इंकलाब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
इंकलाब लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

नशेमन से धुआँ उठता है तुम कहते हो बादल है

 हालिया पार्लियामानी इन्तखाबात से पहले मुस्लिम तंजीमों और इदारों के सरबराहान में बड़ी इजतराबी कैफियत देखने को मिली थी। हर जानिब से ये आवाज बुलन्द की गई कि किसी सूरत बी0जे0पी0 और मोदी को बरसरे एक्तदार आने से रोका जाए। इस अन्दाज से मोदी के खिलाफ नारे बुलन्द किए गए कि हिन्दू वोटरों का एक बड़ा तबका खामोशी के साथ मुत्तहिद हो गया और मुस्लिम वोटर मुन्तसिर होकर कई खानों में बँट गए। नतीजा यह हुआ कि बी0जे0पी0 अक्सरीयत से जीत गई और मोदी सिर्फ हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डालकर बाआसानी वजीर आजम बन गए। ऐसे लोग जो हर हाल में किसी भी हुकूमत से करीब तर हो जाना चाहते हैं वह अपनी सियासी मन्तिक को फेल होता देख कर परेशान व बेचैन हो गए, अब खौफ व डर की वजह से उजलत में वजीर आजम मोदी को अपनी हिमायत की खबर पहुँचाना चाहते हैं। चूँकि इन लोगों ने यह अन्दाजा अपने तौर पर कर लिया है कि आइन्दा दस साल तक मोदी एक्तदार उज़मा पर काबिज रहेंगे। गालिबन यही सोच मुस्लिम इदारों के सरबराहान को भी खुद सुपुर्दगी पर मजबूर कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि न किसी ने इनकी हिमायत तलब की है न अब किसी को हुकूमत साजी के लिए मुसलमानों की हिमायत की जरूरत है। रजाकाराना तौर पर अपनी जानिब से हिमायत का एलान किस बात का पैगाम देता है? बेमहल बे मौका और बेजरूरत बातों से सिर्फ कीमत ही नहीं घटती बल्कि बचा बचाया वकार भी बाकी नहीं रहता और इसको हलकापन भी कहा जाता है।
      वजीर आजम मोदी ने अपने इलेक्शन के तकरीरों में और टी0वी0 चैनलों को इंटरव्यू देते हुए बहुत सारे नेकात की तरफ इशारा किया है और कुछ बातें मुस्लिम अवाम के तईं खुल कर की हैं। अभी तो मोदी की ताजपोशी को एक माह भी नहीं गुजरा हम अभी से उतावले होकर खुद को इनके हवाले कर दें, ये कहाँ की अकलमंदी है। इसे खौफ या लालच ही तसव्वुर किया जाएगा। गलती दर गलती यह सियासी सूझ बूझ हरगिज नहीं है। हम हिन्दुस्तानी शहरी हैं। हमारे हुकूक बराबर के हैं। हम किसी के मरहूनेमिन्नत नहीं हैं। हमारे हुकूक की अदायगी में अगर जानिबदारी बरती गई तो हम खामोश नहीं रहेंगे। दस्तूर हिन्द ने हमें जो मुराआत दी हैं इन में अगर किसी तरह की नाइंसाफी की गई तो हमें अपने हुकूक को वागुजार कराने के जायज तरीकों से कोई ताकत रोक नहीं सकती और खुद मोदी ने कहा है कि मैं किसी मखसूस कौम या फिरका का नहीं बल्कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का चैकीदार और सेवक हूँ। मुझसे किसी को डरने की जरूरत नहीं है। मोदी से कौन डरता है। मुसलमानों में गुजरात के फसाद का गुस्सा जरूर बाकी है। अगर उन्हें इस गुस्से को खत्म करना है तो अपनी गैर जानिबदारी का सबूत पेश करने के लिए ही मसायल हल करें।
    चाहिए तो ये था कि हम अभी खामोश रहकर हुकूमत के रवैये का जायजा लेते क्योंकि पूरा हिन्दुस्तान गुजरात नहीं है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को और इनके मफादात को नजरअंदाज करना या इन पर जबर जुल्म करना कोई आसान बात नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इसके बड़े भयानक नतीजे  बरामद होंगे, हमें मोदी से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी न है। बात सिर्फ यह है कि गुजरात में मुसलमानों का जो कत्लेआम हुआ उस वक्त वह खुद वजीर आला थे। इनकी मौजूदगी में जो हुआ इसको रोकना इनका फर्ज मनसवी था जिसे इन्होंने नहीं निभाया। न मुजरिमों को इन्होंने कैफरे किरदार तक पहुँचाया। यही शिकायत और इसी कारकिर्दगी का जख्म आज भी हरा है। इसके बावजूद हमारी बेहिसी और चापलूसी की इन्तिहा देखिए कि मोदी साहब को और इनके करीबी लोगों को जामिया मिलिया और एक दीगर मुस्लिम इदारे में दावत दी जा चुकी है। यह इदारा एक कल्चरल सेन्टर है जिसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है वहाँ के जिम्मेदारों में एक होड़ लग