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मंगलवार, 19 जून 2018

संघ, विहिप जैसे संगठनों के कारण भारत में अल्पसंख्यकों और दलितों की दशा खराब

अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि देश में जारी भगवाकरण अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
वाशिंगटन : अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने आरोप लगाया है कि भारत में पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही और हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश के भगवाकरण की कोशिश की।
यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में भारत को अफगानिस्तान, आजरबैजान, बहरीन, क्यूबा, मिस्र, इंडोनेशिया, इराक, कजाकिस्तान, लाओस, मलेशिया और तुर्की के साथ खास चिंता वाले टीयर टू देशों में रखा है।
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गैर हिंदुओं और हिंदुओं के अंदर निचली जातियों को अलग-थलग करने के लिए चलाए गए बहुआयामी अभियान के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों की दशा पिछले दशक के दौरान बिगड़ी हैं।’
    उसने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि इस अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
उसने कहा, ‘ये समूह अपने विरुद्ध हिंसक कार्रवाई, धमकी से लेकर राजनैतिक ताकत हाथ से चले जाने तथा मताधिकार छिन जाने की बढ़ती भावना से जूझ रहे हैं। भारत में 2017 में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही है।’
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज के रूप में रहा भारत का इतिहास अब धर्म पर आधारित राष्ट्रीय पहचान की बढ़ती बहिष्कार करने की अवधारणा के खतरे से घिर गया है। इस साल के दौरान हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश का भगवाकरण करने की कोशिश की।’
उसने कहा कि करीब एक तिहाई राज्य सरकारों ने गैर हिंदुओं के विरुद्ध धर्मांतरण रोधी और  गोहत्या रोधी कानून लागू किए, भीड़ ने ऐसे मुसलमानों और दलितों के विरुद्ध हिंसा की जिनके परिवार पीढ़ियों से डेयरी, चमड़ा, बीफ के कारोबार में लगे हैं तथा उन्होंने ईसाइयों के विरुद्ध भी धर्मांतरण को लेकर हिंसा की।
रिपोर्ट के अनुसार, गोरक्षकों की भीड़ ने वर्ष 2017 में कम से कम 10 लोगों की हत्या कर दी। घर वापसी के माध्यम से गैर हिंदुओं को हिंदू बनाने की खबरें सामने आईं।
धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भेदभाव के तौर पर विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ पर पंजीकरण नियमों का बेजा इस्तेमाल किया गया।
रिपोर्ट कहती है कि पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की दशाएँ बिगड़ने के साथ ही कुछ सकारात्मक बातें हुईं। उच्चतम न्यायालय ने कई ऐसे निर्णय किए जिससे धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा हुई।

