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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मानव जाति का हत्यारा टोनी ब्लेयर

भारत की जनता पर ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर इंग्लैंड सरकार ने जो अत्याचार किये थे. वह मानवजाति के लिए कलंक है और उसमें नर पिशाचों की आश्चर्यजनक भूमिका दिखाई देती है. दुनिया में अपने को उच्च समझने वाले यूरोपीय लोगों ने मानव जाति के ऊपर कैसे-कैसे अत्याचार किये. 
                ईराक में सद्दाम हुसैन को फांसी व जनता का नरसंहार इंग्लैंड, अमेरिका और उसकें दोस्त देशों ने किया और 6 लाख से अधिक लोगों को मार डाला था लेकिन जब चिलकॉट जांच समिति की रिपोर्ट आई है तो जिन आधारों के ऊपर ईराक में नरसंहार किया था. वह सब गलत पाए गए. आज भी लाखों विधवाएं बेसहारा हैं.
 इराक़ युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले की जांच के लिए गठित चिलकॉट जांच समिति अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने सद्दाम हुसैन की तरफ से दिख रहे ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और अप्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध में भेजा दिया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले का एक कारण यह बताया गया कि इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के अस्त्र है, जिनके चलते वह बड़ा खतरा पैदा कर सकते है लेकिन यह अनुमान पूरी तरह अतिरंजित था।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद टोनी ब्लेयर के खिलाफ इंग्लैंड में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं तो वहीँ ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 2003 के इराक़ युद्ध में मारे गए लोगों के परिवार से माफी मांगी है हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि वो परिवार उन्हें न कभी भूलेंगे और न माफ़ करेंगे. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि खुफिया सूचनाएं ग़लत थीं और युद्ध के बाद की योजना खराब थी. इसी के बाद से दुनिया के अन्दर आतंकवाद की एक लहर आई जिसने भी इंसानी खून को बहा रहे हैं  लेकिन इसकी शुरुवात अमेरिकी साम्राज्यवाद ने शुरू की थी और पूरी दुनिया में आतंकवादी और नर पिशाच की भूमिका में पहले इंग्लैंड और अब अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के चेहरे दिखाई देते हैं.इन देशों की खुशहाली का राज  मानव रक्त की नदियाँ बहा देने में छिपा हुआ है. साम्राज्यवाद का असली चेहरा एक खूनो दैत्य का चेहरा होता है जो पूरी दुनिया के अन्दर मानव जाति का रक्त पीने के लिए हमेशा लालायित रहता है और आज भी साम्राज्यवाद मानव रक्त को बहाकर मुनाफे को बढ़ा रहा है. दुनिया में आतंकवाद समाप्त करने के लिए ईराक युद्ध व सद्दाम हुसैन की फांसी के जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों को  पकड़ कर युद्ध अपराधी की तरह मुकदमा चला कर सजा-ए-मौत देनी चाहिए जिससे दुनिया के अन्दर शांति कायम हो सके नहीं तो विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष जो हथियार सौदागरों के एजेंट की भूमिका में हैं वह अपने हतियारों का प्रदर्शन करने के लिए इसी तरह नरसंहार करते रहेंगे और उसके प्रतिशोध में आतंकवाद जारी रहेगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी

मैंने कुछ दिन पहिले एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘‘अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी’’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अभी हाल की यात्रा के संदर्भ में मैं यह बताना चाहूंगा कि आखिर मैंने यह शीर्षक ही क्यों दिया था? क्या मोदी जी की सफल यात्रा के बावजूद यह तर्क अभी भी प्रासंगिक है? अमरीका की दोस्ती व दुश्मनी दोनों खतरों से भरपूर है।
सबसे पहले स्वयं मोदी के प्रति अमरीकी रवैये को लें। 2002 के गुजरात में हुये दंगे के बाद अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद वे जैसे ही प्रधानमंत्री बने उन्हें न सिर्फ अमरीका में आने की इजाजत दी गई वरन् उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। क्या प्रधानमंत्री बनते ही वे सब कारण लुप्त हो गये जिनके चलते मोदी का अमरीकी प्रवेश वर्जित कर दिया गया था?
