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सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

अटल सरकार से मोदी सरकार आगे

अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने तीन आतंकवादियों को कंधार ले जाकर छोड़ा था वहीँ मोदी सरकार ने  11 आतंकवादियों को तालिबान को सौंप दिया और उसके बदले में तीन इंजिनियर की रिहाई कराई. अपहरण और फिरौती का उद्योग इन राष्ट्रवादी सरकारों में फल-फूल रहा है. कूटनीतिक साहस क्षमता का कहीं भी प्रदर्शन करने में ये सरकारें असफल हो रही हैं लेकिन अपने भाषणों में ये रुस्तमे विश्व हैं. इजराइल का नाम हमेशा रटने वाली यह सरकारें यह भी सबक नही ले पायीं कि कैसे आतंकियों के अपरहण उद्योग से निपटा जा सकता है. विश्व में कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिसमें आतंकियों को पकड़ा गया है या मारा गया है और अपर्हित लोगों को छुड़ाया गया है. 
 11 आतंकियों की अदला-बदली रविवार को किसी गुप्त स्थान पर हुई। छोड़े गए 11 आतंकियों में शेख अब्दुर रहीम और मौलावी अब्दुर राशिद शामिल है। दोनों क्रमश: कुनूर और निमरोज प्रांत के लिए तालिबान के गर्वनर के रूप में काम कर चुके हैं.
दोनों तरफ से रिहाई की प्रक्रिया अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी दूत जल्मे खलीलजाद और तालिबान के प्रतिनिधि मुल्ला अब्दुल गनी बरदार के बीच बैठक में हुई।  
               अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मौलाना मसूद अजहर को रिहा किया गया था. इसी शातिर आतंकी ने साल 2000 में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का गठन किया था. जिसका नाम 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले के बाद सुर्खियों में आया था. 
         दूसरा आतंकी अहमद उमर सईद शेख. इस आतंकवादी को 1994 में भारत में पश्चिमी देशों के पर्यटकों का अपहरण करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था. इसी आतंकी ने डैनियल पर्ल की हत्या की थी. अमेरिका में 9/11 के हमलों की योजना तैयार करने में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. बाद में डेनियल पर्ल के अपहरण और हत्या के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों ने उसे 2002 में गिरफ्तार कर लिया था.
           तीसरा आतंकी मुश्ताक अहमद ज़रगर. ये आतंकी रिहाई के बाद से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में उग्रवादियों को प्रशिक्षण देने में एक सक्रिय हो गया था. भारत विरोधी आतंकियों को तैयार करने में उसकी खासी भूमिका थी.
अटल सरकार में अप्रहत प्लेन अमृतसर  में रुका हुआ था लेकिन हमारे कमांडों वहां तक नहीं पहुँच पाते हैं. ऐसा बोला जाता है कि उनको विमान से एयरपोर्ट भेजना था लेकिन किसी भी विमान का इंतजाम नहीं हो पाया था. और जब वह सड़क के रास्ते गये तो वहां भरी जाम की वजह से देरी हो जाती है.  
                          भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के तत्कालीन प्रमुख ए. एस. दौलत ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक 'कश्मीर:द वाजपई ईयर्स' में भी कहा है कि भारत उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया था। दौलत ने अपनी पुस्तक में इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख नहीं किया कि उस अपहृत विमान में उनकी खुफिया एजेंसी रॉ का एक अधिकारी भी बैठा था जिसका नाम शशि भूषण सिंह तोमर था। यह अधिकारी काठमाण्डू स्थित भारतीय दूतावास में फर्स्ट सेक्रेटरी के तौर पर कार्य कर रहा था। तोमर की तत्कालीन कैबिनेट सचिव एन.के. सिंह से नजदीकी रिश्तेदारी थी।
अपहृत विमान में इतना ईंधन नहीं था कि उसे लाहौर या कंधार ले जाया जाता। इस कारण उसे अमृतसर हवाई अड्डे पर उतरना पड़ा, जहां अपहृर्ताओं ने गुरुग्राम निवासी रूपन कत्याल नामक एक यात्री को इतना घायल कर दिया कि बाद में उसकी विमान में ही मृत्यु हो गई थी। 25 वर्षीय कत्याल शादी के बाद हनीमून मनाने काठमाण्डू गया हुआ था। विमान में उसकी पत्नी रचना सहगल उसके साथ थी।
             

