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मंगलवार, 12 मई 2015

भक्ति.सूफी परंपराएं मानवता को एक करती हैं


वर्तमान दौर में धार्मिक पहचान का इस्तेमाल,राजनैतिक एजेण्डे को लागू करने के लिए किया जा रहा है। चाहे मुद्दा आतंकवादी हिंसा का हो या संकीर्ण राष्ट्रवाद का, दुनिया के सभी हिस्सों में धर्म के मुखौटे के पीछे से राजनीति का चेहरा झांक रहा है। कुछ दशकों पहले तकए धर्म और राजनीति को अलग करने और रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता था परंतु हुआ उसका उल्टा। धर्म और राजनीति का घालमेल बढ़ता ही गया। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया में हालात बहुत गंभीर हैं। अप्रैल 2015 में अमरीकी राष्ट्रपति ने अजमेर स्थित गरीब नवाज़ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर भेजी। गत 22 अप्रैल को अखबारों में छपी खबर के मुताबिक, सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी ने भी दरगाह पर चादर चढ़ाई।
अगर हम राज्य, राजनीति और धर्म के परस्पर रिश्तों को परे रखकर देखें तो यह दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि कुछ धार्मिक परंपराएं, सभी धर्मों के लोगों को प्रभावित करती आई हैं। दक्षिण एशिया व विशेषकर पाकिस्तान और भारत की सूफी व भक्ति परंपराएं क्रमशः इस्लाम और हिंदू धर्म की ऐसी दो मानवतावादी धाराएं हैं जो धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता की एकता की बात करती हैं। इन परंपराओं के संतों के अनुयायी सभी धर्मों के थे और ये संत सत्ता से दूर रहते थे। इस मामले में वे मध्यकाल के पुरोहित वर्ग से भिन्न थे जो कि राजाओं और नवाबों के दरबारों की शोभा बढ़ाने में गर्व महसूस करता था। हिंदू धर्म में कबीर, तुकाराम, नरसी मेहता, शंकर देव व लाल देध जैसे संतों की समृद्ध परंपरा है तो इस्लामिक सूफी परंपरा के संतों में निज़ामुद्दीन औलिया, मोइनुद्दीन चिश्ती,ताजुद्दीन बाबा औलिया,अज़ान पीर व नूरूद्दीन नूरानी शामिल हैं। इनके अतिरिक्त सत्यपीर व रामदेव बाबा पीर दो ऐसे संत थे जो भक्ति और सूफी दोनों परंपराओं के वाहक थे।
संत गुरूनानक ने हिंदू धर्म और इस्लाम का मिश्रण कर एक नए धर्म की स्थापना की। इस्लाम का ज्ञान हासिल करने के लिए वे मक्का तक गए और हिंदू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष को समझने के लिए उन्होंने काशी की यात्रा की। उनके सबसे पहले अनुयायी थे मरदान और सिक्खों के पवित्र स्वर्ण मंदिर की आधारशिला रखने के लिए मियां मीर को आमंत्रित किया गया था। गुरूग्रंथ साहब का धर्मों के प्रति समावेशी दृष्टिकोण है और उसमें कुरान की आयतें और कबीर व अन्य भक्ति संतों के दोहे शामिल हैं। आश्चर्य नहीं कि नानक के बारे में यह कहा जाता था कि 'बाबा नानक संत फकीर, हिंदू का गुरूए मुसलमान का पी'।
आज यदि पूरे विश्व में धर्म चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है तो इसका कारण है राजनीति के क्षेत्र में उसका इस्तेमाल। इस संदर्भ में सूफी परंपरा में लोगों की रूचि का एक बार फिर से बढ़ना सुखद है। दक्षिण एशिया में सूफीवाद का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। सूफी शब्द का अर्थ होता है मोटा ऊनी कपड़ा, जिससे बने वस्त्र सूफी संत पहनते हैं। सूफीवाद, शिया मुस्लिम धर्म से उभरा परंतु आगे चलकर कुछ सुन्नियों ने भी इसे अपनाया। सूफीवाद में रहस्यवाद को बहुत महत्ता दी गई है और वह कर्मकाण्डों को सिरे से खारिज करता है। वह अल्लाह को मानवरूपी नहीं मानता बल्कि उन्हें आध्यात्मिक शक्ति के रूप में देखता है। यह भक्ति संतो की आस्थाओं से मिलता जुलता है। कई सूफी संत सर्वेश्वरवादी थे और उनके जीवनमूल्य,मानवीयता से ओतप्रोत थे।
शुरूआत में इस्लाम के कट्टरपंथी पंथों ने सूफी संतो का दमन करने का प्रयास किया परंतु आगे चलकर उन्होंने सूफीवाद से समझौता कर लिया। सूफी संतों में से कुछ दरवेश बन गए। दरवेश का अर्थ होता है ऐसे संत जो एक स्थान पर नहीं रहते और लगातार भ्रमण करते रहते हैं। कई देशों में सभी धर्मों के लोग उनकी दरगाहों पर खिराजे अकीदत पेश करते हैं। इसी तरहए भक्ति संतो के अनुयायी भी सभी धर्मों के लोग हैं।
सूफीवाद के समानांतर भक्ति परंपरा भी भारतीय धार्मिक इतिहस की सबाल्टर्न धारा का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति संत, समाज के विभिन्न तबकों से थे, विशेषकर नीची जातियों से। भक्ति संतों ने धर्म को संस्थागत रूप देने का विरोध किया और उसको विकेन्द्रीकृत करने का प्रयास किया। उनका कहना था कि धर्म, व्यक्ति का निजी मसला है। वे धर्म और राज्य सत्ता को एक.दूसरे से अलग करने के हामी थे और उन्होंने ईश्वर की आराधना की अवधारणा को ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से जोड़ा। भक्ति संतों के लेखन में गरीब वर्ग के दुःख.दर्द झलकते हैं। भक्ति परंपरा ने कई नीची जातियों को प्रतिष्ठा दिलवाई। यह परंपरा मुसलमानों के प्रति भी समावेशी दृष्टिकोण रखती थी और इसने ऊँची जातियों के वर्चस्व को चुनौती दी।
भक्ति परंपरा, कर्मकांडों की विरोधी थी। इसके संतों ने ऐसी भाषा का उपयोग किया जिसे जनसामान्य समझ सकते थे। वे एक ईश्वर की अवधारणा में विश्वास रखते थे। इस परंपरा के संतों ने हिंदू.मुस्लिम एकता पर जोर दिया।
हमें यह समझना होगा कि हर धर्म में विभिन्न धाराएं होती हैं। भक्ति और सूफी परंपराएं, धर्मों का मानवतावादी चेहरा हैं जिन्होंने मानवता को एक किया और धर्मों के नैतिक.आध्यात्मिक पक्ष पर जोर दिया। इसके विपरीत,धर्मों की असहिष्णु प्रवृत्तियों का इस्तेमाल राजनैतिक ताकतों ने अपने एजेण्डे की पूर्ति के लिए किया। भारतीय उपमहाद्वीप में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राजाओं, नवाबों और जमींदारों ने हिंदू व मुस्लिम सांप्रदायिकता की नींव रखी। इस धार्मिक राष्ट्रवाद का धर्मों के नैतिक पक्ष से कोई लेनादेना नहीं था। यह केवल धार्मिक पहचान का राजनैतिक लक्ष्य पाने के लिए इस्तेमाल था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के कई नेता जिनमें गांधीजी व मौलाना अबुल कलाम आज़ाद शामिल हैं,अत्यंत धार्मिक थे परंतु वे न तो धार्मिक राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे और ना ही अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रति उनके मन में तनिक भी बैरभाव था।
सूफी और भक्ति परंपराएं हमें इस बात की याद दिलाती हैं कि वर्तमान दौर में धर्मों के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष को कमजोर किया जा रहा है। अगर हमें मानवता के भविष्य को संवारना है तो हमें धर्मों के समावेशी.मानवतावादी पक्ष को मजबूत करना होगा और धर्मों के समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल को हतोत्साहित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि सभी धर्म मूलतः नैतिकता और मानवता पर जोर देते हैं। हमें धर्मों की मूल आत्मा को अपनाना होगा न कि बाहरी आडंबरों को।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन से किस तरह अलग है घर वापसी ?

 

