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बुधवार, 10 अगस्त 2016

गुजरात में दलितः असमानता और हिंसा के शिकार

गत 11 जुलाई को गुजरात के ऊना शहर में ‘मानव भक्षकों’ व ज़बरिया वसूली करने वालों के गिरोह ने-जो स्वयं को गौरक्षक बता रहे थे-एक दलित परिवार के सात सदस्यों की क्रूरतापूर्वक पिटाई की। उन्हें मोटा समधियाला गांव में एक मरी हुई गाय की खाल उतारने के लिए लोहे की छड़ों, लाठियों और चाकू से मारा गया। उसके बाद उनके कपड़े उतारकर उन्हें सार्वजनिक रूप से मारते हुए थाने ले जाया गया। इस भयावह व दिल हिला देने वाली हिंसा से दलितों के प्रति गुजरात में व्याप्त पूर्वाग्रहों और घृणा का पता चलता है। इस बर्बर घटना पर उतनी ही तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दलित लेखक अमृतलाल मकवाना ने उन्हें मिला ‘जीवन श्रेष्ठ साहित्य कृति’ पुरस्कार लौटा दिया। गुजरात के दलित युवा सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अपना विरोध व्यक्त करने के लिए कई बसों को आग के हवाले कर दिया और सड़कों व राजमार्गों को जाम किया। बनासकांठा जिले के करीब एक हजार दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाने की इच्छा व्यक्त की। सुरेन्द्र नगर में दलितों ने मृत गायों को ठिकाने लगाने से इंकार कर दिया।
पुलिस का रवैया ढीलाढाला था। पुलिस आसानी से दलितों की सार्वजनिक रूप से पिटाई को रोक सकती थी। पुलिस ने एफआईआर कायम करने में बहुत देरी लगाई। इससे भी बुरी बात यह थी कि एफआईआर, पीड़ितों के खिलाफ ही दर्ज की गई-जैसा कि मोहम्मद अख़लाक के मामले में हुआ था। मानव भक्षकों के खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज की गई जब दलितों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और दलितों ने विरोध प्रदर्षन किए। पुलिस की लेतलाली सामने आने के बाद, ऊना थाने के पुलिस इंस्पेक्टर और एक असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया गया। घटना के नौ दिन बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल पीड़ितों से मिलने के लिए समय निकाल सकीं और वह भी तब, जब इस घटना से पूरा देश आहत हो चुका था और दलितों के विरोध प्रदर्षनों से कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ रही थी। उत्तरप्रदेश चुनाव में भाजपा को इस घटना का खामियाजा न भुगतना पड़े, यह भी आनंदी बेन की यात्रा का एक उद्देष्य था।
भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का दलितों के प्रति दृष्टिकोण जगजाहिर है। सन 2015 में फरीदाबाद में दलित बच्चों की हत्याओं के बारे मंे पूछे जाने पर केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने दलितों की तुलना कुत्तों से करते हुए कहा था, ‘‘अगर कोई एक कुत्ते को पत्थर मार दे तो क्या उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार है?’’ हाल में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दलितों पर हमले को ‘सामाजिक बुराई’ बताया। स्पष्टतः, वे दलितों पर अत्याचार को रोकने में राज्य की असफलता का बचाव कर रहे थे। राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि ‘‘गुजरात में कांग्रेस शासन के दौरान दलितों पर अत्याचार की घटनाओं की संख्या कहीं ज़्यादा थी। भाजपा के सत्ता में आने के बाद से इन घटनाओं में तेज़ी से कमी आई है।’’ आंकड़े राजनाथ सिंह के इस दावे से मेल नहीं खाते। मई 2015 के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में 19 प्रतिषत की वृद्धि हुई है।
इस संदर्भ में भाजपा के नेता केवल प्रतिकात्मक बातों और खोखले दावों से दलितों को संतुष्ट करना चाहते हैं। भाजपा के मुखिया अमित षाह ने कुुंभ में दलित साधुओं के साथ क्षिप्रा नदी में डुबकी लगाई। इस अवसर पर उन्होंने कहा ‘‘भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जो भारतीय संस्कृति को मज़बूत करने में विष्वास रखती है और यह मानती है कि पूरा विष्व एक परिवार है।’’ हम उनकी बातों पर कैसे भरोसा करें, जबकि उनके गृह राज्य गुजरात में छुआछूत की अमानवीय प्रथा का व्यापक प्रचलन है। गुजरात के दलित, भेदभाव और छुआछूत का दंष झेलने को मजबूर हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार,
98.4 प्रतिषत गांवों में अंतर्जातीय विवाहों पर प्रतिबंध है और ऐसे विवाह करने वाले लोगों के खिलाफ हिंसा हुई और उन्हें अपने गांव छोड़कर जाना पड़ा है। 98.1 प्रतिषत गांवों में किसी दलित व्यक्ति को गैर-दलितों के मोहल्लों में मकान किराए से नहीं दिया जाता है और 97.6 प्रतिषत गांवों में यदि दलित, गैर-दलितों के पानी के पात्रों या अन्य बर्तनों को छू लें तो इससे वे बर्तन अपवित्र माने जाते हैं, 97.2 प्रतिषत गांवों में किसी दलित को गैर-दलित क्षेत्र में कोई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित करने की इजाज़त नहीं है। ये सर्वेक्षण नवसर्जन संस्था ने गुजरात के 1,589 गांवों में किया था। क्या राज्य सरकार ने छुआछूत की इस क्रूर व अमानवीय प्रथा के खिलाफ कोई कार्यवाही की? उत्तर है, नहीं। दलितों को 77 गांवों में सामाजिक बहिष्कार के कारण अपने घर छोड़कर जाना पड़ा। इस मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने की और यह पाया कि इसके पीछे दलितों की शिकायतों का पुलिस द्वारा संज्ञान न लिया जाना, ऐसे मामलों में पुलिस द्वारा सही जांच और उपयुक्त कार्यवाही न की जाना और दलितों पर अत्याचार के प्रकरणों में दोषसिद्धी की दर अत्यंत कम होना है। राज्य ने इस मामले में उपयुक्त कार्यवाही करने की बजाए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों को गलत ठहरा दिया। 
भाजपा के दलितों के प्रति दृष्टिकोण और ऊना जैसी घटनाओं के पीछे, दरअसल, हिन्दुत्व की विचारधारा है। हिन्दुत्व की विचारधारा, ऊँचनीच की अवधारणा पर आधारित है और इसमें दलित, सामाजिक पदक्रम के सबसे निचले पायदान पर हैं। सामाजिक असमानता और ब्राह्मणों का प्रभुत्व, हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं में षामिल है। हिन्दुत्व की
विचारधारा, भाजपा की नीतियों का आधार है और यही कारण है कि ये नीतियां, दलितों को सांस्कृतिक, राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर करने वाली हैं। दलितों को कमज़ोर करने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं। इनमें से एक है राष्ट्रवाद के प्रतीकों का निर्माण। इन प्रतीकों को पूरे समाज पर लादने की कोषिष की जाती है। ये प्रतीक ऊँची जातियों के विषेषाधिकारों को स्वीकृति देते हैं और जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं। गाय, सरस्वती वंदना और योग, धार्मिकता और राष्ट्रवाद के प्रतीक बना दिए गए हैं। हिन्दुत्व की विचारधारा, उन परंपराओं और नियमों को मान्यता देती है जो मूलतः ऊँची जातियों के हैं और दलितों सहित अन्य समुदायों की परंपराओं और आचरण को निचला दर्जा देती है। स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए हर व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उच्च जातियों को स्वीकार्य परंपराओं और नियमों का पालन करे।
उदाहरणार्थ, हमेशा से दलितों को मृत मवेषियों को ठिकाने लगाने और उनके मांस को खाने के लिए मजबूर किया जाता रहा है। किसी मृत जानवर को छूना, ऊँची जातियों के सदस्यों को मंजूर नहीं था और यह काम केवल दलितों के लिए उचित माना जाता था। आज भी दलित मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम करते हैं।
गुजरात में निजी निवेश, अधोसंरचनात्मक विकास और खेती के निगमीकरण पर ज़ोर ने सांठगांठ पर
आधारित पूंजीवाद (क्रोनी कैपिटालिज्म) को बढ़ावा दिया जा रहा है। सार्वजनिक संसाधनों, जो सबाल्टर्न समुदायों की आजीविका के आधार हैं, को उनसे छीनकर अदानी व अंबानी जैसे उद्योग समूहों के हवाले किया जा रहा है। इससे दलित आदिवासी, मछुआरे आदि बेरोज़गार हो रहे हैं और आर्थिक असमानता बढ़ रही है। राज्य सरकार द्वारा भले ही कुछ भी दावे किए जा रहे हों, सच यह है कि गुजरात में 2005 से 2010 के बीच निर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोज़गार में वृद्धि की दर नकारात्मक रही है। इससे दलितों की असंगठित क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में असमानता में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत तेज़ है और दलित आदिवासी पहले से अधिक गरीब हुए हैं। यद्यपि अनुसूचित जाति उपयोजना के तहत हर राज्य को इस उपयोजना के लिए राज्य की अनुसूचित जातियों की आबादी के अनुपात में धनराषि आवंटित करनी चाहिए परंतु गुजरात सरकार ने पिछले दस वर्षों में एक बार भी इस उपयोजना के लिए राज्य के बजट का 7.09 प्रतिषत-जो कि गुजरात की आबादी में अनुसूचित जातियों का हिस्सा है-आवंटित नहीं किया। जुलाई 2015 की अपनी एक रपट में सरकार ने एक बहुत अजीब सा तर्क दिया, जो कि अनुसूचित जाति उपयोजना के दिषानिर्देषों का स्पष्ट उल्लंघन था। सरकार ने कहा कि ‘‘केवल अनुसूचित जातियों के लिए क्षेत्र-आधारित विकास की परियोजनाएं लागू करना बहुत कठिन है’’! मनरेगा-जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को रोज़गार उपलब्ध करवाने का एक महत्वपूर्ण उपकरण है-के लिए बजट आवंटन में लगातार कमी की जा रही है और जिन ज़िलों में यह योजना लागू है, उनकी संख्या में लगातार कमी की जा रही है। इससे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को बहुत नुकसान हुआ है। सन 2013-14 में मनरेगा के अंतर्गत 18 लाख अनुसूचित जाति व जनजाति के परिवारों को साल में 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध हुआ। सन 2014-15 में यह आंकड़ा 7 लाख रह गया।
अहमदाबाद के ह्यूमन डेव्लपमेंट रिसर्च सेंटर (एचडीआरसी) ने अपने नोटिस बोर्ड पर सफाईकर्मियों के रूप में कार्य करने के लिए आवेदन पत्र आमंत्रित करते हुए एक विज्ञापन लगाया। इसमें कहा गया था कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारांे को नियुक्ति में प्राथमिकता दी जाएगी। इस विज्ञापन से हिन्दुत्व संगठन भड़क उठे। राजपूत षौर्य फाउंडेषन और युवा षक्ति संगठन के कार्यकर्ताओं ने एचडीआरसी के कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ की। उन्होंने यह आरोप लगाया कि एचडीआरसी, समाज को विभाजित कर रही है और लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचा रही है। इस घटना से हिन्दुत्व संगठनों का दलितों के प्रति दृष्टिकोण ज़ाहिर होता है। उनका यह ख्याल है कि हाथ से मैला साफ करने और अन्य सफाई के कार्य केवल दलितों को ही करने चाहिए। यह विडंबनापूर्ण ही है कि जहां संयुक्त राष्ट्र संघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं, हाथ से मैला साफ करने की प्रथा के उन्मूलन की बात कर रही हैं वहीं गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सन 2007 में प्रकाषित अपनी पुस्तक ‘कर्मयोग’ में यह लिखा था कि वाल्मीकि समुदाय के सदस्य हाथ से मैला साफ करने का काम अपनी आजीविका कमाने के लिए नहीं वरन इसलिए करते हैं क्योंकि वह उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभव है। हम चकित हैं कि अगर हाथ से मैला साफ करने से व्यक्ति आध्यात्म की और प्रवृत्त होता है तो ऊँची जातियां इस मौके को क्यों खो रही हंै और क्यों सरकार सभी जातियों के लोगों को यह काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही?
जो दलित युवक भेदभाव के इस दुष्चक्र को तोड़ना चाहते हैं, वे बेहतर जिंदगी के लिए षिक्षा प्राप्त करने के मौके तलाष रहे हैं। परंतु उच्च षैक्षणिक संस्थानों में दलित विद्यार्थियों के साथ एबीव्हीपी जैसे दक्षिणपंथी विद्यार्थी संगठनों और प्रषासन द्वारा भेदभाव किया जाता है। और अगर वे इसका विरोध करते हैं तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता है जैसा कि अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल और रोहित वेमूला के मामलों से साफ है। इससे दलितों की आवाज़ और कमज़ोर हो रही है और दलित युवक अपने आप को असहाय अनुभव कर रहे हैं। असहमति की आवाज़ों को देषद्रोह बताकर क्रूरतापूर्वक कुचल दिया जाता है। इसी तरह, योग-जिसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया गया है-से भी दलित स्वयं को नहीं जोड़ पा रहे हैं। इसके कारण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक हैं। पहले से भूख और गरीबी से पीड़ित दलित, जो दिनभर कमरतोड़ षारीरिक श्रम करते हैं, में योग करने की ऊर्जा कहां से बची रहेगी। इसी तरह, दलितों से सरस्वती वंदना करने की अपेक्षा करना एक क्रूर मज़ाक है क्योंकि दलितों को कभी षिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं दिया गया। आज भी गुजरात के स्कूलों में दलित बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। इंडिया एक्सक्लूज़न रिपोर्ट 2014 के अनुसार राज्य के 32.4 प्रतिषत दलित बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।
हिन्दू के रूप में स्वयं को स्वीकार्य बनाने के लिए और हिंदुत्व संगठनों से जुड़ने के लिए दलितों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मुसलमानों के खिलाफ हिंदुत्ववादी युद्ध में षिरकत करें। उनके मन में यह भ्रम पैदा किया जाता है कि वे हिन्दू समुदाय का हिस्सा बन गए हैं और उन्हें मुसलमानों से श्रेष्ठ बताकर, हिन्दू राष्ट्रवादी समूह मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करने के लिए दलितों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मुसलमानों को राष्ट्रविरोधी और सभी हिन्दुओं का षत्रु बताकर दलितों को उनके खिलाफ भड़काया जा रहा है। दलित सड़कों पर हिंसा करते हैं और बाद में आपराधिक न्याय प्रणाली की गिरफ्त में आसानी से आ जाते हैं।
दलितों को स्वयं को राष्ट्रवादी साबित करने के लिए सभी हिन्दुत्ववादी नियमों का पालन व उसके प्रतीकों का सम्मान करना होता है ताकि उन्हें सत्ता और अवसरों के वे चंद टुकड़े मिल सकें, जिन्हें ऊँची जातियां उनकी और फेकेंगी। जहां तक चुनावों का सवाल है दलितों के सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है कि वे भाजपा का साथ दें क्योंकि भाजपा उन्हें कुछ हद तक सुरक्षा उपलब्ध करवा सकती है। अगर दलित इन हिन्दुत्ववादियों की अपेक्षा के अनुरूप आचरण नहीं करते तो उनके साथ वही होता है जो ऊना में हुआ। दलितों के साथ हिंसा कर उन्हें दबाने का काम धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह करते हैं जिन्हें राज्य का संरक्षण प्राप्त होता है। इस कारण वे बिना किसी डर के खुलेआम हिंसा करते रहते हैं।
सन 2000 की षुरूआत में गुजरात की विभिन्न अदालतों में अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत 13,293 प्रकरण लंबित थे। साल के अंत तक वे सभी प्रकरण लंबित बने हुए थे अर्थात एक भी प्रकरण में निर्णय नहीं हुआ था। इस साल अप्रैल तक प्रदेष में दलितों पर अत्याचार के 409 मामले दर्ज किए गए। राज्य अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, गुजरात में सन 2001 से लेकर अब तक दलितों पर हमले के 14,500 मामले दर्ज किए गए अर्थात औसतन 1,000 प्रति वर्ष या तीन प्रतिदिन। दलित अधिकार कार्यकर्ता कहते हैं कि दलितों पर अत्याचार करने वाले इसलिए बेखौफ रहते हैं क्योंकि इस तरह के प्रकरणों में दोषसिद्धि की दर मात्र तीन से पांच प्रतिषत के बीच है।
क्या राज्य तंत्र द्वारा दलितों पर अत्याचारों को रोकने और दोषियों को सज़ा दिलवाने की ज़िम्मेदारी पूरी न करना स्वीकार्य हो सकता है? दलित समुदाय की बेहतरी और उसकी सुरक्षा की ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया जाना हिन्दुत्व के असली चरित्र को दर्षाता है और भाजपा के इरादों का पर्दाफाष करता है। हिन्दुत्ववादी, दलितों का अपनी घृणा की राजनीति  में इस्तेमाल तो करना चाहते हैं परंतु उन्हें बराबरी का दर्जा देना नहीं चाहते। दलितों को अपने निचले दर्जे को चुपचाप स्वीकार करना होगा ताकि स्थापित सामाजिक पदक्रम को कोई खतरा न हो। दलितों के साथ यदि भेदभाव होता है और उनके साथ हिंसा की जाती है तो इसके लिए जातिप्रथा ज़िम्मेदार नहीं है। यह तो एक ‘सामाजिक बुराई’ है।
भारत को आज एक षक्तिषाली दलित आंदोलन की आवष्यकता है। यह सही है कि धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों के समूह और सरकार व षासक दल का रवैया दलितों के सषक्तिकरण की राह में बड़ी बाधा है परंतु नागरिक समाज संगठनों को आगे बढ़कर दलितों को एक करना होगा और उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ना सिखाना होगा। अछूत प्रथा के खिलाफ लगातार अभियान चलाए जाने की ज़रूरत है और विकास का एक नया माॅडल बनाने की भी।
-नेहा दाभाड़े

