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शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी

मैंने कुछ दिन पहिले एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘‘अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी’’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अभी हाल की यात्रा के संदर्भ में मैं यह बताना चाहूंगा कि आखिर मैंने यह शीर्षक ही क्यों दिया था? क्या मोदी जी की सफल यात्रा के बावजूद यह तर्क अभी भी प्रासंगिक है? अमरीका की दोस्ती व दुश्मनी दोनों खतरों से भरपूर है।
सबसे पहले स्वयं मोदी के प्रति अमरीकी रवैये को लें। 2002 के गुजरात में हुये दंगे के बाद अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद वे जैसे ही प्रधानमंत्री बने उन्हें न सिर्फ अमरीका में आने की इजाजत दी गई वरन् उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। क्या प्रधानमंत्री बनते ही वे सब कारण लुप्त हो गये जिनके चलते मोदी का अमरीकी प्रवेश वर्जित कर दिया गया था?
मुझे याद है कि एक समय ऐसा था जब दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का सारी दुनिया में बहिष्कार होता था। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने सभी राष्ट्रों से बहिष्कार का आव्हान करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। जब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने वहां के मूल निवासियों पर ज्यादतियां करना बंद नहीं कर दिया और अंततः उनके ही हाथों में सत्ता नहीं सौंप दी गई तब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का बहिष्कार जारी रहा।
इस तरह यह पूछा जा सकता है कि क्या मोदी जी को जिन कारणों से वीजा नहीं दिया गया था, क्या वे समाप्त हो गए थे? यदि मोदी का बहिष्कार किसी सिद्धांत पर आधारित था तो अमरीका को उस पर कायम रहना चाहिए था। ज्योंही मोदी प्रधानमंत्री बने अमरीका का रवैया पूरी तरह से बदल गया।
सच पूछा जाये तो अमरीकी रवैये में परिवर्तन का संकेत उस समय से ही मिलने लगा था जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था और इस बात कि संभावना नजर आने लगी थी कि भारत के अगले प्रधानमंत्री मोदी ही बनेंगे। यदि बारीकी से देखा जाये तो अमरीका का परिवर्तित दृष्टिकोण किसी सिद्धांत नहीं बल्कि अपने खुद के निहित स्वार्थों पर आधारित है। भारत अब एक विशाल बाजार हो गया है। जिस देश के 80 करोड़ निवासियों के पास मोबाइल आ चुके हैं या आने वाले हैं उस देश से कौन व्यापार नहीं करना चाहेगा।
हमारे देश ने बिजली के उत्पादन के लिए अणुशक्ति के कारखाने बनाने का फैसला किया है। इस तथ्य के बावजूद कि जर्मनी, जापान और कुछ हद तक अमरीका स्वयं ने अणुशक्ति आधारित बिजली के उत्पादन के खतरों को महसूस किया है। जापान और जर्मनी ने तो अगले 20 सालों तक के लिए इस तरह के कारखानों को बंद कर दिया है। अब ये कारखाने बेकार पड़े हैं। इसलिए इन कारखानों को दूसरे देशों को बेचना है। भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां इन बंद पड़े कारखानों को खरीदने की अपार संभावनायें हैं। इसलिए जापान ने भी नरेन्द्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह एक वास्तविकता है कि देशों के पारस्परिक संबंध राजनैतिक कारणों से ज्यादा, आर्थिक कारणों से संचालित होते हैं।
हम यहां पर अब हमारे देश के प्रति अमरीकी रवैये के इतिहास पर जाना चाहेंगे। हम 1947 में आजाद हुये। इस बात में संदेह नहीं कि अमरीका ने हमें आजाद होने में सहायता की थी और समय-समय पर ब्रिटेन के ऊपर हमें आजाद करने के लिए दबाव बनाया था। परंतु ज्योंही हम आजाद हुये हमारे साथ अमरीका ने लगभग सौतेला व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया। आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू ने अणुशक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर देना प्रारंभ कर दिया था। इसकी संभावना का पता लगाने के लिए नेहरू जी ने हमारे देश के महान अणु वैज्ञानिक डाक्टर भाभा को अमरीका भेजा था। अमरीका में जब डाक्टर भाभा ने इस मुद्दे पर संबंधित लोगों से विचार विमर्श करना प्रारंभ किया तो उनको यह कहकर लगभग अपमानित किया गया कि अणुशक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग आपके बस में नहीं है। आप तो खेती करो और प्रगति के बाकी सोपानों को हमारे ऊपर छोड़ दो। अमरीका के इस रवैये से डाक्टर भाभा इतने दुःखी हुये कि बताया जाता है कि उनकी आंखों में आंसू आ गये।
