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बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 3

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कुछ राज्यों के नए भर्ती-शुदा पुलिस फोर्स के दिमाग में यह भर दिया गया है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए यदि किसी से खतरा है तो वे माओवादी हैं या नक्सलवादी हैं या उनसे सहानुभूति रखने वाले हैं (जो लोग भी हिंसा ग्रस्त लोगों से सहानुभूति रखते हैं वे ‘सस्पेक्ट’ हैं), या मुस्लिम अल्पसंख्यकों में तथाकथित ‘जेहादी’ हैं, इस शब्द का भी का दुरुपयोग किया गया (हालाँकि इस्लाम में इसका अर्थ ऐसे संघर्ष से है जो स्वयं की बुरी भावनाओं के खिलाफ किया जाता है)। यह एक तथ्य है, जैसा कि जस्टिस राजेन्द्र सच्चर कमीशन की रिपोर्ट एवं अन्य रिपोर्टों में माना गया है कि भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों का आर्थिक-सामाजिक विकास अवरुद्ध है और उनका स्तर अनुसूचित जाति के समान है। पुलिस फोर्स में गलत दृष्टिकोण भर देने का प्रभाव यह पड़ा कि गांधीवादी सच्चे अम्बेदकरवादी (डाॅ0 बी0 अम्बेदकर जो अनुसूचित जातियों के मसीहा बने तथा भारतीय संविधान की संरचना करने वाले थे, उनके सिद्धांतों पर चलने वाले) वे लेखक तथा विद्वान जिन्होंने आदिवासियों, अनुसूचित जातियों तथा गरीब किसानों की समस्याएँ उठाईं और वे लोग जिन्होंने नागरिक स्वतंत्रता, समुदाय के स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि के लिए कार्य किया और वे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग जिनकी हिंसा और क्रान्ति के मामलों में दूर-दूर तक कोई संलिप्तता नहीं थीं, यही सब लोग माओवादी या जेहादी कहकर बन्दी बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक दशा को कोर्ट ने अपने फैसले में पुष्ट स्रोतों द्वारा संदर्भित किया है, इसमें योजना आयोग के एक ‘एक्सपर्ट ग्रुप’ की रिपोर्ट ‘विकास की चुनौतियाँ-अतिवादी प्रभावित क्षेत्रों में’ भी हंै, जो अप्रैल 2008 में प्रस्तुत की गई थी, इस रिपोर्ट से फैसले के आलोचक घबरा गए हैं- इसके ये अंश बताते हैं:-
‘‘स्वतंत्रता प्राप्ति के आरम्भ से ही विकास के साँचे ने समाज के वंचित वर्ग के असंतोष को अत्यधिक बढ़ा दिया है, जिससे इस वर्ग को अपूर्णीय क्षति पहुँची है। विकास में गरीब ने ही ज्यादा योगदान दिया, परन्तु बड़े वर्ग ने अपने फायदे के लिए उसे ही असमानुपातिक ढंग से वंचित किया, निर्वासित किया, और अमानवीय जीवन जीने पर मजबूर कर दिया। जहाँ तक आदिवासियों का मामला है, उनके सामाजिक ताने-बाने को तहस नहस किया, उनकी सांस्कृतिक पहचान को मिटा दिया तथा शोषण किया। विकास एवं उसके कार्यान्वयन के भ्रष्ट तरीकों द्वारा नौकरशाहों, ठेकेदारों, व्यापारियों, बिचैलियों तथा समाज के लालची वर्ग ने उनके
संसाधनों को छीना तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया’’।
राजनैतिक पार्टियों की असफलताओं के कारण केन्द्र एवं राज्यों में सरकारें एक के बाद एक आती जाती रहीं, जमीनों पर मनमाने कब्जे होते रहे जिसके कारण जो आन्दोलन हुए तथा जो समस्याएँ उत्पन्न हुईं, उन पर लोकतांत्रिक तरीके से इन सरकारों ने विचार नहीं किया, यहाँ तक कि संसद में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों तथा बंगाल की ‘लेफ्ट फ्रन्ट’ सरकार ने भी यही ढंग अपनाया। सभी ने जालिमाना तरीके से इन आन्दोलनांे को बुरी तरह से कुचला। कोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकारों पर यह जोर दिया है कि इन आन्दोलनों से निपटने के लिए वे संवैधानिक दायरे में रहकर ही कोई समाधान खोजें तथा इसे केवल ‘‘ला एण्ड आर्डर’ की समस्या न समझें। इस संबंध में योजना आयोग के ‘एक्सपर्ट ग्रुप’ की रिपोर्ट का उद्धरण दिया है-
‘‘आन्दोलन अनेक प्रकार के होते हैं, यह तर्क संगत नहीं है कि केवल अशान्ति या ‘ला एण्ड आर्डर’ की समस्या समझकर इन्हें शक्ति के द्वारा दबाया जाए। असंतोष को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखकर इन्हें वर्गीकृत करना चाहिए और जन-समस्याओं को एजेन्डे में लेना चाहिए, सरकार को ‘विधि के शासन’ के दायरे से बाहर न जाना चाहिए। यह न जानना आश्चर्य की बात नहीं है कि असंतोष का तुरन्त कारण क्या था, आश्चर्य यह है कि राज्य इसकी जड़ नहीं तलाश कर सका।
कोर्ट के फैसले में इस बात की कलई खोली गई कि ऐसे प्रयास होते हैं कि इस प्रकार के आन्दोलनों को राक्षसी आन्दोलनों के रूप में पेश किया जाए। यह भी अन्तर बताया गया कि सरकारी हिंसा के जवाब में वंचित वर्ग प्रति हिंसा के लिए मजबूर किया जाता है। बहरहाल इससे आगे आकर इस वर्ग को नगरीय भारत के लोकतंत्र वादियों से सम्पर्क साधना चाहिए ताकि इन आन्दोलनों को व्यापक रूप दिया जा सके। अब इस बात को मान्यता मिल रही है और आर्थिक व वित्तीय आधिपत्य बनता जा रहा है कि इस व्यवस्था से हम विकसित होंगे, परन्तु सच यह है कि इससे भूमण्डल की समस्त सम्पदा एवं पर्यावरण नष्ट होगा।
चूँकि नगरीय भारत में बौद्धिक एवं राजनैतिक ‘वैकूम’ बनता जा रहा है, इन हालात में कोर्ट का फैसला इस बात की चेतावनी है कि भारतीय संविधान को एक ऐसे पैक्ट का रूप न दिया जाए जिससे राष्ट्रीय आत्महत्या का रास्ता निकलता है और यह न हो कि विनाश कारी नीतियों का विरोध करने वाले वंचितों और शोषितों को हिंसक रूप से कुचला जाए। हिंसक आन्दोलनों को भी सरकारें संवैधानिक तरीकों से ही नियंत्रित करें। कोर्ट के अनुसार मध्य एवं पूर्वी भारत में ‘विधि के शासन’ को तार तार कर दिया गया। जबकि संविधान एक ऐसा अभिलेख है जो सभी नागरिकों के लिए जीविका के अधिकार, जीवन के
अधिकार एवं सम्मानजनक जीवन जीने के प्रति संकल्पबद्ध है। कोर्ट उन लोगों को जो नीति निर्माण करते और लागू करते हैं याद दिलाता है कि अतिवादिता और गरीबी के बीच गहरा सम्बन्ध है जो शस्त्र शक्ति से हटाया नहीं जा सकता। अंत में कोर्ट उन लोगों की प्रंशसा करता है जो वंचित वर्ग हेतु संघर्ष करके मुसीबतें झेल रहे हैं। अमरीका में दासता के उन्मूलनकर्ता फ्रेडरिक डगलस का दृष्टिकोण कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘‘शक्तिशाली वर्ग के सामने जब तक जोरदार ढंग से माँग नहीं रखी जाती, वह मानता नहीं है।’’

