद ज़हीर, फै़ज़ अहमद फ़ैज़ और सरदार जाफ़री उनके मद्दाह थे तो दूसरी तरफ़ क्लासिकी शायरी के नुमाइन्दा शायर नवाब जाफ़र अली खाँ, असर लखनवी और सालिक लखनवी उन की शायरी के मोतरिफ़ थे, जिस का बुनियादी सबब यह था कि उन्होंने पूरे क्लासिकी रचाव और ज़बान के रख-रखाव के साथ शायरी की। उन की फिक्र नई है लेकिन रोजमर्रा और ज़बान का जादू वही है। वह तरक़्क़ी पसंद तहरीक के नुमाइंदा शायरों मंे थे। जिन्दगी की बदलती हुई क़दरों और असरी तकाज़ों पर उन की गहरी निगाह थी। मजाज़ की शायरी रूमानियत या इन्क़लाबी रूमानियत की मिसाल बाद में है पहले वह अपने अहद की मिससियत की अलामत है। वह उस वक़्त की जि़न्दगी, तहज़ीब, तज़ादात, जद्दो-जेहद, उस वक़्त की घुटन, तशनगी, हिरमाँ-नसीबी और बेबसी की अलामत है।
मजाज़ की शायरी की एक खुसूसियत इसमें जि़न्दगी की ताज़गी और गर्मी है। वह जाती तौर पर नाकामियों और घुटन का शिकार रहे, लेकिन उनकी शायरी कभी मायूसी और यासियत का शिकार नहीं हुई। जि़न्दगी के बारे में उनका रवैया हमेशा खुश-आइंद रहा। इसीलिए उन्होंने लिखा था:-

खूने दिल की कोई क़ीमत जो नहीं है तो न हो,
खूने दिल नज़रे चमन-बन्दीए दौराँ कर दे।

यही हौसला और अज़्म उनकी शायरी की ताक़त है और इसी ने उन्हें असरी मिस्सियत का मुसव्विर बना दिया है। मजाज़ के यहाँ जमालियाती एहसास और फि़करी इज़हार में जो जमालियाती कैफि़यत है, वह उनके अहद के कम शायरों में मिलेगी। उनकी नज़्में-रात और रेल, मुसाफि़र, ख़्वाबे सहर, जज़्बे और एहसास की ऐसी तसवीरें हैं, जो हर दिल में एक बेहतर जि़न्दगी की तमन्ना बेदार करती हैं। यह सिर्फ़ मजाज़ हैं, जो पहले जश्ने-आज़ादी के जोशों खरोश में जब ‘‘ज़माना रक़्स में है,जि़न्दगी ग़ज़ल ख्वाँ है’’ की सूरत थी, वह आने वाली जि़म्मेदारियों का यह कहकर एहसास दिलाते हैं कि ‘‘यह इन्तहा नहीं, आग़ाजे कारे मरदाँ है’’।
मजाज़ की शायरी हमेशा जि़न्दगी की खूबसूरती और ताज़गी का एहसास दिलाती है, मजाज़ का ये शेर-

तेरे माथे पे ये आँचल, बहुत ही खूब है लेकिन,
तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।

आज भी जि़न्दगी की जद्दो-जहद में औरत की बराबरी और उसके निसाई हुस्न, दोनो का एहसास दिलाता है। मजाज़ ने इन्क़लाब और तब्दीली के नग़मे भी लिखे हैं, लेकिन वह किसी एक इन्क़लाब के नग़मा-ख़्वाँ नहीं, वह जि़न्दगी के नग़मा-ख़्वाँ हैं, और उस के हुस्न, दिलकशी और मसर्रत के लिए, हमेशा एक ताज़ा इन्क़लाब की तमन्ना करते हैं।
आओ, मिलकर इन्क़लाबे ताजह़तर पैदा करें,
दहर पर इस तरह छा जाएँ कि सब देखा करें।

मजाज़ की यह आवाज़ आज भी उसी तरह दिलकश, उसी तरह खूबसूरत और दिल-आवेज़ है, और मुस्करा कर आने वाले ज़माने से कह रही है-
जो हो सके, हमें पामाल करके आगे बढ़,
न हो सके तो, हमारा जवाब पैदा कर।

-प्रोफे़सर शारिब रुदौलवी
उर्दू से लिप्यन्तरण- डॉ0एस0एम0 हैदर
लेखक मो0:- 09839009226

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

कर दिया चुप वाक़्याते-दह्र नें, भी कभी हम में भी गोयाई बहुत।

एक रिर्पोट देख कर सांसदों के बारे में मुझे अपनी पहले की धारण को लगता है परिवर्तित करना पड़ेगा। पहले हम ही क्या, सभी यह विचार करते होंगे कि सांसद बड़ा बवाली, बहुत उत्तेजक, हंगामें बाज़ नारेबाज़, कुर्सियाँ, माइक भंजक, फ़ाइले फाड़ने वाला, राष्ट्रपति को अभिभाषण न पढ़ने देने वाला, काग़ज के गोले फेकने वाला, ‘वेल‘ मे जाकर अक्खाड़े बाज़ी करने वाला होता है। अब मालूम हुआ कि इनमें से 35 फ़ीसदी शन्ति स्वभाव के हैं। बेचारे कुछ बोलते ही नहीं, न कबूतर बाज़ हैं, न ही प्रश्न पूछने के लिए रक़म पैदा करते हैं। वोट देने के लिए ‘बिकते‘ हैं या नहीं? यह नहीं कह सकता। सरकार बनाने या गिराने के मौक़ों पर यह ‘चांस‘ मिलता है।
स्वतंत्र संस्था पी0आर0एस0 लेजिस्लेटिव रिर्सच नें हाल ही में ख़त्म हुए मानसून सत्र की समीक्षा की, इसके मुताबिक, दोनो सदनों में ‘शान्त‘ बैठे रहने वाले सदस्यों की संख्या औसतन 35 फ़ीसदी है। मुद्दे उठाना, सवाल पूछना तो दूर की बात हैं, किसी चर्चा-परिचर्चा में भी यह हिस्सा नहीं लेते एक मतदाता यह सोचकर इन्हें भेजता है कि सांसद जी वहाँ जाकर क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान कराएँगे, मगर यहाँ आकर बस यह मूक-दर्शक बन जाते हैं, अगर बोलते भी हैं तो अपने वेतन-भत्ते बढ़वाने के मुद्दे पर। लगता है कि इन पर ‘परमानन्द माधवम‘ की कृपा भी नहीं होती, जिस से ‘मूकम् करोति वाचालम‘ वाली स्थिति वैदा हो जाती।
अब मैं एक बात और सोचता हूँ, इस आदत में अच्छे पहलू भी हैं- पुरानी मसल है कि "TALK IS SILVER BUT SILENCE IS GOLD" इस हिसाब से तो यह ‘सेाने‘ वाले हुए। रिर्पोट ने यह नहीं बताया कि यह ‘सोने‘ के कितने माहिर हैं।
यहाँ पर ‘हाली‘ का एक शेर याद आ गया, इसमें ‘वाक़याते दह्र‘ का अर्थ ‘दुनिया की घटनायें‘, और ‘गोयाई‘ का अर्थ है बोलने की आदत-
कर दिया चुप वाक़्याते-दह्र नें,
भी कभी हम में भी गोयाई बहुत।
अब देखना ये पड़ेगा कि यह सांसद चुप क्यों रहते हैं? क्या पहले कभी बोलते भी थे? या जब से चुने गये तब से अब तक इनकी यही स्थिति बनी रही? इस मामले में एक मध्य मार्ग भी है, वह यह कि जो ज़्यादा बोलते है, कम बोलें जो नहीं बोलते हैं, वह कुछ बोलें ज़रुर। हिन्दी कवि नें यही सीख दी है-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
डा. एस.एम. हैदर
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 20 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, अंतिम भाग