उसके बाद अमरीका ने न तो हमारे देश के औद्योगिक विकास में मदद की और ना ही हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायता की। लगातार अमरीका ने पड़ौसी देश पाकिस्तान को हमारे विरूद्ध भड़काया और पाकिस्तान को लगातार हथियारों की सहायता देते रहे। अमरीकी सहयोग के कारण ही पाकिस्तान ने 1965 में हमसे युद्ध किया। इस दरम्यान दुनिया में समाजवादी खेमा बहुत मजबूत हो गया था। सोवियत संघ को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश माना जाता था। सोवियत संघ ने भारतवर्ष समेत दुनिया के उन तमाम राष्ट्रों को खुले दिल से सहायता दी जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विभिन्न साम्राज्यों के चंगुल से आजाद हुये थे। इनमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देश शामिल थे। सोवियत संघ ने हमें सबसे पहला इस्पात का कारखाना दिया जो उस समय के मध्यप्रदेश के भिलाई नामक एक गांव में स्थापित किया गया। रक्षा, तेल का शोधन, दवाईयों का उत्पादन, ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसमें सोवियत संघ ने हमारी मदद न की हो।
अमरीका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश माना जाता है। परंतु दुःख की बात है कि अमरीका ने दुनिया के नव आजाद देशों में लोकतंत्र व्यवस्था मजबूत करने में कतई सहायता नहीं की। उसने एक के बाद एक एशिया और अफ्रीका के देशों पर तानाशाहों को लादा। इन देशों के लोकप्रिय नेताओं को अमरीका ने या तो कमजोर किया या उनकी हत्या करवा दी। इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि अफ्रीका के अत्यधिक लोकप्रिय नेता पेट्रिस लुम्मबा की हत्या अमरीका ने करवायी थी और उसके बाद वर्षों तक कांगो का शासन एक अत्यधिक यातताई तानाशाह के हाथों में सौंप दिया। अपनी विभिन्न नीतियों के सहारे मिश्र में नासर को कमजोर किया, इण्डोनेशिया में सुकर्णो की सत्ता में सेंध लगाई, पाकिस्तान में भी प्रजातंत्र को मजबूत नहीं होने दिया। वहां भी प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की हत्या हुई। फिर सैनिक शासक फील्ड मार्शल अय्यूब को 10 साल तक समर्थन दिया। पाकिस्तान में भी एक के बाद एक लोकप्रिय नेताओं की हत्यायें हुईं। अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित हो गया था, जिसके चलते वहां के निवासियों को अनेक भौतिक सुविधाओं प्राप्त हुईं थीं, महिलाओं को आजादी मिली थी, स्कूलों और अस्पतालों में तमाम प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हो गईं थीं। चूंकि अफगानिस्तान सोवियत संघ के पड़ौस में था इसलिये उस देश की प्रगतिशील सरकार का तख्ता उलटने के लिए अनेक प्रकार के षडयंत्र किये गये और तालिबान की नींव डाली गई। अमरीका की पूर्व विदेश मंत्री हैलेरी क्लींटन ने स्वयं स्वीकार किया है कि हमने अफगानिस्तान में तालिबान को बढ़ावा दिया था। तालिबानों की ताकत बढ़ने से अफगानिस्तान नरक बन गया। तालिबानियों ने महिलाओं का घर से निकलना भी
प्रतिबंधित कर दिया। उन्हंे अस्पतालों, स्कूलों में भी काम नहीं करने दिया गया और उनसे कहा गया कि यदि वह बाहर निकलें तो सिवा उनके पैरों के अलावा शरीर का और कोई भी अंग नहीं दिखना चाहिए। अनेक वर्षों से वहां तबाही मची हुई है। दिन-रात आतंकवादी वहां निर्दोषों को मारते हैं।
लगभग यही हाल ईराक में भी है। अमरीका ने ईरान पर हमला करने के लिए सद्दाम हुसैन की सहायता ली। उन्हें हथियार दिये, डाॅलर दिये और 10 वर्षों तक ईरान से लड़वाया। जब सद्दाम हुसैन आत्मनिर्भर बन गये और अमरीका का पिछलग्गू बनने से उन्होंने इंकार कर दिया तो उनके खिलाफ ईराक में विद्रोह करवाया और बाद में झूठे आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा दी गई। आज उसी ईराक में जो हालत है वह अराजकता से भी बदतर है।
अनुभव बताते हैं कि अमरीका की नीति है ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’। देखना यह है कि मोदी और मोदी सरकार के साथ भविष्य में उनका रवैया कैसा रहता है। इस समय अमरीका की कोशिश है कि भारत को पूरी तरह से इजरायल की गोदी में बैठा दिया जाये और सारे अरब देशों से हमारे संबंधों में कड़वाहट पैदा करवा दी जाये। हमारी विदेशनीति की परंपरा के अनुसार वर्षों से हमने फिलीस्तीन का साथ दिया है। अमरीका हमें इस तरह पूरे अरब और मध्य पूर्व देशों से अलग-थलग करना चाहता है। लगता है ऐसा करवाने में मोदी पूरी तरह तैयार हैं। दीर्घकाल में इससे हमारा कितना लाभ होगा यह एक सोचने की बात है।
-एल.एस. हरदेनिया