मुझे याद है कि एक समय ऐसा था जब दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का सारी दुनिया में बहिष्कार होता था। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने सभी राष्ट्रों से बहिष्कार का आव्हान करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। जब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने वहां के मूल निवासियों पर ज्यादतियां करना बंद नहीं कर दिया और अंततः उनके ही हाथों में सत्ता नहीं सौंप दी गई तब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का बहिष्कार जारी रहा।
इस तरह यह पूछा जा सकता है कि क्या मोदी जी को जिन कारणों से वीजा नहीं दिया गया था, क्या वे समाप्त हो गए थे? यदि मोदी का बहिष्कार किसी सिद्धांत पर आधारित था तो अमरीका को उस पर कायम रहना चाहिए था। ज्योंही मोदी प्रधानमंत्री बने अमरीका का रवैया पूरी तरह से बदल गया।
सच पूछा जाये तो अमरीकी रवैये में परिवर्तन का संकेत उस समय से ही मिलने लगा था जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था और इस बात कि संभावना नजर आने लगी थी कि भारत के अगले प्रधानमंत्री मोदी ही बनेंगे। यदि बारीकी से देखा जाये तो अमरीका का परिवर्तित दृष्टिकोण किसी सिद्धांत नहीं बल्कि अपने खुद के निहित स्वार्थों पर आधारित है। भारत अब एक विशाल बाजार हो गया है। जिस देश के 80 करोड़ निवासियों के पास मोबाइल आ चुके हैं या आने वाले हैं उस देश से कौन व्यापार नहीं करना चाहेगा।
हमारे देश ने बिजली के उत्पादन के लिए अणुशक्ति के कारखाने बनाने का फैसला किया है। इस तथ्य के बावजूद कि जर्मनी, जापान और कुछ हद तक अमरीका स्वयं ने अणुशक्ति आधारित बिजली के उत्पादन के खतरों को महसूस किया है। जापान और जर्मनी ने तो अगले 20 सालों तक के लिए इस तरह के कारखानों को बंद कर दिया है। अब ये कारखाने बेकार पड़े हैं। इसलिए इन कारखानों को दूसरे देशों को बेचना है। भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां इन बंद पड़े कारखानों को खरीदने की अपार संभावनायें हैं। इसलिए जापान ने भी नरेन्द्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह एक वास्तविकता है कि देशों के पारस्परिक संबंध राजनैतिक कारणों से ज्यादा, आर्थिक कारणों से संचालित होते हैं।
हम यहां पर अब हमारे देश के प्रति अमरीकी रवैये के इतिहास पर जाना चाहेंगे। हम 1947 में आजाद हुये। इस बात में संदेह नहीं कि अमरीका ने हमें आजाद होने में सहायता की थी और समय-समय पर ब्रिटेन के ऊपर हमें आजाद करने के लिए दबाव बनाया था। परंतु ज्योंही हम आजाद हुये हमारे साथ अमरीका ने लगभग सौतेला व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया। आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू ने अणुशक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर देना प्रारंभ कर दिया था। इसकी संभावना का पता लगाने के लिए नेहरू जी ने हमारे देश के महान अणु वैज्ञानिक डाक्टर भाभा को अमरीका भेजा था। अमरीका में जब डाक्टर भाभा ने इस मुद्दे पर संबंधित लोगों से विचार विमर्श करना प्रारंभ किया तो उनको यह कहकर लगभग अपमानित किया गया कि अणुशक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग आपके बस में नहीं है। आप तो खेती करो और प्रगति के बाकी सोपानों को हमारे ऊपर छोड़ दो। अमरीका के इस रवैये से डाक्टर भाभा इतने दुःखी हुये कि बताया जाता है कि उनकी आंखों में आंसू आ गये।