-अमरीकी रिपोर्ट
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

साइबर परिप्रेक्ष्य में संघ

हिंदू राष्ट्रवाद ने हर नागरिक के मन को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है, यह प्रक्रिया राममंदिर आंदोलन के बाद से चल रही है, मोदी सरकार बनने के साथ इन दिनों चरम पर है। इसके पहले अटल बिहारी सरकार बनने के समय भी इसके मध्यवर्ती उभार को देख सकते हैं लेकिन आक्रामक ढ़ंग से हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी की महानेता की जो इमेज इसबार सामने आई है वैसा व्यापक असर पहले कभी नहीं देखा गया। चुनौती यह है कि ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इमेज को कैसे समझें। तदर्थ उपकरणों  के जरिए इसे समझना मुश्किल है, यह प्रचलित समाजविज्ञान के नजरिए से भी पकड़ में नहीं आ सकती। साथ ही प्रेस क्रांति के संदर्भ में रचे गए साम्प्रदायिकता विरोधी विचारधारा के संदर्भ में भी इसके समाधान नहीं खोजे जा सकते। इसे समझने के लिए नए युग के साइबर परिप्रेक्ष्य की जरूरत है।
        ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ का नया संदर्भ वर्चुअल रियलिटी रच रही है। साइबर संचार रच रहा है। इसलिए वर्चुअल रियलिटी की प्रक्रियाओं की सटीक समझ के आधार पर ही इसके समूचे वैचारिक तानेबाने को खोला जाना चाहिए। सवाल यह है सारे देश में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की 
आंधी कैसे आई उसकी प्रक्रिया क्या है उसने किस तरह के दार्शनिक मॉडल का इस्तेमाल किया इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
    ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ अचानक पैदा हुई विचारधारा नहीं है। यह पहले से थी और इसका सौ साल से भी पुराना इतिहास है, इस विचार के इतिहास में वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में रहे हैं और वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में नहीं रहे हैं। 19वीं  सदी के पुनरुत्थानवाद में इस विचारधारा के बीज बोए गए थे। जिनकी ओर हमने कभी कोई विचारधारात्मक संघर्ष नहीं चलाया। हमने नवजागरण के सकारात्मक पक्षों पर ध्यान केद्रिंत किया लेकिन उसके नकारात्मक पक्ष पर ध्यान ही नहीं दिया। राजा राममोहन राय के सकारात्मक विचारों पर नजर गई लेकिन नकारात्मक विचारों को छिपाए रखा। उसी तरह दयानंद सरस्वती के आर्य समाज और उसके समाजसुधारों और खड़ी बोली हिंदी के विकास से संबंधित योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की लेकिन हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। इसी तरह बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि के स्वाधीनता  संग्राम में योगदान को महत्व दिया लेकिन उनके हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। कहने का आशय यह कि ‘हिंदुत्व’ ‘गोरक्षा’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ की अवधारणा हाल-फिलहाल की तैयारशुदा विचारधाराएँ नहीं हैं। ये भारतीय समाज में पहले से मौजूद रही हैं। इससे यह मिथ टूटता है कि ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ का विचार सिर्फ आरएसएस की देन है।
आरएसएस ने  पहले से मौजूद इन दोनों विचारों को अपने सांगठनिक वैचारिक ढांचे में शामिल किया और मनमाना विस्तार दिया। यह सच है वामपंथी, 
धर्मनिरपेक्ष विचारकों ने बड़े पैमाने पर आरएसएस का मूल्यांकन किया, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि की परंपरा का विवेचन भी किया लेकिन वे यह बताने में असमर्थ रहे कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का विचार आम जनता के दिलो-दिमाग में कैसे घुसता चला गया धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र, संविधान, सरकारें आदि इसे रोकने में असफल क्यों रहीं। ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ के विचारों की आम जनता में आज जो गहराई तक मौजूदगी नजर आती है उसकी प्रक्रियाओं को दार्शनिक तौर पर खोले बिना यह समझ में नहीं आएगा कि आखिरकार ये विचार जनता में इतनी गहराई तक कैसे पहुँचे, कहने का आशय यह कि विचार की आलोचना से विचार का सतही रूप समझ में आता है लेकिन उसकी जनता में पैंठ को देखकर उसका असली रूप समझ में आता है।
       ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष ताकतें तदर्थ भाव से वैचारिक संघर्ष करती रहीं, लेकिन उसका सफाया नहीं कर पाईं, जबकि हर स्थान और संरचना में उनका दखल था। इसका अर्थ यह है संरचना पर कब्जा कर लेने या कानून बनाने से कोई भी प्रचलित विचार मरता नहीं है। धर्मनिरपेक्षतावादी इस संघर्ष के जरिए अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे, हर बार के चुनावों में जनसंघ-भाजपा की हार पर खुश हो रहे थे, धर्मनिरपेक्ष ताकतों की विजय पर जश्न मना रहे थे, लेकिन विगत 70 सालों में धर्मनिरपेक्ष प्रचार अभियान अंत में वहीं आकर पहुँचा जहाँ पर वह 1947 में था, सन् 1947 में जो घृणा हमारे मन में थी वही घृणा आज भी हमारे मन में है, मुसलमानों, पाक के निर्माण आदि के खिलाफ जो घृणा 1947 में थी, वह आज भी है, इससे यह पता चलता है कि हम नौ दिन चले अढाई कोस।
कहने का आशय यह कि देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा तो हमने बना ली लेकिन उसके अनुरूप शरीर नहीं बना पाए, शरीर के अंग नहीं बना पाए। शरीर और अंगों के बिना आत्मा का चरित्र वायवीय बन जाता है। उल्लेखनीय विगत 70 सालों में साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने प्रयोगों के जरिए एक ही चीज पैदा की है वह है अशांति! अशांति के बिना वे अपना विकास नहीं कर सकतीं। उनके सारे एक्शन अ-शांति पैदा करने वाले होते हैं। संघियों के प्रयोग सिर्फ प्रचार तक ही सीमित नहीं रहे हैं बल्कि शरीर, राजनीति, सेंसरशिप, दंगे और दमन तक इनका क्षितिज फैला हुआ है। इन सबके कारण वे समाज को शांति से रहने नहीं देते। इन सबका असर यह हुआ कि धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत का तानाबाना और ढाँचा लगातार क्षतिग्रस्त हुआ है। मसलन् जब कभी दंगा होता है तो हम उसे संपत्ति, जानो-माल के नुकसान या कानून-व्यवस्था की समस्या से ज्यादा देखते ही नहीं हैं, हम यह नहीं देखते कि इससे भारत का धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक शरीर क्षतिग्रस्त हुआ है। हमने भारत की आत्मा को एकदम वायवीय बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत की बातें सब करते हैं, लेकिन भारत के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष शरीर के अंगों की बात कोई नहीं करता। अंगों के बिना शरीर का कोई अर्थ नहीं है।
       भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शारीरिक अंगों के बिना भारत की आत्मा वायवीय है, अमूर्त है, अप्रासंगिक है। साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में अनेक लोग मारे गए, अनेक किस्म के विचारों का भी अंत हुआ। बार-बार कहा गया सचेत रहो। लेकिन सचेत रहो के आह्वान ने हमें अंत में कहीं का नहीं छोड़ा, हम क्रमशः अचेत होते चले गए, जनता में सचेत रहो के आह्वान को पहुँचाने में असफल रहे, असफल क्यों रहे इसका कभी वस्तुगत मूल्यांकन नहीं किया। आज सत्तर साल बाद हकीकत यह है कि आम आदमी की जुबान, बोली, अभिव्यंजना शैली आदि में साम्प्रदायिक लहजा घुस गया है। कायदे से व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक बनना था लेकिन हुआ एकदम उलटा। आज हम सबके कॉमनसेंस में साम्प्रदायिक विचारों और नारों ने गहरी पैठ बना ली है। हम सबको योग, भगवानराम, कृष्ण, राधा, सीता, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि के निरर्थक प्रपंचों में उलझा दिया गया है। व्यक्ति को हमने लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता के अनुरुप पूरी तरह नए रुप में तैयार ही नहीं किया, हम ऊपर से मुखौटे लगाकर उसे धर्मनिरपेक्ष बनाते रहे, लोकतांत्रिक बनाते रहे, उसके व्यक्तित्वान्तरण के सवालों को कभी बहस के केन्द्र में नहीं लाए, सवाल यह है व्यक्ति को पूरी तरह बदले बगैर यह कैसे संभव है कि भारत लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष हो जाए, हमने रणनीति यह बनायी कि व्यक्ति जैसा है, वैसा ही रहे, थोड़ा बहुत बदल जाए तो ठीक है, जो हिदू है वह हिंदू रहे, जो मुसलमान है वह मुसलमान रहे, जो ईसाई है वह ईसाई रहे, बस इससे हमें सद्भाव का पाखंडी मार्ग मिल गया। हमने व्यक्ति के कपड़े बदले, जीवन के साजो-सामान बदले, समाज का ऊपरी ढाँचा बदला, कल-कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, नई-नई गगनचुम्बी इमारतें बनाईं, नए कानून बनाए, लेकिन व्यक्ति को नहीं बदला। यही वह जगह है जहाँ पर भारत हार गया, भारत वायवीय बन गया, बिना शरीर के अंगों का देश बन गया। आधुनिक भारत को 
आधुनिक मनुष्य भी चाहिए, इस सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात को हम समझ ही नहीं पाए, लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत की परिकल्पना को आधुनिक मनुष्य बनाए बगैर साकार करना संभव नहीं है, यही वह बिंदु है जहाँ से साम्प्रदायिक ताकतों ने समाज के जर्रे-जर्रे पर हमला किया और उसे अपने साँचे में ढालने में उनको सफलता मिली।
       आधुनिक शरीर अंग रहित भारत वस्तुतः साम्प्रदायिक भारत है, हम लाख दावा करें कि भारत धर्मनिरपेक्ष है, उसकी जनता धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन वास्तविकता इसके एकदम विपरीत है, आप आँकडों की रोशनी में, मतदाताओं के मतदान की प्राथमिकताओं, प्राप्त मतों के आधार पर लाख तर्क दें और कहें कि भारत धर्मनिरपेक्ष है तो यह बात गले नहीं उतरती, क्योंकि आधुनिक भारत के अनुरूप आधुनिक व्यक्ति के निर्माण के काम को हमने अपने एजेण्डे पर कभी नहीं रखा, इसका परिणाम यह निकला कि आज धर्मनिरपेक्ष सपने, प्राथमिकताएँ और मूल्य संकट में हैं, सभी धर्मनिरपेक्ष दल अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं, उनके पास इसका कोई उत्तर नहीं है।
बुनियादी सवाल यह है कि 70 साल तक भारत धर्मनिरपेक्ष था तो फिर एकदम हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर काबिज क्यों हो गईं, क्यों जीवन के हर क्षेत्र में उनका व्यापक प्रभाव बना हुआ है  यह महज मोदी सरकार के आने के साथ घटित परिघटना नहीं है, मोदी का चुनाव जीतना एक घटना मात्र है, यह संभव है कि आगामी 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी-भाजपा हार जाएँ, सारे देश में क्रमशः उनकी राज्य सरकारें भी खत्म हो जाएँ लेकिन क्या इससे भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मान लेंगे, क्या धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र का संबंध सिर्फ चुनावी हार-जीत तक ही सीमित है यह लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता को अति सरलीकृत रुप में देखना होगा। हमें लोकतंत्र के चुनावी गणित के दायरे के बाहर जाकर गंभीरता से साम्प्रदायिकता के चरित्र को समझने की कोशिश करनी होगी।
      हमारे यहाँ संविधान सब मानते हैं, लेकिन संविधान के अनुरूप सही शारीरिक अंगों या संरचनाओं को हम निर्मित ही नहीं कर पाए, जो संरचनाएँ निर्मित की हैं वे 
धर्म, धार्मिक पहचान और जनदवाब की दासी है। उन संरचनाओं के आदेशों को कोई नहीं मानता। हमें संविधान चाहिए, बिना संवैधानिक संरचनाओं के आदेशों के अनुपालन के बिना, हमें व्यक्ति चाहिए लेकिन संविधान के ढाँचे ढला व्यक्ति नहीं चाहिए, बल्कि परंपरा में ढला व्यक्ति चाहिए, धर्म में ढला व्यक्ति चाहिए, कानून चाहिए लेकिन धर्मानुकूल कानून चाहिए। संविधान के पालन का अर्थ है संवैधानिक संरचनाओं का निर्माण और उनके आदेश का पालन, कानून 
विधान के अनुरूप आचरण, संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप नए व्यक्ति के रूप में नागरिक की पहचान का निर्माण करना। इन सब पर 
ध्यान केन्द्रित करने के बजाय साम्प्रदायिक धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने संविधान को तो माना, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र, व्यक्ति के जीवन में लोकतंत्र, परिवार में लोकतंत्र, धर्म में लोकतंत्र, राजनीति में लोकतंत्र, जाति में लोकतंत्र आदि को अस्वीकार किया। कागज पर अभिव्यक्ति की आजादी को माना लेकिन उसकी असली स्प्रिट से परहेज करते रहे।
दिलचस्प आयरनी यह है कि हमारे देश में लोकतांत्रिक संविधान है, लोकतांत्रिक संरचनाएँ हैं, लेकिन व्यक्ति के जीवन में अंदर-बाहर लोकतंत्र नहीं है। व्यक्ति के अंदर-बाहर लोकतंत्र का अभाव ही वह बिंदु है जहाँ से साम्प्रदायिक ताकतें अपनी ऊर्जा लेती हैं और अपने सामाजिक आधार को निरंतर बढ़ाती रही हैं, इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि सभी दलों में अ-लोकतांत्रिक व्यक्ति मान्य और ताकतवर बना है। अलोकतांत्रिक व्यक्ति का आदर्श प्रतिनिधि चरित्र हैं गुंडे, दलाल, समानांतर सत्ता केन्द्र, अवैध सत्ता केन्द्र आदि।
     अंगों के बिना शरीर की अवधारणा के अनुसार यदि साहित्य को देखें तो बहुत ही भयावह तस्वीर नजर आएगी, कहने को साहित्य खूब लिखा जा रहा है, लेकिन उसमें सारवान अंतर्वस्तु और सृजन के तत्व का अभाव है। रूढ़ विषयों पर स्टीरियो टाइप लेखन जमकर हो रहा है, इसलिए साहित्य प्रभावहीन होकर रह गया है। इसी तरह हिंदी में साहित्यकार है, लेकिन उनकी जीवन और उसके गंभीर सवालों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसने ठीक से विश्वदृष्टि का निर्माण तक नहीं किया है। वह लिखने के नाम पर लिख रहा है, बिना विश्वदृष्टि के लिख रहा है, समाज में किसी भी वर्ग या समुदाय या लिंग के साथ लगाव पैदा किए बगैर लिख रहा है, ऐसी स्थिति में साहित्यकार समाज में रहकर भी अपनी पहचान नहीं बना पाया है।
मोदी सरकार आने के पहले कहने के लिए सामूहिकता का खूब ढोल पीटा गया, कहा गया सोनिया गांधी हरेक फैसले लेती रही हैं, मनमोहन सिंह पर थोपती रही हैं, वे तो उनके आदेशों का पालन करते रहे हैं, मोदीजी पीएम बनेंगे तो यह सब नहीं होगा, फैसले सामूहिक तौर पर मंत्रिमंडल लेगा, लेकिन व्यवहार में हुआ एकदम उलटा, प्रधानमंत्री कार्यालय में सभी मंत्रालयों की शक्ति संकेन्द्रित होकर रह गयी। यहाँ तक कि भाजपा के द्वारा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति भवन के फैसले लेने का अधिकार भी पीएम ने अपने पास रख लिया। सामूहिक फैसले न लेने का क्लासिक उदाहरण है नोटबंदी का फैसला। यह फैसला अकेले पीएम का था, उनके कॉकस के लोगों के अलावा इसके बारे में कोई पहले से नहीं जानता था। जबकि यह फैसला लेना था रिजर्व बैंक को लेकिन पीएम ने बैंक पर अपना फैसला थोप दिया। कहने का आशय यह कि मोदी के सत्ता में आने के बाद मंत्रिमंडल की सामूहिक फैसले लेने, स्वायत्त और लोकतांत्रिक विवेक के आधार पर काम करने की शक्तियाँ घटी हैं। अब मंत्रिमंडल में अलोकतंत्र सर्कुलेशन में है, पीएम निष्ठा चरम पर है, इसने लोकतंत्र को अपाहिज बना दिया है। सत्ता के सर्कुलेशन को रोक दिया है, अब सत्तातंत्र में सिर्फ वही चीज गतिशील है जिसकी पीएम ने अनुमति दी है। पीएम की अनुमति के बिना कोई चीज गतिशील नहीं हो सकती। उसने लोकतंत्र की स्पीड को रोक दिया है।
अंगों के बिना शरीर की धारणा से संचालित होने के कारण सिर्फ एक ही चीज पर बल है वह है प्रचार की सघनता और उन्माद। हम अब सब समय प्रचार की सघन अनुभूतियों में ही डूबते-उतराते रहते हैं, हम भूल गए कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आजादी आदि का भी जीवन में कोई महत्व है। हम सबके जेहन में संघ, मोदी, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद के प्रचार को सघनता के साथ उतार दिया गया है। हरेक व्यक्ति बिना जाने माने बैठा है कि मोदीजी सही कर रहे हैं, सवाल करो कि क्या सही कर रहे हैं तो उसके पास न तो कोई तथ्य होते हैं, न प्रमाण होता है, लेकिन वह माने बैठा है कि मोदीजी सही कर रहे हैं। यहाँ तक कि जघन्य हत्याकांडों की खबरों तक से व्यक्ति अब विचलित नहीं होता, उसे मोदी की चुप्पी से कोई परेशानी नहीं है बल्कि वह मोदी की चुप्पी पर भी मोदी के पक्ष में तर्कों का पुलिंदा लेकर खड़ा है। हालात की गंभीरता देखें कि 
आधारकार्ड को संवैधानिक प्रावधानों, सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों की अवहेलना करके हर चीज से जोड़ दिया गया उसको भी चुपचाप स्वीकार कर लिया गया। अलोकतांत्रिक प्रक्रिया का इतना सघन प्रभाव पहले कभी महसूस नहीं किया गया।
      सांगठनिक संरचनाएं और मॉडल का चरित्र। मोदी सरकार आने के बाद समूचे समाज का नए सिरे से वर्गीकरण किया जा रहा है, शहरों का नया वर्गीकरण हो रहा, नए सिरे से सामाजिक समुदायों के वर्गीकरण की दिशा में सरकार कदम उठाने जा रही है, आरक्षण को भी नए वर्गीकरण के नजरिए से परिभाषित करने की कोशिश हो रही है, इसी प्रकार नागरिक पहचान, ग्राहक पहचान, क्रय-विक्रय, बैंक से आदान-प्रदान आदि सब क्षेत्र में नए किस्म के वर्गीकरण या केटेगराइजेशन ने जन्म ले लिया है। कहने का आशय यह कि जीवन के हर क्षेत्र में केटेगराजेशन हो रहा है। इस क्रम में नए पदबंधों का उदय हुआ है। सवाल उठता है इस तरह के वर्गीकरण की जरूरत क्यों पड़ी। यह असल में चीजों, घटनाओं, देश, पड़ोस, निजी कार्य-व्यापार आदि को सीधे सपाट क्रम में देखने के नजरिए की दिशा में ठेलने की प्रक्रिया है। इस तरह देखने का अर्थ यह है कि चीजों, घटनाओं आदि को एपीसोड के रूप में देखना, इसमें एक एपीसोड खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है, यही पद्धति हिंदू राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य पर भी लागू होती है, उनके सभी एक्शन एपीसोड के रूप में आते हैं, एक एपीसोड़ खत्म तो दूसरा शुरू, दूसरा खत्म तो तीसरा शुरू आदि आदि। इस तरह के एपीसोड लगातार यही संदेश देते हैं कि आप अपने घर या स्कूल में नहीं हैं बल्कि लगातार किसी एपिसोड में व्यस्त हैं। कभी समुदाय, कभी धर्म, कभी स्त्री या कभी मोदी या कभी हिंदुत्व या कभी लवजेहाद, कभी गऊ-गुंडई आदि के एपीसोड में व्यस्त रहते हैं। आप एक घटना या स्तर से बाहर निकलते हैं तो दूसरी घटना आकर घेर लेती है। ये सभी सेगमेंट कभी वायनरी, कभी चक्राकार और कभी लाइनर भाव से घटित होते रहते हैं। हम इनमें से किसी न किसी में बंधने के लिए मजबूर हैं। आप चाहें तो अपने नजरिए के अनुसार सेगमेंट या सर्किल बदल सकते हैं। मसलन आपको लवजेहाद यूपी में नापसंद है लेकिन गोवा में पसंद है।
      आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठन अपने को चक्राकार रूप में संगठित करते हैं, वे आंतरिक से बाह्य की ओर उन्मुख होते हैं। इस काम को वे सिलसिलेबार स्थानीय गतिविधियों के जरिए संपन्न करते हैं। इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है आदिम समूह के रुप में हिंदू समाज को संगठित करना। चीजों को नए वर्गीकरण में करके देखना, रखना और संपन्न करना स्वयं में आदिम समाज की प्रवृत्ति है, उसी की देन है। इस प्रक्रिया में कम्युनिकेशन बहुत प्रभावशाली होता है। लेकिन इस समूची प्रक्रिया का सबसे विलक्षण सच यह है कि आधुनिक राज्य के शासन में नए वर्गीकरण को समाज में बरकरार रखना असंभव है। क्योंकि सत्तातंत्र की कार्यप्रणाली को वर्गीकृत ढ़ंग से नहीं चलाया जा सकता है। क्योंकि आधुनिक राज्य और समाज की बुनियाद में वर्गीकरण का निषेध काम करता है।
      वास्तविकता यह कि है भारत की व्यवस्था एकीकरण और एकीकृत भाव से चलती रही है। यह ग्लोबल सिस्टम का अंग है। इसके कारण वह सभी किस्म के विभाजनकारी वर्गीकरणों को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है, वह विभाजनकारी ताकतों के बनाए लक्ष्यों को तोड़ने के लिए, उनको अपदस्थ करने के लिए भी वचनवद्ध है। यही वजह है साम्प्रदायिकता के साथ 
आधुनिक राज्य का निरंतर अंतर्विरोध बना रहता है।
           आरएसएस ने एक नायकत्व का जो मॉडल चुना है वह पशुचेतना और पशुदृष्टि पर आधारित है। यह मॉडल प्राचीन समाजों में सक्रिय रहा है। पशुदृष्टि का गहरा संबंध पशु स्प्रिट से है। हरेक पशु की स्प्रिट अलग होती है लेकिन कुछ चीजें साझा हैं मसलन पशु अति चौकन्ना होकर हर तरफ नजर रखता है, केन्द्र पर नजर रखता है, हर चीज को एकल सर्किल में रखकर देखता है, ठीक वैसे ही आरएसएस भी देखता है। इसके गर्भ से ही केन्द्रीकृत सत्ता, केन्द्रीकृत संगठन की अवधारणा का जन्म हुआ है। आरएसएस की प्रकृति में जो लोग लोकतंत्र और विकेन्द्रीकरण खोज रहे हैं वह गलती कर रहे हैं, आरएसएस का लोकतंत्र और विकेन्द्रीकरण से कोई संबंध नहीं है, यह उसके बुनियादी मॉडल का हिस्सा ही नहीं है। वह जब भी जहाँ पर भी काम करता है केन्द्रीकृत ढंग से काम करता है। उसके काम करने की शैली द्वैतपूर्ण और वायनरी है। मसलन् वह कहता है लोकतंत्र की, करता है अधिनायकवाद की। कहता है राममंदिर की, करता है सामाजिक विभाजन की। यह काम वह क्रमबद्ध ढंग से करता है। मसलन इसबार यदि गऊरक्षा, लवजेहाद के मसले केन्द्र में हैं तो अगली बार सत्ता में वे जब आएँगे तो नए विभाजनकारी मुद्दों के साथ आएगे, वे गऊरक्षा और लवजेहाद पर बातें नहीं करेंगे, जैसे पहले उन्होंने धारा 370 राममंदिर आदि के मसले उठाए लेकिन बाद में उनको छोड़ दिया और नए मसले चुन लिए।
    कहने का आशय यह कि आरएसएस का मानना है जब भी सत्ता में आओ नए मसले के साथ आओ, पुराने को छोड़ दो। इस क्रम में वे अपने हिंदुत्व नामक वर्गीकरण को नहीं छोड़ते या मुसलमानों के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग नहीं करते। वर्गीकरण और वर्गीकृत सोच उनके मॉडल का अंतर्ग्रथित हिस्सा है। उनके वर्गीकरण में केन्द्रीकरण का निषेध शामिल नहीं है। यही वजह है कि आज पीएम कार्यालय में समूची सत्ता का केन्द्रीकरण करके रख दिया गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि संघ के बनाए वर्गीकरण अनुदार होते हैं और स्थानीयता पर निर्भर होते हैं। पुराने समाज में जिस तरह पिता, बॉस, शिक्षक आदि का चेहरा केन्द्र में होता था, लेकिन आधुनिक समाज में यह अप्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक समाज में हम विभिन्न किस्म के सर्किलों और वर्गीकृत समूहों में बँट जाते हैं, लेकिन इन सभी वर्गीकृत और बँटे हुए सर्किलों का एक चेहरा होता है, उस चेहरे पर सबकी नजर होती है। इसी तरह संघ का भी एक प्रधान चेहरा होता है जिस पर सबकी नजर होती है। इस समय वह चेहरा नरेन्द्र मोदी हैं। पहले अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसलिए वर्गीकरण में बँटे लोगों की नजर शून्य या आकाश की ओर नहीं प्रधान चेहरे पर टिकी होती है। यही है पशुदृष्टि जो 
प्रधान पर नजर रखती है लेकिन पशुचेतना की तरह काम करती है। कहने को समाज में विभिन्न स्तरों पर अनेक सत्ताकेद्र हैं लेकिन इन सबके ऊपर एक ही केन्द्र है, एक ही व्यक्ति है जो समूची सत्ता, सोच और आचरण का प्रतिनिधित्व करता है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी 
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