हाल ;10 दिसंबर 2014 में आगरा में आयोजित एक कार्यक्रम में फुटपाथ पर रहने वाले और कचरा बीनने वाले लगभग 350 लोगों को मुसलमान से हिंदू बनाया गया। उनसे यह वायदा किया गया था कि यदि वे कार्यक्रम में भाग लेंगे तो उन्हें राशन कार्ड व बीपीएल कार्ड उपलब्ध करवाए जायेंगे। यह कार्यक्रम, आरएसएस से जुड़ी दो संस्थाओं . बजरंग दल और हिंदू जनजागृति समिति . द्वारा आयोजित किया गया था। इसे धर्मपरिवर्तन न कहकर घरवापसी बताया गया। इस कार्यक्रम को योगी आदित्यनाथ जैसे आरएसएस नेताओं द्वारा 'शानदार उपलब्धि' और आरएसएस की 'गौरवमयी सफलता' बताया जा रहा है। एक आरएसएस विचारक के अनुसार, धर्मपरिवर्तन पर प्रतिबंध की संघ की लंबे अरसे से चली आ रही मांग का धर्मनिरपेक्षतावादी और धार्मिक अल्पसंख्यक विरोध करते आ रहे हैं। इस धर्मपरिवर्तन ;नहीं घरवापसी से धर्मपरिवर्तन के खिलाफ कानून बनाए जाने के मुद्दे पर बहस फिर शुरू होगी। आरएसएस से जुड़े इस चिंतक का कहना है कि अगर आगरा के वेदनगर के 350 मुसलमानों को हिंदू बनाने के कार्यक्रम के पीछे संघ है, तो इससे यह साफ है कि संघ एक सुविचारित रणनीति के तहत काम कर रहा है।
इस चिंतक के अनुसार, आरएसएस का यह कदम चतुराईपूर्ण है क्योंकि इससे धर्मपरिवर्तन पर प्रतिबंध पर बहस शुरू हो गई है, जिसकी मांग वह कई दशकों से करता आ रहा है और जिसके लिए उसे आलोचना भी झेलना पड़ी है। यद्यपि सांप्रदायिक तत्व चिल्ला.चिल्लाकर कहते आ रहे हैं कि मीनाक्षीपुरम के धर्मपरिवर्तन के पीछे पेट्रोडालर थे और ईसाई मिशनरियां विदेशों से आ रहे धन का इस्तेमाल, आदिवासियों और दलितों को ईसाई बनाने के लिए कर रही हैं तथापि यह सच नहीं है। मीनाक्षीपुरम में धर्मपरिवर्तन के पीछे था ऊँची जातियों द्वारा दलितों का अपमान। जहां ईसाई मिशनरियों द्वारा जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन के आरोप लंबे समय से लगाए जा रहे हैं वहीं यह भी सच है कि अब तक एक भी ऐसा मामला सामने नहीं आया है जिसमें यह साबित हुआ है कि किसी को जबरदस्ती ईसाई बनाया गया था। यह सही है कि कुछ ईसाई पंथों के सदस्य दावा करते हैं कि वे धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं परंतु अधिकांश पंथों के धार्मिक नेताओं का यह कहना है कि धर्मपरिवर्तन तभी करवाया जाता है जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से ईसाई बनना चाहता है। दिलचस्प यह है कि इस मान्यता के बावजूद कि मिशनरियां बड़े पैमाने पर लोगों को ईसाई बना रही हैं, जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, देश की ईसाई आबादी में कमी आई है ;1971.2.60 प्रतिशत, 1982.2.44 प्रतिशत, 1991.2.34 प्रतिशतए 2001.2.30 प्रतिशत व 2011 में लगभग 2.20 प्रतिशत। पास्टर स्टेन्स को जिंदा जलाए जाने की घटना के बाद, तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री एल के आडवाणी द्वारा नियुक्त वाधवा जांच आयोग, इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पास्टर स्टेन्स धर्मपरिवर्तन नहीं करवा रहे थे और उड़ीसा के मनोहरपुर के क्योन्झार में ईसाईयों का आबादी में प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ था। पास्टर स्टेन्स जिस दौरान वहां कार्यरत थे,उस अवधि में इलाके की ईसाई आबादी में बहुत थोड़ी सी वृद्धि हुई थी।
भारत में धर्मपरिवर्तन कैसे और क्यों हुआ? हम इस प्रश्न पर दो स्तरों पर विचार कर सकते हैं। जहां तक मध्यकालीन भारत का प्रश्न है, उस समय मुख्यतः जातिगत दमन के कारण लोग मुसलमान बने। जैसा कि स्वामी विवेकानंद लिखते हैं, 'क्या कारण है कि भारत के गरीबों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है? यह कहना बकवास है कि उन्हें तलवार के जोर पर मुसलमान बनाया गया। वे तो जमींदारों और पुरोहितों से मुक्ति पाने के लिए मुसलमान बने" ;कलेक्टिड वर्क्स, खण्ड.8, पृष्ठ 303। इनके अलावा,कुछ हिंदुओं ने इस्लाम इसलिए अपनाया क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि इससे मुस्लिम शासक खुश होंगे और जागीर या ईनाम मिलेगा,कुछ ने डर के कारण और कुछ ने सामाजिक मेलजोल के चलते इस्लाम के प्रति आकर्षित होने के कारण उस धर्म को अपना लिया। इसके उदाहरण हैं मलाबार तट और मेवात के मुसलमान। मध्यकाल में इस्लाम में धर्मपरिवर्तन का मुख्य कारण था सूफी संतों का प्रभाव, जिनकी दरगाहों पर अछूतों के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं था। चूंकि आज भी देश की कम से कम एक.चौथाई आबादी छुआछूत में विश्वास रखती है इसलिए आश्चर्य नहीं कि कुछ दमित जातियों के सदस्य,हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लेते हैं। याद रहे कि डॉक्टर आंबेडकर ने हिंदू धर्म का त्याग करने के पहले कहा था कि, 'मैं जन्म से हिंदू हूं। यह मेरे हाथ में नहीं था। परंतु मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा'। इसी तरहए यह प्रचार भी गलत है कि हिंदुओं के ईसाई बनने का सिलसिला देश में अंग्रेजों के आगमन के बाद शुरू हुआ। भारत में ईसाई धर्म,अंग्रेजों से बहुत पहले आ चुका था। कुछ लोग कहते हैं कि पहली सदी ईस्वी में सेंट थॉमस सबसे पहले भारत में ईसाई धर्म लाए तो कुछ अन्यों का कहना है कि यह धर्म भारत में पहली बार पांचवी सदी में आया। ईसाई मिशनरियां लंबे समय से उपेक्षित आदिवासी क्षेत्रों में काम करती रही हैं और गरीब आदिवासियों को शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवाती आई हैं। इससे प्रभावित होकर भी कई आदिवासी और दलित ईसाई बने। लगभग छःह दशक पहले से, सांप्रदायिक ताकतों ने मिशनरियों के आदिवासी इलाकों में काम करने पर आपत्ति उठाना शुरू की और तबसे ही इन क्षेत्रो में हिंसा प्रारंभ हुई। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शहरों में बड़ी संख्या में ईसाई मिशनरी स्कूल हैं जिनमें अपने बच्चों को दाखिल करनवाने के लिए समाज के सभी वर्गों के सदस्य आतुर रहते हैं। यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि कुछ मिशनरियां अपनी प्रार्थना सभाओं व रोग ठीक करने के दावों के जरिए धर्मपरिवर्तन करवा रही होंगीं। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि धोखाधड़ी या लालच से लोगों को ईसाई बनाने की घटनाएं न के बराबर होती हैं। ईसाई मिशनरियों पर अधिकतर हमले उस समय किए जाते हैं जब वे प्रार्थनासभाएं आयोजित करती हैं। विदेशों से जो पैसा मिशनरियों को मिलता है, वह कानूनी रास्ते से आता है और देश के कई एनजीओ व आरएसएस जैसे संगठनों को भी विदेशों से पैसा मिल रहा है।
दूसरा प्रश्न यह है कि क्या आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन जो कर रहे हैं,वह धर्मपरिवर्तन नहीं बल्कि घरवापसी है?संघ परिवार के कई दावे केवल राजनैतिक फिकरेबाजियां हैं। भारत के जातिवादी समाज में स्वेच्छा से धर्मपरिवर्तन लंबे समय से होता आ रहा है। यह अलग बात है कि ईसाई और मुस्लिम समुदाय भी जातिवाद के वायरस से मुक्त नहीं रह पाए हैं परंतु प्रभुत्वशाली जातियों के दमन से मुक्ति और सामाजिक न्याय की चाह की धर्मपरिवर्तन में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिकाएं रही है। आरएसएस का यह दावा अप्रासंगिक है कि वर्तमान भारत के अधिकांश मुसलमानों और ईसाईयों के पूर्वज हिंदू थे।  आखिर इस बात का क्या महत्व है कि किसी व्यक्ति के पूर्वज किस धर्म को मानते थे?क्या हम अपने आज के विश्वासों और आस्थाओं का निर्धारण,अपने पूर्वजों की आस्थाओं और विश्वासों के आधार पर करेंगे? हम कितने पीछे तक जाएंगे? डार्विन के मानव के विकास के सिद्धांत को यदि हम छोड़ भी दें, तब भी ताजा डीएनए अध्ययन बताते हैं कि सबसे पहला मनुष्य,दक्षिण अफ्रीका में जन्मा था। इसी तरह, इस पर भी बहस जारी है कि आर्य भारत के निवासी थे या वे कहीं बाहर से यहां आए थे। लोकमान्य तिलक का कहना है कि आर्य उत्तर ध्रुव से भारत आए थे। तो क्या अब हम वह धर्म अपना लें जो आर्कटिक में रहने वाले आर्यों का था? या हम उन विश्वासों पर चलें जो लाखों साल पहले दक्षिण अफ्रीका में जन्में हमारे पूर्वजों के थे ?
घुमन्तू जातियों और मूर्तिपूजकों का क्या धर्म था? कुछ समाजवैज्ञानिक,पूरी दुनिया में मूलनिवासियों ;आदिवासियों की आस्थाओं और उनके रीतिरिवाजों को धर्म न कहकर 'देशीय संस्कृति' कहते हैं। चूंकि जाति व्यवस्था,भारत में धर्म का केंद्रीय तत्व रही है इसलिए दमित जातियों के सदस्य समय.समय पर हिंदू धर्म छोड़करए जैन, बौद्ध, ईसाई,इस्लाम व सिक्ख धर्म अपनाते रहे हैं। लोगों को जब हिंदू धर्म में असमानता का सामना करना पड़ता था तो उनमें से कई इस धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों को अपना लेते थे। भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर भारतीय उपमहाद्वीप में बड़ी संख्या में लोग बौद्ध बने। यह अलग बात है कि बाद में ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के कारण बौद्ध धर्म का इस देश से सफाया हो गया। कई लोगों को यह लगता था कि मिशनरियां उनके समुदाय की सेवा कर रही हैं और इसलिए वे अपना धर्म बदल लेते थे।
भारतए महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता आंदोलन के कारण अस्तित्व में आया। महात्मा गांधी ने सभी धर्मों के लोगों को एक करने में सफलता पाई क्योंकि वे सभी धर्मों को एक नजर से देखते थे। वे भारतीय और विदेशी धर्मों में कोई विभेद नहीं करते थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सांप्रदायिक तत्व उन्हें उद्वत कर धर्मपरिवर्तन का विरोध कर रहे हैं। इसके लिए वे उनके भाषणों, वक्तव्यों आदि के चुनिंदा और अधूरे हिस्सों का इस्तेमाल करते हैं। महात्मा गांधी के धर्मपरिवर्तन पर विचार, 22 मार्च 1931 को उनके द्वारा'द हिन्दू' अखबार को दिये गए एक साक्षात्कार ;कलेक्टिड वर्क्स, खण्ड 106, पृष्ठ 27.28 से स्पष्ट हैं। उन्होंने कहा, 'अगर स्वशासित भारत में मिशनरियां,स्वास्थ्य व शिक्षा आदि की सुविधाएं प्रदान कर धर्मपरिवर्तन करवाती रहेंगी तो मैं निश्चित तौर पर उनसे यह कहूंगा कि वे भारत से चली जाएं। हर राष्ट्र का धर्म उतना ही अच्छा है जितना कि किसी और राष्ट्र का। निश्चित तौर पर,भारत के धर्म, उसके लोगों के लिए पर्याप्त हैं। हमें किसी आध्यात्मिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है'। यह उनके उद्वरण का पहला हिस्सा है। परंतु इसके बाद जो कुछ उन्होंने कहा, वह ठीक इसके विपरीत है और वही उनके विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। गांधीजी ने आगे कहाए'ये वे बातें हैं जो अखबार के संवाददाता ने मेरे मुंह में डालीं...मैं तो सिर्फ इतना कह सकता हूं कि जो कुछ मैं कहता और मानता रहा हूं,यह उसके ठीक विपरीत है'। वे कहते हैंए'मैं धर्मपरिवर्तन के विरूद्ध नहीं हूं परंतु मैं उसके आधुनिक तरीकों के खिलाफ हूं। इन दिनों धर्मपरिवर्तन एक व्यवसाय बन गया है.....हर राष्ट्र अपने धर्म को उतना ही अच्छा मानता है,जितना कि किसी और राष्ट्र के धर्म को। निश्चित तौर पर भारतीय लोगों के धर्म उनके लिए काफी हैं। भारतीयों को अपना धर्म बदलने से कोई लाभ नहीं होगा'। और इसके बाद वे भारतीय धर्मों की सूची देते हैं,'ईसाई और यहूदी धर्म के अलावा, हिंदू धर्म और उसकी शाखाएं, इस्लाम और पारसी,भारत के जीवित धर्म हैं।'
जहां महात्मा गांधी साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष कर रहे थे, वहीं सम्प्रदायवादी 'दूसरे' समुदायों के विरूद्ध जहर उगल रहे थे। बीसवीं सदी की शुरूआत में ही, शुद्धि ;आर्य समाज और तंजीम ;तबलीगी जमात, उनके राजनैतिक एजेन्डे का हिस्सा बन चुके थे। चूंकि हिन्दू, पैगम्बर.आधारित धर्म नहीं है इसलिए उसमें धर्मपरिवर्तन की परिकल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है। इसके विपरीत, सभी पैगम्बर.आधारित धर्म, अपने अनुयायिों से ईश्वर के संदेश को फैलाने की अपेक्षा करते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए आर्य समाज ने एक नया शब्द गढ़ा,'शुद्धि' जो कि दरअसल, लोगों को जबरदस्ती हिन्दू बनाने का दूसरा नाम था। आरएसएस ने इसमें और सुधार करते हुए 'घर वापसी' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया ताकि लोगों को जबरदस्ती हिन्दू बनाने के उसके अभियान को एक सम्मानजनक चोला पहनाया जा सके। संघ का यह दावा कि घरवापसी का उद्धेश्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाना है,इसलिए अर्थहीन है क्योंकि अल्पसंख्यकों ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़.चढ़कर हिस्सेदारी कर यह साबित कर दिया था कि वे पहले से ही राष्ट्र की मुख्यधारा में हैं। अलबत्ता, आरएसएस अवश्य स्वाधीनता संग्राम से दूर रहा था।  इसी तरह यह दावा भी बेबुनियाद है कि आदिवासी हिन्दू हैं। दरअसल आदिवासी जीवात्मवादी व प्रकृतिपूजक हैं। वे अपने पूर्वजों और प्रकृति की जीवात्मा की आराधना करते हैं। दुनिया के सभी हिस्सों के आदिवासीजन इसी तरह के विश्वास रखते हैं और ऐसा ही आचरण करते हैं। यह हिन्दू धर्म के ठीक विपरीत है, जो गीता, राम और शंकराचार्य में आस्था रखता है।
मुख्य मुद्दा यह है कि संघ,भारतीय राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता और हिन्दू राष्ट्रवाद का पैरोकार है। यही कारण है कि जहां अन्य धर्मपरिवर्तनों को वह 'जबरन' बताता है वहीं उसके द्वारा किए जा रहे जबरन धर्मपरिवर्तन को घरवापसी कहता है। भारत के राष्ट्र.राज्य के रूप में उभरने से देश   में आए परिवर्तनों को स्वीकार करने की बजाए वह पशुपालक.सामंती समाज की वैचारिकी से चिपका हुआ है। हम जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन और किसी के द्वारा स्वेच्छा से कोई धर्म अपनाने के बीच विभेद कैसे करें? यदि कोई हिन्दू,बौद्ध, जैन या सिक्ख बन जाए तो संघ को इसमें कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि ये 'भारतीय' धर्म हैं। साम्प्रदायिक तत्वों को समस्या केवल इस्लाम और ईसाई धर्म से है। इस विभेद को स्वीकार्यता देने के लिए संघ परिवार ने धूर्ततापूर्वक भारतीय और विदेशी धर्मों की परिकल्पना प्रस्तुत की है। सच यह है कि धर्म मूलतः वैश्विक होते हैं और उन्हें राष्ट्र के दायरे में नहीं बांधा जा सकता।
संविधानसभा ने इस मुद्दे पर गहराई से विचार किया था और इसके बाद ही अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार संविधान में शामिल किया गया। वर्तमान में जिस शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा हैए वह'धर्म परिवर्तन करवाना' है। क्या हमारे देश में अंबेडकर जैसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है जो स्वेच्छा से दूसरा धर्म अपनाना चाहते हैं? क्या जब हम यह कहते हैं कि किसी का धर्मपरिवर्तन करवाया जा रहा है,तो हम उस व्यक्ति के अंतःकरण पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहे होते हैं? क्या 'धर्म और अंतःकरण की स्वतंत्रता' में विश्वास करने वाले हमारे प्रजातांत्रिक समाज में किसी व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का हक नहीं है?
आरएसएस,अलीगढ़ में क्रिसमस के दिन एक विशाल घरवापसी आयोजन करने जा रहा है। योगी आदित्यनाथ जैसे संघ परिवार के नायकों का कहना है कि जो लोग घर वापस आएंगे उन्हें उनके मूल गोत्र और जाति में प्रवेश दिया जाएगा। तो इस तरह यह न केवल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने का प्रयास है वरन् जातिगत ढांचे को मजबूती देने का षड़यंत्र भी है। यही हिन्दू राष्ट्रवाद का असली एजेन्डा है।
क्या हमें धर्मपरिवर्तन पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है? हमारे देश में पहले से ही ऐसे कानून हैं,जिनमें जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लोभ.लालच से धर्मपरिवर्तन करवाने वालों के लिए सजा का प्रावधान है। जो हमें करना है वह यह है कि हम स्वैच्छिक और जबरन धर्मपरिवर्तन के बीच विभेद करेंगे। घरवापसी,जबरन धर्मपरिवर्तन का पर्यायवाची है। आज जरूरत इस बात की है कि धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की जाए और जो लोग गैरकानूनी तरीकों से धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं, उन्हें सजा दिलवाई जाए। तथाकथित 'धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम'आमजनों को अंतःकरण की स्वतंत्रता देने के लिए नहीं बल्कि उसे समाप्त करने के लिए बनाए जा रहे हैं।
- राम पुनियानी

