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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

मायावती जी, रामदेव का इलाज बेनी प्रसाद के पास

मायावती जी, रामदेव का इलाज बेनी प्रसाद के पास है। रामदेव संत का चोला धारण किये हुए हैं। वह चोला उनके लिए कवच कुंडल है। वह समझते हैं कि हम कुछ भी कहें कुछ भी करें। अंध धार्मिकता के कारण सब माफ़ी योग्य है।  वास्तव में संत बहुत कम लोग हैं कुसंत लोगों की संख्या ज्यादा है।  रामदेव औषधि व्यापारी हैं अथाह काला धन उनके पास है।  हर बात में असत्य का सहारा लेकर आरोप प्रत्यारोप लगाना उनकी आदत है अगर वह संत होते तो राजनीती में नहीं होते और उनके लिए सभी लोग बराबर होते। दलित विरोधी  मानसिकता जिस तरह से उन्होंने राहुल गाँधी के ऊपर कटाक्ष करते हुए उजागर की है वह किसी भी तरह से स्वागत योग्य नहीं हो सकती है।  रामदेव की स्तिथि एक सड़क छाप प्रचारक की है उस प्रचारक को यह नही मालूम होता है कि उसके द्वारा कहे जा रहे शब्दों का क्या अर्थ है।
 इसी सन्दर्भ में उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में टिप्पणियां करते हुए कहा था कि वह दलितों के घर हनीमून और पिकनिक मनाने जाते हैं। इस मामले में शुक्रवार को उनके खिलाफ लखनऊ में धारा 171(6) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
 बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने  योग गुरु बाबा रामदेव द्वारा कांग्रेस की आलोचना के दौरान दलितों के संबंध में की गई टिप्पणी की निंदा करते हुए उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जेल भेजने की मांग की है।
बेनी ने का कि मोदी को सबक सिखाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि जानवर खुद नहीं चलते हैं बल्कि उन्हें नकेल के साथ चलाया जाता है। बेनी ने कहा कि ऎसे जानवरों के साथ सलूक करना मुझे बखूबी आता है बेनी ने मोदी की जानवर से तुलना करते हुए उन्हें हंटर से रास्ते पर लाने की बात कही थी। इसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई। हमारे जिले के इस्पात राज्य मंत्री श्री बेनी प्रसाद वर्मा की दिल्ली में चली होती तो उनका  योग (जो बाराबंकी जनपद में तो प्रसिद्द है ) उसका इस्तेमाल होता। राम नगर थाना जिला बाराबंकी में मंत्री जी के एक बडबोले विरोधी के ऊपर तत्कालीन थाना अध्यक्ष ने योग का प्रयोग किया था। जब न्यायालय में उक्त नेता जी का चालान आया तो पेट के बल वो लेटाये हुए थे और जब माननीय मंत्री जी का चुनाव आया तो उसमें सबसे आगे आगे वही नेताजी उनका चुनाव प्रचार कर रहे थे।
 सुमन
लो क सं घ र्ष !



बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-3


बाराबंकी। अभियुक्त तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को 24 दिसम्बर लखनऊ जेल पहंचाया गया जहां मौजूद एक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके पुलिस ने 9 दिन की रिमाण्ड हासिल करने के बाद अभियुक्तो पर जुल्म ढाए गए और सारी हदे पार कर दी गयी। उन्हे पुलिस की तरफ से सरकारी गवाह बनाने की भी पेशकश की गयी। इसके बाद दोनो अभियुक्तो को फैजाबाद जेल ले जाया गया जहां 8 जनवरी को मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में पुलिस ने रिमाण्ड हासिल किया और एक बार फिर अभियुक्तो पर जुल्म ढाने का सिलसिला चल पड़ा। कानून के रखवालो के जुल्म ढाने के बाद इंसाफ के घर मंे इंसाफ पाने में भी काफी दिक्कतो ं का सामना करना पड़ा। एक