गुरुवार, 31 मई 2012

ईरान पर प्रतिबन्ध

अमेरिका लगातार भारत पर दबाव बना रहा है कि वह ईरान से तेल आयात कम करे जबकि भारत की उर्जा जरूरतों को पूरा करने में ईरान की विश्वसनीय भूमिका है जबकि अमेरिका कभी भी भारत का विश्वसनीय साथी नहीं रहा है। कई दशक पहले तारापुर परमाणु रिएक्टर की यूरानियम फर्जी बहानो के आधार पर पश्चिमी देश बंद कर चुके हैं। पूरी दुनिया में अमेरिका व पश्चिमी देश विकासशील व छोटे देशों के लिये ब्लैक मेलर साबित होते हैं और धीरे-धीरे उस देश की संप्रभुता का ही हरण कर लेते हैं।
भारत यात्रा पर आए ईरान के विदेश मंत्री अली अकबर सालेही से बातचीत के बाद विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने स्पष्ट किया कि भारत की बढ़ती घरेलू मांग को देखते हुए ईरान तेल का महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। सालेही ईरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के विशेष दूत के तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अगस्त में तेहरान में होने वाल गुट निरपेक्ष आंदोलन (नैम) की शिखर वार्ता का न्योता देने भारत आये हैं।
ईरान के साथ भारत के सदियों पुराने सम्बन्ध हैं और ईरान को भी जरूरत है भारत की वहीँ भारत को भी ईरान की जरूरत है । भारत को चाहिए की विकसित देश के रूप में अपना स्थान बनाने के लिये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के किसी भी दबाव में न आयें। अपने देश के हितों के अनुरूप अपनी नीतियों को संचालित करें। पिछलग्गूपन से देश में ढेर सारी समस्याएं ही पैदा होंगी।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 15 मई 2012

अमरीकी गुलामी - असर शुरु


अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी हिंदुस्तान यात्रा पर आई थी और उन्होंने भारतीय संघवाद के विपरीत आचरण प्रदर्शित करते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे मुलाकात की और अमेरिकी एजेंडे को संसद में पास कराने के लिये विचार विमर्श किया। उस में मुख्य रूप से यह बात भी शामिल थी कि भारत ईरान से पेट्रोलियम पदार्थों को न ख़रीदे। भारतीय राजनेताओं नागरिकों राजदूतों की जिस तरह से बेइज्जती तलाशी के नाम पर अमेरिकी हवाई अड्डों पर होती है। उसका कोई भी जवाब भारत सरकार नहीं दे पाती है उलटे अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी ने भारतीय संघ की परवाह न करके सीधे बंगाल की मुख्यमंत्री से सम्बन्ध कायम करने की कोशिश की अमेरिकी दबाव के बीच भारत ने मंगलवार को स्वीकार किया कि उसने ईरान से कच्चे तेल के आयात में बड़े पैमाने पर कटौती की है। पेट्रोलियम राज्य मंत्री आर पी एन सिंह ने कहा कि 2010-11 और 2011-12 के दौरान भारतीय तेल कंपनियों ने ईरान से 18.5 एमएमटी और 17.44 एमएमटी कच्चे तेल का आयात किया। उन्होंने बताया कि 2012-13 में ईरान से 15.5 एमएमटी कच्चे तेल का आयात किया जाना है। सिंह ने धर्मेद्र प्रधान के सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी।
ईरान द्वारा रुपये में पेमेन्ट लेने में हम इस जिम्मेवारी से मुक्त हो जाते हैं। तेल के लिये मिले रुपयों से ईरान कपड़े, अनाज अथवा अन्य दूसरा माल भारत से खरीद सकता है। यह सौदा भारत के लिये लाभप्रद है।
सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 13 मई 2012