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

गुजरात: हिंदुवत्व का किला चरमराया

गुजरात में हुए नगर महापालिका से लेकर तालुका पंचायत तक चुनाव नतीजे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में अच्छे नहीं रहे. हद तो यहाँ तक हो गयी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह जनपद मेहसाणा में भी भारतीय जनता पार्टी बुरी तरह पराजित हुई. अच्छे दिन के नारे की पोल खुलनी शुरू हुई वहीँ नागपुर मुख्यालय के दिवास्वप्न हिन्दू राष्ट्र का भी सपना खंडित होता नजर आ रहा है. शुद्ध ब्राहमणत्व की विचारधारा जनता को स्वीकार नहीं है लेकिन घायल नागिन की तरह यह लोग विष वमन करना बंद नहीं किये हैं लेकिन इसका असर संसद की कार्यप्रणाली पर पड़ा है और सत्तारूढ़ दल ने अपना मुखौटा सौम्य व मानवीय लगाकर शासन चलाने की कोशिश कर रहा है और धीरे-धीरे अपने विषाक्त विचारधारा दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों में फैला रहा है और उन्हें मुस्लिम विरोध के नाम पर हिन्दुवत्व की टोपी पहना कर अपना मजबूत आधार तैयार कर रहा है. इतिहास के अर्धसत्यों के आधार पर वह भारतीय जनमानस में घृणा व द्वेष फैला कर एक विशेष प्रकार की अंधभक्ति नवजवानों में तैयार कर रहा है. यह अंधभक्त तर्क, बुद्धि व विवेक खो कर सिर्फ मुस्लिम विरोध के आधार पर एक उग्र तालिबानी हिंदुवत्व बम के रूप में तब्दील हो रहे हैं. जिसका उदहारण मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट से लेकर अभी हाल में कुरनूल जिला आन्ध्र प्रदेश में 29 नवम्बर को भारी मात्रा  में विस्फोटक संघियो के पास  से  बरामद हुए है ऐथवा श्रीनिवास व बोया सुरेश  को पुलिस ने गिरफ्तार किया है इन लोगो के पास से  2,680 डिकोंनेटर, 1,200 गिलेटीन राड, 180 बूस्टर , 1,200 मीटरफ्यूज वायर  व  1.50टोंस अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ  है की घटना से प्रमाणित होता है.
गुजरात की जनता ने यह कर दिखाया है कि ज्यादा दिन तक जनता को अर्धसत्यों के आधार पर गुमराह नहीं किया जा सकता है जिसका परिणाम यह रहा कि भाजपा ने गुजरात में सभी 6 महानगर पालिका पर अपना कब्जा जरूर बनाए रखा लेकिन वहीँ जिला पंचायत में उसे कांग्रेस के हाथों बड़ी पराजय झेलनी पड़ी। 31 जिला पंचायतों में से 21 पर कांग्रेस ने जीत हासिल  नगर पालिका पालिका में से उसने 42 पर जीत हासिल कर पायी जिला पंचायत और वहीं 4 पर अन्य का कब्जा रहा। भाजपा के खाते में केवल 6 जिला पंचायत गई। 230 तालुका पंचायतों में से 130 पर कांग्रेस जीती और भाजपा केवल 73 ही जीत पाई।
हिंदुवत्व का किला देश के मुनाफाखोर, जमाखोर जमातों तथा उद्योगपतियों के मुनाफे को लाखों-लाख गुना बढ़ा देता है उनके द्वारा किये जा रहे शोषण की तरफ जनता का ध्यान न रहे इसलिए तमाम सारे भावनात्मक मुद्दे संसद और विधान सभाओं से लेकर उद्योगपतियों द्वारा संचालित इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया में छाये रहते हैं. 
                 महंगाई बेरोजगारी, भुखमरी, कर्ज में डूबे किसानो की आत्महत्या या यूँ कहे की बहुसंख्यक आबादी की समस्याओं की चर्चा व उसका निराकरण नहीं हो पा रहा है. साम्राज्यवादी शक्तियां शासक वर्ग को बुरी तरह से जकडे हुए है. समाजवाद के नाम पर छद्म समाजवादियों का कब्ज़ा है वह भी साम्राज्यवादी शक्तियों की स्वेच्छा से गुलामी कर रही हैं. जरूरत इस बात की है कि साम्राज्यवादी शक्तियों को बुरी तरह से पराजित नहीं किया जाएगा तब तक हिंदुवत्व का किला जीर्णशीर्ण होने पर भी खड़ा रहेगा. जब तक यह किला खड़ा रहेगा तब तक निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है की देश की एकता और अखंडता खतरे में है और बहुसंख्यक आबादी की समस्याओं की समाधान नहीं हो सकता है. 
सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 26 सितंबर 2015

सवर्ण हिन्दुत्व की जातिवादी राजनीति और गुजरात में पटेल आरक्षण

सवर्ण उग्र हिंदुत्व के सत्ता में आने के पश्चात ही पिछले एक साल से देश में नाटकीय माहौल देखने को मिल रहा है। यह महज संयोग नहीं है कि जिस दिन जाति-जनगणना के आँकड़ों की माँग के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ‘बिहार बंद’ का आह्वान करते हैं उसी दिन सुबह तड़के ही पंजाब के गुरुदासपुर में आतंकी हमला हो जाता है। मीडिया के लिए सामाजिक न्याय से कहीं
अधिक महत्वपूर्ण उग्र हिंदुत्व की मुसलमान विरोधी भावना को कवरेज देना है इसलिए ‘बिहार बंद’ की उपेक्षा करके गुरुदासपुर आतंकी हमले और याकूब मेमन की फाँसी की खबर को पचा दिया गया। उन्हीं दिनों इस समय की भाजपा के मूल राज्य और जनपद, गुजरात के महेसाणा में पटेल जाति के युवकों ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में अपने लिए आरक्षण की माँग की। वे जुलाई माह के शुरुआती दिनों से ही अपने आंदोलन को आकार देने लगे थे। महेसाणा के विसनगर में पटेल जाति के इन युवकों का विरोध-प्रदर्शन उग्र हो गया और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प भी हो गई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की कई गाडि़यों में आग लगा दी। कुछ पत्रकार घायल हुए और पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ शांति-भंग का मुकदमा भी दर्ज किया। अब प्रश्न यह उठता है कि गुजरात में सुदृढ़ सामाजिक-आर्थिक स्थिति में होने के बावजूद पटेल या पाटीदार जाति के लोग आरक्षण क्यों माँग रहे हैं?
    पटेल या पाटीदारों को उत्तर भारत की कुर्मी जाति के समकक्ष रखा जाता है क्योंकि इनकी वास्तविक अस्मिता मेहनतकश किसानों की ही है। ध्यातव्य है कि उत्तर भारत के पटेलों को अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित किया गया है। यद्यपि इनमें सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक स्तर पर भिन्नता है। गुजरात के कुछ पटेलों के पास बड़े आर्थिक उत्पादन के स्रोतों पर अधिकार हैं। उनके पास बड़ी खेतिहर भूमि या जोत है। संभव है कि यह केवल कुछ पटेलों के पास ही हों और इनकी बहुत बड़ी संख्या में निर्धनता व्याप्त हो, लेकिन गुजरात में पटेलों की स्थिति देखकर तनिक भी अनुभव नहीं होता कि इन्हें किसी प्रकार के आरक्षण की आवश्यकता है। लेकिन यह भी चैंकाने वाला सत्य है कि केंद्र सरकार की सरकारी नौकरियों में गुजराती पटेलों का प्रतिनिधित्व लगभग शून्य है। गुजरात की आबादी लगभग 6 करोड़ है जिसका बीस प्रतिशत पटेल या पाटीदार हैं। गुजरात में पटेलों की दो उपजातियाँ पाई जाती हैं एक ‘लेवा’ और दूसरी ‘कड़वा’। दोनों में वर्चस्व की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता भी है किन्तु आरक्षण की माँग के मुद्दे पर दोनों में जबरदस्त एकता देखी जा रही है। इससे पहले पटेलों ने आरक्षण की माँग दो दशकों पहले कांग्रेस की सरकार में की थी। लेकिन तब भी इन्हें टाल दिया गया था। सच तो यह है कि भारत की सभी ओबीसी जातियों को आरक्षण के नाम पर छलावा ही मिला है। गुजरात के पटेलों का मामला दूसरा है। क्योंकि वे अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति से परेशान नहीं हैं बल्कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अपने पिछड़े होने के आधार पर आरक्षण की माँग कर रहे हैं। मूल रूप से काँग्रेसी चेतना और सरदार वल्लभ भाई पटेल के अनुयायी पटेलों को भाजपा ने जातिवादी कार्ड खेलकर लुभा लिया और गुजरात में अभूतपूर्व राजनैतिक सफलता प्राप्त की। पटेलों की धर्म-निरपेक्ष भावना को कट्टरपंथी हिन्दुत्व में परिवर्तित कर भाजपा उन पर शासन करती रही। अभी भी कर रही है और उनकी यही सफलता पिछले आम चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर भी देखी गई। एकाएक राज्य व्यापी ‘पाटीदार अनामत आंदोलन’ (पटेल आरक्षण आंदोलन) को देखकर गुजरात सरकार के हाथ-पाँव फूल गए। विडम्बना यह है कि सरकार में भी पटेलों का ही दबदबा है। गुजरात की मुख्यमंत्री और राज्य भाजपा अध्यक्ष रणछोड़ दास फाल्दू दोनों ही पटेल हैं। इसके अलावा गुजरात सरकार के सात राज्यमंत्री और विधानसभा के कुल 182 में से 44 विधायक पटेल हैं। आंदोलन को मिलती सफलता देखकर सरकार ने इसे दबाने की भी कोशिश की लेकिन असफल रही। ‘पाटीदार अनामत समिति’ के बैनर तले लाखों पटेल जुट गए और अपने-अपने क्षेत्र में आंदोलन को दिशा देने लगे। राजधानी गांधीनगर में भी पटेल प्रदर्शन कर चुके हैं। गुजरात के बड़े क्षेत्रों मसलन वड़ोदरा, सूरत, हिम्मत नगर, राजकोट और सौराष्ट्र में भी आंदोलन ने अपने पाँव पसार लिए हैं। आंदोलन कारियों में बड़ी भागीदारी युवाओं की हैं। आंदोलन का नेतृत्व ही इक्कीस वर्षीय युवा नेता हार्दिक पटेल कर रहे हैं। उन्हें डराने,
धमकाने का भी प्रयास किया गया लेकिन अब सबकुछ इसलिए व्यर्थ है क्योंकि आंदोलन गति पकड़ चुका है और गुजरात भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रहा है। आंदोलनकारियों का स्पष्ट संकल्प है कि वे 2017 तक अन्य पिछड़ा वर्ग में अपने आप को दर्ज कराके रहेंगे। इस पर स्वयं को आंदोलन का नेता घोषित करने वाले हार्दिक पटेल का कहना है कि वे अभी महात्मा गांधी और सरदार पटेल के मार्ग पर चल रहे हैं, किन्तु आवश्यकता पड़ी तो भगत सिंह का रास्ता भी अख्तियार करेंगे।
    धर्म और जाति की राजनीति करने का भाजपा का इतिहास रहा है। मण्डल कमीशन का प्रभाव कम करने के लिए भाजपा ने अपने आका, पुरुष सवर्ण हिंदुओं के कट्टरपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सहायता से बाबरी विध्वंस कराने में सफल रही थी और उस समय धार्मिक भावनाओं को भड़का कर जनता का ध्यान भटकाने की उसकी मंशा पूरी हुई थी। 2014 के आम चुनावों में भी कट्टरपंथी सवर्ण हिन्दुत्व का फेमस चेहरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं को ओबीसी और ‘नीच जात’ का बताते नहीं थके। बिहार में भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मोदी को ओबीसी प्रचारित करते फिर रहे हैं। लेकिन जाति जनगणना के आँकड़ों को सार्वजनिक करने में इनकी कोई रुचि नहीं दिखाई पड़ी। ओबीसी की अनुमानित साठ फीसदी आबादी का कुछ ज्ञान इन्हें अवश्य है। इसीलिए ये बार-बार ओबीसी का पत्ता फेंकते रहते हैं। बहर हाल पटेल आरक्षण आंदोलन भाजपा की जड़ों में मट्ठा डाल सकता है क्योंकि आंदोलन भी उसी स्थान से उठा है जहाँ वर्तमान भाजपा की जड़ें स्थित हैं। गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीनों ही गुजरात के महेसाणा जिले के हैं और पटेल आरक्षण आंदोलन भी महेसाणा से उठा जो अब पूरे गुजरात में व्यापक हो गया है। फौरी तौर पर पटेल आरक्षण आंदोलन को गुजरात-भाजपा को तोड़ने की कांग्रेस द्वारा की गई साजिश बताया गया लेकिन नाटकीयता तब और बढ़ गयी जब राज्य सरकार के मंत्री नानूभाई वणानी के पुत्र विपुल को भी आंदोलन में शामिल पाया गया। नानूभाई के पुत्र ने अपनी फेसबुक वाल पर ‘पाटीदार अनामत आंदोलन’ का बैनर पोस्ट किया था और मीडिया द्वारा पूछने पर स्वीकार किया कि वह इस आंदोलन में शामिल हैं। विपुल ने मीडिया से यह भी कहा कि वह पटेल जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित करने का पूरी तरह से समर्थन करता है। क्षतिपूर्ति के नाम पर पाटीदारों की दोनों उपजातियों, लेवा और कड़वा की धार्मिक गद्दियों, ‘माँ उमिया माताजी संस्थान’ और ‘श्री खोढाल धाम’ के मठाधीशों से मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल और गुजरात के भाजपा अध्यक्ष ने भेंट की और आंदोलन पर अपनी चिंता जाहिर की। उन्हें पता है कि पाटीदारों की दोनों उपजातियों को अपने धार्मिक स्थलों पर असीम श्रद्धा है और उनकी राजनैतिक, सामाजिक दिशा को वही तय करते हैं। अंततः थक-हारकर गुजरात सरकार ने पटेल आरक्षण आंदोलन की समस्या को सुलझाने के लिए सात सदस्यीय एक पैनल बनाया है। इसकी अध्यक्षता गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री और सरकार के प्रवक्ता नितिन पटेल करेंगे।
    गुजरात में पटेलों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है। भाजपा ने जातिवादी राजनीति के बल पर ही पटेलों की बहुसंख्यक जनता को सत्ता पाने के लिए इस्तेमाल किया। ‘पटेल आरक्षण आन्दोलन’ के खड़े होने से कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या भाजपा ने कुछ पटेलों को सत्ता में शामिल कर पटेलों की बड़ी संख्या को हाशिए पर कर दिया है? क्या पटेल अपनी बहुसंख्यक राजनैतिक शक्ति को पहचान गए हैं? यदि राज्य में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित कर दिया गया (जिसकी संभावनाएँ बन सकती हैं क्योंकि ऐसा न करने पर गुजरात की भाजपा सरकार को खतरा उत्पन्न हो सकता है) तो वे केंद्र में भी आरक्षण माँग सकते हैं। अगर वे केंद्र में भी आरक्षण की माँग करते हैं तो अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षित अन्य जातियाँ इसका विरोध नहीं करेंगी क्या? जाति जनगणना के आँकड़ों को लेकर पिछड़े वर्ग के नेताओं और जनता में पहले से ही आक्रोश व्याप्त है। दूसरी तरफ सवर्ण सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग की जतियों के बढ़ते वर्चस्व से अलग हलकान हैं। धीरे-धीरे ही सही लेकिन पिछड़े वर्ग की जातियाँ शैक्षिक और सार्वजनिक क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। उत्तर-प्रदेश में पिछले दिनों ऐसे कई अवसर आए हैं जब सामान्य और पिछड़े वर्ग के अभ्यर्थियों में संघर्ष हुए हैं। हालात ये हैं कि अन्य पिछड़े वर्ग में सामान्य श्रेणी से अधिक प्रतिस्पर्धा है क्योंकि उन्हें आबादी के अनुपात में आरक्षण नहीं दिया गया है। इसलिए सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रावधानों को दृष्टि में रखकर सरकार को जाति जनगणना के आँकड़ें जारी करने चाहिए और ओबीसी को उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण देना चाहिए। हर जाति को ओबीसी में लाकर जोड़ देना भी सही नीति नहीं है। यदि सरकार गुजरात के पटेलों को आरक्षण देना चाहती है (जो अनुचित नहीं है) तो वह उसी अनुपात में ओबीसी की आरक्षण सीमा भी बढ़ाएँ।
 -संतोष अर्श 
मोबाइल: 09919988123
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के सितम्बर 2015  अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण समाप्त करने का नया जादू