समाप्त

-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 2

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी पहले, भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक कमेटी- ‘‘कमेटी आन स्टेट अग्रेरियन रिलेशन्स एण्ड द अनफिनिश्ड टास्क आॅफ लैण्ड रिफाम्र्स’’ ने अपनी जो रिपोर्ट मार्च 2009 मंे दाखिल की, उसमें यह कहा कि आदिवासियों की जमीनें छीनना ‘‘औपनिवेशिक कृत्य है, जिसमें कम्पनियाँ जन सतर्कता सेना- ‘सलवा जुडूम’ की आर्थिक सहायता केवल इस अभिप्राय से कर रही हैं ताकि गाँव के गाँव खाली करा लिए जाएँ, रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘जो कि अधिकारिक रिपोर्ट है, 640 गाँव तो समतल ही कर दिए गए, यह सब बन्दूक के निशाने पर सरकार की मेहरबानी से हुआ, दंतेवाड़ा की आधी से अधिक जनसंख्या के बराबर- 3,50,000 आदिवासी बेघर हो गए, औरतों के साथ व्यभिचार हुआ, युवा अपाहिज बनाए गए, लड़कियों का कत्लेआम हुआ। जो भाग नहीं सके उनको ‘‘सलवा-जुडूम’’ के शरणार्थी शिविरों मंे हँका दिया गया। हाल यह है कि वह 640 ग्राम जो ‘लौह-अयस्क’ पर स्थित थे, अब निर्जन हैं तथा बड़ी बोली लगाने वालों के लिए उपलब्ध हैं।
कोर्ट के फैसले पर हमारे सम्पादकीयों तथा विश्लेषणों का जोर इस बात पर है कि उच्चतम न्यायालय वाक्-पटुता की रौ में विधिक क्षेत्र से आगे निकल गया है, और इसके ब्याख्यात्मक भाग गैर जरूरी हंै। विश्लेषकों के इस रुख ने इस बात को नजर अन्दाज कर दिया कि केन्द्र और राज्य सरकार ने अपने हित
साधने हेतु वहाँ की जमीनी वास्तविकताओं का कोर्ट में खुद ही बखान किया था ताकि उनके द्वारा आदिवासी युवाओं को सिविल मिलीशिया में भर्ती के मामले को न्याय संगत मान लिया जाय, हालाँकि यह भर्ती
संविधान एवं पुलिस एक्ट 1861 का खुला उल्लंघन है। विकास का जो विकृत एजेन्डा पेश हुआ, जो झूठे आश्वासन दिए गए, जो अवैधानिक कार्य किए गए, संवैधानिक
निषेध के बावजूद जिस तरह आदिवासियों की जमीनों को हड़पा गया, जिस तरह से राज्य सरकार के गलत निर्णयों से विद्रोह ने सर उठाया और जिसके दबाने हेतु अन्याय किया गया, उन्हीं संदर्भों में सुप्रीम कोर्ट को आवश्यक रूप से इन बातों पर फोकस करना पड़ा, कोर्ट ने कहा-
‘‘इस समस्या का मूल कारण एवं निस्तारण कहीं और है। आधुनिक नव-उदारवादी आर्थिक विचार ने अनियत्रिंत लालच एवं स्वार्थ को जन्म दिया है। गलत सपने दिखाए गए, यह झूठ कहा गया कि उपभोेग से आर्थिक विकास होगा, जिससे हर एक ऊँचा उठेगा, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से ही विकास सम्भव है, इसी से हम भूमण्डलीय प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर सकेंगे। धन एकत्र करने से ही हम भूख, अस्वस्थता, अशिक्षा एवं गरीबी की समस्या को हल कर पाएँगे। सच तो यह है कि नीति निर्माता या उच्च वर्ग के लोगों के पास गरीबों की समस्या एवं कष्ट के हल का कोई जवाब नहीं है, वे आँखें बन्द किए हुए हैं। इससे बुरी स्थिति यह है कि उन्होंने इस ऐतिहासिक साक्ष्य को भुला दिया है कि जो विकास प्राकृतिक संसाधनों के लूट खसोट पर टिका होता है वह देश को पतन की ओर ले जाता है-’’
विश्व के अनेक भागों में, जिनमें पाश्चात्य उदारवादी प्रजातंत्र भी शामिल हैं, विधि के शासन की बात मात्र प्रतिध्वनि है। वहाँ ‘प्रजातंत्र’, ‘स्वतंत्रता’ तथा ‘संवैधानिक अधिकार’ का शोर मचाना केवल दिखावा है। कोर्ट का यह भी विचार है कि- ‘‘लाभ और मूल्य के समान बँटवारे के बिना निजी क्षेत्र द्वारा संसाधनों के शोषण की जो भी नीतियाँ हैं वह उन सिद्धान्तों के विपरीत हैं जो शासन के लिए आवश्यक मानी गई हैं। जब इस प्रकार के उल्लंघन बड़े पैमाने पर घटित होते हैं तब कानून द्वारा प्रदत्त समानता को, जो आर्टीकिल 14 और सम्मान जनक जीवन जीने के अधिकार को जो आर्टीकिल 21 के अन्तर्गत दिए गए हैं, कमजोर करते हैं। इसके अतिरिक्त जब खनन-माफिया और सरकारी एजेन्टों का शोषण हेतु गठजोड़ बन जाता है तब फिर यही बातें आर्टीकिल 14 तथा 21 को निष्क्रिय करती हैं तथा राज्य के नैतिक अधिकार को भी प्रभावित करती हैं।
भारत के गृह विभाग की रिपोर्ट के अनुसार कुल 607 जिलों में से 120 से 160 तक जिले माओवाद या नक्सलवाद से प्रभावित हैं और यह कि इस आन्दोलन ने लगभग एक चैथाई भारतीय भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है। जहाँ भी कुछ राजनैतिक आन्दोलनों को कड़ाई से कुचलने की जरूरत हुई, माओवादी, नक्सलवादी का लेबिल लगाने हेतु, इस नाम को अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया गया। इस सन्दर्भ मंे कोर्ट ने कहा कि प्रजातंत्रिक राज्य में यह न्याय संगत नहीं है कि आन्दोलनों से निपटने के लिए ऐसे गैर कानूनी तरीके अपनाए जाएँ जिससे
संविधान या विधि के शासन का उल्लंघन हो क्योंकि इससे, जैसा कि सरकारी कमेटियों का भी कथन है, हिंसा और असंतोष बढ़ता ही जाएगा।
आदिवासियों, अनुसूचित जातियों, कृषक वर्ग, मजदूर वर्ग, अल्पसंख्यक तथा अन्य शोषित वर्ग की दयनीय दशा को कोर्ट ने ‘भयानक’ बताया है, परन्तु कोर्ट के फैसले से पूर्व इन्हीं वर्गों की सुरक्षा के नाम पर पास किए गए अनेक कानूनों के अंतर्गत माओवादियों या माओवादियों से सहानुभूति रखने वालों या जेहादी कहकर उनको जेलों में बन्द कर दिया गया, कोर्ट ने यह कहकर ऐसे मामलों की भत्र्सना की है-
‘मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य है कि छत्तीसगढ़ राज्य तथा इसके चाटुकार संवैधानिक वर्जनाओं के ज्ञान के प्रति अपनी आँखें मूँदे हुए हैं। यदि कोई वहाँ की अमानवीय स्थिति पर आपŸिा करता है तो उसे तुरन्त माओवादी या उनका हमदर्द मान लिया जाता है’।
जहाँ तक सरकारी मशीनरी एवं पुलिस का कारपोरेट को लाभ पहुँचाने हेतु दोनों में समन्वय की बात है, यह तथ्य याद रखना चाहिए कि जिन वर्गों- मुस्लिम, ईसाई, अनुसूचित जातियों, महिलाओं और अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से वंचित वर्गों पर फासिस्ट आन्दोलनों तथा राजनैतिक दलों द्वारा बराबर प्रहार किया जाता है वे सभी अभी कुछ दिनों पूर्व तक अछूत की श्रेणी में रहे हैं, इन्हीं को बम विस्फोटों एवं सामूहिक हत्याओं में फाँसा जाता है। बाद मंे जन-आक्रोश को दबाने हेतु जाँच कमीशन बैठाए जाते हैं तथा उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती है। अभी हाल में ‘‘होम लैण्ड सेक्योरिटी’’ का मामला ‘‘चैम्बर्स आॅफ कामर्स एण्ड इन्डस्ट्री’’ द्वारा इस लिए उठाया गया ताकि अधिक मुनाफा कमाया जाए और आन्दोलनों को कुचला जाए। इन मामलों पर आयोजित बैठकों को अधिकतर सेवानिवृत फौजी तथा पुलिस अधिकारी सम्बोधित करते हैं।