उसके बाद अमरीका ने न तो हमारे देश के औद्योगिक विकास में मदद की और ना ही हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायता की। लगातार अमरीका ने पड़ौसी देश पाकिस्तान को हमारे विरूद्ध भड़काया और पाकिस्तान को लगातार हथियारों की सहायता देते रहे। अमरीकी सहयोग के कारण ही पाकिस्तान ने 1965 में हमसे युद्ध किया। इस दरम्यान दुनिया में समाजवादी खेमा बहुत मजबूत हो गया था। सोवियत संघ को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश माना जाता था। सोवियत संघ ने भारतवर्ष समेत दुनिया के उन तमाम राष्ट्रों को खुले दिल से सहायता दी जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विभिन्न साम्राज्यों के चंगुल से आजाद हुये थे। इनमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देश शामिल थे। सोवियत संघ ने हमें सबसे पहला इस्पात का कारखाना दिया जो उस समय के मध्यप्रदेश के भिलाई नामक एक गांव में स्थापित किया गया। रक्षा, तेल का शोधन, दवाईयों का उत्पादन, ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसमें सोवियत संघ ने हमारी मदद न की हो।
अमरीका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश माना जाता है। परंतु दुःख की बात है कि अमरीका ने दुनिया के नव आजाद देशों में लोकतंत्र व्यवस्था मजबूत करने में कतई सहायता नहीं की। उसने एक के बाद एक एशिया और अफ्रीका के देशों पर तानाशाहों को लादा। इन देशों के लोकप्रिय नेताओं को अमरीका ने या तो कमजोर किया या उनकी हत्या करवा दी। इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि अफ्रीका के अत्यधिक लोकप्रिय नेता पेट्रिस लुम्मबा की हत्या अमरीका ने करवायी थी और उसके बाद वर्षों तक कांगो का शासन एक अत्यधिक यातताई तानाशाह के हाथों में सौंप दिया। अपनी विभिन्न नीतियों के सहारे मिश्र में नासर को कमजोर किया, इण्डोनेशिया में सुकर्णो की सत्ता में सेंध लगाई, पाकिस्तान में भी प्रजातंत्र को मजबूत नहीं होने दिया। वहां भी प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की हत्या हुई। फिर सैनिक शासक फील्ड मार्शल अय्यूब को 10 साल तक समर्थन दिया। पाकिस्तान में भी एक के बाद एक लोकप्रिय नेताओं की हत्यायें हुईं। अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित हो गया था, जिसके चलते वहां के निवासियों को अनेक भौतिक सुविधाओं प्राप्त हुईं थीं, महिलाओं को आजादी मिली थी, स्कूलों और अस्पतालों में तमाम प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हो गईं थीं। चूंकि अफगानिस्तान सोवियत संघ के पड़ौस में था इसलिये उस देश की प्रगतिशील सरकार का तख्ता उलटने के लिए अनेक प्रकार के षडयंत्र किये गये और तालिबान की नींव डाली गई। अमरीका की पूर्व विदेश मंत्री हैलेरी क्लींटन ने स्वयं स्वीकार किया है कि हमने अफगानिस्तान में तालिबान को बढ़ावा दिया था। तालिबानों की ताकत बढ़ने से अफगानिस्तान नरक बन गया। तालिबानियों ने महिलाओं का घर से निकलना भी
प्रतिबंधित कर दिया। उन्हंे अस्पतालों, स्कूलों में भी काम नहीं करने दिया गया और उनसे कहा गया कि यदि वह बाहर निकलें तो सिवा उनके पैरों के अलावा शरीर का और कोई भी अंग नहीं दिखना चाहिए। अनेक वर्षों से वहां तबाही मची हुई है। दिन-रात आतंकवादी वहां निर्दोषों को मारते हैं।
लगभग यही हाल ईराक में भी है। अमरीका ने ईरान पर हमला करने के लिए सद्दाम हुसैन की सहायता ली। उन्हें हथियार दिये, डाॅलर दिये और 10 वर्षों तक ईरान से लड़वाया। जब सद्दाम हुसैन आत्मनिर्भर बन गये और अमरीका का पिछलग्गू बनने से उन्होंने इंकार कर दिया तो उनके खिलाफ ईराक में विद्रोह करवाया और बाद में झूठे आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा दी गई। आज उसी ईराक में जो हालत है वह अराजकता से भी बदतर है।
