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शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

मिशन 2014 चूर चूर हो जाएगा


बाराबंकी। निमेष कमीशन ने जिला आजमगढ़ के थाना सराय मीर जाकर 7जुलाई 2009 को उस घटना स्थल की जांच की जहां से अभियुक्त तारिक कासमी को उठाने का आरोप तारिक कासमी और उसके घर वालों ने एस0टी0एफ0 पर लगाया था। इसी तरह कमीशन ने 6 जुलाई 2009 को जिला जौनपुर  के थाना मडि़याहू के तहत उस बाजार का भी मुआयना किया जहां से खालिद मुजाहिद को उठाने का आरोप खालिद मुजाहिद के घरवाले एस0टी0एफ0 पर लगा रहे है। दोनों घटना स्थलों से वहां के लोगो से पूछताछ की।
तारिक कासमी को गिरफ्तार करने की सनद कमीशन को जिन लोगो की गवाही से मिली उनमें कवंलधारी सिंह निवासी रानी की सरायं, हफीज निवासी रानी की सरायं रामायन निवासी रानी की सरायं, शाहआलम निवासी रानी की सरायं ,शमशाद अहमद एडवोकेट निवासी रानी की सरायं, तारिक शमीम निवासी रानी की सरायं, मौलवी असलम (तारिक कासमी के ससुर) अब्दुल शमीम, अरशद अब्दुल रहमान, मुहम्मद हारून, सर्फुद्दीन, शौकत अली, मुहम्मद आजम के नाम मुख्य रूप से है। उपरोक्त सभी लोगो ने कमीशन को ये बताया कि इन्होने 12 दिसम्बर 2007 के दिन या तो खुद अपनी आँखो से तारिक कासमी को थाना रानी की सरायं चेक पोस्ट के करीब दोपहर 12 बजे लखनऊ बलिया रोड पर घटना स्थल  मुहम्मदपुर से एक टाटा सूमो पर कुछ लागो ने जबरदस्ती उसको मोटरसाइकिल से उठाकर ले जाते देखा था और दो लोग उनकी मोटरसाइकिल नम्बर यू0पी0 50एन2943 पर बैठकर बनारस की तरफ चले गए थे उन्होने किसी न किसी से सुना था कि एस0टी0एफ0 के लोग उठा ले गए है।
             इसी तरह खालिद मुजाहिद को 12दिसम्बर 2008 को गिरफ्तार करने की बात जांच कमीशन को जिन लोगो से मिली उसमें कमला प्रसाद साहू, मुहम्मद मुस्लिम, राजेन्द्र प्रसाद, राजबली,फिरोज अहमद, राजेश कुमार, सुनील कुमार, सन्तोष कुमार, मन्नू चाट वाला( जिसकी दुकान से खालिद मुजाहिद को एस0टी0एफ0 के जरिए उठाए जाने की बात कही जा रही है),महताब आलम,चन्द्र मोहन यादव, इम्तियाज अहमद,निज़ामुद्दीन,फखरेआलम,जुल्फिकार,शकील अहमद, सईद आलम,जहीर आलम फलाही और मुहम्मद अनस, के नाम शामिल है। इसके अलावा सहाफी मुहम्मद  आरिफ , जो कि हिन्दी दैनिक अमर उजाला के प्रतिनिधि है और गुलाब चन्द केसरी, जोकि दैनिक हिन्दुस्तान के तहसील प्रतिनिधि है के भी बयान कमीशन ने दर्ज किए है।   
                   दोनो ही अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी की जांच गवाहों के बयान से कमीशन को मिली। निमेष कमीशन को इस  बात के भी प्रमाण मिले कि मदरसा जामिते अलसलहात वाक्या कस्बा व थाना मडि़याहू जहां खालिद मुजाहिद पढ़ाता था इसमें 12दिसम्बर को आखिरी बार इसने पढ़ाया था और मदरसा के रिकार्ड में इसकी गैर हाजिरी इस दिन के बाद से लिखी हुई है। फिर दोनो ही अभियुक्त के घर एस0टी0एफ0 ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर 18 दिसम्बर की दरमियानी शब को छापा मारकर तलाशी ली और इनके घर मंे मौजूद मज़हबी किताबें व दीगर सामान अपने कब्जे में ले लिए, जिसका जिकर स्थानीय पुलिस ने अपने रोजनामचे मंे भी किया है। साथ ही दोनो को अपनी हिरासत में रखकर इनसे सादे कागज पर हस्ताक्षर कराने  और उनके उंगलियों के निशान अपनी हिरासत में लगवाने के भी प्रमाण कमीशन को मिले। कमीशन ने दोनो ही अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाबत 17दिसम्बर 2007,18दिसम्बर 2007, 20दिसम्बर 2007,21दिसम्बर 2007,22दिसम्बर2007 को बातरतीब अमर उजाला,हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण हिन्दी अख़बार में छपी खबरो का भी जायजा लिया। कमीशन ने सर्किल आफीसर मडि़याहू के इस जवाब का भी मुआयना किया जिन्होने अभियुक्त खालिद मुजाहिद के चचा जहीर आलम फलाही के सूचना अधिकार के तहत मांगी थी और जिसमंे सी0ओ0ने इस बात को स्वीकार किया है कि 12दिसम्बर 2007 की शाम साढ़े छःबजे एस0टी0एफ0ने खालिद मुजाहिद को मडि़याहू बाजार से गिरफ्तार किया है, लेकिन इसके मुतालिक जी0डी0की कापी इन्होने ये कहकर देने से इन्कार किया है कि इससे जांच में गड़बड़ी होने की खतरा हो जाएगा।