बुधवार, 10 सितंबर 2014

आईसिस,तेल की राजनीति और इस्लाम के प्रति घृणा का चरम

 लगभग एक माह पहले ;अगस्त 2014, मुस्लिम कार्यकर्ताओं.अध्येताओं के एक समूह ने विभिन्न शहरों में प्रेस वार्ताएं आयोजित कीं। उन्होंने आईसिस द्वारा की जा रही क्रूर हिंसा की भर्त्सना करते हुए वक्तव्य जारी किये। इन वक्तव्यों पर सबसे ऊपरए बड़े.बड़े अक्षरों में लिखा गया था, 'इस्लाम मीन्स पीस' ;,का अर्थ है शांति। बयान में कहा गया था कि'भारतीय मुसलमान, ईराक और सीरिया में आईसिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों की कड़ी निंदा करते हैं। हम धार्मिक असहिष्णुता और इस्लाम के नाम पर हिंसा और उत्पीड़न की भी निंदा करते हैं।' मैंने इस वक्तव्य को कई जगह भेजा। एक व्यक्ति का जवाब आया, ''इस्लाम का अर्थ है शांति' यहए इस सदी का सबसे बड़ा चुटकुला है'।
भारत में इन दिनों लवजिहाद के बारे में प्रचार, जंगल में आग की तरह फैल रहा है। जाहिर है कि इस मुद्दे को सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हवा दी जा रही है। शादी के साथ.साथ धर्मपरिवर्तन करने और लड़कियों द्वारा पीछे हट जाने की चन्द घटनाओं का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जा रहा है कि मुस्लिम पुरूष, हिंदू लड़कियों से धोखा देकर विवाह कर रहे हैं और इसका उद्देश्य उन्हें मुसलमान बनाना है। एक मित्र ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं ऐसे 100 मामले भी बता सकता हूं, जब मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू पुरूषों से शादी की हो। मेरी किस्मत अच्छी थी कि और मैं 100 से भी अधिक ऐसे दंपत्तियों की सूची बनाने में सफल रहा। हिंदू पुरूष,मुस्लिम पत्नि के नाम से गूगल सर्च करने पर कई मर्मस्पर्शी प्रेमकथाएं सामने आईं। यह शायद उल्टा लवजिहाद हैhttps://www.facebook.com/R3alityofPorkistan/posts/613266692020533। पहले से ही जहरीले हो चुके वातावरण में अल कायदा के अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी कियाए जिसमें कहा गया है कि अल कायदा अपनी गतिविधियों का भारत में विस्तार करेगा।
 इस्लाम और मुसलमानों के बारे में इतनी सारी भ्रांतियां फैला दी गई हैं और जनसाधारण के मन में इतनी गलतफहमियां बैठा दी गईं हैं कि किसी से यह कहना ही मुहाल हो गया है कि वे धर्म, और राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म के दुरूपयोग,के बीच अंतर करें। देश और दुनिया में दिल को हिला देने वाली जो घटनाएं हो रही हैं उनके लिए इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को दोषी बताया जा रहा है। आमजन अन्य धर्मों को तो 'नैतिकता और शांति' के साथ जोड़ने को तैयार हैं परंतु इस्लाम को नहीं। कई समूहों और संगठनों द्वारा 'सहमति के उत्पादन' के चलते, मुसलमानों का एक ऐसा चित्र बनाया जा रहा है जो न तो सही है और ना ही विश्व में शांति की स्थापना में मददगार साबित होगा। सभी मुसलमानों को एकसा बताया जा रहा है। चंद अपराधी मुसलमानों और इस्लाम के कट्टरवादी संस्करण को असली इस्लाम बताया जा रहा है, जिससे दशकों से चले आ रहे पूर्वाग्रह और मजबूत हो रहे हैं।
आईसिस का जन्म अलकायदा की कोख से हुआ है। अलकायदा के लड़ाकों को अमरीका और आईएसआई द्वारा स्थापित किये गये मदरसों में प्रशिक्षित किया गया था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अमरीका,पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। इस क्षेत्र के बारे में अमरीका की नीति को इन शब्दों में बयान किया जा सकता है,'तेल इतना कीमती है कि उसे वहां के निवासियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।' अमरीका की पश्चिम एशिया नीति को समझने के लिए आपको बड़े.बड़े विद्वानों की मोटी.मोटी किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है। आपको केवल हिलेरी क्लिंटन की एक छोटी सी वीडियो क्लिप भर देखनी होगी। वीडियो क्लिप में वे बड़ी शान से और बिना किसी लागलपेट के कहती हैं कि अमरीका ने मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित कर अल कायदा का निर्माण किया था। http://www.youtube.com/watch?v=nLhRKj6633w। इस क्षेत्र के इतिहास पर एक नजर डालने से ही हमें समझ में आ जायेगा कि मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया गया था।
 अल कायदा का अमरीका ने केवल निर्माण ही नहीं किया वरन उसने उसे धन और हथियार भी उपलब्ध करवाये ताकि अल कायदा, अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेनाओं से मोर्चा ले सके। धीरे.धीरे, जब अलकायदा के भयावह अत्याचारों की खबरें छन.छन कर बाहर आनी शुरू हुईं तब अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को ही दानवी प्रवृत्तियों का स्त्रोत बताने के लिए 9-11-2001 के बाद से 'इस्लामिक आतंकवाद' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। 9-11 के पहले तकए आतंकी हमलों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाता था। वैसे भी, सभी धर्मों के मानने वाले आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। महात्मा गांधी और राजीव गांधी के हत्यारे हिंदू थे तो इंदिरा गांधी को सिक्खों ने मारा था। थायलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुक आतंकी हमलों में शामिल हैं। नार्वे के एंडर्सबर्लिंग ब्रेविक भी आतंकी थे परंतु मुसलमान नहीं। सच यह है कि लगभग सभी धर्मों के लोगों ने कभी न कभी राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतंकी हमलों में भाग लिया है। परंतु 9-11 के बाद से, आतंकी हमलों को इस्लाम और केवल इस्लाम से जोड़ दिया गया।
यह दिलचस्प है कि अल कायदा को खड़ा करने और मुजाहिदीनों के दिमाग में घोर कट्टरता भरने के लिए अमरीका ने इस्लाम के जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसे सूत्रबद्ध करने वाले थे अब्द अब्द अल वहाब, जिन्होंने इस्लाम को कट्टर बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी और धर्म की केवल अपनी व्याख्या को सही बताया था। वे लिखते हैं 'यदि कोई धर्मावलंबी, इस्लाम की इस ;वहाबी व्याख्या पर अपने विश्वास को स्वीकार करने में जरा सा भी संकोच या संदेह दर्शाता है तो वह अपना संपत्ति और जीवन का अधिकार खो बैठेगा।' इस्लाम के इसके अलावा कई अन्य संस्करण भी हैं। परंतु क्या कारण है कि यह संस्करण सबसे प्रभुत्वशाली बनकर उभरा है। इसका कारण यह है कि इस संस्करण को सऊदी अरब के शासकों का संरक्षण प्राप्त है। अब्द अल वहाब के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तकफीर। इस सिद्धांत के अनुसारए 'वे मुस्लिम काफिर हैं जो ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा लेते हैं जिससे शासक ;अर्थात राजा की प्रभुसत्ता और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता हो। जो लोग इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करेंगे उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा,उनकी पत्नियों और लड़कियों के साथ जबरदस्ती की जायेगी और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।'http://www.huffingtonpost.com/alastair-crooke/isis-wahhabism-saudi-arabia_b_5717157.html
  यह संस्करण सऊदी शासकों को भाता था क्योंकि इससे वे तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बरकरार रख सकते थे। यह अमरीका के लिए भी बहुत काम का था क्योंकि इसमें काफिर ;जो सत्य को छुपाता है का अर्थ गैर.मुस्लिम या 'दूसरा' कर दिया गया था। इस संस्करण में जिहाद का अर्थ है गैर.मुस्लिम की जान लेना। इस्लाम के जानेमाने विद्वानों का कहना है कि जिहाद का अर्थ है अच्छे काम करने की हर संभव कोशिश करना। इस्लाम, जो यह कहता है कि'मेरे लिये मेरा दीनए तुम्हारे लिये तुम्हारा' और जो यह कहता है कि 'इसी कारण इजरायल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इंसान को कत्ल के बदले या जमीन में बिगाड़ फैलाने के सिवाए किसी और वजह से कत्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इंसानों को कत्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इंसानों को जीवनदान दिया ;कुरान,अध्याय 5, आयत 32। शांति के पैरोकार इस धर्म के नाम पर मासूमों को मारा गया। इस्लाम का यह संस्करण उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी था जो दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर रूसी सेना से लड़ना चाहते थे। परंतु समस्या यह है कि ब्रेनवाश करके जिन लड़ाकों को तैयार किया गया था वे सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के बाद भी उतने ही कट्टर बने रहे। रूसी सेना को हराने के बाद अल कायदा इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये संस्करण में विश्वास करता रहा और उसके पास अमरीका द्वारा उसे उपलब्ध कराये गये खतरनाक हथियार बने रहे। उनके दिमाग में वहाबी इस्लाम भरा हुआ था और हाथों में अमरीकी बंदूकें थीं। इसी का नतीजा है कि आईसिस का अस्तित्व में आना, उनका यह भ्रम कि वे अब दुनिया पर शासन कर सकते हैंए उनके द्वारा खलीफा को गद्दी पर बैठाया जाना और उसके बाद पागलपन के कामों की लंबी श्रृंखला।
जाहिर है कि अमरीका बांटो और राज करो की नीति का इस्तेमाल ठीक उसी तरह कर रहा है जैसे कि पहले साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं। भारत में साम्राज्यवादियों ने सांप्रदायिक राजनीति के बीच बोये। पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दशकों के दौरान, अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य रहा है नस्लीय और सांप्रदायिक विभाजनों को और गहरा करना, और उनके आधार पर छोटे.छोटे देशों का गठन करवाना। यही कारण है कि शियाओं, सुन्नियों और कुर्दों आदि के बीच हिंसा को अमरीका प्रोत्साहन दे रहा है। एक ओर अमरीका बांटो और राज करो की अपनी नीति लागू कर रहा है और दूसरी ओर वह पूरी दुनिया में इस्लाम का दानवीकरण भी कर रहा है और इसका आधार बनाया जा रहा है अल कायदा और आईसिस जैसे संगठनों के कुकर्मों को।
शक्तिशाली निहित स्वार्थी तत्व,अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म का दुरूपयोग करने पर आमादा हैं। वे एक धर्म विशेष के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसे दौर में आमजनों को तार्किक ढंग से सोचने के लिए राजी करना दुष्कर कार्य है। जो धारणायें लोगों के दिमागों में बैठ गयी हैं उन्हें निकालना आसान नहीं है। परंतु यदि हमें अपने समाज में शांति और प्रगति लानी है तो हमें यह करना ही होगा। 
 -  राम पुनियानी

शुक्रवार, 7 जून 2013

नफरत से प्यार करने वालों को करें नजरअंदाज



घृणा फैलाने वाली वक्तव्य और साम्प्रदायिक राजनीति

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महात्मा गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव की खातिर अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी . जिन्हें इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच प्रेम की बात करते थे . उन महात्मा के पास तीन बंदरों की एक छोटी सी मूर्ति थी। इनमें से एक बंदर अपने मुंह पर हाथ रखे हुए था। इसका अर्थ यह था कि हमें बुरा नहीं बोलना चाहिए। जो लोग शांति और अमन की राह पर चल रहे हैं, वे विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक करने की बात करते हैं जिनके लिए राजनीति एक व्यापार है, जिसे वे धर्म के नाम पर खेलते हैं, वे लगातार दूसरे समुदायों के विरूद्ध जहर उगलते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तरह की घृणा फैलाने वाली बातों से हिंसा भड़कती है और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच की खाई और चौड़ी होती है। हमारी यह स्पष्ट मान्यता है कि राजनैतिक दलों और समूहों की उनकी नीतियों को लेकर आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए . यह बुरा बोलना नहीं है और न ही यह किसी धार्मिक समुदाय विशेष पर हमला है। घृणा फैलाने वाली बातें साम्प्रदायिक राजनीति के पैरोकारों का प्रमुख हथियार हैं। उन्हें यह अच्छी तरह से मालूम है कि "दूसरे से घृणा करो"की राजनीति चुनाव में उन्हें बहुत लाभ पहुंचा सकती है।
इस संदर्भ में, सबसे ताजा मामला वरूण गांधी का है। उनका महात्मा गांधी से कोई लेना देना नहीं है परन्तु वे साम्प्रदायिक सद्भाव के एक बहुत बड़े मसीहा पंडित जवाहरलाल नेहरू के परिवार से हैं। वरूण गांधी ने सन् 2009 में एक आमसभा में घृणा फैलाने वाली बातें कहीं थीं। पीलीभीत में भाषण देते हुए उन्होंने दूसरों के हाथ काट डालने और ऐसी ही कई बेहूदा और निम्नस्तरीय बातें कहीं थीं। उनके भाषण को कैमरे पर रिकार्ड कर लिया गया और उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर लिए गए। सारे सबूतों के होते हुए भी उन्हें अदालत ने बरी कर दिया क्योंकि सभी गवाह पलट गए। यह घटनाक्रम हमें गुजरात के बेस्ट बेकरी मामले की याद दिलाता है, जहां भी धन के लालच में या डर के चलते अधिकांश गवाह पक्षद्रोही हो गये थे। तहलका द्वारा किये गये स्टिंग आपरेशन से यह साफ हुआ कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने किस प्रकार या तो गवाहों को खरीद लिया था या फिर उन्हें डरा.धमका कर अदालत में अपने ही पहले के बयानों से मुकरने पर मजबूर कर दिया था। भारत में गवाहों की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता लम्बे समय से यह मांग कर रहे हैं कि सुनियोजित हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिए यह आवश्यक है कि गवाहों को उनके जानोमाल की हिफाजत की गारंटी दी जाए। जहीरा शेख मामले में भी निचली अदालत ने गवाहों के पक्षद्रोही हो जाने के कारण  आरोपियों को बरी कर दिया था।
वरूण गांधी के मामले ने एक बार फिर देश का ध्यान गवाहों के पलटने की समस्या पर केन्द्रित किया है। तहलका ने एक बार फिर यह साबित किया है कि गवाहों को "मैनेज" किया गया था।  इसमें कोई संदेह नहीं कि घृणा फैलाने वाले लोगों को यदि इसी प्रकार दोषमुक्त किया जाता रहा तो उनके हौसले बढ़ते ही जायेंगे। इस मुद्दे से एक और पहलू जुड़ गया है। हाल में "आल इंडिया मजलिस ए इत्तहादुल मुसलमीन" के अकबरद्दीन ओवेसी को गिरफ्तार किया गया और वे अपने "हिन्दू विरोधी भाषण" के लिए मुकदमें का सामना कर रहे हैं। यह बिलकुल ठीक हो रहा है। दोषियों को सजा मिलनी इसलिए जरूरी है ताकि इस तरह की घटनाएं दोहराई ना जाएं। ओवेसी के भाषण के जवाब में प्रवीण तोगड़िया ने भी उतना ही भडकाऊ भाषण दिया। उनके विरूद्ध एफआईआर तो दर्ज कर ली गई परन्तु इससे आगे कोई अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। तोगड़िया इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं परन्तु उन्हें केवल एक बार जेल की सलाखों के पीछे डाला गया है। जाहिर है कि उनकी हिम्मत बढ़ती जा रही है।
घृणा फैलाने वाले भाषणों के मामले में भारतीय संविधान और कानूनों में बहुत स्पष्ट प्रावधान हैं। भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और कई अन्य कानून, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा को परिभाषित करते हैं और घृणा फैलाने वाली बातें कहने या लिखने को प्रतिबंधित करते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 95ए राज्य सरकार को किसी भी प्रकाशन को प्रतिबंधित करने का हक देती है अगर राज्य सरकार की दृष्टि में प्रकाशन में ऐसी कोई बात कही गई है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए या 153 ए या 153 बी या 292 या 293 या 295 ए के तहत् दण्डनीय अपराध है। भारत नागरिक और राजनैतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता;आईसीसीपीआर का हस्ताक्षरकर्ता है, जो यह कहता है किराष्ट्रीय, नस्लीय या धार्मिक आधार पर घृणा फैलाने की ऐसी कोशिश, जिसका उद्देश्य हिंसा भड़काना, शत्रुता का भाव उत्पन्न करना या भेदभाव करने के लिए प्रेरित करना हो, कानून के अन्तर्गत प्रतिबंधित होगी। हमें यह याद रखना चाहिए कि हर समुदाय में विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी समुदाय विशेष के बारे में घृणा फैलाने वाली बातें कहता है तो वह उस समुदाय के सभी सदस्यों को एकसार बताता है। यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। एक सेवानिवृत्त अधिकारी जे.बी. डिसूजा ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद मुंबई में हुई हिंसा के दौरान और उसके पश्चात, घृणा फैलाने वाली बातें कहने के आरोप में बाल ठाकरे के विरूद्ध मामला दायर किया था। परन्तु उन्हें उनके इस प्रयास में कोई खास सफलता नहीं मिल सकी, क्योंकि हमारे कानून में ढेर सारे छेद हैं।
यद्यपि मूलतः भारत की सांस्कृति शांति और सद्भाव की संस्कृति है तथापि विशिष्ट धार्मिक समुदायों को घृणा का पात्र बनाने के प्रयास ब्रिटिश शासन काल में ही शुरू हो गये थे। अपनी फूट डालो राज करो की नीति के तहत ब्रिटिश शासकों ने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और साम्प्रदायिक तत्वों को एक दूसरे के समुदायों के विरूद्ध लोगों को भड़काने के लिए प्रोत्साहित किया।  अंग्रेजों ने अपनी विभाजनकारी राजनीति खेलने के लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को चुना। दोनों धर्मों के लोगों की जीवन शैली के कुछ चुनिंदा पक्षों को घृणा फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। सूअर का मांस खाना, गाय का मांस खाना, मस्जिद के सामने बाजे बजाना, मंदिरों का विध्वंस, तलवार की नौंक पर इस्लाम का प्रसार आदि कुछ ऐसी चुनिंदा थीम थीं, जिनका इस्तेमाल दशकों तक घृणा फैलाने और हिंसा भड़काने के लिए किया जाता रहा। आडवाणी की रथयात्रा में भी इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया था। मुस्लिम राजाओं द्वारा मंदिरों का विध्वंस करने के मुद्दे को पागलपन की हद तक हवा दी गई। एक जुनून.सा पैदा कर दिया गया। इस घृणा से उपजी हिंसा और रथयात्रा जहां जहां से भी गुजरी, वहां खून बहा।
आज भी कई लोग बांटने वाले दुष्प्रचार का बड़ी कुटिलता से इस्तेमाल कर रहे हैं। कई वेबसाईटें इस काम में जुटी हुई हैं और भड़काऊ ई.मेलों को एक व्यक्ति से दूसरे, दूसरे से तीसरे को भेजा जा रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी एक अन्य ऐसे राजनेता हैं जो नियमित तौर पर घृणा फैलाने वाली बातें कहते रहें हैं परन्तु उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ। मुसलमानों के प्रति घृणा से लबरेज उनके एक लेख के प्रकाशन के बाद यद्यपि भारत में उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई तथापि अमरिका के एक विश्वविद्यालय से उनकी प्रोफेसरी समाप्त कर दी गई। आज भी उनकी घृणा फैलाने वाले भाषण के वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। ऐसी चीजों को हमारा समाज नजरअंदाज करता आ रहा है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह के वीडियो, ई.मेल और भाषण हमारी राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाते हैं। वरूण गांधी के मामले से यह साफ है कि हमारी न्याय व्यवस्था में दोषियों के लिए बच निकलना बहुत आसान है। वे घृणा फैलाने वाली बातें कहकर राजनैतिक लाभ भी अर्जित कर लेते हैं और बाद में उन्हें अपने किए की कोई सजा भी भुगतनी नहीं पड़ती है।
वैश्विक स्तर पर 9/11 के डब्ल्यूटीसी हमले के बाद से अमरीकी मीडिया में इस्लाम और मुसलमानों को खलनायक सिद्ध करने का अभियान चल रहा है। इसी अभियान का यह नतीजा यह है की वहां पर आम मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। हाल में इंग्लैण्ड में भी इस तरह के हमले बढ़े हैं। इनमें शामिल हैं ड्रम वादक लीराईट बी की वुलेच में हत्या। हम एक डरावने दौर से गुजर रहे हैं जब प्रेम और सद्भाव के मूल्यों को हर ओर से चोट पहुंचाई जा रही है।
अपनी एक कविता में जावेद अख्तर लिखते हैं भूल के नफरतए प्यार की कोई बात करें। काश हम सब इसे गंभीरता से लेते। वरूण गांधी, ओवेसी, तोगड़िया जैसे लोग जहां नफरत की तिजारत कर रहे हैं वहीं ऐसे लोग भी हैं जो शांति मार्च निकाल रहे हैंए अमन के गीत गा रहे हैं और सद्भाव की खुशबू फैला रहे हैं। हमारे ये ही मित्र राष्ट्रीय एकीकरण की नींव रखेंगे और घृणा फैलाने वाली बातों पर विजय प्राप्त करेंगे। अब समय आ गया है कि हम उन सब लोगों को एक सिरे से खारिज करें जो किसी धर्म विशेष या उसके मानने वालों को घृणा का पात्र सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं।
.-राम पुनियानी