यह बात बहुतों को नही मालूम है कि गांधी जी को प्रथम समाजवादी क्रान्ति से, जो 1917 में हुई, पूरी हमदर्दी थी, इस क्रान्ति ने सभी राष्ट्र-मुक्ति आन्दोलनों को अपना सहयोग दिया। गांधी की मुख्य सोच केवल यही नहीं थी कि उन्हें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाए, यह तो उनके अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का पहला चरण था, अन्य उद्देश्य थे- भूख, बेरोजगारी तथा विकराल अभावग्रस्तता का उन्मूलन। वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था ही बेरोज़गारी और मानवीय पतन का कारण है। गांधी का इस पर विश्वास था कि सामन्तवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर इसका दूसरा रास्ता खोजा जाए, यदि मानव जाति को डूबने से बचाना है, शोषण, असमानता, बेरोजगारी, हिंसा और युद्ध से मुक्ति दिलाना है। गांधी जी राजनैतिक सन्धि हेतु जब लंदन गए और वहाँ की एक श्रमिक बस्ती में जाकर रहे तब उन्होंने खुले आम यह कहा कि भारत में ब्रिटिश सामानों का जो बहिष्कार हो रहा है उसके निहितार्थ इंग्लैंड के श्रमिक समझने की क्षमता रखते हैं।
डा0 एम0एस0 स्वीमीनाथन जो एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हैं और जिनकी पहचान भारत में हरित क्रान्ति से जुड़ी है (उन हलकों में विवादास्पद हैं जो उस आर्गैनिक फारमिंग का समर्थन करते जो केमिकल तथा कीट नाशक दवाओं से मुक्त हों, उनका मत है कि उस भार से किसान पस्त हैं और उनके कर्जे बढ़ रहे हैं तथा ज़मीन व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं) उन्होंने ब्लूूम वर्ग यू0टी0वी0 पर अपने एक साक्षात्कार में जो 20 जनवरी 2010 को रिले किया गया उसमें गांधी जी की राजनैतिक प्राथमिकताओं को याद किया, इस बात पर भी दुःख प्रकट किया कि पिछले दशक में संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य उपलब्धता व पोषकों हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए थे भारत उनकी आधी उपलब्धि भी नहीं प्राप्त कर सका, जबकि वियतनाम और चीन ने उन्हें प्राप्त कर लिया। यह भी चेतावनी दी कि खाद्य वस्तुओं की असुरक्षा तथा उनके दामों में बेतहाशा बृद्धि आम-जनता के लिए असंतोष का कारण बनेगी।
इस बढ़ी हुई आयु में किसी अन्य राजनैतिक नेता को नहीं, केवल महात्मा गांधी को फासीवादी और दक्षिण पंथियों ने अपना निशाना बनाया तथा उनकी हत्या कर दी, इसलिए कि वे उनकी राजनैतिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को भारत में अपने साम्राज्यवादी भविष्य के एजेण्डे के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे थे। अब हत्यारे या उनके वैचारिक सहायक इसकी जो भी व्याख्या करें। बहरहाल बँटवारे के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की पुनर्संरचना को, जाते हुए साम्राज्यवादी थोप रहे थे तथा इसमें दोनो धार्मिक समूहों की राजनैतिक शक्तियों का सहारा ले रहे थे और धार्मिक हत्याओं हेतु उनको प्रशिक्षित किया जा रहा था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि आज के क़ब्ज़े वाले देशों तथा कल के लक्षित देशों में किया जा रहा है।
गांधी के सहयोग से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले, ग्रामीण व नगरीय कामगारों, दलितों के मसीहा, भारत के
संविधान के निर्माता डा0 बी0आर0 अम्बेडकर जिन्होंने संयुक्त राज्य की कोलम्बियाँ यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की थी, जब
गांधी जी की हत्या की गई तो असीमित पीड़ा के साथ अपनी भावनाओं को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया ‘‘महात्मा गांधी हम से सब से ज्यादा क़रीब थे‘‘ इस श्रद्धांजलि ने इस शरीफ़ लेकिन समझौता न करने वाले क्रान्तिकारी के जीवन का निचोड़ पेश कर दिया। 20वीं सदी के अनेक नेतृत्व करने वालों के साथ-साथ गांधी ने केवल भारतीय जन-मानस को ही राजनैतिक प्रेरणा नहीं दी वरन् वह, संसार के विभिन्न भागों में होने वाले आन्दोलनों के भी प्रणेता बने ताकि उस राजनैतिक साम्राज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिसकी संरचना ही इसलिए की गई थी ताकि श्रमिकों व कामगारों के राजनैतिक आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का हनन किया जाय।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
( समाप्त )