गुजरात में नागपुर की प्रयोगशाला है, उस प्रयोगशाला में पहले व्यापक पैमाने पर लूटपाट व नरसंहार किया गया था. अब उसी प्रयोगशाला में दो-तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद पिछड़ों व दलितों के आरक्षण को समाप्त करने के लिए नया प्रयोग शुरू हुआ है. गुजरात की रैली में जानबूझ कर पुलिस लाठीचार्ज व उसके बाद भड़काई गयी हिंसा ने अरबों रुपये की परिसंपत्तियों को नष्ट कर दिया तथा हिंसा करने का जो प्रयोग संघी प्रयोग शाला मुसलमानों के खिलाफ करती आ रही थी, वह अपनी ताकत को पुन: दिखाने के लिए अमादा थी और दिखाया और जिस तरीके से गुजरात पुलिस ने लोगों के घरों में घुसकर महिलाओं, बच्चों, पुरुषों को पीटा तथा संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है यही काम पूर्व में मुसलमानों के खिलाफ गुजरात पुलिस ने किया था. गुजरात पुलिस का चरित्र संघ की प्रयोगशाला से निर्मित विचारों से ओत-प्रोत होने के कारण उसने जनता को जगह-जगह मारा पीटा व गोलियां चलाई. इस सब हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच संघ आरक्षण को समाप्त करने का कार्य करना चाहती है. अगर पाटीदार जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो गुजरात में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा. अगर नहीं हो पाती है तो जैसा हार्दिक पटेल ने कहा है कि पटेल-पाटीदार को आरक्षण नहीं तो किसी को आरक्षण नहीं होना चाहिए.
संघी हिन्दुवत्व से प्रभावित सवर्ण जाति के कुछ तत्व बराबर आरक्षण की मांग कर रहे हैं या आरक्षण समाप्त करने की. इस पूरे आन्दोलन को आरएसएस का वैचारिक समर्थन प्राप्त था, बगैर उसकी मदद के इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा करना हार्दिक पटेल के बस की बात नहीं थी.
                     संघ के ऊपर हमेशा एक अवसर को छोड़ कर महाराष्ट्र की चितपावन ब्राह्मण जाति का कब्ज़ा रहा है और आज भी प्रमुख पदाधिकारीगण चितपावन ब्राह्मण जाति के हैं वह किसी भी कीमत पर दलितों व पिछड़ों को आरक्षण नहीं देना चाहते हैं. जब देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की थी तो पूरे देश के अन्दर आरएसएस ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया था और मंडल पर कमंडल लागू करने का कार्य किया था और जब आज कमंडल का ही शासन है तो वह पूरी तरह से देश को मनुस्मृति के दौर में देश को ले जाना चाहती है और उसमें सवर्ण जातियों का शासन हो और बाकी जातियां सेवक की भूमिका में हों ऐसा सामाजिक ढांचा तैयार करने के लिए नागपुर की प्रयोगशाला किसी भी कीमत पर बनाना चाहती हैं उसी का परिणाम है गुजरात में होने वाली हिंसा और पुलिस द्वारा की जा रही प्रति हिंसा, जिससे आरक्षण समाप्त करने की बात को आगे ले जाया जा सके. संघ की प्रयोगशाला का आरक्षण समाप्त करने का नया जादू कितना चल पाता है यह तो वक्त बताएगा.   

सुमन 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मोदी का नया अवतार

गुजरात, प्रधानमंत्री मोदी की वजह से आजकल चर्चित रहता है. पहले आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सफल संघर्ष चलाने वाले महानायक मोहन दास करमचंद गाँधी के कारण चर्चित रहा है आजादी के बाद नेहरु मंत्रीमंडल के उप-प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों के कारण चर्चा में रहा है. मोदी जब मुख्यमंत्री थे, मुसलमानों के नरसंहार के समय उनके मूक दर्शक होने के कारण गुजरात चर्चित रहा है. मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और महात्मा गाँधी को किसी भी रूप में न मानने के लिए चर्चित संघ रहा है और गाँधी की हत्या में भी संघ का नाम आया और सरदार पटेल ने संघ के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो बाद में माफीनामे के बाद उसको सांस्कृतिक गतिविधियाँ करने की छूट मिली थी. आज मोदी गुजरात में चल रहे आन्दोलन को शांति करने के लिए जो अपील की है वह महात्मा गाँधी की फोटो व सरदार पटेल की फोटो के साथ की है. यह उनका नया अवतार माना जाए या राजनीति में सत्ता के शिखर के ऊपर बने रहने के लिए विचारों की तिलांजलि माना जाए. यह नया मुखौटा प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए मजबूरी है या जरूरी है.
ज्ञातव्य है कि गुजरात में रिजर्वेशन की मांग कर रही पटेल-पाटीदार कम्युनिटी का आंदोलन हिंसक हो जाने के बाद राज्य के बड़े शहरों में तनाव है। अहमदाबाद और सूरत में असर सबसे ज्यादा है। हालात काबू करने के लिए गांधीनगर से आर्मी की एक टुकड़ी अहमदाबाद बुलवाई गई। इससे पहले कुछ लोगों ने पटरियां उखाड़कर कोयले से लदी एक मालगाड़ी में आग लगाने की भी कोशिश की। वहीं, मंगलवार रात से अब तक हुई हिंसा की वजह से उत्तरी गुजरात के पालनपुर में दो लोगों की मौत हो गई। इस तरह हिंसा के चलते अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, केंद्र ने पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियां  भेजी हैं।
गुजरात में चल रहे मुसलमानों के नरसंहार के समय न महात्मा गाँधी की बात आई थी और न ही सरदार पटेल ही याद आये थे. आज यह अपील अद्भुत अपील है - महात्मा गांधी और सरदार पटेल की तस्वीरों के साथ गुजरात की जनता को टीवी पर दो मिनट छह सेकेंड के इस संबोधन में मोदी ने कहा, 'मेरी सभी भाइयों और बहनों से विनती है कि उन्हें हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। इस समय हमारा एक ही मंत्र होना चाहिए, शांति।'
 'हर समस्या का समाधान बातचीत द्वारा निकाला जा सकता है। लोकतंत्र की मर्यादा का पालन हम सबको करना चाहिए। मैं एक बार फिर गुजरात के सभी भाइयों और बहनों को शांति रखने का आग्रह करता हूं। हिंसा के मार्ग पर चलकर कभी कुछ नही मिलता। हम सब साथ मिलकर बातचीत के जरिए समस्या का समाधान करें।'
यह अपील जब गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हो रही थी उस समय अगर आई होती तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी का कद जनता के दिमाग में बढ़ गया होता लेकिन आज जब उनका स्वयं का वोट बैंक हिंसा के ऊपर उतर आया है तब वह शांति का पाठ पढ़ाकर गौतम बुद्ध का सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं और जब अल्पसंख्यकों का नरसंहार चल रहा था तब वह हिटलर की यहूदी विरोधी नीति का अनुसरण कर रहे थे. शायद राजनीति में सब कुछ जायज है. 

सुमन 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

निर्दोषों को न मिले सजा:वसंत.रजब का स्मारक

गुजरात हिंसा ;2002; की भयावहता को शब्दों में बयां करना मुश्किल है। गोधरा में ट्रेन में लगी आग में 58 निर्दोष व्यक्तियों को जिंदा जला दिए जाने की त्रासद घटना के बहाने, बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काई गयी,जिसमें 1,000 से अधिक लोग मारे गए। इन दंगों के बाद मुझे कई बार गुजरात जाने का अवसर मिला और अपनी इन्हीं यात्राओं के दौरान, मैंने उन दो महान नवयुवकों के बारे में जाना, जिन्होंने अहमदाबाद में जुलाई ,1946 में हुए दंगों के दौरान,लोगों को बचाने के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। ये दो नवयुवक थे  वसंतराव गिहेस्ते और रजब अली लखानी। दोनों नजदीकी मित्र और कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्ता थे। मासूमों का खून बहते देख वे सड़कों पर उतर आए। वसंत राव ने मुसलमानों को बचाने का प्रयास किया और रजब अली ने हिन्दुओं को। दोनों को उन्मादी भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया।
उन दोनों की स्मृति में गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक जुलाई को सांप्रदायिक सद्भाव दिवस मनाना शुरू कर दिया। गुजरात सरकार ने इसे मान्यता देते हुए, दोनों के एक संयुक्त स्मारक का निर्माण करवाया। स्मारक के अनावरण के मौके पर आयोजित कार्यक्रम की अखबारों में छपी खबरों से मुझे पता चला कि वहां वसंत राव के परिजन तो मौजूद थे परन्तु रजब अली के रिश्तेदारों ने कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया।   
सन 1946 के बाद, देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई। दंगों ने और बड़ा और भयावह स्वरुप ले लिया। रजब अली के परिजनों को बाद में हुए दंगों में चुन.चुन कर निशाना बनाया गया। यहाँ तक कि वे रजब अली से अपना रिश्ता छुपाने लगे। जब इससे भी काम नहीं चला, तो उनमें से कुछ ने हिन्दू नाम रख लिए और कुछ ने हिन्दू धर्म अपना लिया और कनाडा व अमरीका में बस गए! धार्मिक सद्भाव के प्रबल पक्षधर, रजब अली ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उच्च मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के कारण, उनके ही परिजन विघटनकारी तत्वों के निशाने पर आ जायेगें। यह दुखद घटनाक्रम यह भी बताता है कि भारत में हिन्दू.मुस्लिम हिंसा के चलते,मुसलमान स्वयं को कितना असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होने वालों में मुसलमानों का प्रतिशत, आबादी में उनके प्रतिशत से कई गुना ज्यादा है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 1991 में जारी आकड़ों के अनुसार,दंगों के शिकार होने वालों में मुसलमानों का प्रतिशत 80 था जबकि उस समय वे कुल आबादी का केवल 12 प्रतिशत थे।
गुजरात हिंसा के बाद, बड़ी संख्या में हिन्दू व मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ताओं और दोनों समुदायों के प्रमुख व्यक्तियों ने शांति की पुनर्स्थापना के लिए काम किया। नई सरकार के आने के बाद एक वर्ष में ही सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अंतर्सामुदायिक रिश्तों में तनाव और कटुता घुल गई है और शांति के वाहक रजब अली के रिश्तेदारों पर जो गुजरा, वह इस दुखद स्थिति को रेखांकित करता है।
सांप्रदायिक हिंसा, धर्म के नाम पर हिंसा कैंसर की तरह हमारे समाज में फैल गई है। इसकी शुरूआत अंग्रेज साम्राज्यवादी शासकों की  'बांटों और राज करो' की नीति से हुई थी। उन्होंने इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण प्रस्तुत किया। शासक के धर्म को उसकी नीतियों के निर्धारक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस तथ्य को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया कि सभी शासकों का एक ही धर्म होता है.सत्ता और संपत्ति पाना। उनकी धार्मिक पहचान गौण होती है। इतिहास के इसी सांप्रदायिक संस्करण का फिरकापरस्त संगठनों ने दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। ये संगठन आजादी के आंदोलन से दूर रहे। हिंसक सांप्रदायिक झड़पें शुरू हो गईं और आम लोगों के दिमागों में यह बिठा दिया गया कि दूसरे धर्म के लोग उनके शत्रु हैं। सांप्रदायिक राजनीति के खिलाडि़यों ने कई तरह के मिथकों और पूर्वाग्रहों को हवा दी। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की विभिन्न आयोगों द्वारा समय.समय पर की गई जांच की रपटों और येल विश्वविद्यालय के हाल के अध्ययन से पता चलता है कि जिन इलाकों में हिंसा होती है, वहां हिंसा भड़काने वाले सांप्रदायिक संगठन को चुनाव में फायदा होता है। यही हम भारत में होता देख रहे हैं। हिंसा की सीढ़ी पर चढ़कर सांप्रदायिक संगठन सत्ता तक पहुंचने लगे हैं।
बढ़ती हुई हिंसा के प्रकाश में, कई नेताओं ने शांति और सद्भाव के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद की। गांधीजी और उनके नज़दीकी नेताओं ने सद्भाव और हिंदू.मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास किए। हिंदू.मुस्लिम एकता, गांधीजी की राजनीति का केंद्रीय तत्व था। इस सब के बावजूद, सांप्रदायिक हिंसा बढ़ती गई और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक लोगों कोए निर्दोषों की जान बचाने के प्रयास में अपनी जान खोनी पड़ी। आज हम देख रहे हैं कि इस हिंसा का स्वरूप परिवर्तित हो गया है। बड़े, खूनी दंगों का स्थान अल्पसंख्यकों को डराने.धमकाने के कई तरीकों ने ले लिया है। मंदिर मस्जिद, चर्च, गौमांस भक्षण आदि जैसे मुद्दों को लेकर अल्पसंख्यकों को डराने.धमकाने के प्रयास जारी हैं। सांप्रदायिक ताकतों का मुख्य लक्ष्य विभिन्न समुदायों को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना है।
अगर गांधी इस समय होते तो वे क्या करते? शांति की स्थापना के लिए कई प्रयोग किए जा रहे हैं। इनमें मोहल्ला कमेटियां, शांति सेनाए अंतर्धार्मिक संवाद, धार्मिक त्योहारों को विभिन्न धर्मावलंबियों द्वारा एक साथ मिलकर मनाना, कबीर उत्सवए सौहार्द को बढ़ावा देने वाली फिल्में और धार्मिक एकता की आवश्यकता के प्रति लोगों को जागृत करने के अभियान शामिल हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह भी कोशिश है कि सांप्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों को न्याय मिल सके।
विभिन्न समुदायों का अपने.अपने मोहल्लों में सिमटना कैसे रोका जाए? दूसरे समुदायों के बारे में नकारात्मक सोच से कैसे लड़ा जाए ? ये आज की बड़ी चुनौतियां हैं। इस तरह के प्रयास किए जाना इसलिए जरूरी है ताकि रजब अली के परिजनों की तरह, किसी अन्य को अपनी धार्मिक पहचान न तो छुपाना पड़े और ना ही बदलना।
-राम पुनियानी

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

किसका विकास ?