                   अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद के अधिवक्ता मुहम्मद शुएब और रणधीर सिंह सुमन ने बताया कि जस्टिस आर0डी0निमेष ने इस बात पर सवाल खड़ा किया था कि जब तारिक कासमी को गिरफ्तार किए जाने की खबरें कई हिन्दी दैनिक में छपी हुई थी तो पुलिस या सरकार ने इन खबरों की जांच की जहमत क्यों नही की। इसी तरह तारिक कासमी के दादा जहीर अली के जरिए जब स्थानीय थाना रानी की सरायं को तारिक की गुमशुदगी की सूचना दी गयी तो फिर इसने इसको नज़रअन्दाज क्यों किया? इसके अलावा इस बात पर सवालिया निशान खड़ा किया है कि जब तारिक कासमी के दादा के जरिए पुलिस को दी गयी तहरीर में ये कहा गया कि इसके पास मौजूद मोबाइल नम्बर 9450047342 से जब तारिक कासमी के घर वालों ने बातचीत कायम करने की कोशिश की तो वह कभी चालू हालत में मिलता रिंग जाती, लेकिन उठता नही और कभी बन्द हो जाता, लेकिन पुलिस ने इस बात को जानबूझकर कर नज़र अन्दाज़ किया क्योंकि हकीकत तो पुलिस को पता ही थी कि तारिक कासमी  व इसका मोबाइल एस0टी0एफ0 के कब्जे में है। इसी तरह खालिद मुजाहिद के टाटा सूमो गाड़ी में मडि़याहू बाजार से मन्नू चाट वाले की दुकान से उठाए जाने की ख़बर 17दिसम्बर 2007 को सभी समाचार पत्रों में छपी, लेकिन पुलिस और सरकार ने उस पर कोई कार्यवायी नहीं की फिर 22दिसम्बर 2007 के दिन जिस दिन एस0टी0एफ0 ने दोनो अभियुक्तों को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार  करना बताया, को जौनपुर से ख़बर दैनिक जागरण समाचार पत्र में छपी कि एस0टी0एफ0 के जरिए 12दिसम्बर को मडि़याहू बाजार से उठाए गए खालिद मुजाहिद पर आई0बी0 की निगाह लगभग छः माह से थी। लोगो के मुताबिक इस ख़बर का वजूद कैसे हुआ और जब हुआ तो फिर सरकार ने इस ख़बर की जांच करने की कोशिश क्यों नही की।
                   समाजवादी सरकार के ऊपर जब मुस्लिम समाज से जोर बढ़ाया कि इसने चुनाव के समय जो वादा आतंकवाद के झूठे आरोपो में कैद मुस्लिम नवजवानों की रिहाई की बात की थी। उसे वह कब पूरा करेगी? तो अक्टूबर के पहले सप्ताह मंे अखिलेश यादव सरकार ने बाराबंकी, लखनऊ,फैजाबाद, और गोरखपुर जिला अधिकारी से अभियुक्तो के मुकदमें के बारे में जानकारी तलब की। रिपोर्ट में मुकदमें का नम्बर, धाराएं, अदालत का नाम अभियुक्तो के नाम मुकदमे की प्रकृति प्रथम सूचना रिपोर्ट के साथ मेडिकल रिपोर्ट,केस डायरी, में मौजूद सबूतो की छानबीन जो अभियोजन अधिवक्ताओं ने किया हो मुकदमे की जानकारी मांगी। मुकदमा वापसी के बारे में एस0पी0की राय व जिला अधिकारी की राय मांगी जो कि सभी जिलो से रिपोर्ट भेज दी गयी है। रिपोर्ट में क्या लिखा गया है यह तो बाद की बात है लेकिन आमतौर पर अधिकारियों की तरफ से अभियुक्तो की रिहाई की रिपोर्ट दुश्वारियां पैदा करके भेज दी जाती है। लेकिन रिहाई की बात असल में जिम्मेदारी सरकार के ही पास होती है। सी-आर0सी0पी0 की धारा 321 के तहत किसी भी अभियुक्त के खिलाफ अदालत में जारी केस की वापसी के अधिकार अदालत के पास मौजूद होतेे है। अभियुक्त के केस की वापसी के लिए पहले अधिवक्ता या सरकारी अधिवक्ता अदालत से प्रार्थना करेगा लेकिन वह यह काम अदालत का फैसला आने से कबूल ही कर सकता है मगर वर्ष 1991 में उ0प्र0 सरकार ने इसमें कुछ तब्दीली की जिससे सरकार ने अपने पास यह अधिकार ले लिया। अब सरकार जब भी चाहे और जिस अभियुक्त को चाहे रिहाई कर सकता है।ं जाहिर है कि सरकार की मंशा किसी की भी रिहाई करने की है तो पुलिस और न ही अभियोजन या अधिवक्ता कोई दखल नही दे सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने भी मुकदमा वापसी के बारे में अपनी राय कई मुकदमें में दी है । इसके मुताबिक दिल्ली  सरकार बनाम प्रीत पब्लिक स्कूल और राहुल अग्रवाल बनाम राकेश जैन 34(1998)एससी 910 एआईआर2005, एस0के0शुक्ला बनाम उ0प्र0 सरकार एआईआर2006एससी413, के केसो में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय देते हुए कही है कि मुकदमे की वापसी लेने के लिए सरकार निम्न बातो पर स्वतन्त्र है।  1-अमन के लिए 2-जनता के इंसाफ के लिए 3-क्षेत्र की सुरक्षा के लिए4-किसी गैर जरूरी बेकार मुकदमे के लिए 5-शान्ति व्यवस्था के लिए 6-पब्लिक पालिसी के लिए 7-समाज के सद्भाव के लिए 8-गैर जरूरी सरकारी खर्च के लिए 9-मुकदमा जारी रखने की सूरत में अभियुक्त के अधिकार में होने वाली नाइंसाफी के लिए और इसी तरह के कई बातो के आधार पर सरकार केस वापस ले सकती है। जाहिर है कि अखिलेश सरकार के पास अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद के केस की वापसी के लिए कई कानून मौजूद है जिन पर अमल करके वह इन बेकसूरों को इंसाफ दिला सकती है और राज्य में एक के बाद एक हो रहे साम्प्रदायिक दंगो के सबब वह खो चुकी अपना वजूद वह फिर से पा सकती है वरना फिर उसका मिशन 2014 चूर चूर हो जाएगा।
-मुहम्मद तारिक खान

