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रविवार, 12 अप्रैल 2020

कोरोना :वियतनाम जिसने दुश्मन की मदद कर मानवता की मिसाल पेश की

 
 
https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/f/fc/VietnamMural.jpg
अमरीका ने वियतनामके साथ यह किया था
  अमरीका ने  वियतनाम को समाप्त करने के लिए 1 नवम्बर 1955 - 30 अप्रैल 1975 तक उसी की धरती पर  युद्ध लड़ा था लेकिन उसी वियतनाम ने कोरोना वायरस से जूझ रहे अमरीका को 1मिलियन PPE किट दान कर मानवता को बचाए रखने के लिए क्म्युनिस्ट परम्परा को जिन्दा रखा है । 450 हज़ार की पहली खेप US पंहुच चुकी है दूसरी पंहुचने वाली है . वियतनाम ने इटली और लागोस को भी मदद स्वरूप जांच किट और इक्यूपमेंट्स भेजे है।
पूंजीवाद और समाजवाद में यही अंतर है  युद्ध और मानव रक्त बहाना उनका जीवन है शांति उनकी मौत है  कम्यूनिस्ट वियतनाम में कोरोना वायरस के 251 मरीज थे कोई कैजुअल्टी नही, सब ठीक हो चुके है ।
पूरी दुनिया में कोरोना वायरस महामारी का कहर जारी है। इस बीमारी का सबसे ज्यादा प्रकोप फिलहाल अमेरिका झेल रहा है। पिछले 24 घंटों में वहां 1920 लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि, दुनिया में कई देश ऐसे भी हैं जिन्होंने काफी हद तक कोरोना वायरस से जंग जीत ली है। ऐसा ही एक देश है वियतनाम।
वियतनाम दक्षिणपूर्व एशिया के हिन्दचीन प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित एक देश है। इसके उत्तर में चीन, उत्तर पश्चिम में लाओस, दक्षिण पश्चिम में कंबोडिया और पूर्व में दक्षिण चीन सागर स्थित है। २००८ में ८ करोड़ ६१ लाख की जनसंख्या के साथ वियतनाम दुनिया में १३वाँ सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है।
हमारे देश में कोरोना जंग जारी है ,थाली- ताली- शंख- पटाका -दिया जलाना -गौ मूत्र  -गोबर व मशाल जुलूस के साथ अब आधुनिक चिकित्सा का सहारा भी लिया जा रहा है .केरल ने आधुनिक चिकित्सा पद्दति का सहारा लेकर कोरोना की रोकथाम की है .आरोप -प्रत्यारोप का दौर ,साम्प्रदिकता को भी आधार बना का कोरोना वाइरस से युद्ध लड़ा जा रहा है .
 गरीब जनता को  मुर्गा बनाना -चुतड पर साट लगाना -सड़क पर घिसटते हुए सरकना  और बेतों से पिटाई फिर जेल  में बाद करना जैसे द्रश्य आम बात है .वहीँ  कोरोना वाइरस को विदेशों से लाने वाले लोगों को सरकार बड़े आराम से सेवा  कर रही है . गरीब मजदूर किसान बेहाल है .जनता को केरल -वियतनाम से  सीखना चाहिए .
-रणधीर सिंह सुमन

रविवार, 28 जून 2015

अमरीका, लोकतंत्र, आतंकवाद व धार्मिक अतिवाद


  बहुत से पाठकों को यह शीर्षक ही बड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह इस निबन्ध की एक पड़ताल का विश्लेषण करने का प्रयास है। जो अमरीका के आतंकवाद, लोकतंत्र व धार्मिक अतिवाद के गठजोड़ पर आधारित है। वर्षों के बड़े प्रोपेगंडा के कारण बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि अमरीका संसार में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी व प्रोत्साहक है और संसार में हर दशा में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चाहता है धार्मिक अतिवाद व आतंकवाद के विरोध में लड़ी जा रही लड़ाई का पड़ताल करें और यह भी देखने का प्रयास करें कि भारत में उसकी क्या भूमिका रही है।
    वर्षों की अंदेखी, उदासीनता व हाशिए पर रहने के बाद दक्षिण एशिया का क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी के साथ उभरा है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल व मालदीप आते हैं। तेल के बड़े भण्डारों व सामरिक महत्व के कारण खाड़ी के देश अधिक महत्वपूर्ण माने जाते रहे। तत्पश्चात अमरीका, योरोपीय यूनियन, चीन व जापान जैसे महत्वपूर्ण देशों ने दक्षिण एशिया की ओर देखना शुरू किया और 9/11 की घटना के बाद तो अमरीका का ध्यान पूरे तौर पर इस ओर हुआ। ‘‘आतंकवाद’’ से अमरीका ने सहयोगी देशों की सहायता से इस पूरे क्षेत्र को शक्ति संरचना कर अपने काबू में करना शुरू किया और पाकिस्तान व अफगानिस्तान में यह काफी हद तक सफल भी रहा। साथ ही उसने भारत के अपने रिश्तों को भी मजबूत करने का पूरा प्रयास किया जिससे कि चीन के प्रभाव को भी रोका जा सके।
    चोम्सकी, जो वर्तमान संसार में सबसे सम्मानित बुद्धिजीवी माने जाते हैं, 2013 के अपने लेख में कहते हैं कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आतंकी शक्ति का संचालन कर रहा है। चोम्सकी अमरीकी नागरिक हैं तथा प्रख्यात एम0आई0टी0 मेसोच्यूसेट इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में वर्षों से प्रोफेसर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीकी व्यवस्था हमेशा कुछ विरोधी व भिन्न मतावलंबितयों को भी बरदाश्त करती रही है जिससे कि संसार को दिखाया जा सके कि अमरीका में असहमति को कितना सम्मान दिया जाता है। इससे मुझे अपने अमरीकी प्रवास में 2006-07 की एक घटना याद आती है हाऊज (अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यालय/ आवास) के सामने टेंट लगाये थे या प्लेकार्ड लिए बैठे थे। सबसे अगली कतार में एक अमरीकी महिला एक बड़ा सा पोस्टर लिए बैठी जिस को उस समय मेकअप में दिखाया था और बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नीचे लिखा था ‘‘विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी’’। अमरीकी स्वार्थो पर हमला नहीं करती। चोक्सी व हरमेन का यह भी मानना है कि तीसरी दुनिया में जो भी क्षेत्र अमरीका के प्रभाव में हैं वहाँ वहाँ आतंक का जमावड़ा है। इन विद्वानों ने दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि किस प्रकार लातेनी अमरीका के गरीब देशों में कठपुतली शासक अमरीका के समर्थन से आतंक के द्वारा अवामी इच्छाओं का दमन करते रहे हैं। वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आज भूमंडलीय स्तर पर जितना भी आतंकवाद है। अमरीकी विदेशी नीति का परिणाम है। मेकार्ड व स्टाई बर जैसे विशेषज्ञों का यह मानना है कि 9/11 घटना से पहले भी व बाद में भी अमरीका अल कायदा को धन व हथियारों से सीरिया, लीबिया, बोसनिया, चेचेनिया, इरान जैसे अनेकों देशों में अपनी कार्यवाही के लिए सहायता देता रहा हैं ध्यान देने की बात यह है कि ये सभी देश अमरीका के समर्थक नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि विश्व में 74 प्रतिशत देशों में जहाँ आतंकी तरीकों को प्रशासनिक सहमति हासिल है, अमरीका की कठपुतली सरकारें हैं। क्या यह मजाक नहीं लगता कि जो महाशक्ति दुनिया में सुबह से शाम तक शांति की बात करती हो, गले-गले तक आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
    अमरीका के द्वारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के दावों की कलई कई बार खुल चुकी है। एक बार फिर इस की पड़ताल कर ली जाये। यदि हम दुनिया का नक्शा उठा कर देखें तो पाते हैं कि लातीनी अमरीका के देशों से लेकर,
मध्यपूर्व, दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिणी एशिया के देशों तक अमरीका की सहायता से लोकतंात्रिक सरकारों का तख्ता पलट कर तानाशाही सत्ता को कभी सफलता पूर्वक और कभी असफल प्रयासों का सहारा लिया गया है। यहाँ पर कुछ विशिष्ट उदाहरणों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया जा रहा है।
    अमरीका का हमेशा कहना रहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकारों को कभी नहीं हटाने का प्रयास करेगा चाहे वह कोई वामपंथी सरकार क्यों न हो। 1970 में दक्षिणी अमरीका के देश चिली में डाॅ. एलेन्डे की वामपंथी सरकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण में होने वाले चुनाव के द्वारा बनाई गई लेकिन उस को बहुत दिन चलने नहीं दिया गया और सी आईए के द्वारा उस का तख्ता पलट कर फौजी शासन स्थापित कर दिया गया जिस ने इस के विरोध में होने वाले जन आन्दोलन को कुचल दिया। ऐसा ही कुछ निकारागुआ में भी किया गया। 1984 में पारदर्शी चुनाव के द्वारा वहाँ पर एक प्रगतिशील वामपंथ की ओर झुकाव वाली सरकार का गठन किया गया लेकिन अमरीका को निकारागुआ की क्यूबा व सोवियत यूनियन से दोस्ती अच्छी नहीं लगी। अमरीका को इस बात का डर भी खाये जा रहा था कि कहीं निकारागुआ का उदाहरण दूसरे शोषित लातीनी अमरीका के देशों को वामपंथ की ओर न मोड़ दे। अमरीका ने निकारागुआ के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि उसे अपना ध्यान व संसाधन अपनी सुरक्षा में लगाना पड़ गया और इस प्रकार आर्थिक संकटों से जूझती हुई सरकार को गिरा दिया गया। क्यूबा पर तो लगातार अमरीकी प्रयास जारी रहा। फोडेल कास्त्रो को मारने का कई बार प्रयास भी किया गया। लेकिन क्यूबा की वामपंथी सरकार को गिराया नहीं जा सका।
    यह सूची इतनी लम्बी है कि दर्जनों पन्ने सियाह हो जाएँगे इस लिए निम्न संक्षिप्त सारणी के द्वारा यह बात आगे बढ़ाई जा रही है  जिस से पाठकों को यह अन्दाजा भली भाँति हो जाएगा कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाहों को किस प्रकार मजबूत किया गया और उनकी सत्ता को कैसे जायज़ ठहराया गया
1    लातीनी अमरीका:
    पिनोशेट (चिली), नोरेगा (पनामा),
    डुवेलियर (हैती), बेनजे़र (बोलेविया)
2    ऐशिया:
    ओमान, कतर, बहरैन के शेख
    सऊदी अरब के बादशाह
    सुहारतों (इण्डोनेशिया)
    जि़याउलहक़ व मुशर्रफ़ (पाकिस्तान)
    बादशाह रज़ाशाह पहेलवीं (ईरान)
3    अफ्रीका:
    बादशाह हसन (मोराक्को)
    गफ्फार नुमैरी (सुडान)
    होसनी मुबारक (मिश्र)
    द0 अफ्रीका के नस्लवादी शासक
4    योरोप:
    फ्रानको (स्पेन)
    सालाज़ार (पुर्तगाल)    

    तुर्की व यूनान की फ़ौजी सत्ता इन तथा इन जैसे अनेक दूसरे उदाहरणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अमरीकी लोकतंत्र का मुखौटा कितना महीन है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के इस के दावे कितने खोखले हैं वरना फौजी शासकों, बादशाहों तथा नस्लवादी शासकों को सभी प्रकार के समर्थन देकर उन की सत्ता को बचाना क्या अर्थ रख सकता है। जाहिर है अपने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक हितों के सामने लोकतंत्र की कोई कीमत नहीं है। सऊदी अरब व ईरान के निर्मम व जालिम बादशाहों को वर्षों तक अमरीका ने बचाया क्योंकि वे उस की कठपुतली थे। ईरान के अवाम ने बादशाह के विरोध में बगावत किया, कुरबानी दी और उसे खदेड़ दिया। यह अलग बात है कि ईरान में चुनाव वो करवाती है लेकिन लोकतंत्र पर लगाम है। सऊदी अरब में बादशाहत अब भी बनी हुई है, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है तथा धार्मिक कट्टरता ने अवाम, विशेष कर अल्पसंख्यकों को पैरों के नीचे दबा रखा है लेकिन अमरीका के आर्थिक व सामरिक हित सर्वाेपरि हैं।
    अजीब विडंबना है कि संसार भर में आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अमरीका का हाथ देखा जा सकता है और इस्लाम के नाम पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में तो सीधे अमरीका की भूमिका देखी जा सकती है। चूँकि अमरीका के आर्थिक व सामरिक हितों को सब से अधिक खतरा इस्लामी चरमपंथियों से था इस लिए उस ने विश्व मीडिया शक्ति को इस्लामी आतंकवाद का डर दिखाने को लगा दिया। बहुतों को इस बात पर विश्वास भी हो गया कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व शांति के लिए सब से बड़ा खतरा है। जब हकीकत यह है कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व आतंकवाद का केवल एक छोटा सा अंशमात्र है। अमरीका के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर चाल्र्स कुर्ज़मैन ने अपने अध्ययन ष्ज्ीम उपेेपदह डंतजलते रू ॅील जीमतम ंतम ेव मिू उनेसपउ ज्मततवतपेजेघ्ष् के द्वारा यह स्थापित किया है कि मुस्लिम आतंकवाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया। उन्होंने यह सवाल भी किया कि हमने इस बात पर क्यों विश्वास किया कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है और हम इतना क्यों डरे हुए थे। पिछले पाँच वर्षों की घटनाओं ने प्रोफेसर कुर्जमैन की बात को सही साबित कर दिया। आज पूरे योरोप व अमरीका में प्ेसंउवचीवइपं अर्थात इस्लाम का डर जीवन की एक हकीकत बन चुका है और समाज के दिन प्रतिदिन जीवन में देखा जा सकता है।
    तथाकथित मुस्लिम या इस्लामी आतंकवाद की ताकत व फैलाव चाहे जितना हो लेकिन आज यह स्थापित हो चुका है कि इसके पीछे काफी हद तक इस्लाम की वह चरमपंथी व्याख्या है जो साम्राजी के नाम से जानी जाती है और जिसका प्रमुख स्रोत सऊदी अरब है जो साम्राजी विचारधारा को ही सच्चा इस्लाम मान कर उसके प्रचार व प्रसार पर अरबों डालर खर्च करता रहा है। अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर नाइजीरिया के अलशबाब व बोकोहरम व इराक-सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आई0एस0) तक सभी विचारधारा से प्रोत्साहित होते हैं। योरोप व अमरीका सहित समूचे विश्व में सऊदी पेट्रोडालर की सहायता से मस्जिदों व मदरसों पर कब्जा किया जा रहा है और वहीं से साम्राजी विचारधारा को ही सही इस्लाम के रूप में प्रसारित व प्रचारित किया जा रहा है। कैसा मज़ाक है, कि वह अमरीका जो सुबह से शाम तक इस्लामी आतंकवाद की रट लगाए रहता है, मुस्लिम संसार में अपने को ही गले से लगाये हुए हैं। बादशाहत, धार्मिक अतिवाद व पूँजीवाद के इस अजीबों गरीब मिश्रण को अमरीका ही
साध सकता है। संतोष की बात यह है कि अपने सभी प्रयासों के बावजूद समूचे विश्व की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा ही इस विचारधारा के प्रभाव में है लेकिन जिस तेजी के साथ यह फैल रहा है शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता हैं।
        यह हम कैसे भूल जाएँ कि अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरोध में अमरीका ने ही तालीबान को प्रोत्साहन व समर्थन दिया था और पाकिस्तान के फौजी शासकों के द्वारा उन के मदरसों को बढ़ावा मिला था। भारत में हिन्दुत्व व चरमपंथी हिन्दु शक्तियों के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका को देखा जा सकता है। भारत के मजदूर-किसान-दलित-आदिवासी की एकता आदि को तोड़ने के लिए जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उस के अनुषंगी संगठन लगे हुए हैं उसे कोई भी देख सकता है। स्वदेशी व भारतीयता का गला फाड़ फाड़ कर नारा लगाने वालों की जब केन्द्र में सत्ता स्थापित हुई तो कारपोरेट सेक्टर के हित ही देशहित हो गये और सांप्रदायिक तनाव के धुएँ में असली मुद्दों को छुपाने का प्रयास हो रहा है। पूँजीवादी फासीवाद हमारे देश में दस्तक दे रहा है। हमें इतिहास से सबक लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद लोकतांत्रिक चुनावों के कंधों पर चढ़ कर ही आता रहा है। हिटलर व मुसोलनी इस के उदाहरण हैं। लोकतंत्रीकरण व लोकतंात्रिक मुकाबला कर सकती है। एक व्यक्ति ही सब कुछ कर देगा, यह सोच ही  फासीवाद व तानाशाही की ओर उठा पहला कदम है जिसके लिए हमें सचेत रहना है।        
 -प्रो0 नदीम हसनैन
        मोबाइल: 09721533337
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