इस्राईल के विनाश के लिए शस्त्र उठाने की आवश्यकता नहीं है- अहमदीनेजाद


अमेरिकी साम्राज्यवाद के पिट्ठू देश इजराइल को समाप्त करने के लिये किसी युद्ध की आवश्यकता नहीं है. यह बात कहकर ईरानी राष्ट्रपति ने इजराइल व उसके आका अमेरिका की असली हालत बता दी है। यह बात सही है कि यदि तीसरी दुनिया के मुल्क अमेरिका व इजराइल से अपने आर्थिक सम्बन्ध समाप्त कर ले तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था स्वयं ही आत्मघाती दौर से गुजर रही है स्वत: नष्ट हो जाएगी।
अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी हिंदुस्तान यात्रा पर आई थी और उन्होंने भारतीय संघवाद के विपरीत आचरण प्रदर्शित करते हुए बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से सीधे मुलाकात की और अमेरिकी एजेंडे को संसद में पास कराने के लिये विचार विमर्श किया। उस में मुख्य रूप से यह बात भी शामिल थी कि भारत ईरान से पेट्रोलियम पदार्थों को न ख़रीदे। भारतीय राजनेताओं नागरिकों राजदूतों की जिस तरह से बेइज्जती तलाशी के नाम पर अमेरिकी हवाई अड्डों पर होती है। उसका कोई भी जवाब भारत सरकार नहीं दे पाती है उलटे अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी ने भारतीय संघ की परवाह न करके सीधे बंगाल की मुख्यमंत्री से सम्बन्ध कायम करने की कशिश की है। यदि भारतीय संघ ने विरोध प्रदर्शित किया होता तो विदेश मंत्री हिलेरी की हिम्मत पस्त होती।
राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने कहा है कि इस्राईल के विनाश के लिए शस्त्र उठाने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपनी प्रांतीय यात्रा के अंतर्गत शनिवार को पूर्वी प्रांत ख़ुरासान रज़वी के काश्मर नगर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए यह बात कही। डाक्टर अहमदी नेजाद ने कुछ क्षेत्रीय देशों द्वारा कुछ बाहरी शक्तियों से अरबों डालर के शस्त्र ख़रीदने की आलोचना करते हुए कहाः यदि इन शस्त्रों को ख़रीदने के पीछे उनका उद्देश्य ज़ायोनी शासन से लड़ना है तो उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि इस्राईल की तबाही के लिए युद्ध की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि क्षेत्रीय देश ज़ायोनी शासन से संबंध विच्छेद कर थोड़ी सी त्योरी चढ़ा लें तो इस शासन का काम तमाम हो जाएगा। ईरानी राष्ट्रपति ने कुछ क्षेत्रीय शासकों की तेल की आय के साठ अरब डालर को, पश्चिम से शस्त्र ख़रीदने पर व्यय करने पर आलोचना की। ज्ञात रहे कि दिसंबर 2011 में अमरीका ने आधिकारिक घोषणा में कहा था कि उसने सऊदी अरब से तीस अरब डालर का शस्त्र समझौता किया है जिसके अंतर्गत वह इस दशेश को एफ़-15 युद्धक विमान सहित दूसरे युद्ध उपकरण मुहैया करेगा। ईरानी राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सेना के हाथों अफ़ग़ान जनता के जनसंहार की भी भर्त्सना की।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अरब देशों में उमड़ते असंतोष का बड़ा कारण है नव-साम्राज्यवाद



