शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी

मैंने कुछ दिन पहिले एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘‘अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी’’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अभी हाल की यात्रा के संदर्भ में मैं यह बताना चाहूंगा कि आखिर मैंने यह शीर्षक ही क्यों दिया था? क्या मोदी जी की सफल यात्रा के बावजूद यह तर्क अभी भी प्रासंगिक है? अमरीका की दोस्ती व दुश्मनी दोनों खतरों से भरपूर है।
सबसे पहले स्वयं मोदी के प्रति अमरीकी रवैये को लें। 2002 के गुजरात में हुये दंगे के बाद अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद वे जैसे ही प्रधानमंत्री बने उन्हें न सिर्फ अमरीका में आने की इजाजत दी गई वरन् उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। क्या प्रधानमंत्री बनते ही वे सब कारण लुप्त हो गये जिनके चलते मोदी का अमरीकी प्रवेश वर्जित कर दिया गया था?
मुझे याद है कि एक समय ऐसा था जब दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का सारी दुनिया में बहिष्कार होता था। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने सभी राष्ट्रों से बहिष्कार का आव्हान करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। जब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने वहां के मूल निवासियों पर ज्यादतियां करना बंद नहीं कर दिया और अंततः उनके ही हाथों में सत्ता नहीं सौंप दी गई तब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का बहिष्कार जारी रहा।
इस तरह यह पूछा जा सकता है कि क्या मोदी जी को जिन कारणों से वीजा नहीं दिया गया था, क्या वे समाप्त हो गए थे? यदि मोदी का बहिष्कार किसी सिद्धांत पर आधारित था तो अमरीका को उस पर कायम रहना चाहिए था। ज्योंही मोदी प्रधानमंत्री बने अमरीका का रवैया पूरी तरह से बदल गया।
सच पूछा जाये तो अमरीकी रवैये में परिवर्तन का संकेत उस समय से ही मिलने लगा था जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था और इस बात कि संभावना नजर आने लगी थी कि भारत के अगले प्रधानमंत्री मोदी ही बनेंगे। यदि बारीकी से देखा जाये तो अमरीका का परिवर्तित दृष्टिकोण किसी सिद्धांत नहीं बल्कि अपने खुद के निहित स्वार्थों पर आधारित है। भारत अब एक विशाल बाजार हो गया है। जिस देश के 80 करोड़ निवासियों के पास मोबाइल आ चुके हैं या आने वाले हैं उस देश से कौन व्यापार नहीं करना चाहेगा।
हमारे देश ने बिजली के उत्पादन के लिए अणुशक्ति के कारखाने बनाने का फैसला किया है। इस तथ्य के बावजूद कि जर्मनी, जापान और कुछ हद तक अमरीका स्वयं ने अणुशक्ति आधारित बिजली के उत्पादन के खतरों को महसूस किया है। जापान और जर्मनी ने तो अगले 20 सालों तक के लिए इस तरह के कारखानों को बंद कर दिया है। अब ये कारखाने बेकार पड़े हैं। इसलिए इन कारखानों को दूसरे देशों को बेचना है। भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां इन बंद पड़े कारखानों को खरीदने की अपार संभावनायें हैं। इसलिए जापान ने भी नरेन्द्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह एक वास्तविकता है कि देशों के पारस्परिक संबंध राजनैतिक कारणों से ज्यादा, आर्थिक कारणों से संचालित होते हैं।
हम यहां पर अब हमारे देश के प्रति अमरीकी रवैये के इतिहास पर जाना चाहेंगे। हम 1947 में आजाद हुये। इस बात में संदेह नहीं कि अमरीका ने हमें आजाद होने में सहायता की थी और समय-समय पर ब्रिटेन के ऊपर हमें आजाद करने के लिए दबाव बनाया था। परंतु ज्योंही हम आजाद हुये हमारे साथ अमरीका ने लगभग सौतेला व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया। आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू ने अणुशक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर देना प्रारंभ कर दिया था। इसकी संभावना का पता लगाने के लिए नेहरू जी ने हमारे देश के महान अणु वैज्ञानिक डाक्टर भाभा को अमरीका भेजा था। अमरीका में जब डाक्टर भाभा ने इस मुद्दे पर संबंधित लोगों से विचार विमर्श करना प्रारंभ किया तो उनको यह कहकर लगभग अपमानित किया गया कि अणुशक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग आपके बस में नहीं है। आप तो खेती करो और प्रगति के बाकी सोपानों को हमारे ऊपर छोड़ दो। अमरीका के इस रवैये से डाक्टर भाभा इतने दुःखी हुये कि बताया जाता है कि उनकी आंखों में आंसू आ गये।