रविवार, 19 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 2

एक क्रान्तिकारी की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके शिष्य कैसे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग उभरे एवं वह महात्मा गांधी के पद चिन्हों पर चले। अमेरिकी इतिहास के एक बहुत बड़े आन्दोलन का उन्होंने नेतृत्व किया। उन्होंने यू0एस0 के मिलिट्रीवाद का विरोध तथा अमेरिका के अफ्रीकी लोगों की मुक्ति का आन्दोलन चलाया। उनका मत था कि सेना का अन्याय वहाँ के कामकाजी लोगों के खिलाफ हैं, यह मानवता के विरुद्ध है तथा नस्लवाद एवं शोषण को बढ़ावा देता है। महात्मा गांधी का मत था कि एक ऐसे देश में जहाँ लाखों भूखे हांे, खाना ही प्रथम आवश्यकता है। वे कहते थे कि धार्मिक-दर्शन पूरी मानवता के सम्मान का उपदेश देता है, इसमें संस्कृतियों के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है। मार्टिन लूथर किंग इस बात पर जोर देते हैं ‘‘कोई भी धर्म जो मनुष्य की आत्मा की तो चिंता करे और उस गंदी बस्ती की चिंता न करे जिसमें आत्मा पैदा हुई और जहाँ की आर्थिक दशाओं ने उसे लँगड़ा कर रखा है, वह धर्म बीमार है उसे खून देने की जरूरत है’’ राजनैतिक प्रशिक्षण के आलोक में गांधी ने राजनैतिक रणनीति के तौर पर सविनय अवज्ञा, असहयोग, आन्दोलन तथा सत्याग्रह को चुना। भारतीय आन्दोेलन पर भी इस का यह प्रभाव पड़ा कि यहाँ लाखों लोग इस जनसंघर्ष में कूद पड़े जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपना शासन चलाना मुश्किल हो गया। वर्तमान में बोलोविया की स्थिति पर अगर ग़ौर करें तो वहाँ के देशी लोगों ने एक बड़ा असहयोग आंदोलन चलाकर, राजनैतिक और आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए वहाँ का तख़्ता पलट दिया था।
अब देखिए, दूसरी ओर भारत में मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों ने ‘आपरेशन ग्रीन हन्ट‘ का कोई विरोध नहीं किया। बहुत बड़ा ‘पैरा मिलिट्री‘ अभियान मध्य एवं पूर्वी भारत के देशी आदिवासियों एवं किसानो के ख़िलाफ़ छेड़ दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘सल्वा जुडुम‘ को बन्द करने के निर्देश दिए थे। जिसकी वित्तीय सहायता मध्य एवं पूर्वी भारत में भारतीय एवं विदेशी मल्टीनेशनल कार्पोरेट खान उत्खनन जगत करता था, जिनका उद्देश्य था उस जमीन को खाली करा लेना जो मिनरल पदार्थों से परिपूर्ण है तथा यह हज़ारों एकड़ जमीन वहाँ के आदिवासियों और किसानो के क़ब्ज़े में पुराने ज़माने से रही है तथा उस पर वह खेती करते चले आ रहे हैं। औद्योगिक स्वार्थों के तहत उस ज़मीन पर बड़े पैमाने पर क़ब्ज़े किए गए तथा गरीब बस्तियों को उजाड़ा गया। कुछ लोगों ने इस ज़्यादती को ‘आन्तरिक उपनिवेशवाद‘ की संज्ञा दी है। कृषि एवं उद्योग के बीच ‘बैलेंस‘ बनाने हेतु अगर गांधी होते तो क्या करते? आज का हाल तो यह है कि कुछ गंाधीवादी जो यहाँ के आदिवासियों एवं कृषकों के हित में काम कर रहे थे वे निशाना बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
गांधी जी की ग़लत तस्वीर पेश की गई, उन्होंने औद्यीगीकरण तथा आर्थिक विकास का कभी विरोध नहीं किया। उनका नज़रिया यह था कि जो भी बड़ी या छोटी इन्डस्ट्री हो उसका मुुख्य उद्देश्य देहातों व शहरों में बेरोज़गारी का ख़त्म करना, होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण था कि भारी उद्योगों पर सामाजिक कन्ट्रोल हो, प्रबंधन के सभी सेक्टरों में श्रमिकों की भागीदारी हो और उन्नत कृषि तकनीक हेतु भारी प्रयास किए जाएँ। उनका इस बात पर ज़ोर था कि ग्रामीण ढाँचागत विकास के तहत साफ़ पानी, सफ़ाई, स्वास्थ्य, साक्षरता, शिक्षा, तथा आधारभूत निवास को त्वरित प्राथमिकता दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी और माओत्सेतुंग के प्रोग्रामों में बहुत सी समानताएँ हैं। ख़ास तौर से उन देशों में जो उपनिवेशवाद के कारण ऐतिहासिक रूप से तबाह हुए, जहाँ खेतियाँ बर्बाद हुईं, वहाँ आर्थिक उत्थान का आरम्भ कैसे किया जाए, हालाँकि दोनों के तरीक़ों में अन्तर था। माओ एक ऐसे राष्ट्रवादी थे जिनकी चिंताएँ चीन-वासियों हेतु थीं। महात्मा गांधी हालाँकि भारतीय समाज के विशिष्ट हालात को बखूबी समझते थे फिर भी उनकी चिंताएँ समस्त मानवता के लिए थीं। 20वीं सदी के राजनैतिक आन्दोलनों की पूरी समझ रखते थे तथा वे एक राजनैतिक यर्थाथवादी भी थे। महात्मा गांधी ने ‘सेलेक्टेड वकर््स‘ तीसरे खण्ड में ‘रिकान्सट्रकशन प्रोग्राम‘ के अन्तर्गत, जो 1941 में, फिर संशोघित 1945 में प्रकाशित हुआ ‘इकोनामिक इक्वैलिटी‘ के शीर्षक से पैरा 13 में यह कह कर सावधान किया, ‘‘जब तक धनवानों एवं लाखों भूूखों के बीच एक बड़ी खाई बनी रहेगी, एक हिंसा रहित सरकारी-तंत्र का स्थापित होना असंभव है। जब तक नई दिल्ली के बड़े-बड़े महलों एवं गरीब श्रमिक वर्ग की दुखदायी झोपड़ पट्टियों का अन्तर बाकी रहेगा एक न एक दिन हिंसक और खूनी क्रान्ति निश्चित है। जब तक कि धनी वर्ग स्वेच्छा से अपनी सम्पदा और शक्ति को आम भलाई के कामों मंे न लगा दे।
गांधी आज कल के भारतीय एवं अन्य स्थानों के राजनैतिक वर्ग के स्तर तथा व्यक्तिगत स्तर पर स्व-चरित्र के उदाहरण पेश करने पर ज़ोर देते थे। विलासिता पूर्ण, अविवेकी, निर्लज्ज जीवन बिताने हेतु, जीवन भर के लिए ज़रूरत से अधिक सामान एवं धन-सम्पदा एकत्र करना तथा दूसरी ओर एक बड़े समूह का इन सब से वचिंत होना, गांधी जी के विचार में अत्यंत घातक था। वे चाहते थे कि देशवासी सादा, सरल, नैतिक जीवन का ढंग अपनाएँ क्योंकि आज के भारतीय राजनैतिक वर्ग अथवा अन्य का आचरण इसके विपरीत है। अनेक देशों के सरकारी तंत्र भी क़र्ज लेते-लेते इसी चक्रव्यूह में फँसते हैं जिससे उनमें रहने वाले समाज पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
यह बात निर्विवाद है कि महात्मा गांधी के राजनैतिक संघर्ष का एक मानवीय पहलू भी था, जिसके कारण उन्हें पिछाड़ पाना कठिन था। उन्हों ने व्यक्ति के बजाय समाज की नाइंसाफियों तथा उस राजनैतिक प्रणाली पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा जो मानव को दासता की ओर ले जाता है। उनके पास आगे बढ़ने और पीछे पिछड़ने का राजनैतिक कौशल तथा राजनैतिक अनुभवों की गहरी समझ थी। उपनिवेशवाद के खिलाफ़ किसी भी आन्दोलन को इतना अधिक सहयोग एवं विभिन्न विचार धाराओं के लोगों का समर्थन नहीं मिला जितना उनके आन्दोलन को।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