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

त्रिशूल की लंबी होती छाया

मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी
पिछले कुछ महीनों ;अप्रैल २०१३ से बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार, उनकी गठबंधन साथी भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की छवि एक धर्मनिरपेक्ष नेता की होनी चाहिए। स्पष्टतः, उनका इशारा गुजरात के 2002 के कत्लेआम में मोदी की भूमिका की तरफ है। उन्होंने यह भी कहा कि वाजपेयी के साथ काम करने में उन्हें कोई समस्या नहीं थी और ना ही आडवाणी के साथ होगी। यह साफ है कि चाहे मोदी हों, वाजपेयी या आडवाणी.सभी एक ही थाली के चट्टे.बट्टे हैं। ये सब आर.एस.एस. के प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं। आर.एस.एस. हिंदुत्व के प्रति प्रतिबद्ध है और वह भारत को धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र के स्थान पर हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है। वाजपेयी ने इस लक्ष्य की प्राप्ति में अपने ढंग से योगदान दिया। उन्होंने भाजपा को उस दौर में स्वीकार्यता दिलवाई जब सभी दल उसकी छाया तक से दूर भाग रहे थे। इसके लिए वाजपेयी को उदारवादी मुखौटा लगाना पड़ा। बाबरी मस्जिद के विध्वंस और उसके बाद हुए सांप्रदायिक दंगों की यादें, जनता के दिमाग में ताजा है। उस समय, पार्टी के विभाजकारी एजेंडे को लागू करने की जिम्मेदारी आडवाणी की थी। बाद में, आडवाणी भी अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि गढ़ने का प्रयास करने लगे।
नीतीश  कुमार और उनके जैसे अन्य नेताओं.जिनमें जयप्रकाश नारायण भी शामिल हैं.ने ही भाजपा को स्वीकार्यता और सम्मान प्रदान किया है। नीतीश कुमार की कोई वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है और उन्हें सत्ता और केवल सत्ता से मतलब है।
इन दिनों मोदी का इतना विरोध क्यों हो रहा है? एक कारण तो यह है कि कई नेताओं और दलों को ऐसा लग रहा है कि मोदी का विरोध करने से उन्हें मुसलमानों के वोट प्राप्त होंगे। जो भी प्रजातंत्र के पैरोकार और कमजोर वर्गों की अधिकारों की लड़ाई में उनके पक्षधर हैं, उन्हें चाहिए कि वे यह सुनिश्चित करें कि मोदी.भाजपा राजनीति के हाशिए पर रहें और चुनावों में विजय न हासिल कर सकें। नीतीश कुमार क्या और क्यों सोच रहे हैं, यह कहना मुश्किल है। परंतु एक बात साफ है . और वह यह कि भाजपा बदल रही है। सांप्रदायिक एजेंडे वाले एक दल से वह सांप्रदायिक, फासिस्टी कार्यवाहियां करने वाली पार्टी बन रही है। मोदी के नेतृत्व ने उसके सांप्रदायिक, फासिस्टी चरित्र  को और उभारा है। अब वह सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है। वह अपने एजेंडे को लागू करने के लिए अब सड़कों और चौराहों पर खून बहाने को तैयार है।
भाजपा में आया यह परिवर्तन और मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना, इस बात के सुबूत हैं कि फासीवाद भारत के द्वार पर दस्तक दे रहा है। अगर उदारवादी मूल्यों की पैरोकार और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की हामी ताकतें अब भी नहीं चेतीं तो फासिज्म की भारत में आमद को कोई नहीं रोक सकेगा। जर्मनी और इटली को अपने बूटों तले रोंदने वाले फासीवाद और भाजपा में .विशेषकर मोदी के संभावित नेतृत्व में . कई समानताएं हैं। भाजपा जिन आर्थिक सुधारों पर जोर दे रही है उनमें से कई की उपादेयता से यूपीए का मुख्य घटक दल कांग्रेस भी सहमत है। कई अन्य ऐसे कारक हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि मोदी, कट्टर फासीवादी हैं। मोदी के अल्पसंख्यकों के प्रति रूखे और क्रूर व्यवहार का उद्धेश्य बहुसंख्यक समुदाय को अपने साथ जोड़ना है। निसंदेह, सांप्रदायिक धुव्रीकरण की यह प्रक्रिया भारत में लंबे समय से चल रही है और इसे अंजाम दिया जा रहा है सांप्रदायिक दंगों के जरिए। अभी हाल के कुछ वर्षों में, आर.एस.एस. ने सांप्रदायिक धुव्रीकरण करने के अपने काम की आउटसोर्सिंग राज्यतंत्र को कर दी है। यह महाराष्ट्र के धुले में कुछ माह पहले हुए सांप्रदायिक दंगों से स्पष्ट है जहां कि पुलिसकर्मियों ने मुसलमानों पर हमले किये। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने और साम्प्रदायिक.फासीवादी विचारधारा को मजबूती देने के लिए आतंकी हमलों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। हर आतंकी हमले के लिएए चाहे वह किसी ने भी किया होए मुसलमानों को दोषी ठहराया जाता है। साम्प्रदायिक दुष्प्रचार ने समाज के एक तबके को इस हद तक प्रभावित कर दिया है कि मोदी, उसके नायक बन गए हैं।
राज्य तंत्र के विभिन्न हिस्सों के साम्प्रदायिकीकरण की प्रक्रिया ने नए आयाम ले लिए हैं। नौकरशाही का एक हिस्सा साम्प्रदायिक ताकतों में शामिल हो गया है। मीडिया,  विभाजनकारी सोच को प्रोत्साहन दे रही है और संघ परिवार के सदस्यों के उत्तेजक वक्तव्यों को जरूरत से ज्यादा महत्व। सास भी कभी जैसे सीरियल,प्रतिगामी मूल्यों को बढ़ावा दे रहे हैं। ढ़ेर सारे बाबा , गुरू और भगवान ऊग आए हैं जो मीठी चाशनी में लपेटकर   जातिगत और लैंगिक ऊंचनीच के वही पुराने मूल्य जनता के समक्ष पेश कर रहे हैं। यही मूल्य साम्प्रदायिक व विघटनकारी राजनीति का आधार हैं।
मोदीए बड़े औद्योगिक घरानों के अलावा आईटी.एमबीए वर्ग के भी प्रिय पात्र बन गए हैं। यही वर्ग अन्ना.केजरीवाल.रामदेव के उभरने के पीछे भी हैए जिन्होंने संसदीय प्रजातंत्र के प्रति अविश्वास का भाव पैदा करने की कोशिश की और  भ्रष्टाचार, जो कि हमारी व्यवस्थागत कमियों का एक लक्षण मात्र है, को बहुत बढ़ा.चढ़ाकर प्रस्तुत किया। अदानी, टाटा और अम्बानी, मोदी के गीत इसलिए गा रहे हैं क्योंकि मोदी ने उन्हें मुफ्त जमीनें और ढेर सारे अनुदान दिए हैं। मोदी ने विकास का छलावा पैदा करने के अलावा स्वयं की छवि एक जनप्रिय नेता की बनाने में भी सफलता हासिल की है। इतिहास गवाह है कि किसी भी देश में फासीवाद का आगाज हमेशा करिश्माई जननेताओं के नेतृत्व में होता रहा है। अपने प्रचार तंत्र और बड़े औद्योगिक समूहों की सहायता से, मोदी करिश्माई नेता के रूप में उभरने की तैयारी कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस और अन्य पार्टियां प्रजातंत्र का जीता.जागता प्रतीक हैं। कांग्रेस ने भी कई मौकों पर प्रजातांत्रिक अधिकारों को सीमित करने का प्रयास किया है। परंतु मोदी तो तानाशाही का जीता.जागता नमूना हैं। उनकी राजनीति में मतभिन्नता और उदारता के लिए कोई स्थान नहीं है। गुजरात की राजनीति से साबका रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि वहां मोदी ने किस तरह का एकाधिकार कायम कर रखा है। वे अपने विरोधियों  को . चाहे वे पार्टी के अंदर हो या बाहर . तनिक भी सहन नहीं करते। हममें में से कई तानाशाहीपूर्ण शासन और अधिनायकवादी फासीवाद के बीच अंतर नहीं कर पाते। कई राजनैतिक ताकतों ने आपातकाल ;इंदिरा गांधी, 1975 को फासिस्ट राज बताया था। परंतु आपातकाल के लिए फासिज्म शब्द का प्रयोग सही नहीं है। फासिज्म हमेशा एक जनांदोलन से उभरता है। आपातकाल का जन्म किसी जनांदोलन से नहीं हुआ था। इसके विपरीत, भाजपा.मोदी जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं वह एक जनांदोलन है और उस आंदोलन के करिश्माई नेता की जिम्मेदारी संभालने के लिए मोदी तैयार बैठे हैं। नीतीश कुमार चाहे जिस कारण से मोदी का विरोध कर रहे हों परंतु हम सबको यह समझना होगा कि आज के हमारे राजनैतिक नेताओं से मोदी कई मामलों में एकदम अलग हैं। आशीष नंदी ने बिल्कुल ठीक कहा था कि मोदी में फासिस्ट नेता के सभी गुणधर्म हैं। अभी हाल में नंदी ने अपने एक लेख ब्लेम द मिडिल क्लास ;मध्यम वर्ग है दोषी में जोर देकर कहा है कि मध्यम वर्ग के कारण ही भारत पर फासीवाद का खतरा मंडरा रहा है और यही वर्ग मोदी का सबसे बड़ा प्रशंसक भी है।
इसके बावजूद, खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। भारतीय राजनीति की विभिन्नता, मोदी एण्ड कंपनी के रास्ते में बाधक है। दमित और शोषित वर्गों का अपने अधिकारों के लिए संघर्ष, मोदी के नेतृत्व में साम्प्रदायिक फासीवाद के बढ़ते कदमों को थाम सकता है। परंतु एक प्रमुख समस्या यह है कि जहां तक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था का प्रश्न है, कांग्रेस की विश्वसनीयता संदिग्ध है। कांग्रेस को आमजन 1984 के सिक्ख कत्लेआम के लिए दोषी ठहराते हैं और यह सही भी है। यह भी सही है कि धर्मनिरपेक्षता और उससे जुड़े मुद्दों पर कांग्रेस ने अवसरवादी नीतियां अपनाई हैं और भाजपा.मोदी, इस स्थिति का पूरा लाभ उठा रहे हैं।
हम सबको यह समझना होगा कि हमारे देश के सभी राजनैतिक दल अवसरवादी हैं और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से कभी न कभी समझौता कर चुके हैं। परंतु इसके बावजूद, उनमें से किसी की भी तुलना भाजपा.मोदी से नहीं की जा सकती क्योंकि ये दोनों उस आरएसएस के एजेंट हैं जो भारत को फासीवादी, हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया के कई देशों में धर्म के नाम पर ऐसी राजनीति का उदय हो रहा है जिसमें फासीवाद की झलक देखी जा सकती है। हमारे पड़ोसी मुल्कों में इस्लाम के नाम पर फासीवाद जड़ें जमा रहा है।
हम सबको यह समझना होगा कि प्रजातंत्र का कोई विकल्प नहीं है और धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति, प्रजातंत्र को दफ़न कर देगी। भारत में फासीवाद बहुत धीमी गति से अपने कदम बढ़ा रहा है और शायद इसलिए हम उसके खतरे को उतनी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं जितना कि लिया जाना चाहिए। क्या यह फासीवाद नहीं है कि हिन्दुत्व के आलोचकों को हिन्दू.विरोधी बताया जा रहा है?
समय आ गया है कि सभी प्रजातांत्रिक ताकतें एक संयुक्त मोर्चा बनाकर देश को फासीवाद के संकट से बचाएं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो नरेन्द्र मोदी और उनके साथी हमारे देश को फासीवाद की लंबी,अंधेरी सुरंग में धकेल देंगे।
 -राम पुनियानी

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हिंदू धर्म को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास




यद्यपि धर्म को परिभाषित करना, मूलतः, धर्मशास्त्रियों का काम है, तथापि समय.समय पर विभिन्न न्यायिक अधिकरण और न्यायाधीश, अपनी.अपनी बुद्धि व सोच के आधार परए हिंदू धर्म की प्रकृति के सम्बन्ध में अपने.अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं. इनमें से अधिकांश की सोच वर्तमान राजनीति से प्रेरित रही है .. उस राजनीति से जो हिंदू धर्म को अपने लक्ष्यों के अनुरूप परिभाषित करना चाहती है यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि हाल में आयकर अपीलीय अधिकरण ने यह घोषणा कर दी कि हिंदू धर्म, दरअसल, कोई धर्म ही नहीं है और यह कि शिव, हनुमान और देवी दुर्गा किसी धर्म.विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करते वरन वे तो बरह्मंड की महाशक्तियां हैं! इसी माह पारित अपने एक आदेश  में, आयकर अपीलीय अधिकरण, नागपुर ने कहा कि हिंदू देवी.देवताओं की पूजा.अर्चना और मंदिर के रखरखाव को धार्मिक गतिविधियां नहीं कहा जा सकता.
न्यायाधिकरण ने कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिंदू  धर्म, कोई धर्म नहीं है और ना ही हिंदुओं को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है, शिव मंदिर देवस्थान पञ्च समिति सनातनीश् ने यह तर्क प्रस्तुत किया था कि  चूँकि उसके द्वारा संचालित मंदिर के द्वार सभी धर्मों और पंथों के लोगों के लिए खुले हुए हैं इसलिए मंदिर किसी धर्म.विशेष का नहीं है और मूर्तियों की स्थापना, धर्मिक गतिविधि नहीं है.
यह तर्क नितांत हास्यास्पद है क्योंकि मूर्तिपूजा, हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण भाग है और इस्लाम व ईसाई धर्म के मानने वालेए मूर्तिपूजा नहीं करते. मूर्तिपूजा, निःसंदेह, हिंदू धार्मिक गतिविधि है यही कारण है कि राममंदिर आन्दोलन खड़ा किया गया और बाबरी मस्जिद को जमींदोज किया गया ताकि उसके स्थान पर राम मंदिर का निर्माण कर, उसमें रामलला की मूर्ति स्थापित करने का धार्मिक कर्त्तव्य पूरा किया जा सके. शिव, हनुमान और देवी दुर्गा को श्महाशक्ति बताने का क्या उद्देश्य है? वर्तमान विश्व राजनीति मेंए अमरीका को विश्व की महाशक्ति कहा जाता है. अधिकरण ने दुर्गा, हनुमान व शिव को बरह्मंड की महाशक्तियां बताया है.अधिकरण के विद्वान सदस्यों को यह पता होना चाहिए कि हिंदू धर्म में अलौकिक शक्ति की अवधारणा बहुस्तरीय है.इसकी शुरुआत होती है, बहुदेववाद से, जिसमें अलग.अलग देवी.देवताओं के अलग.अलग कार्यक्षेत्र है.वर्षा के देवता इन्द्र हैं तो मारूत, हवा के देवता है. शक्ति की प्रतीक दुर्गा हैं तो सरस्वती, ज्ञान की देवी हैं.यहाँ तक कि सेक्स.सम्बन्धी मामलों का प्रभारी एक अलग देवता ;कामदेव है. इसके ऊपर का स्तर त्रिदेववाद का है, जहाँ ब्रह्मा, सृष्टि निर्माता हैंए विष्णुए पालनकर्ता हैं और शिव, विनाशक हैं. तीसरे स्तर पर एकेश्वरवाद है,जिसमें केवल एक ईश्वर की परिकल्पना है हनुमान तो एक पौराणिक चरित्र हैं, राम के सेवक है और उन्हें भगवान भी कहा जाता है.
ये सारी अवधारणाएँ हिंदू धर्म का भाग हैं और यह कहना कि इनमें सभी धर्मों के लोग विश्वास करते हैंए सच को झुठलाना है हिंदू धर्म के अलग अलग पंथ, अलग.अलग देवताओं की आराधना करते हैं इनमें से कुछ विष्णु के अवतार हैं जैसे राम और कृष्ण. यूनानी धर्मशास्त्र में भी कुछ.कुछ इसी तरह का बहुदेववाद है. ईसाई धर्मं में पिताए पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रिदेववाद प्रचलित है,ये सभी मान्यताएं धर्म.विशेष से जुड़ी हुईं हैं और इतर धर्मों पर लागू नहीं होतीं.अधिकरण के आदेश के विपरीत, हम जानते हैं कि बौद्ध व जैन जैसे कुछ धर्म अलोकिक शक्तियों में विश्वास नहीं करते. भारत में विकसित कुछ और धार्मिक परम्पराओं जैसे चार्वाक की भी अलौकिक शक्तियों में आस्था नहीं थी.
जहाँ तक न्यायाधिकरण के इस निष्कर्ष का प्रश्न है कि हिंदू, कोई धर्म नहीं हैं क्योंकि उसमें कई अलग.अलग धारायें हैं, उसे तुरंत खारिज किया जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदू धर्म में विभिन्न धाराएं हैं परन्तु इसका कारण यह है कि इस धर्म का कोई एक पैगंबर नहीं है. यह धर्म किस्तों में, एक लंबे अंतराल में,  अस्तित्व में आया है. इसलिए इस धर्मं में विभिन्नताएं तो हैं परन्तु ये विभिन्नताएं, हमें यह इज़ाज़त नहीं देतीं कि हम इस इसे एक धर्म ही न मानें.
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है. इसके कई कारण हैं. पहला यह कि इस धर्म का कोई एक जन्मदाता नहीं है. दूसरा यह कि दुनिया के इस भूभाग में उभरे दो विभिन्न धर्मों को हिंदू धर्म का हिस्सा मान लिया गया है और तीसरे, हिंदू धर्म में इतनी विभिन्नताएं हैं कि उसे एक झंडे.तले रखना मुश्किल प्रतीत होता है.   विशेष बात यह है  कि अलग.अलग समय में स्थापित परंपराएं और कर्मकांड, आज भी इस धर्म का हिस्सा बने हुए हैं. भगवान सत्यनारायण से लेकर संतोषी माता और  देवी दुर्गा से लेकर निराकार, निर्गुण ईश्वर की परिकल्पनाएं इस धर्म में एक साथ जीवित हैं.
हिंदू धर्म जिस मामले में अन्य धर्मों से भिन्न है वह है उसकी जाति व्यवस्था. यह धर्म सामाजिक ऊंचनीच को धार्मिक स्वीकार्यता प्रदान करता है. जाति व्यस्वथा को हिंदू धर्म के ग्रंथों और उसकी परंपराओं व रीति.रिवाजों में स्वीकृति प्राप्त है. जिन   परिस्थितियों में यह व्यवस्था अस्तित्व में आयी, उनसे भी हमें इसे समझने में मदद मिलती है. आर्य, जो कई दौरों में भारत आये, पशुपालक और बहुदेववादी थे. शुरुआती दौर में वेद रचे गए, जो तत्कालीन समाज के मूल्यों की झलक हमें  दिखलाते हैं. वह बहुदेववाद का युग था और अलग.अलग देवताओं के पास अपने.अपने विभाग  थे. मनु के नियम समाज के पथप्रदर्शक थे, वैदिक युग के बाद आया, ब्राह्मणवाद का युग, जिसमें समाज बाहरी प्रभावों से दूर रहा. जाति व्यवस्था के चलते, समाज का अभिजात्य वर्ग को सामान्यजनों से दूरी बनाने में जाति व्यवस्था ने मदद की. इसके बाद, जाति व्यवस्था को बौद्ध धर्म की चुनौती ने ब्राह्मणवाद को  बदलने पर मजबूर किया और उसके नतीजे में वह अस्तित्व में आया, जिसे हम आज हिंदू धर्म कहते हैं. इस दौर में  पंथिक प्रथाओं  के निर्वहन में आमजनों को भी शामिल किया गया और सार्वजनिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों का सिलसिला प्रारंभ किया गया ताकि आम लोगों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोका जा सके.
यह दिलचस्प है कि आठवीं शताब्दी तक, तथाकथित हिंदू ग्रंथों में, हिंदू शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया है. यह शब्द तो अरब निवासीयों और मध्य.पूर्व के मुसलमानों के इस भूभाग पर आगमन के बाद अस्तित्व में आया. वे सिंधु नदी के पूर्व में रहनेवालों को हिन्दू कहने लगे. प्रारंभ में, हिंदू शब्द का भौगोलिक अर्थ था.इसके बाद, इस क्षेत्र में विकसित हो रहे धर्मों को हिंदू धर्मों की संज्ञा दी गयी. जाति व्यवस्था के कारण, हिंदू धर्म में धर्मप्रचार के लिए कोई स्थान नहीं था. उलटे, जाति व्यवस्था के पीड़ितों ने बौद्ध, इस्लाम और बाद में ईसाई व सिक्ख धर्मों को अपनाने की हर संभव कोशिश की.
हिंदू धर्म में भी दो धाराएं स्पष्ट नज़र आतीं हैं . ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा. श्रमण परंपरा ने  जाति व्यस्वथा को ख़ारिज किया और ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध. ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बना रहा परन्तु साथ ही अन्य धाराएँ जैसे तंत्र, भक्ति, शैव, सिद्धांत आदि का अस्तित्व भी बना रहा.श्रमण परंपरा ने वैदिक नियमों और मूल्यों को तरजीह नहीं दी.जहाँ ब्राह्मणवाद, समाज को जातियों के खांचों में बांटता था, वहीं श्रमणवादी इस विभाजन के विरोधी थे.ब्राह्मणवाद हिंदू धर्म की प्रधान धारा इसलिए बना रहा क्योंकि उसे राज्याश्रय मिला. कालांतर में, नीची जातियों की धार्मिक परंपराओं को नकार कर, ब्राह्मणवाद को ही हिंदू धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया गया. यह प्रक्रिया, मगध.मौर्य साम्राज्य के दौरान बौद्ध व जैन धर्मों के दमन के बाद शुरू हुई. बाद में, अंग्रेजों ने, भारतीय समाज को समझने के अपने प्रयास के चलते, सभी गैर.ईसाई व गैर.मुसलमानों को, ब्राह्मणवादी मानदंडों पर आधारित, हिंदू पहचान दे दी. वेदों व अन्य ब्राह्मणवादी ग्रंथों को हिंदू ग्रन्थ कहा जाने लगाण् इस प्रकार, हिंदू धर्म में निहित विभिन्नताओं को परे रक् कर, केवल ब्राह्मणवाद को हिंदू धर्मं का दर्ज़ा दे दिया गया. जिसे हम आज हिंदू धर्मं कहते हैं, दरअसल वह, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों, ग्रंथों व ब्राह्मणों की सत्ता पर आधारित है.
वर्तमान हिंदू धर्म, धर्म के सभी समाजशास्त्रीय मानदंडों पर खरा उतरता है.यह अलग बात है कि उसपर ब्राह्मणवाद का वर्चस्व है. यह कहना कि हिंदू कोई धार्मिक समुदाय नहीं है, पूरी तरह से गलत है.
-राम पुनियानी

सोमवार, 24 सितंबर 2012

विश्व बैंक के कारिंदों से अब समझना होगा इस देश को!


यह देश अब विश्वबैंक के शिकंजे में हैं। हम कैसे जिये और हमारी जरुरतें क्या हैं, इसे तय करना न हमारे बस में है और न हमारी संसद के  अखितयार में। पांच करोड़ व्यापारी परिवारों के विशाल वोट बैंक के मद्देनजर संघ परिवार खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी के खिलाफ हैं, बाकी सुधारों पर उन्हें कोई एतराज नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में  इतिहास बनाने वाले विनिवेश मंत्री अरुण शौरी सुधार मुहिम में मजबूती के साथ डां. मनमोहन सिंह के साथ खड़े हो गये।उनका मानना है कि रीटेल में एफडीआई के मुद्दे पर फिजूल में हो-हल्ला मचाया जा रहा है।अरुण शौरी ने कहा है कि खुदरा और विमानन क्षेत्रों में एफडीआई से न लोगों को बहुत नुकसान होगा और न ही कंपनियों को बहुत फायदा होगा। उन्होंने डीजल मूल्यवृद्धि का भी समर्थन किया।एक वैश्विक सम्मेलन के दौरान शौरी ने कहा कि खुदरा और विमानन में एफडीआई से ना तो बहुत फायदा होगा और ना ही बहुत नुकसान. यह दोनों पक्षों (कारोबारियों एवं उपभोक्ताओं) के लिए बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं है। उन्होंने कहा कि पांच या छह साल पहले रिलायंस, एयरटेल और बिग बाजार जैसी प्रमुख कंपनियां खुदरा क्षेत्र में आई थीं, लेकिन इनसे छोटे व्यापारी प्रभावित नहीं हुए।शौरी ने कहा कि वास्तव में, आज फ्यूचर ग्रुप और रिलायंस जैसे बड़े खिलाड़ी मुश्किल में हैं न कि छोटे व्यापारी। बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां बहुत बड़ी तादाद में नहीं आ रही हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि भारत में पैर जमाना उनके लिए आसान नहीं है। अरुण शौरी ने कहा कि सुशासन का मूल मंत्र है कि उसकी मलाई ऊपर आनी चाहिए, न कि काई। पूरे देश में बिहार और गुजरात ऐसे दो राज्य हैं, जहां सुशासन दिखता है। बिहार में नीतीश की सरकार में भाजपा शामिल है तो गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी है जिनके राज में आर्थिक सुधार सबसे तेज लागू हुए हिंदुत्व की आड़ में और नरसंहार भी हुआ तो उसे विकास के छाते से ढक दिया गया।
                      नीतीश और मोदी दोनों प्रधामनमंत्रित्व के दावेदार हैं। आडवाणी ने पहले ही संकेत दिया है कि अगला प्रधानमंत्री गैरभाजपाई हो सकता है जबकि कारपोरेट जगत की पहली पसंद मोदी है। दोनों की तारीफ करके संघ परिवार के किस एजंडे को अंजाम दे रहे हैं शौरी अरुण शौरी मशहूर पत्रकार भी है और उन्होंने ही इंदिरा राज के भ्रष्टाचार का पिटारा खोला था, जिसकी परिणति विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व में अभिव्यकत् हुई थी। जाहिर है कि शौरी एक देह में हिंदुत्व,संघ परिवार, मीडिया और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के अवतार हैं। 1968–72 और  1975–77 की अवधि में वे विश्वबैंक में बाहैसियत अर्थशास्त्री काम करते रहे हैं। अब डा. मनमोहन सिंह, मंटेक सिंह आहलूवालिया से लेकर महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी विश्वबैंक की सेवा में रहे हैं।विनिवेश, निजीकरण और विदेशी पूंजी के जरिये भारत देश का कायाकल्प करने में इनसबका भारी योगदान है।मौजूदा  वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने १९६८ में हावर्ड बिजनेस स्कूल से बिजनेस मैनेजमेंट सीखा और देश को मैनेज कर रहे हैं। अमेरिका से बुलाये  गये  बंगाल के वित्तमंत्री अमित मित्र भी फिक्की के चेयरमैन हैं, जो समाजवादी अर्थशास्त्र से बंगाल की मां माटी और मानुष को आजादी दिलाने के लिए अवतरित हैं। सैम पित्रोदा भारत में राजीव गांधी के जमाने से तकनीकी क्रांति के मसीहा हैं तो नंदन निलकणि इंफोसिस की चेयरमैनी छोड़कर भारतीयों को पहचान दिलाने में जुट गये। शौरी भाजपा के हैं तो अमित मित्र तृणमूल कांग्रेस के।इन सज्जनों के अलावा जो भी नीति निर्धारक हैं, उनके तार या वाशिंगटन या विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष  और डब्लूटीओ से जुड़े हैं। ओड़ीशा में अपने पिता की विचारधारा के उलट कारपोरेट साम्राज्य तैयार करने वाले मौजूदा मुख्यमंत्री भी अमेरिका पलट हैं।ये तमाम लोग आम भारतीयों के मुकाबले ज्यादा पढ़े लिखे अत्याधुनिक अमेरिकापरस्त सलोग हैं।आदिवासियों, हिमालय और पूर्वोत्तर के लोगों, विस्थापितों, आत्महत्या कर रहे किसानों, बेरोजगार लोगों, छोटे व्यापारियों, मजदूरों और अर्थव्यवस्था से बाहर तमाम लोगों की तकलीफों  के बजाय उन्हें देश को अमेरिका बना देने की ज्यादा चिंता है और इसीको वे समावेशी विकास के तहत हमारी भलाई मानते हैं, यह स्वाभाविक भी है।हमने ही तो उन्हें अपना भाग्य विधाता बना रखा है! 