गई है कि कैसे मोदी तक पहुँचा जाए। इनके करीबी मुअतमिद हैं जो गुजरात से आकर आजकल दिल्ली में कयाम पजीर हंै। जामिया मिलिया में इनको दावत दी जा चुकी है जबकि इसके बरअक्स मुजफ्फरनगर फसाद के हीरो को वजीर बना दिया गया है। पुणे में एक मुसलमान इंजीनियर को टोपी और दाढ़ी के जुर्म में कत्ल किया गया, अभी तक इस पर खामोशी है कि हिन्दू राष्ट्र सेना पर कब पाबन्दी आयद होगी और कब तक इसको बेलगाम छोड़ा जाएगा। एक तरफ यह एलान है कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ अवाम के सेवक हैं दूसरी तरफ अमल यह है कि बेगुनाह मुसलमानों को दसियों साल तक जेल में बन्द करके स्कीम बनाने वाला आई0बी0 अफसर अजीत देवल को एन0एस0ए0 बनाया जाता है। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद शहादत के वक्त कल्याण सिंह का होम सेक्रेटरी जो बाद में टी0आई0आई0 का चेयरमैन बना, गैर कानूनी तरीके से कैबिनेट सेक्रेटरी आर्डिनेन्स के जरिये बनाया जाता है। इससे हुकूमत की करनी का तजाद और जहनियत का पता चलता है।
    हमारी जिन्दगी और मौत का मालिक रज्जाक सिर्फ अल्लाह है, यही हमारा ईमान है। ईमान व यकीन को मजबूत करके अपने मौक्किफ पर इस्तकलाल के साथ कायम रहना एक मोमिन की शान है। अगर हमारे साथ अच्छा रवैया रहा और हमारे मजहबी उमूर में बेजा मदाखिलत नहीं की गयी। हमारे चैन सुकून की जिन्दगी में रखनान्दाजी नहीं की गई तो खामख्वाह मुखालिफत का हमें शौक नहीं। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ 60 फीसदी हिन्दू आज भी ऐसे हैं जो खुद को सेक्यूलर कहते हैं। इन्हें ये बताना चाहिए कि 1947 में हमने हिन्दुस्तान के इक्तिदार को यह कहकर इनके हवाले कर दिया था कि अब हम हिन्दुस्तान की हुकूमत आपके जिम्मे करते हैं आप हुकूमत कीजिए हम आपके पीछे हैं। जो हालत उस वक्त हमारी थी वही हालत आज 2014 में हिन्दुस्तान के सेक्यूलर हिन्दुओं की है। अब ये मुल्क गांधी, लोहिया, या अम्बेडकर की सोच पर चलेगा या फिर गोलवलकर या सावरकर के ख्वाब की ताबीर पूरी करेगा। यह एक लमहा फिफ्र मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सेकुलर हिन्दुओं के लिए भी है। इन्हें चाहिए कि वे आपस में इत्तिहाद पैदा करें और सेकुलर पार्टियों के लीडरों को चाहिए गुजिश्ता सियासी रंजिशों को भूलकर करीब आएँ और मौजूदा सियासी तब्दीलियों का मुकाबला करने के लिए अवाम का एतमाद हासिल करें। तभी कोई बेहतर रास्ता निकल सकता है और हुकूमत को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए एक दबाव कायम किया जा सकता है। वरना वही होगा जो आजादी के बाद से अब तक होता आ रहा है। वादा और मीठी बातों से खुश होकर और भरोसा करने की वजह से गुजिश्ता साठ वर्षों से हमारे जज्बात और एतमाद के साथ मुसलसल खेला जा रहा है। एक अरसा दराज तक रामविलास पासवान मुसलमानों की नजर में खुद को सेकुलर साबित करने के लिए बी0जे0पी0 से कसदन दूर रहे। आज अपने सियासी मफादात के हुसूल के लिए इन्होंने बी0जे0पी0 का दामन पकड़ा और मुसलमानों को पस्त हिम्मत करने के लिए इनके मुस्लिम नुमाइन्दे मुसलमानों की मजलिस में जाकर तकरीर करते हैं और अपने मतालबात से बाज रहने की तल्क़ीन करते हैं ऐसे बहुत सारे लोग मुस्लिम नुमाइन्दा बनकर खैरख्वाही की आड़ में हुकूमत के मन्जूरे नजर होने की गरज से मुसलमानों में दाखिल होकर दहशत पैदा करने की कोशिश में मुन्हमिक हंै। ऐसे लोग कौम व मिल्लत के भी खैरख्वाह नहीं हो सकते। इनसे होशियार रहने की अशद जरूरत है। आइन्दा पाँच बरसों में सियासत गिरगिट की तरह न जाने कितने रंग बदलेगी। अगर हमारे साथ बदसलूकी नहीं की गई तो हमसे ज्यादा वफादार दुनिया की कोई कौम नहीं है। पन्द्रह सौ साला तारीख इस सच्चाई की चश्मदीद गवाह है, इस पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। किसी को ज़ाती तौर पर हमारी हिमायत वफादारी का मुशाहिदा करना है तो हमारे जुमला मसायल को हल करे और फिर देखे कि हम किस कदर जां निशार हैं। अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। अमली इकदामात ही जख्म पर मरहम का काम कर सकते हैं। इसलिए अभी वक्त हमारे सब्र व तहम्मुल का मोत्कादी है।