मौके पर तो अभियुक्तों के वकील को भी मारा पीटा गया। इसके साथ साथ पुलिस इन्हे रिमाण्ड हासिल करने के बाद गोमती नगर के एक मकान मंे ले गयी जहां उनके ऊपर बेइन्तिहा जुल्म ढाए गए सोने तक का मौका नही दिया गया, टांगो को चीरा जाता था, बाल उखाड़े जाते थे, इनके अजू तनासिल (वृषण) को डोरी से बांध कर इसमें वजन लटका दिया जाता था जिससे इन्हे बहुत अधिक तकलीफ होती थी तथा इनके मुँह में जबरन शराब उड़ेली जाती थी पेशाब पीने को दिया जाता था। उनके पैखाने के मुहाने में पेट्रोल डाला जाता था जिससे इन्हें असहनीय दर्द होता था। इन्हे सुअर का गोश्त खिलाया जाता था कड़ाके की ठण्ड में बर्फ की सिल्लियो पर लेटाया जाता था, करन्ट के झटके दिए जाते थे। इसी दौरान हैदराबाद,राजस्थान,गुजरात,मुम्बई, बंगाल, दिल्ली और कई और राज्यो की पुलिस पूछताछ करने इनके पास आती थी।इनसे एस0टी0एफ0 ने रटा रटाया बयान याद करवाया। एक बार राजस्थान और दिल्ली की पुलिस के सामने सही बयान दे दिया यह सोचकर कि ये उ0प्र0 की पुलिस नही है सच बता देंगे तो मुझे यह लोग छोड़ देंगे लेकिन सही बयान देने पर उनके ऊपर और अधिक जुल्म ढाने शुरू हो गए। दोनो अभियुक्तो ने अदालत को दिए गए बयान में कहा है कि 17 जनवरी को एक बैटरी जिस पर कुछ चिकनाहट लगा हुआ था इनके हाथ में पकड़वायी गयी इनके हाथ और पैरो के निशान लिए गए और सादे कागज पर इनके हाथ व पैर के निशान लिए गए। पुलिस अधिकारी निशान लेते समय आपस में बात कर रहे थे कि ऐसे सबूत तैयार करो कि इन्हे फांसी के फन्दे तक ले जाने के लिए काफी हों।दोनो ही अभियुक्तो ने बताया कि पुलिस इन्हे सरकारी गवाह बनाने के लिए कह रही थी किन्तु इन्होने सरकारी गवाह बनने से मना कर दिया। इनकी कानूनी पैरवी के लिए अधिवक्ता पहले आगे नही आए और फिर जब लखनऊ के मुहम्मद शुएब एडवोकेट ने हिम्म्त दिखायी तो इन्हे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बाराबंकी सिविल कोर्ट में जब वह पहली बार आए तो उस समय जिला बार के महामंत्री प्रदीप सिंह ने भी शुएब एडवोकेट को यह सलाह दी कि वह आतंकवाद के आरोप में निरूद्ध अभियुक्तो की पैरवी न करे वरना उनकी सुरक्षा नही कर पाएंगे। माहौल खराब देखकर शुएब एडवोकेट वापस लखनऊ अपने घर चले गए, लेकिन वहां से उन्होने इलाहाबाद के मुख्य न्यायाधीश शिकायत पत्र भेजकर कहा कि अधिवक्ताओं द्वारा उन्हें धमकी दी गयी है। उस समय जिला जज पीयूष कुमार से रिपोर्ट तलब कर ली जिन्होने सरदार बेन्त सिंह और प्रदीप सिंह समेत कई अधिवक्ताओं को नोटिस भेजकर इनका बयान दर्ज कराया गया। अपने खिलाफ हाईकोर्ट का सख्त कार्यवायी देखकर अधिवक्ताओं के तेवर ढीले पड़ गए। इसी समय धर्मनिरपेक्ष मानसिकता के तेजतर्रार अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने खुद अभियुक्तो की पैरवी करने की पहल की जिसे इन्होने कबूल कर लिया जिसके नतीजे में अभियुक्तो की कानूनी पैरवी की शुरूआत हो सकी। इस तरह अभियुक्तो तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद को न्याय के मंदिर में भी अन्याय का दर्द सहना पड़ा। जबकि कानून यह कहता है कि जब तक अदालत के सामने इसका अपराध साबित न हो जाए तब तक वह निर्दोष है। लेकिन अभियुक्तो की बदकिस्मती देखिए कि कानून की रखवाली करने वाले न्याय के मंदिर में भी इन अधिवक्ताओें के दंगा फसाद का  रवैया का सामना करना पड़ा जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कत्ल के आरोपी नाथूराम गोडसे के घिनौने अपराध की पैरवी करने पहली कतार में खड़े थे। 