मंगलवार, 26 मई 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

नरेन्द्र मोदी ने 25 मई 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में एक साल पूरा कर लिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इस एक साल में मोदी की क्या उपलब्धियां रहीं,यह उतना ही विवादास्पद है जितना कि मोदी का व्यक्तित्व। जहां प्रधानमंत्री के समर्थक और अनुयायी यह अतिश्योक्तिपूर्ण दावा कर रहे हैं कि मोदी ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं वहीं उनके विरोधी, उन वायदों की सूची गिनवा रहे हैं जो पूरे नहीं हुए। उनके कार्यकाल का निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। हम यहां उन कुछ प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जो मोदी के कार्यकाल में उभरीं और उस दिशा पर विचार करेंगे, जिस ओर उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश को ले जा रही है।
आम चुनाव के समय नारा दिया गया था 'अब की बार, मोदी सरकार' और यह सचमुच मोदी की ही सरकार है। यह न तो एनडीए की सरकार है और ना ही भाजपा की। अखबारों के अनुसार, एनडीए के गठबंधन साथियों ने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की है। महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और अकाली दल, भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों के विरोधी हैं। शिवसेना ने भाजपा की तुलना अफजल खान की सेना के महाराष्ट्र पर आक्रमण से की। पिछली यूपीए सरकार के विपरीत, प्रधानमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि वे एक कड़े प्रशासक हैं और सभी निर्णय वे स्वयं लेते हैं। प्रजातंत्र में सबको साथ लेकर चलना होता है,सभी के हितों का ख्याल रखना होता है। कुछ महीनों पहले, अखबारों में एक फोटो छपी थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी एक ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए थे और बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों की कुर्सियां नीचे थीं। संदेश स्पष्ट था। प्रधानमंत्री ने किस हद तक अपने मंत्रियों पर शिकंजा कस रखा है यह इस बात से जाहिर है कि मंत्रियों को अपने निजी सचिवों की नियुक्तियों के लिए भी प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। कारण यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि मंत्रिगण अपने रिश्तेदारों या परिचितों को अपना निजी सचिव बनाएं। परंतु क्या इसके लिए एक सामान्य निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता ?क्या प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे उनके निर्देशों का पालन करेंगे? यह भी साफ नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों के प्रस्तावित निजी सचिवों के संबंध में क्या जांच.पड़ताल की।
केंद्रीयकरण
मोदी सरकार में सभी शक्तियां, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीकृत कर दी गई हैं। सभी मंत्रालयों के सचिवों की पीएमओ तक सीधी पहुंच है और पीएमओ किसी भी मंत्रालय से कोई भी फाईल बुलवा सकता है। इससे निश्चित तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है परंतु हर तेज निर्णय हमेशा सबसे अच्छा निर्णय नहीं होता। प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राफेल कंपनी से लड़ाकू हवाई जहाज खरीदने का सौदा, बिना रक्षामंत्री की मौजूदगी या सहमति के किया। प्रधानमंत्री इस एक वर्ष में दुनिया के बहुत से देशों में गए। इनमें भूटान, श्रीलंका, नेपाल, इंग्लैण्ड,जर्मनी, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, चीन और मंगोलिया शामिल हैं। विदेश मंत्री, ईराक में फंसे 39 भारतीयों को निकालने और अन्य इसी तरह के कामों में व्यस्त रहीं। यहां तक कि नेपाल में भूकंप के बाद भारत सरकार ने जो राहत पहुंचाई उसका श्रेय भी केवल मोदी को दिया गया। जिन भी देशों में मोदी गए, वहां उन्होंने अप्रवासी भारतीयों की सभाओं को संबोधित किया और स्वदेश की राजनीति के संबंध में टिप्पणियां कीं।
किसी एक व्यक्ति में सारी शक्तियां केंद्रित कर देने से उन लोगों को लाभ होता है जो उस व्यक्ति के करीबी हैं या जिनकी उस तक पहुंच है। वह व्यक्ति जितना अधिक शक्तिशाली होता है उसे उतने ही ज्यादा विवेकाधिकार प्राप्त होते हैं और वह जो नीतियां बनाता हैए उनसे उन लोगों को लाभ होता है जो उसके नजदीक हैं। प्रधानमंत्री की छवि कुबेरपतियों के मित्र की है। उनके 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' 'मेक इन इंडिया' अभियानों से भी यही ध्वनित होता है। इन अभियानों के अंतर्गत उद्योगों की नियमन प्रणाली को लचीला बनाया जा रहा है, उन्हें विभिन्न अनुमतियां प्रदान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, कारपोरेट टैक्सों की दरें घटाई गई हैं, पर्यावरण संबंधी बंधन ढीले किए गए हैं और उद्योगपतियों को कर्मचारियों को जब चाहे रखने और जब चाहे हटाने की स्वतंत्रता दे दी गई है। इस सब से श्रमिकों की ट्रेड यूनियनें कमजोर हुई हैं व श्रमिक वर्ग की आमदनी घटी है। राज्य, भूमि अधिग्रहण करने में उद्योगपतियों की मदद कर रहा है और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। मुंबई.दिल्ली औद्योगिक गलियारा और मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इनकी तुलना पूर्व यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं से कीजिए.यद्यपि वह भी उद्योगपतियों की मित्र थी.जिसने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा व सूचना के अधिकार जैसी योजनाओं व कार्यक्रमों पर कम से कम कुछ धन तो खर्च किया।
एससी, एसटी व नीति आयोग
अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के लिए केंद्रीय बजट 2015.16 में पिछले बजट की तुलना में प्रावधान क्रमश: रूपये 43,208 करोड़ से घटाकर रूपये 30,851 करोड़ और रूपये 26,715 करोड़ से घटाकर रूपये 19,980 करोड़ कर दिए गए। इन समुदायों के आबादी में अनुपात की दृष्टि से जितना धन इन योजनाओं के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, बजट प्रावधान उससे काफी कम हैं।
अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हेपतुल्लाह को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि पारसी समुदाय की प्रजनन दर कैसे बढ़ाई जाए।
मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना कर दी। मोदी सरकार का तर्क था कि योजना आयोग की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका गठन उस दौर में किया गया था जब सरकार का अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। परंतु इस संदर्भ में यह याद रखे जाने की जरूरत है कि शनैः शनैः योजना आयोग अधिक समावेशी नीतियां अपना रहा था और उसी ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में बजट प्रावधान करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार 'अल्पसंख्यक' शब्द का इस्तेमाल किया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि समाज के हाशिये पर पड़े तबकों को मुख्यधारा के समकक्ष लाए जाने की जरूरत है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक न्याय व सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए सभी के विकास की बात कही गई थी। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए जाने का सिलसिला दसवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ। इस योजना का फोकस महिलाओं व अल्पसंख्यकों सहित सभी वंचित व कमजोर वर्गों के सामाजिक.आर्थिक विकास पर था। ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना में अधिक समावेशी विकास की बात कही गई थी और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाने पर जोर दिया गया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए और अधिक आर्थिक प्रावधान किए गए थे।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग स्थापित करने के निर्णय को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। नीति आयोग का वंचित समूहों के विकास से कोई लेनादेना नहीं है। वह तो एक प्रकार का 'थिंक टैंक'है, जिसका जोर बाजार और औद्योगिक गलियारों के विकास और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने पर है।
शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता
प्रधानमंत्री मोदी के बाद उनके मंत्रिमंडल के जिस मंत्री की मीडिया में सबसे अधिक चर्चा रही वे थीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। और वे लगभग हमेशा गलत कारणों से चर्चा में रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्री का कई शैक्षणिक संस्थानों से कई मौकों पर टकराव हुआ और उन्होंने अनेक विवादास्पद निर्णय लिए। इनमें शामिल हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के चार.वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को समाप्त करनाए अमर्त्य सेन द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का दूसरी बार कुलाधिपति बनने से इंकारए परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक अनिल काकोडकर व आरण्केण् शैवगांवकर का आईआईटी मुंबई के शासी निकाय से इस्तीफा,केंद्रीय विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के अधबीचए जर्मन की जगह संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना आदि। शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्ता को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए गए। हरियाणा में स्कूलों में गीता पढ़ाई जा रही है और राजस्थान के स्कूलों में सूर्यनमस्कार अनिवार्य बना दिया गया है।
आरएसएस नेता सुरेश सोनी व कृष्णगोपाल दत्तात्रेय और भाजपा के जेपी नड्डा व रामलाल ने मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर यह मांग की कि स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में 'सुधार' किए जाएं। इस मुद्दे पर कई बैठकें हुईं। 30 अक्टूबर 2014 को इस मुद्दे पर छठवीं बैठक आयोजित की गई। दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को गुजरात  सरकार ने स्कूली विद्यार्थियों के अतिरिक्त अध्ययन के लिए निर्धारित किया है। ये किताबें इतिहास को हिंदू राष्ट्रवादी चश्मे से देखती हैं और इनमें अप्रमाणित तथ्यों के आधार पर प्राचीन भारत का महिमामंडन किया गया है ताकि लोगों में श्रेष्ठता और गर्व का झूठा भाव जगाया जा सके। इतिहास को पौराणिक रंग दे दिया गया है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक उपलब्ध थी और इसका प्रमाण यह है कि भगवान गणेश का सिर हाथी का और शरीर मनुष्य का है। हम सब यह सोचकर चकित थे कि हाथी का कई क्विंटल वजनी सिर यदि किसी तरह मानव शरीर पर लगा भी दिया जाए तो वह मनुश्य उसका वजन कैसे सहन कर सकेगा। इसी तरह के वक्तव्य कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी दिए जिनमें से कुछ ने कहा कि भारत में हजारों साल पहले परमाणु मिसाइलें थीं। विद्यार्थियों के सामने फंतासी और पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में परोसनाए उनके दिमाग को कुंद करना है। एक अच्छे विद्यार्थी का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वह किसी भी बात को आंख मूंचकर नहीं मानता और हर विश्वास व तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसता है।  
हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना
देश में हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है। यह, हिन्दू धार्मिक चेतना से एकदम अलग है। हिन्दू धार्मिक चेतना का प्रकटीकरण कई स्वरूपों में हो सकता है जिनमें पवित्रता.अपवित्रता की अवधारणाए जो यह निर्धारित करती है कि कौन किसके साथ रोटी.बेटी का संबंध रख सकता है और कौन ऊँचा है और कौन नीचा से लेकर मीरा, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम, रविदास आदि के प्रेमए सद्भाव, समानता, सत्य व अहिंसा पर आधारित समावेशी शिक्षाओं तक शामिल हैं। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना एक प्रकार की राजनैतिक चेतना है जो जाति.आधारित ऊँचनीच को कायम रखते हुए हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से एक करना चाहती है और जो 'दूसरे'को न केवल परिभाषित करती है वरन् यह भी सिखाती है कि उस 'दूसरे' से हिन्दुओं को अनवरत युद्धरत रहना है। हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना,एकाधिकारवादी राज्य को आसानी से स्वीकार कर लेगी बशर्ते वह उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के विशेषाधिकारों को कायम रखे और 'दूसरे' समुदाय का हिंसा से दमन करे और यहां तक कि उसे देश से भगा दे।
ध्रुवीकरण करने के उद्धेश्य से शुरू किया गया साम्प्रदायिक विमर्श दिन.प्रतिदिन और दुस्साहसी होता जा रहा है। कुछ राज्यों में गोड़से के मंदिर बन गए हैं और उसे हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। दिसम्बर 2014 से लेकर अब तक दिल्ली,पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले की कम से कम 11 घटनाएं हुई हैं।  शासक दल के सांसद और यहां तक कि मंत्री ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं जिनके लिए उनपर दूसरे समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए के तहत कार्यवाही की जा सकती है। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची व अन्यों ने अलग.अलग समय पर कहा कि जो लोग राम में विश्वास नहीं करते वे हरामजादे हैंए मदरसे आतंकवाद के अड्डे हैं,मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए और जो लोग मोदी को वोट नहीं देते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। परंतु न तो इन भड़काऊ वक्तव्य देने वालों और ना ही चर्चों पर हमले करने वालों पर कोई कार्यवाही की गई।
घर वापसी अभियान जोरशोर से जारी है और आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में गैर.हिन्दुओं को जबरदस्ती हिन्दू बनाए जाने को औचित्यपूर्ण बताते हुए अत्यंत गिरी हुई भाषा का उपयोग किया। उन्होंने यह मांग की कि 'हमारा माल वापिस कर दो' मानो मुसलमान कोई संपत्ति हों। भागवत के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाए गृह मंत्री ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी तरह, कई संगठनों ने यह बीड़ा उठा लिया है कि वे हिन्दू लड़कियों की शादी गैर.हिन्दुओं से नहीं होने देंगे भले ही लड़के और लड़की को इसमें कोई आपत्ति न हो।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन केवल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने से संतुष्ट नहीं हैं। वे राज्य की शक्ति का प्रयोग उनके खिलाफ करना चाहते हैं। गुजरात विधानसभा ने हाल में एक अत्यंत भयावह तथाकथित आतंकवाद.निरोधक विधेयक पारित किया है और सरकार के कहने पर राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र सरकार के बीस साल पुराने गौवध निषेध अधिनियम को अपनी स्वीकृति दे दी है। इन सभी कानूनों का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों का दमन है।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 12 मई 2013