     अनुवादक -नीरज  वर्मा 
        (इंकलाब से साभार)


मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

पुलिस की कहानी को संदिग्ध

पुलिस कस्टडी में मोबाइल सील बन्द था फिर उसका इस्तेमाल हुआ यह बात पुलिस की कहानी को संदिग्ध बनाती है।
बाराबंकी-इसी तरह खालिद मुजाहिद के पास से बरामद किये गये मोबाइल आईएमईआई नं.0 355655007210640 पर 21 नवम्बर 2007 से लेकर 25 नवम्बर सन 2007 तक बराबर बात होने की तस्दीक काल डिटेल से प्राप्त हुई है और इसके बाद 16 दिसम्बर को 12.50 बजे के बाद 17 दिसम्बर सन 2007 को 10 बजे लेकर 11.16 मिनट तक 3 मिनट उसे तक बात की गई है इसके बाद फिर 10 दिसम्बर 2007 को 10.41 से लेकर 17ः26 तक 6 मि0 7 से0 तक बात किये जाने की पुष्टि काल डिटेल रिकार्ड से प्राप्त हुई है उसके बाद 19 दि0 सन 2007 को दो 11.59 से लेकर 12.11 तक बात किये जाने की पुष्टि हुई है इसके बाद 21 दिसम्बर सन 2007 को शाम 16.34 मिनट तक और फिर 22 दिसम्बर 2007 को एस0टी0एफ0 के जरिये मुल्जिमान को गिरफ्तार बाराबंकी में दिखाये जाने सुबह 6.3 मिनट और उसके बाद उसी दिन दोपहर 15.49 मिनट पर बात करने की पुष्टि हुई है यानि खालिद की गिफ्तारी जो सवा 6 बजे हुई उसके बाद 11.49 मिनट पर मोबाइल इस्तेमाल किये जाने की पुष्टि काल डिटेल से हुई जबकि उस समय मोबाइल पुलिस सील बंद था फिर भी उसका इस्तेमाल हुआ यह बात पुलिस की कहानी को संदिग्ध बताती है काल डिटेल ने पुलिस की पूरी झूठी कहानी खोलकर रख दी है इसके अनुसार तारिक कासमी से बाराबंकी में गिरफ्तारी के समय बरामद किये गये मोबाइल आई0ई0एम0आई0 नं0 3535363201590141 से 22 नवम्बर 2007 को रानी की सराय से फिर 23 नवम्बर को रानी की सराय और फूलपुर और उसके बाद 24 नवम्बर 2007 को फिर रानी की सराय आजमगढ़ कोलाहार से काल डिटेल में दिखाया गया है उसके बाद इसी मोबाइल से तारिक कासमी को एस0टी0एफ0 के जरिये रानी की सरांय थाना के तहत महमूदपुर गांव के पास से उठाये जाने वाले दिन 12 दिसम्बर 2007 को विश्वास खण्ड यू0पी0ई0 से फिर 15 दिसम्बर 2007 को मडि़याहू से 16 दिसम्बर 2007 को नदीम नगर लखनऊ से फिर 17 दिसम्बर 2007 को विश्वास खण्ड गोमती नगर लखनऊ से यू0पी0ई0 से उसके बाद 18 दिसम्बर 2007 के दिन नाका हिंडोला लखनऊ से उसके बाद 19 दिसम्बर को विधान सभा मार्ग और नाका हिंडोला लखनऊ यू0पी0ई0 से उसके बाद 20 दिसम्बर 2007 को विजय खण्ड गोमती नगर लखनऊ यू0पी0ई0 से फिर उसके बाद 21 दिसम्बर 2007 को खडगपुर मेडिकल कालेज से और दुर्गापुरी यू0पी0ई0 से और पुलिस के जरिये बयानकर्ता गिरफ्तारी की तारीख 22 दिसम्बर 2007 को 6.10 मिनट तक दुर्गापुरी बाराबंकी यू0पी0ई0 से बात करना काल डिटेल के रिकार्ड में बताया गया है। इस तरह काल डिटेल के रिकार्ड से यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि अभियुक्त 22 नवम्बर 2007 से 23 नवम्बर 2007 तक अपने अपने निवास स्थान पर ही थे और फिर 12 दिसम्बर से 22 दिसम्बर के बीच वह अपने निवास स्थान से दूर मुखतालिफ मुकामात पर एसटीएफ की कस्टडी में ही रहे जैसा कि मुल्जिमान के घर वालों व एैनी सहिदीन  (चश्मदीद गवाह) का मानना है और इस दौरान दोनों के मोबाइल फोन एसटीएफ बराबर इस्तेमाल करती रही उसके अलावा 18 दिसम्बर 2007 को एसटीएफ और रानी की सरांय की पुलिस के जरिये रात 12 बजे की करीब दी गई दबिश जिसमें तारिक कासमी के घर से बरामद चार किताबों की फर्द रानी की पुलिस ने रोजनामचा में दिखाई गई हैं जो इस बात की पुष्टि करती है कि तारिक कासमी के घर पर दबिश 18 दिसम्बर 2007 को आधी रात को देकर पुलिस ने बरामद की गई चीजों को भी अपनी केस प्रापर्टी बतौर सुबूत बनाया है इस पर मुल्जिमान तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद के रिश्तेदार मो0 असलम (तारिक के ससुर) और जहीर आलम फलाही (खालिद मुजाहिद के चचा) भेजी गई अपनी फरियाद में किया था उसका कोई असर मायावती हुकूमत पर नहीं हुआ।
    तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को लेकर जब मुसलमानों ने हद से ज्यादा व्याकुलता बढ़ने लगी और मायावती को रोका गया कि हालात ऐसे ही खराब हुये तो अमन और आमान बिगड़ने का खतरा नाहक हो जायेगा तो उन्होंने गर्वनर उत्तर प्रदेश के पास इन्क्वारी कमीशन की सिफारिश भेज दी।