खालिद 

तारिक 

  -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?-2

बाराबंकी। एस0टी0एफ0 ने तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हुई गिरफ्तारी की जो कहानी बतायी उसमें छेद ही छेद है। बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर लोगों ने एक ही व्यक्ति को इनोवा कार में रिक्शे से उतार कर जबरन डालते हुए देखा था,जबकि तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद दोनो ही की कद व काठी औसतन साढे़ पांच फिट के करीब है। 22दिसम्बर 2007 को कड़ाके की ठण्ड में सुबह रेलवे स्टेशन पर कम भीड़ थी। सुबह की नमाज़ से फुरसत पाने के बाद लोग अपने घर चले गए और बाकी रात भर खुलने वाली चाय की दुकान पर चाय की चुस्की ले रहे थे।रेलवे स्टेशन के मेनगेट के सामने तिकोने पार्क के किनारे दो चार रिक्शे वाले  नगर पालिका के तहत गिरायी लकड़ी के अलाव के चारो ओर बैठे हाथ सेक रहे थे तथा सायकिल स्टैण्ड के किनारे एक कोने पर फुल्लन शुक्ला नाम का एक व्यक्ति समाचार पत्र के स्टाल पर बैठा समाचार पत्र बेच रहा था। अचानक रेलवे स्टेशन चैराहे से शहर को जाने वाली रोड पर विश्वनाथ के होटल से चन्द कदम पहले बिजली के खम्भे के सामने रिक्शा पर बैठे एक आदमी को इनोवा कार से उतरे एक आदमी को चार पांच लोगो ने काला कपड़ा ओढ़ाकर गोद में उठाकर कार में डाल दिया। लोग कुछ समझ पाते कि कार मंे डालने वाले स्टेनगन सम्भाल कर बोले कि होशियार कोई भी कार के पास नही आए खतरनाक  आतंकवादी पकड़े गए है। इनके पास आर0डी0एक्स0 जैसी खतरनाक विस्फोटक सामग्री है। इनना सुनना था कि रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गयी, लोग अपने अपने घर की ओर चल पड़े चाय के होटल पर सन्नाटा छा गया।
    आतंकवादी के पकड़े जाने की खबर जंगल की आग की तरह पूरे शहर में फैल गयी। मीडिया के लोगो का जमघट कोतवाली में जमा होने लगा।जहां  एस0टी0एफ0 और ए0टी0एस0 के साथ लखनऊ की पुलिस कप्तान प्रवीन कुमार स्वयं कोतवाली में मौजूद थे। मीडिया के लोग आतंकवादियों की एक झलक पाने के लिए बेचैन थे लेकिन किसी को अपने मकसद में कामयाबी नही मिली और चन्द समय बाद एस0टी0एफ0 के लोग  कोतवाली में मुकदमा दर्ज करके गाडि़यों से ये कहते हुए लखनऊ की ओर रवाना हो गए कि डी0जी0पी0 केस के सिलसिले में प्रेस के रुबरु होना है। अभियुक्तो को वहां बुलाया गया है जब कि अभियुक्तो को लेकर पुलिस वाले सफेदाबाद गेस्ट हाउस जा पहंुचा, यहाँ अभियुक्तो को बाराबंकी एस0ओ0जी0 के हवाले कर दिया गया,जो इन्हे लेकर जेल पहंुची और वहाँ सी0जे0एम0 ने अभियुक्तों की ज्यूडीशियल रिमाण्ड मन्जूर की।मीडिया के लोग जब रेलवे स्टेशन पहुंचे तो इन्हे सही कहानी इस तरह पता चली कि सबसे पहले चाय की होटल पर उपस्थित अजय कुमार ने मीडिया के लोगो को बताया कि वह सुबह दुकानदारी का समय होने के कारण चारो तरफ ग्राहक खड़ेे थे अचानक शोर मचा तो देखा कि चैराहे के करीब एक रिक्शे पर सवार एक आदमी के करीब खड़े एक बड़ी कार से उतरे लोग इस पर काला रंग का कपड़ा ढककर उसे कार में डाल रहे है। इसके बाद कार तेजी से पुुलिस लाइन की ओर चली गयी। अखबार बेचने वाले फुल्लन शुक्ला ने भी यही बात बतायी। सबसे अहम बात सायकिल स्टैण्ड वाले ने बताया जिसने अपना नाम नही बताया।