उसके बाद अमरीका ने न तो हमारे देश के औद्योगिक विकास में मदद की और ना ही हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायता की। लगातार अमरीका ने पड़ौसी देश पाकिस्तान को हमारे विरूद्ध भड़काया और पाकिस्तान को लगातार हथियारों की सहायता देते रहे। अमरीकी सहयोग के कारण ही पाकिस्तान ने 1965 में हमसे युद्ध किया। इस दरम्यान दुनिया में समाजवादी खेमा बहुत मजबूत हो गया था। सोवियत संघ को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश माना जाता था। सोवियत संघ ने भारतवर्ष समेत दुनिया के उन तमाम राष्ट्रों को खुले दिल से सहायता दी जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विभिन्न साम्राज्यों के चंगुल से आजाद हुये थे। इनमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देश शामिल थे। सोवियत संघ ने हमें सबसे पहला इस्पात का कारखाना दिया जो उस समय के मध्यप्रदेश के भिलाई नामक एक गांव में स्थापित किया गया। रक्षा, तेल का शोधन, दवाईयों का उत्पादन, ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसमें सोवियत संघ ने हमारी मदद न की हो।
अमरीका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश माना जाता है। परंतु दुःख की बात है कि अमरीका ने दुनिया के नव आजाद देशों में लोकतंत्र व्यवस्था मजबूत करने में कतई सहायता नहीं की। उसने एक के बाद एक एशिया और अफ्रीका के देशों पर तानाशाहों को लादा। इन देशों के लोकप्रिय नेताओं को अमरीका ने या तो कमजोर किया या उनकी हत्या करवा दी। इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि अफ्रीका के अत्यधिक लोकप्रिय नेता पेट्रिस लुम्मबा की हत्या अमरीका ने करवायी थी और उसके बाद वर्षों तक कांगो का शासन एक अत्यधिक यातताई तानाशाह के हाथों में सौंप दिया। अपनी विभिन्न नीतियों के सहारे मिश्र में नासर को कमजोर किया, इण्डोनेशिया में सुकर्णो की सत्ता में सेंध लगाई, पाकिस्तान में भी प्रजातंत्र को मजबूत नहीं होने दिया। वहां भी प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की हत्या हुई। फिर सैनिक शासक फील्ड मार्शल अय्यूब को 10 साल तक समर्थन दिया। पाकिस्तान में भी एक के बाद एक लोकप्रिय नेताओं की हत्यायें हुईं। अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित हो गया था, जिसके चलते वहां के निवासियों को अनेक भौतिक सुविधाओं प्राप्त हुईं थीं, महिलाओं को आजादी मिली थी, स्कूलों और अस्पतालों में तमाम प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हो गईं थीं। चूंकि अफगानिस्तान सोवियत संघ के पड़ौस में था इसलिये उस देश की प्रगतिशील सरकार का तख्ता उलटने के लिए अनेक प्रकार के षडयंत्र किये गये और तालिबान की नींव डाली गई। अमरीका की पूर्व विदेश मंत्री हैलेरी क्लींटन ने स्वयं स्वीकार किया है कि हमने अफगानिस्तान में तालिबान को बढ़ावा दिया था। तालिबानों की ताकत बढ़ने से अफगानिस्तान नरक बन गया। तालिबानियों ने महिलाओं का घर से निकलना भी
प्रतिबंधित कर दिया। उन्हंे अस्पतालों, स्कूलों में भी काम नहीं करने दिया गया और उनसे कहा गया कि यदि वह बाहर निकलें तो सिवा उनके पैरों के अलावा शरीर का और कोई भी अंग नहीं दिखना चाहिए। अनेक वर्षों से वहां तबाही मची हुई है। दिन-रात आतंकवादी वहां निर्दोषों को मारते हैं।
लगभग यही हाल ईराक में भी है। अमरीका ने ईरान पर हमला करने के लिए सद्दाम हुसैन की सहायता ली। उन्हें हथियार दिये, डाॅलर दिये और 10 वर्षों तक ईरान से लड़वाया। जब सद्दाम हुसैन आत्मनिर्भर बन गये और अमरीका का पिछलग्गू बनने से उन्होंने इंकार कर दिया तो उनके खिलाफ ईराक में विद्रोह करवाया और बाद में झूठे आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा दी गई। आज उसी ईराक में जो हालत है वह अराजकता से भी बदतर है।
अनुभव बताते हैं कि अमरीका की नीति है ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’। देखना यह है कि मोदी और मोदी सरकार के साथ भविष्य में उनका रवैया कैसा रहता है। इस समय अमरीका की कोशिश है कि भारत को पूरी तरह से इजरायल की गोदी में बैठा दिया जाये और सारे अरब देशों से हमारे संबंधों में कड़वाहट पैदा करवा दी जाये। हमारी विदेशनीति की परंपरा के अनुसार वर्षों से हमने फिलीस्तीन का साथ दिया है। अमरीका हमें इस तरह पूरे अरब और मध्य पूर्व देशों से अलग-थलग करना चाहता है। लगता है ऐसा करवाने में मोदी पूरी तरह तैयार हैं। दीर्घकाल में इससे हमारा कितना लाभ होगा यह एक सोचने की बात है।
-एल.एस. हरदेनिया

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