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं।
आईना-जमीर हाशमी
लो उजागर हो गया पटना धमाकों का भी सच
कार्यवाही थी वहाँ भी सब उसूलांे के बगैर।
ला न पाए छः महीने में भी कोई फर्दे जुर्म
बेगुनाहों पर थी तोहमत फिर सबूतों के बगैर।।

 -मुहम्मद अदीब
मजमून निगार
(राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं। )
मोबाइल: 09868181945
साभार-इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

मिशन 2014 चूर चूर हो जाएगा


बाराबंकी। निमेष कमीशन ने जिला आजमगढ़ के थाना सराय मीर जाकर 7जुलाई 2009 को उस घटना स्थल की जांच की जहां से अभियुक्त तारिक कासमी को उठाने का आरोप तारिक कासमी और उसके घर वालों ने एस0टी0एफ0 पर लगाया था। इसी तरह कमीशन ने 6 जुलाई 2009 को जिला जौनपुर  के थाना मडि़याहू के तहत उस बाजार का भी मुआयना किया जहां से खालिद मुजाहिद को उठाने का आरोप खालिद मुजाहिद के घरवाले एस0टी0एफ0 पर लगा रहे है। दोनों घटना स्थलों से वहां के लोगो से पूछताछ की।
तारिक कासमी को गिरफ्तार करने की सनद कमीशन को जिन लोगो की गवाही से मिली उनमें कवंलधारी सिंह निवासी रानी की सरायं, हफीज निवासी रानी की सरायं रामायन निवासी रानी की सरायं, शाहआलम निवासी रानी की सरायं ,शमशाद अहमद एडवोकेट निवासी रानी की सरायं, तारिक शमीम निवासी रानी की सरायं, मौलवी असलम (तारिक कासमी के ससुर) अब्दुल शमीम, अरशद अब्दुल रहमान, मुहम्मद हारून, सर्फुद्दीन, शौकत अली, मुहम्मद आजम के नाम मुख्य रूप से है। उपरोक्त सभी लोगो ने कमीशन को ये बताया कि इन्होने 12 दिसम्बर 2007 के दिन या तो खुद अपनी आँखो से तारिक कासमी को थाना रानी की सरायं चेक पोस्ट के करीब दोपहर 12 बजे लखनऊ बलिया रोड पर घटना स्थल  मुहम्मदपुर से एक टाटा सूमो पर कुछ लागो ने जबरदस्ती उसको मोटरसाइकिल से उठाकर ले जाते देखा था और दो लोग उनकी मोटरसाइकिल नम्बर यू0पी0 50एन2943 पर बैठकर बनारस की तरफ चले गए थे उन्होने किसी न किसी से सुना था कि एस0टी0एफ0 के लोग उठा ले गए है।
             इसी तरह खालिद मुजाहिद को 12दिसम्बर 2008 को गिरफ्तार करने की बात जांच कमीशन को जिन लोगो से मिली उसमें कमला प्रसाद साहू, मुहम्मद मुस्लिम, राजेन्द्र प्रसाद, राजबली,फिरोज अहमद, राजेश कुमार, सुनील कुमार, सन्तोष कुमार, मन्नू चाट वाला( जिसकी दुकान से खालिद मुजाहिद को एस0टी0एफ0 के जरिए उठाए जाने की बात कही जा रही है),महताब आलम,चन्द्र मोहन यादव, इम्तियाज अहमद,निज़ामुद्दीन,फखरेआलम,जुल्फिकार,शकील अहमद, सईद आलम,जहीर आलम फलाही और मुहम्मद अनस, के नाम शामिल है। इसके अलावा सहाफी मुहम्मद  आरिफ , जो कि हिन्दी दैनिक अमर उजाला के प्रतिनिधि है और गुलाब चन्द केसरी, जोकि दैनिक हिन्दुस्तान के तहसील प्रतिनिधि है के भी बयान कमीशन ने दर्ज किए है।   
                   दोनो ही अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी की जांच गवाहों के बयान से कमीशन को मिली। निमेष कमीशन को इस  बात के भी प्रमाण मिले कि मदरसा जामिते अलसलहात वाक्या कस्बा व थाना मडि़याहू जहां खालिद मुजाहिद पढ़ाता था इसमें 12दिसम्बर को आखिरी बार इसने पढ़ाया था और मदरसा के रिकार्ड में इसकी गैर हाजिरी इस दिन के बाद से लिखी हुई है। फिर दोनो ही अभियुक्त के घर एस0टी0एफ0 ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर 18 दिसम्बर की दरमियानी शब को छापा मारकर तलाशी ली और इनके घर मंे मौजूद मज़हबी किताबें व दीगर सामान अपने कब्जे में ले लिए, जिसका जिकर स्थानीय पुलिस ने अपने रोजनामचे मंे भी किया है। साथ ही दोनो को अपनी हिरासत में रखकर इनसे सादे कागज पर हस्ताक्षर कराने  और उनके उंगलियों के निशान अपनी हिरासत में लगवाने के भी प्रमाण कमीशन को मिले। कमीशन ने दोनो ही अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाबत 17दिसम्बर 2007,18दिसम्बर 2007, 20दिसम्बर 2007,21दिसम्बर 2007,22दिसम्बर2007 को बातरतीब अमर उजाला,हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण हिन्दी अख़बार में छपी खबरो का भी जायजा लिया। कमीशन ने सर्किल आफीसर मडि़याहू के इस जवाब का भी मुआयना किया जिन्होने अभियुक्त खालिद मुजाहिद के चचा जहीर आलम फलाही के सूचना अधिकार के तहत मांगी थी और जिसमंे सी0ओ0ने इस बात को स्वीकार किया है कि 12दिसम्बर 2007 की शाम साढ़े छःबजे एस0टी0एफ0ने खालिद मुजाहिद को मडि़याहू बाजार से गिरफ्तार किया है, लेकिन इसके मुतालिक जी0डी0की कापी इन्होने ये कहकर देने से इन्कार किया है कि इससे जांच में गड़बड़ी होने की खतरा हो जाएगा।