इसके अनुसार सुबह एक ट्रेन आयी बाहर स्टेशन से बाहर इस समय एक लम्बी काठी का एक आदमी उतरा जिसके दोनो हाथों में काले रंग के बैग थे एक प्लास्टिक की थैला था और दूसरा रेकसीन या चमड़े का था। वह आदमी थोड़़ी दूर जाने पर पी0सी0ओ0के पास ठहरा इधर उधर देखा देखने के बाद रिक्शे वालो के पास आ गया, उसने रिक्शे वालो से कुछ कहा जिससे रिक्शे वालो ने चलने के लिए नही माने। इसके बाद वह आदमी चैराहे की ओर गया तभी एक रिक्शे ले जाने के लिए राजी हो गया। जैसे ही वह चला कि पार्सल कार्यालय के करीब पहले से ही मौजूद एक कार तेज गति से रिक्शे के पास पहुंची और चार पांच आदमी उसमंे से उतरे रिक्शे पर सवार आदमी के सिर और चेहरे को ढककर उसे कार में डाल दिया। जब मीडिया को पुलिस से यह सूचना मिली थी कि आतंकवादी स्टेशन पर पकड़े गए है तो इस बात पर आश्चर्य हुआ कि पुलिस की कहानी कुछ बता रही है और स्टेशन पर देखने वाले लोग कुछ बता रहे है।मीडिया ने पुलिस की बतायी कहानी पर भरोसा किया वही छापा दिखाया जो पुलिस चाह रही थी। एक उर्दू समाचार पत्र को छोड़कर किसी ने भी एक आदमी को पकड़ने की बात नही लिखी।प्रायः देखने में आता है कि पुलिस किसी गुडवर्क का खुलासा करते समय कहती है कि पकड़ने का स्थान और समय वह अभी नही बता सकती। लिखा पढ़ी के बाद ही वह बता पाएंगे लेकिन आश्चर्य कि ऐसे मामलों में जब पुलिस एस0टी0एफ0या ए0टी0एस0 किसी मुस्लिम को आतंकवादी के रुप में पकड़ती है तो मीडिया पुलिस की बनायी गयी कहानी पर विश्वास कर लेती है। हालांकि यह एक संवेदनशील मामला है क्योंकि एक ओर अगर देश की सुरक्षा व उसकी सुख शांति का मामला है तो दूसरी ओर एक पूरी कौम की कौमपरस्ती और देश के लिए वफादारी का भी सम्बन्ध है।
  क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

क्या सरकार निर्दोष मुस्लिम नवजवानों का वाद वापसी करना चाहती है?

बाराबंकीं। कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके केस की वापसी के मामले  में अखिलेश सरकार की नीयत साफ नही है, अगर इसका इरादा नेक होता तो केस को वापस लेने की सरकारी कार्यवायी से पहले इसने मायावती सरकार के समय में गवर्नर की ओर से गठित आर डी निमेश कमीशन की रिपोर्ट को पहले ही प्रकाशित कर देते ताकि जनता के सामने निर्दोष व्यक्तियों की कहानी आ जाती और इसके बाद जब मुकदमा वापसी की कार्यवायी सरकार करती तो सम्प्रदायिक पार्टियां और इनके जनसंगठनों को जनता को फुसलाने का मौका हाथ न लगता। बम धमाके से सम्बन्धित केस वापसी के सम्बन्ध में प़त्र लिखकर जिला मजिस्टेट को आख्या देने को कहा वह प्रचार माध्यमों में लीक हो गए और जिला मजिस्टेट की रिपोर्ट शासन तक आने से पहले विभिन्न न्यायालयों परिसर में अधिवक्ताओं के आन्दोलन का सिलसिला शुरू हो गया।जो आगे और बढता दिखायी दे रहा है।23 नवम्बर 2007 के दिन एक साथ लखनऊ, बनारस, और फैजाबाद की कचहरियों में ताबड़ तोड़ कई बम धमाके हो गए और इसमें 14 व्यक्ति हलाक और करीब 50 जख़्मी हुए।
              बाराबंकी रेलवे स्टेशन से तारिक कासमी (आजमगढ़) और खालिद मुजाहिद (जौनपुर) को बम विस्फोटको के साथ गिरफतार करके इन्होने आतंकवादी संगठन हरकत अलजेहाद(हूजी) का मुख्य कार्यकर्ता बताते हुए फैजाबाद,गोरखपुर (जो कि 23 नवम्बर 2007 से पहले आतंकवादी घटना का शिकार हुआ था) और लखनऊ कचहरी सिलसिलेवार बम धमाके के अभियुक्त करार दिया था। पुलिस व एस0टी0एफ0 के पास से 9अदद जिलेटिन राड पैक शुदा दर्जन डिटोनेटर, सवा किलो आर0डी0एक्स और कई अदद मोबाइल तथा सिम कार्ड बरामद करने का दावा पेश किया था। लेकिन हैरत अंगेज तौर पर बरामद सामग्री को न तो प्रेस को दिखाई गयी और न ही अदालत के सामने खोली। जिसकी वजह से तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी पर सवालात खड़े होने शुरू हो गए। नेशनल लोकतान्त्रिक पार्टी के कौमी सदर अरशद खान गिरफतारी के 10 दिन पहले से ही तारिक कासमी की गायब हो जाने की घटना के खिलाफ अपने पार्टी प्लेटफार्म से विरोध कर रहे थे। जब वह 12 दिसम्बर को जौनपुर के थाने मडि़याहू से खालिद मुजाहिद के भी गायब होने की खबर आ गयी तो इनकी पार्टी ने गम्भीर रूख अख्तियार कर लिया।