रविवार, 1 अप्रैल 2018

गद्दार केंचुल बदल रहे हैं

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  ने शहीद राजगुरु को अपना संघी  बता दिया है। एक संघ प्रचारक नरेंद्र सहगल की किताब में इस बात का दावा किया गया है। नरेंद्र सहगल हरियाणा में विद्यार्थी परिषद  के संगठन मंत्री रहे हैं। दरअसल नरेंद्र सहगल की किताब ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ में लिखा गया है कि ‘सरदार भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स को लाहौर की मालरोड पर गोलियों से उड़ा दिया। फिर दोनों लाहौर से निकल गए। राजगुरु नागपुर आकर डॉ. हेडगेवार से मिले। राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे’।
सहगल की किताब में दावा किया गया है कि राजगुरु संघ की मोहित बोड़े शाखा के स्वयंसेवक थे। सहगल की लिखी किताब के अनुसार नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के बेहद करीबी रहे। किताब में यह भी दावा किया गया है कि सुभाष चंद्र बोस भी संघ से काफी प्रभावित थे। एक खास बात यह भी है कि किताब ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ की भूमिका संघ प्रमुख मोहन भागवत ने लिखी है। भागवत ने लिखा है कि स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर सवाल उठाने वाले लोगों को  यह किताब उचित जवाब देगी।
 राजगुरु को संघ का संघी  बताने के अलावा इस किताब में हेडगेवार का भी जमकर महिमामंडन किया गया है। हेडगेवार के बारे में लिखा गया है कि हेडगेवार ने 26 जनवरी 1930 को देश के हर प्रांत में स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले नेहरु के आदेश पर खुशी जताते हुए पूरे देश में, खासकर संघ की शाखाओं में आजादी का दिन मनाने का निर्देश दिया था।किताब के मुताबिक महात्मा गांधी के सत्याग्रह में स्वयंसेवक ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था और खुद हेडगेवार ने भी सत्याग्रह किया था।
वैसे यह किताब झूठ का पुलिंदा है और कोई भी तथ्य ऐतिहासिक नहीं  है क्योंकि संघियों की स्वतंत्रता आंदोलन में कोई  भूमिका नहीं रही है। अब संघ  इस किताब को इन सारे सवालों का जवाब बता रही है। हालांकि इधर शहीद राजगुरु को संघ का संघी  बताने पर लोग अब ट्विटर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खिलाफ मजे ले रहे हैं। एक यूजर ने लिखा कि अभी वो लोग कह रहे हैं कि राजगुरु स्वयंसेवक थे बाद में यह लोग कहेंगे कि भगत सिंह लाहौर शाखा में शाखा प्रमुख थे।
इन तथ्यों के विपरीत वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ। चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।
23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।
                         जबकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि 30 जनवरी 1930 को रावी नदी के तट पर जवाहर लाल नेहरु ने तिरंगा ध्वज फेहराया था और जिसका समर्थन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने नही किया था. 
                हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का उद्देश्य व अन्तिम लक्ष्य स्वाधीनता प्राप्त करना और समाजवादी राज्य की स्थापना था। दल की ओर से बम का दर्शन नाम से प्रकाशित एक लघु पुस्तिका में क्रान्तिकारी आन्दोलन की समस्या के बारे में अपने विचार खुलकर प्रकट किये गये थे.
                संघ ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत कितना भी झूंठ प्रकशित करे लेकिन उसकी 'गद्दारी और मुखबिरी का इतिहास' इतिहास के पन्ने जब भी कोई खोलेगा तो वह अक्षर सबसे पहले दिखाई देंगे.  अगर राजगुरु संघ की शाखा के थे तो क्या संघ समाजवादी दर्शन के लिए काम कर रहा था. जिस तरह से सांप नई उर्जा प्राप्त करने के लिए अपनी केंचुल बदलता है उसी तरह संघी अपनी गद्दारी का इतिहास बदलने के लिए देश के महान क्रांतिकारियों को संघी बताने के लिए बेताब नजर आ रहे हैं. दूसरी तरफ अगर हेड़गेवारकर गाँधी के अनुयायी थे तो गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का प्रचार प्रसार संघी क्यूँ करते हैं.
             भविष्य में गद्दारों को अपनी गद्दारी छिपाने के लिए जरुरत पड़ी तो काल मार्क्स को महर्षि कार्ल मार्क्स लिख कर हिंदुवत्व की परंपरा का महर्षि घोषित कर सकते हैं. वैसे कार्ल मार्क्स पूरी दुनिया मजदूर और किसान, शोषित-पीड़ित जनता के लिए महर्षि हैं.

रणधीर सिंह सुमन 

रविवार, 10 सितंबर 2017

संघी गिरोह भविष्य में तर्कवादी लोगों की हत्याएं कर सकता है


 बाराबंकीं। संघी गिरोह की हिन्दुवत्व वाली विचारधारा अब अपने असली चेहरे के साथ मैदान में आ गई है। जिसका परिणाम नरेंद्र दाभोलकर गोविंद पंसारे कुलर्गी व गौरी लंकेश की हत्या हैं। भविष्य में यह लोग तर्कवादी लोगों की हत्याएं कर सकते है। 
                   उक्त विचार व्यक्त करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जिला कौंसिल बैठक में उपस्थित कार्यकर्ताओ को संबोधित करते हुए सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि इस उग्रवादी विचार धारा से देश की एकता और अखंडता को खतरा है। पार्टी इस संबंध में 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक जन जागरूकता अभियान चलाएगी। 
                        कौंसिल सदस्यों को संबोधित करते हुए सचिव ब्रजमोहन वर्मा ने कहा कि गांव-गांव जाकर जनसभाओं के माध्यम से किसान कर्जों की फर्जी त्रण-माफी का पर्दाफाश किया जाएगा। 15 सितंबर को अतरोरा व 16 से जनसभा से जन-जागरूकता अभियान की शुरूआत होगी।
                  बैठक में कौंसिल के वीरेंद्र कुमार, प्रवीन कुमार, मुनेश्वर बक्श वर्मा, राम नरेश वर्मा, अमर सिंह प्रधान कैलाश आदि वरिष्ठ नेता मौजूद थे।

-भूपिंदर पाल सिंह

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

संघी हत्यारे बुद्धिजीवी लोगों की हत्याएं कर रहे हैं


बाराबंकी। अखिल भारतीय नौजवान सभा व आल इण्डिया स्टूडेण्ड फेडरेशन की कन्या कुमारी से चलकर हूसैनीवाला जाने वाली लॉन्ग मार्च को जनपद हरदोई में रोके जाने व पत्रकार गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के विरोध में प्रदेश व देश की तानाशाह सरकार के तानाशही रवैये के खिलाफ अखिल भारतीय नौजवान सभा के कार्यकर्ताओ द्वारा पुलिस लाइन तिराहे पर प्रदेश सरकार का पुतला फूंक कर विरोध प्रदर्शन किया गया।
                    प्रदर्शन का नेतृत्व नौजवान सभा जिलाध्यक्ष अधिवक्ता बी0पी0सिंह व जिला महामंत्री प्रित्युश कान्त शुक्ल ने किया। इस दौरान कार्यकर्ताओ ने सरकार विरोधी नारे भी लगाये। 
               प्रदेश सरकार का पुतला जलाने से पूर्व गाँधी भवन में आयोजित सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि जब से देश व प्रदेश में मोदी-योगी सरकारों आयी है, तब से लोकतंत्र समाप्त हो गया है और संघी हत्यारे गिरोह बुद्धिजीवी लोगों की हत्याएं कर रहे हैं। 
                    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव ब्रज मोहन वर्मा ने कहा कि किसान ऋण माफी योजना जनता के साथ धोखा है।
भाकपा के जिला सहसचिव डॉ0 कौसर हुसेन ने कहा कि नौजवानों और छात्रों के लांग मार्च को हरदोई पुलिस ने योगी के इशारे पर रोक कर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोध प्रदर्शन के दौरान किसान सभा जिलाध्यक्ष विनय सिंह, रामनरेश वर्मा, वीरेंदर कुमार, मुनेश्वर, बशत, राकेश, समाजसेवी मयंकर यादव, अधिवक्ता विजय कुमार सिंह, अधिवक्ता पुष्पेन्द्र सिंह, अधिवक्ता राजेंद्र बहादुर सिंह, अधिवक्ता कर्मवीर सिंह, अधिवक्ता आनद सिंह, अधिवक्ता मन्नू लाल चौरसिया, अधिवक्ता गौरी रस्तोगी, अधिवक्ता नीरज वर्मा, अरुण यादव, अवधेश यादव समेत आदि लोगो ने विरोध प्रदर्शन किया।

- भूपिंदर पाल सिंह 

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

गोडसेवाद जीता - गांधीवाद से

दक्षिण अफ्रीका से लेकर अपने देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ मोहनदास करमचंद गाँधी ने जो आन्दोलन चलाया उससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सूरज डूबने लगा लेकिन इस बात से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सबसे चहेते संगठन संघ को यह बातें नहीं पसंद आयीं और उन्होंने गाँधी की काया को 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर नष्ट कर दिया था. विचारों में देश के अन्दर गाँधीवाद का बोलबाला रहा किन्तु 26 मई 2014 नरेन्द्र दामोदर मोदी की शपथ ग्रहण के बाद गोडसेवाद ने अपने को विजयी घोषित कर दिया और संविधान की प्रस्तावना में लिखा शब्द धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को बदलते हुए गाली का स्वरूप दे दिया जाता है और राष्ट्र को अघोषित रूप से हिन्दू राष्ट्र घोषित किया जाने लगा. गोडसे मंदिर से लेकर गाँधी की हत्या को वध कहकर नाथूराम गोडसे को सम्मानित करने का काम शुरू हो गया. सोशल मीडिया के माध्यम से गाँधी की  सबसे ज्यादा चरित्र हत्या सुनियोजित तरीके से, संघी अर्थात गोडसे वादियों ने की.  नयी पीढ़ी को बहुत सारा इतिहास की जानकारी न होने के कारण वह गोडसे को सहज तरीके से स्वीकार कर रही है, जो चिंता का विषय है.
                                देश की एकता और अखंडता की हिफाजत के लिए आज जरूरी है कि गांधीवाद फिर गोडसेवाद को पराजित करे अन्यथा इस देश की एकता और अखंडता को बनाये और बचाए रखना एक मुश्किल काम होगा. संघियों के मन में गोडसे है लेकिन मजबूरी में माला पहनाना गाँधी प्रतिमा को भी आवश्यक है.
                   आज जब अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ देश को जोड़ा जा रहा है तो जनता को यह महसूस होने लगा कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद से आजादी कितनी मुश्किलों के बाद मिली थी लेकिन यह गोडसेवादी अब फिर देश को अमेरिकी साम्राज्यवाद का गुलाम बनाने पर तुले हैं फिर हमें नए गाँधी को लाने की जरूरत है. साम्राज्यवाद के खिलाफ दुनिया में गाँधी महान हैं. विचारों की भिन्नता हो सकती है. कोई जरूरी नहीं गाँधी दर्शन की सभी चीजों से सहमत हों लेकिन सहमत औरे असहमत चलता रहता है लेकिन फ़ासिस्टवादियों से असहमत का मतलब है उनकी गोली का शिकार होना है. 