प्रजातंत्र पर बदनुमा दाग:मोदी

नरेन्द्र मोदी, जिनके प्रति कुछ यूरोपीय देशों के रुख में नरमी आ रही थी, को अमरीका से आ रही ताज़ा ख़बरों से काफी निराशा हुई होगी। अमरीका में एक विशिष्ट लाबी द्वारा उन्हें वीसा प्रदान किये जाने का दवाब बनाने के बावजूदए 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन फार इंटरनेशनल रिलीजीयस फ्रीडम' ;यूएससीआईआरएफ ने ओबामा प्रशासन से यह मांग की है की सन २००२ के गुजरात कत्लेआम,  जिसमें २ए००० से अधिक लोग मरे गए थे और १,५०,००० से अधिक अपने घर.बार से बेदखल कर दिए गए थे, में मोदी के भूमिका के चलते, उन्हें वीसा देने पर प्रतिबंध जारी रखा जाये.
 कमीशन की अध्यक्षा केटरीना लान्तोस स्वेट ने कहाए 'गुजरात में हिंसा 'और वहां के भयावह घटनाक्रम से मोदी के जुडाव के महत्वपूर्ण प्रमाण उपलब्ध हैं और इसलिए उन्हें वीसा प्रदान किया जाना उचित नहीं होगा.हाल के वर्षों में, मोदी शायद एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें इस मानवाधिकार संस्था ने इतना लांछित किया है। वर्तमान अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने भी, जब वे सीनेट के सदस्य थे, मोदी के बारे में ऐसे ही विचार प्रगट किये थे। उन्होंने विदेश विभाग को लिखा था कि सन २००२ के मुसलमानों के कत्लेआम में मोदी की संभावित भूमिका के कारण, उन्हें वीसा नहीं दिया जाना चाहिए, अमरीका का 'अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियमए १९९८' ऐसे विदेशियों का अमरीका में प्रवेश प्रतिबंधित करता है जो 'धार्मिक स्वातंत्र्य के सीधे और गंभीर हनन के लिए जिम्मेदार हैं'.
अमरीकी संस्था का कहना है कि कत्लेआम से मोदी को जोड़ने वाले कई सुबूत उपलब्ध हैं। इसी आधार पर सन २००५ से, मोदी उन व्यक्तियों की सूची में है, जिन्हें वीसा नहीं दिया जाना है, मोदी.समर्थकों के लाख सर पटकने के बाद भी गुजरे आठ सालों में इस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। संस्था की रपट, मुसलमानों के इस संदेह का भी ज़िक्र करती है कि मोदी ने माया कोडनानी, जो कि अभी जेल में हैं, को बलि का बकरा बना दिया है। आयोग ने धार्मिक स्वतंत्रता की दृष्टि से, भारत को दूसरी श्रेणी में रखा है। रपट यह भी कहती है कि भारत के विभिन्न राज्यों में 'धार्मिक स्वातंत्र्य कानून' बनने के बाद से, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और उन्हें डराने.धमकाने की घटनाओं में वृद्धि हुई है।यद्यपि ये कानून मुख्यतः भाजपा.शासित प्रदेशों में बनाये गए हैं तथापि कुछ अन्य राज्यों ने भी इस प्रकार के असंवैधानिक कदम उठाये हैं।  
भारत में पिछले तीन दशकों में सांप्रदायिकता में वृद्धि हुई है और धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की घटनाएँ बढ़ी हैं। १९८४ में दिल्ली में सिक्खों, डांग, कंधमाल व अन्य आदिवासी इलाकों में ईसाईयों व मेरठ, मलयाना, भागलपुर, मुंबई, गुजरात व उत्तरप्रदेश के अन्य इलाकों में मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा के घटनाएं हुई हैं। हिंसा के अलावाए सामाजिक स्तर पर भी अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की कोशिशें हो रहीं हैं।इसका एक उदाहरण हैं डांग व अन्य कई स्थानों पर आयोजित किये गए शबरी कुम्भ जैसे धार्मिक कार्यक्रमए जिनका लक्ष्य, हिंदुओं व विशेषकर आदिवासियों को अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भडकाना है।मुसलमानों के खिलाफ अनवरत हिंसा ने ऐसी चंतपेजीपलं हालात पैदा कर दिए हैं कि मुसलमान स्वयं को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस करने लगे हैं। कई राज्यों में धार्मिक स्वातंत्र्य कानून बनाये गए हैं, जो कि अपने नाम के ठीक विपरीत, धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का हनन करते हैं। ये कानून भारतीय संविधान के मूल्यों के विरुद्ध हैं और वे सांप्रदायिक ताकतों को, राज्यतंत्र के सांप्रदायिकता के रंग में रंग चुके तबके की सहायता से, असहाय धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का अवसर प्रदान करते हैं। इन सब कार्यवाहियों का अंतिम उद्देश्य है, धार्मिक ध्रुवीकरण के रास्ते देश में धार्मिक राष्ट्रवाद.सांप्रदायिक फासीवाद का आगाज करना.
अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के तौर.तरीकों में बदलाव आया है। कम अवधि में बड़े पैमाने पर हिंसा करने की बजाय लम्बे समय तक छुटपुट हमले करने की प्रवृत्ति पूरे देश में सामने आ रही है। इस तरह की कार्यवाहियां मुख्यतः उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे गैर.भाजपा शासित राज्यों में हो रही हैं। इन राज्यों के शहरी इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा का बोलबाला तेजी से बड़ा है और इससे समाज का साम्प्रदायिकीकरण हो रहा है। इस सब से अंततः उस साम्प्रदायिक राजनैतिक दल की ताकत बढ़ेगी, जो धार्मिक राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे को लागू करने के लिए आतुर शक्तियों की राजनैतिक शाखा है। मोदी ने एक कुटिल रणनीति के तहत अपने भाषणों में साम्प्रदायिकता के बजाय विकास की बातें करनी शुरू कर दी , हालांकि मोदी के विकास को छद्म विकास ही कहा जा सकता है। मोदी ने साम्प्रदायिक सोच वाले तबके को पहले ही अपना घनघोर प्रशंसक बना लिया है और अब वे विकास की बात कर अन्य हिन्दुओं को अपने साथ लेना चाहते हैं ताकि चुनाव में उनकी विजय और आसान हो सके। यद्यपि कई कारणों से कानून उन्हें सजा नहीं दे सका है तथापि उनकी सारी कुटिलता के चलते भी उनके खून से रंगे हाथ अभी भी साफ नहीं हो सके हैं।
अमरीकी आयोग की रपट से साम्प्रदायिकता.विरोधी ताकतों को संबल मिलेगा। हमारे देश की न्याय प्रणाली और कानून ऐसे हैं कि जहाँ एक ओर सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा नहीं मिल पा रही है वहीँ दंगों में मासूम मारे जा रहे हैं। सांप्रदायिक हिंसा में हिस्सा लेने वालों और उसे रोकने के अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं करने वालों को सजा देने के लिए कानून बनाये जाने की मांग को जल्दी से जल्दी पूरा किया जाना चाहिए। हमें आशा करनी चाहिए कि सांप्रदायिक हिंसा के दोषियों को सजा दिलवाने के लिए हमें अंतर्राष्ट्रीय एजेन्सियों की मदद नहीं लेनी पड़ेगी.
किसी भी प्रजातंत्र की सफलता.असफलता का एक महत्वपूर्ण मानक यह है कि उसमें अल्पसंख्यक स्वयं को कितना सुरक्षित अनुभव करते हैं और उनका जीवन कितना गरिमापूर्ण है। इस मानक पर भारत लगातार नीचेए और नीचे खिसकता जा रहा है। यह ींतहमारे प्रजातंत्र पर बदनुमा दाग है। अब समय आ गया है कि बिना धर्म, जाति और नस्ल के भेदभाव के, हम सभी निर्दोषों की रक्षा के लिए आगे आयें। हमें ऐसा कानून भी बनाना होगा जिसके चलते अमानवीय हिंसा को चुपचाप देखते रहने वालों या उसे बढावा देने वालों को उनके किये का खामियाजा भुगतना पड़े.
इस सिलसिले में यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरे दक्षिण एशिया में धार्मिक स्वतंत्रता को बाधित किया जा रहा है।हाल में पाकिस्तान में हिंदुओं और सिक्खों, बांग्लादेश में बौद्धों और हिंदुओं और श्रीलंका व बर्मा में मुसलमाओं पर अत्याचारों की दुखद खबरें सामने आयीं हैं। दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की रुग्णता, खेद का विषय है। हम जानते हैं कि दुनिया में राष्ट्रों के समूह एक साथ प्रगति करते हैं। दक्षिण एशिया में जहाँ भारत प्रजातंत्र का स्तंभ है, वहीं अन्य राष्ट्र प्रजातंत्र बनने की ओ़र अलग अलग गति से अग्रसर हैं। वर्तमान में, कहीं सेना के जनरलों की प्रभुता है तो कहीं कट्टरपंथी ताकतों का राज चल रहा है। यह त्रासद है कि भारत,प्रजातान्त्रिक मूल्यों के सन्दर्भ में, फिसलन भरी राह पर चल पड़ा है। हमें स्वाधीनता आन्दोलन और भारतीय संविधान के मूल्यों को याद रखने की ज़रूरत है

-राम पुनियानी

मंगलवार, 7 मई 2013

लातीनी अमरीका की खिड़की

 विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और विश्व के विकसित देशों द्वारा समर्थित नई वैश्विक व्यवस्था की खुले व्यापार की नीति सभी देशों पर एक समान रुप से लागू हो गई है। इस वैश्विक व्यवस्था के साथ पूरे विश्व मंे एक सूचना क्रांति भी हो रही है। इसके फलस्वरुप पूरे विश्व में उत्पादक से उपभोक्ता समाज तक नये-नये अविष्कारों और माॅडल की चर्चा होती रहती है।
        हमारी इस दुनिया में एक और ऐसी दुनिया भी है जिसमें एक नयी समाज व्यवस्था आकार ले रही है। इस समाज व्यवस्था का इस मीडिया की मुख्यधारा में कोई विशेष उल्लेख नहीं होता है। इसका एक प्रमुख कारण यही है कि यह नयी समाजव्यवस्था साम्राज्यवाद के विरोध की विचारधारा पर आधारित है। यह वैश्वीकरण को उपनिवेशवाद का नया चेहरा मानती है।
        महात्मा गांधी ने ‘हिन्द-स्वराज’ का बीजमंत्र दक्षिण आफ्रीका मंे खोजा और भारत में विकसित किया था। भारत में ‘हिन्द-स्वराज’ का शताब्दी-समारोह सम्पन्न हो चुका है। भारत से बहुत दूर स्थित देशों में ‘हिन्द-स्वराज’ की भावना आन्दोलन और परिवर्तन जमीनी आकार ले रहे हैं।
        वैश्विक सूचना क्रांति का अपना एक लोक-लुभावन चेहरा है। विश्व के विकसित देशों के संदर्भों से भरपूर यह सूचना-क्रांति ललचाती भी है, डराती भी है। उत्पादन के आंकड़ों, विकास दर, प्रति व्यक्ति आय, मुद्रा का मूल्य आदि की शब्दाबली के साथ इसके आकलन चमकीले, चिकने और फिसलन भरे होते हैं।
        इस सूचना क्रांति के कुछ लघु एवं सुन्दर प्रकाशन हमे आश्वस्त करते हैं। देश की लघु पत्रिकाएं भरोसा देती हैं कि ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ और ‘विचार का अन्त’ कभी नहीं होता है। यह खतरनाक समय ही विचार की शुरुआत की जमीन बनाता है। ऐसे समय मंे कभी वाराणसी और दिल्ली से ‘सामयिक-वार्ता’ का प्रकाशन होता था। आजकल यह मासिक पत्रिका मध्यप्रदेश के एक छोटे से शहर इटारसी से संपादित और प्रकाशित हो रही है। इसका ‘लातीनी अमरीका’ पर केन्द्रित अंक नई जमीन तोड़ता है। इस जमीन पर कई नये विचार फूट रहे हैं।
        आज से पांच सौ वर्ष पूर्व स्पेन से कोलम्बस अपनी समुद्री यात्रा पर निकला था। उसका लक्ष्य सोने की चिडि़या कहलाने वाला इंडिया था। कोलम्बस इंडिया की खोज में अमरीका पहंुच गया। उसने अमरीका को ही इंडिया समझा इसलिए आज भी अमरीका के मूल निवासी ‘रेड-इंडियन’ कहलाते हैं।
        कोलम्बस की इस खोज के साथ ही दुनिया के तथाकथित सभ्य देशों द्वारा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का क्रूरतम खेल शुरु हो गया था। दक्षिण अमरीका के देशों में लैटिन परिवार की स्पानी, पुर्तगाली और फ्रांसीसी भाषा वाले देशों के उपनिवेशों के कारण दक्षिण अमरीका को लातीनी-अमरीका कहा जाने लगा।
        लातीनी अमरीका में क्यूबा, ब्राजील, अर्जन्तीना, चिली, वेनेजुएला, निकारागुआ, बोलिविया आदि 33 देश स्थित हैं। इन देशों का इतिहास इनकी प्राचीन सभ्यताओं  माया, इन्का, एजटेक से जुड़ा है। यूरोप के आक्रमणकारियों ने न केवल इनकी प्राचीन सभ्यताओं को नष्ट किया वरन् इनके समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट भी की। लातीनी अमरीकी देश बहुमूल्य धातुओं और औद्योगिक कच्चे माल के निर्यात और उपभोक्ता वस्तुओं के आयात की मंडी बनकर रह गये थे। लातीनी अमरीका के अधिकांश देश उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में यूरोप की अधीनता मंे आजाद हो गए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शेष देशों को भी उपनिवेशवादी शासन से स्वतंत्रता मिली। परन्तु तानाशाही और कठपुतली सरकारों का दौर भी लम्बे समय तक प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए चला। अभी भी कई देशों में प्रजातंत्र के भेष में सैनिक तानाशाही अपना सर उठाती रहती है।
        लातीनी अमरीकी देशों मंे प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए कई सामाजिक आन्दोलन चल रहे हैं। आजकल खनन, भूमि अधिग्र्रहण के विरुद्ध व्यापक हड़तालें और आन्दोलन हो रहे हैं। इन देशों में जनता ऐसे नेताओं को चुन रही है जो वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।
        लातीनी अमरीकी देशों में विदेशी ताकतों की कठपुतली सरकारों को हटाकर राष्ट्रहित में काम करने वाली सरकारों की स्थापना का दौर चल रहा है। बोलिविया के दो नगरों में पानी के निजीकरण के विरुद्ध जन-आन्दोलन बहुचर्चित है। बोलिविया 1982 से गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था। विश्व बैंक ने कर्ज के साथ निजीकरण की शर्तें भी लगाई। रेल्वे, वायुसेना, संचार, गैस, बिजली के बाद पानी का भी निजीकरण कर दिया गया।
        विदेशी कंपनियों ने पानी का दाम दुगुना और तिगुना कर दिया। यह एलान भी कर दिया गया जो भी बिल नहीं चुकाएगा, उसका पानी का कनेक्शन काट दिया जायेगा। लोग सड़कों पर उतर आए। जन आन्दोलन तेज होने और सेना से भी नहीं दबने के कारण विदेशी कंपनी को देश छोड़कर जाना पड़ा।
        इस आन्दोलन का राजनैतिक असर भी पड़ा। जनता ने अपनी ताकत पहचानी और विदेशी ताकतों की कठपुतली सरकार को हटाकर अपनी सरकार बनाई। पहली बार एक मूलनिवासी और पानी आन्दोलन के कार्यकर्ता को राष्ट्रपति चुना गया। इसी तरह वेनेजुएला में 1998 में उगो चावेज बहुमत से जीतकर राष्ट्रपति बने। चावेज ने दक्षिण अमरीका के स्वतंत्रता सेनानी साईमन बोलीवार के प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर     आधारित संविधान देश मंे लागू किया। इस संविधान के तहत हुए 2002 के चुनावों ंमंे उगो चावेज पुनः देश के राष्ट्रपति बने। इसके बाद 2006 और 2012 मंे भी चावेज बहुमत से चुनाव जीते। इस जीत के बाद जनवरी 2013 में वे राष्ट्रपति शपथ लेते पर कैन्सरग्रस्त होने से नहीं ले सके और 8 मार्च 2013 को उनका निधन हो गया।
        उगो चावेज ने देश के पेट्रोलियम उद्योग पर सरकार का नियंत्रण बढ़ा दिया था। उन्होंने पेट्रोल से प्राप्त आमदनी का उपयोग जनता को मुफ्त शिक्षा, मुफ्त इलाज, सस्ता अनाज और रोजगार उपलब्ध कराने में किया। चावेज ने बड़ी-बड़ी जागीरों को तोड़कर जमीन को भूमिहीनों और सहकारी संस्थाओं मंे बांट दिया। चावेज के इस निर्णय से देश का कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ा।
        वेनेजुएला मंे आंगनबाड़ी से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक मुफ्त शिक्षा दी जा रही है। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी वेनुजुएला के पूर्ण साक्षर राष्ट्र बन जाने की पुष्टि की है। इस देश में कारखानों को मजदूरों द्वारा चलाने के भी प्रयोग हुए हैं। लातीनी अमरीका में ब्राजील, अर्जन्तीना, चिली, पेरु, उरुग्वे, निकारागुआ और हैती आदि देशों मंे जनता की लोकप्रिय सरकारें स्थापित हो रही हैं।
        अर्जन्तीना के अर्थशास्त्री राउल प्रेनिश ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विकास का गलत माध्यम बताया है। उन्होंने आयात की जगह लेने वाले औद्योगीकरण पर बल दिया है। चिली के अर्थशास्त्री आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक ने ‘पिछड़ेपन का विकास’ सिद्धांत दिया है। उनके अनुसार देशों का पिछड़ापन पूंजीवाद के विकास का परिणाम है।
        इस समय उरुग्वे के लेखक एदुआर्दो गालेआनो सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखक हैं। सन् 1971 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘लातीनी अमरीका की खुली धमनियां’ मंे कोलबंस के ‘वंशजों’ के दमन, लूट और विनाश का हृदयविदारक वर्णन है। गालेआनो की एक और किताब ‘उलटबांसियां: उल्टी दुनिया की पाठशाला’ (1998) है।
        ‘सामयिक-वार्ता’ के इस अंक मंे गालेआनो के एक निबंधों के महत्वपूर्ण अंश ‘शब्द एक शस्त्र है’ छपा है जो कबीर और महात्मा गांधी को लातीनी अमरीका की भूमि पर खड़ा करता लगता है। लातीनी अमरीका की और खुलने वाली यह छोटी सी खिड़की ज्ञान का एक नया दरवाजा भी खुलने की संभावना बनाती है।