                   अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद के अधिवक्ता मुहम्मद शुएब और रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि जस्टिस आर0डी0निमेष ने इस बात पर सवाल खड़ा किया था कि जब तारिक कासमी को गिरफ्तार किए जाने की खबरें कई हिन्दी दैनिक में छपी हुई थी तो पुलिस या सरकार ने इन खबरों की जांच की जहमत क्यों नही की। इसी तरह तारिक कासमी के दादा जहीर अली के जरिए जब स्थानीय थाना रानी की सरायं को तारिक की गुमशुदगी की सूचना दी गयी तो फिर इसने इसको नज़रअन्दाज क्यों किया? इसके अलावा इस बात पर सवालिया निशान खड़ा किया है कि जब तारिक कासमी के दादा के जरिए पुलिस को दी गयी तहरीर में ये कहा गया कि इसके पास मौजूद मोबाइल नम्बर 9450047342 से जब तारिक कासमी के घर वालों ने बातचीत कायम करने की कोशिश की तो वह कभी चालू हालत में मिलता रिंग जाती, लेकिन उठता नही और कभी बन्द हो जाता, लेकिन पुलिस ने इस बात को जानबूझकर कर नज़र अन्दाज़ किया क्योंकि हकीकत तो पुलिस को पता ही थी कि तारिक कासमी  व इसका मोबाइल एस0टी0एफ0 के कब्जे में है। इसी तरह खालिद मुजाहिद के टाटा सूमो गाड़ी में मडि़याहू बाजार से मन्नू चाट वाले की दुकान से उठाए जाने की ख़बर 17दिसम्बर 2007 को सभी समाचार पत्रों में छपी, लेकिन पुलिस और सरकार ने उस पर कोई कार्यवायी नहीं की फिर 22दिसम्बर 2007 के दिन जिस दिन एस0टी0एफ0 ने दोनो अभियुक्तों को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार  करना बताया, को जौनपुर से ख़बर दैनिक जागरण समाचार पत्र में छपी कि एस0टी0एफ0 के जरिए 12दिसम्बर को मडि़याहू बाजार से उठाए गए खालिद मुजाहिद पर आई0बी0 की निगाह लगभग छः माह से थी। लोगो के मुताबिक इस ख़बर का वजूद कैसे हुआ और जब हुआ तो फिर सरकार ने इस ख़बर की जांच करने की कोशिश क्यों नही की।
                   समाजवादी सरकार के ऊपर जब मुस्लिम समाज से जोर बढ़ाया कि इसने चुनाव के समय जो वादा आतंकवाद के झूठे आरोपो में कैद मुस्लिम नवजवानों की रिहाई की बात की थी। उसे वह कब पूरा करेगी? तो अक्टूबर के पहले सप्ताह मंे अखिलेश यादव सरकार ने बाराबंकी, लखनऊ,फैजाबाद, और गोरखपुर जिला अधिकारी से अभियुक्तो के मुकदमें के बारे में जानकारी तलब की। रिपोर्ट में मुकदमें का नम्बर, धाराएं, अदालत का नाम अभियुक्तो के नाम मुकदमे की प्रकृति प्रथम सूचना रिपोर्ट के साथ मेडिकल रिपोर्ट,केस डायरी, में मौजूद सबूतो की छानबीन जो अभियोजन अधिवक्ताओं ने किया हो मुकदमे की जानकारी मांगी। मुकदमा वापसी के बारे में एस0पी0की राय व जिला अधिकारी की राय मांगी जो कि सभी जिलो से रिपोर्ट भेज दी गयी है। रिपोर्ट में क्या लिखा गया है यह तो बाद की बात है लेकिन आमतौर पर अधिकारियों की तरफ से अभियुक्तो की रिहाई की रिपोर्ट दुश्वारियां पैदा करके भेज दी जाती है। लेकिन रिहाई की बात असल में जिम्मेदारी सरकार के ही पास होती है। सी-आर0सी0पी0 की धारा 321 के तहत किसी भी अभियुक्त के खिलाफ अदालत में जारी केस की वापसी के अधिकार अदालत के पास मौजूद होतेे है। अभियुक्त के केस की वापसी के लिए पहले अधिवक्ता या सरकारी अधिवक्ता अदालत से प्रार्थना करेगा लेकिन वह यह काम अदालत का फैसला आने से कबूल ही कर सकता है मगर वर्ष 1991 में उ0प्र0 सरकार ने इसमें कुछ तब्दीली की जिससे सरकार ने अपने पास यह अधिकार ले लिया। अब सरकार जब भी चाहे और जिस अभियुक्त को चाहे रिहाई कर सकता है।