    अरब देश इस समय जिस व्यापक  असंतोष के दौर से गुज़र रहे हैं, उसका एक बड़ा कारण नव साम्राज्यवाद है। इन देशों के आर्थिक व सामाजिक महत्व को देखते हुए पश्चिमी देशों व विशेषकर अमरीका ने यहाँ की सरकारों को अपने हितों के अनुकूल रखने का विशेष प्रयास किया। इसके परिणाम स्वरूप ऐसे अभिजात सत्ताधारियों को भरपूर पश्चिमी सहायता से देर तक सत्ता में टिके रहने का अवसर मिला जिन्हें वहाँ की जनता पसंद नहीं करती थी। इन शासकों के विरुद्ध असंतोष एकत्र होता रहा और अब इतने दिनों तक एकत्र हुआ असंतोष बहुत उभर कर सामने आ रहा है।
    विश्व में प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के अंत के साथ ही नई व पुरानी साम्राज्यवादी ताकतों ने यह प्रयास आरम्भ किए कि वे तरह-तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपायों से महत्वपूर्ण देशों में अपने आर्थिक व सामरिक हितों की रक्षा करें। यह प्रयास मध्य पूर्व व अरब देशों में सबसे अधिक सक्रिय रहे क्योंकि यहाँ तेल व गैस की सबसे अधिक सम्पदा है व क्षेत्र का सामरिक महत्व भी बहुत है। यहाँ अमरीका व उसके मित्र देशों ने इस्राइल के साथ अपने हितों को सबसे नजदीकी तौर पर जोड़ा। इस गठबंधन के प्रति अरब लोगों का विरोध स्वाभाविक था क्योंकि फिलिस्तीनियों को खदेड़ कर व उनके साथ तरह-तरह का अन्याय कर इस्राइल की स्थापना की गई थी। पर अमरीका ने आर्थिक व सैनिक सहायता के बल पर महत्वपूर्ण अरब देशों में ऐसे शासकों को आगे लाने का प्रयास किया जो अमरीकी-इस्राइल गठबंधन से या तो मित्रता रखें या कम से कम उसे सहन करें। अमरीका की नीति इस संकीर्ण संदर्भ में काफी वर्षों तक सफल रही कि मिस्र व सऊदी अरब जैसे सबसे महत्वपूर्ण या धनी अरब देशों ने अमरीका-इस्राईली गठबंधन की क्षेत्र की मुख्य ताकत को कोई चुनौती नहीं दी। बदले में मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को अमरीका ने भरपूर सहायता दी व सबसे बड़े हथियारों के सौदे सऊदी अरब के शासकों के साथ किए। इराक में सद्दाम हुसैन ने अमरीकी वर्चस्व को चुनौती दी तो उन्हें सत्ता से हटाने के लिए बहुत विध्वंसक युद्ध करने में भी अमरीका ने देर नहीं की।
    मध्य-पूर्व क्षेत्र में अरब देशों से अलग जो सबसे महत्वपूर्ण देश है वह ईरान है। पहले अरब देशों पर नियंत्रण रखने के लिए अमरीका ने ईरान को ही चुना था। वहाँ की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर ईरान के शाह की तानाशाही स्थापित करने में अमरीका की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ईरान के शाह की तानाशाही के लम्बे दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन हुआ पर शाह से अमरीका की दोस्ती बनी रही। इस तरह ईरान का समर्थन उपलब्ध होने के कारण क्षेत्र में अमरीका व इस्राइल       ka  गठबंधन मजबूत स्थिति में रहा।
    ईरान के शाह की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध यहाँ के लोगों का असंतोष बहुत वर्षों तक एकत्र होता रहा व जब वह एक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा तो वहाँ एक कट्टरपंथी मुस्लिम सरकार की स्थापना हुई जो अमरीका की घोर विरोधी थी। इस तरह से अमरीका का मध्य-पूर्व क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण साथ छूट गया तो उसने महत्वपूर्ण अरब देशों में मित्र सरकारें बनाने के अपने प्रयास और तेज कर दिए।
    अमरीका के लिए सबसे महत्वपूर्ण देश मिस्र था। पहले यहाँ के राष्ट्रपति नासिर के नेतृत्व में ही अरब राष्ट्रवाद में जबरदस्त उभार आया था। पर अनवर सादात के राष्ट्रपति बनने के बाद यहाँ अमरीकी असर बढ़ने लगा व हुस्नी मुबारक के समय में तो मिस्र अमरीका का सबसे बड़ा मित्र बन गया। पर यह दोस्ती सत्ताधारियों के स्तर पर ही थी व मिस्र के आम लोगों ने इस मित्रता को कभी स्वीकार नहीं किया। हुस्नी मुबारक ने अपने लोकतांत्रिक विरोधियों का उत्पीड़न किया व चुनावों का आयोजन इस तरह किया गया कि विरोधियों को उचित अवसर न मिल सके। मुबारक की इस जोर जबरदस्ती के बावजूद उनकी सत्ता को मजबूत करने के लिए अमरीका का समर्थन मिलता रहा।
    जब लोकतांत्रिक विरोध को उभारने के अवसर नहीं मिले तो मिस्र में वही हुआ जो ईरान में हुआ था यानी कट्टरपंथी मुस्लिम ताकतों में विरोध केन्द्रित होने लगा। जब और कोई जगह नहीं मिलती है तो विरोधी धार्मिक मंच की ओर हो जाते हैं क्योंकि वहाँ कुछ सुरक्षा मिल जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मिस्र में अन्य विरोधी स्वर नहीं हैं पर सबसे संगठित विरोध की ताकत तो कट्टरपंथी तत्वों के पास है।
    पर अमरीका ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं। ईरान के अनुभव से सीखते हुए उसने ऐसे प्रयास पहले ही आरंभ कर दिए हैं कि मुबारक के बाद जो सत्ताधारी आएँ वे उसके हितों के अनुकूल हों। आगे सवाल यह है कि मुबारक के जाने के बाद अस्थाई सरकार में सत्ता किसके पास आएगी व फिर चुनावों में कौन जीत पाएगा।
    सऊदी अरब के शासकों ने कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं से समझौता किया हुआ है जिससे वे एक दूसरे की सहायता से पनप सकें। इस तरह यहाँ के कट्टरवादी तत्व बहुत शक्तिशाली हैं तथा उन्होंने अनेक देशों में हिंसक कट्टरवादी व सांप्रदायिक विचारों को फैलाया है। इसके बावजूद अमरीका यहाँ के शासकों के साथ अरबों रूपये के हथियार के सौदे करता रहा है।
    आगे सवाल यह है कि तेल की दौलत के बल पर सऊदी अरब के शासक कब तक अपनी लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करने वाली सत्ता को कायम रख पाएँगे। अरब देशों की जनता में जो उभार आया है वह आज नहीं तो कल सऊदी अरब को भी ज़रूर प्रभावित करेगा।
    इराक में भयानक हिंसा व बर्बादी करने के बाद भी अमरीका यहाँ अपने उद्देश्य प्राप्त करने में सफल हुआ हो, ऐसा नहीं लगता है। वहाँ के आम लोगों में अमरीका व उसके पिछलग्गू राजनेताओं के प्रति आज भी बहुत विरोध की भावना है। अतः अमरीका व उसके मित्र पश्चिमी देशों को अब गंभीरता से सोचना चाहिए कि जिस तरह की नीतियाँ उन्होंने अरब देशों मे जन विरोधी सरकारों को बनाए रखने के लिए अपनाई हैं उन्हें त्यागने का वक्त अब आ गया है। यदि अमरीका व उसके सहयोगी पश्चिमी देश इस समय भी अरब स्ट्रीट से उठती आवाज़ को सुन कर अपनी नीतियाँ बदल लें तो अरब देशों में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना की राह से एक बड़ी बाधा दूर हो जाएगी।
-भारत डोगरा