 -  कश्मीर उप्पल
                             
फोन - 09425040457
                           

बुधवार, 20 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-5

   
 सुप्रीम कोर्ट न्यायालय के वकील सर के नाम पे खत
    शनिवार दिनांक 8.10.2011 को रात में दंतेवाड़ा का पुराना थाना के ही बगल में नया थाना बना है उसी नया थाना भवन में प्रताड़ना किया गया है। रात में मैं सोई थी दो लेडीज पुलिसकर्मी मुझे उठाए है। मैंने पूछा क्यों जगा रहे हो, कहने लगे एस0पी0 अंकित गर्ग साहब आए हैं। मुझे दूसरे रूम में ले गए। उस रूम में एस0पी0 अंकित गर्ग और किरन्दूल थाने का एस0डी0पी0ओ0 भी बैठा हुआ था मुझे उस रूम में बिठाया गया साथ में कुछ समय तक लेडीज पुलिसकर्मी थे कुछ देर बाद उन दोनों लेडीज को रूम से बाहर आने को कहा और कहा कि यहाँ पर जो कुछ भी हो रहा है, इस बात को किसी से नहीं कहोगे यदि ऐसा हुआ तो तुम लोग के साथ क्या कर सकता हूँ। तुम लोग अच्छी तरह जानते हो वो दोनों ने कहा जी सर हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे ठीक है जाओ ऐसा कहा है। फिर मानकर आरक्षक और वसंत को बुलाया, कहने लगा मानकर तुम डरना मत मैं हूँ ना ये मदर सौद तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी। मादर सौद तुम जानना चाहोगी ये प्लान हमने बनाया था जो कामयाब होते नजर आ रहा है। मानकर को कहने लगे बेटा तुम बहुत ही बहादुरी का काम किया तुमसे मैं बहुत खुष हूँ। मदर सौद मैं कौन हूँ एस0पी0 अंकित गर्ग हूँ। जो पहले बीजापुर में था अब बहुत जल्द एस0पी0 से बड़ा रेंज का अधिकारी बनने वाला हूँ। टेबल बजाकर कहने लगा सब कुछ यह से होता है। हम जो कहेंगे वही होगा शासन प्रषासन सरकार यह है। समझी मादर सौद मानकर को तुम क्या बदनाम करोगे उसे तो अब प्रमोषन मिलेगा। काफी देर तक गन्दी-गन्दी गाली देकर मानसिक रूप से प्रताडि़त किया। कई गालियों को मैंने पहले खत में जिक्र किया है। शायद आपको वो खत प्राप्त हुई होगी पूरी बातें खत पर बयान नहीं कर सकती कुछ कागजों में साइन करने को कहा कुछ बातों को लिखकर देने को कहा जब मैंने मना करने लगी तो कड़क बातों से दबाव डाला फिर भी मैंने इंकार करने लगी। तब करेंट सार्ट पैर कपड़ा में देने लगे कुछ देर के लिए रोक दिया और कहने लगा हम जो कह रहे हैं। वो करो इसी में आपकी भलाई है। तुम बच जाओगी समझी। हिमाँशु , स्वामी अग्निवेश , प्रशांत भूषण, कोलिन, लिंगाराम, कविता श्रीवास्तव, मेधा पाटेकर, अरुंधती राय, नंदनी सुन्दर, मनीष कुंजम, रामा सोडी, एस्सार कंपनी का मालिक ये सब के नाम से लेटर लिखकर दो ये सब नक्सली समर्थक है। मैं और लिंगा दिल्ली तक यहाँ की हर खबर देते थे जो मैं जानती हूँ ये लोग बुलाने पर मैं दिल्ली गई थी एस्सार कंपनी के अध्किारी नक्सली तक रूपये पहुचानें के लिए हमेशा  मनीष कुंजम, रामा सोडी और मुझे देते थे इस तरह से हमलोग नक्सली का मदद करते थे बहुत सारी बातें हैं। इस तरह का खत लिखने को कहा। जो मैं लिखकर नहीं दी ना ही उनके लिखा कागज पर साइन भी नहीं किया। मदर सौद हमारे लिखित कागज में साइन कर बहुत ही दबाव डाले मैंने कहा आप जान ले लो पर मैं जो गुनाह की नहीं और जिन लोगों के बारे में कह रहे हो। हो भी नहीं करूँगा। मैंने कहा इससे अच्छा मार दो कहने लगा ये भी कर लेते पर नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हें दिल्ली से अरेस्ट किया गया है। अब तुम मेरी बात नहीं मान रही हो तो सजा देकर ही जेल में भेजेंगे ताकि शर्म से जेल की दीवारों में अपना सर पटककर मर जाओगी शिक्षित महिला हो इतनी शर्म को तो लेकर जी तो नहीं पाओगी। इस तरह की बातें कहा और फिर करंट सार्ट देने को कहा करंट सार्ट दे देकर मेरे कपड़े को उतराया गया नंगा करके खड़ा रखा। एस0पी0 अंकित गर्ग कुर्सी में बैठकर हमे देख रहा था। शरीर को देख देखकर गन्दी-गन्दी गालियाँ देकर बेइज्जत किया कुछ देर बाद बाहर निकला और कुछ समय बाद फिर तीन लड़के को भेजा वो लड़के उल्टी सीधी हरकतें करने लगे और धक्का देने पर गिर गई फिर मेरे शरीर में बेदर्दी के साथ डाला गया सह नहीं पाई बेहोषी की हालात में थी काफी देर बाद होश  आया तो मैंने अपने आप को जिस रूम में सोई थी वहाँ पाई। तब तक सुबह हो चुका था रविवार दिनांक 9.10.2011 उस दिन भर दर्द को अंदर ही अंदर सहती रही किससे कहती वहाँ पर मेरा अपना कोई था ही नहीं। सोमवार दिनांक 10.10.2011 को सुबह लेडीज पुलिस हमें कहने लगी फ्रेश  हो जाओ तुमको कोर्ट ले जाना है। तब मैंने कहा मैडम मुझे चक्कर आ रहा है। मेरी हिम्मत नहीं हो रही है। कुछ देर रुक जाओ कहने लगी तुम्हें जल्दी तैयार होने को बोले हैं नहीं तो हमे गाली पड़ेगा। तब मैंने कहा एक कप चाय पीला दीजिए जिससे मैं हिम्मत कर सकूँ चाय पीया और धीरे-धीरे बाथ रूम तक गई कुछ देर बाद चक्कर आया तो गिर गई। मैं पहले से ही बाथरूम तक जाने लायक नहीं थी फिर भी दबाव डालकर बाथरूम में प्रवेश  होने के लिये भेजा गया। शायद ये लोग अच्छी हालात बनाकर मुझे कोर्ट न्यायालय में ले जाना चाहते थे। पर ऐसा नहीं हुआ बाथरूम में गिरते ही बेहोश  हो गई फिर दंतेवाड़ा थाना से निकालकर दंतेवाडा अस्पताल में ले गए काफी देर बाद मुझे होश आया। होश आने के बाद दर्द और ज्यादा बढ़ा गया ना सो सकी ना बिस्तर से उठ सकी पूरी तरह घायल हालात में थी प्रताड़ना का जिक्र किसी से उस वक्त नहीं किया मुझे धमकी दिया गया था फिर भी कोषिश  करती रही कि मौका देखकर मेरे ऊपर किया गया प्रताड़ना के बारे में बताऊँ पुलिसकर्मी तो हर पल मेरे साथ थे। फिर मुझे दंतेवाडा अस्पताल से करीब दो बजे गाड़ी के बीच सीट में सुला कर कोर्ट में लाया गया बहुत देर तक कोर्ट न्यायालय के बाहर ही रखे। न्यायालय के अंदर नहीं ले गए और एस0डी0पी0ओ0 न्यायालय के अंदर से कागजात लेकर आया और कहने लगा इसमें साइन करो मैंने कहा सर मैं कुछ जज के सामने बयान देना चाहती हूँ। तब कहने लगा ये सब बाद में होगा। ये सब कागजात तुम्हें जेल भेजने के लिए है। साइन करो क्या करती इससे अच्छा तो जेल जाना ही ठीक है। सोचकर साइन कर दिया। जज मेडम बगैर देखे सुने हमे जेल भेज दिया बहुत देर बाद कोर्ट से फिर दंतेवाडा थाना में लाए दो व्यक्ति पहले से ही थाने में मौजूद थे इतनी परेशानी होने के बाद भी वो दोनों व्यक्ति हमे पूछताछ कर रहे थे कविता श्रीवास्तव के बारे में मैंने कहा मेरी हालात ठीक नहीं है। इस वक्त मैं बात करने योग्य नहीं हूँ। मुझे जबरदस्ती ना करे। तब तक रामदेव मेरा भाई परिवार के साथ थाना आया और कहने लगा मेरी दीदी को इधर क्यों लाए हो कोर्ट ने तो जेल ले जाने की परमिशन दिया है। तब तुरंत जगदलपुर के लिए रवाना किए। जगदलपुर सेन्ट्रल जेल में शाम को करीब 7-8 बजे पहुँचे मेरी हालात देखकर जेल वाले ने दाखिला नहीं दिया। फिर दंतेवाडा का ही गार्ड हमें जगदलपुर अस्पताल में भर्ती किया। इलाज होता रहा मंगलवार दिनांक 11.10.2011 को जगदलपुर का डॉक्टर रायपुर के लिए रिफर किया। शाम को जगदलपुर अस्पताल से करीब 10-11 बजे रायपुर के लिए निकले रायपुर में बुधवार दिनांक 12.10.2011 सुबह पहुचे रायपुर अस्पताल में भर्ती किया गया इलाज होता रहा। रायपुर का गार्ड जबरदस्ती डॉक्टर से कहकर हमें उसी दिन शाम को करीब 8-9 बजे सेन्ट्रल जेल रायपुर में ले आए, हमने बहुत कोषिश  किया कि सर हमें तकलीफ है, इलाज होने दो फिर भी जबरन ले आए और कहने लगे लाल गेट को दिखते ही अपने आप ठीक हो जाओगे ऐसे कहे है। चलने योग्य भी नहीं थी बड़ी तकलीफों का सामना करते हुए जेल की गेट को प्रवेश किया।                 
स्व हस्ताक्षरित
प्रार्थी
श्रीमती सोनी सोरी (सोढ़ी)



 -हिमांशु कुमार

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-4

इस बीच लिंगा की बुआ सोनी सोरी का फोन आया कि सर पंद्रह अगस्त को मेरे सरकारी आश्रम जिसमे मैं पढ़ाती हूँ वहाँ नक्सली आए थे और कह रहे थे कि हम ये तिरंगा झंडा उतार कर यहाँ काला झंडा फहराएँगे। तो सर मैंने उनसे खूब बहस की और उनसे कहा कि इस झंडे के लिए भगत सिंह जैसे लोगो ने अपनी कुर्बानी दी है मैं इसे नहीं उतारने दूँगी। फिर वो मुझसे पूछने लगी सर मैंने ठीक किया ना। मैं उसकी बातें सुन रहा था और सोच रहा था मैं इस अकेली कमजोर सी आदिवासी लड़की को सेल्यूट करूँ जो अकेले राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए लड़ रही है या उन वर्दीधारी सुरक्षा बल के बड़े ओहदेदारों को जो रोज इस तिरंगे को बलात्कार और निर्दोषों का खून बहा कर अपमानित करते हैं?
    कल रात इसी लड़की का फोन आया था कि सर मुझे नक्सली घोषित कर दिया है। आज मुझे मारने पुलिस आई थी। मुझ पर गोलियाँ भी चलाईं। मैं बचने के लिए जंगल में भाग गई हूँ। और मैं सोच रहा था। तिरंगे झंडे की रक्षा के लिए अपनी जान पर खेलने वाली लड़की का ये अंत होगा? काश  इसने पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ कोर्ट में जाने का असंवैधानिक काम ना किया होता। का
कि ये आदिवासी ना होती। काष इसके जिले में खनिज सम्पदा ना होती। काष सत्ता पर धनपषु ना बैठे होते। तो इस लड़की को देभक्ति का पुरस्कार मिलता। लेकिन अब देभक्ति का ढोल पीट कर देष की संपत्तियों को विदेशी  कंपनियों को बेचने वाले सरकारी देद्रोही इस लड़की की हत्या करने पर उतारू हैं। सोनी सोरी ने मुझे ये भी बताया कि सर लिंगा ने एक स्कूल में नक्सलियों के काले झंडे को उतार कर फेंक दिया और नक्सलियों को डाँट कर भगा दिया है। मैंने कहा कि तुम लोग सबसे लड़ाई क्यों ले रहे हो? वहाँ जंगल में तुम्हे कौन बचाएगा? खैर।
    लिंगा का अंतिम फोन लगभग दो सप्ताह पहले आया कि सर मैं दिल्ली आ रहा हूँ और मैंने सोचा है कि गाँव में ही रह कर काम करूँगा। सर आप मेरे लिए कहीं से एक कैमरे और एक पुराने लेप टाप की व्यवस्था कर देंगे क्या? मैंने यह बात अपने दोस्तों से कही तो एक लेपटाप लिंगा के लिए मेरे एक दोस्त ने दे दिया है। ये लेख मैं उसी लेपटाप पर लिख रहा हूँ। ये लेपटाप अपने मालिक का इंतजार ही कर रहा है। देखते हैं इसका इंतजार कब खत्म होगा।
    इसी वर्ष मार्च में सरकार ने दंतेवाडा में तीन गाँव जला दिए। ताड्मेतला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली। लिंगा तब दिल्ली में ही था। उसने कहा, सर मैं जाकर इन गाँवों के लोगों से मिल कर आता हूँ। लिंगा गया। वहाँ से फोटो और वीडियो लाया। उनकी कापी मेरे पास भी है। और मैंने अपने कुछ दोस्तों को भी दे दी है। क्योंकि इन गावों को जलाने की इस घटना की जाँच सर्वोच्च न्यायालय ने सी.बी.आई. को सौंपी है ! सरकार को पता है की लिंगा सी.बी.आई. को महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है इसलिए उसे जेल में डालने का षड्यंत्र रचा गया।
    फिर चार दिन पहले लिंगा की बुआ सोनी सोरी का अचानक फोन आया कि सर, कल लिंगा को, पुलिस हमारे दादा जी के घर पालनार से पकड कर ले गई। वो बताने लगी, कि सर पुलिस वाले एक दिन पहले लिंगा के पास आए, और बोले कि हम तुम्हारे ऊपर अवधे गौतम के घर पर हमले का केस खतम करा देंगे। तुम बस ये करना कि लाला नामक एक आदमी बाख्शर में एक बैग में पैसे लेकर आएगा। तुम वो पैसे का बैग लेकर पुलिस को लाकर दे देना। बस उसके बाद तुम्हारे सारे केस खत्म। लिंगा ने ऐसा करने से मना कर दिया, और अपने दादा जी के घर चला गया। कुछ देर बाद एक सेद सुमो में सादी वर्दी में पुलिस वाले आए और लिंगा को गाड़ी में डाल कर ले गए। अगले दिन फिर वही लोग सोनी को पकड़ने आए। सोनी जंगल में चली गई। मैंने कहा गिरफ्तार हो जाओ। नहीं तो तुम्हे यह लोग जान से मार देंगे। तो बोली सर मेरे तीन छोटे छोटे बच्चे हैं। मेरा पति भी जेल में है। लिंगा भी जेल गया। इन सब के लिए कौन लडे़गा? मैं दुनिया को सच्चाई बताना चाहती हूँ। उसके बाद जेल भी जाऊँगी। पता नहीं इस लड़कीका क्या होगा?
-हिमांशु कुमार