सुमन 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

जोगेंद्र नाथ मंडल का सांप्रदायिकीकरण

आजादी से पहले पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार बनती थी. जिसमें शेड्यूल्ड कास्ट के नेता जोगेंद्र नाथ मंडल मंत्री होते थे तो वहीँ मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री वाले कैबिनेट में भारतीय जनसंघ के बाद में संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्याम प्रसाद मुखर्जी भी होते थे. बंगाल के उप-मुख्यमंत्री रहते हुए मुखर्जी ने अंग्रेज़ गवर्नर को चिट्ठी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन को कुचलने के लिए हर संभव मदद का आश्वासन देते रहते थे.
जोगेंद्र नाथ मंडल बंगाल या देश के अन्दर अनुसूचित जाति, जनजाति के उत्थान के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार थे. पकिस्तान के निर्माण के समय मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पकिस्तान के कानून एवं श्रम मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल बनाये गए. कहा यह भी जाता है कि पकिस्तान के संविधान की रचना भी उन्होंने की. भारत पकिस्तान विभाजन के समय कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दू मुसलमानों का कत्लेआम इतिहास की बड़ी घटनाओं में से एक है. पकिस्तान के अन्दर कत्लेआम देख कर हताश व निराश जोगेंद्र नाथ मंडल 8 अक्टूबर 1950 को लियाकत अली मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर भारत वापस आ गए थे . जिन्ना की मृत्यु 11 सितम्बर 1948 को हो गयी जोगेंद्र नाथ मंडल के सारे कसमें वादे जिन्ना के साथ थे.  उनके न रहने के बाद उनका कोई पुरसाहाल नहीं रहा. 
        इस घटना को लेकर संघ विचारक राकेश सिन्हा की नई पत्रिका ‘पाकिस्तान वॉच’ के पहले अंक में प्रकाशित किया गया है और उसके बाद सुनियोजित तरीके से संघ के लोगों ने सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक जोगेंद्र नाथ मंडल के इस्तीफे का सहारा लेकर तथ्यों और परिस्तिथियों के विपरीत जाकर यह साबित करने की कोशिश में संघ परिवार लगा है कि दलित और मुसलमान स्वाभाविक रूप से एक दुसरे के दुश्मन हैं. पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल के इस्तीफा से जुड़े कुछ घटनाओं का जिक्र सांप्रदायिक भावना से किया है।
            संघ की नागपुरी विष प्रयोगशाला इस समय जोगेंद्र नाथ मंडल से जुडी हुई तमाम सारे किस्से कहानियां सोशल मीडिया व प्रिंट मीडिया में प्रकाशित करा रहा है जिससे दलितों व मुसलमानों के बीच की दूरी बढ़ सके और इस बात को दबाया जा सके कि धर्म के आधार पर अनुसूचित जातियों का शोषण नहीं किया गया है.ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि संघ व हिन्दू महासभा एक तरफ मुसलमानों के खिलाफ विष वमन कर देश को विभाजित करना चाहते थे तो वहीँ मुस्लिम लीग इस्लाम के मतावलंबियों को लेकर अलग राष्ट्र के निर्माण की मांग कर रही थी. यह दोनों पक्ष अंग्रेजों की एक जोड़ी बैल के दांये व बांये बैल थे. यह  दोनों अंग्रेजों के इशारे पर हमेशा कार्य करने के लिए तत्पर रहते थे देश की एकता और अखंडता से इनका कोई मतलब नहीं था.
संघ इतिहास के तथ्यों को तोड मारोड़ कर एक नया इतिहास तैयार कर रहा है जिसका आधार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष को बढ़ावा देना और अंग्रेजों की गुलामी करने के उसके कार्य को छिपाना है. उसी प्रक्रिया के तहत जोगेंद्र नाथ मंडल सांप्रदायिकीकरण किया जा रहा है

सुमन 

बुधवार, 10 अगस्त 2016

गुजरात में दलितः असमानता और हिंसा के शिकार

गत 11 जुलाई को गुजरात के ऊना शहर में ‘मानव भक्षकों’ व ज़बरिया वसूली करने वालों के गिरोह ने-जो स्वयं को गौरक्षक बता रहे थे-एक दलित परिवार के सात सदस्यों की क्रूरतापूर्वक पिटाई की। उन्हें मोटा समधियाला गांव में एक मरी हुई गाय की खाल उतारने के लिए लोहे की छड़ों, लाठियों और चाकू से मारा गया। उसके बाद उनके कपड़े उतारकर उन्हें सार्वजनिक रूप से मारते हुए थाने ले जाया गया। इस भयावह व दिल हिला देने वाली हिंसा से दलितों के प्रति गुजरात में व्याप्त पूर्वाग्रहों और घृणा का पता चलता है। इस बर्बर घटना पर उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दलित लेखक अमृतलाल मकवाना ने उन्हें मिला ‘जीवन श्रेष्ठ साहित्य कृति’ पुरस्कार लौटा दिया। गुजरात के दलित युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अपना विरोध व्यक्त करने के लिए कई बसों को आग के हवाले कर दिया और सड़कों व राजमार्गों को जाम किया। बनासकांठा जिले के करीब एक हजार दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा व्यक्त की। सुरेन्द्र नगर में दलितों ने मृत गायों को ठिकाने लगाने से इंकार कर दिया।
पुलिस का रवैया ढीलाढाला था। पुलिस आसानी से दलितों की सार्वजनिक रूप से पिटाई को रोक सकती थी। पुलिस ने एफआईआर कायम करने में बहुत देरी लगाई। इससे भी बुरी बात यह थी कि एफआईआर, पीड़ितों के खिलाफ ही दर्ज की गई-जैसा कि मोहम्मद अख़लाक के मामले में हुआ था। मानव भक्षकों के खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज की गई जब दलितों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और दलितों ने विरोध प्रदर्षन किए। पुलिस की लेतलाली सामने आने के बाद, ऊना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया। घटना के नौ दिन बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल पीड़ितों से मिलने के लिए समय निकाल सकीं और वह भी तब, जब इस घटना से पूरा देश आहत हो चुका था और दलितों के विरोध प्रदर्षनों से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी। उत्तरप्रदेश चुनाव में भाजपा को इस घटना का खामियाजा न भुगतना पड़े, यह भी आनंदी बेन की यात्रा का एक उद्देष्य था।
भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का दलितों के प्रति दृष्टिकोण जगजाहिर है। सन 2015 में फरीदाबाद में दलित बच्चों की हत्याओं के बारे मंे पूछे जाने पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने दलितों की तुलना कुत्तों से करते हुए कहा था, ‘‘अगर कोई एक कुत्ते को पत्थर मार दे तो क्या उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार है?’’ हाल में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दलितों पर हमले को ‘सामाजिक बुराई’ बताया। स्पष्टतः, वे दलितों पर अत्याचार को रोकने में राज्य की असफलता का बचाव कर रहे थे। राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि ‘‘गुजरात में कांग्रेस शासन के दौरान दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की संख्या कहीं ज़्यादा थी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन घटनाओं में तेज़ी से कमी आई है।’’ आंकड़े राजनाथ सिंह के इस दावे से मेल नहीं खाते। मई 2015 के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में 19 प्रतिषत की वृद्धि हुई है।
इस संदर्भ में भाजपा के नेता केवल प्रतिकात्मक बातों और खोखले दावों से दलितों को संतुष्ट करना चाहते हैं। भाजपा के मुखिया अमित षाह ने कुुंभ में दलित साधुओं के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई। इस अवसर पर उन्होंने कहा ‘‘भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो भारतीय संस्कृति को मज़बूत करने में विष्वास रखती है और यह मानती है कि पूरा विष्व एक परिवार है।’’ हम उनकी बातों पर कैसे भरोसा करें, जबकि उनके गृह राज्य गुजरात में छुआछूत की अमानवीय प्रथा का व्यापक प्रचलन है। गुजरात के दलित, भेदभाव और छुआछूत का दंष झेलने को मजबूर हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार,
98.4 प्रतिषत गांवों में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध है और ऐसे विवाह करने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा हुई और उन्हें अपने गांव छोड़कर जाना पड़ा है। 98.1 प्रतिषत गांवों में किसी दलित व्यक्ति को गैर-दलितों के मोहल्लों में मकान किराए से नहीं दिया जाता है और 97.6 प्रतिषत गांवों में यदि दलित, गैर-दलितों के पानी के पात्रों या अन्य बर्तनों को छू लें तो इससे वे बर्तन अपवित्र माने जाते हैं, 97.2 प्रतिषत गांवों में किसी दलित को गैर-दलित क्षेत्र में कोई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करने की इजाज़त नहीं है। ये सर्वेक्षण नवसर्जन संस्था ने गुजरात के 1,589 गांवों में किया था। क्या राज्य सरकार ने छुआछूत की इस क्रूर व अमानवीय प्रथा के खिलाफ कोई कार्यवाही की? उत्तर है, नहीं। दलितों को 77 गांवों में सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने घर छोड़कर जाना पड़ा। इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की और यह पाया कि इसके पीछे दलितों की शिकायतों का पुलिस द्वारा संज्ञान न लिया जाना, ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा सही जांच और उपयुक्त कार्यवाही न की जाना और दलितों पर अत्याचार के प्रकरणों में दोषसिद्धी की दर अत्यंत कम होना है। राज्य ने इस मामले में उपयुक्त कार्यवाही करने की बजाए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों को गलत ठहरा दिया। 
भाजपा के दलितों के प्रति दृष्टिकोण और ऊना जैसी घटनाओं के पीछे, दरअसल, हिन्दुत्व की विचारधारा है। हिन्दुत्व की विचारधारा, ऊँचनीच की अवधारणा पर आधारित है और इसमें दलित, सामाजिक पदक्रम के सबसे निचले पायदान पर हैं। सामाजिक असमानता और ब्राह्मणों का प्रभुत्व, हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं में षामिल है। हिन्दुत्व की
विचारधारा, भाजपा की नीतियों का आधार है और यही कारण है कि ये नीतियां, दलितों को सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर करने वाली हैं। दलितों को कमज़ोर करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं। इनमें से एक है राष्ट्रवाद के प्रतीकों का निर्माण। इन प्रतीकों को पूरे समाज पर लादने की कोषिष की जाती है। ये प्रतीक ऊँची जातियों के विषेषाधिकारों को स्वीकृति देते हैं और जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं। गाय, सरस्वती वंदना और योग, धार्मिकता और राष्ट्रवाद के प्रतीक बना दिए गए हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा, उन परंपराओं और नियमों को मान्यता देती है जो मूलतः ऊँची जातियों के हैं और दलितों सहित अन्य समुदायों की परंपराओं और आचरण को निचला दर्जा देती है। स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए हर व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उच्च जातियों को स्वीकार्य परंपराओं और नियमों का पालन करे।
उदाहरणार्थ, हमेशा से दलितों को मृत मवेषियों को ठिकाने लगाने और उनके मांस को खाने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। किसी मृत जानवर को छूना, ऊँची जातियों के सदस्यों को मंजूर नहीं था और यह काम केवल दलितों के लिए उचित माना जाता था। आज भी दलित मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम करते हैं।
गुजरात में निजी निवेश, अधोसंरचनात्मक विकास और खेती के निगमीकरण पर ज़ोर ने सांठगांठ पर
आधारित पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटालिज्म) को बढ़ावा दिया जा रहा है। सार्वजनिक संसाधनों, जो सबाल्टर्न समुदायों की आजीविका के आधार हैं, को उनसे छीनकर अदानी व अंबानी जैसे उद्योग समूहों के हवाले किया जा रहा है। इससे दलित आदिवासी, मछुआरे आदि बेरोज़गार हो रहे हैं और आर्थिक असमानता बढ़ रही है। राज्य सरकार द्वारा भले ही कुछ भी दावे किए जा रहे हों, सच यह है कि गुजरात में 2005 से 2010 के बीच निर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोज़गार में वृद्धि की दर नकारात्मक रही है। इससे दलितों की असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में असमानता में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत तेज़ है और दलित आदिवासी पहले से अधिक गरीब हुए हैं। यद्यपि अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत हर राज्य को इस उपयोजना के लिए राज्य की अनुसूचित जातियों की आबादी के अनुपात में धनराषि आवंटित करनी चाहिए परंतु गुजरात सरकार ने पिछले दस वर्षों में एक बार भी इस उपयोजना के लिए राज्य के बजट का 7.09 प्रतिषत-जो कि गुजरात की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा है-आवंटित नहीं किया। जुलाई 2015 की अपनी एक रपट में सरकार ने एक बहुत अजीब सा तर्क दिया, जो कि अनुसूचित जाति उपयोजना के दिषानिर्देषों का स्पष्ट उल्लंघन था। सरकार ने कहा कि ‘‘केवल अनुसूचित जातियों के लिए क्षेत्र-आधारित विकास की परियोजनाएं लागू करना बहुत कठिन है’’! मनरेगा-जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को रोज़गार उपलब्ध करवाने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है-के लिए बजट आवंटन में लगातार कमी की जा रही है और जिन ज़िलों में यह योजना लागू है, उनकी संख्या में लगातार कमी की जा रही है। इससे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को बहुत नुकसान हुआ है। सन 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत 18 लाख अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध हुआ। सन 2014-15 में यह आंकड़ा 7 लाख रह गया।
अहमदाबाद के ह्यूमन डेव्लपमेंट रिसर्च सेंटर (एचडीआरसी) ने अपने नोटिस बोर्ड पर सफाईकर्मियों के रूप में कार्य करने के लिए आवेदन पत्र आमंत्रित करते हुए एक विज्ञापन लगाया। इसमें कहा गया था कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारांे को नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी। इस विज्ञापन से हिन्दुत्व संगठन भड़क उठे। राजपूत षौर्य फाउंडेषन और युवा षक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं ने एचडीआरसी के कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की। उन्होंने यह आरोप लगाया कि एचडीआरसी, समाज को विभाजित कर रही है और लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रही है। इस घटना से हिन्दुत्व संगठनों का दलितों के प्रति दृष्टिकोण ज़ाहिर होता है। उनका यह ख्याल है कि हाथ से मैला साफ करने और अन्य सफाई के कार्य केवल दलितों को ही करने चाहिए। यह विडंबनापूर्ण ही है कि जहां संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, हाथ से मैला साफ करने की प्रथा के उन्मूलन की बात कर रही हैं वहीं गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सन 2007 में प्रकाषित अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’ में यह लिखा था कि वाल्मीकि समुदाय के सदस्य हाथ से मैला साफ करने का काम अपनी आजीविका कमाने के लिए नहीं वरन इसलिए करते हैं क्योंकि वह उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है। हम चकित हैं कि अगर हाथ से मैला साफ करने से व्यक्ति आध्यात्म की और प्रवृत्त होता है तो ऊँची जातियां इस मौके को क्यों खो रही हंै और क्यों सरकार सभी जातियों के लोगों को यह काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही?
जो दलित युवक भेदभाव के इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, वे बेहतर जिंदगी के लिए षिक्षा प्राप्त करने के मौके तलाष रहे हैं। परंतु उच्च षैक्षणिक संस्थानों में दलित विद्यार्थियों के साथ एबीव्हीपी जैसे दक्षिणपंथी विद्यार्थी संगठनों और प्रषासन द्वारा भेदभाव किया जाता है। और अगर वे इसका विरोध करते हैं तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है जैसा कि अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल और रोहित वेमूला के मामलों से साफ है। इससे दलितों की आवाज़ और कमज़ोर हो रही है और दलित युवक अपने आप को असहाय अनुभव कर रहे हैं। असहमति की आवाज़ों को देषद्रोह बताकर क्रूरतापूर्वक कुचल दिया जाता है। इसी तरह, योग-जिसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया गया है-से भी दलित स्वयं को नहीं जोड़ पा रहे हैं। इसके कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं। पहले से भूख और गरीबी से पीड़ित दलित, जो दिनभर कमरतोड़ षारीरिक श्रम करते हैं, में योग करने की ऊर्जा कहां से बची रहेगी। इसी तरह, दलितों से सरस्वती वंदना करने की अपेक्षा करना एक क्रूर मज़ाक है क्योंकि दलितों को कभी षिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया। आज भी गुजरात के स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। इंडिया एक्सक्लूज़न रिपोर्ट 2014 के अनुसार राज्य के 32.4 प्रतिषत दलित बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।
हिन्दू के रूप में स्वयं को स्वीकार्य बनाने के लिए और हिंदुत्व संगठनों से जुड़ने के लिए दलितों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी युद्ध में षिरकत करें। उनके मन में यह भ्रम पैदा किया जाता है कि वे हिन्दू समुदाय का हिस्सा बन गए हैं और उन्हें मुसलमानों से श्रेष्ठ बताकर, हिन्दू राष्ट्रवादी समूह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने के लिए दलितों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी और सभी हिन्दुओं का षत्रु बताकर दलितों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है। दलित सड़कों पर हिंसा करते हैं और बाद में आपराधिक न्याय प्रणाली की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं।
दलितों को स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए सभी हिन्दुत्ववादी नियमों का पालन व उसके प्रतीकों का सम्मान करना होता है ताकि उन्हें सत्ता और अवसरों के वे चंद टुकड़े मिल सकें, जिन्हें ऊँची जातियां उनकी और फेकेंगी। जहां तक चुनावों का सवाल है दलितों के सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है कि वे भाजपा का साथ दें क्योंकि भाजपा उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है। अगर दलित इन हिन्दुत्ववादियों की अपेक्षा के अनुरूप आचरण नहीं करते तो उनके साथ वही होता है जो ऊना में हुआ। दलितों के साथ हिंसा कर उन्हें दबाने का काम धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह करते हैं जिन्हें राज्य का संरक्षण प्राप्त होता है। इस कारण वे बिना किसी डर के खुलेआम हिंसा करते रहते हैं।
सन 2000 की षुरूआत में गुजरात की विभिन्न अदालतों में अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत 13,293 प्रकरण लंबित थे। साल के अंत तक वे सभी प्रकरण लंबित बने हुए थे अर्थात एक भी प्रकरण में निर्णय नहीं हुआ था। इस साल अप्रैल तक प्रदेष में दलितों पर अत्याचार के 409 मामले दर्ज किए गए। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात में सन 2001 से लेकर अब तक दलितों पर हमले के 14,500 मामले दर्ज किए गए अर्थात औसतन 1,000 प्रति वर्ष या तीन प्रतिदिन। दलित अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि दलितों पर अत्याचार करने वाले इसलिए बेखौफ रहते हैं क्योंकि इस तरह के प्रकरणों में दोषसिद्धि की दर मात्र तीन से पांच प्रतिषत के बीच है।
क्या राज्य तंत्र द्वारा दलितों पर अत्याचारों को रोकने और दोषियों को सज़ा दिलवाने की ज़िम्मेदारी पूरी न करना स्वीकार्य हो सकता है? दलित समुदाय की बेहतरी और उसकी सुरक्षा की ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया जाना हिन्दुत्व के असली चरित्र को दर्षाता है और भाजपा के इरादों का पर्दाफाष करता है। हिन्दुत्ववादी, दलितों का अपनी घृणा की राजनीति  में इस्तेमाल तो करना चाहते हैं परंतु उन्हें बराबरी का दर्जा देना नहीं चाहते। दलितों को अपने निचले दर्जे को चुपचाप स्वीकार करना होगा ताकि स्थापित सामाजिक पदक्रम को कोई खतरा न हो। दलितों के साथ यदि भेदभाव होता है और उनके साथ हिंसा की जाती है तो इसके लिए जातिप्रथा ज़िम्मेदार नहीं है। यह तो एक ‘सामाजिक बुराई’ है।
भारत को आज एक षक्तिषाली दलित आंदोलन की आवष्यकता है। यह सही है कि धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह और सरकार व षासक दल का रवैया दलितों के सषक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा है परंतु नागरिक समाज संगठनों को आगे बढ़कर दलितों को एक करना होगा और उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाना होगा। अछूत प्रथा के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जाने की ज़रूरत है और विकास का एक नया माॅडल बनाने की भी।
-नेहा दाभाड़े