ं जाहिर है कि सरकार की मंशा किसी की भी रिहाई करने की है तो पुलिस और न ही अभियोजन या अधिवक्ता कोई दखल नही दे सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने भी मुकदमा वापसी के बारे में अपनी राय कई मुकदमें में दी है । इसके मुताबिक दिल्ली  सरकार बनाम प्रीत पब्लिक स्कूल और राहुल अग्रवाल बनाम राकेश जैन 34(1998)एससी 910 एआईआर2005, एस0के0शुक्ला बनाम उ0प्र0 सरकार एआईआर2006एससी413, के केसो में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय देते हुए कही है कि मुकदमे की वापसी लेने के लिए सरकार निम्न बातो पर स्वतन्त्र है।  1-अमन के लिए 2-जनता के इंसाफ के लिए 3-क्षेत्र की सुरक्षा के लिए4-किसी गैर जरूरी बेकार मुकदमे के लिए 5-शान्ति व्यवस्था के लिए 6-पब्लिक पालिसी के लिए 7-समाज के सद्भाव के लिए 8-गैर जरूरी सरकारी खर्च के लिए 9-मुकदमा जारी रखने की सूरत में अभियुक्त के अधिकार में होने वाली नाइंसाफी के लिए और इसी तरह के कई बातो के आधार पर सरकार केस वापस ले सकती है। जाहिर है कि अखिलेश सरकार के पास अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद के केस की वापसी के लिए कई कानून मौजूद है जिन पर अमल करके वह इन बेकसूरों को इंसाफ दिला सकती है और राज्य में एक के बाद एक हो रहे साम्प्रदायिक दंगो के सबब वह खो चुकी अपना वजूद वह फिर से पा सकती है वरना फिर उसका मिशन 2014 चूर चूर हो जाएगा।
-मुहम्मद तारिक खान

     अनुवादक -नीरज  वर्मा 
        (इंकलाब से साभार)


बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-3


बाराबंकी। अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को 24 दिसम्बर लखनऊ जेल पहंचाया गया जहां मौजूद एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके पुलिस ने 9 दिन की रिमाण्ड हासिल करने के बाद अभियुक्तो पर जुल्म ढाए गए और सारी हदे पार कर दी गयी। उन्हे पुलिस की तरफ से सरकारी गवाह बनाने की भी पेशकश की गयी। इसके बाद दोनो अभियुक्तो को फैजाबाद जेल ले जाया गया जहां 8 जनवरी को मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में पुलिस ने रिमाण्ड हासिल किया और एक बार फिर अभियुक्तो पर जुल्म ढाने का सिलसिला चल पड़ा। कानून के रखवालो के जुल्म ढाने के बाद इंसाफ के घर मंे इंसाफ पाने में भी काफी दिक्कतो ं का सामना करना पड़ा। एक मौके पर तो अभियुक्तों के वकील को भी मारा पीटा गया। इसके साथ साथ पुलिस इन्हे रिमाण्ड हासिल करने के बाद गोमती नगर के एक मकान मंे ले गयी जहां उनके ऊपर बेइन्तिहा जुल्म ढाए गए सोने तक का मौका नही दिया गया, टांगो को चीरा जाता था, बाल उखाड़े जाते थे, इनके अजू तनासिल (वृषण) को डोरी से बांध कर इसमें वजन लटका दिया जाता था जिससे इन्हे बहुत अधिक तकलीफ होती थी तथा इनके मुँह में जबरन शराब उड़ेली जाती थी पेशाब पीने को दिया जाता था। उनके पैखाने के मुहाने में पेट्रोल डाला जाता था जिससे इन्हें असहनीय दर्द होता था। इन्हे सुअर का गोश्त खिलाया जाता था कड़ाके की ठण्ड में बर्फ की सिल्लियो पर लेटाया जाता था, करन्ट के झटके दिए जाते थे। इसी दौरान हैदराबाद,राजस्थान,गुजरात,मुम्बई, बंगाल, दिल्ली और कई और राज्यो की पुलिस पूछताछ करने इनके पास आती थी।इनसे एस0टी0एफ0 ने रटा रटाया बयान याद करवाया। एक बार राजस्थान और दिल्ली की पुलिस के सामने सही बयान दे दिया यह सोचकर कि ये उ0प्र0 की पुलिस नही है सच बता देंगे तो मुझे यह लोग छोड़ देंगे लेकिन सही बयान देने पर उनके ऊपर और अधिक जुल्म ढाने शुरू हो गए। दोनो अभियुक्तो ने अदालत को दिए गए बयान में कहा है कि 17 जनवरी को एक बैटरी जिस पर कुछ चिकनाहट लगा हुआ था इनके हाथ में पकड़वायी गयी इनके हाथ और पैरो के निशान लिए गए और सादे कागज पर इनके हाथ व पैर के निशान लिए गए। पुलिस अधिकारी निशान लेते समय आपस में बात कर रहे थे कि ऐसे सबूत तैयार करो कि इन्हे फांसी के फन्दे तक ले जाने के लिए काफी हों।