अनुभव बताते हैं कि अमरीका की नीति है ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’। देखना यह है कि मोदी और मोदी सरकार के साथ भविष्य में उनका रवैया कैसा रहता है। इस समय अमरीका की कोशिश है कि भारत को पूरी तरह से इजरायल की गोदी में बैठा दिया जाये और सारे अरब देशों से हमारे संबंधों में कड़वाहट पैदा करवा दी जाये। हमारी विदेशनीति की परंपरा के अनुसार वर्षों से हमने फिलीस्तीन का साथ दिया है। अमरीका हमें इस तरह पूरे अरब और मध्य पूर्व देशों से अलग-थलग करना चाहता है। लगता है ऐसा करवाने में मोदी पूरी तरह तैयार हैं। दीर्घकाल में इससे हमारा कितना लाभ होगा यह एक सोचने की बात है।
-एल.एस. हरदेनिया

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

झूठों का सौदागर ओबामा



अमरीकी
राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने बयानबाजी के बाद हिटलर के प्रचार मंत्री गोविल्स को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा था कि ईराक से अमरीकी सेनायें पूरी तरह से वापस हो जाएँगी जबकि असलियत यह है कि बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में २० ००० अमरीकी तैनात हैं अगर उनके सादे कपड़ों के नीचे देखा जाये तो वह सभी अमेरिकी सैनिक अधिकारी हैं। अमरीका हमेशा स्वतंत्र मुल्कों को गुलाम बनाने का आदि रहा है और अपनी रणनीति के तहत ईराक को गुलाम बनाया है लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे। ईरान ने उसके ड्रोन को अपने कब्जे में ले लिया है और बराबरी के साथ धमका भी रहा है यदि अमेरिका ने हमला किया तो ईराक के प्रधानमंत्री नूरी मलेकी जो ईरान के साथ अपने संबंधो को प्रगाढ़ बना रहे हैं वह ईरान के साथ खड़े हुए नजर आ सकते हैं। यह अमरीका की मुख्य चिंता है इसीलिए अमरीका अपनी फौजों को सादी वर्दी में तैनात कर रहा है।
पाकिस्तान में 28 सैनिकों की हत्या नाटो सेनाओं द्वारा किये जाने के बाद वहां की सरकार ने शम्स हवाई अड्डे को खाली करा लिया है। अफगानिस्तान में लड़ रही नाटो सेनाओं के खाद्य व अन्य जरूरत की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में वाल स्ट्रीट आन्दोलन के गति पकड़ने के कारण पूर्वी तटों पर स्थित बंदरगाहों पर काम बंद है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी मंदी के चपेट में है इसलिए अमरीका के पास झूठ की सौदागरी के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। अगर ईरान पर हमला करने की स्तिथि में अमेरिकी होते तो उनका स्वर दूसरा होता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 26 जून 2011

संयुक्त राष्ट्र की राजनीति: अमरीकी साम्राज्यवाद का खेल

इराक के बाद लीबिया
सुरक्षा परिषद ने एक ओर तो बहरीन में विदेशी सेनाओं के प्रवेश को अनदेखा किया परन्तु दूसरी ओर लीबिया में उसके तेल भण्डार पर कब्जे़ हेतु अरबलीग के इशारे से नो फ्लाई मिलिट्री जोन लागू किया।
इस बार लीबिया में वही सब हो रहा है जो प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद के वर्षों में इराक में घटित हुआ था। याद होगा कि इराक पर जो हमला और कब्जा किया गया उसका मुख्य उद्देश्य वहाँ के तेल स्रोतों पर कब्जा जमाना तथा वहाँ के बजट एवं तेल की आमदनी को हाथ में लेना था। यह इसलिए कि बड़ी आर्थिक शक्तियों को अपनी गिरती हुई आर्थिक स्थिति को सँभालना था। इस हेतु उन्हें रूस एवं चीन के सहारे आगे बढ़ना था ताकि इराकी जनता के प्रतिरोध का मुकाबला उन पर सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव द्वारा प्रतिबंध लगा कर, किया जाय। लीबिया में अब संयुक्त राष्ट्र ने ‘नो फ्लाई जोन’ तथा अन्य प्रतिबंधों को अपने प्रस्ताव द्वारा लागू कर दिया है, जो एक बड़ा तेल उत्पादक देश है।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि सुरक्षा परिषद के एक भी स्थाई सदस्य ने ‘वीटो’ का प्रयोग नहीं किया। रूस एवं चीन द्वारा वोट का बहिष्कार तथा वीटो के