अमृतसर हवाई अड्डे को दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप का निर्देश था कि किसी तरह विमान को वहीं रोक कर रखा जाए पर ईंधन न भरा जाए। इस बीच हवाई अड्डे के निदेशक विजय मुलेकर के पास एक फोन आया जिसमें एक आदमी ने यह निर्देश दिया कि हवाई जहाज में ईंधन भर दिया जाए और उसे आगे उड़ान भरने दी जाए। फोन करने वाले आदमी ने अपना नाम सी. लाल बताया और कहा कि वह गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव है। विजय मुलेकर ने उसकी बात नहीं मानी और कहा कि 'मैं केवल दिल्ली स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की ही बात मानूंगा।' जांच करने पर पता चला कि वह फोन एक यूरोपीय देश से आया था। यूरोप से आए इस फोन वाली घटना का जिक्र अंग्रेजी समाचार पत्रिका 'इंडिया टुडे' के 10 जनवरी, 2000 अंक में किया गया है। इस घटना की चर्चा अंग्रेजी पुस्तक 'आईसी 814 हाइजैक्ड! द इनसाइड स्टोरी' में भी पृष्ठ संख्या 203 पर की गई है। वहां सी. लाल की जगह जे. लाल लिखा हुआ है।
                इन्डियन एयरलाइन्स  फ्लाईट 814 (VT-EDW) का अपहरण शुक्रवार, 24 दिसम्बर 1999 को  लगभग 05:30 बजे विमान के भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश के कुछ ही समय बाद कर लिया गया था। जिसको इब्राहिम अतहर, बहावलपुर, पाकिस्तान, शाहिद अख्तर सईद, कराची, पाकिस्तान, सन्नी अहमद काजी, कराची, पाकिस्तान, मिस्त्री जहूर इब्राहिम, कराची, पाकिस्तान, शकीर, सुक्कुर, पाकिस्तान ने किया था.
पाकिस्तान से हर समय मुकाबला करने वाले लोग अमेरिकी साम्राज्यवाद के भी समर्थक हैं लेकिन पाकिस्तान अमेरिकी साम्राज्यवाद का मुख्य चहेता देश है और पाकिस्तान के माध्यम से ही तालिबान का निर्माण हुआ था. दोनों घटनाओं में तालिबान शामिल था और अफगानी 11 आतंकियों को छुड़ाने में उसके मुख्य भूमिका रही है लेकिन देश के नीति नियंता अमेरिकी मोह में फंस कर सही निर्णय लेने में असमर्थ साबित होते हैं. यही देश का दुर्भाग्य है.