सोमवार, 18 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-3

लेकिन फिर कल एक फोन ने मेरे सारे विश्वास को डगमगा दिया। दंतेवाड़ा से फिर उसी आदिवासी लडकी ने मुझे बताया की सर, दंतेवाडा के एस0एस0पी0 कल्लूरी नें दो नई नक्सली वारदातों में फिर से उसका नाम जोड़ दिया है और अदालत में उसके खिलाफ चालान भी पेश  कर दिया है। वो लड़की रो रही थी कि सर मैं तो रोज अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ, वहाँ मेरी हाजिरी लगी हुई है, मैं जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूँ और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूँ। लेकिन फिर भी एस0एस0पी0 कल्लूरी ने मुझे फरार घोषित कर दिया है और मुझे मारने की फिराक में है। फोन के उस तरफ वो लड़की रोती जा रही थी और फोन के इस तरफ मैं गुस्से, बेबसी, और असमंजस की हालत में उसका रोना सुनता जा रहा था।
    लाखों लोग इस देश  की आजादी के लिए लड़े थे मेरे पिता भी लड़े थे। क्या यही दिन देखने के लिए उन सारे लोगों ने कुर्बानी दी थी? क्या भगत सिंह इस तरह के देश के लिए शहीद हुए थे? कम से कम मुझे कोई ये तो बता दे की मुझे क्या करना चाहिए? आदिवासी होता तो बन्दूक उठा सकता था। पर सबने गांधीवादी कह कह कर मुझे इतना इज्जतदार बना दिया है कि अब मैं हर अन्याय पर बस इन्टरनेट पर एक लेख लिखता हूँ और सोच लेता हूँ की काफी देश  सेवा हो गई। अब तो मीडिया वालों ने मेरे फोन भी उठाने बंद कर दिए हैं।
    क्या कोई मेरी बात सुन रहा है? हेल्लो? मीडिया, सरकार, न्याय पालिका? है कोई गरीब जनता, आदिवासियों की बात सुनने वाला? क्या कोई बचा है? कम से कम इस लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोषिष तो कर लो, कोई है जो इस बेबस आदिवासी लड़की को बचा सकता है?
    इस बार जब लिंगा दिल्ली से दंतेवाडा जाने लगा तो मैंने उसे जोर से भींच कर गले से लगा लिया। मैंने कहा लिंगा मेरा दिल कह रहा है कि हम अंतिम बार मिल रहे हैं। वो हँसने लगा। और बोला सर मैं अपने दिल से पुलिस का डर निकालना चाहता हूँ। मैंने कोई गलती नहीं की। सारे अपराध पुलिस ने किए। और मैं ही डरूँ? क्यों। इसलिए कि मैं आदिवासी हूँ। और आदिवासियों को पुलिस से डरना चाहिए?
    लिंगा वही लड़का है जिसे दंतेवाडा के तत्कालीन डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने जबरन एस0पी0ओ0 बनाने के लिए चालीस दिन तक दंतेवाडा थाने के शौचालय में भूखा रखा था और जिसे हम लोगों की मदद से उसकी बुआ सोनी सोरी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से मुक्त कराया था। उसके बाद इन दोनों अधिकारियों ने लिंगा की हत्या की कई असफल कोषिषें की। अंत में हमने उसे दिल्ली भेज दिया। वहाँ उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की। उसी दौरान डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी थी कि लिंगा कोडोपी कांग्रेसी नेता अवधेश गौतम के घर पर हुए हमले का मास्टर माइंड है। लेकिन जब दिल्ली में शोर मचा कि ये लड़का दिल्ली में है तो दंतेवाडा में कैसे हमला करेगा? तो परम ज्ञानी श्री विश्वरंजन जी ने कहा कि ये विज्ञप्ति गलती से जारी हो गई थी। खैर गलती तो इंसानों से हो ही जाती है। और अच्छे अच्छे पट कथाकार कई बार फ्लाप कहानी भी लिख देते हैं। तो इस बार ये कहानी पिट गई।
    मैंने उसे समझाने की बहुत कोषिष की और उससे कहा कि देखो दंतेवाडा में आदिवासियों का जो नरसंहार सरकार कर रही है उस को रोकने के लिए हम सब को काम करना है। तुम वहाँ जाओगे तो या तो सरकार कोई भी फर्जी मामला बना कर तुम्हे जेल में डाल देगी या फर्जी एन्काउन्टर दिखा कर तुम्हे नक्सली सिद्ध कर के मार देगी। वो बोला ऐसे कैसे मुझे नक्सली सिद्ध कर देंगे? मैंने कहा जो लोग नारायण देसाई जैसे प्रख्यात गांधीवादी और प्रोफेसर यशपाल जैसे अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को माओवादी समर्थक कह कर छत्तीसगढ़ में उनका जलूस निकलवा सकते हैं। उनके लिए तुम्हे माओवादी सिद्ध करना क्या मुष्किल है? छत्तीसगढ़ सरकार तो गुंडागर्दी पर उतरी हुई है।
    लिंगा मुझसे कहने लगा कि मेरे गाँव के लोग चाहते हैं कि मैं वहाँ का बन्द स्कूल और अस्पताल शुरू करवा दूँ। मैं ये काम करवा लूँ फिर आगे का सोचूँगा। आखिरकार हमारी इस बात पर सहमति बनी कि लिंगा तीन महीने दंतेवाडा के अपने गाँव में रहने के बाद दिल्ली आकर पत्रकारिता शुरू करेगा।
    लिंगा बीच बीच में मुझे फोन करता रहता था। उसने मुझे बताया कि वो बस्तर के कमिष्नर श्रीनिवासलू से और दंतेवाडा के कलेक्टर ओम प्रकाश  चैधरी से मिला है और उनको अपने साथ हुई पुरानी पुलिस ज्यादतियों और गाँव में लोगो की तकलीफों के बारे में बताया है। और ये कि इन दोनों ने उसे सहयोग का आष्वासन दिया है। इसके कुछ दिन बाद उसका फिर फोन आया कि सर मुझे नक्सलियों ने बुला कर डांटा है कि मैं इन सरकारी अधिकारियों से क्यों मिला? और ये भी कि नक्सली मुझसे कह रहे थे कि ज्यादा नेतागीरी मत करो! वो मुझसे पूछने लगा कि सर क्या मैं अपने लोगो के भले के लिए काम नहीं कर सकता?
    एक दिन उसका फोन आया और वो मुझे बताने लगा कि सर मैं आदिवासी विकास विभाग के एक अधिकारी से मिला और मैंने उनसे कहा कि आपने गाँव में कोई बिल्डिंग नहीं बनाई है पर कलेक्टर को बता दिया है कि बिल्डिंग बनाई गई है। मैं कलेक्टर को इसके बारे में बताऊँगा। इस पर वो अधिकारी महोदय गिड़गिड़ाने लगे और बोले कि आप को हम नई बिल्डिंगे बनाने का ठेका दे देंगे पर आप हमारी शिकायत मत करो। लिंगा ने बताया सर मैंने उन्हें बोला कि मैं यहाँ ठेकेदारी करने नहीं आया हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ आप गाँव में ईमानदारी से काम करें।
    इस बीच मई जून में मुझे अमरीका जाना पड़ा। एक दिन उसका फोन आया कि सर हम लोग बहुत मुसीबत में हैंै नक्सलियों ने मेरी बुआ सोनी सोरी के पिता अर्थात मेरे दादा का पूरा घर लूट लिया है और उनके पैर में गोली मार दी है। मैंने कहा ठीक हैैै। मैं तुरंत इस समाचार को सब को भेजता हूँ। तो उसने कहा कि नहीं मैं खुद दिल्ली आ रहा हूँ और मैं खुद इसके बारे में प्रेस को बताऊँगा।
    फिर उसका फोन आया कि सर मैं अपना एक मिट्टी का घर बना रहा हूँ। इस बीच उसने बताया कि वो थानेदार से मिला और अपनी मोटरसाइकिल वापिस माँगी तो थानेदार ने लिंगा से कहा कि अगर फिर से मोटर साइकिल माँगने आया तो तुझे किसी भी केस में फँसा कर अन्दर कर देंगे।
-हिमांशु  कुमार

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

सीरिया का गृहयुद्ध और अमरीका

पिछले कई वर्षों से सीरिया अमरीकी साम्राज्यवाद के निशाने पर है। ज्ञातव्य है कि इसराइल और सीरिया की साझी सीमा रेखाएँ हैं। यह भी वास्तविकता है कि सीरिया के रणनैतिक महत्व वाले क्षेत्र गोलान हाइट्स पर इसराइल ने 1967 से ही गैरकानूनी कब्जा जमा रखा है। लीबिया में सत्ता परिवर्तन की सफलता के पश्चात से एंग्लो अमरीकी साम्राज्यवाद ने सीरिया में भी सत्ता परिवर्तन के इरादे से देश (सीरिया) के अन्दर गृहयुद्ध छेड़ रखा है। सरकारी सैनिक संगठनों और एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा संगठित बलों के बीच मुठभेड़ों में अब तक हज़ारों सैनिक मारे जा चुके हैं और लाखों घायल अवस्था में जी रहे हैं।
    प्रश्न यह नहीं है कि वर्तमान में सीरिया में मौजूदा शासन व्यवस्था का स्वभाव, रूप क्या और और कैसा है। प्रश्न यह है कि किसी देश में वहाँ की राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के निर्धारित करने का अधिकार उस देश के निवासियों को है अथवा किसी साम्राज्यवादी शक्ति को? जो लोग विदेशी समर्थन की बात करते हैं वे या तो जान बूझकर अथवा अनजाने में साम्राज्यवादियों के मार्ग को प्रशस्त करने का समर्थन करते हैं और उन्हें दखलन्दाजी करने को आमंत्रित करते हैं; अवसर देते हैं।
    सभी जानते हैं कि इस समय पश्चिम एशिया में ईरान अमरीकी साम्राज्यवाद का मुख्य निशाना बना हुआ है। सीरिया ईरान का मित्र देश है। इसने अमरीकी साम्राज्यवाद और इसराइल के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं। वह लेबनान में हिज्बुल्लाह का समर्थन करता है। सीरिया रूस का भी मित्र देश है। वास्तव में सीरिया में गृहयुद्ध करवाकर सत्ता परिवर्तन करवाने का लक्ष्य है: उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया के तेल से सम्पन्न राजनैतिक क्षेत्र पर एंग्लो-अमरीकी आधिपत्य जमाना। अमरीका और उसके साथी देश चाहते हैं कि रूस को रोका जाए और चीन, भारत एवं अन्य राष्ट्र जिन्हें ऊर्जा की आवश्यकता है, उनकी ऊर्जा आपूर्ति पर उनका नियंत्रण हो।
    अमरीका ने सीरिया के गृहयुद्ध में विरोधी सैनिक बलों को आर्थिक सहायता देने के लिए तुर्की को प्रोत्साहित किया। उसने ‘अरब लीग’ को सीरिया के विरुद्ध प्रतिबन्ध लगाने और सैन्य कार्यवाहियाँ करने के लिए प्रोत्साहित किया। सभी जानते हैं कि ‘अरब लीग’ अमरीका द्वारा नियंत्रित एक गठबंधन है।
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव रखा गया जिसके अन्तर्गत अन्य चीजों के साथ, सीरिया में बसर अल असद सरकार पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा आर्थिक प्रतिबंध लगाने की अनुमति देने की बात उल्लेखित थी परन्तु 4 फरवरी 2012 को रूस और चीन ने इस प्रस्ताव को बीटो कर दिया। वास्तविकता यह है कि इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए पिछले कई महीनों से अमरीका और उसके यूरोपीय मित्र देश प्रयास करते रहे हैं और दबाव के साथ पूरी कोशिश की गई थी कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के दूसरे सदस्य राष्ट्र भी इसका समर्थन करें। भारत सरकार ने पहले तो इस प्रस्ताव का समर्थन करने में संकोच प्रदर्शित किया परन्तु अन्तिम समय में प्रस्ताव के समर्थन में अपना वोट दिया परन्तु रूस और चीन के वीटो के कारण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका।
    इस्तांबुल में फारस की खाड़ी स्थित अनेक देशों की बैठक में इस बात पर सहमति बन गई है कि अमरीका, अरब देश, सीरिया के विद्रोहियों को प्रतिमाह वेतन देने के लिए 100 मिलियन डालर की मदद देंगे। न्यूयार्क टाइम्स की एक रपट के अनुसार ओबामा प्रशासन सीरिया के विद्रोहियों को संचार उपकरण देने पर तैयार हो गया है। इस बैठक में भाग लेने वाले सभी देश अमरीका के पिछलग्गू राष्ट्र हैं। बताया गया है कि 100 मिलियन डालर की मदद देने का मकसद सीरिया के राष्ट्रपति असद की सेना छोड़ने वाले सैनिकों को प्रोत्साहित करना है। यह भी बताया गया कि इस फंड का इस्तेमाल विद्रोहियों की ‘‘फ्री सीरिया आर्मी’’ के लिए ब्लैक मार्केट से हथियारों की खरीद के लिए भी किया जा सकता है यह भी बताया गया कि अरब फंड (सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत द्वारा दी गई राशि) की राशि को विपक्षी सीरियन नेशनल कांगे्रस द्वारा वितरित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने भी सीरिया के विद्रोहियों के लिए 1.22 करोड़ डालर की मानवीय सहायता की घोषणा की है। स्मरण रहे कि सीरिया में विद्रोह के बाद अमरीका द्वारा दी गई कुल सहायता राशि 2.5 करोड़ डालर की हो गई है। इसके अतिरिक्त अमरीका ने विद्रोहियों को बेहतर तालमेल के  उद्देश्य  से संचार के
अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए हैं।
    वास्तव में अमरीका और उसके साथी देश सीरिया में लीबिया जैसी परिस्थिति पैदा कर उस पर हमला करने के योजना के नक्शे पर चल रहे हैं। विश्व जनमत को सोचना है कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश की संप्रभुता पर, किसी भी बहाने हमला करने का कोई भी अधिकार है? इराक, अफगानिस्तान, विलूचिस्तान, लीबिया एवं पश्चिमी एशिया तथा अफ्रीका के अनेक राष्ट्रों में जो स्वयं मानवाधिकारों के उल्लंघन के अपराधी रहे हैं, उन साम्राज्यवादियों को सीरिया में उनके द्वारा किए जा रहे कुकृत्यों के लिए कैसे क्षमा किया जा सकता है?
    पश्चिम एशिया और फारस की खाड़ी के इलाके में अमरीका, ब्रिटेन और उनके साथी राष्ट्र ऐसी भयानक स्थिति थोपने का प्रयास कर रहे हैं जिससे इस क्षेत्र और आस-पास के सभी देशों की संप्रभुता और शान्ति को खतरा पैदा हो गया है। सीरिया के घटनाक्रम पर भारत सरकार ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘भारत हर प्रकार की हिंसा की निन्दा करता है, चाहे वह कोई भी कर रहा हो। भारत मानता है कि सभी देशों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करंे, उनकी उचित आकांक्षाओं को पूरा करें और उनकी शिकायतों को प्रशासनिक, आर्थिक और अन्य उपायों द्वारा दूर करें।
    परन्तु भारत सरकार ने यह नहीं स्पष्ट किया कि क्या किसी भी देश को दूसरे देश की संप्रभुुता पर, किसी भी बहाने हमला करने का कोई भी अधिकार है?
-सुश्री पूनम सिंह
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2012 अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 28 जून 2012