    जिस पर गवर्नर के हुकुम से रिटायर्ड जज आर0डी0 निमेष कमीसन का वजूद 14 मार्च 2008 को अमल में आया जिसको अपनी रिपोर्ट 6 माह के अन्दर देने की हिदायत की गयी लेकिन कमीसन की रिपोर्ट 6 माह में न पेश की जा सकी और जिसके नतीजे में इनका कार्यकाल 8 बार बढ़ाया गया। इस दौरान विधानसभा का चुनाव का बिगुल बज गया और हुकूमत से नाराज मुसलमानों ने मायावती हुकूमत के विरूद्ध अपना गुस्सा जाहिर करके उसकी हुकूमत का तख्ता पलट दिया। नवीस कमीसन ने अपनी काम की शुरूआत की इस दौरान कमीसन ने लगभग परिजन लोगों के बयाज दर्ज किये जिसमें चश्मदीद गवाह पुलिस अफसरान जांच करने वाले अफसरान मुल्जिमान बी0एस0एन0एल0 महकमे के अफसरान और मुल्जिमान के घर वालों के बयान शामिल है।
    जस्टिस निमेष ने अभियुक्तों की गिरफ्तारी की जगह बाराबंकी रेलवे स्टेशन का दौरा करके वहां वाकिया के चश्मदीद गवाहन के बयान रिकार्ड कराये जिससे उस सुबह चाय का होटल चलाने वाले भी शामिल है। अजय ने अखबार नवीस कमीसन उसने कहा गया कि 22 दिसम्बर की सुबह वह अपने होटल पर रोजाना की तरह चाय बनाने में व्यस्त था कि अचानक सवा 6 बजे भागो दहशतगर्द है इतना सुनते ही वो घबराकर दुकान खुली छोड़कर माल गोदाम रोड भाग खड़ा हुआ उसने किसी को भी गिरफ्तार होते हुए अपनी आंखों से नहीं देखा। बाद में उसे लोगाों से पता चला कि पुलिस ने आतंकियों को गिरफ्तार किया। अजय ने यह गवाही लगभग 4 महीने पहले दी थी। इस दौरान स्थानीय पुलिस और एस0टी0एफ0 ने अपना होमवर्क करते हुए उसे काफी समझा बुझा दिया था कि बयान में भी तब्दीली आ गयी वरना 22/07 को जब प्रेस के लोगों ने उसे वाकया की तपशील पूंछी थी तो उसने बताया था कि उसने शोर मचने पर केवल रिक्शा पर बैठे हुए केवल एक व्यक्ति को कुछ लोगों के द्वारा काला कपड़ा उढ़ाकर गाड़ी में गोद में उठाकर लादते हुए देखा था निमेष कमीशन के सामने दूसरी गवाही एक रिक्शा चालक ‘कृष्णा’ की गुजरी जिसने सशपथ बयान में कहा कि वह उस दिन अपने रिक्शे के साथ रेलवे स्टेशन पर सवारी के इन्तजार में खड़ा था कि अचानक 6ः20 मिनट पर शोर मचा और लोग इधर-उधर भागने लगे वह भी थोड़ी दूर भागा बाद में जब वह लौटा तो उसे लोगों से पता चला कि दो आतंकवादी पकड़े गए हैं जिनके पास से भारी मात्रा में विस्फोट पदार्थ पुलिस ने बरामद किया है।
    निमेष कमीशन के सामने रेलवे पर अखबार बेचने वाले सुशील कुमार ने अपने बयान में कहा कि 22 दिसम्बर 2007 को वह अपने बुक स्टाल पर था कि 6ः20 मिनट पर अचानक शोर मचा तो उसने देखा कि कुछ लोग एक आदमी को मार पीटकर गाड़ी में लाद रहे हैं। आदमी को चादर उढ़ा दी गयी थी उसके सामने उस आदमी के पास से कोई चीज बरामद नहीं हुई थी जब तक वह कुछ समझ पाता लोगों की जबानी उसे पता चला की आतंकवादी पकड़े गए हैं। वह घबड़ाकर अपनी जान बचाकन भाग खड़ा हुआ।
    यह बात काबिले गौर है कि अजय कुमार के जरिये प्रेस वालों को दिया गया बयान कि उसने केवल एक आदमी को जो रिक्शे पर बैठा हुआ था काला कपड़ा उढ़ाकर कुछ लोगों को गाड़ी में डालते हुए देखा था कि मुशाविहत अखबार बेचने वाले सुशील कुमार से काफी मिलती है। सुशील ने भी अपने बयान मेें कहा कि उसने गाड़ी पर लादते हुए केवल एक व्यक्ति को देखा था रेलवे स्टेशन बाराबंकी पर पान के दुकानदार ‘कृष्ण चन्द्र शुक्ला’ ने निमेष कमीशन को अपनी गवाही में बताया कि वह वर्षों से साइकिल स्टैण्ड के बगल में पान की दुकान रखता चला आ रहा है। 22 दिसम्बर के दिन उसने रोजाना की तरह अपनी दुकान खोली और अभी वह झाड़ू लगाने ही जा रहा था कि उसने देखा कि 10/12 लोग रेलवे स्टेशन की तरफ से बम-बम चिल्लाते हुए चैराहे की ओर भागते चले आ रहे है उन्हें देखकर वह भी अपनी दुकान छोड़कर भाग खड़ा हुआ लगभग आधे घण्टे बाद जब वह अपनी दुकान के पास वापस लौटा तो उसे पता चला कि दो आतंकवादी पकड़े गए हैं। उसने किसी को गिरफ्तार होते अपनी आंखों से नहीं देखा। इस गवाह ने बताया ‘‘कि लोग रेलवे स्टेशन से चैराहे की तरफ भागते हुए आ रहे थे’’ जब कि पुलिस का कहना यह है कि ‘‘उसने मुखबिर के निशानदेही पर मालगोदाम रोड की ओर से रेलवे स्टेशन चैराहे पर आकर खड़े हुए दो लोगों को उस समय गिरफ्तार किया जब वह किसी से मिलने के इन्तजार में खड़े थे’’।
-मुहम्मद तारिक खान