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपनी आमसभाओं आदि में कहते हैं कि वे सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनके कहने का अर्थ शायद यह होता है कि वे सभी भारतीयों के विकास के लिए काम करेंगे,चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों, चाहे उनकी संस्कृति कोई भी हो व वे देश के किसी भी इलाके में रहते हों। यह सोच सराहनीय है और इस दिशा में प्रयास करने वाले नेता को हम सभी का पूरा समर्थन मिलना चाहिए।
परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें तो दो प्रश्न हमारे मन में उभरेंगे। पहला यह कि क्या हमारे देश के पास इतने संसाधन हैं कि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास सुनिश्चित कर सकें?तथ्य यह है कि हमारे संसाधन अत्यंत सीमित हैं और चाहे हम कितने ही आकर्षक नारे क्यों न लगायें, ऐसा विकास असंभव है जिसका लाभ सभी भारतीयों तक पहुंचे। विकास पर परस्पर विरोधाभासी दावे होना अवश्यंभावी है। जो लोग संगठित हैं और जिनके पास सरकारी तंत्र को प्रभावित करने की ताकत और नौकरशाही तक पहुंच है, वे विकास के फल उन लोगों तक नहीं पहुंचने देंगे जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसलिये सभी का विकास या तो केवल एक पवित्र इरादे की घोषणा है या सहज विश्वासियों को बेवकूफ बनाने का हथियार।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में, यदि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तो क्या यह न्यायपूर्ण है?दुनिया के 100, बल्कि 50,सबसे रईस व्यक्तियों में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु यह भी सच है कि 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन से कम की आमदनी पर जीवनयापन करने वाले भारतीयों की संख्या 83.6 करोड़ है। लगभग 20 करोड़ भारतीय,हर रात भूखे सोते हैंए लगभग 21.2 करोड़ कुपोषित हैं और हर वर्ष लगभग 7,000 भारतीय भूख से मर जाते हैं। अगर हम इनमें उन लोगों को जोड़ लें जो कुपोषण.जनित बीमारियों से मरते हैं तो यह संख्या करीब 1 करोड़ हो जायेगी।
सबसे रईस 50 या 100 लोगों के क्लब में भारतीयों की संख्या के बढ़ने से कुछ भारतीय, विशेषकर शहरी मध्यम वर्गए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। वे भारत में बढ़ती असमानता की ओर देखना ही नहीं चाहते। वे इस तथ्य की ओर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाये रहते हैं कि भारतए मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है। शिक्षाए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचए शिशु व बाल मृत्यु दर आदि की दृष्टि से हम बहुत पिछड़े हुये हैं। शुतुरमुर्गी मुद्रा में रेत में सिर गड़ाये हुये शहरी मध्यमवर्ग के भारतीय, ऐसा कुछ भी देखना.समझना नहीं चाहते जो गौरव के उनके भाव को चोट पहुंचाए। जब प्रधानमंत्री मोदी सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तब तकनीकी रूप से वे गरीबों के विकास की बात भी करते हैं। परंतु चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिये प्रश्न यह उठता है कि सभी भारतीयों का विकास करने की उनकी रणनीति क्या है ?सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? करदाताओं के पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है ?
एक रणनीति तो यह हो सकती है कि देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जाये। इसके लिये संबंधित क्षेत्र के सभी जातियों व समुदायों के लोगों के श्रम का इस्तेमाल हो। ऐसा करने से वहां के निवासियों को विकास का लाभ तो मिलेगा हीए उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा। इससे उन लोगों को नये अवसर मिलेंगेए जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे भूखों और कुपोषितों के हाथों में कुछ पैसा आयेगा। इस आमदनी से वे जो सामान खरीदेंगे उससे उद्योगों को अपरोक्ष रूप से लाभ होगा। परंतु जब प्रधानमंत्री सब के विकास की बात करते हैं तब उनके दिमाग में स्पष्टतः यह रणनीति नहीं होती।
दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि करदाताओं के पैसे और देश के संसाधनों ;जमीनए पानीए जंगल, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनद्ध का इस्तेमाल कर भारी.भरकम उद्योग खड़े किए जाएं, जिनसे केवल कुछ लोगों को लाभ हो। इस रणनीति के पैरोकार हमें बताते हैं कि गरीब.मजदूर, किसान,छोटे व्यवसायी व कारीगर . उन्हें उपलब्ध करा,गए अवसरों का उचित इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और वे उतनी तेजी से विकास की राह पर देश को आगे नहीं ले जा पाएंगे जितनी तेजी से वे लोग ऐसा कर सकेंगे जिनके पास ढ़ेर सारी पूंजी है। जब विकास तेजी से होगा तब रोजगार के अवसर बढेंगे और इससे अपरोक्ष रूप से गरीबों को फायदा होगा। विदेशी निवेशक,भारत को भारी मुनाफा कमाने वाली जगह के तौर पर देख रहे हैं। परंतु वे श्रमिकों पर कम से कम पैसा खर्च करना चाहते हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों,जिनमें जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक शामिल हैं, का भरपूर दोहन करना चाहते हैं। मुनाफा बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि श्रम पर कम से कम खर्च किया जाए। इसका एक तरीका तो यह है कि इस तरह की आधुनिक, मंहगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे उद्योगों में कम से कम श्रमिकों की जरूरत पड़े। इस तरह का विकास, रोजगार नहीं लाता। दूसरा तरीका है कि मजदूरी की दर कम से कम रखी जाए।'विकास' की इस दूसरी रणनीति के तहत, राज्य,पूंजीपतियों को मिट्टी के मोल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध करवाता है और करदाताओं के पैसे से 'विश्वस्तरीय'आधारभूत संरचना वाले कुछ द्वीप तैयार करता है, जिससे पूंजीपतियों को अच्छी सड़कें,फ्लाईओवर,बंदरगाहए बिजली आदि उपलब्ध कराई जा सके। राज्य, गरीबों से उनकी जमीनें जबरदस्ती छीनता है। किसानों को संगठित होकर अपनी जमीन की उचित कीमत पाने के लिए मोलभाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता। गरीबों से कहा जाता है कि वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे अनाज, खाद,कीटनाशक इत्यादि खुले बाजार से खरीदें क्योंकि अनुदान, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। परंतु निवेशकर्ताओं से यह नहीं कहा जाता कि वे अपने उद्योग लगाने के लिए बाजार मूल्य पर जमीन आदि खरीदें। इस तरह,इस दूसरी रणनीति से केवल और केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके पास अरबों रूपये हैं। राज्य उनका ताबेदार बन जाता है और उन्हें जमीन व देश के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने की खुली छूट देता है। इसके साथ ही, श्रम कानूनों में इस तरह के 'सुधार' किए जाते हैं जिससे ट्रेड यूनियनों के लिए श्रमिकों को संगठित करना मुश्किल हो जाता है। गरीबों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें कम से कम वेतन पर काम करना होता है। इससे देश में असमानताएं बढ़ती हैं। अपने विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री मोदी अपने 'मेक इन इंडिया' नारे से विदेशी कुबेरपतियों को यही लालच दे रहे हैं और मजे की बात यह है कि वे इसे सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास कहते हैं।
गुजरात का विकास
आईए,हम एक नजर डालें नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात के कच्छ जिले के कुछ गांवों में हुए विकास पर। वहां के लोगों से मिलने और वहां के हालात देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी थोड़ा.बहुत विकास हुआ है उससे दलित और मुसलमान अछूते हैं। भाजपा और संघ परिवार से जुड़ा हुआ स्थानीय श्रेष्ठि वर्ग, विकास के अभाव से लोगों का ध्यान हटाने के लिए समय.समय पर साम्प्रदायिक नारे उछालकर एक वंचित समूह को दूसरे वंचित समूह से लड़ाता आ रहा है।
जिले के बानी.पच्छम इलाके के लोग इसे तालुका का दर्जा दिए जाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। 60 हजार की आबादी और 85 गांवों वाला यह इलाका, वर्तमान में भुज तालुका का भाग है। खाबड़ा इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है और भारत.पाक सीमा पर स्थित है। खाबड़ा में रॉ, बीएसएफ आदि सहित लगभग सभी सुरक्षा एजेन्सियों के कार्यालय हैं। भुज, इस गांव से लगभग 54 किलोमीटर दूर है और अपने हर काम के लिए गांव वालों को 100 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। हाल तक, 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा देने के लिए भी भुज जाना पड़ता था जिसके कारण कई विद्यार्थी यह परीक्षा नहीं दे पाते थे। इस साल खाबड़ा में 12वीं की बोर्ड परीक्षा का केन्द्र स्थापित किया गया और यहां से 164 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। गांव के लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि जहां 10 गांव वाले गांधीधाम को तालुका का दर्जा दे दिया गया है वहीं 85 गांव वाले बानी.पच्छम इलाके को यह दर्जा नहीं दिया जा रहा है। इस इलाके में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। वे आबादी का लगभग 85 प्रतिशत हैं। गांववासियों का कहना है कि उनके इलाके को तालुका का दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वहां मुसलमानों की बहुसंख्या है और सरकार, मुसलमानों पर संदेह करती है। यह इस तथ्य के बावजूद कि 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में स्थानीय मुस्लिम रहवासियों ने भारतीय सेना की हर तरह से मदद की थी। यहां तक कि वे सैनिकों के साथ पाकिस्तानी बंकरों तक गए थे।
पूरे इलाके में मात्र 72 स्कूल हैं। शिक्षकों के 350 पद खाली पड़े हैं। अधिकतर स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है जो पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार, हर स्कूल में कम से कम पांच शिक्षक होने चाहिए। तीन गांव.उदयी, झामरीवाट और लखाबो.ऐसे हैं जिनमें एक भी स्कूल नहीं है। और यह शायद संयोग मात्र नहीं कि इन तीनों गांवों की पूरी आबादी मुसलमानों की है। इन गांवों में स्कूल खोलने के लिए कई बार मांग उठाई गई परंतु सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत,लुहाना में मांग करते ही स्कूल खोल दिया गया। मुस्लिम.बहुल इलाकों के स्कूलों के परीक्षा परिणाम बहुत खराब आते हैं।
टूगा गांव के एक शिक्षक मोहम्मद खालिद से हमारी मुलाकात हुई। इस गांव में एक प्राथमिक व एक हाईस्कूल है। यह इलाके के बेहतर स्कूलों में से एक है। जिस प्राथमिक शाला में खालिद पढ़ाते हैं वहां 225 विद्यार्थी और छःह शिक्षक हैं। इन्हें कक्षा एक से लेकर आठ तक के विद्यार्थियों को पढ़ाना होता है। इसके लिए पहली और दूसरी व तीसरी और चौथी  कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बिठाया जाता है ताकि एक ही शिक्षक उन्हें पढ़ा सके। खालिद यह स्वीकार करते हैं कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न है और सुविधाओं की बहुत कमी है। परंतु इसके लिए वे मुस्लिम समुदाय में जागरूकता की कमी को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि अगर समुदाय में जागरूकता होती तो लोग स्कूल पर ध्यान देते और कोशिश करते कि वह अच्छी तरह चले। वे इसके लिए मुसलमानों के प्रति भेदभाव को दोषी नहीं ठहराते।
जान कुनरिया गांव में बिजाल डुंगलिया ने भी बताया कि स्कूल ठीक से नहीं चल रहे हैं। उनमें शौचालय तो दूरए पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है।
अंजर ब्लाक के सिनोगरा गांव में दो स्कूल हैं। इनमें से एक का भवन सन् 2001 के भूकंप में ढह गया था और इसका पुनर्निर्माण कृष्ण पारिणम मंदिर द्वारा करवाया गया है। दूसरी कन्या शाला है। मुसलमान, गांव की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हैं। स्कूल, हिन्दुओं के रहवासी इलाके में हैं यद्यपि मुसलमानों की बस्ती वहां से बहुत दूर नहीं है। उच्च जातियों के बच्चे लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित अंजर में स्थित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और गांव के स्कूल में केवल मुसलमानों और दलितों के बच्चे ही हैं। 220 विद्यार्थियों में से केवल 83 मुसलमान हैं। मुसलमान बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। जो बच्चे दाखिला ले लेते हैं उनमें से ज्यादातर या तो स्कूल आते ही नहीं हैं या बहुत कम आते हैं। शिक्षकों की राय थी कि मुस्लिम अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है। लड़कियां'बंधानी' का काम करती हैं और लड़के दुकानों आदि में। वे पढ़ना ही नहीं चाहते। मुसलमानों के केवल कुछ घर पक्के हैं और समय के साथ उनके मालिकाना हक की जमीनें कम होती जा रही हैं। दलित अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं और इसलिए दलित विद्यार्थियों की स्कूलों में उपस्थिति बेहतर है। लड़कों की तुलना में लड़कियों की उपस्थिति ज्यादा रहती है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और कई पद खाली पड़े हैं। लड़कों के स्कूल में सात और लड़कियों के स्कूल में छःह शिक्षक हैं। दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते दो या दो से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बैठाकर पढ़ाया जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी खराब है। मुस्लिम ग्रामीणों का मानना है कि उनके गांव की उपेक्षा इसलिए की जा रही है क्योंकि वहां मुसलमानों का बहुमत है।
-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