12 दिसम्बर को इनकी पार्टी के प्रादेशिक मुखिया चैधरी चरन पाल सिंह उस समय की मुख्यमंत्री मायावती व गर्वनर उ0प्र0 को ज्ञापन के जरिए आगाह किया कि अगर 22दिसम्बर तक तारिक कासमी व खालिद मुजाहिद की बरामदगी पुलिस नही करती है तो वह विधानसभा के सामने खुदखुशी कर लेंगे। इस वार्निंग से खौफज़दा मायावती सरकार के पुलिस अधिकारी ने बाराबंकी ने अचानक एक नाटकीय अन्दाज में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफतारी दिखला दी। जबकि 12दिसम्बर 2007 को रानी की सरायं थाना की चेक पोस्ट के करीब लखनऊ बलिया रोड पर मौजा महमूदपुर से हकीम तारिक कासमी निवासी सम्मूपुर थाना रानी की सराय जिला आजमगढ़ के एक सफेद रंग की टाटा सूमो गाड़ी से उतरे कुछ लोगो के जरिये दिन के लगभग 12 बजे  के समय जबरदस्ती अपहरण कर लिया गया। इस घटना को 13 दिनांक को समाचार पत्रों में छापा भी गया था।इसके दो दिन बाद तारिक कासमी के 80 वर्ष के दादा अजहर अली की तहरीर पर थाना रानी की सराय में पुलिस ने गुमशुदगी की रिपोर्ट भी लिखी थी।तारिक के अपहरण किए जाने की घटना को कई लोगो ने देखा था। इनमें से कई लोगो ने निमेष कमीशन के सामने गवाही भी दी थी। इसी तरह 12 दिसम्बर 2008 के दिन शाम 6 बजे के लगभग कस्बा व थाना मडि़याहू जिला जौनपुर में खालिद मुजाहिद जो एक मदरसे में अध्यापक था, को टाटा सूमो पर सवार कुछ लोगो ने इस समय जबरदस्ती अपहरण कर जौनपुर शहर की तरफ ले गए जब शाम की नमाज अदा करने के बाद खालिद पवन टाकीज के सामने मन्नू चाट वाले की दुकान पर चाट खाने रूके थे। खालिद के अपहरण की तस्दीक निमेष कमीशन के सामने प्रमुख रूप से मुहम्मद शाहिद आलम, मुहम्मद शकील, जुल्फिकार, फखरे आलम, शकील अहमद, हाजी अकरम उल्ला, इम्तियाज अहमद(सभी दुकानदार है), शाहिद जमाल(चाचा जाद भाई खालिद मुजाहिद),अनीस उर्ररहमान एडवोकेट ने की है।खालिद के अपहरण की रिपोर्ट चाचाजाद भाई मुहम्मद शाहिद ने भीड़ के साथ थाने पहुुचकर पुलिस को इसके अपहरण किए जाने की तहरीर दे कर रिपोर्ट लिखानी चाही किन्तु इसकी रिपोर्ट पुलिस ने नही लिखी, इसके बाद खालिद के चाचा फलाही ने मानव अधिकार आयोग,मुख्यमंत्री उ0प्र0, राज्यपाल उ0प्र0 और डी0जी0पी0 आदि को शिकायती पत्र भेजे और खालिद की बरामदगी की प्रार्थना की, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नही की। चुनाव के समय मुलायम सिंह ने मुसलमानों से वादा किया था कि इनकी सरकार अगर बहुमत में आती है तो आतंकवादी के फर्जी केस से मुस्लिम नवजवानो की जेल से रिहाई कर दी जाएगी। लेकिन बहुमत में आने के बाद जब अखिलेश सरकार ने जस्टिस निमेष कमीशन की प्राथमिकता नही दी जो मार्च मंे ही करनी थी और न ही निमेष कमीशन की रिपोर्ट जनता में प्रकाशित की? इसके बजाए सरकार की ओर से जिला फैजाबाद, गोरखपुर,लखनऊ व बाराबंकी जिला प्रशासन से वाद की जानकारी तलब की जिसके बाद हिन्दुत्ववादी संगठन आर0एस0एस0 व बी0जे0पी0 ने विरोध कार्यक्रम को तेज कर दिया, जो अखिलेश सरकार के बढ़ते हुए कदमो को रोकने का काम जरूर कर सकता है?