-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 1


नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के केस में भारतीय उच्चतम न्यायालय ने ‘‘स्पेशल पुलिस अधिकारियों’’ की भर्ती के फैसले को अवैधानिक एवं असंवैधानिक करार दिया है, जिसके द्वारा राज्य सरकार ने केन्द्र के समर्थन से ऐसी नागरिक सतर्कता सेना, उन जनजाति क्षेत्रों में नियुक्त करनी चाही जो खनिज पदार्थों से परिपूर्ण हैं, ये इलाके पूर्वी एवं मध्य भारत में स्थित हैं। इन खनिज सम्पन्न इलाकों पर भारतीय एवं विदेशी कम्पनियाँ कब्जा जमाना चाहती हैं जिसका विरोध आदिवासी एवं किसान वर्ग कर रहा है। राज्य जो ‘‘फोर्स’’ बना रही है, उसे इन इलाकों में तैनात करके माओवादी, नक्सलवादी आन्दोलनों को, विद्रोही गतिविधियों का नाम देकर, कुचलना चाहती है। इस फैसले का महत्व यह है कि इसके द्वारा कम से कम सुप्रीम कोर्ट की यह मान्यता मिल गई कि इन क्षेत्रों में सरकार एवं जनता के बीच का ‘‘सामाजिक-सम्पर्क’’ तो टूट ही गया है, यह इसलिए हुआ कि भूमण्डलीकरण का विकृत रूप यहाँ लागू किया गया और इसके लिए राज्य द्वारा अवैधानिक एवं असंवैधानिक तरीके अपनाए गए।
कोर्ट का यह कथन है कि- ‘‘समस्या तो यह है कि राज्य ने आर्थिक राजनीति के अनैतिक रूप को मान्यता दी जिसके फलस्वरूप विद्रोही राजनीति पैदा हुई और इसी से हिसंक आन्दोलन की राजनीति ने जन्म लिया। इस बात को माना गया है कि भारत के अनेक भू भागों में जो सशस्त्र विद्रोह हुए उनका कारण सामाजिक आर्थिक हालात और स्थानीय असमानताएँ थीं’’।
कारपोरेट जगत के संगठन तथा उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया ने, जैसा कि अनुमान था, कोर्ट के इस विचारण पर कि आदिवासियों को हिंसक रूप से उजाड़ा गया और सैकड़ों आदिवासी ग्रामों को ‘विकास’ के नाम पर खाली करा लिया गया, प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की। जो समझौता छत्तीसगढ़ सरकार तथा भारतीय एवं सीमापार कम्पनी, टाटा, एस्सार, आरसेलर, मित्तल, डी बियर्स, बी0एच0पी0 बिलियन और रियो टिन्टो व अन्य के मध्य हुआ था और उसी के तहत आदिवासी जनसंख्या में से ही कम वेतन पर भर्ती किए गए सैनिक तथा पुलिस एवं अर्ध सैनिक बलों को इस हेतु इस्तेमाल किया गया। यही कारण था कि अनुसूचित जातियों, किसानों एवं आदिवासियों की मदद से माओवादियों का प्रतिक्रियात्मक हिंसक आन्दोलन उभरा। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सटीक रूप से ‘‘भूमण्डलीकरण का अँधेरा पहलू’’ करार दिया। कारपोरेट जगत की प्रतिक्रिया कुछभी आश्चर्यजनक नहीं थी, क्योंकि कुछ को छोड़कर समस्त मीडिया ने वर्तमान आर्थिक नीतियों के लाभ, उच्च मध्य वर्ग एवं उद्योग जगत की बड़ी आमदनी, अवस्थापना आदि के फायदे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया।
जोसेफ कानरैड की ‘‘हार्ट आफ डार्कनेस’’ में 19वीं तथा शुरू 20वीं सदी में अफ्रीका के उपनिवेशीकरण तथा वहाँ की साम्राज्यवादी, पूँजीवादी, विस्तारवादी भयंकर नीतियों का जो चित्रण है, कोर्ट ने भूमण्डलीकरण के नाम पर आदिवासियों पर जो अत्याचार हुए, इसी से उसकी तुलना की है।
उक्त नीतियों के लागू करने से अनेक गंभीर अनियमितताएँ सामने आई हैं जिनसे संविधान तथा ‘विधि का शासन’ प्रभावित हो रहा है, कोर्ट ने ऐसा सन्दर्भ दिया है। कोर्ट यह भी सन्दर्भ देता है कि आज पूरे विश्व में- मैक्सिको, हैती, मध्य एवं लैटिन अमरीका, अफ्रीका एवं अरब जगत में अर्थ एवं वित्तीय मामलों में दरवाजे के पीछे के निर्णय तथा इतर-संवैधानिक तरीके ही हिंसक उथल-पुथल का कारण बनते हैं। जैसा कि कहा जाता है कि यह ‘‘बैंकर-युद्ध’’ है जो यूरोप एवं अमरीका के नागरिकों को फकीर बनाए दे रहा है तथा सम्पूर्ण विश्व पर प्रभाव डाल रहा है।
अपने औद्योगिक विकास और वित्तीय सहायकों की प्रशंसा के बावजूद चीन और भारत भी इस प्रभाव से बचे नहीं हंै। एशियाई विकास बैंक के अनुसार आय में असमानता के मामले मंे क्षेत्र में चीन का स्थान दूसरे ऊँचे नम्बर पर है। वहाँ के राजकीय प्रबंधन- वर्कर सेफटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतिवर्ष वहाँ एक लाख मजदूर काल के गाल में समा जाते हैं। इसी प्रकार से भारत में जब से यह नीतियाँ लागू हुई हैं, भारत सरकार के ‘नेशनल ब्युरो आॅफ क्राइम स्टैटिक्स’ के अनुसार 1995 से 15 वर्ष की काल अवधि में दो लाख पचास हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली हैं तथा कर्ज के फंदे में जकड़ जाने पर दूसरे तबकों के परिवारों ने सामूहिक आत्महत्याएँ की हैं।
इन नीतियों का भयानक रूप यह है कि मिलिट्री हमलों द्वारा न समाप्त होने वाले ऐसे युद्ध छेड़े जाते हैं कि लाखों आदमी जान से मार दिए जाते हैं और अनेक क्षेत्रों में पूरी मानव जाति की नस्ल समाप्त कर दी जाती है। आण्विक उद्योगों के कचरे से यूरेनियम अस्त्र बना कर इनका इस्तेमाल अतिशक्तिशाली एकाधिकार प्राप्त कम्पनियाँ तथा वित्तीय संस्थाएँ उन युद्धों में करती हैं, जिनका उद्देश्य कभी एक कभी दूसरे समाज के आर्थिक क्षेत्रों पर कब्जा करके, बजट एवं बचत स्रोतों को हथिया कर उन्हें गुलाम बनाना होता है। इसे मुसोलिनी के ‘फासिस्ट बिजनेस माॅडल’ के सन्दर्भ में ‘नवनाजी’ या ‘न्युकान्स’ भी कहते हैं।
नव-उदारवाद की ज़मीनी हक़ीक़त और इन नीतियों की भारत में प्रभाव पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने प्रेक्षण में प्रकाश डालते हुए भर्ती मामले को अवैधानिक एवं
असंवैधानिक करार दिया है और कहा है कि केन्द्र एवं राज्य ने मिलकर विद्रोह को शान्त करने के बहाने आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए ‘‘आदिवासी गरीबों की आधी जनसंख्या’’ को उनकी ‘‘दूसरी
आधी’’ जनता द्वारा मार डालने की नीति बनाई है ताकि कम्पनियों को खनिज-संपदा को लूटने का मौका मिले जबकि आदिवासी भूमि को किसी को देने पर संवैधानिक निषेध लागू है।