अमरीका की साम्राज्यावादी गतिविधियाँ और नया विश्व परिदृश्य भाग -2


आखिर क्यों अमरीका ने विश्व जनमत का उल्लंघन किया और अनदेखी? इसका जवाब है तेल! इस पूरी राजनीति के पीछे इराक़ और अरब देशो के तेल पर कब्जा करना असली उद्देश्य था। दूसरे शब्दों में सारी उक्त बातें, आतंकवाद, अमरीका को ख़तरे, इराक़ और दूसरी जगहों पर तानाशाही का होना और जनतंत्र का नहीं होना इत्यादि के बारे में लंबीचौड़ी बातों की जड़ में तेल और दूसरे कच्चे मालों और स्रोतों पर कब्जा करने के उद्देश्य छिपे हुए थे।
यहाँ अमरीका का विशिष्ट परंपरागत सम्राज्यवादी रूप सामने आ जाता है। बुश ने एक बार तो यह भी कहा कि गॉड’ ने सपने में आकर उन्हे इराक़ को बचाने के लिए कहा है और फिर इसके विपरीत प्रेसीडेंट का पद त्याग करते वक्त उन्होंने कहा कि इराक़ में अमरीका का जाना एक ग़लती थी, एक ग़लत सूचना के आधार पर वे ऐसा कर बैठे! कितने हल्के ंढग से, कितनी आसानी से यह सब कह दिया। उन्होंने यह तक नहीं सोचा कि उतनी दूर से आकर इराक़ की सभ्यता, संस्कृति, पुराने इतिहास, परंपरा, उसके गाँवों, शहरों, सड़कों, मकानों इत्यादि को बर्बाद करने और इराक़ियों को अपमानित करने का उन्हें क्या हक था? वे आते हैं और एक सार्वभौम राष्ट्र के राष्ट्रपति सद्दाम को फाँसी पर पहुंचा देते हैं! कहाँ गए जनतंत्र और विश्व संबंधों के नियम क़ानून? सद्दाम की तानाशाही को तो एक समय खुद अमरीका ने सहायता देकर खड़ा किया था। तानाशाही से निपटने के तरीके हैं, और किसी दूसरे देश में घुसपैठ करने का हक नहीं है।
सम्राज्यवाद के लिए ख़तरे
वास्तव में अमरीका अपने को इतना असुरक्षित समझता है कि उसे दूर दराज के कमजोर देशों से भी खतरा दिखाई देता है। इराक़ की घटनाओं के बाद आतंकवाद घटा नहीं, बढ़ा है। इसकी ज़िम्मेदारी अमरीका पर है। इराक़ में सफलता के बाद उसने समझा कि वह ईरान तथा अन्य देशों पर भी उसी तरह हमला करके उन्हें अपने कब्ज़े में कर लेगा। लेकिन उसे पता नहीं था कि अब उसके सहयोगी भी उसका साथ देने को तैयार नहीं हैं। दुनिया के देश अब इराक़ को दोहराना नहीं चाहते। इसीलिए अमरीका ईरान में इराक़ जैसा कुछ नहीं कर पा रहा है। इस बीच रूस और कुछ अन्य देश ज्यादा सक्रिय होकर अमरीका का विरोध कर रहे हैं जिनमें चीन, भारत और दूसरे देश शामिल हैं। रूस ने साफ कहा है कि इराक़ जैसा हस्तक्षेप नहीं होने देगा। इस बार यू।एन. की भूमिका भी बढ़ा गई है। लीबिया में भी अमरीका अप्रत्यक्ष रूप से ही काम कर पाया और सीरिया एवं अन्य देशों के मामले में उसे बहुत ही घूमकर चलना पड़ रहा है। उसकी नज़रें अफगानिस्तान, पाकिस्तान और फिर भारत पर भी हैं। साथ ही मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणतंत्रों के देश भी उसके निशाने पर हैं। तो क्या अमरीका सफल हो पाएगा?. नहीं, अब इतना आसान नहीं है।
बदलती परिस्थिति
अमरीका यह भूल रहा है कि अब एक नया ज़माना और नई परिस्थिति चल रही है। पुराने ंढग से साम्राज्यवाद काम नहीं कर सकता। नई सूचना एवं तकनीकी क्रांति के ज़माने में विकासमान देश भी अपने को मजबूत और आत्मविश्वास भरा महसूस कर रहे हैं। आज ब्रिक्स के रूप में भारत, चीन, ब्राज़ील और अन्य देश अमरीका के सामने खड़े हो जाते हैं। वे उसे चुनौती दे रहे हैं, जबकि आज कोई सोवियत संघ नहीं है। इतिहास में पहली बार विकासमान देशों की विकास दर विकसित देशों से आगे निकल कर 3 गुना से अधिक हो गई है। आज विश्व साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था गहन संकट में फँसा हुआ है। इससे निकलने के लिए वह छटपटा रहा है लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा है।
इसलिए पुराने साम्राज्यवादी तरीक़ों के द्वार बंद होते जा रहे हैं, और नए तरीके क्या होंगे यह उन्हें नहीं पता। आज पहली बार अमरीका पीछे हटने को मजबूर है। अमरीका एक बात नहीं समझता और ना ही समझने की कोशिश कर रहा है। इतिहास और समाज विकास संबंधी जिन समस्याओं का सोवियत संघ सामना कर रहा था, वे अन्य रूपों में अमरीका तथा अन्य विकसित पूँजीवादी और साम्राज्यवादी देशों के सामने भी खड़ी हो रही हैं। केंद्रीकृत राष्ट्र, जनतंत्र की कमी, आदेशों और फ़तवों से राज करना, दूसरे देशों पर धौंस जमाना, उन्हें डराना
धमकाना, अत्याधुनिक हथियारों का प्रदशर्न और होड़, सूचना पर रोक लगाने की कोशिश करना, अमरीकी अत्याचारों को छिपाने की असफल कोशिशों करना, जैसे कई तरीके हैं जो अब नहीं कामयाब होते, ख़ासकर सूचना क्रांति के दौर में. इराक़ में अपनी काली करतूतों और दमनकारी तरीकों को अमरीका छिपा नहीं सका।
साम्राज्यवाद के कई पुराने तरीके अब कारगर नहीं रह गए, इसलिए स्वयं साम्राज्यवाद के लिए ही संकट पैदा होता जा रहा है।
इसके अलावा, आज दुनिया एक ध्रुवीय नहीं रह गई है। अब वह बहु ध्रुवीय बनती जा रही हैं। इनमें, रूस, चीन, ब्रिक्स के विकासमान देश अपनी अधिक असरदार भूमिका अदा कर रहे हैं।
स्वयं साम्राज्यवाद की अर्थ व्यवस्था में ही कई परिवर्तन हो रहे हैं जिन्हें समझने की ज़रूरत है। आज वह जिस संकट और मंदी से गुजर रहा है वह 1930 के दशक के संकट से काफ़ी अलग है। आज विश्व पूँजीवाद, उत्पादक पूँजी और गैर उत्पादक वित्त पूँजी के हिस्सों में बँट गया है। उत्पादक पूँजी को कसीनो’ पूँजीवाद और जमा वित्त पूँजी से आज़ाद होना पड़ेगा।
साम्राज्यवाद नई उत्पादक और संचार शक्तियों का प्रयोग करने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है। उनका बेहतर इस्तेमाल गैर साम्राज्यवादी देश कर रहे हैं। एक नए किस्म की विकास की धारा चल पड़ी है। साम्राज्यवादी तौर तरीके काम नहीं आएँगे। आज अमरीका अत्याधुनिक हथियार निर्मित किए जा रहा है, क्यों? किससे ख़तरा है? किसी से नहीं, इसलिए वह काल्पनिक ख़तरे पैदा कर उनसे लड़ने के लिए हवा में तलवार भाँज रहा है। अन्य विकसित पूँजीवादी देशों समेत दुनिया के लोग इसे समझ चुके हैं, और यही है अमरीका की त्रासदी।
उसे समझना पड़ेगा कि यह नव तकनीकी सूचना संचार का युग है, इसलिए दूसरे देशों के साथ पुराने तरीके से पेश नहीं आ सकता है। कोई भी केंद्रीकृत, जबरन तरीके, संरचनाएँ, संगठन, सरकार और राज्य इत्यादि नहीं चल सकता या उतनी आसानी से नहीं चल सकता। यह समझने में अमरीका देर कर रहा है, लेकिन यह उसे समझना ही होगा।
इसीलिए लैटिन अमरीका के दर्जन से अधिक देशों में जनवादी और वामपंथी सरकारें कायम हो गयी हैं, यूरोप की हाल कि घटनाएँ कोई साम्राज्यवाद के लिए सुसमाचार नहीं हैं। विश्व एक भारी ऐतिहासिक परिवर्तन के कगार पर खड़ा है।
-अनिल राजिमवाले
मोबाइल : 09868525812

रविवार, 24 जून 2012

अमरीका की साम्राज्यावादी गतिविधियाँ और नया विश्व परिदृश्य भाग 1


सोवियत संघ के अस्तित्व तक अमरीका अपनी गतिविधियों के लिए उसे ज़िम्मेदार ठहराता था। अमरीका के अनुसार उसे सोवियत ख़तरे का सामना करने के लिए सारे विश्व में सैनिक अड्डे स्थापित करना तथा नएनए अत्याधुनिक हथियारों का उत्पादन करना और बेचना ज़रूरी था। सोवियत संघ के पतन के बाद इस तर्क का आधार ख़त्म हो गया और हथियारों की होड़ और सारी दुनिया में सैनिक अड्डे बनाने का कोई औचित्य नहीं रह गया। कई लोग यह आशा और अपेक्षा करने लगे कि कम से कम अब तो अमरीका युद्धों की तैयारियों और दूसरे देशों में अड्डे बनाने तथा उनमे सैनिक हस्तक्षेप करने या आक्रमण करने से बाज आएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि इसके विपरीत अमरीका ने दुनिया में अपनी सैनिक गतिविधियाँ और भी अधिक ब़ाई हैं। यह समझा जाता है कि सोवियत पतन के बाद अब तो दुनिया उसके लिए खुला मैदान बन गई है जहाँ वह कुछ भी कर सकता है, कहीं भी अपनी फ़ौजें भेज सकता है, किसी को भी डराधमका सकता है और अन्य कई प्रकार से कमजोर देशों को दबा सकता है। उसे मालूम है कि अब सोवियत संघ के नहीं रहने से डरने वाली कोई बात नहीं रह गई और उसे अब कोई रोक नहीं सकता है। उसने एक ध्रुवीय दुनिया की घोषणा तक कर डाली अर्थात अब दुनिया में एक ही महाशक्ति रह गई है जिसके आगे सबको झुकना पड़ेगा। अब खुलकर हथियारों और युद्धों का खेल खेला जा सकता है। लेकिन उसकी सारी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ पूरी नहीं हुई हैं, यहाँ रुक कर हम कुछ बातों पर विचार करेंगे।

साम्राज्यवाद का चरित्र?