अब यह भी समझना चाहिए कि इस अमेरिकीकरण के पीछे हिंदुत्ववादी पुनरूत्थान का कितना बड़ा हाथ है। मीडिया की क्या भूमिका है। भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की असलियत क्या है। १९८० में जब इंदिरा गांधी दुबारा सत्ता में आयी, उससे पहले जेपी आंदलन के जरिये संघ परिवार देश  की राजनीति में बड़ी ताकत बन गया।जनता राज के दरम्यान ही मीडिया में हिंदुत्व की घुसपैठ और वर्चस्व भड़ता ही गया। तमाम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पीछे संग परिवार का समर्थन रहा है। इंदिरा गांधी हमेशा नरम हिंदुत्व को राजनीतिक हथियार बनाती रही, लेकिन राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला तोड़कर १९८४ में आपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी के अवसान के बाद संघ परिवार के समर्थन से जो भारी जनादेश पाया, राम मंदिर का ताला खुलवाकर उसे उग्र हिंदू राष्ट्रवाद में तब्दील करने में भी उन्हींकी निर्णायक भूमिका रही। राजीव के जमाने में ही सैम पित्रोदा भारत में सूचना विस्फोट के जनक बन गये। उदारीकरण का सारा श्रेय मनमोहन सिंह को देना गलत है। अमेरिकीकरण में सूचना विस्फोट की  भूमिका भी है। विश्वनाथ सिंह के उत्थान के पीछे मीडिया का सबसे बड़ हाथ था। मंडल बनाम कमंडल विवाद में हिंदुत्व की निर्णायक जीत के पीछे  भी मीडिया रहा है और वहां भी हथियार भ्रष्टाचार विरोदी अभियान को बनाया गया। राजनीतिक अस्थिरता हिंदुत्व के पुनरूत्थान से हुई और इसी परिदृश्य में विश्वबैंक के अवतारों ने देश की बागडोर संभाल ली। विदेश नीति और राजनय की दिशा बनाने में  बतोर जनताई विदेशमंत्री और फिर भाजपा के इकलौते प्रधानमंत्री की भूमिका के बिना आज की विकासगाथा अधूरी ही रहती। भारत अमेरिकी परमाणु संधि की नींव वाजपेयी ने ही रखी और इजराइल से संबंध भी उन्होने बनाये। भारत में आर्थिक सुधार की नीतियां भले ही  नरसिंह राव ने तैयार कर दी, पर देश के पूरी तरह केशरिया बने बिना ये नीतियां अमल में नहीं आयीं।विनिवेश मंत्रालय और कारपोरेट प्रेधानों की अगुवाई में विनिवेस परिषद बनाकर सार्वजनिक लाभदायक कंपनियों को बेचने की जमीन कतो भाजपा ने ही तैयार की। आज के वित्तमंत्री चिदंबरम तब उनके वित्तमंत्री हुआ करते थे। अब वैश्विक हिंदुत्व और अमेरिकी साम्राज्यवाद का मजबूत गठबंधन है,भारतीय सुरक्षा प्रणाली इजराइल पर निर्भर है तो आर्थिक नीतियां, विदेश नीति और राजनय सीधे वाशिंगटन से तय होती है। इसी परिपक्व संक्रमणकाल में जब नरमेध यज्ञ को पुर्णाहुति दी जानी है और नरसंहार संस्कृति चरमोत्कर्ष पर है, संयोगवश राजग का ही वित्तमंत्री यूपीए का वित्तमंत्री है जो बड़ी काबिलियत से ्पने पुराने एजंडे को अमल में ला रहे हैं।

अमेरिका को आश्वस्त करते हुए हाल ही में निरुपमा राव ने जो कहा कि सरकारें आती जाती रहीं, लेकिन १९९१ के बाद हमारी आर्थिक नीतियों में लगातार निरंतरता बनी हुई है। कम से कम सुधारों के सवाल पर, विदेशी पूजी के सवाल पर कांग्रेस भाजपा साथ साथ हैं। भाजपा किसी भी हालत में यह सरकार गिरा नहीं सकती, यह अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की मजबूरी है। सरकार गिरे तो भाजपा आकर और तेजी से ही लागू करेगी आर्थिक एजंडा, इसमें कोई सुदार नहीं है। उसी तरह बाजार के समर्तन से परिवर्तन लाने वाली ममता भी विदेशी पूंजी के खिलाफ नहीं है, अमित मित्र इसके जीते जागते सबूत है। जाहिर है, खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के खिलाफ जिहाद सिर्फ वोट बैंक साधने का खेल है, कारपोरेट राज खत्म करने  की क्रांति तो कतई नहीं। ठीक उसीतरह जैसे कारपोरेट प्रयोजित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का मकसद भी कारपोरेट लाबिइंग के तहत  कालेधन की व्यवस्था को बनाये रखना ही है। 

 एफडीआई और डीजल मूल्यवृद्धि का भाजपा जमकर विरोध कर रही है। इन मुद्दों की आड में वह सरकार से इस्तीफा भी मांग रही है। लेकिन भाजपा के ही अरुण शौरी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी सरकार के इन फैसलों का समर्थन कर रहे हैं। शौरी का कहना है कि डीजल के दाम में बढ़ोतरी,गैस पर दी जा रही सब्सिडी में कटौती और रिटेल में एफडीआई का फैसला देशहित में है। यह वक्त की जरूरत है। यहीं नहीं, शौरी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी जमकर तारीफ की है।

शौरी ने यहां एक सेमीनार में कहा कि प्रधानमंत्री ने पहली बार अपनी ताकत दिखाई है। शौरी ने कहा कि रिटेल में एफडीआई को लेकर किया जा रहा विरोध बेमानी है। इससे न तो किसी को फायदा होगा और न ही किसी को नुकसान। एनडीए सरकार में मंत्री रह चुके शौरी अपनी बेबाकी बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। उनको आर्थिक सुधारों का प्रबल समर्थक माना जाता है।शौरी इससे पहले भी कई मौकों पर पार्टी की राय से अगल अपने विचार रख चुके हैं।

घोटालों के आरोपों में घिरी संप्रग सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह के इस्तीफे पर अड़ी विपक्षी भाजपा से अलग राय व्यक्त करते हुए उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने कहा कि प्रधानमंत्री का त्यागपत्र भ्रष्टाचार को मिटाने का कोई समाधान नहीं है।

खंडूरी ने बातचीत में कहा, ‘प्रधानमंत्री का इस्तीफा भ्रष्टाचार को मिटाने का कोई समाधान नहीं है। उनके बाद फिर कोई और आयेगा, और फिर यही सब होगा। हम समस्या का तुरंत हल चाहते है और राजनीतिक तंत्र में सुधार लाकर समस्याओं को जड़से समाप्त करने की कोशिश नहीं करते।इस संबंध में भाजपा नेता खंडूरी ने केंद्र सरकार से एक बार फिर आग्रह किया कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास लंबित पडे उत्तराखंड के लोकायुक्त अधिनियम को अंतिम मंजूरी दे दें।

गौरतलब है कि खंडूरी ने पिछले साल राज्य के दोबारा मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद एक सशक्त लोकायुक्त अधिनियम विधानसभा से पारित कराया था, जिसके लिये उन्हें भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आंदोलन कर रहे प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे से भी प्रशंसा हासिल हुई थी।गत नवंबर में पारित हुए इस अधिनियम को उत्तराखंड की तत्कालीन राज्यपाल माग्रेट आल्वा ने तुरंत हस्ताक्षर करके अंतिम मंजूरी के लिये केंद्र को भेज दिया था।

 खंडूरी ने प्रधानमंत्री को एक अच्छा ‘अर्थशास्त्री’ बताया और कहा कि वह अत्यधिक दबाव के कारण सहज रुप से काम नहीं कर पा रहे हैं।


अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में केंद्रीय सडक और राजमार्ग मंत्री रहे खंडूरी ने कहा, ‘गठबंधन राजनीति का दबाव सुधारों के रास्ते में अडंगे लगाता है, लेकिन हमें समस्याओं को जड से समाप्त करने पर ध्यान देना चाहिये।

राजनीतिक सुधारों की बात करते हुए खंडूरी ने कहा कि अब जरुरत आ चुकी है कि देश को ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिये, जहां सरकारों के कार्यकाल निश्चित हों।उन्होंने कहा, ‘सरकारों के कार्यकाल निश्चित होने चाहिये, क्योंकि अस्थिर सरकारें अपने कार्यक्रमों को गंभीरता से लागू नहीं कर पाती।

यह पूछे जाने पर कि क्या भ्रष्ट व्यक्ति के प्रधानमंत्री बन जाना देश के लिये घातक हो सकता है, खंडूरी ने कहा कि हमारे देश में भी सरकार के मुखिया के लिए अमेरिका की तरह महाभियोग का प्रावधान होना चाहिये। खंडूरी ने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बदनाम होने से बचाने के लिये कुछ कदम उठाये जा सकते हैं, लेकिन जबावदेही तो सबकी होनी चाहिये।

अन्ना हजारे के बारे में खंडूरी ने कहा कि उन्होंने ईमानदारी से भ्रष्टाचार के मुद्दे को उठाया है। उन्होंने कहा, ‘यद्यपि भ्रष्टाचार को मिटाने का समाधान फिलहाल नहीं दिखाई दे रहा है, लेकिन कम से कम देश में लोग इसके बारे में बात तो कर रहे हैं।

Sat, 25 Aug 2012
 भाजपा को असहज कर देने वाले एक बयान में पूर्व दूरसंचार मंत्री अरुण शौरी ने कहा है कि कोल ब्लाक आवंटन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संसद में सफाई पेश करने का मौका मिलना चाहिए। विपक्ष को इस मसले पर संसद की कार्यवाही बाधित करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा।

यहां शनिवार को एक कार्यक्रम से इतर शौरी ने कहा कि प्रधानमंत्री उस दौरान कोयला मंत्रालय संभाल रहे थे। उन्होंने तथ्यों को स्वयं देखा है, लिहाजा उन्हें सफाई पेश करने का अवसर जरूर दिया जाए। भाजपा द्वारा संसद की कार्यवाही बाधित किए जाने पर शौरी ने कहा, 'जहां तक मैं समझता हूं, विपक्ष को बहस से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती।

कई नेता ऐसे ही छोड़ दिए जाते हैं, यही उनकी शिकायत है।' लेकिन अगर सरकार कार्रवाई करने का मंसूबा बनाती है और उस पर आगे बढ़ेगी तो कहीं कोई दिक्कत नहीं होगी। वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे शौरी ने हिदायत दी कि अगर विपक्ष कोई रुख [संसद ठप कराने का] अख्तियार करता है तो उसे पांच दिन बाद इस पर आगे न बढ़ने की वजह भी तलाशनी होगी। 2जी मामले में वित्त मंत्री पी चिदंबरम के इस्तीफे की मांग को लेकर भाजपा की बहिष्कार की रणनीति की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि कुछ दिनों बाद सब भूल गए और चिदंबरम ने संसद में बोलना जारी रखा।

अगर सांसद आक्रोशित हैं तो उन्हें गांधीवादी होना चाहिए और समझौता नहीं करना चाहिए। काले धन पर शौरी ने आरोप लगाया कि केंद्र का इसे वापस लाने का कोई इरादा नहीं है। चिदंबरम को दोबारा वित्त मंत्री बनाए जाने पर शौरी ने उन्हें पसंदीदा और बुद्धिमान बताते हुए उम्मीद जताई कि आने वाले बजट पिछले की तुलना में बेहतर होंगे।

शौरी का असली चरित्र जानने के लिए इसे जरूर पढ़ें!

अरुण शौरी (जन्म- 2 नवम्बर, 1941, पंजाब) भारत के अदम्य निर्भीकता वाले पत्रकार, बुद्धिजीवी, प्रसिद्ध लेखक और राजनेता हैं। 1968 से 1972 और फिर 1975 से 1977 तक एक अर्थशास्त्री के रूप में इन्होंने विश्व बैंक में अपनी महत्त्वपूर्ण सेवाएँ दी हैं। भारत के योजना आयोग में सलाहकार के पद पर भी वे काम कर चुके हैं। प्रसिद्ध अंग्रेज़ी समाचार पत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के सम्पादक भी अरुण शौरी रहे हैं। सन 1998-2004 तक भारत सरकार में मंत्री के पद को भी अरुण शौरी सुशोभित किया है।

जन्म तथा शिक्षा

अरुण शौरी का जन्म 2 नवम्बर, 1941 में जालन्धर (पंजाब) में हुआ था। वह अपने पिता हरिदेव शौरी और माता दयावंती की प्रथम संतान थे। इन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली से और 'सेन्ट स्टीफेंस कॉलेज', 'दिल्ली विश्वविद्यालय' से अर्थशास्त्र में आनर्स की डिग्री प्राप्त की थी। 1966 में न्यूयार्क, साइराकस यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। अरुण शौरी का विवाह अनीता शौरी के साथ हुआ था, जिनसे ये एक पुत्र के पिता भी बने। पत्रकारिता में पूरी तरह से उतरने से पहले एक अर्थशास्त्री के रूप में विश्व बैंक तथा अन्य महत्त्वपूर्ण संस्थानों में कार्य किया।

लेखन कार्य
अरुण शौरी ने हिन्दू धर्म के ग्रन्थों का अध्ययन किया। वह जयप्रकाश नारायण के जन-आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े और इस दौरान उन्होंने दस महत्त्वपूर्ण लेखों के माध्यम से राजनीतिक शक्तियों के भ्रष्टाचार तथा लोकतंत्र की अवमानना जैसे विषयों पर अपने विचार प्रकट किये, जो सेमिनार, मेन स्ट्रीम तथा इण्डिया टुडे जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। इन आलेखों का पुस्तक रूप में भी प्रकाशन हुआ, जो 'सिंप्टम्स ऑफ़ फ़ॉसिज्म' तथा 'वाशिंगटन एसेज़' शीर्षक से सामने आईं।

पुरस्कार

अरुण शौरी को उनकी पत्रकारिता के लिए 1982 का 'मेग्सेसे पुरस्कार' प्रदान किया गया। वह तीन बार राज्य सभा के सदस्य भी रहे। सन 1990 में उन्हें 'जर्नलिस्ट ऑफ़ द ईयर' चुना गया था। इसी वर्ष (1990) में उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए 'पद्मभूषण' सम्मान भी प्राप्त हुआ। सन 2002 में बिजनेस वीक ने उन्हें "स्टार ऑफ़ इण्डिया' से सम्मानित किया तथा 'द इकॉनोमिक टाइम्स' ने उन्हें 'द बिजनेस लीडर ऑफ द ईयर' चुना। अरुण शौरी को 'दादाभाई नौरोजी पुरस्कार', 'फ़्रीडम टू पब्लिक अवार्ड', 'एस्टर पुरस्कार' और 'इंटरनेशनल एडिटर ऑफ द ईयर अवार्ड' से भी सम्मानित किया जा चुका है।
अल्लाह गणित नहीं जानता है: अरुण शौरी
सलीम ख़ान   Sunday August 28, 2011

अरुण शौरी ने अपनी एक किताब (!) में लिखा है कि अल्लाह गणित नहीं जानता है. यह सन 2001 की बात है. अरुण शौरी के मुताबिक़ "कुरआन में कुछ गणितीय त्रुटियां हैं. कुरआन के अध्याय 4 (सुरह निसा) के श्लोक (आयत) संख्या 11 व 12 के मुताबिक  जब आप वसीयत करते है तो उत्तराधिकारी का हिस्सा जोड़ने पर एक से ज़्यादा मिलता है और यह संभव नहीं है अर्थात जब आप उत्तराधिकार के विभिन्न भागों/वारिसों को दी गई जोड़ का गठन करते हैं तो वह एक से अधिक है. इस प्रकार से कुरआन के लेखक को गणित का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है."

अरुण शौरी और उनके जैसे ही हमारे समाज में रहने वाले और लोगों को जो तर्क (कुतर्क) के सहारे अध्ययन करे बिना इस्लाम के बारे में गलतफहमी पाल रखें है, को बता दूं कि अल्लाह ने अपने अंतिम ग्रन्थ अल-कुरआन में कई जगह वसीयत और उत्तराधिकार के बारे में बताया है.

जैसे:
सुरह अल-बक़रह- अध्याय 2 आयत संख्या 180
सुरह अल-बक़रह- अध्याय 2 आयत संख्या 240
सुरह अल-निसा- अध्याय 4 आयात संख्या 7 व 9
सुरह अल-निसा- अध्याय 4 आयात संख्या 19 व 33
सुरह अल-मायेदः- अध्याय 5 आयत संख्या 105 व 108

कुरआन में सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11, 12 व 176 में उत्तराधिकारियों के अंश के बारे में बिलकुल साफ़-साफ़ लिखा है.

अब अरुण शौरी के द्वारा इंगित आयतों सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11 व 12 का परीक्षण करते है.