-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

रविवार, 26 जून 2011

संयुक्त राष्ट्र की राजनीति: अमरीकी साम्राज्यवाद का खेल

इराक के बाद लीबिया
सुरक्षा परिषद ने एक ओर तो बहरीन में विदेशी सेनाओं के प्रवेश को अनदेखा किया परन्तु दूसरी ओर लीबिया में उसके तेल भण्डार पर कब्जे़ हेतु अरबलीग के इशारे से नो फ्लाई मिलिट्री जोन लागू किया।
इस बार लीबिया में वही सब हो रहा है जो प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद के वर्षों में इराक में घटित हुआ था। याद होगा कि इराक पर जो हमला और कब्जा किया गया उसका मुख्य उद्देश्य वहाँ के तेल स्रोतों पर कब्जा जमाना तथा वहाँ के बजट एवं तेल की आमदनी को हाथ में लेना था। यह इसलिए कि बड़ी आर्थिक शक्तियों को अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति को सँभालना था। इस हेतु उन्हें रूस एवं चीन के सहारे आगे बढ़ना था ताकि इराकी जनता के प्रतिरोध का मुकाबला उन पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव द्वारा प्रतिबंध लगा कर, किया जाय। लीबिया में अब संयुक्त राष्ट्र ने ‘नो फ्लाई जोन’ तथा अन्य प्रतिबंधों को अपने प्रस्ताव द्वारा लागू कर दिया है, जो एक बड़ा तेल उत्पादक देश है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि सुरक्षा परिषद के एक भी स्थाई सदस्य ने ‘वीटो’ का प्रयोग नहीं किया। रूस एवं चीन द्वारा वोट का बहिष्कार तथा वीटो के
अधिकार का प्रयोग न करने का अर्थ तो यही निकला कि उन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये शक्तियाँ लीबिया में वही सब हरकते करेंगी जो वह इराक में कर चुकी हैं। नागरिकों एवं सभी जमीनी जीवों आदि पर बम वर्षा, यहाँ तक की लीबिया के उन सच्चे राजनैतिक आन्दोलन कर्ताओं पर भी जो किसी कठपुतली सरकार को लाने का विरोध कर सकते थे। संसार एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद देख रहा है- एक ऐसा सार्वभौमिक नेटवर्क जो अपने आर्थिक एवं भौगोलिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु आर्थिक एवं कार्पोरेट शक्तियों के साथ-साथ नाटो एवं सुरक्षा परिषद के गठजोड़ का प्रयोग करता है।
इस प्रस्ताव का प्रभाव दूर तक जाता है। लीबिया में एक राजनैतिक आन्दोलन चल रहा है जो लीबिया के तेल पर बाहरी शक्तियों के कब्जे का विरोध करताहै तथा कर्नल गद्दाफी का भी विरोधी है, उन्हें भी अलग-थलग करने की रणनीति है। अब यह देखिए कि जिसे चतुराई से ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ घोषित किया गया वहाँ नाटो के सैनिक विमान बराबर उड़ रहे हैं, क्योंकि ‘प्रस्ताव’ वहाँ बाहरी शक्तियों को सैनिक कार्यवाही की स्वीकृति देता है।
सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव का उद्देश्य निश्चित रूप से यह नहीं है कि कर्नल गद्दाफी के वास्तविक या कथित अत्याचारों पर रोक लगाई जाए या यह कि वहाँ की आन्तिरिक अशान्ति का मामला सैनिक कार्यवाही द्वारा हल किया जाय। वास्तविकता यह है कि ये शक्तियाँ स्वयं अपनी आंतरिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अशान्ति एवं समस्याआंे से बचने के लिए ऐसा करती हैं, जैसा कि उन्होंने इराक में किया था। वे इस प्रस्ताव की सहायता से लीबिया के तेल भण्डारों पर पूर्ण नियंत्रण एवं कब्जा भी चाहते हैं। जो जन-आन्दोलन चल रहे हैं, उनसे उन साम्राज्यवादियों को खतरा है जो अरब के पैसों से मौज उड़ा रहे हैं। वहाँ की कामकाजी जनता को जीविकोर्पाजन एवं सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है अतः उनकी अशान्ति ने वहाँ के बादशाहों की नींद हराम कर दी है तथा उनके बाहरी समर्थकों के तेल के फायदे को भी नुकसान पहुँचाया है जो अभी तक शेखों के शोषण सिस्टम को समर्थन देते रहे हैं।
वित्तीय एवं कार्पोरेट जगत नाटो तथा रूस एवं चीन के साथ मिलकर ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ को इसलिए लागू कर रहे हैं कि लीबिया में ऐसा कोई विकल्प न निकले जो इन सबके स्वार्थ के विपरीत हो। यह एक राजनैतिक तथ्य है कि सभी अरब देशों में तेल का अथाह पैसा है, फिर भी उन्होंने उसको अपनी जनता के कल्याण के लिए खर्च नहीं किया। दूसरी ओर अरब लीग के सदस्य होते हुए भी कई देशों ने इसराईल से संबंध स्थापित कर लिए।
वहाँ की जनता जो पहले नहीं जानती थी अब सुरक्षा परिषद की दोगली नीति को जान गई है। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर अचानक सैनिक आक्रमण की भत्र्सना सुरक्षा परिषद एवं अरब लीग ने की परन्तु दूसरी ओर कपटपूर्ण ढंग से इराक में अमरीकी राजदूत ने इसे उकसाया। इसी प्रकार इराक-ईरान की युद्ध रचना इस क्षेत्र को कमजोर करने हेतु की गई। कुवैत जो कि उस क्षेत्र की उपनिवेश संरचना से पूर्व ईराक का एक हिस्सा था उस पर आक्रमण की योजना इस हेतु बनवाई गई ताकि यू0एस0-यू0के0 को उस क्षेत्र में सैनिक आक्रमण एवं कब्जे का मौका मिल जाए। इराकी जनता पर यह युद्ध जबरदस्ती थोपा गया था, यद्यपि इराक, कुवैत से हट गया था तथा युद्ध विराम हेतु प्रस्ताव दिया था, परन्तु वहाँ यूरेनियम हथियारों के छिपे होने का बहाना बनाया गया। जो लोग हथियार डालने को तैयार थे उन्हें अमानवीय तौर पर बालू में जीवित दफन कर दिया गया और उन्हें सामूहिक रूप से भी मार डाला गया। क्षेत्र में हमले के लिए कुवैत मिलिट्री बेस बना लिया गया, जहाँ से अब तक इराक पर बम वर्षा जारी है। इसी तरह लीबिया पर ‘‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’’ घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है जबकि कर्नल गद्गाफ़ी उनके पुत्र तथा इंग्लैण्ड और अमरीकी सरकारों के बीच घनिष्ठ सम्बंधों के राज़ सामने आ रहे हैं। यहाँ तक कि प्रतिष्ठित ‘लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स’ अब संदेह के घेरे में है जो लीबिया से गुप्त रूप से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहा है।