दुनिया तेज़ी से बदल रही है। इसे नहीं समझने का ख़ामियाजा सोवियत संघ तथा कुछ अन्य देशों को भुगतना पड़ा था। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि शक्तिशाली साम्राज्यवादी देश इस भ्रम से मुक्त हैं. वे भी बदलती दुनिया को नहीं समझ रहे हैं और अपनी पुरानी नीतियों पर ही चलने की कोशिश जारी रखे हुए हैं। हम यह कह सकते हैं की दुनिया बदल गई लेकिन साम्राज्यवादी सोच या दृष्टि नहीं बदली है।
किसी जमाने में अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी इत्यादि देश दूसरे देशों को गुलाम बनाए रखते थे और जब चाहे तब अपनी फ़ौजें उन देशों में भेज दिया करते थे। विश्व साम्राज्यवादी अर्थ व्यवस्था का जन्म हुआ और दुनिया के बहुत सारे देशों को गुलाम बना लिया गया।
आज दुनिया में बहुत सारे परिवर्तन हो गए हैं। ना सिर्फ़ सोवियत एवं कुछ अन्य देशों का पतन हो सकता है बल्कि एक वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति या एस0टी0आर0 चल रही है जो लोगों के सामने विकास की नई संभावनाएँ खोल दे रही है।
इसे सम्राज्यवाद नियंत्रित करना चाहता है और वह नहीं चाहता कि इसका फायदा आम लोगों और कमजोर देशों को मिले। इससे भी ब़कर वह अकूत तेल भंडारों, खनिज क्षेत्रों, हथियारों के बाज़ारों, तथा अन्य कई प्रकार के मुनाफ़े के स्रोतों का भरपूर लाभ उठना चाहता है। साम्राज्यवाद के कई स्वरूप ज़रूर बदले हैं लेकिन उसका मूल चरित्र नहीं बदला है। दुनिया के तेल भंडारों पर कब्जा करने के लिए उसने अपनी सेनाओं को लामबंद किया है और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया है। इराक़ में जिस तरह उसने दखलंदाजी की और फिर बड़े पैमाने पर हमला किया उससे उसका साम्राज्यवादी चरित्र ही उजागर होता है।
अमरीका तेल की राजनीति कुछ उसी तरह चला रहा है जैसे औपनिवेशिक साम्राज्यवादी युग में, खास तौर पर प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के युग में साम्राज्यवादी चलाया करते थे। पहले यह देश किसी ना किसी बहाने अपनी सेना अरब और एशिया के देशों में भेज कर उन देशों और उनके तेल भंडारों पर कब्जा कर लेते थे और फिर वहाँ पर उनकी कठपुतली या सीधी खुद की सरकारें स्थापित कर दी जाती थीं।
हाल में अमरीका ऐसे ही तरीके अपनाने की कोशिश कर रहा है। उसने इराक़ में 2003 में पूर्व नियोजित तरीके से अपनी फौजें भेजीं। उसने बहाने पहले से तैयार करके रखे, यह जानते हुए कि इनका कोई आधार नहीं और ये पूरी तरह झूठ है। उसने चारो ओर यह ढिंोरा पीटा कि इराक़ बड़े पैमानें पर अत्याधुनिक न्यूक्लियर हथियार या डब्लू.एम.डी. बना रहा है जिसकी जानकारी उसे सी.आई.ए. से मिली, ऐसा बताया। वास्तव में सी.आई.ए. और अन्य को ऐसी झूठी तथा फर्जी रिपोर्टें तैयार करने को कहा गया। प्रेस और टी.वी तथा सारी दुनिया में उच्च दबाव का प्रचार चलाया गया। यू.एन. जाँच कमीशन ने बारबार कहा कि वह जाँच कर रहा है और उसे इसके कोई सबूत अभी नहीं मिले हैं, और यह कि अभी वार्ता के ज़रिए समस्या का हल निकाला जाना चाहिए, सैनिक हस्तक्षेप सही नहीं होगा।
ज्यादातर विश्व जनमत और सरकारों के मत भी इराक़ में सैनिक आक्रमण के विरोध में थे। खुद कई पिश्चमी देशों की सरकारें इस अमरीकी रुख़ के विरोध में और शांतिपूर्ण वार्तालाप तथा अधिक से अधिक आर्थिक नाकेबंदी के हक में थीं। इनमें से एक फ्रांस था जिसने अंत तक अमरीकी कार्रवाई का तीखा विरोध किया था। विकासमान देशों की सरकारें और जनता तो विरोध में थी ही। लेकिन अमरीका ने पहले ही मन बना लिया था और उसी के अनुसार सैनिक तैयारियाँ भी कर रहा था। उसे तो सिर्फ़ कोई बहाना चाहिए था और बहाना नहीं मिलने पर खुद ही कुछ बना लेता। उसे इराक़ में डाका डालने की जल्दी थी और सारे विश्व जनमत तथा स्वयं यू.एन. के नियम क़ानूनों और विश्व संबंधों को नियंत्रित करने वाले तौर तरीकों और क़ानूनों का खुलकर उल्लंघन करते हुए उसने बड़े पैमाने पर इराक़ की जनता और उसकी आज़ादी पर हमला बोल दिया। उस समय की घटनाओं को यदि हम याद करें तो स्मरण होगा कि लगभग सभी चाहते थे अमरीका की हार हो और इराक़ी जनता जीते। मीडिया भी इसी विचार का था। लेकिन कई कारणों से इराक की हार हो गई, जिसमें अमरीका के अत्याधुनिक हथियार और इराक़ के राजनैतिक ढांचे का तानाशाही चरित्र मुख्य कारणों में शामिल था।

-अनिल राजिमवाले

क्रमश:

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

गहरी विदेशी साजिशों की एक कहानी



    भारत में हरित क्रान्ति काफी विवादों में घिर चली है। अब इसके कई दुष्परिणाम दिखाई दे रहे हैं। फिर भी भारत सरकार दूसरी हरित क्रान्ति की बात कर रही है। हरित क्रान्ति के पक्ष मंे यह दलील दी जाती है कि भले ही इसके कुछ दुष्प्रभाव हुए हों किन्तु भारत में अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए यह जरूरी थी। भारत को अकालों और पी0एल0 480 जैसी अमरीका पर निर्भरता से मुक्ति दिलाने का काम हरित क्रान्ति ने किया। किन्तु यह भी शायद जानबूझकर पाला पोसा ग,या एक मिथक है। भारत के एक महान, किन्तु गुमनाम, कृषि वैज्ञानिक डाॅ0 रिछारिया के किस्से से यह पता चलता है।
          डाॅ0 राधेलाल रिछारिया का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले की सिवनीमालवा तहसील के आदिवासी अंचल में स्थित नंदरवाड़ा गाँव में 1911 को हुआ था। उनके पिता श्री हरलाल रिछारिया इस गाँव में प्राथमिक शाला के प्रधानाध्यापक तथा पोस्ट मास्टर थे। पढ़ने में तेज यह बालक तेजी से कक्षाओं में छलांग लगाता हुआ, वाराणसी और नागपुर में उच्च शिक्षा प्राप्त करके मात्र 23 साल की उम्र में पी0एच0डी0 करने इंग्लैण्ड के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुँच गया। उसके पास सुनिश्चित आर्थिक व्यवस्था नहीं थी, बीच में बीमार भी रहा, किन्तु दो वर्ष के रिकार्ड समय में पी0एच0डी0 पूरी करके स्वदेश लौट आया।
    डाॅ0 रिछारिया कई पदों पर रहे तथा कई फसलों पर उन्होंने अनुसंधान किया। किन्तु उनकी विशेषज्ञता चावल में रही। 1959 से 1967 तक वे कटक में केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के निदेशक पद पर रहे। उनके नेतृत्व में वहाँ के वैज्ञानिक चावल की देशी किस्मों से ज्यादा पैदावार वाली किस्में विकसित करने पर काम कर रहे थे और उन्हें महत्वपूर्ण सफलता भी हासिल हुई थी। किन्तु इसी बीच डाॅ0 रिछारिया ने देखा कि उनकी जानकारी के बगैर मनीला (फिलीपीन्स) स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक वहाँ हस्तक्षेप कर रहे हैं तथा विदेशी किस्मों को यहाँ प्रचलित करने की कोशिश कर रहे हैं। मनीला का यह संस्थान अमरीका और विश्व बैंक द्वारा स्थापित किया गया था और भारत में हरित क्रान्ति के नाम पर ज्यादा पैदावार देने वाली विदेशी चावल की किस्में लादने की कोशिश कर रहा था। डाॅ0 रिछारिया ने इसका विरोध किया और भारत सरकार को चेतावनी देते हुए पत्र लिखे। उनका कहना था - (1) इनसे भारत में
धान की फसल में नई बीमारियाँ आएँगी और कीट प्रकोप ज्यादा होगा। (2) इनके साथ रासायनिक खाद और रासायनिक कीटनाशकों का काफी उपयोग करना पड़ेगा, जिससे लागत बढ़ेगी और जमीन खराब होगी। (3) इनका आनुवांशिक आधार बहुत संकीर्ण है, जिसके कारण कुछ साल में पैदावर कम होने लगेगी। (4) भारत की विविध तरह की मिट्टी, पानी उपलब्धता और जलवायु के इलाकों के लिए ये किस्में माफिक नहीं है। (5) इनमें सूखा और कम-ज्यादा पानी को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं है। (6) भारत के वैज्ञानिक ऐसी विदेशी किस्में और ऐसे तरीके विकसित कर रहे हैं, जिनसे चावल की पैदावार काफी बढ़ सकती है।
    आज हम देख सकते हैं कि पचास साल पहले डाॅ0 रिछारिया द्वारा दी गई यह चेतावनी कितनी सच साबित हुई। किन्तु अंतर्राष्ट्रीय ताकतें इसे आगे बढ़ाने के लिए बैचेन थीं, क्योंकि इससे भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाइयों का एक बड़ा बाजार बनता। किन्तु विदेशी प्रभाव में आई भारत सरकार ने भी इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया। उल्टे डाॅ0 रिछारिया को 1967 में कटक के संस्थान के निदेशक पद से हटा दिया गया। अपनी देशभक्ति का यह इनाम मिलने से डाॅ0 रिछारिया काफी परेशान रहे। वे उच्च न्यायालय में भी गए, जहाँ उनका मुकदमा प्रसिद्ध वकील श्री रंगनाथ मिश्र ने लड़ा (जो बाद में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा मुख्य न्यायाधीश बने)। डाॅ0 रिछारिया मुकदमा जीते, किन्तु अब तक उनकी सेवानिवृत्ति की उम्र हो गई थी। 
    डाॅ0 रिछारिया देश के ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के चोटी के कृषि वैज्ञानिक थे। यदि वे सत्ता और विदेशी ताकतों की नाराजी मोल नहीं लेते तो नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक बनते। उनसे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी बीच-बीच में सलाह लेती थी। 1971 में
मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने उनको बुलाया और उनके नेतृत्व में रायपुर में ‘मध्यप्रदेश चावल अनुसंधान संस्थान‘ शुरू किया गया। (तब छत्तीसगढ मध्यप्रदेश में शामिल था)। कर्मठ रिछारिया साहब फिर अपने काम में लग गए। छत्तीसगढ मंे घूम-घूम कर, आदिवासी इलाकों में भी जाकर, उन्होनें धान की 17000 से ज्यादा किस्में इकट्ठी की और उनका एक जीवंत संग्रह बनाया। उन्होंने पाया कि कई किस्में ऐसी हैं, जिनमें विदेशों से आई ज्यादा पैदावार वाली किस्मों से ज्यादा उत्पादन मिल सकता है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़) मंे कम से कम 13 ऐसी धान की किस्में हैं, जिनमें प्रति हेक्टेयर 40 से 76 क्विटल तक पैदावार देने की संभावना है। ऐसी ही किस्में देश के अन्य भागों में भी मिल सकती हैं।
    किन्तु डाॅ0 रिछारिया का यह काम फिर विदेशी ताकतों की नजर में खटकने लगा। अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान मनीला के वैज्ञानिको ने डाॅ0 रिछारिया से इन किस्मों के जनन-द्रव्य के लेन-देन का प्रस्ताव रखा था, जिसे उन्होने नामंजूर कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि 1976 में
मध्य प्रदेश में चावल अनुसंधान के लिए विश्व बैंक का 4 करोड़ रू0 का एक प्रोजेक्ट आया जिसमें शर्त रखी गई कि रायपुर के चावल अनुसंधान संस्थान को बंद करके जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय में विलय कर दिया जाए। कारण यह बताया गया कि दो जगह एक ही काम नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि इस विश्वविद्यालय का कुलपति मनीला के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान के बोर्ड का सदस्य भी था। अंतर्राष्ट्रीय साजिश पूरी हुई तथा रायपुर का संस्थान बंद कर दिया गया।
    डाॅ0 रिछारिया को एक बार फिर बड़ा झटका लगा। फिर भी जीवन के अंतिम वर्षो में वृद्धावस्था के बावजूद वे छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और अन्य जन संगठनों के साथ देशी बीजों को बचाने के काम में लगे रहे।
    एक देशभक्त कृषि वैज्ञानिक के साथ हुई इन साजिशों का दुनिया को पता तब चला, जब अस्सी के दशक के उत्तरार्द्र्ध में टाइम्स आॅफ इंडिया में प्रसिद्ध लेखक श्री क्लाड अल्वारेस का लेख ‘द ग्रेट जीन राॅवरी‘ (जबरदस्त जीन डकैती) शीर्षक से आवरण कथा के रूप में प्रकाशित हुआ। बाद में प्रसिद्ध पत्रकार भारत डोगरा ने उनके जीवन और काम के बारे में लिखा। भोपाल में 11 मई 1996 को उनका देहांत हो गया।
         रिछारिया एक बार फिर 2002 में चर्चा में आए जब रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय ने यूरोप की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी सिनजेन्टा से करार किया। इस करार से डाॅ0 रिछारिया का अद्भुत धान संग्रह इस कम्पनी को मिल जाता, जिनकी मदद से वह नई किस्मंे निकालकर उनका पेटेन्ट कराके, खूब मुनाफा कमाती। जब बहुत हल्ला मचा तो इस करार को रद्द करना पड़ा।
    डाॅ0 रिछारिया के इस किस्से से हमें कई बातें सीखने को मिलती हैं।
    एक, हरित क्रांति के नाम पर भारत और इसके किसानों के साथ धोखा हुआ है और जान-बूझकर उन्हें एक गलत चक्र में फँसा दिया गया है जिसका नतीजा वे आज भुगत रहे हैं। यदि डांॅ0 रिछारिया कि चेतावनी पर ध्यान दिया गया होता तो आज यह नौबत नहीं आती। हमारे वैज्ञानिक ऐसा अनुसंधान कर रहे थे, जिनसे देशी किस्मों से और देशी तरीकों से हमारी पैदावार बढ़ सकती थी। किन्तु एक साजिश के तहत उन्हे आगे नहीं बढ़ने दिया गया। आज भी हमारी कृषि नीति देशहित-जनहित के बजाय देशी-विदेशी कंपनियों के स्वार्थाें को ज्यादा समर्पित है।
    दो, भारत सरकार और सत्ता प्रतिष्ठानों में विदेशी घुसपैठ, विदेशी प्रभाव और दबाव काफी ज्यादा है। इसके कारण कई बार उनका फैसला देशहित-जनहित में होने के बजाय विदेशी साम्राज्यवादी हितों को पूरा करने में होता है। इसलिए देश ने विकास का एक गलत अनुपयुक्त रास्ता चुन लिया है। इस मायने में हम आज भी पूरी तरह आजाद नहीं हैं।
    तीन, भारत के वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी भी ज्यादातर अपने ज़मीर को गिरवी रखकर विदेशी नकल और सत्ता के साथ सामंजस्य को मंजूर कर लेते हंै। रिछारिया से ही कुछ कनिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डाॅ0 एम0एस0 स्वमीनाथन थे। वे तत्कालीन विदेशी निर्देशों को पूरी तरह स्वीकार करते हुए सर्वोच्च पद पर पहुँच गए और हरित क्रांति के जनक कहलाने लगे। बाद में, अब वे उसी जबान से हरित क्रांति की आलोचना भी कर लेते हैं। स्वामीनाथन और रिछारिया भारत के वैज्ञानिकों औंर बुद्धिजीवियों की दो धाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक पूरी तरह अवसरवादी, स्वार्थी और सत्ता के साथ सामंजस्य करने वाली तथा दूसरी देशभक्त और सिद्धांतों से समझौता न करने वाली। अफसोस की बात है कि रिछारिया जैसे लोग बहुत बिरले हैं।
    क्या हम अब भी चेतेंगे। अपनी किस्मत का फैसला खुद करेंगे, देश को बचाएँगे और सही रास्ते पर ले जाएँगे। क्या डाॅ0 रिछारिया का त्याग और संघर्ष बेकार जाएगा?  
   -सुनील   

                        मो. 09425040452
   

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

झूठों का सौदागर ओबामा



अमरीकी
राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने बयानबाजी के बाद हिटलर के प्रचार मंत्री गोविल्स को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा था कि ईराक से अमरीकी सेनायें पूरी तरह से वापस हो जाएँगी जबकि असलियत यह है कि बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में २० ००० अमरीकी तैनात हैं अगर उनके सादे कपड़ों के नीचे देखा जाये तो वह सभी अमेरिकी सैनिक अधिकारी हैं। अमरीका हमेशा स्वतंत्र मुल्कों को गुलाम बनाने का आदि रहा है और अपनी रणनीति के तहत ईराक को गुलाम बनाया है लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे। ईरान ने उसके ड्रोन को अपने कब्जे में ले लिया है और बराबरी के साथ धमका भी रहा है यदि अमेरिका ने हमला किया तो ईराक के प्रधानमंत्री नूरी मलेकी जो ईरान के साथ अपने संबंधो को प्रगाढ़ बना रहे हैं वह ईरान के साथ खड़े हुए नजर आ सकते हैं। यह अमरीका की मुख्य चिंता है इसीलिए अमरीका अपनी फौजों को सादी वर्दी में तैनात कर रहा है।
पाकिस्तान में 28 सैनिकों की हत्या नाटो सेनाओं द्वारा किये जाने के बाद वहां की सरकार ने शम्स हवाई अड्डे को खाली करा लिया है। अफगानिस्तान में लड़ रही नाटो सेनाओं के खाद्य व अन्य जरूरत की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में वाल स्ट्रीट आन्दोलन के गति पकड़ने के कारण पूर्वी तटों पर स्थित बंदरगाहों पर काम बंद है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी मंदी के चपेट में है इसलिए अमरीका के पास झूठ की सौदागरी के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। अगर ईरान पर हमला करने की स्तिथि में अमेरिकी होते तो उनका स्वर दूसरा होता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 26 जून 2011