शनिवार, 18 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 1

समस्त संसार में ये पूर्वानुमानों के दौर हैं। अनेक क्षेत्रों में हम आर्थिक और वित्तीय गिरावट देख रहे हैं जिसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी साम्राज्यवाद के ऐतिहासिक विकास में निहित है। साथ ही साथ मानवीय इतिहास में वह महायुद्ध भी हैं, जिनका उद्देश्य था सभी महाद्वीपों के स्वतंत्र राष्ट्रों को नव उपनिवेश बनाना और बरबाद करना, देशों के बजट, उनके आर्थिक क्षेत्रों व बाजारों को छीनना, प्रत्यक्ष रूप से उस नागरिक आबादी के खात्मे को लक्ष्य बनाना जिसे वे उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।
अनेक देशों पर सैनिक आक्रमण हुए तथा कब्जे भी हुए जैसे फिलिस्तीन, कांगो, पूर्व योगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, यमन, हैती और वे देश भी जिनको धमकियाँ दी जा रही हैं या आगे जिन पर कार्यवाही होना है जैसे ईरान, रूस, चीन। इन बातों के बावजूद आज तक विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, फासिस्टवाद की समस्या के हल के लिए कोई गंभीर राजनैतिक प्रयास नहीं हुए, हालाँकि राजनैतिक आंदोलनों तथा जमीनी मुठभेड़ों के साहस जोर पकड़ते रहे हैं। बहरहाल नतीजा यह निकला कि एक के बाद एक देश सैनिक हमलों से या तो बर्बाद कर दिए गए या फिर आन्तरिक फासिस्टों के आगे नत-मस्तक हुए। इस प्रकार से सैनिक आक्रमण के साथ-साथ घातक प्रोपोगण्डा जो इस समय विश्व स्तर पर हो रहा है उसके खिलाफ नागरिकों को शिक्षित करने में हमारी वैचारिक विफलता जिम्मेदार है और नागरिकों तथा समाज के दीर्घ कालिक राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए यह बात घातक भी है। यही बात उन सरकारों के लिए भी है जो ऐतिहासिक क्रांतियों के बाद स्थापित हुईं और जिनके सामथ्र्य को कमजोर कर दिया गया।
अन्य समाजों या संघों के साथ-साथ भारत एवं इसमें रहने वाले एक बार फिर वैश्विक तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय वरदान बन गए हैं। भारत सरकार की तीन कमेटियों ने भी यह रिपोर्ट दी है कि भारत की तिहाई आबादी से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं और असंगठित कार्य क्षेत्र के लगभग 700 मिलियन श्रमिक प्रतिदिन एक डालर से कम पर और अनेक ऐसे भी हैं जो लगभग बीस रूपये रोज पर जो आधे डालर से कम हैं, जिन्दगी गुजारते हैं। इन हालात के तहत एक चैथी कमेटी ‘‘कृषि सुधार और भूमि सुधार के अधूरे कार्य‘‘ ने भूमि अधिग्रहण की राज्य की नीतियों की आलोचना की है और कहा है यह सब विदेशी तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ पहुँचाने के लिए है। यह भी कहा कि वैधानिक अनुशासनहीनता, गरीबी और हिंसा की जो साइकिल है उसका कारण है राज्य का नव उदारवाद का आर्थिक एजेन्डा और उन कानूनों का संशोधन जिनके द्वारा देशी जनजातियों तथा कृषकों के लिए बहुत समय से उन जमीनों को सुरक्षित कर दिया गया था। जिनमें वे खेती करते थे और जिन्हें उनसे छीना नहीं जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की अनुमान आधारित फारवर्ड टेªडिंग जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक निषिद्ध थी अब सरकारों ने महज राजनैतिक रंगों के दिखावे के लिए उनकी इजाजत दे दी ताकि फ्री-मार्केट एवं अंधाधुंध विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। यहाँ तक कि कृषि-व्यापार कम्पनियों के फायदे के लिए खाद्य-पदार्थों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भारत को बरबाद करने के लिए की गई। जबकि यह देश हजारों वर्षों से एक कृषि क्षेत्र के रूप में जाना जाता था अनेक प्रकार से खाद्यान्न पैदा किए जाते थे। जहाँ ‘सरप्लस’ की स्थिति होती थी। अब ‘इस्लामी आतंक’ को भी इन्हीं बातों से जोड़ा गया। अनेक क्रूरताओं का जिक्र करें तो देखते हैं कि तमाम बेकुसूर मार डाले जाते हैं बाद में पता चलता हैं कि इनके लिए झूठी कहानियाँ गढ़ी गई थीं तमाम लोगों को बेवजह फाँसा जाता है, इन बातों को अक्सर बचाव पक्ष के वकीलों ने खोला।
मानव जाति को इन तमाम क्रूरताओं से मुक्ति दिलाने हेतु जब हम रणनीति तलाश करते हैं तो 20वीं सदी के तमाम आन्दोलनों में से, इस समय हम को महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राजनैतिक संघर्ष को याद करना चाहिए। उन्होंने भारतीय आर्थिक क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के दखल का सख्ती से विरोध किया था। विश्व स्तर पर उनकी चिंताएँ इस बात से जाहिर होती हंै कि जब ब्रिटिश सरकार ने यूरोपीय यहूदीवाद से साठ-गाँठ के तहत ‘बालफोर डिक्लेरेशन’ फिलिस्तीन को उपनिवेश बनाने हेतु लागू करना चाहा तो गांधी जी ने उसका विरोध किया। मानव जाति की बरबादी के खिलाफ उनकी आलोचनाएँ जो उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के कारण र्हुइं तथा अन्यायी राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेकने के लिए राजनैतिक प्रशिक्षण हेतु उनकी रणनीति, बहुलवादी संघर्ष, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आदि सभी बातें उन लोगों के लिए अब भी उपयुक्त हैं जो इस, 21वीं सदी में मानव समाज की नई संरचना के उपायों की तलाश में लगे हैं।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता के महान युद्ध की विफलता के बाद जिसमें 10 मिलियन भारतीयों की हत्या ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने की थी, उपनिवेश वाद की विरोधी ताकतें भी कुछ न कर सकी थीं, महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छिटकी हुई उग्र घटनाएँ ब्रिटिश शासन को नहीं हरा सकतीं। इसके लिए सतत राजनैतिक जागरूकता की शिक्षा,तथा मुख्य मुद्दों पर बहुजन संघर्ष की जरूरत है और यह भी जरूरी बताया कि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक असहयोग हो कि नाइंसाफी का शासन पंगु हो जाए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने विदेशी राजनैतिक एवं आर्थिक ढाँचे को
ध्वस्त कर दिया, जिससे हम ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ तक पहुँच गए।