इराक, उत्तरी कोरिया, ईरान तथा अन्य स्थानों पर सुरक्षा परिषद ने इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि अब इनका समर्थन कोई नही करता। यह तो दरअसल वहाँ की जनता के खिलाफ युद्ध की घोषणा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो दुनिया में हर जगह अपने आकाओं के फायदे के लिए अपना हुक्म चलाता है, अब सऊदी अरब की सेनाओं के बहरीन मंे दाखिल हो जाने पर भत्र्सना क्यों नही करता? कि यह एक पड़ोसी देश में खुली हुई सैनिक घुसपैठ है। संयुक्त राष्ट्र संघ लगता है कि एक सार्वभौमिक माफिया है जो भौगोलिक एवं राजनैतिक सीमाओं का खयाल किए बगैर अपने विŸाीय नेटवर्क के इशारे पर काम करता है। पेट्रो-डालर की दुनिया में ऐसी सरकारें बाहरी शक्तियों के भरोसे ही जिन्दा हैं। अब ट्युनेशिया, मिस्र, और बहरीन की अरब जनता में एक उफान आ गया है तथा इनकी बदलाव की हवा अन्य देशों की ओर बढ़ रही है, परन्तु साथ ही दूसरी ओर एक रणनीति ऐसी तैयार की जा रही है कि इस उफान को रोक दिया जाए तथा इसकी दिशा को बदल दिया जाए।
इसी सुरक्षा परिषद की ओर से कोई प्रयास आज तक इस बात का नहीं किया गया कि इसराईल पर ‘नो फलाई जोन’ लागू होता तथा इराक, अफगानिस्तान पर आक्रमण करने वाली शक्तियों पर कोई कार्यवाही की जाती। यहाँ पर कर्नल गद्दाफी की सरकार के पक्ष में बात नहीं की जा रही है। वास्तविकता यह है कि कोई ऐसी नैतिक विवशता भी नहीं है कि लीबिया में सुरक्षा परिषद के नेतृत्व वाले ‘नो फ्लाई जोन’ या किसी ऐसे सैनिक घुसपैठ का समर्थन किया जाए जो अरब लीग के इशारे से हुआ। इसने तो आम जनता की कभी बात ही नहीं की, इसने क्षेत्र में हमेशा शाहों के स्वार्थ का समर्थन किया।
अरब दुनिया की जनता को ही केवल यह हक होना चाहिए कि वे अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें। ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का बहाना बनाकर सुरक्षा परिषद, नाटो या उसके संबंधी को, (अरब लीग में या कहीं भी) अपनी मनपंसद सरकार या डिक्टेटर हेतु सैनिक कार्यवाही करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। बातें नव औपनिवेशिक व्यवस्था के तौर पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक देश से दूसरे देश में बराबर देखी जा रही है। मुख्य स्वार्थों का एक नेटवर्क है जो सुरक्षा परिषद, नाटो अरब लीग आदि के साथ मिल कर एशिया अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की कभी एक सोसायटी पर सैनिक हवाई जहाजों या ड्रोन से पक्षियों के समान लोगों पर लक्ष्य साधकर निशाना बनाते हैं तथा अंधाधुंध बम वर्षा करके लोगों को मार डालते हैं। नाटो में जो सरकारें शामिल हैं वे युद्ध अपराधी हैं।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (जो अरब दुनिया के मामले में पुर्जे-पुर्जे करके हवा में उड़ा दिया गया) के अनुसार किसी देश के नागरिक ही अपनी राजनैतिक पसंद का निर्धारण करेंगे, इनमें किसी औपनिवेशिक शक्ति, बन्दूक या विदेशी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसमें कोई शंका नहीं कि तानाशाहों ने औपनिवेशिक सरकारों, उनके वित्तीय एवं कार्पोरेट स्वार्थी तत्वों से साठगाँठ करके अरब दुनिया के संसाधनों को ख्ूाब लूटा है, यह लूट अब भी जारी हैं, इस बात को ट्युनेशिया, मिस्र आदि की अरब जनता खूब जानती है। अरब जगत की कोई भी सरकार अपने नागरिकों की वफादारी का दैवीय
अधिकार प्राप्त करने का दावा कैसे कर सकती है जब कि वह अपनी जनता का शोषण कर रही है, अपने कामकाजी आमजन को बेरोजगार बनाए हुए है, वह सामाजिक तकलीफें उठा रहे हैं तथा राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें भाग लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। लगता है कि वहाँ कोई स्पष्ट राजनैतिक समझौता है कि सुरक्षा परिषद, नाटो या अरब लीग अथवा अन्य किसी संगठन की मदद से औपनिवेशिक सैनिक हस्तक्षेप के द्वारा अरब जनता के आन्दोलनों को अपहृत करना है तथा उनके रुख को मोड़ देना है। वास्तव में अरब भू भागों में स्थापित प्रत्येक बादशाहत को इन्हीं उपनिवेशवादियों ने ही थोपा था तथा वही उन पर अभी तक अपना आधिपत्य जमाए हुए हैं। राजनैतिक या कानूनी तौर से इस्लाम में बादशाहत या डिक्टेटर शिप की या फिरके बंदी ‘सुन्नी’ या ‘शिया’ की कोई मान्यता नहीं है। जब कि हम वहाँ धर्म के दुरुपयोग को बराबर देख रहे हैं, वे सरकारें चाहती हैं कि उन्हें आस्था की नजर से देखा जाए जबकि उन्होंने अपनी जनता को तथा दूसरे क्षेत्रों में भी लोगों को गुलाम बना रखा है तथा जाली संगठनों को विŸाीय सहायता इसलिए दे रहे हैं कि वे अपने उपनिवेशवादियों के सहयोग से दुनिया में इस्लाम की अलग ढंग से व्याख्या करें ताकि वहाँ के स्रोतों के दोहन करने का अवसर प्राप्त रहे।
भूत के समान ‘अलकायदा’ तथा इसी प्रकार के अन्य संगठन कभी दिखते हैं तथा कभी गायब हो जाते हैं, वे धार्मिक उकसाहरों से जब इशारे पाते हैं तो रणनीति के अनुसार यहाँ वहाँ मार काट व खून खराबा करते हंै।
अगर वास्तव में सुरक्षा परिषद नाटो और अरब लीग गम्भीर हैं और उन्हें लीबिया में सरकार एवं विद्रोहियों द्वारा बमबारी की चिंता है तो उन्हें पहले इन बातों पर ध्यान देना होगा कि वे कब्जा किए गए देशों- फिलिस्तीन, कांगो, इराक, अफगानिस्तान के भू भागों से अपने सैनिक वापस लें।
यूगोस्लाबिया की फेडेरल रिपब्लिक को पुनस्र्थापित करें, रवान्डा में पाल कागमे की सरकार को गद्दी से उतरने को कहें, लेबनान व सीरिया के कब्जे वाले भू भागों को खाली करवाएँ, तथा इस्राईल द्वारा कब्जे वाले क्षेत्रों को भी खाली करें। अफगानिस्तान पाकिस्तान क्षेत्र में बम वर्षा रोकें। संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंम्बली के प्रस्ताव के अनुरूप निर्धारित सीमाओं सहित फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दें तथा इस्राईल व फिलिस्तीन की राजनैतिक सीमाओं को स्पष्टतः निर्धारित करके दोनों राज्यों की स्थापना करें। सऊदी अरब से बहरीन भेजी गई सेनाओं को तुरन्त वापस बुलाएँ। हैती में दूसरे अन्य अर्जेन्ट उपायों के अतिरिक्त स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराएँ। संयुक्त राष्ट्र, नाटो एवं अरब लीग को अपने खून खराबा करवाने की आगे की छवि को दुरुस्त बनाने हेतु इससे कम की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे दुनिया के सामने अपना स्पष्टीकरण दें। यद्यपि ये बातें ऐसी हैं जैसे कि सुईं के सूराख से हाथी का पार होना फिर भी ‘नो फलाई जोन’ के मामले में इससे कम तर कुछ भी विचार नही किया जा सकता।