     अनुवादक -मोहम्मद अहमद फारूखी 
        (इंकलाब से साभार)


शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

गिरफ्तारी के आठ माह बाद लगाया गया चार्ज

बाराबंकी। कचेहरी बम काण्ड धमाका केस के मुकदमा की कार्यवाही शुरू से ही ऐसी रही कि अभियुक्तों को सजा से पहले ही सजा मिल जाए। कोर्ट का कार्य ऐसा रहा कि अभियुक्तों के खिलाफ चार्ज गिरफ्तारी के आठ माह बाद लगाया गया। इस दौरान अभियुक्तों को जेल काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। जिसकी जानकारी अभियुक्तों ने मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश मायावती को जेल से भेजे गए पत्र में भी किया गया है।
अभियुक्तों के वकील रणधीर सिंह सुमन एडवोकेट के अनुसार 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी जेल में पहला जुडिशियल रिमाण्ड उस समय के सी0ओ0सिटी दयाराम सरोज ने विवेचक अधिकारी के तौर पर सी0जे0एम0 से इन्हे जेल में बुलाकर किया। लेकिन जब जेल से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत ये सूचना मांगी गयी कि सी0ओ0सिटी दयाराम सरोज 22दिसम्बर को जेल के अन्दर गए थे तो वहां से उत्तर मिला कि नही। यानि सी0ओ0सिटी का बयान गलत निकला किन्तु कोर्ट में कहीं भी दयाराम सरोज ने इस बात को नही कही कि उन्होने जेल में सी0जे0एम0की मौजूदगी में अभियुक्तों का जूडीाियल रिमाण्ड प्राप्त किया। सुमन एडवोकेट के अनुसार जेल में सी0जे0एम0 किस के आदो से रिमाण्ड लेने गयी इस बात की भी जानकारी कहीं भी मौजूद नही है। सुमन ने आगे बताया कि विवेचक अधिकारी दयाराम सरोज ने सी0जे0एम0 से अभियुक्तो के 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत इकबालिया बयान दर्ज करने की प्रार्थना की। इस पर कोर्ट ने इनसे कहा कि बयान लिंक मजिस्ट्रेट ए0सी0जे0एम0 के यहां करा ले। किन्तु कोर्ट के आदो के बावजूद पुलिस ने अभियुक्तों के बयान नही कराए। सुमन के अनुसार ऐसा पुलिस ने इसलिए नही किया, ताकि अगर अभियुक्तों के बयान हो जाते तो फिर उनके 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के बयान की कलाई खुल जाएगी।
मुकदमें में पुलिस के विवेचक अधिकारी दयाराम सरोज सी0ओ0सिटी ने आर0डी0एक्स0 की बरामदगी लगभग 1.25 किग्रा दिखाई है जबकि उन्होने और उनके बाद मुकदमें के दूसरे विवेचक अधिकारी चिरंजीव नाथ सिन्हा ने कहीं भी इस बात का उल्लेख नही किया है कि बरामद आर0डी0एक्स0 का कहीं वजन कराया गया है। सुमन के अनुसार मुकदमें में सबसे मजेदार बात यह है कि अभियुक्तों की 22दिसम्बर 2007 को बाराबंकी से गिरफ्तारी दिखाने के बाद बाराबंकी पुलिस ने उनकी जूडीाियल रिमाण्ड उसी दिन लेने के बाद उन्हे जेल भेज दिया। लेकिन उसके बाद अभियुक्तों को लखनऊ जेल किसके आदो से भेजे गए इस बात का कहीं भी मुकदमें की फाइल में उल्लेख नही है। अभियुक्तों के घर वाले खालिद असलम निवासी अनूक थाना रानी की सरायं जिला आजमग़ (तारिक के ससुर) व जहीर आलम फलाही निवासी मोहल्ला महतवाना थाना व कस्बा मड़ियाहू जिला जौनपुर में मुख्यमंत्री मायावती को एक पत्र भेजकर उनसे निर्दोश तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की रिहाई की प्रार्थन की थी। और पुलिस, एस0टी0एफ0 तथा अन्य जाँच एजेन्सियों की भूमिका के बारे में जांच कराए जाने की अपील भी की थी।
अभियुक्तों के रिश्तेदारों ने अपने पत्र में लिखा था कि एक ओर मुकदमें के विवेचक अधिकारी दयाराम सरोज अपनी 22दिसम्बर की केस डायरी में यह लिखते है कि अभियुक्तों के शरीर पर कोई भी चोटे नही है। और अभियुक्तों से जब मेडिकल जांच कराने को कहा गया तो उन्होने मना कर दिया जबकि बाद में अभियुक्तों की मेडिकल जांच दोपहर 1 बजकर 50 मिनट पर जिला अस्पताल तारिक कासमी की हुई और 1:55 बजे खालिद मुजाहिद की किए जाने का उल्लेख अस्पताल रिकार्ड में और कोर्ट की फाइल में तो भी मौजूद जिसमें दोनो अभियुक्तों के भारीर पर चोटो का उल्लेख मौजूद है।
इस बात का भी तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखी गयी थी कि 22दिसम्बर 2007 को सुबह 6:20 बजे जब अभियुक्तों को गिरफ्तार करना बताया गया है तो गवाहान की तला रेलवे स्टोन से चार सौ मीटर दूर बस स्टैण्ड पर करन के बाद पुलिस के दस्ते बगैर स्थानीय गवाहो के ही अभियुक्तों को गिरफ्तार करने जा पहुँची फिर इसके दूसरे दिन अर्थात 23दिसम्बर 2007 को जनता के दो गवाह विवेचक अधिकारी को मिल गए जिसमें एक विवनाथ होटल के मालिक में से एक रूपो गुप्ता उर्फ बच्चू है और दूसरे राम कयप एक दुकानदार है। दोनो की गवाही में इस बात का कहीं उल्लेख नही है कि इन्होने अभियुक्तों को अपनी आँखों से गिरफ्तार होते हुए देखा है। दोनो ने यही बताया है जब वह सुबह आठ बजे अपनी दुकान के करीब से गिरफ्तार किया है। इसमे सबसे मजेदार बात यह है कि विवनाथ की दुकान सुबह छः बजे के करीब खुल जाती है और रूपो के बजाय इसका बड़ा भाई गिरीश दुकान खोलता है। रूपो छाया चौराहे के पास इन्दिरा मार्केट में सरस्वती स्वीट हाउस की दुकान सुबह खोलने जाता है। अभियुक्तों के रितेदारों ने इस बात की भी उल्लेख किया तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में किया था। विवेचक अधिकारी तारिक कासमी के कब्जे से बरामद बस टिकट और साइकिल स्टैण्ड की पर्ची का उल्लेख अपनी फर्द में किया है। लेकिन यह कहीं उल्लेख नहीं है कि मोटर साइकिल किस गवाह के सामने साइकिल स्टैण्ड पर 16दिसम्बर 2007 को रखी गई और साइकिल स्टैण्ड की पर्ची पर सिर्फ नम्बर 030719 पड़ा है और मोटर साइकिल का मेक स्पलेण्डर लिखा हुआ है। इसके अलावा घर से बरामद किए गए दो मोबाइल सेटों में ई0एम0आई नम्बर 3536320159083 और 355519018975300 लिखा हुआ है। पुलिस ने इस बात का दावा किया है कि इन दोनो मोबाइलों को किसने 18दिसम्बर 2007 को 18:17:37 के बाद 22दिसम्बर को 14:00:04 पर सट्टी बाजार बारबंकी और 23दिसम्बर को 13:41:09 को सरस्वतीपुरम से बात होना काल डिटेल रिकार्ड में दिखाया गया है। इसी तरह ई0एम0आई0नम्बर 355519018975300 से 22दिसम्बर 2007 को 13:40:24 तक बात करना काल डिटेल में बताया गया है। इससे साफ पता चलता है कि दोनों के मोबाईल तारिक कासमी के घर पर बरामदगी के समय मोहर बन्द नही किए गए बल्कि इनसे बराबर 22 तथा 23दिसम्बर 2007 को बात की जाती रही।