नशेमन से धुआँ उठता है तुम कहते हो बादल है

 हालिया पार्लियामानी इन्तखाबात से पहले मुस्लिम तंजीमों और इदारों के सरबराहान में बड़ी इजतराबी कैफियत देखने को मिली थी। हर जानिब से ये आवाज बुलन्द की गई कि किसी सूरत बी0जे0पी0 और मोदी को बरसरे एक्तदार आने से रोका जाए। इस अन्दाज से मोदी के खिलाफ नारे बुलन्द किए गए कि हिन्दू वोटरों का एक बड़ा तबका खामोशी के साथ मुत्तहिद हो गया और मुस्लिम वोटर मुन्तसिर होकर कई खानों में बँट गए। नतीजा यह हुआ कि बी0जे0पी0 अक्सरीयत से जीत गई और मोदी सिर्फ हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डालकर बाआसानी वजीर आजम बन गए। ऐसे लोग जो हर हाल में किसी भी हुकूमत से करीब तर हो जाना चाहते हैं वह अपनी सियासी मन्तिक को फेल होता देख कर परेशान व बेचैन हो गए, अब खौफ व डर की वजह से उजलत में वजीर आजम मोदी को अपनी हिमायत की खबर पहुँचाना चाहते हैं। चूँकि इन लोगों ने यह अन्दाजा अपने तौर पर कर लिया है कि आइन्दा दस साल तक मोदी एक्तदार उज़मा पर काबिज रहेंगे। गालिबन यही सोच मुस्लिम इदारों के सरबराहान को भी खुद सुपुर्दगी पर मजबूर कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि न किसी ने इनकी हिमायत तलब की है न अब किसी को हुकूमत साजी के लिए मुसलमानों की हिमायत की जरूरत है। रजाकाराना तौर पर अपनी जानिब से हिमायत का एलान किस बात का पैगाम देता है? बेमहल बे मौका और बेजरूरत बातों से सिर्फ कीमत ही नहीं घटती बल्कि बचा बचाया वकार भी बाकी नहीं रहता और इसको हलकापन भी कहा जाता है।
      वजीर आजम मोदी ने अपने इलेक्शन के तकरीरों में और टी0वी0 चैनलों को इंटरव्यू देते हुए बहुत सारे नेकात की तरफ इशारा किया है और कुछ बातें मुस्लिम अवाम के तईं खुल कर की हैं। अभी तो मोदी की ताजपोशी को एक माह भी नहीं गुजरा हम अभी से उतावले होकर खुद को इनके हवाले कर दें, ये कहाँ की अकलमंदी है। इसे खौफ या लालच ही तसव्वुर किया जाएगा। गलती दर गलती यह सियासी सूझ बूझ हरगिज नहीं है। हम हिन्दुस्तानी शहरी हैं। हमारे हुकूक बराबर के हैं। हम किसी के मरहूनेमिन्नत नहीं हैं। हमारे हुकूक की अदायगी में अगर जानिबदारी बरती गई तो हम खामोश नहीं रहेंगे। दस्तूर हिन्द ने हमें जो मुराआत दी हैं इन में अगर किसी तरह की नाइंसाफी की गई तो हमें अपने हुकूक को वागुजार कराने के जायज तरीकों से कोई ताकत रोक नहीं सकती और खुद मोदी ने कहा है कि मैं किसी मखसूस कौम या फिरका का नहीं बल्कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का चैकीदार और सेवक हूँ। मुझसे किसी को डरने की जरूरत नहीं है। मोदी से कौन डरता है। मुसलमानों में गुजरात के फसाद का गुस्सा जरूर बाकी है। अगर उन्हें इस गुस्से को खत्म करना है तो अपनी गैर जानिबदारी का सबूत पेश करने के लिए ही मसायल हल करें।
    चाहिए तो ये था कि हम अभी खामोश रहकर हुकूमत के रवैये का जायजा लेते क्योंकि पूरा हिन्दुस्तान गुजरात नहीं है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को और इनके मफादात को नजरअंदाज करना या इन पर जबर जुल्म करना कोई आसान बात नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इसके बड़े भयानक नतीजे  बरामद होंगे, हमें मोदी से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी न है। बात सिर्फ यह है कि गुजरात में मुसलमानों का जो कत्लेआम हुआ उस वक्त वह खुद वजीर आला थे। इनकी मौजूदगी में जो हुआ इसको रोकना इनका फर्ज मनसवी था जिसे इन्होंने नहीं निभाया। न मुजरिमों को इन्होंने कैफरे किरदार तक पहुँचाया। यही शिकायत और इसी कारकिर्दगी का जख्म आज भी हरा है। इसके बावजूद हमारी बेहिसी और चापलूसी की इन्तिहा देखिए कि मोदी साहब को और इनके करीबी लोगों को जामिया मिलिया और एक दीगर मुस्लिम इदारे में दावत दी जा चुकी है। यह इदारा एक कल्चरल सेन्टर है जिसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है वहाँ के जिम्मेदारों में एक होड़ लग गई है कि कैसे मोदी तक पहुँचा जाए। इनके करीबी मुअतमिद हैं जो गुजरात से आकर आजकल दिल्ली में कयाम पजीर हंै। जामिया मिलिया में इनको दावत दी जा चुकी है जबकि इसके बरअक्स मुजफ्फरनगर फसाद के हीरो को वजीर बना दिया गया है। पुणे में एक मुसलमान इंजीनियर को टोपी और दाढ़ी के जुर्म में कत्ल किया गया, अभी तक इस पर खामोशी है कि हिन्दू राष्ट्र सेना पर कब पाबन्दी आयद होगी और कब तक इसको बेलगाम छोड़ा जाएगा। एक तरफ यह एलान है कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ अवाम के सेवक हैं दूसरी तरफ अमल यह है कि बेगुनाह मुसलमानों को दसियों साल तक जेल में बन्द करके स्कीम बनाने वाला आई0बी0 अफसर अजीत देवल को एन0एस0ए0 बनाया जाता है। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद शहादत के वक्त कल्याण सिंह का होम सेक्रेटरी जो बाद में टी0आई0आई0 का चेयरमैन बना, गैर कानूनी तरीके से कैबिनेट सेक्रेटरी आर्डिनेन्स के जरिये बनाया जाता है। इससे हुकूमत की करनी का तजाद और जहनियत का पता चलता है।
    हमारी जिन्दगी और मौत का मालिक रज्जाक सिर्फ अल्लाह है, यही हमारा ईमान है। ईमान व यकीन को मजबूत करके अपने मौक्किफ पर इस्तकलाल के साथ कायम रहना एक मोमिन की शान है। अगर हमारे साथ अच्छा रवैया रहा और हमारे मजहबी उमूर में बेजा मदाखिलत नहीं की गयी। हमारे चैन सुकून की जिन्दगी में रखनान्दाजी नहीं की गई तो खामख्वाह मुखालिफत का हमें शौक नहीं। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ 60 फीसदी हिन्दू आज भी ऐसे हैं जो खुद को सेक्यूलर कहते हैं। इन्हें ये बताना चाहिए कि 1947 में हमने हिन्दुस्तान के इक्तिदार को यह कहकर इनके हवाले कर दिया था कि अब हम हिन्दुस्तान की हुकूमत आपके जिम्मे करते हैं आप हुकूमत कीजिए हम आपके पीछे हैं। जो हालत उस वक्त हमारी थी वही हालत आज 2014 में हिन्दुस्तान के सेक्यूलर हिन्दुओं की है। अब ये मुल्क गांधी, लोहिया, या अम्बेडकर की सोच पर चलेगा या फिर गोलवलकर या सावरकर के ख्वाब की ताबीर पूरी करेगा। यह एक लमहा फिफ्र मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सेकुलर हिन्दुओं के लिए भी है। इन्हें चाहिए कि वे आपस में इत्तिहाद पैदा करें और सेकुलर पार्टियों के लीडरों को चाहिए गुजिश्ता सियासी रंजिशों को भूलकर करीब आएँ और मौजूदा सियासी तब्दीलियों का मुकाबला करने के लिए अवाम का एतमाद हासिल करें। तभी कोई बेहतर रास्ता निकल सकता है और हुकूमत को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए एक दबाव कायम किया जा सकता है। वरना वही होगा जो आजादी के बाद से अब तक होता आ रहा है। वादा और मीठी बातों से खुश होकर और भरोसा करने की वजह से गुजिश्ता साठ वर्षों से हमारे जज्बात और एतमाद के साथ मुसलसल खेला जा रहा है। एक अरसा दराज तक रामविलास पासवान मुसलमानों की नजर में खुद को सेकुलर साबित करने के लिए बी0जे0पी0 से कसदन दूर रहे। आज अपने सियासी मफादात के हुसूल के लिए इन्होंने बी0जे0पी0 का दामन पकड़ा और मुसलमानों को पस्त हिम्मत करने के लिए इनके मुस्लिम नुमाइन्दे मुसलमानों की मजलिस में जाकर तकरीर करते हैं और अपने मतालबात से बाज रहने की तल्क़ीन करते हैं ऐसे बहुत सारे लोग मुस्लिम नुमाइन्दा बनकर खैरख्वाही की आड़ में हुकूमत के मन्जूरे नजर होने की गरज से मुसलमानों में दाखिल होकर दहशत पैदा करने की कोशिश में मुन्हमिक हंै। ऐसे लोग कौम व मिल्लत के भी खैरख्वाह नहीं हो सकते। इनसे होशियार रहने की अशद जरूरत है। आइन्दा पाँच बरसों में सियासत गिरगिट की तरह न जाने कितने रंग बदलेगी। अगर हमारे साथ बदसलूकी नहीं की गई तो हमसे ज्यादा वफादार दुनिया की कोई कौम नहीं है। पन्द्रह सौ साला तारीख इस सच्चाई की चश्मदीद गवाह है, इस पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। किसी को ज़ाती तौर पर हमारी हिमायत वफादारी का मुशाहिदा करना है तो हमारे जुमला मसायल को हल करे और फिर देखे कि हम किस कदर जां निशार हैं। अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। अमली इकदामात ही जख्म पर मरहम का काम कर सकते हैं। इसलिए अभी वक्त हमारे सब्र व तहम्मुल का मोत्कादी है।
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं।
आईना-जमीर हाशमी
लो उजागर हो गया पटना धमाकों का भी सच
कार्यवाही थी वहाँ भी सब उसूलांे के बगैर।
ला न पाए छः महीने में भी कोई फर्दे जुर्म
बेगुनाहों पर थी तोहमत फिर सबूतों के बगैर।।

 -मुहम्मद अदीब
मजमून निगार
(राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं। )
मोबाइल: 09868181945
साभार-इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

रविवार, 7 सितंबर 2014

फासिस्ट सरकार का भुतहा विकास माॅडल

    चावल का एक दाना मसलकर सारी बटलोई का हाल मालूम किया जा सकता है, फिर भी मैंने झाँककर, सूँघकर, कलही से खुदर-बुदर करके गुजरात के विकास माॅडल की बटलोई, जिसे लोकसभा चुनावों में तेज आँच पर चढ़ाया गया था, का हाल मालूम किया है। यह वही विकास माॅडल है जिसके बूते पर 2014 का कार्पोरेट प्रेरित प्रायोजित चुनावी महासमर छल और धूर्तता से विजय किया गया है। जिसमें सबसे अधिक नुकसान विरोधी पार्टियों का नहीं वरन् भारत की उस एक सौ तेरह करोड़ जनता का हुआ है जिसका इस चुनाव से किंचित सम्बंध नहीं है, क्योंकि इस सत्तारूढ़ पार्टी को देश भर से मात्र सत्रह करोड़ वोट मिले थे।
    यह वही विकास माॅडल है जिसकी भारतीय जनता को समाचार पत्रों, रेडियो, सोशल मीडिया से लेकर टी.वी. के सभी न्यूज चैनलों पर प्रत्येक पाँच-पाँच मिनट पर दुहाई दी जा रही थी। एक उभरा हुआ नेता बार-बार यह कह रहा था कि हम सारे देश को गुजरात जैसा बना देंगे। किन्तु यह विकास माॅडल जिसे एक तिलिस्म की तरह प्रयोग करके हम सबको अभिभूत किया जा रहा था इसमें एक हाॅरर है जो मुझे ही नहीं आप सभी को आतंकित करेगा और जो हर भुतही शय की भाँति बाहर और दूर से खूबसूरत लगता है। एक दिन जब मैं
गांधीनगर से अहमदाबाद जा रहा था उसी दिन चैबीस घण्टों में सात सेंटीमीटर वर्षा हुई और गुजरात का विकास माॅडल चीखने लगा। मैंने देखा कि सड़कंे नदियाँ बन गई हैं, आॅटो पानी में डूब गये हैं, कारें जहाँ की तहाँ पानी में तैरकर बन्द हो गई हैं। खैर! यह इस अन्ध विकासवाद के लिए एक स्वाभाविक बात है कोई बड़ी बात नहीं। यह विकास पानी और मनुष्य के निकलने  के सारे रास्ते बन्द कर देता है।
    सौभाग्य या दुर्भाग्य से मैं गांधीनगर जो कि गुजरात की राजधानी है, का प्रवासी हूँ। यह वही शहर है जहाँ तीन किलोमीटर का आॅटो का किराया सौ रुपये है, जहाँ चीनी पचास रुपये किग्रा0 और आलू अस्सी रुपये किग्रा0 बिकता है। जहाँ के निवासियों को कार्पोरेटी मुनाफाखोरी संस्कृति ने जानवर बना दिया है, जो सिर्फ मुनाफे की तलाश में रहते हैं और यू0पी0 बिहार के लोगों को गालियाँ देते हुए उन्हीं को ऊँची दरों पर अपने घरों का अधिकांश भाग किराये पर देते हैं। जहाँ के पुलिस और खुफिया हमेशा आतंकवादियों की तलाश में रहते हैं और न मिलने पर किसी निर्दोष मुस्लिम युवक को आतंकवादी बनाकर गायब कर देते हैं।
    चमाचम सड़कों, फुटपाथों, चैराहों और चैड़े ग्रीन मफलरों वाला यह नया-नया शहर प्रत्येक उस मध्यवर्गीय व्यक्ति को आकर्षित करता है जो सुविधा भोगी, स्वार्थी, उदरंभरि और दिखावेदार है। लेकिन इन चमाचम सड़कों और फुटपाथों के और पीछे, जहाँ ग्रीन मफलर हैं, उन्हीं से थोड़ा और आगे मफलरों के पीछे या उसी में भारत की वही राज्य दर राज्य विस्थापित की गई भोली और निर्दोष जनजातियाँ पत्ती और गत्तों के झोपड़ों में महानगरीय जीवन शैली को अपनी पीली और अतृप्त आँखों से निहारती हुई नारकीय जीवन जी रही हैं। ये शहर के हुस्न की बुनियाद है। ये जनजातियाँ जो अदृश्य मानव हंै जिन्हें कोई नहीं देख पाता या देखना नहीं चाहता, इस राज्य और देश के किसी भी विकास माॅडल का हिस्सा नहीं रही हंै। राष्ट्रवादी सरकार जिसने राष्ट्रवाद को फासीवाद का पर्याय बना रखा है। इन्हें अपने राज्य और राष्ट्र का हिस्सा नहीं मानती तथा अपने विकास माॅडल में इन्हें भागीदार नहीं बनाना चाहती क्योंकि गुजरात का विकास माॅडल सिर्फ और सिर्फ बिड़ला, अम्बानी और अडानी के लिए है। गांधीनगर की महँगाई से ऊबकर जब मैं किसी चायखाने पर चाय पीने के लिए जाता हूँ तो वहाँ खड़ा कोई सामान्य गुजराती मुझसे वार्तालाप में कह रहा होता है-मोदी जी ने हमारे वास्ते क्या किया? कुछ नई ये सब (गांधीनगर की महानगरीय व्यवस्था) तो आप लोग (बाहरी) का वास्ते हैं। बरोबर! यह सुनकर मैं मुस्कराता हूँ और चाय पीकर अपने महँगे अस्थायी आशियाने की ओर लौटता हूँ।
    मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद सबसे अधिक जनजातियाँ गुजरात में हैं। यानी गुजरात देश में चैथा सबसे बड़ा जनजातियों वाला राज्य है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन्हीं जनजातियों का सबसे अधिक विस्थापन, दमन और शोषण हो रहा है। इंडियन एक्सप्रेस का गुजरात संस्करण, चाय के साथ मेरे हाथ में है और यह लेख लिखने से पहले मैंने पढ़ा है कि किस प्रकार एक बिल्डर ने राजनैतिक कार्पोरेटी धन बल की सहायता से किसी आदिवासी नागरिक की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन फर्जी कागजों के सहारे छीन ली है और इस प्रक्रिया में राजस्व प्रशासन का भी सहयोग है। यहाँ के कार्पोरेटी औद्योगिक विकास में भी एक फासीवाद है क्योंकि अम्बानी और अडानी के अतिरिक्त यहाँ कोई एक आटा चक्की तक नहीं लगा सकता। पूरे भारत की तरह यहाँ भी केवल सवर्णों (प्रमुख रूप से पटेल और शाह) का ही कब्जा हर क्षेत्र में है। किसी भी कमजोर अथवा आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति को उभरने का ये कोई भी मौका नहीं दे रहे हैं। दुःख की बात तो यह है कि इस राज्य की सरकार (जो अब पूरे देश की सरकार है) के पास इन लोगों के लिए कोई प्रभावी अथवा ठीक ठाक योजना नहीं है। विकास का दावा कर चुनाव जीतने वाली इस राज्य की सरकार में यहाँ के दलित और आदिवासी बच्चे चढ़ी हुई नदियांे में पिलकर अथवा रस्सियों के पुल पर अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं।
    मैंने गुजरात के विकास माॅडल को भुतहा विकास माॅडल इसलिए कहा है कि मुझे गांधी नगर की शान्त सड़कों और यहाँ के विकास से डर लगता है, या कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है। चमाचम सड़कों पर मुझे गरीब जनजातियों के बच्चों, महिलाओं की आत्माएँ भटकती हुई दिखाई देती हैं जिनकी हत्याकर उनके कंकालों की नींव पर इस भुतहा विकास माॅडल का ढाँचा खड़ा किया गया है। कितना हास्यापद है। कितनी घृणा होती है यह देखकर कि चमाचम सड़कों के किनारे शानदार फुटपाथों पर सुबह सुबह आदिवासियों के बच्चे कतारबद्ध उकड़ू बैठकर अपनी हाज़्ात रफा कर रहे होते हैं। गुजरात के विकसित आदर्श विकास माॅडल (जो पूरे देश में लागू होने वाला है) के बीच में, खुले आसमान के नीचे तराशे गये पत्थरों से निर्मित फुटपाथ पर इन टट्टी करते हुए बच्चों के सामने से सड़क पर कोई महंगी विदेशी कार, भीतर का वातावरण वातानुकूलित करके स्पीड से गुजर जाती है और उस कार की पाॅलिशदार चमक में, उसके शीशों पर, टट्टी करते हुए बच्चों और उनके द्वारा त्याग किये गये मल का प्रतिबिम्ब पलभर के लिए ठहर जाता है। विकास की यह तस्वीर क्या डरावनी नहीं है?
    मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरे राज्य उत्तर प्रदेश में जहाँ की जनता सिर्फ कृषि पर निर्भर है, ऐसा कोई भुतहा विकास माॅडल लागू हो जिसमें यहाँ की गरीब जनता हवन सामग्री बनाकर आहुति के रूप में उग्र हिन्दुत्व  के विकास यज्ञ में झोंक दी जाए।
कोई भी सरफिरा धमका के,
जब  चाहे  जिना  कर ले
हमारा  मुल्क  इस माने में
बुधुआ  की  लुगाई  है।
-अदम गोण्डवी