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

अमेरिका का अंत निकट : अगर भारत चीन ने ईरान का साथ दिया

अमेरिकन साम्राज्यवाद की मौत नजदीक रही है पूरी दुनिया को गुलाम बनाने का स्वप्न अधूरा रह जायेगा ईरान ने आज अपने परमाणु कार्यक्रम को उसके लाख विरोध के बाद आगे बढ़ा दिया है अमेरिकियों को दिखाने के लिये उसका टेलीकास्ट भी किया है इसके साथ-साथ ईरान ने यूरोप के छह: देशों को तेल बेचने से भी मना कर दिया है यह देश हैं इटली, फ्रांस, स्पेन, ग्रीस, नीदरलैंड, पुर्तगाल। इन देशों की पहले से अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं है तेल मिलने से और व्यवस्था ख़राब होगी अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था पहले से ख़राब हैअमेरिकी जनता महंगाई, बेरोजगारी के खिलाफ आन्दोलनरत है इन परिस्तिथियों में अमेरिका और इजराइल उसके पिट्ठू देशों ने जो युधोन्माद ईरान के खिलाफ पैदा किया था अगर वास्तविक लड़ाई पर आये तो निश्चित रूप से अमेरिकन साम्राज्यवाद को जबरदस्त धक्का लगेगा अमेरिका द्वारा अघोषित रूप से शासित ईराक पाकिस्तान भी ईरान के साथ खड़े होंगे
चीन ने खुले आम घोषणा कर रखी है कि वह ईरान की मदद करेगा वहीँ भारत भी ईरान को छोड़ना नहीं चाहता है। अमेरिकी प्रयासों के बाद भी भारत ने तेल लेना बंद नहीं किया है और भारत अपने संबंधों को ईरान से ख़त्म नहीं करना चाहता है। ऐसी स्तिथियों में अगर अमेरिकी साम्राज्यवादी व उसके पिट्ठू मुल्क ईरान की तरफ अगर आँखें भी तरेरते हैं तो एशिया की बहुसंख्यक जनता व सरकारें अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देंगी। जिस तरह से अमेरिकन्स आज भी वियतनाम की मार को भूल नहीं पाए हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