-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

सोमवार, 30 अगस्त 2010

जो 'रहीम' दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय

यद्यपि मैं कोई धर्माधिकारी नहीं हूँ, फिर भी विश्यनता करके समयानुकूल रोजे की प्रकृति, उद्देश्य एवं वर्तमान बदलाव के सम्बन्ध में कुछ व्याख्या करना चाहता हूँ।
जैसा कि अनेक सज्जन जानते हैं, पैगम्बर मोहम्मद साहब को अपने निवास मक्का को 53 वर्ष की आयु में छोड़ना पड़ा, तथा उम्र के आखिरी १० वर्ष तक मदीना में अकर रहे, यहीं से इस्लामी कलेंडर- 'हिजरी' सन् का आरम्भ हुआ। इस सन् के नौवे माह का नाम 'रमजान' है, जिसके पूरे मास 29 या 30 दिन तक रोजा, सुबह अजान से पूर्व से लेकर सुरस्त तक रखा जाता है। इस दरमियाँ अच्छे काम करने तथा बुरे काम न करने के निर्देश दिए गए हैं, जिसमें खाना, पीना, धुम्रपान सहित अनेक कार्यों को न करने को कहा गया है। व्रत और फास्ट भी यही है, परन्तु अंतर भी है।
पवित्र कुरान के सूरा 'बकरह' आयत 183 में रोजे का उद्देश्य 'मुत्तकी' हो जाना बताया गया है, जिसका अर्थ 'एहतियात' या 'परहेज' करने वाले के हैं। अंग्रेजी में इसे काशन (कौतिओन्स) कह सकते हैं। हिंदी में अनेक शब्द हैं- सावधान, चौकस, सचेत या सतर्क। इसके द्वारा मनसा, वाचा, कर्मणा का अच्छा रूप अपना कर व्यक्तित्व एवं सामाजिक आचरण में परिवर्तन अपेक्षित है। ये चाह गया है कि रोजेदार को शारीरिक एवं मानसिक लाभ तो मिले ही, मुख्य रूप से उसमें अध्यात्मिक एवं नैतिक बदलाव आ जाए। केवल खाना पीना जीवन का लक्ष्य न बने।
जब मरीज, डॉक्टर से 'परहेज' के बारे में पूछता है तो वह कुछ बातों के लिए मन करता है, यह अधूरी व्याख्या है। इस शब्द में नकारात्मक सहित सकारात्मक पहलु भी शामिल हैं। हमको इन्द्रियों को काबू में करना है और मन, आँख , कान, मूंह, हाथ पैर से गलत काम नहीं करना है। गुस्सा, द्वेष दूसरों की बुरे करने से बचना है। मुंह द्वारा परहेज यह है कि हराम माल पेट में न जाने पाए। यदि इस पर अमल हो जाए तो चोरी, रिश्वत, भ्रष्टाचार की समस्या हल हो जाए। पैगम्बर साहब का कहना है कि यदि यह सब बातें नहीं होती हैं तो केवल भूख प्यास से कोई लाभ नहीं। रोजा नहीं मन जायेगा। मोहम्मद साहब की एक 'हदीस' का उल्लेख कर दूं, कहते हैं कि मुसलमान वह है जिसकी जबान और हाथ से किसी को कोई कष्ट न पहुंचे। इसका परिधि असीमित है। केवल मुसलमान के लिए नहीं, यह बात पूरी सृष्टि के लिए कही गयी है। रोजेदारों से अपेक्षा नहीं है कि केवल रमजान के माह भर अच्छे बने रहिये बाकी ग्यारह महीने छुट्टा घूमिये। दर असल यह एक प्रशिक्षण मॉस है- कि जो भूल गए हों, याद आ जाए ताकि आगे आप परिवार, समाज सहित सदाचरण करते रहिये। उसके अंतर्गत परोपकार एवं दान (फ़ित्र आदि) पर बहुत जोर दिया गया है।

यहाँ तक तो बातें ठीक हो गयीं। मैं ने वाही लिखा जो इस्लामी किताबों में लिखा है। परन्तु असल चीज मुसलमान का अमल या आचरण है , जिसको देख कर फैसला किया जाता है। हम अपने प्रति इतना खुश फ़हमी में हैं कि हमारी हिम्मत नहीं, कि अपनी सूरत आईने में देखें। हम सभी को नहीं कहते हैं, अनेकानेक बहुत अच्छे हैं परन्तु अनेकानेक ऐसे भी हैं, जिन्होंने ने धर्म को आडम्बर में बदल दिया है। धर्म रुपी शरीर की आत्मा कहीं पलायन कर गयी है। जो चारित्रिक पतन हुआ है- उसकी कौन कौन सी बातें लिखी जाएँ ? आप उन बातों को गुप्त नहीं रख सकते, सभी देख रहे हैं, सभी जान रहे हैं। प्रत्यक्ष कि प्रमाणम।
बात रोजे की हो रही है, देखिये कि इस्लाम ने इन्द्रियों पर काबू की बात की है परन्तु हम आप कैसे दिख रहे हैं- गुस्से से भरे हुए हैं, हम रोजा रख रहे हैं किसी पर एहसान तो नहीं कर रहे हैं- मगर भूख के कारण हमारा आचरण आक्रामक हो जाता है। 'इबादत' बड़ी अच्छी चीज है मगर इसका भी दिखावा कर रहे हैं, दूसरों पर हावी होना चाहते हैं, घमंड से भर गए हैं- न हँसते है न मुस्कराते हैं।
इस्लाम चाहता है, आप परिश्रमी, पराक्रमी बने, रोजा आप को मुसीबत झेलने का आदि बनाये, आप का यह हाल है कि आराम फरमा रहे हैं, जो काम करते थे वह भी छोड़ दिया।
मस्जिदों में लाउड स्पीकर लगवा कर देर देर तक सहर में आवाजें बुलंद करके दूर दूर तक के लोगों को कष्ट देते हैं। अनेक फिरको के आलिमो ने इसे गलत कहा है और एक बयान देवबंद से भी आया है कि ऐसा नहीं करना चाहिए।
अब जरा इफ्तार पार्टियों पर नजर डालिए- रोजेदार पीछे हैं, झूठे रोजेदार या रोजा न रखने वाले मिथ्याचारी आगे-आगे हैं। यह भी स्टेटस सिम्बल बन गयी। इसके बहाने अपने स्वार्थ सिद्ध किये जा रहे हैं। अमीर पार्टी दे रहे हैं, अमीर ही खँ रहे हैं। गरीब का कोई पूछने वाला नहीं। मैंने शिया- सुन्नी मस्जिदों के अन्दर बहार देखा है, अन्दर इफ्तार हो रहा है। अपने-अपने पेट भरने की उचल कूद चल रही है। गरीब बैठा हुआ ललचाई नज़रों से देख रहा है- गरेबान में झांकिए, क्या अल्लाह रसूल के यही पैगाम था ?

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय
जो 'रहीम' दीनहि लखै, दीनबंधु सम होय।

इस्लाम खानपान को नियंत्रित एवं संयमित करना चाहता, मुसलमान इस सादगी को वैभव में बदल रहा है।

