सोमवार, 20 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, अंतिम भाग

यह बात बहुतों को नही मालूम है कि गांधी जी को प्रथम समाजवादी क्रान्ति से, जो 1917 में हुई, पूरी हमदर्दी थी, इस क्रान्ति ने सभी राष्ट्र-मुक्ति आन्दोलनों को अपना सहयोग दिया। गांधी की मुख्य सोच केवल यही नहीं थी कि उन्हें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाए, यह तो उनके अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का पहला चरण था, अन्य उद्देश्य थे- भूख, बेरोजगारी तथा विकराल अभावग्रस्तता का उन्मूलन। वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था ही बेरोज़गारी और मानवीय पतन का कारण है। गांधी का इस पर विश्वास था कि सामन्तवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर इसका दूसरा रास्ता खोजा जाए, यदि मानव जाति को डूबने से बचाना है, शोषण, असमानता, बेरोजगारी, हिंसा और युद्ध से मुक्ति दिलाना है। गांधी जी राजनैतिक सन्धि हेतु जब लंदन गए और वहाँ की एक श्रमिक बस्ती में जाकर रहे तब उन्होंने खुले आम यह कहा कि भारत में ब्रिटिश सामानों का जो बहिष्कार हो रहा है उसके निहितार्थ इंग्लैंड के श्रमिक समझने की क्षमता रखते हैं।
डा0 एम0एस0 स्वीमीनाथन जो एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हैं और जिनकी पहचान भारत में हरित क्रान्ति से जुड़ी है (उन हलकों में विवादास्पद हैं जो उस आर्गैनिक फारमिंग का समर्थन करते जो केमिकल तथा कीट नाशक दवाओं से मुक्त हों, उनका मत है कि उस भार से किसान पस्त हैं और उनके कर्जे बढ़ रहे हैं तथा ज़मीन व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं) उन्होंने ब्लूूम वर्ग यू0टी0वी0 पर अपने एक साक्षात्कार में जो 20 जनवरी 2010 को रिले किया गया उसमें गांधी जी की राजनैतिक प्राथमिकताओं को याद किया, इस बात पर भी दुःख प्रकट किया कि पिछले दशक में संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य उपलब्धता व पोषकों हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए थे भारत उनकी आधी उपलब्धि भी नहीं प्राप्त कर सका, जबकि वियतनाम और चीन ने उन्हें प्राप्त कर लिया। यह भी चेतावनी दी कि खाद्य वस्तुओं की असुरक्षा तथा उनके दामों में बेतहाशा बृद्धि आम-जनता के लिए असंतोष का कारण बनेगी।
इस बढ़ी हुई आयु में किसी अन्य राजनैतिक नेता को नहीं, केवल महात्मा गांधी को फासीवादी और दक्षिण पंथियों ने अपना निशाना बनाया तथा उनकी हत्या कर दी, इसलिए कि वे उनकी राजनैतिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को भारत में अपने साम्राज्यवादी भविष्य के एजेण्डे के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे थे। अब हत्यारे या उनके वैचारिक सहायक इसकी जो भी व्याख्या करें। बहरहाल बँटवारे के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की पुनर्संरचना को, जाते हुए साम्राज्यवादी थोप रहे थे तथा इसमें दोनो धार्मिक समूहों की राजनैतिक शक्तियों का सहारा ले रहे थे और धार्मिक हत्याओं हेतु उनको प्रशिक्षित किया जा रहा था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि आज के क़ब्ज़े वाले देशों तथा कल के लक्षित देशों में किया जा रहा है।
गांधी के सहयोग से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले, ग्रामीण व नगरीय कामगारों, दलितों के मसीहा, भारत के
संविधान के निर्माता डा0 बी0आर0 अम्बेडकर जिन्होंने संयुक्त राज्य की कोलम्बियाँ यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की थी, जब
गांधी जी की हत्या की गई तो असीमित पीड़ा के साथ अपनी भावनाओं को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया ‘‘महात्मा गांधी हम से सब से ज्यादा क़रीब थे‘‘ इस श्रद्धांजलि ने इस शरीफ़ लेकिन समझौता न करने वाले क्रान्तिकारी के जीवन का निचोड़ पेश कर दिया। 20वीं सदी के अनेक नेतृत्व करने वालों के साथ-साथ गांधी ने केवल भारतीय जन-मानस को ही राजनैतिक प्रेरणा नहीं दी वरन् वह, संसार के विभिन्न भागों में होने वाले आन्दोलनों के भी प्रणेता बने ताकि उस राजनैतिक साम्राज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिसकी संरचना ही इसलिए की गई थी ताकि श्रमिकों व कामगारों के राजनैतिक आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का हनन किया जाय।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
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