-रणधीर सिंह सुमन 

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा दो


सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जब भी बोलते हैं जहर उगलते हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुये उनने कहा कि नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा देना चाहिए।
इस संदर्भ में स्वामी ने विशेष रूप से विपिन चंद्र और रोमिला थापर का नाम लिया। उनका आरोप है कि इस तरह के लेखकों ने अनेक हिंदू राजा.महाराजाओं की उपेक्षा की है। स्वामी दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समर्थित एक संस्था है। कार्यक्रम में बोलते हुये अनेक वक्ताओं ने कहा कि मार्क्सवादी,मुसलमान और पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास की बहुत उपेक्षा की है।
स्वामी और अन्य वक्ताओं ने इस तरह के अनेक हिंदू राजाओं का नाम लिया जिनका उल्लेख इन इतिहासज्ञों ने नहीं किया है। वक्ताओं ने विशेष रूप से हेमचंद्र विक्रमादित्य का नाम लिया है, जिन्होंने उत्तर भारत में 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध के बाद हिंदू राज्य की स्थापना की थी।
तथाकथित इन इतिहासज्ञों की इस घनघोर हिंसक प्रवृत्ति की सारे देश में आलोचना की गई। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स ने 9 अक्टूबर को लिखे एक संपादकीय में इस बात पर घोर चिंता प्रगट की है कि हमारे देश में किताबों को सिर्फ इस कारण जलाने की बात की जाए क्योंकि उनमें कुछ ऐसे विचार हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं हैं। संपादकीय में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी समाचारपत्रों में सुर्खियां जीतने के लिए इस तरह की गैर.जिम्मेदार बात करते हैं। वे आये दिन बुद्धिजीवियों और मुसलमानों पर हमला करते रहते हैं। हिंदुस्तान टाईम्स ने यह मांग की है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को चाहिए कि वह स्वामी पर लगाम लगायें। स्वामी बहुत ही भद्दी और भडकाऊ भाषा में, मुसलमानों,पाकिस्तान, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के बारे में निंदापूर्ण बातें कहते रहते हैं। इसी क्रम में उनने नेहरूवियन और वामपंथी इतिहासज्ञों पर हमला किया है। उनका कहना है कि विपिन चंद्र और रोमिला थापर के समान इतिहासज्ञों की किताबों को जला देना चाहिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अनेक संगठनों को स्वामी की बात न सिर्फ अच्छी लगती है वरन् वे उनसे सहमत भी होते हैं। इसी सिलसिले में यहां उल्लेख करना होगा कि दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित कुछ किताबों को गुजरात के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। दीनानाथ बत्रा भी एक अत्यधिक घनघोर प्रतिक्रियावादी लेखक हैं। वे अखंड भारत की वकालत करते हैं और कहते हैं कि पश्चिमी ढंग से लोगों को अपने जन्मदिन नहीं मनाने चाहिए। चूंकि गुजरात में इनकी पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं इसलिये यह कहना उचित होगा कि इस तरह के विचारों को स्वीकार करने वालो की संख्या काफी ज्यादा है।
स्वामी ने जिन इतिहासज्ञों पर हमला किया है वे दुनिया के महान इतिहासज्ञों में से हैं। इतिहास की दुनिया में उनकी अद्भुत स्वीकार्यता है। इस तथ्य के बावजूद यह दुःख की बात है कि स्वामी उनकी किताबों को जलाने की बात करते हैं। आखिर ये लोग कितनी किताबों को प्रतिबंधित करेंगे। दिल्ली की सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि उनका इस तरह के विचारों से कोई लेना.देना नहीं हैं। न सिर्फ उनको असहमति दिखाना चाहिए बल्कि इस तरह की बेबुनियाद, भड़काऊ बातें कहने के लिए उनके विरूद्ध कार्यवाही भी होना चाहिए।
आज के आधुनिक समाज में विभिन्न नजरियों से इतिहास का विवेचन व मूल्यांकन स्वाभाविक है। यह पाठक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस विवेचन व मीमांसा को स्वीकार करता है। इस तरह की स्वीकार्यता पर किसी प्रकार का बंधन न तो संभव है और ना ही लगाना चाहिए। हमारे जैसे बहुआयामी देश में इस तरह का बंधन संभव नहीं है।
आखिर परस्पर विरोधी विचारों को सहना ही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। स्वामी के समान लोग जो भारत को एक ही दिशा में ले जाना चाहते हैं और जो किसी भी प्रकार के विरोधी विचार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं उनके इस दकियानूसी रवैये से हमारे देश का भारी नुकसान होता है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि हम इस तरह के एकतरफा संकुचित विचारों के विरूद्ध हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को स्वामी जैसे संकुचित विचार वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लगाम कसना चाहिए और उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की चिंता क्या है। उसका इस तरह के मुद्दों पर रवैया क्या है? हिंदुस्तान टाईम्स ने अंत में अपने संपादकीय में चेतावनी देते हुये कहा है कि यदि सत्ताधारी पार्टी ऐसा नहीं करती है तो वह वास्तव में हमारे देश का भारी नुकसान करेगी।
संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुये लोगों के रवैये की अमरीका के सर्वाधिक लोकप्रिय समाचारपत्र न्यूयार्क टाईम्स ने भी निंदा की है। अपने 8 अक्टूबर के संस्करण के संपादकीय में न्यूयार्क टाईम्स लिखता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के युवकों को एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन दिया है। शायद वे जानते होंगे कि इस आश्वासन को पूरा करने के लिए उच्च कोटि की शिक्षा और उच्च कोटि के अवसर प्रदान करना आवश्यक है। तभी 25 वर्ष से कम आयु वाले 60 करोड़ भारतीय युवकों को सही दिशा मिलेगी। आज इन युवकों में बुनियादी योग्यताओं की कमी है।
अपने 2014 के घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि राष्ट्र के विकास के लिये और गरीबी के उन्मूलन के लिये शिक्षा ही सबसे बड़ा प्रभावी हथियार है। अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा में सुधारों का उपयोग एक प्रबुद्ध शिक्षित नागरिकों की जमात बनाने के लिये ही किया जायेगाघ् क्या इस तरह की जमात को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जायेगा या एक विशेष प्रकार की विचारधारा को आगे बढ़ाया जायेगा?
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने राष्ट्र का प्रशासन चलाने के लिए गुजरात मॉडल की सिफारिश की थी। अनेक मतदाताओं ने इसे एक लचीली अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता माना था। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात मॉडल में वे पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें दीनानाथ बत्रा ने लिखी हैं। बत्रा एक ऐसे विद्वान हैं जो भारत को दक्षिणपंथी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।
पिछले फरवरी माह में उनने पेंग्विन पर यह दबाव बनाया कि वह वेंडी डोनीगर जो शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं उनकी किताबों का प्रकाशन रद्द किया जाये। क्योंकि बत्रा की राय में उस प्रकाशन ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। उसके बाद जून के महीने में गुजरात सरकार ने यह आदेश जारी किया कि गुजरात के पाठ्यक्रम में बत्रा की किताबें शामिल की जायें। बत्रा की किताबों में अनेक ऐसी बातें शामिल हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। उनकी किताबों में विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे केक और मोमबत्ती के साथ अपना जन्मदिन न मनायें क्योंकि यह गैर भारतीय रीति रिवाज है।
बत्रा विद्यार्थियों से कहते हैं कि वे अखण्ड भारत का नक्शा बनायें। जिस अखण्ड भारत में बांग्लादेश,श्रीलंका,तिब्बत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। बत्रा की यह भी मान्यता है कि प्राचीन भारत में कारें थीं, हवाईजहाज भी थे और अणु अस्त्र भी थे। वे कहते हैं कि विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
यहां स्मरण दिलाना उचित होगा कि 1999 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार थी उस समय बत्रा को इतिहास की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उस समय यह काम अधूरा रह गया था, चूंकि 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनाव में अपदस्थ हो गई थी और वह काम अधूरा रह गया था। इसलिए अब बत्रा दावा करते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी किताबें शीघ्र ही राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जायेंगी।
शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण विद्या है यदि इस पर ऐसे लोगों का नियंत्रण हो जाता है जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करते हैंए जो लगभग तानाशाही के ढंग से यह तय करते हैं कि कौन से सांस्कृतिक रीतिरिवाज भारतीय हैं, जो एक योजना के अनुसार की जाने वाली गतिविधि के द्वारा पड़ोसियों के मन में खतरनाक भावनाओं को जन्म देते हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों से देश का भला नहीं होगा न्यूयार्क टाईम्स अंत में लिखता है।
 -एल.एस. हरदेनिया

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इस्लाम के दानवीकरण का दुष्चक्र