सुरह निसा- अध्याय 4 आयत संख्या 11 व 12 के अनुसार--

"अल्लाह  तुम्हारी संतान के विषय में तुम्हें आदेश देता है कि दो बेटियों के हिस्से के बराबर एक बेटे का हिस्सा होगा; और यदि दो से अधिक बेटियाँ ही हों तो उनका हिस्सा छोड़ी हुई संपत्ति का दो तिहाई है. और यदि वह अकेली हो तो उसके लिए आधा है. और यदि मरनेवाले की संतान हो तो उसके माँ-बाप में से प्रत्येक का उसके छोडे हुए माल का छठा हिस्सा है. और यदि वह निःसंतान हो और उसके माँ-बाप ही उसके वारिस हों, तो उसकी माँ का हिस्सा तिहाई होगा. और यदि उसके भाई भी हों, तो उसकी माँ का छठा हिस्सा होगा. ये हिस्से, वसीयत जो वह कर जाये पूरी करने या ऋण चुका देने के पश्चात् हैं. तुम्हारे बाप भी है और तुम्हारे बेटे भी. तुम नहीं जानते कि उनमें से लाभ पहुँचने की दृष्टि से कौन तुमसे अधिक निकट है. या हिस्सा अल्लाह का निश्चित किया हुआ है. अल्लाह सब कुछ जानता समझता है."
- अल-कुरआन, सुरह 4, अन-निसा आयत संख्या 11

"और तुम्हारी पत्नियों जो कुछ छोड़ा हो, उसमें तुम्हारा आधा है, यदि उनके संतान न हो. लेकिन यदि उनकी संतान हों तो वे जो छोडें, उसमें तुम्हारा चौथाई होगा. इसके पश्चात् जो कि जो वसीयत वें कर जाएँ वह पूरी कर दी जाये, या जो ऋण (उनपर) हो वह चुका दिया जाये. और जो कुछ तुम छोड़ जाओ, उसमें उनका (पत्नियों का) चौथाई हिस्सा होगा, यदि तुम्हारी कोई संतान न हो. लेकिन यदि तुम्हारी संतान है, तो जो कुछ तुम छोड़ोगे, उसमें से उनका (पत्नियों का) आठवां हिस्सा होगा. इसके पश्चात् कि जो वसीयत तुमने की हो वह पूरी कर दी जाये, या जो ऋण हो चुका हो उसे चुका दिया जाये. और यदि कोई पुरुष या स्त्री के न तो कोई संतान हों और न उनके माँ-बाप ही जीवित हों और उसके एक भाई या बहन हों तो उन दोनों में से प्रत्येक का छठा हिस्सा होगा. लेकिन यदि वे इससे अधिक हों तो फिर एक तिहाई में वे सब शरीक होंगे, इसके पश्चात् कि जो वसीयत उसने की वह पूरी कर दी जाये या जो ऋण उस पर हो वह चुका दिया जाये, शर्त यह है कि वह हानिकर ना हो. यह अल्लाह के और से ताकीदी आदेश हैं और अल्लाह सब कुछ जानने वाला, अत्यंत सहनशील है."
-अल-कुरआन, अन-निसा- आयत संख्या 12

इस्लाम में उत्तराधिकार के नियम को बहुत वृहद् तरीके से वर्णित किया गया है. खुले तौर पर और प्राथमिक रूप से उत्तराधिकार के नियम को कुरआन में दिया गया है और डिटेल में अ-हदीस (मुहम्मद<अल्लाह की उन पर शांति हो> की परंपरा और आदेश) में विस्तृत रूप से दिया है. इस्लाम में दिए गए उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप और कोम्बिनेशन को जानने के लिए एक व्यक्ति अपनी पूरा जीवन भी व्यतीत कर दे तो भी कम है. कुरआन की दो आयातों के बिनाह पर अरुण शौरी इस्लाम के उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप को समझ जाने की और उस पर गलत टिपण्णी कर रहें है जबकि उन्होंने इन आयातों को भी ठीक से समझा नहीं! उन्हें ये भी नहीं पता कि इस्लाम में उत्तराधिकार के नियम के गणितीय रूप का क्राइ  ेरिया क्या है.

(मैं आगे अरुण शौरी की टिप्पणियों का विस्तार से जवाब दूंगा, इससे पहले मैं यह पूछना चाहता आम ब्लोगर्स से कि दुनिया में कौन सा ऐसा धर्म जिसने संपत्ति वितरण और वसीयत के बारे में सभी को अधिकार दिए हैं, खास कर औरत को... इस्लाम ही दुनिया में एक वाहिद (केवल) मज़हब है जिमें औरतों को केवल अधिकार ही नहीं दिए बल्कि उनको संपत्ति में भी हिस्सा देने का प्रावधान किया है.)

ख़ैर, तो मैं बात कर रहा था कि अरुण बाबू की कुरआन के खिलाफ़ टिपण्णी की...  तो यह तो कुछ ऐसे ही हुआ कि कोई इंसान गणित के समीकरण को बिना गणित के प्राथमिक नियम जाने बिना हल करना चाहता है. और ऐसा संभव नहीं है कि आप गणित के सामान्य नियम न जाने और समीकरण हल करना शुरू कर दें. मिसाल के तौर पर गणित के समीकरण हल करने में जो सामान्य नियम लागु होता है वह है - BODMAS [Bracket-Off, Division, Multiplication, Adition, Substraction] यानि गणित के समीकरण को हल करने में गणित के प्रमुख चिन्हों को किस प्रकार से एक के बाद एक हल किया जाता है. समीकरण को हल करने के लिए BODMAS को इस्तेमाल करेंगे तो सबसे पहले ब्रेकेट हटाएँगे (हल करेंगे), फिर दुसरे नंबर पर डिविज़न (भाग) को हटाएँगे (हल करेंगे), फिर तीसरे नंबर पर मल्टीप्लिकेशन (गुणा) को हटाएँगे (हल करेंगे), चौथे नंबर पर एडिशन (धन) को हटाएँगे (हल करेंगे) और फिर पांचवें नंबर पर सब्स्ट्रेक्शन (ऋण) को हटाएँगे (हल करेंगे). 

अगर अरुण शौरी को गणित नहीं आती हो और वो पहले मल्टीप्लिकेशन (गुणा) को फिर सब्स्ट्रेक्शन (ऋण) को फिर ब्रेकेट ऑफ फिर भाग को फिर आखिरी में प्लस को हटा रहे है तो ज़ाहिर है उत्तर ग़लत ही आएगा.

ठीक उसी तरह से, क़ुरान के अध्याय 4 के श्लोक 11 व 12 में उत्तराधिकार और वसीयत के बारे में बच्चों के बारे में सबसे पहले आदेश है फिर माँ-बाप और पति अथवा पत्नी के बारे में फरमाता है. इसलाम के वसीयत क़ानून के मुताबिक़ पहले जो बिना देनदारी या ऋण हो उसे चुकता किया जे फिर वसीयत लागू होगी, तदोपरांत पति अथवा पत्नी और माँ-बाप (निर्भर करता है कि वे अपने पीछे संतान छोडें है या नहीं) और फिर जो भी बची संपत्ति है उसे लड़को और लड़कियों में दिए गए अंश के मुताबिक़ बाँट दी जाती है.

अब जब ऊपर लिखे तरीके से वसीयत का उत्तराधिकारियों के मध्य वितरण हो जा रहा है तो यह सवाल कैसे उत्पन्न हो सकता है कि किसी का हिस्सा एक से ज्यादा हो जायेगा. यह बात किसी को भी बहुत आसानी    े समझ आ जायेगी. दरअसल अरुण शौरी और उनकी तरह के और लोग जो क़ुरान की आयतों का हवाला देते है और भ्रमित करते है दरअसल वो कुरान की आयतों को आधा या वो भाग जिसका अर्थ अलग हो को उठाते है और बीच की या उसके बाद की आयतों को नहीं उठाते जिसमें उस बात का समाधान भी होता है या उसका अर्थ पूर्ण हो जाता है और हुआ यही, अरुण शौरी ने अपने ढंग से कुतर्क के ज़रिये यह सिद्ध करने की कोशिश करी कि अल्लाह गणित नहीं जानता है.

अरे जनाब! यह अल्लाह नहीं जो गणित नहीं जानता (नउज़ुबिल्लाह), यह अरुण शौरी है जो गणित नहीं जानता है.

पलाश विश्वास

शनिवार, 22 सितंबर 2012

इस्लाम के दानवीकरण का दुष्चक्र



हम एक अजीब-से दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर विज्ञान तकनीक और तार्किक सोच ने हमें मानवता की बेहतरी के लिए अनेक भौतिक और बौद्धिक उपाय दिए हैं वहीं हमारी दुनिया ने इन दिनों भड़काऊ बातें कहने का फैशन सा बन गया है। साहित्य और विशेष कर फिल्मों के जरिए एक धर्म विशेष-इस्लाम-का दानवीयकरण करने के प्रयास हो रहे हंै। मुस्लिम समुदाय का एक हिस्सा स्वयं को आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहा है और अपने धर्म के अपमान के विरोध में सड़कों पर उतर आया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस भी जारी है परन्तु यह समझना मुश्किल है कि अभिव्यक्ति की आजादी का उपयोग हमेशा एक धर्म विशेष को अपमानित करने और उसका दानवीयकरण करने के लिए ही क्यांे किया जाता है।
इन दिनों (सितम्बर 2012) दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अमेरिकी दूतावासों के सामने विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भी हुई है जिसमें राजदूत क्रिस स्टिवेंस सहित चार अमेरिकी राजनयिक बेन्गाजी में मारे गये हैं। कई देशो ने गूगल, जो कि यूट्यूब का मालिक है, से कहा है कि यूट्यूब से यह उत्तेजक और अपमानजनक विडि़यो क्लिप हटा दी जाए। अमेरीका अब तक “अभिव्यक्ति की आजादी” के नारे पर अटका हुआ है और  बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी देश की सड़कों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं।
यह विडि़यो क्लिप लगभग 14 मिनट लम्बी है और एक फीचर फिल्म का हिस्सा है, जिसके निर्माता अमेरिका में रहने वाले एक ईसाई नकोला बेसीले हैं। फिल्म में इस्लाम का जम कर अपमान किया गया है। दाढ़ी वाले आधुनिक मुसलमानांे की भीड़ को ईसाईयों पर हमला करते दिखाया गया है। फिल्म अपने दर्शकों को अतीत में भी ले जाती है जहां पैगंबर मोहम्मद के जीवनवृत्त को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म मे बताया गया है कि पैगंबर साहब का व्यक्तित्व व सोच, अत्यंत नकारात्मक और आक्रामक थी। इस फिल्म में देखने लायक कुछ भी नही है और इसे बनाने वालों के इरादे भी संदिग्ध हैं। मुसलमानों के एक तबके ने इस फिल्म पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि इस मामले मे सभी मुसलमानों की प्रतिक्रिया एक सी नही रही है। कुछ धर्मगुरूओं ने मुसलमानो से धैर्य बनाये रखने के लिए कहा है। इन लोगांे का कहना है कि इस्लाम शांति का धर्म है और इसलिए किसी भी प्रकार के हिंसक विरोध प्रदर्शन नही होने चाहिए। कुत्सित इरादों से बनाई गई इस घटिया फिल्म का सबसे अच्छा जवाब दिया है मुसलमानो के एक समूह ने, जो कि अमन के संदेशवाहक, पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर लिखी गई किताबें बांट रहे हंै।
पिछले कुछ सालों से पश्चिमी देशों और यहां भारत में भी, इस्लाम का दानवीकरण करने की परंपरा सी बन गई है। हम सब को वह डैनिश कार्टून याद है जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छुपाए एक आतंकवादी के रूप में दिखाया गया था। फ्लोरिडा के एक पास्टर ने यह घोषणा की थी कि चूंकि कुरान हिंसा सिखाती है इसलिए वे उसे सार्वजनिक रूप से जलाएंगे। अफगानिस्तान में कुछ अमेरिकी सैनिको ने भी यह कह कर कुरान की प्रतियां जलाई थीं कि उनमंे आतंकवादियों के कुछ गुप्त संदेश लिखे हुए हैं।
इस्लाम और मुसलमानांे के दानवीकरण में हम एक प्रकार की योजना और एजेंडा देख सकते हैं। ये कार्टून और फिल्में दरअसल उस राजनैतिक प्रक्रिया की उपज हैं, जिसका उद्देश्य पश्चिम एशिया में तेल के कुओं पर कब्जा करना है। इरान में अमेरिका के पिट्ठू रज़ा पहलवी को हटा कर अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के बाद से ही, अमेरिका “इस्लाम-नया खतरा” का नारा बुलंद करता आ रहा है।  अमेरिका ने ही पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए ताकि मुस्लिम युवकों को अलकायदा और तालिबान के झंडे तले अफगानिस्तान पर काबिज़ सोवियत सेना से लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इससे हालात और बिगड़े। इन मदरसों में काफिर और जिहाद जैसे शब्दो का अर्थ तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता था ताकि मुस्लिम युवको को धर्म के नाम पर हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वल्र्ड टेªड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने बड़ी चालाकी से “इस्लामिक आतंकवाद” शब्द गढ़ लिया। इस शब्द का अन्य देशांे का मीडिया भी इस्तेमाल करने लगा और धीरे धीरे यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। यह पूरा घटनाक्रम एक साम्राज्यवादी ताकत द्वारा अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए धर्म के दुरूपयोग का उदाहरण है। दरअसल, इस्लाम का दानवीकरण, अमेरिकी नीति का भाग है। इसके पीछे अमेरिका अपने असली उद्देश्य-अर्थात तेल संसाधनो पर कब्जा-को छिपाना चाहता है। नोयम चोमोस्की ने एक शब्द गढ़ा था “सहमति का उत्पादन”। अमेरिका ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द को इसलिए गढ़ा ताकि उसके, अफगानिस्तान और ईराक पर सैनिक आक्रमण करने के लिए “सहमति का उत्पादन” किया जा सके।
अमेरिका की इस नीति से दो अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू हुई हैं। एक ओर इस्लाम के खिलाफ घृणा फैलाने के अभियान ने हालिया फिल्म, डेनिश कार्टून और पास्टर द्वारा कुरान को जलाने जैसी घटनाओं को जन्म दिया है। अमेरिकी प्रचार को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए अमेरिका ने “सभ्यताओं का टकराव” के सिद्धांत का अविष्कार किया है। इस सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक विश्व इतिहास, पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यताआंे के विकसित पश्चिमी सभ्यताओं पर आक्रमण का इतिहास है। इसी तोड़ी-मरोड़ी हुई सोच और विचारधारा का इस्तेमाल पश्चिम एशिया मे अमेरिकी एजेंडे को लागू करने के लिए किया जाता है। इस सबसे पूरे विश्व के मुसलमानों की सोच मंे अंतर आया है।  कुछ मुसलमान यह मानने लगे हैं कि अफगानिस्तान व इराक पर अमेरीकी हमले के बाद, वे इस दुनिया में सुरक्षित नहीं रह गये हैं। भारत में संघ परिवार की राजनीति ने इस समस्या को नया आयाम दिया। संघ ने राममंदिर का मुद्दा उठाकर मुसलमानो को कटघरे में खड़ा कर दिया। भारतीय मुसलमानांे के एक बड़े हिस्से को यह लगने लगा कि उसे आतंकित किया जा रहा है और सब ओर से घेर लिया गया है। इस परिस्थिति में पहचान से जुडे़ मुद्दो को लेकर मुसलमानों को एक करना आसान हो गया। जब भी कोई समुदाय स्वयं को हर तरफ से घिरा हुआ पाता है तब उसे उत्तेजित करना और किसी भी आक्रामक धार्मिक अभियान का हिस्सा बनाना, आसान हो जाता है।
यह एक तरह का दुष्चक्र है जिसमें इस्लाम का डर एक ओर है और घुटन महसूस कर रहा  आतंकित मुस्लिम समाज दूसरी ओर। इन परिस्थितियों में वे मुस्लिम धर्मगुरू ही समुदाय की प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते हैं जो  शांति की बात कर रहे हंै। जो मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद के जीवन पर आधारित पुस्तकें बांट रहे हैं, वे बधाई के हकदार है समुदाय की प्रतिक्रिया इसी प्रकार की होना चाहिए। अमेरिका के साम्राज्यवादी इरादों और उसके भारी भरकम प्रचार तंत्र से कैसे निपटा जाए, जिनके जरिए अमेरिका दुनिया के कई इलाकों में गड़बडियां फैला रहा है? क्या इस पर किसी तरह से नियंत्रण पाया जा सकता है? ?
जिन दिनो कोफी अन्नान संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव थे, एक उच्चस्तरीय समिति ने एक रपट तैयार की थी जिसका शीर्षक था “सभ्यताओं का गठजोड़” परन्तु इस्लाम को बदनाम करने के अभियान की तुलना में इस रपट को समुचित प्रचार न मिल सका। अब समय आ गया है कि मानवता उन मानवीय मूल्यों को अपनाए जो हमारी सभ्यता में सदियों के विचार-विनिमय के आधार पर उभरे हंै-उन मूल्यों को, जिनके कारण संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी के लिए मूल मानवाधिकारों के घोषणापत्र जारी किये हैं और जिनके कारण “सभ्यताओं के गठजोड़” जैसी रपटें बनती हैं।
मुसलमानों का एक तबका ऐसा भी है जो अनुचित ढंग से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। दरअसल जो लोग या ताकतें इस्लाम के दानवीकरण और इस तरह की फिल्मों के निर्माण के पीछे हैं, वही कुछ मुसलमानों की हिंसक कार्यवाहियों के लिए भी जिम्मेदार हैं। क्या हम संयुक्त राष्ट्रसंघ को एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में पुनर्जीवित नही कर सकते जो यह सुनिश्चित करे कि विभिन्न राष्ट्रांे और उनके मीडिया का आचार- व्यवहार ऐसा हो जिससे प्रजातंत्र और मानवीय गरिमा में अभिवृद्धि हो? क्या पूरा विश्व दुनिया की एकमात्र विश्वशक्ति के आक्रामक तेवरों से निपटने के लिए आगे नहीं आ सकता? अगर ऐसा हुआ तो इस तरह की फिल्मों पर हिंसक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बल्कि शायद दूसरों के धर्म को अपमानित करने के प्रयासों मंे भी कमी आयेगी। अगर कुछ लोग इस तरह की फिल्म बनांएगे तो कुछ वैसी फिल्मे भी बनेंगी जो पैगंबर मोहम्मद के दुनिया को शांति के संदेश पर आधारित होंगी।
अंत में, हमें अभिव्यक्ति की आजादी को तो कायम रखना होगा। परन्तु इसकी कुछ सीमाएं भी तय करनी होंगी। हमे विरोध व्यक्त करने के ऐसे तरीकों का विकास करना होगा जिनसे उन्माद के स्थान पर मर्यादित व तार्किक ढंग से विरोध दर्ज कराया जा सके।