   क्रमशः
    -मुहम्मद तारिक खान
     अनुवादक -नीरज वर्मा एडवोकेट
        (इंकलाब से साभार)

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

संतों महापुरूषों का नाम जपना पराया माल अपना!



तो बहुसंख्यक समुदायों दलित पिछड़ा अल्पसंख्यक आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेताअस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं उनकी क्या भूमिका है संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं  वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैंउत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों मजदूरों महिलाओं छात्रों आदिवासियों युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैं
हम एक अनंत अंधेरी सुरंग में फंसे हुए हैं और बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है।विडंबना यह है कि हम निनानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता ब्लैक होल में जीने के आदी हो गये हैं।अंधेरा हमारी आंखों में किरचों के मानिंद बिंधता नहीं है।इस अंधेरे में हम कार्निवाल मना रहे हैं।अंधेरे को खत्म करना हमारे ख्वाब का सबब नहीं है और न हम अंधेरे को अंधेरा मानने को तैयार हैं।जाहिर हैए हाथ पांव हिलाने की जरुरत बी महसूस नहीं होती। ममता बनर्जी ने रसोई गैस में सब्सिडी खत्म करने के खिलाफ समर्थन वापस लिया केंद्र सरकार से  पर बंगाल के  पूजा बाजार में अंधाधुंध खरीददारी शापिंग माल में उमड़ती भीड़ और महीनों से तैयार किया जा रहा पूजा परिवेश में लगता नहीं कि कहीं  रसोई में आग लगी है। मध्य और निम्न मध्य वर्ग के लोग रोजाना हजारों फूंकने के लिए बाजार में गुत्थमगुत्था है। दूसरी ओरए मान्यवर  कांशीराम की राख में बची खुची चिनगारी से आग पैदा करने की मायावती की चुनावी कवायद का हश्र यह कि ऐन मौके पर सुप्रीम कोर्ट से आय से बाहर की संपत्ति पर जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी होते न होते आर्थिक नीतियों पर भारी गर्जन तर्जन के बाद फिरउसी कारपोरेट सरकार को समर्थन जारी रखने का फैसला।खोदा पहाड़, निकली चूहिया!बहिष्कृतो बहुजनों का नेतृत्व करेने वाले तमाम दलित, पिछड़ा, आदिवासी, अल्पसंख्यक द्रविड़ नेताओं की जान तोते में है। तोते की गरदन पर दबाव पड़ते न पड़ते ये सारे लोग सुर ताल में नाचने गाने लगते हैं।
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार से समर्थन वापसी का फैसला फिलहाल टाल दिया है। मायावती ने कहा है कि डीजल की बढ़ी कीमतों और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ;एफडीआईद्ध जैसे फैसले पर विरोध के बावजूद वह केंद्र सरकार से समर्थन वापस नहीं लेंगी।लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी ;बसपाद्ध की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद मायावती ने यूपीए सरकार का आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही हैए जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। इसके बाद भी समर्थन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि फिलहाल वह यथास्थिति ही चाहती हैं। समर्थन वापसी का फैसला उचित समय पर किया जाएगा।
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच के लिए सीबीआई स्वतंत्र है।उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले की जांच से केन्द्रीय जांच ब्यूरो को रोका नहीं गया है।