शनिवार, 26 मार्च 2016

हिटलर का नाजीवाद इनकी हिन्दू संस्कृति

इप्टा के सचिव राकेश से लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन

भाजपा और आरएसएस में भारतीय व राष्ट्रीय






लगा जरूर होता है लेकिन कोई भारतीय या राष्ट्रीय उनकी सोच और समझ है नहीं. देखा जाए तो इसके बहुत सारे प्रमाण हैं इसके प्रमाण चाहे गोलवलकर के हो, चाहे इटली में मुसोलिनी से मिलना हो, चाहे हिटलर का राष्ट्रवाद हो उसका टू कॉपी (उसकी प्रतिलिपि) अब तो फोटोकॉपी का ज़माना है जो हिटलर का नाजीवाद है वही इनकी हिन्दू संस्कृति है. यह कभी किसी रूप में फिर किसी अन्य रूप में परिभाषित करते हैं. हिटलर के लिए यहूदी नंबर एक के दुश्मन थे. दूसरे नंबर पर कम्युनिस्ट थे. तीसरे पढने लिखने वाले और विवेक की कैफियत रखने वाले लोग उनके दुश्मन थे. उनकी तर्ज पर यहाँ यहूदी नहीं हैं तो मुसलमान नंबर एक पर है और कम्युनिस्ट. संसदीय लोग हों, कम्युनिस्ट जीते या न जीते लेकिन यहाँ और वहां भी यह किया था कि तर्क व बड़ा विवेक मार्क्सवाद ने तैयार किया है इसलिए वह इनके स्वाभाविक रूप से विरोधी हैं.
यह उनकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है. वह अपने क्रियाकलापों को अंजाम देने के लिए नए-नए नारे गढ़ते रहते हैं. सबसे पहले यह 1925 से शुरुवात करते हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सोच आजादी की लड़ाई के लिए नहीं थी और वीर सावरकर आजादी की लड़ाई में फंसे और अटल 16 साल की उम्र में.  इसके दस्तावेज हैं कि इन दोनों लोगों ने उस समय की अंग्रेज हुकूमत से माफ़ी मांगी थी.
उनकी कोशिश है कि अब दोनों को आजादी का महान योद्धा माना जाए. वीर सावरकर ने जो संकल्प लेकर घोषणा की थी कि ब्रिटिश सरकार का सहयोग करेंगे वह उनके नायक हैं. उनको भी स्थान दिया जा चुका है. यह उनकी एक सोची समझी नीति है. आजादी के बाद उन्होंने पहला निशाना 1948 में गाँधी को बनाया और नेहरु भी उस वक्त खुले में घूमते थे और धर्म विरोधी थे. जितना गाँधी धर्म को मानते थे हिन्दू धर्म और वर्णाश्रम को भी मानते थे लेकिन ऐसा आदमी सांप्रदायिक नहीं था इसीलिए उन्हें निशाना बनाया. दुबारा फिर करवट बदली और संघियों ने गौरक्षा और गौहत्या को मुद्दा बनाया. फिर मुद्दे की तलाश में राम जन्म भूमि का मुद्दा मिला. इसके लिए वह शुरू से काम कर रहे थे. वह लोगों के मन की नियत को पकड़ने की कोशिश की. उन्होंने सरस्वती शिशु मंदिर खोले और साम्प्रदायिक शिक्षा की शुरुवात की. यह सारा काम करते हुए समाज में राजनीतिक पैठ नहीं बन पा रही थी. 1966 के बाद कांग्रेस से मोह भंग होने के बाद भी उनको राजनीतिक मान्यता नहीं मिल पाई. 1975 आपातकाल लागू हुआ तब जेपी के साथ उन्होंने एक रिस्क लिया कि उन्होंने अस्मिता पर दांव लगा दिया. उन्होंने खुद को जनता पार्टी के रूप में अपने अस्तित्व का विलय कर दिया. जब उनकी पैठ सब जगह हो गयी तो उनका पहला राजनैतिक बड़ा अस्तित्व था और उसके बाद जनता दल और जनता पार्टी के विघटन जब तो गया तब 1989 तक आते आते उनका राजनीतिक अस्तित्व सीमित रहा.
राम जन्म भूमि को मुद्दे को एक बड़े मुद्दे के रूप में उछाला और वहां से उग्र हिन्दुवाद जो शुरू किया उसकी परिणीती 2014 के पहले मोदी गुजरात में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया और जो कामकाज हुआ और फिर मोदी के समर्थन में पूरा कारपोरेट जगत, मीडिया जुटा और प्रधानमंत्री बना दिया और अब नये नारों की तलाश में निकले हैं. अब धर्म के मुद्दे और राम के मुद्दे अब उनके लिए बासी हो चुके हैं और ऐसी ताकतें भी चाहे अनचाहे जुड़ जाती हैं जो उनके साथ नहीं होनी चाहिए. कट्टर सांप्रदायिक विरोधी भी उनके साथ रिश्ता बना लेते हैं.
              हिटलर का फासीवाद जहाँ से पकड़ा उनको राष्ट्रवाद का नया सूत्र मिला और जो भी है उसे उग्र से उग्र कर रहे हैं. जो इसमें विरोध में तर्क करता है उसपर हमलावर होते हैं जो वर्षों वर्ष में जो तमाम संस्थाएं, विश्व विद्यालय आदि को नष्ट करने का काम कर रहे हैं जिसमें तमाम संस्थाओं में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय एक बड़ा उदहारण है इस हमले में यद्यपि हिन्दू संस्कृति के सबसे ख़राब पक्ष वो लेते हैं जो पक्ष इस देश के दलितों आदिवासियों के विरोध में रहता है उसमें अम्बेडकर को भी सम्मिलित करने, शहीद भगत सिंह व विवेकानंद को भी समायोजित करते हैं जबकि यह सब धार्मिक कट्टरता के प्रबल विरोधी रहे हैं. यह उनकी आगे की रणनीति का हिस्सा है. अब जितने लोग तर्क और विवेक से मुकाबला करेंगे. यह बड़ी लड़ाई होगी और जहाँ ये एक राजनैतिक लड़ाई से ज्यादा सांस्कृतिक लड़ाई होगी जो एक मैदान से ज्यादा लोगों के दिमागों में लड़ी जा रही है.

-इप्टा के सचिव राकेश से लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन व विनय कुमार सिंह की बातचीत के आधार पर 

सोमवार, 21 मार्च 2016

मोहन भागवत क्या नकली हिन्दू हैं ?