भारत को युद्ध क्षेत्र मत बनाओ

प्रधानमंत्री आवास के पास इजराइली दूतावास की कार में विस्फोट के बाद इजराइल ने विस्फोट के पीछे ईरान का हाथ बताया है यह बात कहीं से समझ में आने वाली नहीं है ईरान और भारत के अच्छे सम्बन्ध है भारत अपने पेट्रोलियम पदार्थों की पूर्ती ईरान से लेकर करता है जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर आधारित हैं अमेरिकी इजराइली गठजोड़ काफी समय से ईरान के ऊपर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा रहा है और अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर भी दबाव डाल रहा है कि वह ईरान से अपने हितों को त्याग कर सम्बन्ध विच्छेद कर ले उसी कड़ी का एक षड्यंत्र कार बम विस्फोट भी हो सकता है भारत को इन देशों की हरकतों के ऊपर गंभीर रूप से नजर रखने की जरूरत है काफी दिनों से आर्थिक रूप से विश्व मानचित्र पर उभर रहे भारत को पिछाड़ने के लिये चाइना युद्ध की बात पश्चिमी मीडिया द्वारा व्यापक स्तर पर प्रचारित की जाती रही है हमारे देश को ऐसी घ्रणित चालों से होशियार रहने की जरूरत है
ईरान का कहना कि -
ज़ायोनी शासन के अधिकारियों ने सोमवार को नई दिल्ली और तिबलिसी में संदिग्ध आतंकवादी घटना में ईरान का हाथ होने की बात कही है। भारतीय अधिकारियों के अनुसार नई दिल्ली में सोमवार को इस संदिग्ध आतंकवादी घटना में इस्राइली दूतावास की एक इनोवा कार के पीछे एक मैग्नेटिक बम चिपका कर धमाका किया गया जिसमें भारत में इस्राइली कूटनैतिक की पत्नी तथा कार चालक घायल हो गये।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रामीन मेहमान परस्त ने इस आरोप का खंडन करते हुए उल्लेख किया है कि इस्राइल इन घटनाओं में ईरान पर आरोप लगाकर अवैध अधिक्रत फ़िलिस्तीन में अपने अत्याचारों तथा इसी प्रकार ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या के संदर्भ में विश्व समुदाय का ध्यान भटकाना चाहता है।
इसी प्रकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि संभवतः ईरान की छवि ख़राब करने के उद्देश्य से इस्राइल ने इस संदिग्ध घटना का षडयंत्र रचा हो।
जासूसी संस्था मूसाद जिस शैली को ईरान के परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में प्रयोग करती रही है उसी शैली का नई दिल्ली की आतंकवादी घटना में भी प्रयोग किया गया है।
कुछ दिन पहले ब्रिटेन की साप्ताहिक पत्रिका टेलीग्राफ़ ने ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में मूसाद की भूमिका के संदर्भ में विवरण देते हुए लिखा था कि एक गोपनीय बैठक में मूसाद के पूर्व प्रमुख ने आतंकी गुट केदून को ईरानी परमाणु वैज्ञानिको की हत्या के आदेश दिये थे।
ज़ायोनी शासन के एजेंट अब तक अनेक आतंकवादी घटनाएं अंजाम दे चुके हैं, सन् 1995 में मालटा द्वीप में फ़िलिस्तीन के इस्लामी जेहाद आंदोलन के संस्थापक फ़तही शक़ाक़ी तथा संयुक्त अरब इमारात में फ़िलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोधक आंदोलन हमास के वरिष्ठ कमांडर की हत्या इस शासन द्वारा अंजाम दी गयी आतंकवादी घटनाओं के कुछ उदाहरण हैं।
निःसंदेह ज़ायोनी शासन कि जो स्वंय आतंकवाद की पैदावार है संदिग्ध आतंकवादी घटनाओ के बारे में निराधार दावे करके अपनी अत्याचारपूर्ण नीतियों पर पर्दा नहीं डाल सकता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