दोनो ही अभियुक्तो ने बताया कि पुलिस इन्हे सरकारी गवाह बनाने के लिए कह रही थी किन्तु इन्होने सरकारी गवाह बनने से मना कर दिया। इनकी कानूनी पैरवी के लिए अधिवक्ता पहले आगे नही आए और फिर जब लखनऊ के मुहम्मद शुएब एडवोकेट ने हिम्म्त दिखायी तो इन्हे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बाराबंकी सिविल कोर्ट में जब वह पहली बार आए तो उस समय जिला बार के महामंत्री प्रदीप सिंह ने भी शुएब एडवोकेट को यह सलाह दी कि वह आतंकवाद के आरोप में निरूद्ध अभियुक्तो की पैरवी न करे वरना उनकी सुरक्षा नही कर पाएंगे। माहौल खराब देखकर शुएब एडवोकेट वापस लखनऊ अपने घर चले गए, लेकिन वहां से उन्होने इलाहाबाद के मुख्य न्यायाधीश शिकायत पत्र भेजकर कहा कि अधिवक्ताओं द्वारा उन्हें धमकी दी गयी है। उस समय जिला जज पीयूष कुमार से रिपोर्ट तलब कर ली जिन्होने सरदार बेन्त सिंह और प्रदीप सिंह समेत कई अधिवक्ताओं को नोटिस भेजकर इनका बयान दर्ज कराया गया। अपने खिलाफ हाईकोर्ट का सख्त कार्यवायी देखकर अधिवक्ताओं के तेवर ढीले पड़ गए। इसी समय धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के तेजतर्रार अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने खुद अभियुक्तो की पैरवी करने की पहल की जिसे इन्होने कबूल कर लिया जिसके नतीजे में अभियुक्तो की कानूनी पैरवी की शुरूआत हो सकी। इस तरह अभियुक्तो तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को न्याय के मंदिर में भी अन्याय का दर्द सहना पड़ा। जबकि कानून यह कहता है कि जब तक अदालत के सामने इसका अपराध साबित न हो जाए तब तक वह निर्दोष है। लेकिन अभियुक्तो की बदकिस्मती देखिए कि कानून की रखवाली करने वाले न्याय के मंदिर में भी इन अधिवक्ताओें के दंगा फसाद का  रवैया का सामना करना पड़ा जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कत्ल के आरोपी नाथूराम गोडसे के घिनौने अपराध की पैरवी करने पहली कतार में खड़े थे। 
खालिद 

तारिक 

  -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-2

बाराबंकी। एस0टी0एफ0 ने तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हुई गिरफ्तारी की जो कहानी बतायी उसमें छेद ही छेद है। बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर लोगों ने एक ही व्यक्ति को इनोवा कार में रिक्शे से उतार कर जबरन डालते हुए देखा था,जबकि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद दोनो ही की कद व काठी औसतन साढे़ पांच फिट के करीब है। 22दिसम्बर 2007 को कड़ाके की ठण्ड में सुबह रेलवे स्टेशन पर कम भीड़ थी। सुबह की नमाज़ से फुरसत पाने के बाद लोग अपने घर चले गए और बाकी रात भर खुलने वाली चाय की दुकान पर चाय की चुस्की ले रहे थे।रेलवे स्टेशन के मेनगेट के सामने तिकोने पार्क के किनारे दो चार रिक्शे वाले  नगर पालिका के तहत गिरायी लकड़ी के अलाव के चारो ओर बैठे हाथ सेक रहे थे तथा सायकिल स्टैण्ड के किनारे एक कोने पर फुल्लन शुक्ला नाम का एक व्यक्ति समाचार पत्र के स्टाल पर बैठा समाचार पत्र बेच रहा था। अचानक रेलवे स्टेशन चैराहे से शहर को जाने वाली रोड पर विश्वनाथ के होटल से चन्द कदम पहले बिजली के खम्भे के सामने रिक्शा पर बैठे एक आदमी को इनोवा कार से उतरे एक आदमी को चार पांच लोगो ने काला कपड़ा ओढ़ाकर गोद में उठाकर कार में डाल दिया। लोग कुछ समझ पाते कि कार मंे डालने वाले स्टेनगन सम्भाल कर बोले कि होशियार कोई भी कार के पास नही आए खतरनाक  आतंकवादी पकड़े गए है। इनके पास आर0डी0एक्स0 जैसी खतरनाक विस्फोटक सामग्री है। इनना सुनना था कि रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गयी, लोग अपने अपने घर की ओर चल पड़े चाय के होटल पर सन्नाटा छा गया।
    आतंकवादी के पकड़े जाने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे शहर में फैल गयी। मीडिया के लोगो का जमघट कोतवाली में जमा होने लगा।जहां  एस0टी0एफ0 और ए0टी0एस0 के साथ लखनऊ की पुलिस कप्तान प्रवीन कुमार स्वयं कोतवाली में मौजूद थे। मीडिया के लोग आतंकवादियों की एक झलक पाने के लिए बेचैन थे लेकिन किसी को अपने मकसद में कामयाबी नही मिली और चन्द समय बाद एस0टी0एफ0 के लोग  कोतवाली में मुकदमा दर्ज करके गाडि़यों से ये कहते हुए लखनऊ की ओर रवाना हो गए कि डी0जी0पी0 केस के सिलसिले में प्रेस के रुबरु होना है। अभियुक्तो को वहां बुलाया गया है जब कि अभियुक्तो को लेकर पुलिस वाले सफेदाबाद गेस्ट हाउस जा पहंुचा, यहाँ अभियुक्तो को बाराबंकी एस0ओ0जी0 के हवाले कर दिया गया,जो इन्हे लेकर जेल पहंुची और वहाँ सी0जे0एम0 ने अभियुक्तों की ज्यूडीशियल रिमाण्ड मन्जूर की।