पति कहता है कि मेरा घर संभालो सुख दो, मैं तुम्हारा पेट पालने की व्यवस्था करूंगा और तुमको सुरक्षित रखूंगा, जब तक पत्नी ऐसी है तब तक पति कांट्रैक्ट पूरी करने के लिए उसको रखता है
यह बात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक मोहन भागवत ने कहते हुए वर्तमान हिन्दू धर्म के विवाह संस्कार को  हिटलरी जामा पहना दिया. यह बहुत गंभीर बात है कि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार विवाह जन्म और जन्मांतर से सम्बद्ध एक देवीय प्रक्रिया है. इसी वजह से सात जन्म तक विवाह संबंधों की बात कही जाती है. 
भागवत ने आगे कहा कि अगर पत्‍नी इस समझौते को पूरा नहीं करती है तो पति उसे छोड़ सकता है और अगर किसी कारण पति कांट्रैक्ट पूरा नहीं कर सकता तो पत्नी उसे छोड़ सकती है. यह बात भी हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के विपरीत है इसीलिए तलाक की व्यवस्था नहीं है.
यह सब बातें जो मोहन भागवत कह रहे हैं वह धार्मिक मान्यताओं के विपरीत है और यह सब बातें साबित करती हैं कि मोहन भगवत का कोई सम्बन्ध हिन्दू धर्म से नहीं है और यह व्यक्ति नकली हिन्दू है.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पुलिस है या गणवेशधारी

दिल्ली में आरएसएस मुख्यालय के सामने छात्र-छात्रों के प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस ने चापलूसी में जमकर लाठी चार्ज किया इस लाठी चार्ज में पुलिस के साथ-साथ संघी व अराजक तत्व भी छात्र-छात्रों को पीटने में आगे थे.
इस सम्बन्ध में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर मिस्टर बी.एस. बस्सी ने कहा कि छात्र-छात्रों के प्रदर्शन में उकसावेपूर्ण  कार्यवाई के कारण बल प्रयोग करना पड़ा. लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कार्यों के ऊपर लाठी चार्ज या बल प्रयोग करना कानून और संविधान का स्पष्ट उल्लंघन है. छात्र अगर उकसावे पूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे तो क्या बस्सी साहब और उनकी पुलिस लाठी चार्ज व बल प्रयोग संघी गुंडों के साथ करके भारतीय संविधान व कानून व्यवस्था को गंगा स्नान कराकर पवित्र गाय बना रहे थे.  लोकतंत्र में और वर्तमान सरकार में जिम्मेदारीपूर्ण पदों पर बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों का संविधान व कानून के हिसाब से पालन नहीं कर रहे हैं. चापलूसी कर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को खुश करने की जो प्रक्रिया है वह लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक है. उकसावे में आकर क्या पुलिस बल जनता को मार डालेगा. उकसावे में आकर क्या वह संविधान और कानून को छोड़ कर गुंडागर्दी की स्तिथि में आ जायेगा. बस्सी साहब का यह बयान निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. रिटायरमेंट के बाद और कुछ पाने की इच्छा और आकांक्षा इस तरह के कार्यों को करने के लिए प्रेरित करती है.   

संघी गुण्डों और संघी पुलिस की एकता का अदभुत नजारा और झूठ के दोनों कारखाने इस एकता को नकार रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने पिछले वर्ष 2015 में 10 निरीक्षकों समेत करीब 490  कर्मियों को निलंबित किया गया और इसके साथ ही भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई, सतर्कता जांच की संख्या में 55 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार निलंबित किए गए अधिकारियों में 90 उप-निरीक्षक, 46 सहायक उप-निरीक्षक, 97 हेड कांस्टेबल और 247 कांस्टेबल शामिल हैं। अगर सावधानीपूर्वक दिल्ली पुलिस के सम्पूर्ण क्रियाकलापों की जांच की जाए तो उसका और भयानक चेहरा सामने आएगा. उकसावेपूर्ण कार्यवाई की बात कहकर बचाव करना कहीं से उचित नहीं है.
संघी अपने को पुलिस के साथ होने पर बहुत बहादुर समझते है. पहले यह ब्रिटिश पुलिस के साथ यही काम करते थे और अब दिल्ली पुलिस के साथ. मुखबिरी इनका मुख्य पेशा रहा है. बटेश्वर इनका मुख्य चेहरा है मुख्य पहचान है.  
 
सुमन 

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

गोबिल्स भी पराजित हो गया

नागपुर मुख्यालय की नयी-नयी परिभाषाओं से और नए तरीके के प्रचार अभियान से हिटलर का प्रचार मंत्री गोबिल्स इन लोगों की नयी-नयी स्टाइल से अपने को शर्मिंदा और पराजित महसूस कर रहा होगा. 1947 से पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रेरणा से धर्म के आधार पर ब्रिटिश कालीन भारत का विभाजन इन्ही शक्तियों ने कराया था. फिर भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पंडित दीन दयाल उपाध्याय व डॉ राम मनोहर लोहिया ने कांग्रेस को सरकार से हटाने के लिए गैर कंग्रेसवाद का नारा दिया. फिर भारत-पकिस्तान महासंघ बनाने की मांग शुरू की. कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए यही नारा लगाया गया था. उसी आधार को आज नागपुर मुख्यालय के प्रतिनिधि राम माधव ने 'अल जजीरा' टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा, 'भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक दिन फिर से एक हो जाएंगे और फिर अखंड भारत या अविभाजित भारत' का निर्माण होगा.' राम माधव बीजेपी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता और संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रह चुके हैं. माधव ने भी कहा है कि वह जिस अखंड भारत का जिक्र कर रहे हैं वह बिना युद्ध, लोकप्रिय सहमति पर भी हो सकता है
कुछ दिन पूर्व राम माधव ने कहा था कि 'यह एक ऐसा देश है जहां जीवन जीने के एक विशेष तरीके, एक विशेष संस्कृति या सभ्यता के आधार पर जिंदगी जी जाती है. हम इसे हिंदू कहते हैं. क्या आपको कोई आपत्ति है? भारत की संस्कृति एक है. हम एक संस्कृति हैं, एक जैसे लोग हैं, एक देश हैं.'


                    ब्रिटिश कालीन भारत या वर्तमान भारत के सभी नागरिकोंकी जीवन पद्यति एक सी नहीं है और न ही सभी लोग बहु ईश्वरवाद या एक ईश्वरवाद के मानने वाले लोग हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में बहु जातीय, बहु संस्कृति, बहु धर्मीय, बहु भाषीय लोग हैं उनको एक संस्कृति का कहना गोबिल्स के प्रचार तंत्र का हिस्सा तो हो सकता है लेकिन वास्तविक धरातल से यह बात कोसों दूर है. अखंड भारत का नागपुरी अर्थ है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना और हिन्दू राष्ट्र का अर्थ है की मनुस्मृति का शासन लागू करना है. नागपुर मुख्यालय येन केन प्रकरेण वर्तमान केंद्र सरकार पर सत्ता रूढ़ दल की असफतला को छिपाने के लिए तरह-तरह की अफवाहें व प्रचार करते रहना. जिससे आम जनता की समस्याएं बनी रहे और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट जारी रहे. इन्होने 1947 तक जितना जहर उगला था उससे एक ही पकिस्तान बना था. अगर यह अखण्ड भारत या हिन्दू राष्ट्र की कल्पना में तरह-तरह की अफवाहबाजी जारी रखतें हैं तो देश की एकता और अखंडता को बचाए रखने में नागरिकों को दिक्कत होगी. 

सुमन 

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

संस्थागत दंगा मशीनरी



भाजपा नेताओं या प्रवक्ताओं से जब भी देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में इज़ाफे और बढ़ती असहिष्णुता के संबंध में पूछा जाता है तो वे तपाक से कहते हैं कि कांग्रेस सरकारों और विशेषकर यूपीए शासनकाल में भी देश में सांप्रदायिक हिंसा होती थी। वे 1984 में दिल्ली व अन्य राज्यों में हुए सिक्ख.विरोधी दंगों का हवाला देते हैं और उन दंगों का जिक्र करते हैं, जो कांग्रेस के राज में हुए थे। देश में सन 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 644 घटनाएं हुईं। सन 2015 में इन घटनाओं की संख्या 650 थी। परंतु केवल आंकड़ों के आधार पर सांप्रदायिक हिंसा की तुलना करना बचकाना होगा।
केवल सांप्रदायिक दंगों की संख्या के आधार पर इस या उस शासक दल को दोषी ठहराना बेमानी है। सांप्रदायिक हिंसा कभी स्वस्फूर्त नहीं होती। पॉल ब्रास इस लोकमान्यता का खंडन करते हैं कि दंगे, एक समुदाय के दूसरे समुदाय के विरूद्ध क्रोध का स्वस्फूर्त प्रकटीकरण होते हैं। इसके विपरीत, दंगों की योजना बनाई जाती है और उन्हें भड़काने का काम ' विशेषज्ञ' करते हैं। सांप्रदायिक हिंसा की विभिन्न घटनाओं के अपने अध्ययन से ब्रास इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सांप्रदायिक दंगो की बाकायदा योजना तैयार की जाती है और इन्हें इस काम में माहिर लोग अंजाम देते हैं। दंगों को योजनाबद्ध ढंग से भड़काने का काम, पॉल ब्रास के शब्दों मेंए 'संस्थागत दंगा मशीनरी' ;आईआरएस द्वारा किया जाता है।
संस्थागत दंगा मशीनरी की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं। सबसे पहले किसी प्रमुख राजनेता के नेतृत्व में दंगे करवाने के लिए असामाजिक तत्वों की भर्ती की जाती है, फिर आमजनों के मन में 'दूसरे समुदाय' के प्रति भय उत्पन्न करने और उन्हें उत्तेजित करने के लिए भड़काऊ भाषणों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि सामान्य लोगों के समूह को 'हिंसक भीड़' में परिवर्तित किया जा सके। उत्तेजित व दूसरे समुदाय से भयग्रस्त लोगए 'दूसरों' से दूरी बना लेते हैंए उनके विरूद्ध हिंसा को उचित मानने लगते हैं और ऐसी हिंसा में भागीदारी भी करने लगते हैं। भयातुर व उत्तेजित लोगए 'दूसरे समुदाय' की सांस्कृतिक व आस्थागत विभिन्नताओं को नज़रअंदाज करने लगते हैंए अपने समुदाय के अंदर के दमनकारी व शोषणकारी ढांचे से उनका ध्यान हट जाता है और 'दूसरे समुदाय' के अपनी तरह शोषित, दमित व हाशिए पर पड़े समूहों के साथ जुड़ने की बजाए वे उन लोगों के साथ हो लेते हैंए जो उनके शोषण व दमनकर्ता होते हैं। उत्तेजक भाषणों व आह्वानों से दूसरे समुदाय के साथ उनके सांझा मूल्यों और समानताओं को वे भूल जाते हैं व उनकी राजनैतिक चेतना 'हम' बनाम 'वो' तक सिमट जाती है। इस तरह की राजनैतिक चेतना, वर्चस्ववादी सांप्रदायिक श्रेष्ठि वर्ग के वर्चस्व को बनाए रखने में सहायक होती है और अपने समुदाय का शोषण व दमन करने के बाद भी वे प्रभावशाली बने रहते हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीज से वोटों की फसल उगती है और अन्य दूरगामी लाभ मिलते हैं।
तुलना की भ्रांति
आईआरएस का निर्माण धीरे.धीरे किया जाता है और उसे सुप्तावस्था में रखा जाता है। जब निहित स्वार्थों को ऐसा लगता है कि दंगे भड़काए जाने चाहिए, तब इस मशीनरी को सक्रिय किया जाता है। ऐसा करने का एक उद्देश्य होता है साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर चुनावों में लाभ पाना। इसलिएए पॉल ब्रास के अनुसार, दंगे 'चुनावों के आसपास करवाए जाते हैं' ताकि राजनैतिक संतुलन को बदला जा सके। आईआरएस इतनी शक्तिशाली होती है कि वह दो समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों को कटुता में बदल देती है और दोनों समुदायों के समझदार व परिपक्व लोगों की आवाज को दबा देती है। जब दंगे चुनावों के आसपास नहीं होतेए तब वे अक्सर भविष्य में की जाने वाली हिंसा की रिहर्सल होते हैं।
हिन्दू राष्ट्रवादी, योजनाबद्ध तरीके से भारत में दंगे करवाते रहे हैं और उनसे चुनावों में लाभान्वित होते रहे हैं। 1984 के सिक्ख.विरोधी दंगों और कंधमाल में 2008 की ईसाई.विरोधी हिंसा को छोड़कर, सन् 1970 के दशक के अंत तक जनसंघ और उसके बाद से भाजपा, साम्प्रदायिक हिंसा से चुनावों में लाभ उठाते रहे हैं। सिक्ख.विरोधी दंगों से भाजपा इसलिए लाभ नहीं उठा सकी क्योंकि ये दंगे कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में हुए थे और ओडिसा में भाजपा को इसलिए लाभ नहीं हुआ क्योंकि वहां के सबसे प्रभावशाली राजनैतिक दल, बीजू जनता दल से उसका गठबंधन समाप्त हो गया था। हिन्दू राष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल अपने आधार को भौगोलिक व सामाजिक विस्तार देने के लिए करते आए हैं। वरना क्या कारण है कि दलितों के एक तबके ने हिन्दू राष्ट्रवादियों से हाथ मिला लिया है, जबकि हिन्दू राष्ट्रवादी कभी भी दलितों की बेहतरी व सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए कदमों, जिनमें आरक्षण शामिल है, के कभी समर्थक नहीं रहे और वे दबे.छुपे ढंग से जातिप्रथा को भी औचित्यपूर्ण ठहराते रहे हैं।
कांग्रेस शासनकाल में हुए साम्प्रदायिक दंगों से जो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ, उसका फायदा भी हिन्दू राष्ट्रवादियों को ही मिला। कांग्रेस सरकारों की गलती यह रही कि वे दंगों को रोकने व नियंत्रित करने में असफल रहीं और वह भी तब, जब प्रशासनिक मशीनरी ऐसा करने में पूर्णतः सक्षम थी। दंगों के बाद, कांग्रेस सरकारों ने दंगों की योजना बनाने वालों, उन्हें भड़काने वालों व हिंसा में भागीदारी करने वालों को सजा दिलवाने की कोशिश नहीं की। इससे हिन्दू राष्ट्रवादियों का हौसला बढ़ा और उन्होंने और बड़े पैमाने पर दंगे करवाने शुरू कर दिए। अगर हिन्दू राष्ट्रवादी दंगे करवाने के दोषी थे, तो कांग्रेस सरकारें उन्हें नियंत्रित न कर पाने के लिए जिम्मेदार थीं। कम से कम दो मौकों पर देश में सड़कों पर खुलेआम खूनखराबा हुआ और वह इसलिए संभव हो सका क्योंकि दंगाई और शासक एक ही पार्टी के थे। ये दो मौके थे सन् 1984 के सिक्ख.विरोधी दंगे और सन् 2002 का गुजरात कत्लेआम।
इस तरहए दंगों के लिए भाजपा व कांग्रेस की अभियोज्यता की तुलना इस आधार पर नहीं की जा सकती कि उनके शासनकालों में कितने दंगे हुए और उनमें कितने लोग मारे गए। कांग्रेस शासनकाल में हुए दंगों के लिए भी हिन्दू राष्ट्रवादी ही जिम्मेदार थे क्योंकि वे ही आईआरएस का निर्माण और संचालन करते थे। विभिन्न दंगा जांच आयोगों की रपटों से यह जाहिर होता है कि हिंदू राष्ट्रवादियों के आईआरएस ने दंगे भड़काने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। हिन्दू राष्ट्रवादियों के आईआरएस, विभिन्न स्थानों पर दंगाईयों की भर्ती करते हैं, उनके मन में जहर घोलते हैं और उत्तेजक भाषणों के जरिए लोगों को 'दूसरे' के विरूद्ध हिंसा करने के लिए उकसाते हैं।    
जांच आयोगों के निष्कर्ष
देश में अब तक 31 बड़े साम्प्रदायिक दंगों की जांच न्यायिक जांच आयोगों द्वारा की गई है। इन आयोगों की रपटेंए विभिन्न राजनेताओं, विचारधाराओं और पुलिस की दंगों में भूमिका पर प्रकाश डालती हैं। कुछ जांच आयोगों ने स्पष्ट शब्दों में दंगों की योजना बनाने वालों व उन्हें अंजाम देने वालों को चिन्हित किया। जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग, जिसने मुंबई में 1992.93 में हुए दंगों की जांच की थी, ने अपनी रपट में कहा कि दंगे, बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने और उसका जश्न मनाकर मुसलमानों को भड़काने का नतीजा थे। आयोग ने अपनी रपट में कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं कि आठ जनवरी 1993 के बाद से, शिवसेना और शिवसैनिकों ने दंगों का नेतृत्व संभाल लिया था। शाखा प्रमुख से लेकर शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे तक शिवसेना के संपूर्ण नेतृत्व ने लोगों को मुसलमानों पर हमला करने और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए भड़काया। बाल ठाकरे ने एक दक्ष जनरल की तरह, अपने वफादार शिवसैनिकों के जरिए मुसलमानों पर सुनियोजित व संगठित हमले करवाए। गैर.आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मुंबई दंगों में कम से कम दो हजार लोग मारे गए थे।
शिवसेना को 1969 में भिवंडी में भड़के दंगों के लिए भी जिम्मेदार ठहराया गया। जांच आयोग ने यह पाया कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भिवंडी और उसके मुसलमान रहवासियों के बारे में ठाणे में 30 मई,1969 को आयोजित शिवसेना की एक आमसभा में अत्यंत भड़काऊ बातें कहीं। ठाकरे ने भिवंडी को दूसरा पाकिस्तान बताया और कहा कि वहां जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, वे इतनी शर्मनाक हैं कि उनकी चर्चा वे महिलाओं के सामने नहीं कर सकते। मादोन आयोग ने भिवंडी में 1969 में दंगे भड़काने के लिए निम्न संगठनों को दोषी ठहराया .आल इंडिया मजलिस तामीर.ए.मिल्लत की भिवंडी शाखा, 2. शिवसेना की भिवंडी शाखा, 3. भारतीय जनसंघ की भिवंडी शाखा, 4. भिवंडी सेवा समिति, 5. शिवसेना और भारतीय जनसंघ से जुड़ा राष्ट्रीय उत्सव मंडल व 6. हिन्दू महासभा। जलगांव में हुए साम्प्रदायिक दंगों के लिए मादोन आयोग ने अन्य कारणों के अतिरिक्त, जनसंघ और जनसंघ की जलगांव शाखा द्वारा नियंत्रित श्रीराम तरूण मंडल की साम्प्रदायिक गतिविधियों को दोषी ठहराया। जनसंघ की जलगांव शाखा और श्रीराम तरूण मंडल ने पूरे शहर में भड़काऊ होर्डिंग और पोस्टर लगवाए।
अहमदाबाद में सन् 1969 में हुए दंगों की जांच करने वाले जस्टिस पीजे रेड्डी आयोग ने अपनी रपट में कहा कि जगन्नाथ मंदिर में हुई घटना के पहलेए साम्प्रदायिक तनाव फैलाने के लिए जनसंघ, हिन्दू महासभा व साम्प्रदायिक हिन्दुओं द्वारा संचालित आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आयोग ने कहा कि जनसंघ के कार्यकर्ताओं और साम्प्रदायिक मानसिकता वाले व्यक्तियों ने अफवाहें फैलाईं और प्रशासन इन अफवाहों का प्रभावी ढंग से खंडन करने में असफल रहा। अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त ने आयोग के समक्ष अपने बयान में कहा कि भारतीय जनसंघ और अन्य साम्प्रदायिक संगठनों ने शहर में हिंसा की व अराजकता फैलाई। इस दंगे में 500 से अधिक व्यक्ति मारे गए थे।
उसी तरहए रघुवर दयाल आयोग, जिसने शोलापुर में 17 सितंबरए 1967 और अहमदनगर में 18 सितंबर, 1967 को हुए दंगों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ,हिन्दू महासभा, मजलिस.ए.मुशव्वरात, जमायते इस्लामी और मुस्लिम लीग को जिम्मेदार ठहराया। आयोग ने कहा कि इन संगठनों ने अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए दंगे भड़काए।
जमशेदपुर में 1979 में हुए दंगों की जांच के लिए गठित जस्टिस नारायण आयोग ने पाया कि आरएसएस  ने साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काईं और गड़े मुर्दे उखाड़े। आयोग ने यह भी पाया कि आरएसएस की दंगे करवाने में भी भूमिका थी और उसका उद्धेश्यए उसकी राजनैतिक शाखाए जनसंघए को भविष्य में राजनैतिक लाभ पहुंचाना था।
आयोग ने पुलिस और प्रशासन को भी दंगों को नियंत्रित करने के प्रभावी कदम न उठाने का दोषी पाया। किसी भी आयोग ने कांग्रेस को साम्प्रदायिक घृणा फैलाने, साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने या दंगे करवाने का दोषी नहीं पाया। दंगों पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम न उठाने से हिन्दू राष्ट्रवादियों को और बड़े पैमाने पर अधिकाधिक दंगे करवाने का मौका मिला। उसकी आईआरएस की क्षमता बढ़ी और वह अधिकाधिक कातिल होती गई।
कांग्रेस सरकारों को  दंगों की योजना बनाने वालों और उन्हें करवाने वालों को सजा न दिलवाने की गलती के लिए माफ नहीं किया जा सकता। यदि दंगों के बाद प्रभावी अभियोजन होता तो आईआरएस समाप्त हो जाता। आईआरएस की मदद से हिन्दू राष्ट्रवादियों का भौगोलिक विस्तार हुआ और उनका प्रभाव दक्षिण भारत और आदिवासी व दलितों के एक हिस्से तक फैल गया। सन् 2002 के साम्प्रदायिक दंगों ने न केवल गुजरात में कांग्रेस को कमजोर किया वरन् अंततः इसका नतीजा यह हुआ कि सन् 2014 में भाजपा अपने बूते पर केन्द्र की सत्ता पर काबिज हो गई। आईआरएस अभी भी जीवंत और कार्यरत है और असहिष्णुता फैला रही है। हालांकि इस बारए नागरिक समाज, इस दैत्य का मुकाबला कर रहा है।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 20 दिसंबर 2015