-नीलोफर भागवत
अनुवादक -डॉ0 एस0एम0 हैदर

सोमवार, 20 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, अंतिम भाग

यह बात बहुतों को नही मालूम है कि गांधी जी को प्रथम समाजवादी क्रान्ति से, जो 1917 में हुई, पूरी हमदर्दी थी, इस क्रान्ति ने सभी राष्ट्र-मुक्ति आन्दोलनों को अपना सहयोग दिया। गांधी की मुख्य सोच केवल यही नहीं थी कि उन्हें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाए, यह तो उनके अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का पहला चरण था, अन्य उद्देश्य थे- भूख, बेरोजगारी तथा विकराल अभावग्रस्तता का उन्मूलन। वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था ही बेरोज़गारी और मानवीय पतन का कारण है। गांधी का इस पर विश्वास था कि सामन्तवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर इसका दूसरा रास्ता खोजा जाए, यदि मानव जाति को डूबने से बचाना है, शोषण, असमानता, बेरोजगारी, हिंसा और युद्ध से मुक्ति दिलाना है। गांधी जी राजनैतिक सन्धि हेतु जब लंदन गए और वहाँ की एक श्रमिक बस्ती में जाकर रहे तब उन्होंने खुले आम यह कहा कि भारत में ब्रिटिश सामानों का जो बहिष्कार हो रहा है उसके निहितार्थ इंग्लैंड के श्रमिक समझने की क्षमता रखते हैं।
डा0 एम0एस0 स्वीमीनाथन जो एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हैं और जिनकी पहचान भारत में हरित क्रान्ति से जुड़ी है (उन हलकों में विवादास्पद हैं जो उस आर्गैनिक फारमिंग का समर्थन करते जो केमिकल तथा कीट नाशक दवाओं से मुक्त हों, उनका मत है कि उस भार से किसान पस्त हैं और उनके कर्जे बढ़ रहे हैं तथा ज़मीन व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं) उन्होंने ब्लूूम वर्ग यू0टी0वी0 पर अपने एक साक्षात्कार में जो 20 जनवरी 2010 को रिले किया गया उसमें गांधी जी की राजनैतिक प्राथमिकताओं को याद किया, इस बात पर भी दुःख प्रकट किया कि पिछले दशक में संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य उपलब्धता व पोषकों हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए थे भारत उनकी आधी उपलब्धि भी नहीं प्राप्त कर सका, जबकि वियतनाम और चीन ने उन्हें प्राप्त कर लिया। यह भी चेतावनी दी कि खाद्य वस्तुओं की असुरक्षा तथा उनके दामों में बेतहाशा बृद्धि आम-जनता के लिए असंतोष का कारण बनेगी।
इस बढ़ी हुई आयु में किसी अन्य राजनैतिक नेता को नहीं, केवल महात्मा गांधी को फासीवादी और दक्षिण पंथियों ने अपना निशाना बनाया तथा उनकी हत्या कर दी, इसलिए कि वे उनकी राजनैतिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को भारत में अपने साम्राज्यवादी भविष्य के एजेण्डे के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे थे। अब हत्यारे या उनके वैचारिक सहायक इसकी जो भी व्याख्या करें। बहरहाल बँटवारे के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की पुनर्संरचना को, जाते हुए साम्राज्यवादी थोप रहे थे तथा इसमें दोनो धार्मिक समूहों की राजनैतिक शक्तियों का सहारा ले रहे थे और धार्मिक हत्याओं हेतु उनको प्रशिक्षित किया जा रहा था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि आज के क़ब्ज़े वाले देशों तथा कल के लक्षित देशों में किया जा रहा है।
गांधी के सहयोग से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले, ग्रामीण व नगरीय कामगारों, दलितों के मसीहा, भारत के
संविधान के निर्माता डा0 बी0आर0 अम्बेडकर जिन्होंने संयुक्त राज्य की कोलम्बियाँ यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की थी, जब
गांधी जी की हत्या की गई तो असीमित पीड़ा के साथ अपनी भावनाओं को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया ‘‘महात्मा गांधी हम से सब से ज्यादा क़रीब थे‘‘ इस श्रद्धांजलि ने इस शरीफ़ लेकिन समझौता न करने वाले क्रान्तिकारी के जीवन का निचोड़ पेश कर दिया। 20वीं सदी के अनेक नेतृत्व करने वालों के साथ-साथ गांधी ने केवल भारतीय जन-मानस को ही राजनैतिक प्रेरणा नहीं दी वरन् वह, संसार के विभिन्न भागों में होने वाले आन्दोलनों के भी प्रणेता बने ताकि उस राजनैतिक साम्राज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिसकी संरचना ही इसलिए की गई थी ताकि श्रमिकों व कामगारों के राजनैतिक आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का हनन किया जाय।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
( समाप्त )