-संतोष अर्श  
मोबाइल: 09919988123
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

गुजरात पुलिस - देश का गौरव

मोदी ने कहा था कि गुजरात की पुलिस- देश का गौरव है किन्तु उच्चतम न्यायलय द्वारा आतंकी मामलों ने आ रहे निर्णयों से यह साबित हो रहा है कि गुजरात पुलिस पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों को विभिन्न आतंकी घटनाओ में फंसा दिया था . जिसमें कथित आतंकियों को दस दस साल से अधिक समय से कारागार में बिताने पड़े और उनकी छवि खराब हुई , जीवन नष्ट हुआ . 
17 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में, 'दोहरे बम विस्फोटों' सूरत बम विस्फोट में कथित संलिप्तता के लिए अक्टूबर 2008 में एक टाडा अदालत ने दोषी करार दिया और सजा सुनाई थी, उन सभी ग्यारह व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है 1993 के विस्फोटों में सभी अभियुक्त जेल गए थे  उन सभी लोगों को उच्चतम न्यायलय ने बरी कर दिया है.
 कांग्रेस के पूर्व मंत्री मोहम्मद सुरती सहित ग्यारह व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष पाया और बरी कर दिया यहां तक ​​कि  हथियारों की बरामदगी संतोषजनक ढंग से व ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किया . इस तरह की स्थिति में सजा नहीं दी जा सकती है.
 सुप्रीम कोर्ट ने 2002 अक्षरधाम आतंकी मामले में गुजरात पुलिस निर्णय पारित किया है. अक्षरधाम में जांच डीजी वंजारा और जीएल सिंघल के (नकली) मुठभेड़ विशेषज्ञ टीम द्वारा आयोजित किया गया. बरी करते हुए 16 मई 2014, पर सभी छह अक्षरधाम मामले में मौत की सजा सुनाई थी, जो तीन सहित आरोपी, सुप्रीम कोर्ट ने यह अक्षरधाम मामले की जांच का आयोजन किया जिसके साथ अक्षमता के लिए गुजरात पुलिस की खिंचाई की. न्यायमूर्ति ए.के. की बेंच पटनायक और जस्टिस वी गोपाल गौड़ा ने कहा कि 
सही जांच स्तर से पोटा, विशेष न्यायालय (पोटा) और पुष्टि द्वारा आरोपियों को सजा और सजा देने के तहत आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा मंजूरी देने के लिए, विभिन्न चरणों में इस मामले के विचारण में प्रतिकूलता उच्च न्यायालय द्वारा एक ही की.  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबका मौलिक अधिकार है और इस देश के नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों के ऐसे घोर उल्लंघन हमारे सामने प्रस्तुत किया गया. हम हाथ जोड़कर बैठने के लिए पैसा नहीं दे सकते.
राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से जुड़े इस तरह के एक गंभीर प्रकृति के मामले की इसके बजाय इतने सारे कीमती जान लेने के लिए जिम्मेदार वास्तविक अपराधियों को जेल भेजने की जगह पुलिस ने  निर्दोष लोगों को पकड़ लिया और उनको गंभीर आरोपों में निरुद्ध किया और बाद में सजा कराई .
सूरत में बरी किए जाने के मामले विस्फोटों और अक्षरधाम मामलों गुजरात पुलिस वर्षों में फंसाने के लिए निर्दोष लोगों को टाडा और पोटा जैसे तथाकथित 'आतंक कानूनों' के साथ दुर्व्यवहार किया गया है कि कैसे दिखा. कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के 2002 में पोटा के लागू होने का विरोध किया था और भाजपा राजग सरकार पारित कानून लाने के लिए संसद के संयुक्त सत्र आयोजित करने के लिए मजबूर किया गया था का नेतृत्व किया. यह इसके पहले पोटा के रूप में बुरा था, जो टाडा, अधिनियमित किया था यह भी याद रहे कि कांग्रेस टाडा का विरोध किया था, हालांकि सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने इन काले कानून और अलोकतांत्रिक कानून को लागू होने से रोकने के लिए कांग्रेस के प्रयासों की सराहना की थी. "आतंकवाद" "कानून" से नहीं रोका जा सकता है क्योंकि टाडा और पोटा जैसे कठोर कानून भी दुरुपयोग किया जा सकता है! टाडा के दुरुपयोग से हजारों निर्दोष व्यक्तियों, श्रमिकों के हजारों किसानों को जेल जाना पड़ा था और 1989 में भाजपा ने भी टाडा को समाप्त करने के अभियान का नेतृत्व किया था. 
लेकिन सत्ता में आने के बाद,  भाजपा राजग पोटा अधिनियमित और गुजरात में निर्दोष सैकड़ों मुसलमानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया और दो ​​समुदायों विभाजित किया.  झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गरीब आदिवासियों की तरह अन्य राज्यों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया यहाँ तक उनको भी गिरफ्तार किया गया जो सत्तारूढ़ दल का हिस्सा थे जैसे वाइको ,यह इसलिए पोटा का विरोध और लोकतंत्र का लबादा पहनने के लिए कांग्रेस ने अपना रुख बदला 
यह कि टाडा और पोटा दोनों  निरस्त कर दिया गया है  यह की कई निर्दोष लोगों को अभी भी देश भर की जेलों में सड़ना पड़ रहा है. क्यों है.

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

नोट  http://www.truthofgujarat.com/supreme-court-exposes-gujarat-polices-blatant-abuse-terror-laws-like-pota-tada/#more-4848 
का संक्षिप्त अनुवाद गूगल की मदद से किया गया है .