अधिकार का प्रयोग न करने का अर्थ तो यही निकला कि उन्होंने प्रस्ताव का समर्थन किया। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ये शक्तियाँ लीबिया में वही सब हरकते करेंगी जो वह इराक में कर चुकी हैं। नागरिकों एवं सभी जमीनी जीवों आदि पर बम वर्षा, यहाँ तक की लीबिया के उन सच्चे राजनैतिक आन्दोलन कर्ताओं पर भी जो किसी कठपुतली सरकार को लाने का विरोध कर सकते थे। संसार एक नए प्रकार का उपनिवेशवाद देख रहा है- एक ऐसा सार्वभौमिक नेटवर्क जो अपने आर्थिक एवं भौगोलिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु आर्थिक एवं कार्पोरेट शक्तियों के साथ-साथ नाटो एवं सुरक्षा परिषद के गठजोड़ का प्रयोग करता है।
इस प्रस्ताव का प्रभाव दूर तक जाता है। लीबिया में एक राजनैतिक आन्दोलन चल रहा है जो लीबिया के तेल पर बाहरी शक्तियों के कब्जे का विरोध करताहै तथा कर्नल गद्दाफी का भी विरोधी है, उन्हें भी अलग-थलग करने की रणनीति है। अब यह देखिए कि जिसे चतुराई से ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ घोषित किया गया वहाँ नाटो के सैनिक विमान बराबर उड़ रहे हैं, क्योंकि ‘प्रस्ताव’ वहाँ बाहरी शक्तियों को सैनिक कार्यवाही की स्वीकृति देता है।
सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव का उद्देश्य निश्चित रूप से यह नहीं है कि कर्नल गद्दाफी के वास्तविक या कथित अत्याचारों पर रोक लगाई जाए या यह कि वहाँ की आन्तिरिक अशान्ति का मामला सैनिक कार्यवाही द्वारा हल किया जाय। वास्तविकता यह है कि ये शक्तियाँ स्वयं अपनी आंतरिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक अशान्ति एवं समस्याआंे से बचने के लिए ऐसा करती हैं, जैसा कि उन्होंने इराक में किया था। वे इस प्रस्ताव की सहायता से लीबिया के तेल भण्डारों पर पूर्ण नियंत्रण एवं कब्जा भी चाहते हैं। जो जन-आन्दोलन चल रहे हैं, उनसे उन साम्राज्यवादियों को खतरा है जो अरब के पैसों से मौज उड़ा रहे हैं। वहाँ की कामकाजी जनता को जीविकोर्पाजन एवं सुरक्षा से वंचित कर दिया गया है अतः उनकी अशान्ति ने वहाँ के बादशाहों की नींद हराम कर दी है तथा उनके बाहरी समर्थकों के तेल के फायदे को भी नुकसान पहुँचाया है जो अभी तक शेखों के शोषण सिस्टम को समर्थन देते रहे हैं।
वित्तीय एवं कार्पोरेट जगत नाटो तथा रूस एवं चीन के साथ मिलकर ‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’ को इसलिए लागू कर रहे हैं कि लीबिया में ऐसा कोई विकल्प न निकले जो इन सबके स्वार्थ के विपरीत हो। यह एक राजनैतिक तथ्य है कि सभी अरब देशों में तेल का अथाह पैसा है, फिर भी उन्होंने उसको अपनी जनता के कल्याण के लिए खर्च नहीं किया। दूसरी ओर अरब लीग के सदस्य होते हुए भी कई देशों ने इसराईल से संबंध स्थापित कर लिए।
वहाँ की जनता जो पहले नहीं जानती थी अब सुरक्षा परिषद की दोगली नीति को जान गई है। तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर अचानक सैनिक आक्रमण की भत्र्सना सुरक्षा परिषद एवं अरब लीग ने की परन्तु दूसरी ओर कपटपूर्ण ढंग से इराक में अमरीकी राजदूत ने इसे उकसाया। इसी प्रकार इराक-ईरान की युद्ध रचना इस क्षेत्र को कमजोर करने हेतु की गई। कुवैत जो कि उस क्षेत्र की उपनिवेश संरचना से पूर्व ईराक का एक हिस्सा था उस पर आक्रमण की योजना इस हेतु बनवाई गई ताकि यू0एस0-यू0के0 को उस क्षेत्र में सैनिक आक्रमण एवं कब्जे का मौका मिल जाए। इराकी जनता पर यह युद्ध जबरदस्ती थोपा गया था, यद्यपि इराक, कुवैत से हट गया था तथा युद्ध विराम हेतु प्रस्ताव दिया था, परन्तु वहाँ यूरेनियम हथियारों के छिपे होने का बहाना बनाया गया। जो