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

न्यायपालिका की स्वतंत्रता-2

संवैधानिक मिथ्या या राजनैतिक सत्य

अनादिकाल से ही आदर एवं सत्य, न्याय एवं न्याय करने वाले व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहा है जिसके कारण न्याय प्रक्रिया की पर्याप्त जाँच नहीं की जा सकी है। मानव समाज के विकास में प्राचीन काल से वर्तमान प्रजातांत्रिक युग तक यह धारणा बनी रही है कि न्यायिक शक्ति की उत्पत्ति दैवीय है। जैसे-जैसे आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था नवीन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक सत्य को ध्यान में रखते हुए अपनायी गई, न्याय पालिका राज्य के एक पृथक अंग के रूप में उभरकर सामने आई। यूरोप में शक्ति पृथक्कीकरण के सिद्धांत को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। सत्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड में व्यापारिक एवं वाणिज्यिक वर्गों ने राजा की निरंकुशता को चुनौती दी। गृह युद्ध के फलस्वरूप राजा को फाँसी दी गई ताकि इंग्लैण्ड में संसद की स्वच्छता को स्थापित किया जा सके। मध्यम वर्ग ने संसद के अन्दर तथा बाहर अपनी उपस्थिति एक प्रभावी वर्ग के रूप में दर्ज की।
1789 की फ्रांसीसी क्रांति के पश्चात फ्रांस में भी सत्ता का हस्तान्तरण राजतंत्र से व्यापारिक वर्ग को किया गया। फ्रांसीसी क्रांति का नेतृत्व मध्यम वर्ग ने किया। इसमें मजदूरों एवं किसानों ने अहम भूमिका अदा की। क्रांतिकारी हिंसा एवं अन्य बहुत सी ज्यादतियाँ जो इस क्रांति के फलस्वरूप लोगों पर हुईं, वे उन सारी हिंसा, अन्याय, कष्ट एवं पीड़ा से कहीं कम थीं जो निरंकुश राजतंत्र एवं कुलीन वर्ग के द्वारा इसके पूर्व की गईं। यही कुछ लोग सम्पूर्ण कृषि एवं व्यावसायिक सुविधाओं का भोग करते रहते थे। यही कुलीन वर्ग के लोग आम लोगों पर अत्याचार करते, उनको जेल में डालते एवं उनकी हत्या कर देते। जवाहर लाल नेहरू ने फ्रांसीसी क्रांति पर टिप्पणी करते हुए जेल में लिखा था:-
‘‘फ्रांसीसी आतंक एक बहुत भयानक चीज थी। यह फ्रांस की क्रांति से पहले की गरीबी एवं बेरोजगारी की बुराइयों की तुलना में एक पिस्सू की दंश की भाँति थी। सामाजिक क्रांति का मूल्य चाहे कितना बड़ा ही क्यों न हो, वह उन बुराइयों एवं युद्ध की कीमत से कम है जिनका सामना हमें वर्तमान सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में समय-समय पर करना पड़ता है। फ्रांस की क्रांति का भय अभी बना हुआ था क्योंकि कुलीन वर्ग के बहुत से लोग इस क्रांति में भुक्तभोगी थे एवं हमारी परम्परा इस विशिष्ट वर्ग के प्रति सम्मान की रही है। इस वर्ग से हमदर्दी करना गलत नहीं है। एवं हमारी शुभकामनायें उनके साथ है, परन्तु जो लोग अधिक महत्वपूर्ण हैं, वे आम लोग हैं। हम कुछ लोगों के लिए बहुसंख्यक वर्ग (आम लोगों) की बलि नहीं दे सकते है।’’
इन्ही राजनैतिक विकासों के फलस्वरूप, अमेरिकी स्वतंत्रता के 1776 के युद्ध के पश्चात, शक्ति का सन्तुलन बनाए रखने के लिए, शक्ति पृथक्वीकरण के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया एवं एक स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था अमेरिकी संविधान में की गई। यह व्यवस्था फ्रांसीसी राजनैतिक दार्शनिक, मान्टेस्क्यू एवं यूरोप में हुए घटनाक्रम के फलस्वरूप हुई।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं राजनैतिक सत्य में कहाँ तक समानता है, इस बात का फैसला करने के लिए अमेरिका (यू0एस0ए0) एवं भारत के सर्वोच्च न्यायालयों की कार्यप्रणाली का गूढ़ अध्ययन करना होगा। यह आमतौर पर स्वीकार किया जाता है कि अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय का इतिहास वास्तव में अमेरिका का इतिहास है। इसके कथनों एवं निर्णयों में अमेरिकी समाज का गूढ संघर्ष एवं तनाव दृष्टिगोचर होता है। यही बात भारतीय सर्वोच्च न्यायालय पर भी लागू होती है, हालाँकि उस सीमा तक नहीं, क्योंकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच, न्यायिक सहायता के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश लोगों के लिए संभव नही है। अमेरिकी एवं भारतीय दोनों सर्वोच्च न्यायालयों को न्यायिक पुनरावलोकन की असीम शक्तियाँ प्राप्त है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय सैद्धांतिक रूप से अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से अधिक शक्तिशाली है।