खालिद 

तारिक 

  -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-3


बाराबंकी। अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को 24 दिसम्बर लखनऊ जेल पहंचाया गया जहां मौजूद एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके पुलिस ने 9 दिन की रिमाण्ड हासिल करने के बाद अभियुक्तो पर जुल्म ढाए गए और सारी हदे पार कर दी गयी। उन्हे पुलिस की तरफ से सरकारी गवाह बनाने की भी पेशकश की गयी। इसके बाद दोनो अभियुक्तो को फैजाबाद जेल ले जाया गया जहां 8 जनवरी को मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में पुलिस ने रिमाण्ड हासिल किया और एक बार फिर अभियुक्तो पर जुल्म ढाने का सिलसिला चल पड़ा। कानून के रखवालो के जुल्म ढाने के बाद इंसाफ के घर मंे इंसाफ पाने में भी काफी दिक्कतो ं का सामना करना पड़ा। एक मौके पर तो अभियुक्तों के वकील को भी मारा पीटा गया। इसके साथ साथ पुलिस इन्हे रिमाण्ड हासिल करने के बाद गोमती नगर के एक मकान मंे ले गयी जहां उनके ऊपर बेइन्तिहा जुल्म ढाए गए सोने तक का मौका नही दिया गया, टांगो को चीरा जाता था, बाल उखाड़े जाते थे, इनके अजू तनासिल (वृषण) को डोरी से बांध कर इसमें वजन लटका दिया जाता था जिससे इन्हे बहुत अधिक तकलीफ होती थी तथा इनके मुँह में जबरन शराब उड़ेली जाती थी पेशाब पीने को दिया जाता था। उनके पैखाने के मुहाने में पेट्रोल डाला जाता था जिससे इन्हें असहनीय दर्द होता था। इन्हे सुअर का गोश्त खिलाया जाता था कड़ाके की ठण्ड में बर्फ की सिल्लियो पर लेटाया जाता था, करन्ट के झटके दिए जाते थे। इसी दौरान हैदराबाद,राजस्थान,गुजरात,मुम्बई, बंगाल, दिल्ली और कई और राज्यो की पुलिस पूछताछ करने इनके पास आती थी।इनसे एस0टी0एफ0 ने रटा रटाया बयान याद करवाया। एक बार राजस्थान और दिल्ली की पुलिस के सामने सही बयान दे दिया यह सोचकर कि ये उ0प्र0 की पुलिस नही है सच बता देंगे तो मुझे यह लोग छोड़ देंगे लेकिन सही बयान देने पर उनके ऊपर और अधिक जुल्म ढाने शुरू हो गए। दोनो अभियुक्तो ने अदालत को दिए गए बयान में कहा है कि 17 जनवरी को एक बैटरी जिस पर कुछ चिकनाहट लगा हुआ था इनके हाथ में पकड़वायी गयी इनके हाथ और पैरो के निशान लिए गए और सादे कागज पर इनके हाथ व पैर के निशान लिए गए। पुलिस अधिकारी निशान लेते समय आपस में बात कर रहे थे कि ऐसे सबूत तैयार करो कि इन्हे फांसी के फन्दे तक ले जाने के लिए काफी हों।दोनो ही अभियुक्तो ने बताया कि पुलिस इन्हे सरकारी गवाह बनाने के लिए कह रही थी किन्तु इन्होने सरकारी गवाह बनने से मना कर दिया। इनकी कानूनी पैरवी के लिए अधिवक्ता पहले आगे नही आए और फिर जब लखनऊ के मुहम्मद शुएब एडवोकेट ने हिम्म्त दिखायी तो इन्हे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बाराबंकी सिविल कोर्ट में जब वह पहली बार आए तो उस समय जिला बार के महामंत्री प्रदीप सिंह ने भी शुएब एडवोकेट को यह सलाह दी कि वह आतंकवाद के आरोप में निरूद्ध अभियुक्तो की पैरवी न करे वरना उनकी सुरक्षा नही कर पाएंगे। माहौल खराब देखकर शुएब एडवोकेट वापस लखनऊ अपने घर चले गए, लेकिन वहां से उन्होने इलाहाबाद के मुख्य न्यायाधीश शिकायत पत्र भेजकर कहा कि अधिवक्ताओं द्वारा उन्हें धमकी दी गयी है। उस समय जिला जज पीयूष कुमार से रिपोर्ट तलब कर ली जिन्होने सरदार बेन्त सिंह और प्रदीप सिंह समेत कई अधिवक्ताओं को नोटिस भेजकर इनका बयान दर्ज कराया गया। अपने खिलाफ हाईकोर्ट का सख्त कार्यवायी देखकर अधिवक्ताओं के तेवर ढीले पड़ गए। इसी समय धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के तेजतर्रार अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने खुद अभियुक्तो की पैरवी करने की पहल की जिसे इन्होने कबूल कर लिया जिसके नतीजे में अभियुक्तो की कानूनी पैरवी की शुरूआत हो सकी। इस तरह अभियुक्तो तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को न्याय के मंदिर में भी अन्याय का दर्द सहना पड़ा। जबकि कानून यह कहता है कि जब तक अदालत के सामने इसका अपराध साबित न हो जाए तब तक वह निर्दोष है। लेकिन अभियुक्तो की बदकिस्मती देखिए कि कानून की रखवाली करने वाले न्याय के मंदिर में भी इन अधिवक्ताओें के दंगा फसाद का  रवैया का सामना करना पड़ा जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कत्ल के आरोपी नाथूराम गोडसे के घिनौने अपराध की पैरवी करने पहली कतार में खड़े थे। 
खालिद 