लोग हथियार डालने को तैयार थे उन्हें अमानवीय तौर पर बालू में जीवित दफन कर दिया गया और उन्हें सामूहिक रूप से भी मार डाला गया। क्षेत्र में हमले के लिए कुवैत मिलिट्री बेस बना लिया गया, जहाँ से अब तक इराक पर बम वर्षा जारी है। इसी तरह लीबिया पर ‘‘उड़ान निषिद्ध क्षेत्र’’ घोषित करने का प्रयास किया जा रहा है जबकि कर्नल गद्गाफ़ी उनके पुत्र तथा इंग्लैण्ड और अमरीकी सरकारों के बीच घनिष्ठ सम्बंधों के राज़ सामने आ रहे हैं। यहाँ तक कि प्रतिष्ठित ‘लंदन स्कूल आॅफ इकोनाॅमिक्स’ अब संदेह के घेरे में है जो लीबिया से गुप्त रूप से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहा है।
इराक, उत्तरी कोरिया, ईरान तथा अन्य स्थानों पर सुरक्षा परिषद ने इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि अब इनका समर्थन कोई नही करता। यह तो दरअसल वहाँ की जनता के खिलाफ युद्ध की घोषणा है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो दुनिया में हर जगह अपने आकाओं के फायदे के लिए अपना हुक्म चलाता है, अब सऊदी अरब की सेनाओं के बहरीन मंे दाखिल हो जाने पर भत्र्सना क्यों नही करता? कि यह एक पड़ोसी देश में खुली हुई सैनिक घुसपैठ है। संयुक्त राष्ट्र संघ लगता है कि एक सार्वभौमिक माफिया है जो भौगोलिक एवं राजनैतिक सीमाओं का खयाल किए बगैर अपने विŸाीय नेटवर्क के इशारे पर काम करता है। पेट्रो-डालर की दुनिया में ऐसी सरकारें बाहरी शक्तियों के भरोसे ही जिन्दा हैं। अब ट्युनेशिया, मिस्र, और बहरीन की अरब जनता में एक उफान आ गया है तथा इनकी बदलाव की हवा अन्य देशों की ओर बढ़ रही है, परन्तु साथ ही दूसरी ओर एक रणनीति ऐसी तैयार की जा रही है कि इस उफान को रोक दिया जाए तथा इसकी दिशा को बदल दिया जाए।
इसी सुरक्षा परिषद की ओर से कोई प्रयास आज तक इस बात का नहीं किया गया कि इसराईल पर ‘नो फलाई जोन’ लागू होता तथा इराक, अफगानिस्तान पर आक्रमण करने वाली शक्तियों पर कोई कार्यवाही की जाती। यहाँ पर कर्नल गद्दाफी की सरकार के पक्ष में बात नहीं की जा रही है। वास्तविकता यह है कि कोई ऐसी नैतिक विवशता भी नहीं है कि लीबिया में सुरक्षा परिषद के नेतृत्व वाले ‘नो फ्लाई जोन’ या किसी ऐसे सैनिक घुसपैठ का समर्थन किया जाए जो अरब लीग के इशारे से हुआ। इसने तो आम जनता की कभी बात ही नहीं की, इसने क्षेत्र में हमेशा शाहों के स्वार्थ का समर्थन किया।
अरब दुनिया की जनता को ही केवल यह हक होना चाहिए कि वे अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें। ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का बहाना बनाकर सुरक्षा परिषद, नाटो या उसके संबंधी को, (अरब लीग में या कहीं भी) अपनी मनपंसद सरकार या डिक्टेटर हेतु सैनिक कार्यवाही करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। बातें नव औपनिवेशिक व्यवस्था के तौर पर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक देश से दूसरे देश में बराबर देखी जा रही है। मुख्य स्वार्थों का एक नेटवर्क है जो सुरक्षा परिषद, नाटो अरब लीग आदि के साथ मिल कर एशिया अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका की कभी एक सोसायटी पर सैनिक हवाई जहाजों या ड्रोन से पक्षियों के समान लोगों पर लक्ष्य साधकर निशाना बनाते हैं तथा अंधाधुंध बम वर्षा करके लोगों को मार डालते हैं। नाटो में जो सरकारें शामिल हैं वे युद्ध अपराधी हैं।