रविवार, 15 जून 2014

कार्पोरेट की कोख से जन्मा दक्षिणपंथ का दानव

           दुनिया भर ने धड़कते दिलों के साथ 16 मई को संपन्न हुए पृथ्वी के सबसे विशाल जनतंत्र के चुनावी नतीजों को देखा। संसद में भारत की हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया। निवर्तमान शासक दल कांग्रेस को मात्र 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा, कांग्रेस की हुई दुर्गति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा जीती गई सीटों की संख्या कांग्रेस की 44 सीटों से कहीं अधिक है। जाहिर है कांग्रेस हुकूमत के दौरान पिछले दस सालों, विशेषकर पिछले पाँच वर्षों में इसके कुशासन, जनविरोधी आर्थिक नीतियों, आसन्न भ्रष्टाचार, भयावह बेरोजगारी और गैर जवाबदेही वाले तंत्र से जनता में भारी रोष था जिसका परिणाम उसे अपने संसदीय इतिहास में सबसे करारी हार के रूप में भुगतना पड़ा। 2014 के भारतीय आम चुनावों का मूल्यांकन भारतीय राज्य के अपने अन्तर्निहित द्वंद्वों की सही मायने में व्याख्या करने से ही किया जा सकता है। चुनाव परिणामों के बाद स्वाभाविक रूप से भारत की राजनीति में दक्षिणपंथी उभार अपनी तार्किक परिणति यानी पूर्ण वृत की दशा में पहुँच गया है जिसकी जुस्तजू में वह पिछले तीन दशकों से प्रयासरत था। कांग्रेस हुकूमत के दौरान पैदा हुए जनरोष और किसी कारगर विकल्प की गैर मौजूदगी ने संघ परिवार की राह गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के चुनाव पूर्व घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए आसान कर दी। क्या भारत में दक्षिणपंथी राजनीति को दुनियाभर में चल रही राजनैतिक सक्रियता से अलग रख कर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए?
    भारत के चुनाव पर टीका करने से पूर्व एक बार दुनियाभर में चल रहे राजनैतिक घटनाक्रम पर एक सरसरी नजर दौड़ाना प्रासंगिक होगा। दक्षिणी अमरीका में क्यूबा के बाद समाजवादी नीतियों को लागू करने वाले दूसरे सबसे बड़े देश वेनेजुएला में इन दिनों  ह्यूगो शावेज सरकार को भारी संकट का सामना है। देश की दक्षिणपंथी ताकतें सड़कांे पर उतर कर प्रदर्शन कर रही हैं। सरकार का मानना है कि इस तथाकथित जन आन्दोलन को अमरीकी मीडिया सम्राट सीएनएन के भ्रामक प्रचार और शावेज सरकार द्वारा भगाए गए कार्पोरेट्स का भारी समर्थन है। सरकार विरोधी भारी प्रचार के चलते जनता को उकसाने का काम अमरीकी प्रचार तंत्र बखूबी कर रहा है। भारत के चुनाव के दौरान ही हंगरी में 6 अप्रैल को पुनः बहुमत (133/199) की एक दक्षिणपंथी सरकार चुनी गई। उक्रेन में चल रहे राजनैतिक उथल पुथल और सैन्य जमघटों (रूस-नाटो/ अमरीका) पर दुनिया की नज़र गत मार्च से लगी हुई है। इस उथल-पुथल में अमरीकी और नाटो देशों द्वारा जनतंत्र की आड़ में नव फासीवादी शक्तियों का समर्थन अब किसी से छिपा प्रश्न नहीं है। 30 मार्च को तुर्की में हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में सत्तारूढ़ इस्लामी दक्षिणपंथी दल को लगभग 43 प्रतिशत वोट मिले। सीरिया में चल रहे गृह युद्ध में विपक्षी इस्लामी दक्षिणपंथी ताकतों को जनतंत्र बहाली के नाम पर अमरीकी, सऊदी और यूरोपीय देशों द्वारा आर्थिक एवं सैन्य सहायता दिया जाना एक खुली किताब है। अफ्रीकी उपमहाद्वीप में नाइजीरिया में बोकोहरम और माली में इस्लामी गुटों को अमरीकी पिट्ठू सऊदी का समर्थन जगजाहिर है। 2011 के अरब स्प्रिंग का गुलाब मुस्लिम ब्रदरहुड के जरिए मिस्र की धरती पर खिलते सभी ने देखा है और आज वहाँ चल रहे फौजी शासन पर किन विदेशी शक्तियों का प्रभाव है यह भी किसी से छिपा नहीं है। बहरीन में सुन्नी राजा के खिलाफ शिया जन असंतोष और उसमंे ईरानी धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक सहयोग सभी जानते हैं। हमने हाल ही में देखा कि पड़ोसी पाकिस्तान में पीपुल्स पार्टी की हुकूमत को जनता ने सेंटर राइट मुस्लिम लीग के जरिये सत्ता से बरतरफ किया, हमने हाल ही में नेपाल के चुनावों में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी को सेंटर राइट दल कांग्रेस के हाथों सत्ताच्युत होते देखा है, ठीक भारत के नीचे हिंद महासागर में स्थित टापू देश मालद्वीप में भी यही सब कुछ हुआ। उपरोक्त घटनाक्रमांे पर यह सरसरी नजर इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आज जिस युग में हम जी रहे हंै, लगभग पूरे विश्व में दक्षिणपंथी ताकतें अपने उभार पर हंै। निश्चय ही जनता के मौलिक मुद्दों और उनकी बुनियादी समस्याओं को धर्म, क्षेत्र, राष्ट्र, भाषा, जाति आदि के प्रश्नों को उछाल कर उन्हें आसानी से भ्रमित किया जा सकता है और शासक वर्ग इन्हीं उथली संवेदनाओं के घोड़े पर सवार होकर अपनी लूट को जनता पर थोपने में सफल हो जाता है। सत्ता के इस अनूठे अनुष्ठान को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में पूरी दुनिया पर एकछत्र राज करने वाला अमरीकी कार्पोरेट मीडिया अपनी निर्णायक भूमिका अदा करता है, यह सच अमरीका, कनाडा, यूरोप, मध्य पूर्व, वेनेजुऐला, अफ्रीका से लेकर भारत तक साफ तौर पर देखा जा सकता है। आज पूरे विश्व में ऐसा देश (कुछ एक खित्तों को छोड़ कर) खोजना मुश्किल है जहाँ कार्पोरेट मीडिया किसी भी चुनाव में खुद एक स्टेक होल्डर न हो। यह कौन नहीं जनता कि ‘विश्व पूँजी’ और ‘कार्पोरेट मीडिया’ एक ही  सिक्के के दो पहलू हंै और एक दूसरे के हितों के संरक्षक भी। यह तथ्य रखना यहाँ आवश्यक है कि दुनिया के 1500 प्रमुख अखबार, 1100 पत्रिकाएँ, 9000 रेडियो स्टेशन, 1500 टेलीविजन संस्थान, 2400 प्रकाशन समूहों का नियंत्रण मात्र 6 कार्पोरेट्स के हाथों में है। पूरी दुनिया के  इस नेटवर्क में देशी पूँजी को समाहित करना अथवा उसके हितों को सुरक्षा देना, उसे पल्लवित करना, इनका सहधर्म है। विभिन्न देशों के स्थानीय पूँजीपति की टाँगों के बिना यह पूरी दुनिया में अपने विस्तार और प्रभुत्व को स्थापित नहीं कर सकते।
    इस विश्व परिदृश्य के मद्देनजर भारतीय चुनावों और उसके परिणामों की स्वतःस्फूर्त मीमांसा करने में अब पाठकांे को सुविधा होगी। 1991 में नव उदारवाद के नाम पर नई आर्थिक नीतियों की शुरुआत नरसिम्हा राव सरकार के जमाने से हुई जिसके कर्ता
धर्ता तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह थे, उन्हीं नीतियों को अटल सरकार ने जारी रखा फिर उसके बाद मनमोहन सिंह की कांग्रेसी सरकार ने पिछले दस सालो में उसे विस्तार दिया। इन नीतियों के चलते भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँचा और कमर तोड़ महँगाई से आम जनता की कमर टूट गई। अटल सरकार मात्र प्याज के मँहगे होने पर रुखसत हुई हो ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, तब भी आसमान छूती सब्जियों, सेवाओं और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल था, खुले बाजार की नीतियों के चलते मुनाफाखोरी अपनी चरम पर थी, ठीक वही परिदृश्य निवर्तमान मनमोहन सरकार के सामने मौजूद था जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के भारी कलंकों ने शासक दल की इतनी कमर तोड़ दी कि कुछ बड़े मंत्रियों ने भारी जनाक्रोश देखते हुए चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। इसी व्याप्त जन निराशा के माहौल में पिछले साल के अंत में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीसरी बार चुनाव जीतने पर भारत के शासक वर्ग को एक ऐसा चेहरा मिल गया जिसकी सवारी करके वह अपने मंसूबों को राष्ट्रीय स्तर पर निर्बाध गति से जारी रख सकें। इन्हीं उदारवादी आर्थिक नीतियों के चलते भारत में गत 20 वर्षों के दरम्यान संपत्ति की एकाधिकार वादी प्रवृति जितनी तेजी से बढ़ी ऐसा आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। एक अखबारी रपट के अनुसार 127 करोड़ लोगों के भारत के कुल घरेलू उत्पाद का दो तिहाई हिस्सा मात्र 8700 लोगों के हाथों में सीमित है, 65 करोड़ लोगों के पास जहाँ शौच करने की जगह नहीं है, उसी भारत में मुकेश अम्बानी 27 मंजिला मकान (अन्टिलिया) में रहता है जिसकी कीमत एक अरब डालर से अधिक है। टाटा द्वारा नैनो कार की फैक्ट्री पश्चिम बंगाल से उखाड़कर गुजरात में लगाने के बाद टाटा, अम्बानी और अडानी जैसे धन पशुओं को नरेंद्र मोदी के रूप में विकास का ऐसा विश्वसनीय मिथक मिल गया जो इनकी इजारेदारी में दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की करने में मददगार साबित होगा। तीसरी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही उन तमाम विज्ञापन कम्पनियों और इमेज बिल्डिंग संस्थानांे को अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार और मोदी के ब्रांड को स्थापित करने का ठेका मिल गया जिनकी कृपा से मोदी को गुजरात में चुनाव जीतने में सफलता मिली थी। क्या यह वही अहमदाबाद की सड़कांे पर स्कूटर चलाता साधारण संघ प्रचारक नरेंद्र मोदी है जिसे संघ ने स्कूटर से उठाकर गुजरात का मुख्यमंत्री 13 साल पहले बनाया था? उसके डिजाइनर खादी के कपडे, पगडि़याँ, स्टेज पर स्टार की भाँति अवतरण, भाषण कला, अभिनेताओं की भाँति भाव भंगिमाएँ, लच्छेदार भाषा, 13 वर्ष पुरानी नहीं बल्कि मात्र साल दो साल पुरानी है जिसकी पटकथा, कला संयोजन और डायरेक्शन सभी कुछ संयोजित और प्रायोजित है। भारत की राजनीति में नेताओं को किसी माॅडल के रूप में पेश करने का यह पहला प्रयोग है जिसके पीछे भारत का कार्पोरेट जगत बैठा है। भारत की कार्पोरेट ताकत ने अपने इस सफल प्रयोग के माध्यम से पूरी दुनिया को बता दिया है कि वह अपने धन, बल और छल की ताकत से जनमत को कैसे हाइजैक कर सकते हंै। उन्हीं के द्वारा संचालित मीडिया ने कुछ माह पूर्व एक नौटंकी को ‘अगस्त क्रांति’ का नाम देकर पूरे देश की जन भावनाओं को झकझोरा था और उसी मीडिया के पलटे रुख से नौटंकी के इन तथाकथित महानायकों की आम चुनाव में ऐसी  दुर्दशा बना दी कि उन्हें मात्र 4 सीटों पर संतोष करके औंधे मुँह गिरना पड़ा।
     भारत के आम चुनावों के इतिहास में 2014 का चुनाव सबसे महँगा चुनाव है। किसी राष्ट्रीय चैनल में तीन सेकेण्ड के एक स्लाट की कीमत 1 लाख रुपया है। पीक आवर्स में यह कीमत और बढ़ जाती है। भारत में करीब 800 टीवी चैनल्स है जिनमें 300 चैनल्स समाचार-विचार प्रसारित करते हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के हवाले से नरेंद्र मोदी की ब्रांड बिल्डिंग अथवा चुनाव प्रचार में पाँच से दस हजार करोड़ रुपया खर्च किया गया है। संघ परिवार इस खर्च पर आपराधिक खामोशी रखते हुए उसे छिपाता है लेकिन यह बताने से नहीं चूकता कि पिछले छः माह में मोदी मात्र 5 घंटे सोये हंै, 15 सितम्बर 2013 से 3 लाख किलोमीटर सफर तय करके रिकार्ड 437 रैलियाँ की हंै, इसके अतिरिक्त नवरचनात्मक 1350 थ्री डी रैलियाँ भी की है। भारत में 2011 तक 82000 पत्र-पत्रिकाएँ और टेलिविजन चैनल्स पर (इन प्रचार-प्रसार संस्थाओं पर 100 से भी कम पूँजीपति घरानों का नियंत्रण है) जिस तरह विज्ञापनों और पेड न्यूज के माध्यम से पिछले तीन महीनों से लगातार प्रचार किया गया वह अपने आप में अभूतपूर्व है। भारत का चुनाव दुनिया में अमरीका के चुनाव के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्चीला चुनाव बन गया है। अमरीका के चुनाव पर 7 अरब डालर खर्च हुआ जबकि भारत में यह खर्च अखबारी अनुमानों के अनुसार पाँच अरब डालर पहुँच गया है, कैसी विडम्बना है कि  दोनों मुल्को की प्रति व्यक्ति आमदनी में करीब दस गुना फर्क है लेकिन चुनाव खर्च लगभग एक जैसा। चुनावों के दौरान ही लगभग 250 करोड़ रुपया भारत की भ्रष्ट पुलिस ने पकड़ा है जिसकी अखबारों में खबर छपी है, इससे चुनावों में काले धन के प्रयोग का सिर्फ एक अनुमान लगाया जा सकता है। इस खर्च पर कांग्रेस एंव अन्य दलों की चुप्पी भारत के लोकतंात्रिक भविष्य के प्रति एक आपराधिक मनोवृति है। ऐसी स्थिति में क्या गरीब मजलूमों की आवाज उठाने वाले दल भविष्य में कोई चुनाव लड़ सकेंगे? इतने भयावह चुनावी खर्च के बाद भी 34 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट ही नहीं डाला जो एक चिंतनीय विषय है। 2014 के आम चुनावों में भारतीय मीडिया की कलई भी साफ तौर पर खुल चुकी है। पूरे चुनाव अभियान के दौरान यह पहला मौका था कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने गिने चुने मात्र तीन प्रायोजित साक्षात्कार दिए हों। मोदी के पीछे खड़ी इतनी बड़ी धन संपदा को देखकर मीडिया ने इस बहती गंगा में खूब हाथ धोए। बीबीसी की एक खबर के मुताबिक चुनाव अभियान के दौरान ही भारत में लगभग एक दर्जन नए न्यूज चैनल्स खुले। जाहिर है सभी को पैसा बनाना था और बनाया भी लेकिन प्रचार युद्ध के इस महासमर में खुद को एक योद्धा के रूप में प्रस्तुत भी करना था जो बखूबी किया भी गया। प्रचार के इन पारंपरिक अस्त्रों के अतिरिक्त टीम मोदी ने सोशल मीडिया का भी जबरदस्त प्रयोग किया। संघ-भाजपा ने बाकायदा आई टी सेल बनाकर एसएमएस, ट्वीटर और फेसबुक पर अपने प्रतिबद्ध और पेड कार्यकर्ताओं को दिन रात भारत और विदेश स्थित अपने तमाम स्र्रोतों के माध्यम से प्रचार किया जो अपने आप में एक अनुपम प्रयोग था। जाहिर है इन माध्यमों के जरिये उन्हें भारत के तकनीक संपन्न नौजवानों में अपना प्रभाव और प्रभुत्व स्थापित करने में बड़ी मदद मिली। चुनाव के दिन संघ के संगठन ने तैयार हुए वातावरण को वोटों में तब्दील करके अपना ऐतिहासिक दायित्व पूरा किया।
    नेता को किसी माॅडल अथवा प्रोडक्ट की भाँति पेशकर उसके लिए वोट करने को मजबूर करने के तमाम हथकंडे अपनाए गए। उन पर से विकास की बात, रोजगार की बात करते हुए मोदी ने चुनाव प्रचार के बीचो बीच अपने स्वर बदले। विकास पुरुष को जनता की सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने में, बंगलादेशियों प्रवासियों को बाहर निकालने, पाकिस्तानी नेताओं को कांग्रेस सरकार द्वारा बिरयानी खिलाने और यहाँ तक कि अपनी पिछड़ी जाति का उलाहना देकर दलितों को आकर्षित करने जैसे तमाम अस्त्र चलाते हुए भारत की जनता ने देखा सुना, गंगा पूजन आरती जैसे टोटके करते हुए कथित लौह पुरुष को पूरे देश ने प्रचार माध्यमों के जरिए देखा जबकि निचले स्तर के संघी-भाजपाई नेताओं ने मुजफ्फरनगर में दंगा कराने में शरीक भाजपा विधायकों का खुले मंच पर स्वागत सत्कार कर अपने फासीवादी इरादों को जाहिर किया। अमित शाह द्वारा आजमगढ़ को आतंकवाद का अड्डा बताना, गिरिराज सिंह द्वारा बिहार में मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजे जाने जैसे सांप्रदायिक बयानों ने पूरे देश में चुनाव सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत करने में मदद की। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की बेलगाम जुबान ने निश्चय ही संघ और उसके इरादों को पूरा करने में मदद की। जिसके चलते चुनाव के दौरान ही असम में सांप्रदायिक दंगे हुए और दुनिया भर ने लाशों के व्यापारियों को धर्म के नाम पर लहूलुहान करते जनतंत्र के भारतीय नमूने को जी भर कर देखा।
    जाहिर है विज्ञापनों के जरिए माल बेचना विकसित देशों के समाज में एक स्थापित परंपरा है, दो डालर मूल्य के किसी उत्पाद को खरीदने से पूर्व उपभोक्ता विज्ञापित उत्पाद के ‘यूसर्स रिव्यू’ पढ़कर उत्पाद के बारे में उपभोक्ताओं/ उपयोगकर्ताओं के विचारों को जाँच परख कर ही उक्त उत्पाद को खरीदता है। भारतीय समाज में अभी यह परंपरा विकसित नहीं हुई है, लेकिन मोदी के प्रचार में उपभोक्ता बनाए गए मतदाताओं को इतना समय, समझ और संसाधनों को दिए बिना ही उन्हें मोदी ब्रांड का झुनझुना बेच दिया गया और विकल्पहीनता के अभाव में मोदी का ब्रांड भी गुजरात के एक कुख्यात वाशिंग पाउडर की तरह बिक गया जिसमें कास्टिक सोडा की मात्रा इतनी अधिक है कि बहुत से लोगों के हाथों में एलर्जी हो जाती है, कपड़ों की उम्र जो कम होती है वह नुकसान अलग।
    चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र के एक दूसरे महत्वपूर्ण छेद को भी उजागर किया है। पहली बार भाजपा को उसी मूलमंत्र का फायदा हुआ जिसके जरिए कांग्रेस ने देश में लगभग पाँच दशकों तक राज किया। कुल 31 प्रतिशत मत पाकर (17 करोड़) भाजपा की मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सबसे कम मतों की बहुमत सरकार बन गई है। 11 करोड़ मत पाकर कांग्रेस को मात्र 44 सीटें मिली और 2 करोड़    मत पाकर बहुजन समाज पार्टी सोलहवीं संसद में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। यह लोकतंत्र की विडंबना है या भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार कि विपक्षी मतों के बँटवारे का फायदा उठाकर तथाकथित अल्पमत वाले दल सवा सौ करोड़ के मुल्क पर छाती ठोककर हुकूमत करते हैं। निश्चय ही भारतीय राज्य व्यवस्था में मतों के अनुपात के अनुसार (जैसा कि कई यूरोपीय देशों में होता है) संसदीय सीटों के वितरण के विकल्प को चुनने का समय आ गया है ताकि मतदान में पड़े हर एक वोट की कीमत संसद में उसकी आवाज के रूप में पहुँचे। मिशन 272 प्रचारित करने वाली भाजपा को उनकी आशा से अधिक मिली सीटों ने उनके सीने फुला दिए हैं। विजय जुलूस को खिताब करते हुए मोदी ने धन बल के आधार पर अपने पहले भाषण में ही दस साल का समय माँगा है। घृणित पूँजी को अपने दोहन के लिए भारत में फासीवादी चेहरे को स्थापित करने के मंसूबे अब बेनकाब हो चुके हैं। गुजरात में मोदी ने अपने शासनकाल में अपनी ही मजदूर इकाई भारतीय मजदूर संघ का गला घोटकर रखा है, मोदी ने अपनी ही पार्टी के स्वदेशी आन्दोलन को गुजरात में आक्सीजन पर रखा है। चुनाव प्रचार के दौरान ही वालमार्ट ने अपने भारतीय विस्तार की खबरों से सभी आर्थिक विश्लेषकों को चैंकाया है। ये सभी ऐसे संकेत हैं जिनके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पूरे भारत पर गुजराती माॅडल का आवरण चढ़ाने की नारकीय पूँजीवादी नीतियों को थोपने के कारण ही मोदी के चुनाव पर  धनपशुओं ने अपने खाते खोले हैं। भारत की सबसे प्रबुद्ध आर्थिक और सामाजिक मामलों की ख्याति प्राप्त पत्रिका ‘इकोनाॅमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ ने अपने हालिया सम्पादकीय में बहुत सारगर्भित टिप्पणी करते हुए 2014 के चुनावों को भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी कार्पोरेट डकैती लिखा है। इस डकैती के महानायक नरेद्र मोदी हंै और वे
धनपशु ताकतें जिनकी योजनाओं को क्रमबद्ध तरीके से लागू करने में संघ और उसकी भाजपा दंडवत है। निश्चय ही अब कोई पोस्को अथवा वेदांता भारत से बाहर नहीं भगाया जाएगा, भूमि अधिग्रहण का गुजरात फार्मूला अब पूरे देश पर लागू होगा। भारत के संसाधनों पर विदेशी पूँजी अपना कब्जा पहले से बेहतर बनाएगी और जनता को देशभक्ति के सबसे बड़े पाठ यानी पड़ोसियों के साथ युद्ध जल्दी पढ़ने को मिलेंगे, पूँजीवाद ने फासीवाद का आवरण जब जब दुनिया में कहीं भी ओढ़ा है उन देशांे में भारी जन धन की बर्बादी हुई है, क्या भारत इतिहास के उसी मुहाने पर खड़ा है जहाँ से लौट कर जाने की क्षतिपूर्ति  मानव जाति को अकल्पनीय कुर्बानियाँ देकर चुकानी पड़ी हैं?      
-शमशाद इलाही ‘‘शम्स’’