मीडिया के लोग जब रेलवे स्टेशन पहुंचे तो इन्हे सही कहानी इस तरह पता चली कि सबसे पहले चाय की होटल पर उपस्थित अजय कुमार ने मीडिया के लोगो को बताया कि वह सुबह दुकानदारी का समय होने के कारण चारो तरफ ग्राहक खड़ेे थे अचानक शोर मचा तो देखा कि चैराहे के करीब एक रिक्शे पर सवार एक आदमी के करीब खड़े एक बड़ी कार से उतरे लोग इस पर काला रंग का कपड़ा ढककर उसे कार में डाल रहे है। इसके बाद कार तेजी से पुुलिस लाइन की ओर चली गयी। अखबार बेचने वाले फुल्लन शुक्ला ने भी यही बात बतायी। सबसे अहम बात सायकिल स्टैण्ड वाले ने बताया जिसने अपना नाम नही बताया।इसके अनुसार सुबह एक ट्रेन आयी बाहर स्टेशन से बाहर इस समय एक लम्बी काठी का एक आदमी उतरा जिसके दोनो हाथों में काले रंग के बैग थे एक प्लास्टिक की थैला था और दूसरा रेकसीन या चमड़े का था। वह आदमी थोड़़ी दूर जाने पर पी0सी0ओ0के पास ठहरा इधर उधर देखा देखने के बाद रिक्शे वालो के पास आ गया, उसने रिक्शे वालो से कुछ कहा जिससे रिक्शे वालो ने चलने के लिए नही माने। इसके बाद वह आदमी चैराहे की ओर गया तभी एक रिक्शे ले जाने के लिए राजी हो गया। जैसे ही वह चला कि पार्सल कार्यालय के करीब पहले से ही मौजूद एक कार तेज गति से रिक्शे के पास पहुंची और चार पांच आदमी उसमंे से उतरे रिक्शे पर सवार आदमी के सिर और चेहरे को ढककर उसे कार में डाल दिया। जब मीडिया को पुलिस से यह सूचना मिली थी कि आतंकवादी स्टेशन पर पकड़े गए है तो इस बात पर आश्चर्य हुआ कि पुलिस की कहानी कुछ बता रही है और स्टेशन पर देखने वाले लोग कुछ बता रहे है।मीडिया ने पुलिस की बतायी कहानी पर भरोसा किया वही छापा दिखाया जो पुलिस चाह रही थी। एक उर्दू समाचार पत्र को छोड़कर किसी ने भी एक आदमी को पकड़ने की बात नही लिखी।प्रायः देखने में आता है कि पुलिस किसी गुडवर्क का खुलासा करते समय कहती है कि पकड़ने का स्थान और समय वह अभी नही बता सकती। लिखा पढ़ी के बाद ही वह बता पाएंगे लेकिन आश्चर्य कि ऐसे मामलों में जब पुलिस एस0टी0एफ0या ए0टी0एस0 किसी मुस्लिम को आतंकवादी के रुप में पकड़ती है तो मीडिया पुलिस की बनायी गयी कहानी पर विश्वास कर लेती है। हालांकि यह एक संवेदनशील मामला है क्योंकि एक ओर अगर देश की सुरक्षा व उसकी सुख शांति का मामला है तो दूसरी ओर एक पूरी कौम की कौमपरस्ती और देश के लिए वफादारी का भी सम्बन्ध है।
  क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?

बाराबंकीं। कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके केस की वापसी के मामले  में अखिलेश सरकार की नीयत साफ नही है, अगर इसका इरादा नेक होता तो केस को वापस लेने की सरकारी कार्यवायी से पहले इसने मायावती सरकार के समय में गवर्नर की ओर से गठित आर डी निमेश कमीशन की रिपोर्ट को पहले ही प्रकाशित कर देते ताकि जनता के सामने निर्दोष व्यक्तियों की कहानी आ जाती और इसके बाद जब मुकदमा वापसी की कार्यवायी सरकार करती तो सम्प्रदायिक पार्टियां और इनके जनसंगठनों को जनता को फुसलाने का मौका हाथ न लगता। बम धमाके से सम्बन्धित केस वापसी के सम्बन्ध में प़त्र लिखकर जिला मजिस्टेट को आख्या देने को कहा वह प्रचार माध्यमों में लीक हो गए और जिला मजिस्टेट की रिपोर्ट शासन तक आने से पहले विभिन्न न्यायालयों परिसर में अधिवक्ताओं के आन्दोलन का सिलसिला शुरू हो गया।जो आगे और बढता दिखायी दे रहा है।23 नवम्बर 2007 के दिन एक साथ लखनऊ, बनारस, और फैजाबाद की कचहरियों में ताबड़ तोड़ कई बम धमाके हो गए और इसमें 14 व्यक्ति हलाक और करीब 50 जख़्मी हुए।