 -राम पुनियानी

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

लोकसंघर्ष खुशहाली और खुशी

इस वर्ष फरवरी के तीसरे सप्ताह में मुझे भूटान के प्रधानमंत्री का एक पत्र प्राप्त हुआ। इस पत्र में मुझे भूटान नरेश द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में "खुशहाली और खुशी" विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए निमंत्रित किया गया था। पत्र में कहा गया था कि बैठक में राज्याध्यक्ष, अध्येता, प्राध्यापक व जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता भाग लेंगे। मुझे इस्लामिक विद्वान व मुस्लिम धार्मिक नेता बतौर बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। बैठक 2 अप्रैल को आयोजित थी व मुझसे यह अनुरोध भी किया गया था कि मैं दो दिन और अर्थात 3 व 4 अप्रैल को भी न्यूयार्क में रहूं ताकि बैठक के निष्कषोर्ं को कार्यरूप में परिवर्तित करने की योजना बनाई जा सके।
भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वाई थिनले के आमंत्रण पत्र में कहा गया था कि,"आपने अंतरधार्मिक संवाद के क्षेत्र में अपने असाधारण कार्य से दुनिया के सामने एक शानदार और सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आपके द्वारा विकसित माडल को पूरे विश्व में अपनाए जाने की आवश्यकता है। मैं इस्लाम के सकारात्मक, प्रगतिशील पहलुओं को समाज के सामने लाने के आपके अभियान से अत्यंत प्रभावित हूं। जैसा कि आपने डूशे वैेले को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा था कि इससे इस्लाम के मानने वालों में प्रश्न पूछने का साहस और इच्छा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति की सोच व्यापक और आलोचनात्मक बनती है और यह कार्य, मेरी दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण है।"
प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में आगे कहा"भूटान नरेश ने तीन दशक पहले कहा था कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद से कहीं महत्वपूर्ण है सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता"। आपकी प्रगतिशील सोच भूटान के राष्ट्रीय दशर्न से मेल खाती है। सच तो यह है कि आपके कार्यकलाप और भूटान के राष्ट्रीय उद्धेश्य और महत्वाकाक्षाएं लगभग पूर्णतः समान एकसी हैं और इनकी पूरे विश्व को जरूरत है। इसीलिए मैं आपको दिनांक 2 अप्रैल 2012 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में आयोजित इस उच्च स्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए निमंत्रित कर रहा हूं"।
मैंने यह निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया और 30 मार्च को बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयार्क पहुंच गया। मुझे और कुछ अन्य आमंत्रितों को मिलेनियम यूएन प्लाजा होटल में ठहराया गया जोकि संयुक्त राष्ट्र संघ की इमारत के ठीक सामने स्थित है। बैठक सुबह 10 बजे शुरू होने वाली थी परंतु चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में प्रवेश के पहले व्यक्ति को अनेक सुरक्षा जांचों से गुजरना होता है इसलिए हम लोगों से यह अनुरोध किया गया कि हम 8 बजे संयुक्त राष्ट्र परिसर में स्थित एक इमारत में पहुंच जाएं। हम सब 9़30 बजे के लगभग मुख्य हॉल मे पहुंच गए।
बैठक में अनेक राष्ट्राध्यक्ष, पूर्व राष्ट्राध्यक्ष, संयुक्त राष्ट्र संघ में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, राजनयिक व अलगअलग राजनैतिक दलों के नेता शामिल हुए। बैठक के उद्घाटक मंडल में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मूंग, न्यूजीलैण्ड के पूर्व प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क, भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वी थिंगले, संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा के 66 वें सत्र के अध्यक्ष नासिर अब्दुल अजीज व कोस्टारिका की राष्ट्रपति सुश्री लौरा चिंचलीया शामिल थे। सुश्री लौरा सम्मेलन की मुख्य वक्ता भी थीं।
सम्मेलन में समय की कमी के कारण उद्घाटक मंडल के प्रत्येक सदस्य को उनके वक्तव्य के लिए केवल तीन मिनिट का समय दिया गया। सुश्री लौरा चिंचलीया को 10 मिनिट का समय मिला कोस्टारिका को पर्यावरण के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियों के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार दिया गया। स्मरणीय है कि कोस्टारिका दुनिया का एकमात्र देश है जिसकी कोई सेना नहीं है। मैं सन 2009 में कोस्टारिका गया था। वह हर दृष्टि से एक आदशर देश है। भूटान की तरह कोस्टारिका भी पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए भौतिक विकास और विश्व शांति का हामी है और यही इस उच्च स्तरीय बैठक की विषयवस्तु थी।
भारत के प्रधानमंत्री की विशेष दूत और केन्द्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री सुश्री जयन्ती नटराजन ने भारत की नई उभरती हुई अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डाला जो कि नए आर्थिक नजरिए के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उद्घाटन सत्र में अनेक मंत्रियों, उपमंत्रियों व विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपनेअपने विचार व्यक्त किए।
उद्घाटन सत्र के बाद अलगअलग विषयों पर चर्चा के लिए कई कार्यसमूहों का गठन किया गया। इन कार्यसमूहों को "खुशहाली एवं खुशी", "पर्यावरण संतुलन"""", """"प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग"""", व """"संसाधनों का निष्पक्ष व निरपेक्ष वितरण"""" विषयों पर चर्चा करनी थी। धार्मिक नेताओं के समूह को भी इन विषयों पर अपनेअपने विचार व्यक्त करने थे। मुझे इस्लामिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
धार्मिक नेताओं के समूह में हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, यहूदियों व मुसलमानों के प्रतिनिधि शामिल थे। हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व रामकृष्ण मिशन के मोहन मुनासिंगे ने किया। मैं इस्लाम का प्रतिनिधि था। ईसाई धर्म की ओर से फ्रांस की सुश्री रोशी जोन हेलीफेक्स उपस्थित थीं। यहूदी धर्म का प्रतिनिधित्व नीदरलैंड के रब्बी डेविड कैडमैन कर रहे थे जबकि बौद्ध प्रतिनिधि थे भूटान के अनिल शाक्य।
धार्मिक नेताओं के समूह के सभी सदस्य विद्वान व अत्यंत प्रबुद्ध थे और शांति, अंतरधार्मिक संवाद और पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास के क्षेत्रों में काम कर रहे थे। सभी का यह मानना था कि धर्म आमजनों को खुशहाल व प्रसन्न रखने के लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और मानवता को इस लक्ष्य तक पहुंचाने में धर्म एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। यह तभी हो सकता है जब धर्म थोथा शब्दाडंबर न होकर ठोस यथार्थ पर आधारित हो।
मैं यहूदी धर्म गुरू रब्बी डेविड कैडमेन के वक्तव्य से काफी प्रभावित हुआ। उन्होंने अपने भाषण में यहूदी धार्मिक स्त्रोतों का हवाला देते हुए शांति व प्रसन्नता को ब़ावा देने के प्रभावी उपाय सुझाए। उन्होंने ईश्वर से फिलिस्तिनियों की व्यथा दूर करने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनी अपनी स्वतत्रंता व संप्रभुता के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में उन्होंने बहुत कुर्बानियां दी हैं। सभा ने रब्बी कैडमेन के भाषण की मूलात्मा व उनके सह्दय व न्यायपूर्ण दृष्टिकोण की जमकर सराहना की। अपना भाषण समाप्त कर रब्बी मंच से उतरे और मुझे गले लगाकर उन्होंने मेरे वक्तव्य की सराहना की। मैंने भी उन्हें बधाई दी। हम दोनों ने ईमेल के द्वारा विचार विनिमय करने और एकदूसरे के संपर्क बनाए रखने निर्णय किया।
मैंने अपने प्रस्तुतिकरण में कहा कि आज की दुनिया में ऐसे लोगों का बहुमत है जो व्यथित, दुःखी व परेशानहाल हैं। प्रसन्नता उनसे कोसों दूर है। मैंने कहा कि भूटान द्वारा चर्चा के लिए चुना गया विषय """"खुशहाली व प्रसन्नता"""" अत्यंत उपयुक्त व प्रासंगिक है। सचमुच, मानवता की भलाई व विकास के दो पहलू हैं : खुशहाली व खुशी। किसी व्यक्ति की खुशहाली के लिए यह आवश्यक है कि उसकी मूलभूत आवश्यकताएंरोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व शिक्षापूरी हों। अगर उसकी मूल आवश्यकताएं पूरी नहीं होंगी तो वह कतई खुश नहीं रह सकता। मूल आवश्यकताओं की पूर्ति किसी व्यक्ति के खुश रहने की अनिवार्य शर्त है।
हम किसी भूखे या अधनंगे व्यक्ति से या किसी ऐसे व्यक्ति से जिसके सिर पर छत न हो, कभी अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह प्रसन्न रहे। यद्यपि धन, खुशी की गारंटी नहीं है तथापि जिस मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी न हों वह कभी खुशहाल नहीं हो सकता और खुशहाली के बगैर खुशी की कल्पना तक नहीं की जा सकती। किसी व्यक्ति की खुशहाली उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर निर्भर करती है। इसके विपरीत, खुशी कोई भौतिक वस्तु नहीं है। बहुत धनी व्यक्ति भी अप्रसन्न हो सकता है।
हमारी दुनिया में आज भी करोड़ों लोग भूखे सोते हैं। उनकी मूल आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं। समाज में आर्थिक गैरबराबरी का बोलबाला है। यहां तक कि संयुक्त राज्य अमरीका जैसे देश में भी अमीरों व गरीबों के बीच गहरी खाई है। वहां """"हम 99 प्रतिशत हैं"""" जैसे आंदोलन खड़े हो रहे हैं। अमरीका के आर्थिक संसाधनों पर देश के एक प्रतिशत लोगों का बोलबाला है और बाकी 99 प्रतिशत उनपर निर्भर हैं। जहां तक एशिया और अफ्रीका का प्रश्न है वहां आर्थिक विषमताएं कहीं अधिक भयावह हैं। इन महाद्वीपों के 99 प्रतिशत रहवासी, अमरीका के 99 प्रतिशत नागरिकों की तुलना में अत्यंत कंगाल हैं।
अतः यदि हम एक प्रसन्न दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं तो इस दिशा में पहला कदम होगा धरती के सभी निवासियों की खुशहाली सुनिश्चित करना। यह तभी हो सकता है जब दुनिया में संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो। जहां तक इस्लाम का संबंध है, मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ कुरआन, धन इकट्ठा करने की प्रवॢत्ति को पूरी तरह गलत ठहराती हैं। कुरआन कहती है कि चंद लोगों द्वारा संग्रहित धन दोजख की आग बन जाएगा। कुरआन पवित्र पैगम्बर से कहती है कि अगर कोई उनसे पूछे की उसे अल्लाह की राह पर कितना खर्च करना चाहिए तो उनसे कहो की उनकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद बचा पूरा धन।
इस्लाम सादा जीवन जीने की सीख देता है। पवित्र पैगम्बर भी अत्यंत सादगी से रहते थे और सभी मुसलमानों का पवित्र कर्तव्य है कि वे पैगम्बर की बताई राह पर चलें। परंतु सच यह है कि अल्जीरिया से लेकर इंडोनेशिया तक पूरे इस्लामिक विश्व में न केवल आर्थिक गैरबराबरी का साम्राज्य है बल्कि घोर गरीबी और पिछड़ापन भी है। मुस्लिम बादशाह, शेख, सामंत व पूजींपति अत्यंत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीते हैं जबकि करोड़ों मुसलमान भुखमरी के शिकार हैं।
खुशहाली और खुशी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम एक खुशहाल दुनिया बनाएंगे तभी हम एक खुश दुनिया बना सकेंगे। यद्यपि यह भी सही है कि खुशी के लिए खुशहाली आवश्यक तो है परंतु पर्याप्त नहीं। मैंने भूटान के प्रधानमंत्री को इस सम्मेलन के आयोजन के लिए धन्यवाद व बधाई दी। मैंने कहा कि चुने गए विषय पर विचारमंथन के लिए इससे बेहतर मंच नहीं हो सकता था। मेरे भाषण को सभी ने सराहा व कई लोगों ने मुझे बधाई दी।
अन्य धार्मिक नेताओं की तरह, मुझसे भी अनुरोध किया गया कि मैं कोई धार्मिक प्रार्थना करुं। मैंने अपनी प्रार्थना में कुरआन का पहला अध्याय """"अलफतिहा"""" शामिल किया। """"अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है और जो सारे संसार का रब हैं (जिस संसार को हम संसाधनों के निमर्म दोहन से नष्ट करने पर आमादा हैं। ) हे अल्लाह, निर्णय वाले दिन तुम यह तय करना कि हमने अपने संसाधनों का उचित उपयोग किया या नहीं। हे अल्लाह, हमें सही मार्ग दिखाओवह मार्ग जिसपर तुमने अपने वरदानों की वर्षा की है। ये वरदान हमें हमारी दुनिया के अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के रूप में मिले। और जो इन संसाधनों को नष्ट करें वे तुमारे प्रकोप के भागी हों।""""
सम्मेलन का समापन सर्वधर्म प्रार्थना से हुआ।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर

सोमवार, 25 मई 2009

इस्लाम और कुरान ब्लॉग मे आपका स्वागत है....

सारे ब्लॉगर भाइयों से दिल से आदाब,

मैंने आज से नौ महीने पहले इस ब्लॉग को बनाया था सोचा था की दुनिया में इस्लाम की धूमिल हो चुकी छवि को मैं शायद कुछ सुधार सकूं लेकिन घर पर लगे इन्टरनेट कनेक्शन के दम पर यह सोचा था लेकिन वो ही ठीक से काम नहीं कर रहा था... आगे पढ़े....
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