हमारी सांसो को छूकर के देखो ----------------------

हमारी सांसो को छूकर के देखो ----------------------
प्यार-मोहब्बत में लव जिहाद का नारा उद्घोषित करने वाले लोगों को अब बाजीराव -मस्तानी से भी दिक्कत पैदा हो रही है. इस फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद उनकी अस्पर्शता नीति खतरे में पड़ रही है. उनके अनुसार हिंदुवत्व जिहाद से उनका शुद्ध हिंदुवत्व वादी आन्दोलन खतरे में पद जायेगा. एक राजा दुसरे राजा का राज्य छीनने के लिए युद्ध करता था और जीते हुए राज्य पर वह राज करता था लेकिन नागपुरी इतिहासकारों के अनुसार जितने भी युद्ध होते थे वह धर्म आधारित युद्ध होते थे. धर्म का उपयोग हमेशा राजा अपने राज्य को बढाने व बचाने के लिए करता था. राजा का कभी कोई धर्म नहीं होता था. राज्य बना रहे और उसका वह राजा रहे इसके लिए वह धार्मिक लोगों को अपने पक्ष में रखता था और धर्म की मनचाही व्याख्या कर धर्म के मूल तत्वों से जनता को हटा भी देता था. इसलिए किसी भी युद्ध को धर्म के आधार पर देखना न्यायोचित नही होगा लेकिन देश की एकता और अखंडता को तोड़ने के लिए हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले लोगों को हर चीज धर्म के आधार पर ही दिखाई देती है.
                                     फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' पेशवा बाजीराव जो शुद्ध चितपावन ब्राह्मण हैं और नागपुरी कुनबे का पूर्वज भी है उसने मस्तानी नाम की लड़की से प्रेम किया और उसके बाद उसने उससे शादी कर ली जिससे शमशेर नाम का पुत्र पैदा हुआ था. नागपुरी मुख्यालय को सबसे ज्यादा दिक्कत इस चलचित्र से है कि उनकी जातीय शुद्धता की पोल खुल रही है और जो हिंदुवत्व का महान नायक की छवि गढ़ी गयी थी वह इस फिल्म के बाद टूट रही है इसीलिए विरोध किया जा रहा है.
                                           बाजीराव पेशवा का पूरा नाम श्रीमंत बाजीराव बल्लाळ भट था। शिवाजी महाराज के निधन के पश्चात मराठो में चितपावन ब्राह्मण वंश के पेशवाओ का प्रभाव बढ़ा और उन्होंने सत्ता संभाली। ऐसे ही एक शासक बालाजी विश्वनाथ के यहाँ बाजीराव पेशवा का जन्म 18 अगस्त 1700 ई. को हुआ था जो अपने पिता के सबसे बड़े पुत्र थे। इससे पहले भी कई पेशवाओ ने शासन किया और उनके बाद भी कई पेशवा राज्य करते रहे पर सबसे अधिक प्रसिद्ध बाजीराव पेशवा रहे थे 
                                                    अगर यह बातें बाजीराव पेशवा से सम्बंधित सही हैं तो मनुस्मृति आधारित शासन कहा जा सकता है. पूना के ब्राह्मण शासक बाजीराव पेशवा का राज्य मनुस्मृति के आधार पर चलता था। उनके राज्य में शूद्रों को अपने पीछे झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था, ताकि उनके पैरों के निशान से कोई ब्राह्मण अपवित्र न हो सके। उनके राज्य में शूद्रों को सिर्फ दोपहर जब सूर्य सिर के ऊपर हो और शरीर की परछांई न बनती हो तब ही मार्ग पर चलने की अनुमति थी, ताकि उनकी छाया से ब्राह्मण अपवित्र न हो सकें। शूद्रों को मार्ग पर थुंकने की मनाही थी अपने थूंक को रखने के लिए उन्हें गले में हांड़ी बांधकर चलना पड़ता था, ताकि उनके थूंक पर पैर पड़ जाने से मोई ब्राह्मण अपवित्र न हो सके।उन्हें किसी भी सार्वजनिक स्थल पर जाने का अधिकार नहीं था। उन्हें सार्वजनिक तालाबों से पानी नहीं लेने दिया जाता था। उनको मंदिरों में जाने की मनाही थी। उनको किसी भी तरह के मानवीय अधिकार नहीं थे कोई भी कभी भी उनके साथ मारपीट कर सकता था, हत्या कर सकता था, महिलाओं से बलात्कार कर सकता था। उनकी कोई सुरक्षा नहीं थी. 
                                                                                     यह बातें क्या हिंदुवत्व वादी लागू करना चाहते हैं अगर नहीं तो बाजीराव पेशवा को अपना नायक बनाना छोड़ दें. फिल्म एतिहासिक है तो भी राजा को इंसान की तरह से ही दिखाया जायेगा लेकिन हमारे देश में नायक या महानायक की छद्म छवि गढ़कर इंसान से ऊपर माना जाने लगता है और जब उस महानायक को इंसान के रूप में प्रदर्शित किया जाता है तो भावनाओं में जी रहे लोग जब जमीनी हकीकत पर आते हैं तो उन्हें गहरा धक्का लगता है. नागपुरमुख्यालय ने बाजीराव पेशवा को हिंदुवत्व का महानायक बना रखा है वचः छवि टूट रही है इसलिए विरोध लाजमी है लेकिन बाजीराव को अगर इंसानी नजरिये से देखा जाए, मोहब्बत की, शादी कर ली कोई गुनाह नहीं किया.
 सुमन 