हम एक अजीब-से दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर विज्ञान तकनीक और तार्किक सोच ने हमें मानवता की बेहतरी के लिए अनेक भौतिक और बौद्धिक उपाय दिए हैं वहीं हमारी दुनिया ने इन दिनों भड़काऊ बातें कहने का फैशन सा बन गया है। साहित्य और विशेष कर फिल्मों के जरिए एक धर्म विशेष-इस्लाम-का दानवीयकरण करने के प्रयास हो रहे हंै। मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा स्वयं को आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपने धर्म के अपमान के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस भी जारी है परन्तु यह समझना मुश्किल है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हमेशा एक धर्म विशेष को अपमानित करने और उसका दानवीयकरण करने के लिए ही क्यांे किया जाता है।
इन दिनों (सितम्बर 2012) दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों के सामने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई है जिसमें राजदूत क्रिस स्टिवेंस सहित चार अमेरिकी राजनयिक बेन्गाजी में मारे गये हैं। कई देशो ने गूगल, जो कि यूट्यूब का मालिक है, से कहा है कि यूट्यूब से यह उत्तेजक और अपमानजनक विडि़यो क्लिप हटा दी जाए। अमेरीका अब तक “अभिव्यक्ति की आजादी” के नारे पर अटका हुआ है और  बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी देश की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।
यह विडि़यो क्लिप लगभग 14 मिनट लम्बी है और एक फीचर फिल्म का हिस्सा है, जिसके निर्माता अमेरिका में रहने वाले एक ईसाई नकोला बेसीले हैं। फिल्म में इस्लाम का जम कर अपमान किया गया है। दाढ़ी वाले आधुनिक मुसलमानांे की भीड़ को ईसाईयों पर हमला करते दिखाया गया है। फिल्म अपने दर्शकों को अतीत में भी ले जाती है जहां पैगंबर मोहम्मद के जीवनवृत्त को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म मे बताया गया है कि पैगंबर साहब का व्यक्तित्व व सोच, अत्यंत नकारात्मक और आक्रामक थी। इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नही है और इसे बनाने वालों के इरादे भी संदिग्ध हैं। मुसलमानों के एक तबके ने इस फिल्म पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले मे सभी मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक सी नही रही है। कुछ धर्मगुरूओं ने मुसलमानो से धैर्य बनाये रखने के लिए कहा है। इन लोगांे का कहना है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसलिए किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध प्रदर्शन नही होने चाहिए। कुत्सित इरादों से बनाई गई इस घटिया फिल्म का सबसे अच्छा जवाब दिया है मुसलमानो के एक समूह ने, जो कि अमन के संदेशवाहक, पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर लिखी गई किताबें बांट रहे हंै।
पिछले कुछ सालों से पश्चिमी देशों और यहां भारत में भी, इस्लाम का दानवीकरण करने की परंपरा सी बन गई है। हम सब को वह डैनिश कार्टून याद है जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छुपाए एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया था। फ्लोरिडा के एक पास्टर ने यह घोषणा की थी कि चूंकि कुरान हिंसा सिखाती है इसलिए वे उसे सार्वजनिक रूप से जलाएंगे। अफगानिस्तान में कुछ अमेरिकी सैनिको ने भी यह कह कर कुरान की प्रतियां जलाई थीं कि उनमंे आतंकवादियों के कुछ गुप्त संदेश लिखे हुए हैं।
इस्लाम और मुसलमानांे के दानवीकरण में हम एक प्रकार की योजना और एजेंडा देख सकते हैं। ये कार्टून और फिल्में दरअसल उस राजनैतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में तेल के कुओं पर कब्जा करना है। इरान में अमेरिका के पिट्ठू रज़ा पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के बाद से ही, अमेरिका “इस्लाम-नया खतरा” का नारा बुलंद करता आ रहा है।  अमेरिका ने ही पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए ताकि मुस्लिम युवकों को अलकायदा और तालिबान के झंडे तले अफगानिस्तान पर काबिज़ सोवियत सेना से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे हालात और बिगड़े। इन मदरसों में काफिर और जिहाद जैसे शब्दो का अर्थ तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता था ताकि मुस्लिम युवको को धर्म के नाम पर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वल्र्ड टेªड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने बड़ी चालाकी से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ लिया। इस शब्द का अन्य देशांे का मीडिया भी इस्तेमाल करने लगा और धीरे धीरे यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम एक साम्राज्यवादी ताकत द्वारा अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए धर्म के दुरूपयोग का उदाहरण है। दरअसल, इस्लाम का दानवीकरण, अमेरिकी नीति का भाग है। इसके पीछे अमेरिका अपने असली उद्देश्य-अर्थात तेल संसाधनो पर कब्जा-को छिपाना चाहता है। नोयम चोमोस्की ने एक शब्द गढ़ा था “सहमति का उत्पादन”। अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द को इसलिए गढ़ा ताकि उसके, अफगानिस्तान और ईराक पर सैनिक आक्रमण करने के लिए “सहमति का उत्पादन” किया जा सके।
अमेरिका की इस नीति से दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू हुई हैं। एक ओर इस्लाम के खिलाफ घृणा फैलाने के अभियान ने हालिया फिल्म, डेनिश कार्टून और पास्टर द्वारा कुरान को जलाने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है। अमेरिकी प्रचार को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए अमेरिका ने “सभ्यताओं का टकराव” के सिद्धांत का अविष्कार किया है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक विश्व इतिहास, पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यताआंे के विकसित पश्चिमी सभ्यताओं पर आक्रमण का इतिहास है। इसी तोड़ी-मरोड़ी हुई सोच और विचारधारा का इस्तेमाल पश्चिम एशिया मे अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए किया जाता है। इस सबसे पूरे विश्व के मुसलमानों की सोच मंे अंतर आया है।  कुछ मुसलमान यह मानने लगे हैं कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरीकी हमले के बाद, वे इस दुनिया में सुरक्षित नहीं रह गये हैं। भारत में संघ परिवार की राजनीति ने इस समस्या को नया आयाम दिया। संघ ने राममंदिर का मुद्दा उठाकर मुसलमानो को कटघरे में खड़ा कर दिया। भारतीय मुसलमानांे के एक बड़े हिस्से को यह लगने लगा कि उसे आतंकित किया जा रहा है और सब ओर से घेर लिया गया है। इस परिस्थिति में पहचान से जुडे़ मुद्दो को लेकर मुसलमानों को एक करना आसान हो गया। जब भी कोई समुदाय स्वयं को हर तरफ से घिरा हुआ पाता है तब उसे उत्तेजित करना और किसी भी आक्रामक धार्मिक अभियान का हिस्सा बनाना, आसान हो जाता है।
यह एक तरह का दुष्चक्र है जिसमें इस्लाम का डर एक ओर है और घुटन महसूस कर रहा  आतंकित मुस्लिम समाज दूसरी ओर। इन परिस्थितियों में वे मुस्लिम धर्मगुरू ही समुदाय की प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते हैं जो  शांति की बात कर रहे हंै। जो मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर आधारित पुस्तकें बांट रहे हैं, वे बधाई के हकदार है समुदाय की प्रतिक्रिया इसी प्रकार की होना चाहिए। अमेरिका के साम्राज्यवादी इरादों और उसके भारी भरकम प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, जिनके जरिए अमेरिका दुनिया के कई इलाकों में गड़बडियां फैला रहा है? क्या इस पर किसी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है? ?
जिन दिनो कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव थे, एक उच्चस्तरीय समिति ने एक रपट तैयार की थी जिसका शीर्षक था “सभ्यताओं का गठजोड़” परन्तु इस्लाम को बदनाम करने के अभियान की तुलना में इस रपट को समुचित प्रचार न मिल सका। अब समय आ गया है कि मानवता उन मानवीय मूल्यों को अपनाए जो हमारी सभ्यता में सदियों के विचार-विनिमय के आधार पर उभरे हंै-उन मूल्यों को, जिनके कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी के लिए मूल मानवाधिकारों के घोषणापत्र जारी किये हैं और जिनके कारण “सभ्यताओं के गठजोड़” जैसी रपटें बनती हैं।
मुसलमानों का एक तबका ऐसा भी है जो अनुचित ढंग से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। दरअसल जो लोग या ताकतें इस्लाम के दानवीकरण और इस तरह की फिल्मों के निर्माण के पीछे हैं, वही कुछ मुसलमानों की हिंसक कार्यवाहियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। क्या हम संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में पुनर्जीवित नही कर सकते जो यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न राष्ट्रांे और उनके मीडिया का आचार- व्यवहार ऐसा हो जिससे प्रजातंत्र और मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि हो? क्या पूरा विश्व दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के आक्रामक तेवरों से निपटने के लिए आगे नहीं आ सकता? अगर ऐसा हुआ तो इस तरह की फिल्मों पर हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बल्कि शायद दूसरों के धर्म को अपमानित करने के प्रयासों मंे भी कमी आयेगी। अगर कुछ लोग इस तरह की फिल्म बनांएगे तो कुछ वैसी फिल्मे भी बनेंगी जो पैगंबर मोहम्मद के दुनिया को शांति के संदेश पर आधारित होंगी।
अंत में, हमें अभिव्यक्ति की आजादी को तो कायम रखना होगा। परन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी तय करनी होंगी। हमे विरोध व्यक्त करने के ऐसे तरीकों का विकास करना होगा जिनसे उन्माद के स्थान पर मर्यादित व तार्किक ढंग से विरोध दर्ज कराया जा सके।