तारिक 

  -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-2

बाराबंकी। एस0टी0एफ0 ने तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हुई गिरफ्तारी की जो कहानी बतायी उसमें छेद ही छेद है। बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर लोगों ने एक ही व्यक्ति को इनोवा कार में रिक्शे से उतार कर जबरन डालते हुए देखा था,जबकि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद दोनो ही की कद व काठी औसतन साढे़ पांच फिट के करीब है। 22दिसम्बर 2007 को कड़ाके की ठण्ड में सुबह रेलवे स्टेशन पर कम भीड़ थी। सुबह की नमाज़ से फुरसत पाने के बाद लोग अपने घर चले गए और बाकी रात भर खुलने वाली चाय की दुकान पर चाय की चुस्की ले रहे थे।रेलवे स्टेशन के मेनगेट के सामने तिकोने पार्क के किनारे दो चार रिक्शे वाले  नगर पालिका के तहत गिरायी लकड़ी के अलाव के चारो ओर बैठे हाथ सेक रहे थे तथा सायकिल स्टैण्ड के किनारे एक कोने पर फुल्लन शुक्ला नाम का एक व्यक्ति समाचार पत्र के स्टाल पर बैठा समाचार पत्र बेच रहा था। अचानक रेलवे स्टेशन चैराहे से शहर को जाने वाली रोड पर विश्वनाथ के होटल से चन्द कदम पहले बिजली के खम्भे के सामने रिक्शा पर बैठे एक आदमी को इनोवा कार से उतरे एक आदमी को चार पांच लोगो ने काला कपड़ा ओढ़ाकर गोद में उठाकर कार में डाल दिया। लोग कुछ समझ पाते कि कार मंे डालने वाले स्टेनगन सम्भाल कर बोले कि होशियार कोई भी कार के पास नही आए खतरनाक  आतंकवादी पकड़े गए है। इनके पास आर0डी0एक्स0 जैसी खतरनाक विस्फोटक सामग्री है। इनना सुनना था कि रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गयी, लोग अपने अपने घर की ओर चल पड़े चाय के होटल पर सन्नाटा छा गया।
    आतंकवादी के पकड़े जाने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे शहर में फैल गयी। मीडिया के लोगो का जमघट कोतवाली में जमा होने लगा।जहां  एस0टी0एफ0 और ए0टी0एस0 के साथ लखनऊ की पुलिस कप्तान प्रवीन कुमार स्वयं कोतवाली में मौजूद थे। मीडिया के लोग आतंकवादियों की एक झलक पाने के लिए बेचैन थे लेकिन किसी को अपने मकसद में कामयाबी नही मिली और चन्द समय बाद एस0टी0एफ0 के लोग  कोतवाली में मुकदमा दर्ज करके गाडि़यों से ये कहते हुए लखनऊ की ओर रवाना हो गए कि डी0जी0पी0 केस के सिलसिले में प्रेस के रुबरु होना है। अभियुक्तो को वहां बुलाया गया है जब कि अभियुक्तो को लेकर पुलिस वाले सफेदाबाद गेस्ट हाउस जा पहंुचा, यहाँ अभियुक्तो को बाराबंकी एस0ओ0जी0 के हवाले कर दिया गया,जो इन्हे लेकर जेल पहंुची और वहाँ सी0जे0एम0 ने अभियुक्तों की ज्यूडीशियल रिमाण्ड मन्जूर की।मीडिया के लोग जब रेलवे स्टेशन पहुंचे तो इन्हे सही कहानी इस तरह पता चली कि सबसे पहले चाय की होटल पर उपस्थित अजय कुमार ने मीडिया के लोगो को बताया कि वह सुबह दुकानदारी का समय होने के कारण चारो तरफ ग्राहक खड़ेे थे अचानक शोर मचा तो देखा कि चैराहे के करीब एक रिक्शे पर सवार एक आदमी के करीब खड़े एक बड़ी कार से उतरे लोग इस पर काला रंग का कपड़ा ढककर उसे कार में डाल रहे है। इसके बाद कार तेजी से पुुलिस लाइन की ओर चली गयी। अखबार बेचने वाले फुल्लन शुक्ला ने भी यही बात बतायी। सबसे अहम बात सायकिल स्टैण्ड वाले ने बताया जिसने अपना नाम नही बताया।इसके अनुसार सुबह एक ट्रेन आयी बाहर स्टेशन से बाहर इस समय एक लम्बी काठी का एक आदमी उतरा जिसके दोनो हाथों में काले रंग के बैग थे एक प्लास्टिक की थैला था और दूसरा रेकसीन या चमड़े का था। वह आदमी थोड़़ी दूर जाने पर पी0सी0ओ0के पास ठहरा इधर उधर देखा देखने के बाद रिक्शे वालो के पास आ गया, उसने रिक्शे वालो से कुछ कहा जिससे रिक्शे वालो ने चलने के लिए नही माने। इसके बाद वह आदमी चैराहे की ओर गया तभी एक रिक्शे ले जाने के लिए राजी हो गया। जैसे ही वह चला कि पार्सल कार्यालय के करीब पहले से ही मौजूद एक कार तेज गति से रिक्शे के पास पहुंची और चार पांच आदमी उसमंे से उतरे रिक्शे पर सवार आदमी के सिर और चेहरे को ढककर उसे कार में डाल दिया। जब मीडिया को पुलिस से यह सूचना मिली थी कि आतंकवादी स्टेशन पर पकड़े गए है तो इस बात पर आश्चर्य हुआ कि पुलिस की कहानी कुछ बता रही है और स्टेशन पर देखने वाले लोग कुछ बता रहे है।मीडिया ने पुलिस की बतायी कहानी पर भरोसा किया वही छापा दिखाया जो पुलिस चाह रही थी। एक उर्दू समाचार पत्र को छोड़कर किसी ने भी एक आदमी को पकड़ने की बात नही लिखी।प्रायः देखने में आता है कि पुलिस किसी गुडवर्क का खुलासा करते समय कहती है कि पकड़ने का स्थान और समय वह अभी नही बता सकती। लिखा पढ़ी के बाद ही वह बता पाएंगे लेकिन आश्चर्य कि ऐसे मामलों में जब पुलिस एस0टी0एफ0या ए0टी0एस0 किसी मुस्लिम को आतंकवादी के रुप में पकड़ती है तो मीडिया पुलिस की बनायी गयी कहानी पर विश्वास कर लेती है। हालांकि यह एक संवेदनशील मामला है क्योंकि एक ओर अगर देश की सुरक्षा व उसकी सुख शांति का मामला है तो दूसरी ओर एक पूरी कौम की कौमपरस्ती और देश के लिए वफादारी का भी सम्बन्ध है।
  क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?