डॉक्टर एस.एम हैदर

शनिवार, 14 अगस्त 2010

जाको राखै साइयाँ , मार सके न कोय

जिंदगी एवं मौत का सम्पूर्ण अधिकार सर्वशक्तिमान में निहित है, लेकिन हमारे कुछ भ्रष्टाचारी बन्धुवों ने इस 'पावर' को भी अपने हाथ में ले लिया है, यह कोई हवाई बात नहीं है, प्रमाण हेतु कुछ उदहारण सेवा में प्रस्तुत है -
विधान परिषद् सत्र में मायावती सरकार के समाज कल्याण मंत्री इन्द्रजीत सरोज ने शिक्षक दल के विधायक सुभाष चन्द्र शर्मा के प्रश्न के उत्तर में यह स्वीकार किया कि जे.पी नगर में 897 वृद्धावस्था पेंशन लाभार्थी जीवित दिखाए जा रहे थे तथा पेंशन प्राप्त कर रहे थे। जो सत्यापन में मृतक पाए गए ।
इसी सदन में जिन्दों को मुर्दा बनाया जाना भी स्वीकार किया गया, यह घपले स्वार्थवश राजस्व विभाग के अधिकारीयों व कर्मचारियों ने अंजाम दिए। सदन में सपा के सदस्य डॉक्टर राकेश सिंह राना के सवाल के जवाब में राजस्व मंत्री फागु सिंह चौहान ने माना कि ऐसे मामले सरकार के संज्ञान में हैं, जिन पर कार्यवाही विचाराधीन है।
अब एक घटना यह देखिये कि एक जिन्दा दलित महिला को पुलिस ने मृतक मान कर अदालती कार्यवाही भी कर दी, वह आश्चर्यजनक रूप से जीवित हाजिर हो गयी।
घटना यह बताई जा रही है कि ग्राम हथौंधा सोहिलपुर, थाना राम सनेहीघाट जिला बाराबंकी के निवासी शिव शंकर कौशल ने अपनी पुत्री कृष्णा के अपहरण की प्राथमिकी २००७ में दर्ज कराई। बाद में बरेली के कुतुबखाना के मोहन होटल में जब एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली तो इसी की शिनाख्त कृष्णा के रूप में करके कसे को हत्या की धाराओं में परवर्तित किया गया तथा थानाध्यक्ष, सब इन्स्पेक्टर , उप निरीक्षकों, कुल पांच पुलिसजनो की टीम ने कसे की विवेचना करके आठ लोगों को हत्यारोपी करार दिया जो पकड़ कर जेल भी भिजवाये गए जहाँ लम्बे समय तक बंद रहे।
स्तिथि उस समय बदल गयी जब वह अपने दो बच्चों के साथ अदालत में प्रस्तुत हुई। अदालत ने पांचों पुलिसजनो को हाजिर होने की तारिख निश्चित कर दी है।
मृतिका कृष्णा ने, जिसे अब जीवित कहा जायेगा, अपनी शिनाख्त हेतु तथा जीवित होने के साबुत हेतु प्रधान का प्रमाण पत्र तथा पढाई के अंकपत्रों सहित अन्य अभिलेख प्रस्तुत किये हैं। अच्छा यह हुआ कि वह सीधे अदालत पहुंची कहीं पुलिस वालों को पहले भनक लग जाती तो वह उसे जरूर ठिकाने लगा देते - कहते तब न सही तो अब सही। अब जो सुनता है यही कहता है -

जाको राखै साइयाँ , मार सके न कोय

-डॉक्टर एस.एम हैदर

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे

यह खबर क्या आप ने पढ़ी कि बैकुंठ में मुर्दों को लाइन लगनी पड़ी ? बात यह है कि लखनऊ में भैसकुंड नामक शमशान घाट गोमती तट पर है, जहाँ पर दाह संस्कार अपग्रेड करके संपन्न होता है, इसी स्थल का नाम बाद में बैकुंठधाम कर दिया गया। यहाँ के महापात्रों ने मुर्दों को नोचना शुरू किया अर्थात क्रिया कर्म हेतु बड़ी रकमों की सौदेबाजी करने लगे, जिसके कारण क्रिया कर्म में विलम्ब होने लगे और इसी बीच कई-कई शवो को अपनी अंतिम यात्रा हेतु इसी प्रकार लाइन में शामिल होना पड़ा। जिस प्रकार ये बेचारे जिंदगी भर राशन की दुकान पर, कभी रेल की खिड़की आदि पर लाइन में धक्के-मुक्की में लगे रहते थे, दुखद यह है कि अब भी उन्हें इस कष्ट से राम का नाम लिए जाने से भी मुक्ति नहीं मिल सकी।
लखनऊ के महापौर ने इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप किया तथा ` 500 /- प्रति लाश निर्धारित कर दिया। अब महापात्रों ने तीन स्लैब आर्थिक स्तिथि के आधार पर बना कर पैसे में बढ़ोत्तरी की मांग रख दी है, मुर्दे 'वेटिंग' में चल रहे हैं।
महापात्रों से उन सभी को डरना चाहिए जिन्हें मरना है, इन्ही के मन्त्रों के सहारे मुर्दा बैकुंठ की राह पकड़ता है ताकि मुर्दे के सभी पाप, महापात्र अपने जतन से धुलवा दे, फिर यह कि जब मुर्दा अनाप- शनाप काम कर घर भर गया तो घर वालों को ज्यादा खर्च कर देने में क्यों कष्ट होता है ?
अब महापात्रों से ससम्मान यह पूछता है कि उन्होंने जो 'स्लैब सिस्टम' निर्धन वर्ग, माध्यम वर्ग एवं संपन्न वर्ग हेतु प्रस्तावित किया है, उसके निर्धारण एवं सत्यापन हेतु वे क्या उपाय करेंगे- इनकम टैक्स स्टेटमेंट की प्रतिलिपि लेंगे या आय प्रमाण पत्र ? झूठे प्रपत्रों पर ' एक्शन का क्या तरीका होगा ? '
अब दूसरी और देखिये तो कब्रों का मसला भी बड़ा टेढ़ा है, पैसा है तो जन्नत भी आसान है। पैसा चाहते जितना भी पड़े दरगाह, मस्जिद या इमामबाड़े में अच्छी जगह कब्र मिल जाए तो क्या कहना जिंदगी भर अधार्मिक रहे, किसी बुरे काम से नहीं डरे लेकिन मरने के बाद 'शोर्ट कट' से जन्नत जाने का पूरा इंतजाम वारिसों को समझा गए थे। मरने के बाद भी 'स्टेटस सिम्बल' के उसी प्रकार दीवाने हैं, जैसे कि जीवन में थे।

सब से बुरी स्तिथि तो हम जैसे गरीबों की होती है, न दुनिया में चैन न बाद में कोई उम्मीद। कभी घबराते हैं तो मौत को याद करते हैं- मगर फिर ये शेर पढ़ कर निराश हो जाते हैं-

अब तो घबरा के यह कहते हैं कि मर जायेंगे,
मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे॥