              बाराबंकी रेलवे स्टेशन से तारिक कासमी (आजमगढ़) और खालिद मुजाहिद (जौनपुर) को बम विस्फोटको के साथ गिरफतार करके इन्होने आतंकवादी संगठन हरकत अलजेहाद(हूजी) का मुख्य कार्यकर्ता बताते हुए फैजाबाद,गोरखपुर (जो कि 23 नवम्बर 2007 से पहले आतंकवादी घटना का शिकार हुआ था) और लखनऊ कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके के अभियुक्त करार दिया था। पुलिस व एस0टी0एफ0 के पास से 9अदद जिलेटिन राड पैक शुदा दर्जन डिटोनेटर, सवा किलो आर0डी0एक्स और कई अदद मोबाइल तथा सिम कार्ड बरामद करने का दावा पेश किया था। लेकिन हैरत अंगेज तौर पर बरामद सामग्री को न तो प्रेस को दिखाई गयी और न ही अदालत के सामने खोली। जिसकी वजह से तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी पर सवालात खड़े होने शुरू हो गए। नेशनल लोकतान्त्रिक पार्टी के कौमी सदर अरशद खान गिरफतारी के 10 दिन पहले से ही तारिक कासमी की गायब हो जाने की घटना के खिलाफ अपने पार्टी प्लेटफार्म से विरोध कर रहे थे। जब वह 12 दिसम्बर को जौनपुर के थाने मडि़याहू से खालिद मुजाहिद के भी गायब होने की खबर आ गयी तो इनकी पार्टी ने गम्भीर रूख अख्तियार कर लिया।12 दिसम्बर को इनकी पार्टी के प्रादेशिक मुखिया चैधरी चरन पाल सिंह उस समय की मुख्यमंत्री मायावती व गर्वनर उ0प्र0 को ज्ञापन के जरिए आगाह किया कि अगर 22दिसम्बर तक तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बरामदगी पुलिस नही करती है तो वह विधानसभा के सामने खुदखुशी कर लेंगे। इस वार्निंग से खौफज़दा मायावती सरकार के पुलिस अधिकारी ने बाराबंकी ने अचानक एक नाटकीय अन्दाज में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी दिखला दी। जबकि 12दिसम्बर 2007 को रानी की सरायं थाना की चेक पोस्ट के करीब लखनऊ बलिया रोड पर मौजा महमूदपुर से हकीम तारिक कासमी निवासी सम्मूपुर थाना रानी की सराय जिला आजमगढ़ के एक सफेद रंग की टाटा सूमो गाड़ी से उतरे कुछ लोगो के जरिये दिन के लगभग 12 बजे  के समय जबरदस्ती अपहरण कर लिया गया। इस घटना को 13 दिनांक को समाचार पत्रों में छापा भी गया था।इसके दो दिन बाद तारिक कासमी के 80 वर्ष के दादा अजहर अली की तहरीर पर थाना रानी की सराय में पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखी थी।तारिक के अपहरण किए जाने की घटना को कई लोगो ने देखा था। इनमें से कई लोगो ने निमेष कमीशन के सामने गवाही भी दी थी। इसी तरह 12 दिसम्बर 2008 के दिन शाम 6 बजे के लगभग कस्बा व थाना मडि़याहू जिला जौनपुर में खालिद मुजाहिद जो एक मदरसे में अध्यापक था, को टाटा सूमो पर सवार कुछ लोगो ने इस समय जबरदस्ती अपहरण कर जौनपुर शहर की तरफ ले गए जब शाम की नमाज अदा करने के बाद खालिद पवन टाकीज के सामने मन्नू चाट वाले की दुकान पर चाट खाने रूके थे। खालिद के अपहरण की तस्दीक निमेष कमीशन के सामने प्रमुख रूप से मुहम्मद शाहिद आलम, मुहम्मद शकील, जुल्फिकार, फखरे आलम, शकील अहमद, हाजी अकरम उल्ला, इम्तियाज अहमद(सभी दुकानदार है), शाहिद जमाल(चाचा जाद भाई खालिद मुजाहिद),अनीस उर्ररहमान एडवोकेट ने की है।खालिद के अपहरण की रिपोर्ट चाचाजाद भाई मुहम्मद शाहिद ने भीड़ के साथ थाने पहुुचकर पुलिस को इसके अपहरण किए जाने की तहरीर दे कर रिपोर्ट लिखानी चाही किन्तु इसकी रिपोर्ट पुलिस ने नही लिखी, इसके बाद खालिद के चाचा फलाही ने मानव अधिकार आयोग,मुख्यमंत्री उ0प्र0, राज्यपाल उ0प्र0 और डी0जी0पी0 आदि को शिकायती पत्र भेजे और खालिद की बरामदगी की प्रार्थना की, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नही की। चुनाव के समय मुलायम सिंह ने मुसलमानों से वादा किया था कि इनकी सरकार अगर बहुमत में आती है तो आतंकवादी के फर्जी केस से मुस्लिम नवजवानो की जेल से रिहाई कर दी जाएगी। लेकिन बहुमत में आने के बाद जब अखिलेश सरकार ने जस्टिस निमेष कमीशन की प्राथमिकता नही दी जो मार्च मंे ही करनी थी और न ही निमेष कमीशन की रिपोर्ट जनता में प्रकाशित की? इसके बजाए सरकार की ओर से जिला फैजाबाद, गोरखपुर,लखनऊ व बाराबंकी जिला प्रशासन से वाद की जानकारी तलब की जिसके बाद हिन्दुत्ववादी संगठन आर0एस0एस0 व बी0जे0पी0 ने विरोध कार्यक्रम को तेज कर दिया, जो अखिलेश सरकार के बढ़ते हुए कदमो को रोकने का काम जरूर कर सकता है?
   क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)
Share |