इससे पहले बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन करके साबित किया है कि वह विधानसभा चुनाव भले ही हार गई हों पर बीएसपी का जनाधार अभी भी कायम है। वहीं दूसरी ओर यह भी जता दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में वह नए जातीय समीकरणों का इस्तेमाल करेंगी। संकल्प रैली में भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने माया के विरोधियों को करारा जवाब दे दिया है।  रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने केंद्र और राज्य की अखिलेश सरकार पर हमला बोला। कांशीराम की पुण्यतिथि पर घोषित अवकाश को रद्द किए जाने के एसपी सरकार के फैसले पर माया ने राज्य सरकार को घेरा तो इसे राष्ट्रीय शोक न मनाने के फैसले पर केंद्र पर भी हमला किया। माया ने दोनों दलों को दलित विरोधी बताया।
यूपी विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी रैली को संबोधित करते हुए माया ने कहा कि वर्तमान एसपी सरकार शहर और योजनाओं के नाम बदल रही है। इन्हें बाबा साहब अंबेडकर और अन्य दलित नेताओं के नामों पर रखा गया था और एसपी शासन में कुल 24 मूर्तियां तोड़ी गईं हैं। यही नहीं मेरी मूर्ति को भी तोड़ा गया। दलित राजनीति करने वाली माया ने इस बार भी इसी ओर अपने भाषण का रुख मोड़ते हुए नौकरियों में आरक्षण के बिल की बात कही। माया ने कहा कि यह बिल अभी तक संसद में अटका है।प्रदेश में 6 महीने पहले ही जीतकर आई समाजवादी पार्टी की सरकार पर हमला करते हुए पूर्व सीएम मायावती ने कहा इस सरकार को यादवों को छोड़ न तो ओबीसी की फिक्र है न मुस्लिमों की। एसपी पर चुनावी वादे पूरे न करने का आरोप लगाते हुए माया ने कहा कि इस राज में यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है।
इस रैली और यूपी के बदले माहौल को देखते हुए लग रहा है कि अब वह अपनी रणनीति बदल रही हैं। अब तक सर्वसमाज की बात करने वाली मायावती अब दलित.मुस्लिम समीकरण पर ध्यान दे रही हैं। जिन अगड़ों के सहारे वे 2007 में यूपी की सत्ता पर काबिज हुई थीं वे अब उनकी प्राथमिकता में नहीं है। संकल्प रैली स्थल पर किसी वर्ग विशेष को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। राजनैतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि मायावती अब अपना ध्यान मुसलमानों पर केंद्रित कर रही हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि उनकी सत्ता मुसलमानों की वजह से ही गई है। इसलिए अब उनका पूरा ध्यान दलितों के साथ.साथ मुसलमानों पर है। रैली में माया दलित अत्याचार पर तो अपने स्वभाव के अनुकूल बोलीं लेकिन उन्होंने प्रदेश की सत्ता में भागीदारी मुसलमानों के साथ पक्षपात की भी बात कही। उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का सवाल भी उठाया।
माना जा रहा है कि माया अब दलित मुस्लिम गठजोड़ को फिर से ताकत देने का काम करेंगी। दलित अत्याचार के साथ.साथ मुसलमानों के साथ श्धोखाश् उनका अहम मुद्दा होने वाला है। माया को यह अच्छी तरह मालूम है कि सपा के मुस्लिम नेताओं में आपसी खींचतान चल रही है। हवा के साथ बहे मुस्लिम मतदाताओं को बीएसपी के साथ वापस जोड़ने में ये नेता ही अहम भूमिका निभाएंगे। एसपी द्वारा मुसलमानों के साथ किए गए वायदे उनका मुख्य मुद्दा होंगे। जहां तक आम मुसलमानों का सवाल है कम से कम कानून व्यवस्था के मामले में वे मायावती सरकार को अब याद कर रहे हैं।  
कांग्रेस और संघपरिवार अल्पसंख्यक बाजार वर्चस्व वाले तबके के हितों के मद्देनजर राजनीति के जरिये हिंदू राष्ट्रवाद के तहत मनुस्मृति  की व्यवस्था कायम करके कारपोरेट साम्राज्यवादी यहूदी हिंदू गठजोड़ की विश्वव्यवस्था के मुताबिक अर्थ व्यवस्था को खुला बाजार में तब्दील करके बहुसंख्यक जनता को जल जंगल जमीन आजीविका रोजगार और उत्पादन के साधनों से वंचित करने में लगी हैं।नागरिकता और मानवाधिकार निलंबित है। राष्ट्र का सैन्यीकरण हो रहा है तो अंतरिक्ष का भी।समता और न्याय की बलि चढ़ा दी गयी है। रोज संसदीय व्यवस्था को धता बताते हुएए संविधान की हत्या करते हुए एक के बाद एक फैसले लागू किये जा रहे हैं कारपोरेट नीति निर्धारण के जरिये। वाशिंगटन और तेल अबीब के निर्देशन में। ज्यादातर हिमालयी क्षेत्र और पूरे मध्यभारत में सशस्त्र बल विशेष सैन्य कानून लागू है या फिर तरह तरह के सैन्य अभियानों या सलवा जुड़ुम जैसे सरकारी कार्यक्रम के तहत इस कानून के प्रवधान लागू हैं।