 -राम पुनियानी

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

झूठों का सौदागर ओबामा



अमरीकी
राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा अपने बयानबाजी के बाद हिटलर के प्रचार मंत्री गोविल्स को भी पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने एक बयान में कहा था कि ईराक से अमरीकी सेनायें पूरी तरह से वापस हो जाएँगी जबकि असलियत यह है कि बगदाद स्थित अमेरिकी दूतावास में २० ००० अमरीकी तैनात हैं अगर उनके सादे कपड़ों के नीचे देखा जाये तो वह सभी अमेरिकी सैनिक अधिकारी हैं। अमरीका हमेशा स्वतंत्र मुल्कों को गुलाम बनाने का आदि रहा है और अपनी रणनीति के तहत ईराक को गुलाम बनाया है लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे। ईरान ने उसके ड्रोन को अपने कब्जे में ले लिया है और बराबरी के साथ धमका भी रहा है यदि अमेरिका ने हमला किया तो ईराक के प्रधानमंत्री नूरी मलेकी जो ईरान के साथ अपने संबंधो को प्रगाढ़ बना रहे हैं वह ईरान के साथ खड़े हुए नजर आ सकते हैं। यह अमरीका की मुख्य चिंता है इसीलिए अमरीका अपनी फौजों को सादी वर्दी में तैनात कर रहा है।
पाकिस्तान में 28 सैनिकों की हत्या नाटो सेनाओं द्वारा किये जाने के बाद वहां की सरकार ने शम्स हवाई अड्डे को खाली करा लिया है। अफगानिस्तान में लड़ रही नाटो सेनाओं के खाद्य व अन्य जरूरत की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ अमेरिका में वाल स्ट्रीट आन्दोलन के गति पकड़ने के कारण पूर्वी तटों पर स्थित बंदरगाहों पर काम बंद है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी मंदी के चपेट में है इसलिए अमरीका के पास झूठ की सौदागरी के अतिरिक्त कुछ शेष नहीं है। अगर ईरान पर हमला करने की स्तिथि में अमेरिकी होते तो उनका स्वर दूसरा होता।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 2 जुलाई 2011