बाराबंकीं। कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके केस की वापसी के मामले  में अखिलेश सरकार की नीयत साफ नही है, अगर इसका इरादा नेक होता तो केस को वापस लेने की सरकारी कार्यवायी से पहले इसने मायावती सरकार के समय में गवर्नर की ओर से गठित आर डी निमेश कमीशन की रिपोर्ट को पहले ही प्रकाशित कर देते ताकि जनता के सामने निर्दोष व्यक्तियों की कहानी आ जाती और इसके बाद जब मुकदमा वापसी की कार्यवायी सरकार करती तो सम्प्रदायिक पार्टियां और इनके जनसंगठनों को जनता को फुसलाने का मौका हाथ न लगता। बम धमाके से सम्बन्धित केस वापसी के सम्बन्ध में प़त्र लिखकर जिला मजिस्टेट को आख्या देने को कहा वह प्रचार माध्यमों में लीक हो गए और जिला मजिस्टेट की रिपोर्ट शासन तक आने से पहले विभिन्न न्यायालयों परिसर में अधिवक्ताओं के आन्दोलन का सिलसिला शुरू हो गया।जो आगे और बढता दिखायी दे रहा है।23 नवम्बर 2007 के दिन एक साथ लखनऊ, बनारस, और फैजाबाद की कचहरियों में ताबड़ तोड़ कई बम धमाके हो गए और इसमें 14 व्यक्ति हलाक और करीब 50 जख़्मी हुए।
              बाराबंकी रेलवे स्टेशन से तारिक कासमी (आजमगढ़) और खालिद मुजाहिद (जौनपुर) को बम विस्फोटको के साथ गिरफतार करके इन्होने आतंकवादी संगठन हरकत अलजेहाद(हूजी) का मुख्य कार्यकर्ता बताते हुए फैजाबाद,गोरखपुर (जो कि 23 नवम्बर 2007 से पहले आतंकवादी घटना का शिकार हुआ था) और लखनऊ कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके के अभियुक्त करार दिया था। पुलिस व एस0टी0एफ0 के पास से 9अदद जिलेटिन राड पैक शुदा दर्जन डिटोनेटर, सवा किलो आर0डी0एक्स और कई अदद मोबाइल तथा सिम कार्ड बरामद करने का दावा पेश किया था। लेकिन हैरत अंगेज तौर पर बरामद सामग्री को न तो प्रेस को दिखाई गयी और न ही अदालत के सामने खोली। जिसकी वजह से तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी पर सवालात खड़े होने शुरू हो गए। नेशनल लोकतान्त्रिक पार्टी के कौमी सदर अरशद खान गिरफतारी के 10 दिन पहले से ही तारिक कासमी की गायब हो जाने की घटना के खिलाफ अपने पार्टी प्लेटफार्म से विरोध कर रहे थे। जब वह 12 दिसम्बर को जौनपुर के थाने मडि़याहू से खालिद मुजाहिद के भी गायब होने की खबर आ गयी तो इनकी पार्टी ने गम्भीर रूख अख्तियार कर लिया।12 दिसम्बर को इनकी पार्टी के प्रादेशिक मुखिया चैधरी चरन पाल सिंह उस समय की मुख्यमंत्री मायावती व गर्वनर उ0प्र0 को ज्ञापन के जरिए आगाह किया कि अगर 22दिसम्बर तक तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बरामदगी पुलिस नही करती है तो वह विधानसभा के सामने खुदखुशी कर लेंगे। इस वार्निंग से खौफज़दा मायावती सरकार के पुलिस अधिकारी ने बाराबंकी ने अचानक एक नाटकीय अन्दाज में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी दिखला दी। जबकि 12दिसम्बर 2007 को रानी की सरायं थाना की चेक पोस्ट के करीब लखनऊ बलिया रोड पर मौजा महमूदपुर से हकीम तारिक कासमी निवासी सम्मूपुर थाना रानी की सराय जिला आजमगढ़ के एक सफेद रंग की टाटा सूमो गाड़ी से उतरे कुछ लोगो के जरिये दिन के लगभग 12 बजे  के समय जबरदस्ती अपहरण कर लिया गया। इस घटना को 13 दिनांक को समाचार पत्रों में छापा भी गया था।इसके दो दिन बाद तारिक कासमी के 80 वर्ष के दादा अजहर अली की तहरीर पर थाना रानी की सराय में पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखी थी।तारिक के अपहरण किए जाने की घटना को कई लोगो ने देखा था। इनमें से कई लोगो ने निमेष कमीशन के सामने गवाही भी दी थी। इसी तरह 12 दिसम्बर 2008 के दिन शाम 6 बजे के लगभग कस्बा व थाना मडि़याहू जिला जौनपुर में खालिद मुजाहिद जो एक मदरसे में अध्यापक था, को टाटा सूमो पर सवार कुछ लोगो ने इस समय जबरदस्ती अपहरण कर जौनपुर शहर की तरफ ले गए जब शाम की नमाज अदा करने के बाद खालिद पवन टाकीज के सामने मन्नू चाट वाले की दुकान पर चाट खाने रूके थे। खालिद के अपहरण की तस्दीक निमेष कमीशन के सामने प्रमुख रूप से मुहम्मद शाहिद आलम, मुहम्मद शकील, जुल्फिकार, फखरे आलम, शकील अहमद, हाजी अकरम उल्ला, इम्तियाज अहमद(सभी दुकानदार है), शाहिद जमाल(चाचा जाद भाई खालिद मुजाहिद),अनीस उर्ररहमान एडवोकेट ने की है।खालिद के अपहरण की रिपोर्ट चाचाजाद भाई मुहम्मद शाहिद ने भीड़ के साथ थाने पहुुचकर पुलिस को इसके अपहरण किए जाने की तहरीर दे कर रिपोर्ट लिखानी चाही किन्तु इसकी रिपोर्ट पुलिस ने नही लिखी, इसके बाद खालिद के चाचा फलाही ने मानव अधिकार आयोग,मुख्यमंत्री उ0प्र0, राज्यपाल उ0प्र0 और डी0जी0पी0 आदि को शिकायती पत्र भेजे और खालिद की बरामदगी की प्रार्थना की, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नही की। चुनाव के समय मुलायम सिंह ने मुसलमानों से वादा किया था कि इनकी सरकार अगर बहुमत में आती है तो आतंकवादी के फर्जी केस से मुस्लिम नवजवानो की जेल से रिहाई कर दी जाएगी। लेकिन बहुमत में आने के बाद जब अखिलेश सरकार ने जस्टिस निमेष कमीशन की प्राथमिकता नही दी जो मार्च मंे ही करनी थी और न ही निमेष कमीशन की रिपोर्ट जनता में प्रकाशित की? इसके बजाए सरकार की ओर से जिला फैजाबाद, गोरखपुर,लखनऊ व बाराबंकी जिला प्रशासन से वाद की जानकारी तलब की जिसके बाद हिन्दुत्ववादी संगठन आर0एस0एस0 व बी0जे0पी0 ने विरोध कार्यक्रम को तेज कर दिया, जो अखिलेश सरकार के बढ़ते हुए कदमो को रोकने का काम जरूर कर सकता है?
   क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)
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