-डॉक्टर एस.एम हैदर

रविवार, 8 अगस्त 2010

'कुत्ते' में गुन बहुत हैं, सदा रखिये संग

मानव जाति तथा अन्य प्राणियों में बहुत सी विभिन्नताएं तो हैं ही परन्तु अनेकानेक समानताएं भी है। विशेषताओं या गुणों में कुछ जीव-जंतु मनुष्यों से बहुत आगे हैं। कुत्तों और घोड़ों की वफादारी एवं संवेदनशीलता को सभी जानते हैं। आप ने कुछ समय पूर्व इंदौर के एक कुत्ते का हाल अख़बारों में पढ़ा होगा जिसकी मौत हो जाने पर वहां के आड़ा बाजार इलाके की दुकाने शोक में बंद कर दी गयी- यह मृतक कुत्ता लगभग पिछले दस वर्ष से इलाके की अधिकांश शव यात्राओं में आश्चर्य जनक रूप से शामिल हो रहा था, अपने इस अद्भुत गुण के कारण वह स्थानीय लोगो में काफी लोकप्रिय था। उसका अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और धार्मिक पद्धति से किया गया , जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए । 'खुमार ' ने कहा था - 'इस दौर के इंसान वफ़ा भूल गए हैं' - मैं कहता हूँ कुत्ते ही से कुछ सीख लें।
अब एक किस्सा भी सुन लीजिये- कुत्तों का जिन से विरोध हो जाता है, उनको छोड़ते भी नहीं। लतीफा यह है कि एक नए ढंग की शव यात्रा जा रही थी, आगे-आगे एक कुत्ता था जिसकी जंजीर एक आदमी के हाथों में थी, कुत्ते पर फूल मालाएं पड़ी थी, उसके पीछे कन्धों पर शव, फिर उसके पीछे आदमियों की एक एकहरी पंक्ति थी। रास्ते में दूर पर खड़े एक जवान ने देखा तो उसको बड़ा ताज्जुब हुआ, तेज कदम बढ़ा कर पंक्ति तक पहुंचा, पिछले आदमी से हाल पूछा तो उसने बताया कि यह शव उस व्यक्ति की पत्नी का है जिसके हाथ में कुत्ते की जंजीर है। उसकी पत्नी इसी कुत्ते के काटने से मरी हैं, जवान बड़ी लालसा से पूछा क्या यह कुत्ता मुझे मिल सकता है ? - उसने जवाब दिया यह बात कुत्ते के मालिक से पूछो - वह दौड़ कर आगे पहुंचा और यही सवाल किया- उसने जवाब दिया देखते नहीं हो- इसीलिए तो सब लाइन में लगे हैं- सब का काम क्रम से होगा, जाओ सब से पीछे लग जाओ।
अब बताइए कुत्ते की प्रसंशा की जाए या निंदा ?

'गिरिधर' की एक पंक्ति शब्द परिवर्तन के साथ - 'कुत्ते' में गुन बहुत हैं, सदा रखिये संग।

-डॉक्टर एस.एम हैदर

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

करहुं प्रणाम, जोड़ जुग पाणि

एक मजेदार खबर उर्दू अखबार में देख कर मैं चौंक पड़ा। जलालपुर, आंबेडकर नगर (यू.पी)के इस 'डिस्पैच' का हिंदी रूपांतरण आप भी पढ़ लीजिये -
" देश की राजनीति में मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, मनमोहन सिंह, बाल ठाकरे व जयललिता भले ही अलग अलग राजनैतिक पार्टियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, लेकिन स्थानीय तहसील की ग्राम पंचायत हैदराबाद में यह सब एक ही छत के नीचे अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं।
यहाँ के मिठाई लाल ने इन नेताओं से प्रभावित होकर अपने आधा दर्जन बच्चों के नाम इन बड़े राजनीतज्ञयों के नाम पर कर रखा है। इन के बड़े पुत्र मुलायम सिंह ने इस वर्ष इंटर पास किया है। दूसरे राजनाथ सिंह ने हाई स्कूल कर लिया है, तीसरा कल्याण आठवी का विद्यार्थी है, चौथी संतान जय ललिता -चौथी कक्षा में गयी है, मनमोहन सिंह ने प्राइमरी में दाखिला लिया है, आखिरी पुत्र बाल ठाकरे मां की गोद में खेल रहे हैं। मिठाई लाल को इस बुढ़ापे में एक और बेटी की इच्छा है, जिसका नाम उन्होंने पहले ही मायावती सोच लिया है।'
मिठाई लाल जी की यह दूर द्रष्टि प्रशंसनीय है, यदि कभी मिल गए तो मैं इन्हें बिना मिलावटी लड्डू जरूर खिलाऊंगा, इन्होने नया ढंग निकाल कर बड़ो-बड़ो को मात दी है। ग्वालियर एवं रामपुर के राजघरानो में देखा गया था कि इनमें वफादारी, वैचारिक स्वतंत्रता या स्वार्थवश यह आपसी व्यवस्था थी कि इनके सदस्य अलग अलग पार्टियों में अपनी सीट रिजर्व रखते थे। बाद में इस तरकीब को बहुतों ने अपनाया, सरकारें बदलने पर भी कोई कष्ट नहीं होता था।
हाँ ! एक प्रश्न मिठाई जी से करना है, वह यह कि अगर लड़का हो जाए तो क्या नाम रखेंगे ? नाम पर न किसी की बपौती है न ये 'पेटेंट' होते हैं, नसीमुद्दीन तो ठीक नहीं रहेगा, मेरा सुझाव है कि सतीशचन्द्र या स्वामी प्रसाद रख लें, सब से बढ़िया यह रहेगा कि काशीराम रख दे। सत्ताधारी पार्टी के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित होगी। बड़े लड़के को नौकरी बिना 'पेमेंट' भी मिलने का चांस बनेगा, यह बात और है कि उसके नाम बदलवाने की शर्त रखी जाए।
कभी कभी 'सब साधै' का दांव उल्टा भी बैठता है। मगर हम को क्या हक़ है कि किसी की नीयत पर शक करें। हो सकता है कि इसमें 'नेशनल सरकार' बनाने का या नैतिक या अध्यात्मिक पहलु हो या सन्देश हो अगर न भी हो, तो यह दोहा पढ़ते रहे, मन शुद्ध हो जायेगा।
सियाराम मय सब जग जानी,
करहुं प्रणाम, जोड़ जुग पाणि ।
-डॉक्टर एस.एम हैदर

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

यह नयना बिन काजल कारे

आदि काल से व्यक्ति को अपने सजने सवारने का बहुत शौक रहा है उस समय की कबीलाई और जंगली कौम के स्त्री-पुरुष पत्थरों, लकड़ियों एवं हड्डियों से बने जेवर पहना करते थे। खजुराहो के अति प्राचीन मंदिरों पर पत्थरों से उकेरी गयी मूर्तियों में भी यह भावनाएं साफ़ दिखाती हैं। शुरू में मेहँदी या अन्य चीजों से बाल रंग कर बूढ़े लोग अपने को जवान दिखाने की जुगत में लगे रहते थे। बाद में 'डाई' के आने से अंतर्मन की हीन भावना को छुपाने का एक अच्छा आवरण हाथ लगा। धीरे-धीरे यह धंधा घरों से निकल कर सैलून और ब्यूटी पार्लरों तक पहुंचा, जिस से अनेक लोगों को खाने कमाने के अवसर हाथ लगे। इस बीच कंपनियों ने बाल रंगने के नए नए कलर तथा प्रसाधन बाजारों में भेज दिए। अब युवा वर्ग भी इस अंधी-दौड़ में शामिल हो गया।
समाये बदलते देर नहीं लगती। नई चीज आ जाती हैं और पुरानी चीजों को 'ओवर टेक' करती हैं।
एक नई वैज्ञानिक खोज की और आपका ध्यान आकृष्ट करने के लिए मुझ को यह सब लिखना पड़ा।