ओबामा, ओसामा और अफ-पाक

अमरीकी सैनिक कार्यवाही में ओसामा बिन लादेन की मौत ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है और कई छिपी हुई सच्चाइयाँ उजागर हुईं हैं। यह स्पष्ट है कि अमरीका ने एक सफल सैनिक कार्यवाही में, अल् कायदा के मुखिया और दुनिया के सबसे दुर्दान्त आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का खात्मा कर दिया है। इस कार्यवाही को अंजाम देने के लिए, जिस उच्च प्रशिक्षित कमांडो दस्ते का इस्तेमाल किया गया, उसने पाकिस्तान की हवाई सीमा का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया।
बराक हुसैन ओबामा सातवें आसमान पर हैं। उनके नेतृत्व में अमरीका ने वह हासिल किया है, जिसे पाने की कोशिश अमरीकी गुप्तचर एजेन्सियाँ दस साल से कर रही थीं। ओबामा का खुश होना स्वाभाविक है। एक ओर वे नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता हैं तो दूसरी ओर उनकी छवि एक ऐसे ताकतवर नेता की बन गई है जो अपने दुश्मनों का सफाया कर देता है। अगले चुनाव में उनकी जीत की संभावना काफी बढ़ गई है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार एक अजीबो-गरीब परिस्थिति में फँस गई है। पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि ओसामा उसके देश में नहीं है, व यह भी कि पाकिस्तान, आतंकियों की पनाहगाह नहीं है और इसके बाद क्या हुआ? ओसामा, पाकिस्तान की सबसे प्रसिद्ध सैन्य प्रशिक्षण अकादमी से पैदल तय की जा सकने वाली दूरी पर पाया गया।
अमरीका ने पाकिस्तान को जमकर अपमानित किया है। अमरीका ने पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया। उसने पाकिस्तान की धरती पर सैनिक कार्यवाही करने से पहले पाकिस्तान की अनुमति लेना तो दूर, उसे सूचित करना तक जरूरी नहीं समझा। पाकिस्तान के घावों पर नमक छिड़कते हुए, अमरीका ने अपने सैन्य बलों का दूसरे देश में इस्तेमाल करने के लिए माफी माँगने से भी इंकार कर दिया है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इसी प्रकार की सैनिक कार्यवाही के जरिए अमरीका, पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के जखीरे को नष्ट कर सकता है। पाकिस्तान के ओसामा के बारे में लगातार झूठ बोलने के कारण यह माँग भी उठ रही है कि पाकिस्तान को “आतंकी राष्ट्र“ घोषित किया जाए। और तो और, भारतीय सेना प्रमुख तक ने भी ताल ठोककर यह कहा है कि भारतीय सैन्य बल भी पाकिस्तान के भीतर ऐसी ही सैनिक कार्यवाही करने में सक्षम हैं।
ओसामा की मौत के शोर-शराबे में कई सच्चाइयाँ दब सी गई हैं, ओसामा की मौत को एक आतंकी का अंत मात्र समझना गलत होगा। इस मामले में सच की कई परते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका ही अल् कायदा का जनक है। इस तथ्य को आखिर क्यों छुपाया जा रहा है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए धन और हथियार दिए थे? अमरीका आज भले ही पाकिस्तान को ओसामा को शरण देने का दोषी बता रहा हो परंतु क्या यह सच नहीं है कि पाकिस्तानी सेना और आई.एस.आई., मध्यपूर्व के तेल संसाधनों पर कब्जा जमाने की अमरीकी रणनीति के महत्वपूर्ण मोहरे रहे हैं?
कुछ दशक पहले तक, शीत युद्ध का दौर था। उस समय आतंकवाद नहीं बल्कि साम्यवाद, अमरीका का दुश्मन नंबर वन हुआ करता था। अमरीका का लक्ष्य था पूरी दुनिया पर आर्थिक, राजनैतिक व सैनिक दबदबा जमाना और उसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा था समाजवादी देशों का गुट। इसी दौरान, अफगानिस्तान की कम्यूनिस्ट सरकार ने देश में भू-सुधार करने का कार्यक्रम हाथ में लिया और उसकी मदद के लिए सोवियत सेनाएँ अफगानिस्तान में काबिज हो गईं।
सोवियत संघ की इस कार्यवाही का विरोध करने के लिए, अमरीका ने क्षेत्र में कट्टरपंथी इस्लाम को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। यह वह समय था जब वियतनाम में मुँह की खाने के बाद, अमरीकी सेना का मनोबल टूट चुका था और अमरीका, अपनी सेनाएँ अफगानिस्तान में भेजने की स्थिति में नहीं था।
सोवियत सेना से मुकाबला करने के लिए अमरीका ने एक चतुर रणनीति अपनाई। उसने इस्लाम के कट्टरपंथी संस्करण को प्रोत्साहन व समर्थन देना शुरू कर दिया। अमरीका के सी.आई.ए. ने आई.एस.आई. की मदद से पाकिस्तान में मदरसों की स्थापना करवाई। इन मदरसों में जिहाद और काफिर जैसी इस्लामिक अवधारणाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाने लगा। इन मदरसों का पाठ्यक्रम वाशिंगटन में तैयार किया गया। इसका उद्देश्य था एशियाई मुस्लिम युवकों को आतंकवाद के रास्ते पर ढकेलना। सऊदी अरब के एक सिविल इंजीनियर ओसामा को, मदरसों से खूँखार आतंकी बनकर निकल रहे युवकों के संगठन अल् कायदा का नेतृत्व सँभालने के लिए चुना गया। इसके बाद क्या हुआ, यह सर्वज्ञात है।
अल् कायदा के भारत व पाकिस्तान पर आतंकी हमलों के इतिहास से हम सब वाकिफ हैं परंतु हम सभी इस तथ्य को अपेक्षित महत्व नहीं देते कि अमरीका और आई.एस.आई. व पाकिस्तानी सेना के गठजोड़ ने ही अल् कायदा की विषबेल को बोया और सींचा था।