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर देश अमरीकी गुलामी की ओर

 2014 में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर चुनाव लड़कर सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी की आर्थिक नीतियाँ देश को बेबसी की ओर ले जा रही हैं। बुलेट ट्रेन के नाम पर जापान से लिए गए कर्ज से देश कर्ज के मकड़जाल में फंसता जा रहा है तो वहीं जापान सरकार ने हस्ताक्षर होने के बाद तुरन्त ही कहा कि आप परमाणु टेस्ट नहीं कर सकते हैं अगर परमाणु टेस्ट किया तो हमको समझौते के ऊपर सोचना पड़ेगा। यह उसी तरीके की बात है कि जब तारापुर परमाणु संयत्र को शर्ते न मानने के कारण फ्रांस ने यूरेनियम की सप्लाई रोक दी थी। अमरीकी साम्राज्यवादी मुल्कों या उनके सहयोगी देशों से कर्ज लेने का मतलब है इस देश की जनता को गिरवी रखने का काम होता है। देश का ज्यादा से ज्यादा पैसा कर्जे का ब्याज चुकाने में देना होगा। जिससे आर्थिक बुनियादी ढांचा कमजोर होगा।
    वहीं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा  संघ आगे बढ़कर उन्माद के स्तर पर लगा रहा है। देश के अंदर भुखमरी, बेरोजगारी, महंगाई, उत्पीड़न सभी का इलाज हिन्दू-मुसलमान के आधार पर देखा जायेगा। इसी सोच के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता पूरे देश में साम्प्रदायिक उन्माद फैला रहे हैं। साम्प्रदायिक उन्माद से नागरिकों की किसी भी बुनियादी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है। युवाओं के दिमाग को विषाख्त करने का काम अवश्य किया जा रहा है। अपने कर्मो  को छिपाने के लिए  सीबी आई को उपयोग कभी मुख्यमंत्री वीरभद्र के घर पर छापे की लिए या आज केजरीवाल के कार्यालय पर छापा.
इरफ़ान इंजीनियर ने लिखते है कि हिन्दुवत राष्ट्रवादी अपनी बेजा हरकतों को उचित ठहराने के लिए राष्ट्रवाद और देशभक्ति की अवधारणाओं का सहारा ले रहे हैं। जो भी ऊँची जातियों की जीवनशैलीए संस्कृति व विचारों के विरूद्ध या शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत के अनुरूप हैए वे उसे राष्ट्रविरोधी व देशद्रोह बता रहे हैं। हिन्दुवत राष्ट्रवादियों के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है एक संस्कृति और एक विचार का वर्चस्व। इसी आधार पर हिंदू राष्ट्रवादी,तार्किकता व मानवतावाद को खारिज करते हैं।  हिन्दुवत  धर्म इन दोनों अवधारणाओं को खारिज नहीं करता।  आज आवश्यकता है राष्ट्रवाद की परिकल्पना के विखण्डन की।
-रणधीर सिंह सुमन

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

संघी खाएगा स्वर्ग जाएगा ! अल्पसंख्यक खाएगा नरक जाएगा !

बीफ के सवाल पर जहाँ देश के अन्दर पीट-पीटकर लोगों को मार डाला जा रहा है या पशुधन के व्यापारियों की पिटाई करके जान ले ली जा रही हो। वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख पदाधिकारी श्री मनमोहन वैद्य ने स्वीकार किया है कि संघ के लोग बीफ खाकर भी उसमें रह सकते हैं। टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार संघ के 3000 लोग बीफ का आनंद लेते हैं। संघ के लोग हिन्दी भाषी प्रदेश में बीफ के सवाल को लेकर समाज में कटुता पैदा करते हैं वहीं स्वयं उसका सेवन करने से परहेज नहीं करते हैं यह उनके दोहरे चरित्र को दर्शाता है। मुख्य सवाल यह है कि इनके दोहरे चरित्र के कारण देश के अन्दर निवास करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भयभीत होते हैं। दूसरी तरफ यह लोग भी बीफ के सवाल ऊपर तमाम सारी पूर्वाग्रह भरी बातें कर धार्मिक उन्माद पैदा करते हैं।
    मनमोहन वैद्य के बीफ खाने की बात स्वीकार करने के बाद भी संघ के लोग उन्माद फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। ईमानदारी की बात तो यह है कि नागपुर मुख्यालय को बीफ के सवाल के ऊपर अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए तथा गौरक्षा समिति से लेकर तमाम सारी सेनायें उन्होंने बना रखी है उसको भंग करें। अन्यथा उनकी दोगली राजनीति के कारण देश के एकता और अखण्डता विविधता को गम्भीर खतरा पैदा हो रहा है।
-रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

समय है अब भी सुधार कर लो !

राहुल गांधी ने आरएसएस की तुलना बैन किए जा चुके मुस्लिम संगठन सिमी से की। देश के प्रधानमंत्री कांग्रेस पार्टी के ओर से दस वर्ष तक डॉ मनमोहन सिंह रहे हैं.तब यह बात क्यों नहीं समझ में आई.
यह बात अब राहुल गाँधी की समझ में आई है कि आरएसएस की गतिविधियाँ सिमी के बराबर हैं. जो पूरी तरह से सत्य नहीं है वास्तव में गाँधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाना और माफीनामे के बाद सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करने की आजादी देना कांग्रेस की बड़ी भूल थी. सांस्कृतिक सगठन के रूप में उसने बहुसंख्यक समाज में अल्पसंख्यक मुसलमानों के खिलाफ एक विषाक्त वातावरण तैयार किया जिसका असर मध्यम वर्गीय कुछ युवाओं पर ज्यादा पड़ा. क्या कांग्रेस को आर एस एस के सांस्कृतिक मुखौटे अतिरिक्त राजनीतिक मुखौटा जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी नहीं दिखाई दी. कांग्रेस नेताओं की समझ हिन्दू व हिंदुवत्व के अंतर को समझने में असमर्थ रही है. हिन्दू एक धर्म है और हिंदुवत्व एक राजनीतिक विचारधारा है, जो हिटलर, मुसोलिनी के आदर्शों पर चल कर इर्ष्या के आधार पर सृजित संगठन है. अल्पसंख्यक विरोध इसकी जीवन धारा है. मुसलमान ही नहीं, ईसाईयों के भी खिलाफ है, जब दोनों नहीं मिलते हैं तो बौद्धों के खिलाफ है. जब बौद्ध नहीं मिलते हैं, तो सिखों के खिलाफ है. इस तरह से यह संगठन इर्ष्या के आधार पर कार्य करता है. दुष्प्रचार व गलत तथ्यों का सहारा लेकर यह लोगों को भड़काने का काम करता है. कांग्रेस में जब तक धर्म निरपेक्ष ताकतों का बोलबाला रहा तब तक यह संगठन अपनी ताकत बटोरने के लिए तथा बढाने के लिए इतिहास को तोडना-मरोड़ना जारी रखा. आज भी यह काम तेजी के साथ जारी है. कांग्रेस संगठन पर इन्ही हिंदुवत्ववादियों का प्रभाव बाधा व इसके तमाम नेता नागपुरी भाषा बोलने लगे उस भाषा का परिणाम यह हुआ कि अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़ी जातियों के लोग इससे दूर हटने लगे. समाजवाद का नारा, सामंतवाद के नारे के रूप में बदलना शुरू हो गया और आर्थिक सुधारों के नाम पर मल्टी नेशनल कंपनियों का मुनाफा लाखों लाख करोड़ बढ़ता गया.  जल, जंगल, जमीन पूरे देश के नागरिकों के न होकर कुछ उद्योगपतियों की व्यक्तिगत संपत्ति हो गए.
राहुल गाँधी अगर आप में राजनीतिक समझ है तो अविलम्ब कांग्रेस संगठन को हिंदुवत्व वादी तबके से मुक्त कराओ और आरएसएस जैसे फ़ासिस्ट संगठनो के ऊपर प्रतिबन्ध लगाने की बात करो, सरकार आने पर इस कार्य को इमानदारी से पूरा करो तभी कांग्रेस को पुनर्जीवन मिल सकता है. समाजवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इस बात को अच्छी तरीके से समझने की जरूरत है. साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई को तेज करने की जरूरत है अन्यथा साम्राज्यवादी ताकतें भारत समेत पूरे एशिया को युद्ध का मैदान बना देंगी. कभी जाती के नाम पर, कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर.

सुमन 

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

आरक्षण और हिंदुत्व

सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने अब भारतीय कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है। भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है। भारत की केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में 27% आरक्षण दे रखा है और विभिन्न राज्य आरक्षणों में वृद्धि के लिए क़ानून बना सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता है।
.                          इस व्यवस्था के खिलाफ नागपुर मुख्यालय समय-समय पर समाप्त करने के लिए तरह-तरह के मुखौटे लगा कर आन्दोलन चलने का काम करता रहा है. विश्वनाथ प्रताप सिंह जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का काम पूरा कर दिया था. तब नागपुर मुख्यालय ने छात्रों नौजवानों से लेकर अडवानी की रथयात्रा निकलवा कर मंडल पर कमंडल की विजय प्राप्त करने की कोशिश की थी. संघ ने आखिर विश्वनाथ प्रताप सिंह की खिचड़ी सरकार को गिरा कर ही दम लिया था. हाँ यह बात जरूर सही है कि मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद उसको समाप्त नहीं कर पाए थे. इस बीच संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात उठा कर इस मुद्दे को पुन: जीवंत कर दिया मुख्य सवाल यह है कि आरक्षण के बाद जो अभिजात्य वर्ग आरक्षित समुदायों में पैदा हुआ उसका सीधा सम्बन्ध हिन्दुवत्व की राजनैतिक विचारधारा वाले संघ को फायदा हुआ संघ के राजनितिक मुखौटे भाजपा को दलितों के एक बड़े समुदाय का मत व समर्थन प्राप्त हुआ. गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने 15 वर्ष तक मुख्यमंत्री पद पर राज इसलिए भी किया कि दलितों, पिछड़ों व सवर्णों के जो आर्थिक टकराव थे उस आर्थिक टकराव को उन्होंने मुस्लिम विरोध में बदल दिया था. इस बार संसदीय चुनाव में मुस्लिम विरोध के नाम पर दलितों, पिछड़ों व सवर्णों का एक हिन्दुवत्व वादी बड़ा समूह तैयार हुआ व उसने हर-हर मोदी करते हुए शुद्ध नागपुरी विचारधारा को शासन सत्ता दिला दी.
                सत्ता प्राप्ति के बाद नागपुर को यह महसूस होने लगा कि हिन्दुवत्व की विचारधारा बहुसंख्यक आबादी को ग्राह हो गयी है तो आरक्षण की भी समीक्षा कर उसके आधार को आर्थिक कर दिया जाए जिससे दलितों, पिछड़ों, आदिवासी, जनजातियों को सैकड़ों वर्ष पूर्व सेवक की भूमिका में बदला जा सके इसीलिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की ओर से मिलने वाली स्कालरशिप की व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है. अगर इन तबकों को स्कालरशिप के नाम पर मिलने वाली आर्थिक मदद बंद हो जाये तो उच्च शिक्षा संस्थानों में इन समुदायों के छात्रों की संख्या स्वत: कम हो जाएगी.
       आज जब सरकारी नौकरियां समाप्त की जा रही हैं और एक विशाल प्राइवेट सेक्टर रोजगार का सृजन कर रहा है तो उसमें आरक्षण लागू करने की आवश्यकताएं महसूस की जा रही हैं और यह मांग समाज में उठनी प्रारंभ हो चुकी है ऐसे वक्त में सरकारी नौकरियों में आरक्षण बनाये रखने की बजाये उसके आधार को बदल देने की नागपुर की मनुस्मृति को लागू करने की पुन: कोशिश है.
जैसे-जैसे वंचित तबकों में खुशहाली आ रही है उतनी ही तेजी से नागपुर की विषाक्त विचारधारा के कारण मुस्लिम विरोध के नाम पर हिन्दुवत्व वादी विचारधारा बढ़ रही है. इसके लिए नागपुर मुख्यालय में बैठे हुए लोग इतिहास का नवीनीकरण कर रहे हैं. जिससे मुस्लिम विरोध के नाम पर इन तबकों में मत का प्रतिशत हिंदुवत्व के लिए बढ़ रहा है.
नागपुर में बैठे हुए लोग इतिहास के अर्धसत्यों को लेकर तरह-तरह की झूठी कहानियां गढ़ कर एक भ्रामक इतिहास भी तैयार कर रहे हैं. कर्नाटक में टीपू सुलतान के इतिहास का संप्रदायीकरण उसका विशेष उदहारण है. टीपू सुलतान ने अंग्रेजों को कई बार युद्ध में हराया. टीपू सुलतान के विरोध में अंग्रेजों के साथ मराठे, आयंकर ब्राह्मण, हैदराबाद रियासत के लोग थे जो अंग्रेजों के साथ मराठे व अयंकर ब्राहमण थे वह युद्ध में अगर मारे गए तो नागपुर मुख्यालय को इसको हिन्दू मुसलमान बना कर आज घडियाली आंसू रो रहा है. वह इतिहास को इस दृष्टि से नहीं देख रहा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ रहने वाले लोग मारे गए थे. नागपुर मुख्यालय की निष्ठां सदैव अंग्रेजों के साथ रही है. अंग्रेजों के साथ रहने वाले लोगों के युद्ध में मारे जाने के इतिहास को वह बदल रही है. 
आरक्षण भारत के इतिहास को बदलने की एक आवश्यकता है. सभी नागरिकों को एक सामान करने में आगे बढे हुए लोगों को कुछ संतोष करना पड़ेगा जब दुनिया में हम खड़े होते हैं तो हमारे यहाँ पेड़ की छाल उबाल कर पीने लोग या गोबर से गेंहू निकाल कर खाने वाले लोग मौजूद होते हैं वहीँ दूसरी तरफ एक तबका मंगल व चाँद पर मकान बनाने की तैयारी कर रहा है. इस अंतर को समाप्त करने के लिए आरक्षण का सहारा लेना ही पड़ेगा और नागपुर मुख्यालय यह बात समझने में असमर्थ है. अरक्षित तबकों को वोट के लिए साथ भी रखेंगे और गला भी काटेंगे. मुस्लिम या अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के खिलाफ लड़ाई में आगे रखेंगे लेकिन हिन्दू मानेगे भी नहीं. मदिर में प्रवेश निषेध लिखा मिलेगा.

सुमन 
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