संयुक्त राष्ट्र की राजनीति: अमरीकी साम्राज्यवाद का खेल

इराक के बाद लीबिया
सुरक्षा परिषद ने एक ओर तो बहरीन में विदेशी सेनाओं के प्रवेश को अनदेखा किया परन्तु दूसरी ओर लीबिया में उसके तेल भण्डार पर कब्जे़ हेतु अरबलीग के इशारे से नो फ्लाई मिलिट्री जोन लागू किया।
इस बार लीबिया में वही सब हो रहा है जो प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद के वर्षों में इराक में घटित हुआ था। याद होगा कि इराक पर जो हमला और कब्जा किया गया उसका मुख्य उद्देश्य वहाँ के तेल स्रोतों पर कब्जा जमाना तथा वहाँ के बजट एवं तेल की आमदनी को हाथ में लेना था। यह इसलिए कि बड़ी आर्थिक शक्तियों को अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति को सँभालना था। इस हेतु उन्हें रूस एवं चीन के सहारे आगे बढ़ना था ताकि इराकी जनता के प्रतिरोध का मुकाबला उन पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव द्वारा प्रतिबंध लगा कर, किया जाय। लीबिया में अब संयुक्त राष्ट्र ने ‘नो फ्लाई जोन’ तथा अन्य प्रतिबंधों को अपने प्रस्ताव द्वारा लागू कर दिया है, जो एक बड़ा तेल उत्पादक देश है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि सुरक्षा परिषद के एक भी स्थाई सदस्य ने ‘वीटो’ का प्रयोग नहीं किया। रूस एवं चीन द्वारा वोट का बहिष्कार तथा वीटो के
अधिकार का प्रयोग न करने का अर्थ तो यही निकला कि उन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये शक्तियाँ लीबिया में वही सब हरकते करेंगी जो वह इराक में कर चुकी हैं। नागरिकों एवं सभी जमीनी जीवों आदि पर बम वर्षा, यहाँ तक की लीबिया के उन सच्चे राजनैतिक आन्दोलन कर्ताओं पर भी जो किसी कठपुतली सरकार को लाने का विरोध कर सकते थे। संसार एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद देख रहा है- एक ऐसा सार्वभौमिक नेटवर्क जो अपने आर्थिक एवं भौगोलिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु आर्थिक एवं कार्पोरेट शक्तियों के साथ-साथ नाटो एवं सुरक्षा परिषद के गठजोड़ का प्रयोग करता है।
इस प्रस्ताव का प्रभाव दूर तक जाता है। लीबिया में एक राजनैतिक आन्दोलन चल रहा है जो लीबिया के तेल पर बाहरी शक्तियों के कब्जे का विरोध करताहै तथा कर्नल गद्दाफी का भी विरोधी है, उन्हें भी अलग-थलग करने की रणनीति है। अब यह देखिए कि जिसे चतुराई से ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ घोषित किया गया वहाँ नाटो के सैनिक विमान बराबर उड़ रहे हैं, क्योंकि ‘प्रस्ताव’ वहाँ बाहरी शक्तियों को सैनिक कार्यवाही की स्वीकृति देता है।
सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव का उद्देश्य निश्चित रूप से यह नहीं है कि कर्नल गद्दाफी के वास्तविक या कथित अत्याचारों पर रोक लगाई जाए या यह कि वहाँ की आन्तिरिक अशान्ति का मामला सैनिक कार्यवाही द्वारा हल किया जाय। वास्तविकता यह है कि ये शक्तियाँ स्वयं अपनी आंतरिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अशान्ति एवं समस्याआंे से बचने के लिए ऐसा करती हैं, जैसा कि उन्होंने इराक में किया था। वे इस प्रस्ताव की सहायता से लीबिया के तेल भण्डारों पर पूर्ण नियंत्रण एवं कब्जा भी चाहते हैं। जो जन-आन्दोलन चल रहे हैं, उनसे उन साम्राज्यवादियों को खतरा है जो अरब के पैसों से मौज उड़ा रहे हैं। वहाँ की कामकाजी जनता को जीविकोर्पाजन एवं सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है अतः उनकी अशान्ति ने वहाँ के बादशाहों की नींद हराम कर दी है तथा उनके बाहरी समर्थकों के तेल के फायदे को भी नुकसान पहुँचाया है जो अभी तक शेखों के शोषण सिस्टम को समर्थन देते रहे हैं।
वित्तीय एवं कार्पोरेट जगत नाटो तथा रूस एवं चीन के साथ मिलकर ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ को इसलिए लागू कर रहे हैं कि लीबिया में ऐसा कोई विकल्प न निकले जो इन सबके स्वार्थ के विपरीत हो। यह एक राजनैतिक तथ्य है कि सभी अरब देशों में तेल का अथाह पैसा है, फिर भी उन्होंने उसको अपनी जनता के कल्याण के लिए खर्च नहीं किया। दूसरी ओर अरब लीग के सदस्य होते हुए भी कई देशों ने इसराईल से संबंध स्थापित कर लिए।
वहाँ की जनता जो पहले नहीं जानती थी अब सुरक्षा परिषद की दोगली नीति को जान गई है। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर अचानक सैनिक आक्रमण की भत्र्सना सुरक्षा परिषद एवं अरब लीग ने की परन्तु दूसरी ओर कपटपूर्ण ढंग से इराक में अमरीकी राजदूत ने इसे उकसाया। इसी प्रकार इराक-ईरान की युद्ध रचना इस क्षेत्र को कमजोर करने हेतु की गई। कुवैत जो कि उस क्षेत्र की उपनिवेश संरचना से पूर्व ईराक का एक हिस्सा था उस पर आक्रमण की योजना इस हेतु बनवाई गई ताकि यू0एस0-यू0के0 को उस क्षेत्र में सैनिक आक्रमण एवं कब्जे का मौका मिल जाए। इराकी जनता पर यह युद्ध जबरदस्ती थोपा गया था, यद्यपि इराक, कुवैत से हट गया था तथा युद्ध विराम हेतु प्रस्ताव दिया था, परन्तु वहाँ यूरेनियम हथियारों के छिपे होने का बहाना बनाया गया। जो लोग हथियार डालने को तैयार थे उन्हें अमानवीय तौर पर बालू में जीवित दफन कर दिया गया और उन्हें सामूहिक रूप से भी मार डाला गया। क्षेत्र में हमले के लिए कुवैत मिलिट्री बेस बना लिया गया, जहाँ से अब तक इराक पर बम वर्षा जारी है। इसी तरह लीबिया पर ‘‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’’ घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है जबकि कर्नल गद्गाफ़ी उनके पुत्र तथा इंग्लैण्ड और अमरीकी सरकारों के बीच घनिष्ठ सम्बंधों के राज़ सामने आ रहे हैं। यहाँ तक कि प्रतिष्ठित ‘लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स’ अब संदेह के घेरे में है जो लीबिया से गुप्त रूप से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहा है।
इराक, उत्तरी कोरिया, ईरान तथा अन्य स्थानों पर सुरक्षा परिषद ने इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि अब इनका समर्थन कोई नही करता। यह तो दरअसल वहाँ की जनता के खिलाफ युद्ध की घोषणा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो दुनिया में हर जगह अपने आकाओं के फायदे के लिए अपना हुक्म चलाता है, अब सऊदी अरब की सेनाओं के बहरीन मंे दाखिल हो जाने पर भत्र्सना क्यों नही करता? कि यह एक पड़ोसी देश में खुली हुई सैनिक घुसपैठ है। संयुक्त राष्ट्र संघ लगता है कि एक सार्वभौमिक माफिया है जो भौगोलिक एवं राजनैतिक सीमाओं का खयाल किए बगैर अपने विŸाीय नेटवर्क के इशारे पर काम करता है। पेट्रो-डालर की दुनिया में ऐसी सरकारें बाहरी शक्तियों के भरोसे ही जिन्दा हैं। अब ट्युनेशिया, मिस्र, और बहरीन की अरब जनता में एक उफान आ गया है तथा इनकी बदलाव की हवा अन्य देशों की ओर बढ़ रही है, परन्तु साथ ही दूसरी ओर एक रणनीति ऐसी तैयार की जा रही है कि इस उफान को रोक दिया जाए तथा इसकी दिशा को बदल दिया जाए।
इसी सुरक्षा परिषद की ओर से कोई प्रयास आज तक इस बात का नहीं किया गया कि इसराईल पर ‘नो फलाई जोन’ लागू होता तथा इराक, अफगानिस्तान पर आक्रमण करने वाली शक्तियों पर कोई कार्यवाही की जाती। यहाँ पर कर्नल गद्दाफी की सरकार के पक्ष में बात नहीं की जा रही है। वास्तविकता यह है कि कोई ऐसी नैतिक विवशता भी नहीं है कि लीबिया में सुरक्षा परिषद के नेतृत्व वाले ‘नो फ्लाई जोन’ या किसी ऐसे सैनिक घुसपैठ का समर्थन किया जाए जो अरब लीग के इशारे से हुआ। इसने तो आम जनता की कभी बात ही नहीं की, इसने क्षेत्र में हमेशा शाहों के स्वार्थ का समर्थन किया।
अरब दुनिया की जनता को ही केवल यह हक होना चाहिए कि वे अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें। ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का बहाना बनाकर सुरक्षा परिषद, नाटो या उसके संबंधी को, (अरब लीग में या कहीं भी) अपनी मनपंसद सरकार या डिक्टेटर हेतु सैनिक कार्यवाही करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। बातें नव औपनिवेशिक व्यवस्था के तौर पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक देश से दूसरे देश में बराबर देखी जा रही है। मुख्य स्वार्थों का एक नेटवर्क है जो सुरक्षा परिषद, नाटो अरब लीग आदि के साथ मिल कर एशिया अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की कभी एक सोसायटी पर सैनिक हवाई जहाजों या ड्रोन से पक्षियों के समान लोगों पर लक्ष्य साधकर निशाना बनाते हैं तथा अंधाधुंध बम वर्षा करके लोगों को मार डालते हैं। नाटो में जो सरकारें शामिल हैं वे युद्ध अपराधी हैं।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (जो अरब दुनिया के मामले में पुर्जे-पुर्जे करके हवा में उड़ा दिया गया) के अनुसार किसी देश के नागरिक ही अपनी राजनैतिक पसंद का निर्धारण करेंगे, इनमें किसी औपनिवेशिक शक्ति, बन्दूक या विदेशी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसमें कोई शंका नहीं कि तानाशाहों ने औपनिवेशिक सरकारों, उनके वित्तीय एवं कार्पोरेट स्वार्थी तत्वों से साठगाँठ करके अरब दुनिया के संसाधनों को ख्ूाब लूटा है, यह लूट अब भी जारी हैं, इस बात को ट्युनेशिया, मिस्र आदि की अरब जनता खूब जानती है। अरब जगत की कोई भी सरकार अपने नागरिकों की वफादारी का दैवीय
अधिकार प्राप्त करने का दावा कैसे कर सकती है जब कि वह अपनी जनता का शोषण कर रही है, अपने कामकाजी आमजन को बेरोजगार बनाए हुए है, वह सामाजिक तकलीफें उठा रहे हैं तथा राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें भाग लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। लगता है कि वहाँ कोई स्पष्ट राजनैतिक समझौता है कि सुरक्षा परिषद, नाटो या अरब लीग अथवा अन्य किसी संगठन की मदद से औपनिवेशिक सैनिक हस्तक्षेप के द्वारा अरब जनता के आन्दोलनों को अपहृत करना है तथा उनके रुख को मोड़ देना है। वास्तव में अरब भू भागों में स्थापित प्रत्येक बादशाहत को इन्हीं उपनिवेशवादियों ने ही थोपा था तथा वही उन पर अभी तक अपना आधिपत्य जमाए हुए हैं। राजनैतिक या कानूनी तौर से इस्लाम में बादशाहत या डिक्टेटर शिप की या फिरके बंदी ‘सुन्नी’ या ‘शिया’ की कोई मान्यता नहीं है। जब कि हम वहाँ धर्म के दुरुपयोग को बराबर देख रहे हैं, वे सरकारें चाहती हैं कि उन्हें आस्था की नजर से देखा जाए जबकि उन्होंने अपनी जनता को तथा दूसरे क्षेत्रों में भी लोगों को गुलाम बना रखा है तथा जाली संगठनों को विŸाीय सहायता इसलिए दे रहे हैं कि वे अपने उपनिवेशवादियों के सहयोग से दुनिया में इस्लाम की अलग ढंग से व्याख्या करें ताकि वहाँ के स्रोतों के दोहन करने का अवसर प्राप्त रहे।
भूत के समान ‘अलकायदा’ तथा इसी प्रकार के अन्य संगठन कभी दिखते हैं तथा कभी गायब हो जाते हैं, वे धार्मिक उकसाहरों से जब इशारे पाते हैं तो रणनीति के अनुसार यहाँ वहाँ मार काट व खून खराबा करते हंै।
अगर वास्तव में सुरक्षा परिषद नाटो और अरब लीग गम्भीर हैं और उन्हें लीबिया में सरकार एवं विद्रोहियों द्वारा बमबारी की चिंता है तो उन्हें पहले इन बातों पर ध्यान देना होगा कि वे कब्जा किए गए देशों- फिलिस्तीन, कांगो, इराक, अफगानिस्तान के भू भागों से अपने सैनिक वापस लें।
यूगोस्लाबिया की फेडेरल रिपब्लिक को पुनस्र्थापित करें, रवान्डा में पाल कागमे की सरकार को गद्दी से उतरने को कहें, लेबनान व सीरिया के कब्जे वाले भू भागों को खाली करवाएँ, तथा इस्राईल द्वारा कब्जे वाले क्षेत्रों को भी खाली करें। अफगानिस्तान पाकिस्तान क्षेत्र में बम वर्षा रोकें। संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंम्बली के प्रस्ताव के अनुरूप निर्धारित सीमाओं सहित फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दें तथा इस्राईल व फिलिस्तीन की राजनैतिक सीमाओं को स्पष्टतः निर्धारित करके दोनों राज्यों की स्थापना करें। सऊदी अरब से बहरीन भेजी गई सेनाओं को तुरन्त वापस बुलाएँ। हैती में दूसरे अन्य अर्जेन्ट उपायों के अतिरिक्त स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराएँ। संयुक्त राष्ट्र, नाटो एवं अरब लीग को अपने खून खराबा करवाने की आगे की छवि को दुरुस्त बनाने हेतु इससे कम की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे दुनिया के सामने अपना स्पष्टीकरण दें। यद्यपि ये बातें ऐसी हैं जैसे कि सुईं के सूराख से हाथी का पार होना फिर भी ‘नो फलाई जोन’ के मामले में इससे कम तर कुछ भी विचार नही किया जा सकता।

-नीलोफर भागवत
अनुवादक -डॉ0 एस0एम0 हैदर
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