अमरीका से हथियारों से लदे जहाज, पाकिस्तानी बंदरगाहों पर पहुँचते थे, जहाँ उनकी कोई जाँच नहीं की जाती थी और हथियारों को सीधे अल् कायदा को सौंप दिया जाता था। अमरीका के एक पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का एक दिलचस्प वक्तव्य इस सिलसिले में प्रासंगिक है। बात सन् 1985 की है। अल् कायदा के नेताओं का एक दल व्हाइट हाउस आया हुआ था। अजीब से कपड़े पहने हुए इन लोगों को हैरानी से देख रहे पत्रकारों को संबोधित करते हुए रीगन ने कहा- “जेंटिलमेन, ये अजीब से दिख रहे लोग, दरअसल, अमरीका के संस्थापकों के समकक्ष हैं“ (व्हाइट हाउस के लाॅन में मुजाहिदीन नेताओं का मीडिया से परिचय करवाते हुए रोनाल्ड रीगन- (1985)। उस समय ये मुजाहिदीन, अफगानिस्तान में अमरीका की लड़ाई लड़ रहे थे। वे अमरीका के एजेंट के बतौर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे कि इस इलाके में शक्ति संतुलन कायम रहे और कच्चे तेल से भरपूर इस क्षेत्र में अमरीका का दबदबा बना रहे।
सन् 1991 के खाड़ी युद्ध में अमरीका ने इराक को परास्त किया। कई अन्य मुस्लिम देशों को भी अमरीका ने भारी नुकसान पहॅँुचाया। इस सब से अल् कायदा अपने ही जन्मदाता का दुश्मन बन बैठा। अल् कायदा और उससे जुडे़ संगठनों ने अमरीका को “सबसे बड़ा शैतान“ कहना शुरू कर दिया। वे अमरीका के खिलाफ जहर उगलने लगे।
इस दौर में पाकिस्तान का शासन कई अलग-अलग जनरलों के हाथों में रहा। ये जनरल, मौलानाओं के सहयोग से देश पर अपनी पकड़ बनाए रखते थे। वे अमरीका के वफादार सेवक थे। पाकिस्तानी सेना व आई.एस.आई., धन के बदले इस इलाके में अमरीकी नीतियों को लागू करने का काम करती रहीं। 9/11 के बाद स्थितियों में परिवर्तन आया। वल्र्ड टेªड सेंटर पर हमले में विभिन्न धर्मों व देशों के 3000 से अधिक लोग मारे गए।
इस हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने एक नया शब्द गढ़ा - “इस्लामिक आतंकवाद“। इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने वाले इस शब्द को पूरी दुनिया के मीडिया ने हाथो-हाथ लिया। इसी के साथ आया “सभ्यताओं के टकराव“ का सिद्धांत। यह सिद्धांत, अमरीकी विदेश नीति का मार्गदर्शक बन गया।
इस सिद्धांत का लुब्बेलुबाब यह है कि “पिछड़ी इस्लामिक सभ्यता“ का उन्नत पश्चिमी सभ्यता से टकराव होना अवश्यंभावी है। जार्ज डब्लू बुश ने अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले को क्रूसेड्स (धर्मयुद्ध) की संज्ञा दी थी। सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत को सरल शब्दों में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था, “अमरीकन पूछ रहे हैं- वे हमसे घृणा क्यों करते हैं? वे हमारी स्वतंत्रताओं से घृणा करते हैं- हमारी
धार्मिक स्वतंत्रता से, हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से, हमारी वोट देने की स्वतंत्रता से और हमारे एकत्रित होने व एक दूसरे से असहमत होने की स्वतंत्रता से“(जार्ज डब्लू बुश, 11/9/2001 के बाद अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए)।
इस सिद्धांत ने दुनिया के मुसलमानों का दानवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल में ट्यूनीशिया, मिस्र और अन्य अरब देशों की जनता द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से प्रजातंत्र के लिए संघर्ष करने से इस्लाम और मुसलमानों के बारे में कई मिथक व पूर्वाग्रह टूटे हैं। अमरीका भी अब अपना नारा बदलना चाहता है। दुनिया में अपनी दादागीरी चलाते रहने के लिए, “प्रजातंत्र का निर्यात“ अमरीका का अगला नारा हो सकता है। इस नारे से अमरीका को दूसरे देशों में अपने सैन्य हस्तक्षेप को उचित ठहराने में मदद मिलेगी। पाकिस्तान की सैनिक सरकारों, जिन्होंने अमरीकी हितों की पूरी वफादारी से रक्षा की, का स्थान नागरिक सरकार ने ले लिया है। यह सरकार पाकिस्तान में प्रजातंत्र लाने की कोशिश कर रही है और वहाँ के समाज को मिलेट्री-मुल्ला गठजोड़ के चंगुल से निकालने की इच्छुक है। यह संयोग की बात है कि लगभग इसी समय अमरीकी नीतियों में भी परिवर्तन हो रहा है। शायद अमरीका को अब पाकिस्तान की सेना और आई0एस0आई0 की सेवाओं की जरूरत नहीं है और इसलिए कई दशकों में पहली बार, अमरीका ने पाकिस्तान की खुलकर कटु आलोचना की है। पाकिस्तान के नेतृत्व को अपने देश के भविष्य के बारे में चिंतन और आत्मावलोकन करना चाहिए। उसे अमरीका के चंगुल सेे मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि अन्य पश्चिम एशियाई देशों के सहयोग से पाकिस्तान किस तरह एक प्रगतिशील-प्रजातांत्रिक देश बन सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों से दूसरे देशों को भी सबक सीखना चाहिए। पाकिस्तान के साथ अमरीका के संबंधों का इतिहास बताता है कि अमरीका की दोस्ती किस तरह रातो रात दुश्मनी में बदल जाती है और किस तरह अमरीका अपने सहयोगियों के आत्मसम्मान की तनिक भी परवाह नहीं करता। जो अन्य देश व्हाइट हाउस की शरण में जाने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं उन्हें इससे सबक लेना चाहिए।