झूठों का सौदागर ओबामा



अमरीकी
राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने बयानबाजी के बाद हिटलर के प्रचार मंत्री गोविल्स को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा था कि ईराक से अमरीकी सेनायें पूरी तरह से वापस हो जाएँगी जबकि असलियत यह है कि बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में २० ००० अमरीकी तैनात हैं अगर उनके सादे कपड़ों के नीचे देखा जाये तो वह सभी अमेरिकी सैनिक अधिकारी हैं। अमरीका हमेशा स्वतंत्र मुल्कों को गुलाम बनाने का आदि रहा है और अपनी रणनीति के तहत ईराक को गुलाम बनाया है लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे। ईरान ने उसके ड्रोन को अपने कब्जे में ले लिया है और बराबरी के साथ धमका भी रहा है यदि अमेरिका ने हमला किया तो ईराक के प्रधानमंत्री नूरी मलेकी जो ईरान के साथ अपने संबंधो को प्रगाढ़ बना रहे हैं वह ईरान के साथ खड़े हुए नजर आ सकते हैं। यह अमरीका की मुख्य चिंता है इसीलिए अमरीका अपनी फौजों को सादी वर्दी में तैनात कर रहा है।
पाकिस्तान में 28 सैनिकों की हत्या नाटो सेनाओं द्वारा किये जाने के बाद वहां की सरकार ने शम्स हवाई अड्डे को खाली करा लिया है। अफगानिस्तान में लड़ रही नाटो सेनाओं के खाद्य व अन्य जरूरत की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में वाल स्ट्रीट आन्दोलन के गति पकड़ने के कारण पूर्वी तटों पर स्थित बंदरगाहों पर काम बंद है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी मंदी के चपेट में है इसलिए अमरीका के पास झूठ की सौदागरी के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। अगर ईरान पर हमला करने की स्तिथि में अमेरिकी होते तो उनका स्वर दूसरा होता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

अमेरिका एशिया को गुलाम बनाने की ओर अग्रसर

ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुक्ति के बाद एशियाई मुल्कों को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने पूरी तरीके से अपनी मुट्ठी में लेने के लिये और लोकतंत्र के बहाने उसने कई मुल्कों में अपने पिट्ठू शासक नियुक्त कर लिये हैं अफगानिस्तान से लीबिया (अफ्रीकी मुल्क) तक उसके पिट्ठू शासक ही राज कर रहे हैं सीरिया में लोकतंत्र के बहाने अमेरिकी साम्राज्यवाद अपना पिट्ठू शासक नियुक्त करने की दिशा में अग्रसर है विशेष बात यह भी है कि जो मुल्क ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अधीन नहीं भी रहे हैं उनको भी अमेरिकी साम्राज्यवाद ने अपने खेमे में कर लिया है

ईरान में ब्रिटीश दूतावास पर ईरानी जनता के द्वारा किये गए प्रदर्शन और तोड़फोड़ के बाद ईरान के खिलाफ अमेरिकी मीडिया के माध्यम से पूरी दुनिया में दुष्प्रचार कार्य तेजी पर हैं। ईरान ने अमेरिकी जासूसी विमान को मार गिराने का दवा किया है। अमेरिकी व उसके मित्र देश ईरान की जासूसी कर रहे हैं और उसके आन्तरिक मामलों में हस्ताक्षेप कर वहां की सरकार को नेस्तनाबूत करना चाहते हैं।वहीँ, ईरान पर कब्ज़ा करने के लिये पाकिस्तान का भी समर्थन चाहिए इसके लिये वह शासकों को मानाने में लगा हुआ है। चीन की आर्थिक ताकत को नष्ट करने के लिये अमेरिकी मीडिया की कोशिश है कि वह भारत और चीन को आपस में लड़ा कर दोनों देशों की ताकत को नष्ट कर दे।जिस गति से अमेरिका व नाटो सेनायें एशियाई मुल्कों में अपने पिट्ठू शासक नियुक्त कर रही है उससे लगता है कि शीघ्र ही एशिया अमेरिकी साम्राज्यवादियों की प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से उपनिवेश होगी।
सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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