रविवार, 23 मार्च 2014

फासीवाद के लक्षण



फासीवाद, जो यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जन्मा, के द्वारा मानवता को दिए गए त्रास को हमारी दुनिया आज तक नहीं भुला सकी है। फासीवाद क्रूर था, वह प्रजातंत्र को कुचलने में यकीन रखता था, वह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता था, वह राष्ट्र की शक्ति को बढ़ा.चढ़ा कर प्रस्तुत करता था, वह अति.राष्ट्रवादी था, वह अपने नेता को 'मजबूत' नेता के रूप में प्रचारित करता था और उसके आसपास एक आभामंडल का निर्माण करता था। उस दौर में जो कुछ घटाए उसे हम आज तक भुला नहीं पाए हैं और हम नहीं चाहते कि हमारी दुनिया को उस दौर से फिर कभी गुजरना पड़े। तभी से ये दो शब्द.फासिज्म और हिटलर.हमारी दैनिक शब्दावली का हिस्सा बन गए। ये हमें उस तानाशाहीपूर्ण शासन और उस क्रूर तानाशाह की याद दिलाते हैं। कई बार इन शब्दों को किसी भी तानाशाहीपूर्ण शासन या अपनी मनमानी करने वाले किसी भी व्यक्ति या नेता के लिए प्रयुक्त किया जाता है। इस राजनैतिक परिघटना के लक्षण बहुत विशिष्ट हैं और किसी व्यक्ति या शासन व्यवस्था पर हिटलर या फासीवादी का लेबल चस्पा करने से पहले हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।
इस मुद्दे पर बहस एक बार फिर इसलिए शुरू हुई है क्योंकि राहुल गांधी ने इशारों में यह कहा कि नरेन्द्र मोदी,हिटलर की तरह हैं। पलटवार करते हुए भाजपा के अरूण जेटली ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद के भारत के सिर्फ एक नेता की तुलना हिटलर से की जा सकती है और वे हैं इंदिरा गांधी, जिन्होंने देश में आपातकाल लगायाए अपने राजनैतिक विरोधियों को जेलों में ठूस दिया और प्रजातांत्रिक स्वतंत्रताओं को समाप्त कर दिया। यह सही है कि इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था। यह एक निंदनीय कदम था। यह भी सही है कि उनके आसपास के कुछ लोगों का व्यवहार तानाशाहीपूर्ण था। परंतु क्या वह फासिस्ट शासन था? क्या इंदिरा गांधी की तुलना हिटलर से की जा सकती है? कतई नहीं। हमें यह समझना होगा कि तानाशाही और एकाधिकारवादी शासन व्यवस्था के कई स्वरूप होते हैं। कई देशों में आज भी फौजी शासन है और कई में राजा.महाराजा सत्ता में हैं। परंतु फासिज्म इन सबसे बिलकुल अलग है।
यूरोप के लगभग सभी फासीवादी, प्रजातांत्रिक रास्ते से सत्ता में आए। उसके बाद उन्होंने धीरे.धीरे प्रजातंत्र का अंत कर दिया और तानाशाह बन बैठे। उन्होंने स्वयं को देश के उद्धारक के रूप में प्रस्तुत किया और अपने देश की सीमाओं का विस्तार करने की कोशिश इस बहाने से की कि उनके पड़ोसी देश, कभी न कभी उनके देश का हिस्सा थे। फासीवाद के दो अन्य मुख्य पारिभाषिक लक्षण यह हैं कि फासीवादी शासकों को उद्योगपतियों का पूर्ण समर्थन हासिल रहता है और इसके बदले उन्हें राज्य हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। दूसरे,फासीवादी शासक दुष्प्रचार और अन्य माध्यमों से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं। उन्हें राष्ट्रविरोधी और देश के लिए खतरा बताया जाता है। देश की सारी समस्याओं के लिए अल्पसंख्यकों को दोषी ठहराया जाता है। इसके बाद शुरू होता है अल्पसंख्यकों का कत्लेआम, जिसे समाज के बड़े वर्ग का मूक और कब जब मुखर समर्थन प्राप्त रहता है। यह फासीवाद साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद पर आधारित होता हैए जिसे नस्ल या धर्म के आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराया जाता है ;हिटलर ने इसके लिए नस्ल का उपयोग किया था।
विदेशी शासन से मुक्त हुए देशों में समाज के सामंती वर्गों की विचारधारा को मध्यम वर्ग व उच्च जातियों द्वारा अपना लिए जाने से फासीवाद से मिलती.जुलती ताकतें उभरती हैं। यही लक्षण राजनैतिक कट्टरवाद के भी हैं, जहां पूरे समाज पर धर्म की संकीर्ण व्याख्या लाद दी जाती है और जो लोग उससे सहमत नहीं होते,उनके साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है। कई इस्लामिक देशों में इस तरह का कट्टरवाद है। भारत में भी इस्लाम के नाम पर कुछ कट्टरवादी.फासीवादी ताकतों का उदय हुआ है और वे धर्म के नाम पर राजनीति कर रही हैं। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति के फासीवाद में बदल जाने का खतरा है। नेहरू इस आशंका से अच्छी तरह वाकिफ थे। उनके द्वारा दी गई चेतावनी आज भी एकदम उपयुक्त जान पड़ती है। उनके अनुसार, मुस्लिम साम्प्रदायिकता उतनी ही खराब है जितनी कि हिन्दू साम्प्रदायिकता। यह भी हो सकता है कि मुसलमानों में साम्प्रदायिकता की भावना हिन्दुओं की तुलना में कहीं अधिक हो। परंतु मुस्लिम साम्प्रदायिकता, भारतीय पर प्रभुत्व जमाकर यहां फासीवाद नहीं ला सकती। यह केवल हिन्दू साम्प्रदायिकता कर सकती है ;फ्रंट लाईन १ जनवरी १९९३ में उद्धृत।
भारत में फासीवाद.कट्टरतावाद का बीज पड़ा सन् १८८० के दशक में हिंदू और मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति के उदय के साथ। मुस्लिम साम्प्रदायिक राजनीति ने अलग राह पकड़ ली और उसने पाकिस्तान की जनता को असंख्य दुःख दिए। भारत पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। हिन्दू साम्प्रदायिक राजनीति भी साथ में ही उभरी परंतु उसने फासीवादी रंग अख्तियार कर लिया। इस फासीवाद की रूपरेखा आरएसएस के प्रमुख विचारक एम एस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक' व्ही ऑर अवर नेशनहुड' में प्रस्तुत की। इस पुस्तक में जर्मनी के नाजी फासीवाद से बहुत कुछ लिया गया है और नाजीवाद के सिद्धांतों की जमकर प्रशंसा की गई है। यह पुस्तक नस्लीय गर्व को उचित ठहराती है और'दूसरे' ;इस मामले में गैर.हिन्दू से निपटने में क्रूर तरीकों के इस्तेमाल की वकालत करती है। पुस्तक, हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति के रूप में स्वीकार करने की वकालत करती है और आमजनों का आह्वान करती है कि वे हिन्दू नस्ल और हिन्दू राष्ट्र का महिमामंडन करें, 'अन्यों' को हिन्दुओं के अधीन मानें और 'अन्यों' के नागरिक अधिकारों को सीमित करें, जैसा कि जर्मन फासीवादियों ने हिटलर के नेतृत्व में यहूदियों के साथ किया था। इसकी प्रशंसा करते हुए गोलवलकर लिखते हैं, राष्ट्र और संस्कृति की शुचिता बनाए रखने के लिए जर्मनी ने अपने देश को यहूदी नस्ल से मुक्त कर दिया। यह राष्ट्रीय गौरव का शानदार प्रकटीकरण था। जर्मनी ने यह भी दिखाया कि किस तरह ऐसी नस्लों या संस्कृतियों, जिनमें गहरे तक अंतर हैं, को कभी एक नहीं किया जा सकता। इससे हिंदुस्तान को सीखना और लाभ उठाना चाहिए' ;व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाईन्ड, पृष्ठ २७,नागपुर १९३८।
फासिज्म के मूल में है एक ऐसी सामूहिक.सामाजिक सोच का निर्माण,जिसके निशाने पर 'दूसरा' समुदाय हो। यही १९८४ की भयावह सिक्ख.विरोधी हिंसा को मुस्लिम.विरोधी व ईसाई.विरोधी हिंसा से अलग करता है। मुसलमानों और ईसाईयों का जानते.बूझते दानवीकरण कर दिया गया है और उन्हें सामान्यजनों की सोच में 'दूसरा' बना दिया गया है। यही कारण है कि उनके खिलाफ नियमित तौर पर होने वाली हिंसा को समाज की मौन स्वीकृति प्राप्त रहती है।
आरएसएस की विचारधारा, फासीवाद का भारतीय संस्करण है। इसकी नींव में हैं अतिराष्ट्रवाद, 'दूसरे' ;मुसलमान व ईसाई व अखण्ड भारत की परिकल्पना और भारतीय राष्ट्रवाद की जगह हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति वफादारी। महात्मा गांधी ने आरएसएस के इन लक्षणों को बहुत पहले ताड़ लिया था। उन्होंने संघ को एकाधिकारवादी दृष्टिकोण वाला साम्प्रदायिक संगठन बताया था। मोदी के उदय के पहले तक हम सब को यह लगता था कि आरएसएस का आंदोलन फासीवादी इसलिए नहीं बन सकता क्योंकि उसके पास कोई चमत्कारिक नेता नहीं है। फासीवाद एक चमत्कारिक नेता के बिना नहीं पनप सकता। सन् २००२ के बाद से मोदी एक ऐसे चमत्कारिक नेता के रूप में उभरे हैं और उन्हें चमत्कारिक नेता का स्वरूप देने के लिए हर संभव प्रयास किया गया है। मोदी की फासीवादी सोच, गंभीर अध्येताओं और समाज विज्ञानियों से तब भी नहीं छुपी थी जब वे बड़े नेता नहीं थे। गुजरात कत्लेआम के बहुत पहले, आशीष नंदी ने लिखा था' एक दशक से भी ज्यादा पहले' जब मोदी आरएसएस के छोटे.मोटे प्रचारक थे व बीजेपी में अपना स्थान बनाने के लिए प्रयासरत थे' उस समय मुझे उनका साक्षात्कार लेने का मौका मिला उनसे मुलाकात के बाद मेरे मन में कोई संदेह नहीं रह गया कि वे एक विशुद्ध फासीवादी हैं। मैं 'फासीवाद'शब्द को गाली की तरह प्रयुक्त नहीं करता। मेरी दृष्टि में वह एक बीमारी हैए जिसमें संबंधित व्यक्ति की विचारधारा के अलावा उसके व्यक्तित्व और उसके प्रेरणास्त्रोतों की भी भूमिका होती है। वे ;मोदी अति शुद्धतावादी हैं, उनके मन में भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं है और वे हिंसा में विश्वास करते हैं.वे जुनूनी और अर्द्धविक्षिप्त हैं। मुझे अभी भी याद है कि उन्होंने किस तरह बड़ी नपीतुली भाषा में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि भारत के विरूद्ध सारी दुनिया षडयंत्र कर रही है और किस तरह हर मुसलमान देशद्रोही और संभावित आतंकवादी है। इस साक्षात्कार ने मुझे अंदर तक हिला दिया और इसके बाद मैंने याज्ञनिक से कहा कि अपने जीवन में पहली बार मैं ऐसे व्यक्ति से मिला हूं जो पुस्तकों में दी गई फासीवादी की परिभाषा पर एकदम फिट बैठता है। ये संभावित हत्यारा है। बल्कि ये भविष्य में कत्लेआम भी कर सकता है।
इसी तरह, जब अप्रैल २०१० में जर्मनी का एक प्रतिनिधिमण्डल गुजरात की यात्रा पर आया तो उसके एक सदस्य ने कहा कि उसे यह देखकर बहुत धक्का लगा कि हिटलर के अधीन जर्मनी और गुजरात के अधीन मोदी में कितनी समानताएं हैं। यहां यह बताना समीचीन होगा कि गुजरात की स्कूली पाठ्यपुस्तकों में हिटलर को एक महान राष्ट्रवादी बताया गया है। गुजरात, हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला रहा है। मोदी की प्रचार मशीनरी चाहे कुछ भी कहे, सब यह जानते हैं कि २००२ के कत्लेआम के बाद सेए राज्य में धार्मिक अल्पसंख्यकों के हाल बेहाल हैं।
क्या हम कह सकते हैं कि फासीवाद केवल यूरोप तक सीमित है और वह भारत में नहीं आ सकता? मूलतः फासीवाद एक ऐसी विचारधारा है, जिसका जन्म समाज के उन तबको में होता है जो प्रजातंत्र के खिलाफ हैं और जो काल्पनिक भयों का निर्माण कर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को खत्म कर देना चाहते हैं और जो यह मानते हैं कि चीजों को ठीक करने के लिए एक मजबूत नेता की आवश्यकता है। फासीवादए अतिराष्ट्रवाद पर जोर देता है और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है। पड़ोसी देशों के प्रति उसका रवैया आक्रामक होता है। इस अर्थ में फासीवाद किसी भी देश पर छा सकता है.किसी भी ऐसे देश परए जहां सामाजिक आंदोलन या तो कमजोर हैं या बंटे हुए हैं या फासीवाद के खतरे के प्रति जागरूक नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भारत में इतनी विविधताएं हैं कि यहां फासीवाद के लिए कोई जगह नहीं है। यह एक अच्छा विचार है और शायद इसी कारण अब तक भारत में फासीवादी ताकतें नियंत्रण में रही हैं। परंतु समय के साथ कई बार विविधताएं समाप्त हो जाती हैं और सब ओर एक सी प्रवृतियां उभरने लगती हैं। इसलिए यह मानना अनुचित होगा कि भारत में फासीवाद कभी आ ही नहीं सकता, विशेषकर इस तथ्य के प्रकाश में कि इस तरह की प्रवृत्तियों को भारत में भारी समर्थन मिल रहा है। फासीवादी ताकतों की ठीक.ठीक पहचान और प्रजातांत्रिक सिद्धांतों व बहुवाद के मूल्यों की रक्षा के लिए सम्मलित प्रयास ही हमारे प्रजातंत्र को बचा सकते हैं।

-राम पुनियानी,
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