-राम पुनियानी
मो0:- 09322254043


सोमवार, 2 मई 2011

हाय ! ओबामा तूने अपने अब्बा हुजूर को मार डाला


अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में अफगानिस्तान में साम्यवादी सरकार को उखाड़ फेकने के लिये बहुत सारे मुस्लिम नवजवानों को गुमराह करके धार्मिक युद्ध का नाम देकर लड़ने के लिये प्रेरित किया था। अमेरिकी कुख्यात खुफिया एजेंसी सी.आई.ए ने हथियार ट्रेनिंग रुपया देकर नवजवानों को आतंकवाद के रास्ते पर जाने के लिये शिक्षित दीक्षित किया था। 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों की वापसी हो गयी। जिससे सी.आई.ए द्वारा भावनात्मक रूप से गुमराह किये युद्धरत जवान बेरोजगारी में आना शुरू हो गए। इन नवजवानों के पास आतंक फैलाने के अतिरिक्त कोई दूसरा हुनर नहीं था। सी.आई.ए ने हथियारों की सप्लाई के बदले में व धन प्राप्त करने के लिये अवैध रूप से अफीम की खेती भी शुरू करवाई अफीम की खेती के पश्चात अफीम से मार्फीन व हेरोइन का निर्माण व तस्करी को भी संरक्षण दिया।
उन्ही युद्धरत नवजवानों में सउदी अरबिया निवासी ओसामा बिन लादेन भी था। ओसामा बिन लादेन ने अमेरिकी शोषण तंत्र को समझा और अमेरिका के भयंकर विरोध में चला गया और उसने वही हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जो अमेरिकी दूसरे देशों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं। चाहे वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर पर बम गिराने के बाद 9/11 की घटना हो जिसमें लगभग 3000 लोग मारे गए थे कि घटना को अंजाम देने का आरोप भी ओसामा बिन लादेन पर आया।
सोमवार (2 मई) की रात एक बजे अमेरिकी सरकार व सी.आई.ए ने पकिस्तान सरकार को बगैर सूचना दिए इस्लामाबाद से 60 किलोमीटर दूर एबदाबाद में ओसामा बिन लादेन सहित चार लोगों को मार डाला। ओसामा की दो पत्नियों सहित 6 बच्चों को गिरफ्तार कर लिया ओसामा की लाश को अमेरिकी प्रचार एजेंसियों के अनुसार इस्लामिक रीति-रिवाजों के अनुसार समुद्र में दफना दिया गया है। दो अमेरिकी हेलीकाप्टर ने इस ऑपरेशन में भाग लिया जिसमें एक हेलीकाप्टर को मार गिराए जाने की बात आई है वहीँ यह भी कहा जा रहा है कि अमेरिकियों ने स्वयं ही इसे नष्ट किया है। ओसामा के सिर में गोली मारी गयी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के समय से ओसामा अमेरिकियों के नजदीक रहा है इस रिश्ते से बराक हुसैन ओबामा का अब्बा हुजुर हो सकता है और 1989 से जब ओसामा अमेरिकियों के लिये अनुपयोगी हो गया और प्रतिरोध पर उतर आया तो उसकी हत्या उसके घर में जाकर कर दी गयी है। ओसामा के पकिस्तान में रहने की सूचना वहां की सरकार, आई.एस.आई और उनके आकाओं को भी रही होगी आज जब अमेरिकी मध्य एशिया में फंसे हैं तो ओसामा का वध करके दुनिया के विरोधी राष्ट्राध्यक्षों को भी एक नया सन्देश जारी किया जा रहा है रहने सबसे ज्यादा दिक्कत पकिस्तान की सर्व भौमिक तथा संप्रभु सरकार की है जिसकी बगैर जानकारी के राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक ऑपरेशन हो रहा हो और उनको सूचना न हो। अब आप इस बात से अंदाजा लगा लीजिये कि पकिस्तान में कैसी संप्रभु सरकार है। सी.आई.ए की उपशाखा आई.एस.आई को भी इस ऑपरेशन की भनक नहीं लगी। अमेरिकन साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे संप्रभुता नाम की चीज नहीं है। उसके हित ही महत्वपूर्ण है। मुंबई आतंकी घटना के समय हमारे देश से भी अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी एफ.बी.आई ने चश्मदीद गवाह अनीता उददैया को सरकार की जानकारी के बगैर अमेरिका लेकर चले गए थे और बाद में वापस छोड़ गए थे। अमेरिकी और खुफिया एजेंसी सी.आई.ए पाकिस्तान समेत अधिकांश देशों को अपना उपनिवेश बना रखा है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 22 मार्च 2011

नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?

मानवता की रक्षा हेतु

विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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