हाल ही में एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ब्रुनो बर्नार्ड ने एक विशेष 'मैजिक लोशन' तैयार किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब बालों को डाई टिन्ट्स या रोज-रोज के केमिकल ट्रीटमेंट करने से फुर्सत मिल जायेगी। इसके इस्तेमाल से बालों का स्वाभाविक कलर और चमक वापस आ जाएगी। प्रसाधन प्रेमियों के लिए तो यह एक अच्छी खबर है। परन्तु इस धंधे में लिप्त कंपनियों, सैलूनो तथा ब्यूटी पार्लरो की कमी पर कुछ असर तो जरूर पड़ेगा।
अब बात का दूसरा रुख यह भी देखिये केवल मके-उप से कोई खूब सूरत नहीं बन जाता, मैंने यह भी सुना है कि सुन्दरता व्यक्ति में नहीं, उसको देखने वाले की आँखों में होती है, उर्दू दां सोसाइटी में जब कोई किसी की प्रशंसा करता है तो वह ठेठ उर्दू में जवाब देता है कि 'यह आपका हुस्ने-नजर है। '
दरअसल कोई भी व्यक्ति अपने अच्छे व्यवहार अचार, विचार के कारण ही लोगों में पसंद किया जाता है, खूबसूरती व्यक्ति के चेहरे से नहीं उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व से झलकनी चाहिए - ऐसी ही स्तिथि के लिए किसी ने सांकेतिक भाषा में यह कहा था-
क्यों काजल दे, काहे सँवारे
यह नयना बिन काजल कारे ।

-डॉक्टर एस.एम हैदर

बुधवार, 4 अगस्त 2010

जनता के कुछ और सत्य हैं, शासन के कुछ और

केन्द्रीय कृषि, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री शरद पवार एक महत्वकांक्षी व्यक्ति रहे हैं, आई.पी.एल मामले में इनका भी दामन साफ़ नहीं था, ये अलग बात है कि वह बच निकले। विभाग से ज्यादा उन्हें क्रिकेट में दिलचस्पी रही, अब तो वह बी.सी.सी.आई से आई. सी.सी तक पहुँच चुके हैं। हालाँकि क्रिकेट से उनका कोई लेना देना नहीं है। उम्र के हिसाब से भी वह फिट नहीं बैठते। बस यह जरूर है कि नीरस कृषि की अपेक्षा क्रिकेट में ग्लैमर, मस्ती, नाचरंग, विज्ञापन और खरीद फरोख्त सभी कुछ है।
कृषि मामलो में जो कुप्रबंधन रहा है, उसके लिए वह तो दोषी है ही, कांग्रेस या केंद्र सरकार भी जिम्मेदार है, गेंहू, चावल, शक्कर आदि के लिए भारत की जनता को बहुत झेलना पड़ा। देश में अब इन वस्तुओ की कमी हो गयी तब आपूर्ति को दुरुस्त नहीं किया गया, व्यापारियों को खुली छूट दे दी गयी और वे मनमाने दाम पर उपभोक्ताओं से वसूलते रहे। राज्य सरकारें भी इन साजिशों में शामिल रही। जब हुल्लड़ मचा तब विदेशों से आपात की सौदेबजियाँ हुई। लोगों ने अपनी जेबें भरी।
इधर किसानो को भी खूब नाच नचाया गया, डीजल महंगा, नहरों से पानी गायब, खाद, बीज की कालाबाजारी इन सब में केंद्र एवं राज्यों ने फायदे उठाये। खांडसारी बाहर से आई भी तो बंदरगाहों पर पड़ी रही। बाजारों में चीनी 45-50 रुपये किलो तक बिकी। फायदे में कौन-कौन शामिल था ?
अब किसान ने जब मेहनत से गेंहू पैदा किया तथा उसे सरकारी क्रय केन्द्रों तक ले गया, तो सरकार उसके भण्डारण की व्यवस्था तक न कर सकी। इस जुलाई माह में वर्षा में गेंहू खुले में पड़ा है, जिसके में सड़ने की खबरें मिल रही हैं। हरियाणा में 40 लाख टन गेंहू पूरी तरह बर्बाद हो गया। पंजाब में 5400 टन गेंहू तो ऐसा है जो पशुवों के खाने के लायक भी नहीं रहा। यू.पी के अनेक जिलों सीतापुर, बहराइच, गोंडा, बलरामपुर में हजारों तन गेंहू बर्बाद हो गया। बाराबंकी में हजारों तन गेंहू खुले में पड़ा भीग रहा है, उस पर पालीथीन तक नहीं डाली गयी। पवार साहब की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा।
दूसरी और गरीबों को सस्ता अनाज देने की तैयारी चल रही है। अभी तक गरीब परिवारों की संख्या 6.52 करोड़ थी। योजना आयोग की तेंदुलकर कमिटी का आकलन 8.07 करोड़ परिवारों का है। अर्थात गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों की संख्या कुल आबादी का 37.5 फ़ीसदी है।
एक तरफ विकास की बातें होती हैं दूसरी तरफ गरीब परिवारों की संख्या बढती जा रही है।
अब देखिये देश का गेंहू सडाया जा रहा है, जब गरीबों को देना होगा तो महंगे टेंडरो पर आयात किया जाएगा फिर कमीशन बाजियां होगी, बाजार भाव चढ़ेंगे। व्यापारी और सरकारी तंत्र सभी की जेबें भरेंगी- यही चक्र चलता रहेगा- नागार्जुन ने कभी सरलता से यह सूक्ष्म और सटीक चोट की थी-
जनता के कुछ और सत्य हैं, शासन के कुछ और ।

-डॉक्टर एस.एम हैदर


मंगलवार, 3 अगस्त 2010

एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है

आप को याद होगा कि एक ईरानी वैज्ञानिक के अपहरण के मामले को लेकर कुछ समय से ईरान एवं अमेरिका के बीच आरोप प्रत्यारोप का अभियान चल रहा था, लोग इस मसले को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे थे कि सच्चाई क्या है। ईरान जो भी कहता था अमेरिका उसको नकारता था।
ईरानी वैज्ञानिक सऊदी अरब गया था और वहां से गायब हो गया। इसके बाद तरह-तरह की बातें हुईं, कई दिन पूर्व वैज्ञानिक अमीरी ने अमेरिका में स्तिथ पाकिस्तानी दूतावास में किसी तरह आकर शरण ली फिर वहां से वह ईरान लाया गया।
अब जो तथ्य सामने आये उससे अमेरिकी करतूत का पर्दाफाश हुआ।
ईरान लौटने के बाद अमीरी ने अपनी व्यथा सुने तथा यह बताया कि पिछले साल के अपहरण के बाद उसे अमेरिकी जांच कर्ताओं के हाथों मानसिक व शारीरिक उत्पीडन का सामना करना पड़ा।
'द वाशिंगटन पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम की गुप्त जानकारी देने के बदले उसे करीब 23 करोड़ रुपये देने का वादा किया। परन्तु सारा अमेरिकी मंसूबा ध्वस्त हो गया तथा ईरानी आरोप की पुष्टि भी हो गयी।
पूरी दुनिया में अमेरिका इसी प्रकार के खेल खेलता रहता है। जिससे उसकी किरकिरी होती है। शायद यही सब कारण है कि स्वयं अमेरिका की जनता अपने नए राष्ट्रपति ओबामा से खिन्न है तथा ए.बी.सी द्वारा हाल में कराये गए सर्वे के अनुसार 60 फीसदी मतदाताओं का विश्वास अब उन पर नहीं रहा।
आगे ईराक, ईरान, कोरिया , अफगानिस्तान, इजराइल, फिलिस्तीन आदि पर यदि वे सही फैसले न ले सके तो स्तिथि यह होगी-

एक आग का दरिया है, और डूब के जाना है

-डॉक्टर एस.एम हैदर
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