परन्तु वास्तविकता कहीं इससे परे है। इन देशों की न्यायिक संस्थाएँ, आर्थिक एवं राजनैतिक नीतियों से काफी सीमा तक प्रभावित होती हंै। पिछली दो सदियों में न्यायपालिका यद्यपि एक पृथक संस्था के रूप में उभरकर आई है, तथापि यह आर्थिक, राजनैतिक एवं सामाजिक अन्याय के प्रति, राजनैतिक संघर्ष का बदल नही हो सकती है। यह संघर्ष ही किसी समाज में शक्तियों के सन्तुलन को परिवर्तित करता है। न्यायपालिका अपने नेक इरादों के बावजूद भी, सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक क्रांति को जन्म नहीं दे सकती है क्योंकि इसका कार्य वर्तमान कानूनों की व्याख्या करना एवं उसको लागू करना है। वर्तमान कानून केवल वर्तमान स्थिति का प्रतिनिधित्व करते हंै। यदि विधायिका एवं कार्यपालिका स्थिरता की ओर झुकी हुई हंै या अवनति या प्रतिक्रिया के मार्ग पर हंै, तो न्यायपालिका की परेशानियाँ और भी बढ़ जाती हंै। इन सीमाओं के बावजूद भी, यह न्यायपालिका का संवैधानिक उत्तरदायित्व है कि वह मूलभूत अधिकारों की रक्षा करे तथा जीवन के अधिकार एवं राजनैतिक स्वतंत्रता के कानून के समक्ष, समानता के अधिकार की रक्षा करे, सामाजिक आर्थिक अन्यायों एवं भेदभावों के उन मामलों को समाप्त करे जो न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ।
अमेरिकी समाज में एक पृथक एवं भिन्न न्याय व्यवस्था की स्थापना मात्र से न्याय की प्राप्ति संभव नहीं हुई। डेªड स्काट बनाम जाॅन एफ0 ए0सैनफोर्ड मुकदमा, 60 यू एस0 393 जिसका फैसला 1857 में हुआ, इसका जीता जागता सबूत है। मुख्य न्यायाधीश ने फैसला दिया कि ‘‘एक गुलाम की हैसियत, सम्पत्ति से अधिक नहीं है। वह व्यापार एवं क्रय की एक वस्तु है। अमेरिकी स्वतंत्रता की उद्घोषणा की तरफ इंगित करते हुए मुख्य न्यायाधीश रोजर बी0 टैने ने इस मामले में टिप्पणी भी की थी कि ‘‘ इस विवाद से पूरी तरह स्पष्ट है कि गुलाम अफ्रीकन प्रजाति को वे लोग अपने में शामिल करना नहीं चाहते थे जो कानून बना रहे थे या उसको लागू कर रहे थे।’’ यह निर्णय उस समय के कपास एवं अन्य बाग़वानी करने वाले मालिकों के हितों की रक्षा करने से प्रेरित था। यही वर्ग उस समय अमेरिका के प्रभावकारी आर्थिक हितों का प्रतिनिधित्व करता था। उस समय के दुराग्रह अब भी विद्यमान हैं। यही कारण है कि अमेरिकी प्रशासन संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा पारित डरबन नस्लवाद (प्रथम) एवं डरबन नस्लवाद (द्वितीय) के विरुद्ध एवं इजराइल के नस्लीय भेदभाव (जहाँ कि चुनी हुई प्रजाति की नीति सरकारी नीति है) के विरुद्ध प्रस्तावों के सम्बन्ध में प्रभावकारिता से सहयोग करने या उनको लागू करने में पूरी तरह अक्षम साबित हुआ है।
यद्यपि अमेरिका में गुलामी प्रथा का अन्त कर दिया गया है फिर भी वर्ग एवं जाति पर आधारित नस्लवाद अमेरिकी न्यायिक व्यवस्था में अब भी मौजूद है। अफ्रीकी नस्ल के काले अमेरिकी, मजदूर एवं खेतिहर मजदूर का एक बड़ा हिस्सा हैं। कुछ दशक पूर्व उन्हें वोट देने का अधिकार न था। इसलिए उनका राजनैतिक प्रभाव नहीं है। आज लगभग तेईस लाख उन्नीस हजार दो सौ अट्ठावन नागरिक व्यक्तिगत (प्राइवेट) अमेरिकी जेलों में बंद हैं।
यह विश्व की सबसे बड़ी जेल संस्था है। अमेरिका के जेल, जो एक प्रकार का उद्योग हैं, प्राइवेट हाथों में हंै। यह एक बढ़ता हुआ उद्योग है। अमेरिका में उच्च शिक्षा की अपेक्षा जेलों पर अधिक पैसा व्यय किया जाता है। यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि अफ्रीकी नस्ल के काले अमेरिकी, अमेरिकी जेलों में सर्वाधिक हैं। लगभग 9 लाख काले अमेरिकी जेलों में सड़ रहे हैं। 20 से 35 आयु वर्ग के पुरूषों में 9 में से एक अफ्रीकी अमेरिकन जेल में है एवं 35 से 39 आयु वर्ग की महिलाओं में 100 में से एक अफ्रीकी- अमेरिकन महिला नागरिक जेलों में बन्द है। उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जो कि ड्रग सम्बंधी एवं अन्य छोटे-मोटे अभियोगों में जेलों में बन्द हैं। एक काले अमेरिकी व्यक्ति ओबामा का राष्ट्रपति के रूप में चुनाव अतीत से एक भिन्न वस्तु अवश्य है, परन्तु इसने अमेरिकी समाज की, जो कि एक बड़े आर्थिक संकट से त्रस्त है एवं कर्जे में डूबा हुआ है, सामाजिक तथा राजनैतिक सच्चाई को नही बदला है एवं अमेरिकी समाज का मूल ढाँचा वैसे ही मौजूद है। यद्यपि पचास के दशक के अफ्रीकी-अमेरिकनों पर हत्या के नजरिये से आक्रमण अब अतीत का हिस्सा बन गया है फिर भी अमेरिकी पुलिस समय-समय पर अपने कुकृत्यों से श्वेत वर्ग की ओर अपने नस्लीय झुकाव को पूरी तरह से जाहिर करती रहती है। अबू जमाल जो कि एक सम्मानित अफ्रीकी नस्लीय, अमेरिकन पत्रकार एवं प्रसिद्ध राजनैतिक कार्यकर्ता है पिछले 25 वर्षों से अमेरिकी जेल में सड़ रहा है। वह अब मृत्यु की कगार पर है। उसकी पुनः मुकदमा करने की अपील को अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है। यह मामला सम्पूर्ण अमेरिकी न्याय व्यवस्था एवं अमेरिकी जजों की निष्पक्षता पर एक सवालिया निशान खड़ा करता है।

लेखिका-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष, इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स

अनुवादक-मोहम्मद एहरार
मोबाइल - 9451969854

जारी ....

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