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर (जो अरब दुनिया के मामले में पुर्जे-पुर्जे करके हवा में उड़ा दिया गया) के अनुसार किसी देश के नागरिक ही अपनी राजनैतिक पसंद का निर्धारण करेंगे, इनमें किसी औपनिवेशिक शक्ति, बन्दूक या विदेशी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसमें कोई शंका नहीं कि तानाशाहों ने औपनिवेशिक सरकारों, उनके वित्तीय एवं कार्पोरेट स्वार्थी तत्वों से साठगाँठ करके अरब दुनिया के संसाधनों को ख्ूाब लूटा है, यह लूट अब भी जारी हैं, इस बात को ट्युनेशिया, मिस्र आदि की अरब जनता खूब जानती है। अरब जगत की कोई भी सरकार अपने नागरिकों की वफादारी का दैवीय
अधिकार प्राप्त करने का दावा कैसे कर सकती है जब कि वह अपनी जनता का शोषण कर रही है, अपने कामकाजी आमजन को बेरोजगार बनाए हुए है, वह सामाजिक तकलीफें उठा रहे हैं तथा राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें भाग लेने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। लगता है कि वहाँ कोई स्पष्ट राजनैतिक समझौता है कि सुरक्षा परिषद, नाटो या अरब लीग अथवा अन्य किसी संगठन की मदद से औपनिवेशिक सैनिक हस्तक्षेप के द्वारा अरब जनता के आन्दोलनों को अपहृत करना है तथा उनके रुख को मोड़ देना है। वास्तव में अरब भू भागों में स्थापित प्रत्येक बादशाहत को इन्हीं उपनिवेशवादियों ने ही थोपा था तथा वही उन पर अभी तक अपना आधिपत्य जमाए हुए हैं। राजनैतिक या कानूनी तौर से इस्लाम में बादशाहत या डिक्टेटर शिप की या फिरके बंदी ‘सुन्नी’ या ‘शिया’ की कोई मान्यता नहीं है। जब कि हम वहाँ धर्म के दुरुपयोग को बराबर देख रहे हैं, वे सरकारें चाहती हैं कि उन्हें आस्था की नजर से देखा जाए जबकि उन्होंने अपनी जनता को तथा दूसरे क्षेत्रों में भी लोगों को गुलाम बना रखा है तथा जाली संगठनों को विŸाीय सहायता इसलिए दे रहे हैं कि वे अपने उपनिवेशवादियों के सहयोग से दुनिया में इस्लाम की अलग ढंग से व्याख्या करें ताकि वहाँ के स्रोतों के दोहन करने का अवसर प्राप्त रहे।
भूत के समान ‘अलकायदा’ तथा इसी प्रकार के अन्य संगठन कभी दिखते हैं तथा कभी गायब हो जाते हैं, वे धार्मिक उकसाहरों से जब इशारे पाते हैं तो रणनीति के अनुसार यहाँ वहाँ मार काट व खून खराबा करते हंै।
अगर वास्तव में सुरक्षा परिषद नाटो और अरब लीग गम्भीर हैं और उन्हें लीबिया में सरकार एवं विद्रोहियों द्वारा बमबारी की चिंता है तो उन्हें पहले इन बातों पर ध्यान देना होगा कि वे कब्जा किए गए देशों- फिलिस्तीन, कांगो, इराक, अफगानिस्तान के भू भागों से अपने सैनिक वापस लें।
यूगोस्लाबिया की फेडेरल रिपब्लिक को पुनस्र्थापित करें, रवान्डा में पाल कागमे की सरकार को गद्दी से उतरने को कहें, लेबनान व सीरिया के कब्जे वाले भू भागों को खाली करवाएँ, तथा इस्राईल द्वारा कब्जे वाले क्षेत्रों को भी खाली करें। अफगानिस्तान पाकिस्तान क्षेत्र में बम वर्षा रोकें। संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंम्बली के प्रस्ताव के अनुरूप निर्धारित सीमाओं सहित फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दें तथा इस्राईल व फिलिस्तीन की राजनैतिक सीमाओं को स्पष्टतः निर्धारित करके दोनों राज्यों की स्थापना करें। सऊदी अरब से बहरीन भेजी गई सेनाओं को तुरन्त वापस बुलाएँ। हैती में दूसरे अन्य अर्जेन्ट उपायों के अतिरिक्त स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराएँ। संयुक्त राष्ट्र, नाटो एवं अरब लीग को अपने खून खराबा करवाने की आगे की छवि को दुरुस्त बनाने हेतु इससे कम की अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे दुनिया के सामने अपना स्पष्टीकरण दें। यद्यपि ये बातें ऐसी हैं जैसे कि सुईं के सूराख से हाथी का पार होना फिर भी ‘नो फलाई जोन’ के मामले में इससे कम तर कुछ भी विचार नही किया जा सकता।

-नीलोफर भागवत
अनुवादक -डॉ0 एस0एम0 हैदर

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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