जिन लोगों पर शासन किया जा रहा है उन पर नियंत्रण रखने के लिए सूचना एकत्रित करना किसी भी शासक सत्ता का मूलभूत सिद्धांत है। जिस समय भूमि अधिग्रहण और नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध भारत में बढ़ता जा रहा हैए तब मध्य भारत में खुल्लमखुल्ला जंग की छाया मेंसरकार ने नियंत्रण तकनीक के तौर पर एक विशाल बायोमेट्रिक कार्यक्रम का प्रारंभ कियाए यूनिक आइडेंटीफिकेशन नंबर ;विशिष्ट पहचान संख्या या यूआइडी जो शायद दुनिया का सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और बड़ी लागत की सूचना एकत्रीकरण परियोजना है। लोगों के पास पीने का साफ पानीए या शौचालयए या खानाए या पैसा नहीं है मगर उनके पास चुनाव कार्ड या यूआइडी नंबर होंगे। क्या यह संयोग है कि इनफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलकेणी द्वारा चलाया जा रहा यूआइडी प्रोजेक्टए जिसका प्रकट उद्देश्य गरीबों को सेवाएं उपलब्ध करवाना है आइटी उद्योग में बहुत ज्यादा पैसा लगाएगा जो आजकल कुछ परेशानी में है;यूआइडी बजट का मोटा अंदाज भी भारत सरकार के वार्षिक शिक्षा खर्च से ज्यादा है। द्ध इतनी ज्यादा तादाद में नाजायज और पहचान रहित  लोग जो झुग्गियों में रहने वाले हैंए खोमचे वाले हैंए ऐसे आदिवासी हैं जिनके पास भूमि के पट्टे नहीं. जनसंख्या वाले देश को ष्डिजीटलाइजष् करने का असर यह होगा कि उनका अपराधीकरण हो जायेगाए वे नाजायज से अवैध हो जायेंगे। योजना यह है कि एन्क्लोजर ऑफ कॉमंस का डिजिटल संस्करण तैयार किया जाए और लगातार सख्त होते जा रहे पुलिस राज्य के हाथों में अपार अधिकार सौंप दिए जाएं। तो बहुसंख्यक समुदायों दलितए पिछड़ाए अल्पसंख्यकए आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेता,अस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं उनकी क्या भूमिका है संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं  वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैंउत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों मजदूरोंए महिलाओं छात्रों आदिवासियों युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैंअमेरिका में हो रहे ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन के विपरीत हजारे आंदोलन ने निजीकरण कॉर्पोरेट ताकत और आर्थिक सुधारों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। उसके विपरीत इसके प्रमुख मीडिया समर्थकों ने बड़े.बड़े कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार घोटालों ;जिनमें नामी पत्रकारों का भी पर्दाफाश हुआ थाद्ध से जनता का ध्यान सफलतापूर्वक हटा दिया और राजनीतिकों की जन.आलोचना का इस्तेमाल सरकार के विवेकाधीन अधिकारों में और कमी लाने एवं और अधिक निजीकरण की मांग करने के लिए इस्तेमाल किया। ;2008 में अण्णा हजारे ने विश्व बैंक से उत्कृष्ट जन सेवा का पुरस्कार लिया।  विश्व बैंक ने वाशिंगटन से एक वक्तव्य जारी किया कि यह आंदोलन उसकी नीतियों से पूरी तरह मेल खाता है।
हालत कितनी विकराल है कल जब पूरे देश में हिंदी और अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के टीवी चैनल लखनऊ में बहुजनों की मेगा रैली की लाइव टेलीकास्ट कर रहे थेए तो बंगाल के तमाम टीवी चैनल ने स्क्रालिंग तक में इसका उल्लेख नहीं किया। आज के अखबारों में भी इसकी सूचना नहीं है। लेकिन बंगाल में ब्राह्मणवादी व्यवस्था तो आजादी के बाद ही लागू हुई। ग्यरहवीं सदी तक यहा बौद्धकाल रहा। फिर अठारवीं सदी तक मुसलमानों का शासन। अठारवीं सदी तक महाराष्ट्र और केरल तमिलनाडु से लेकर चटगांव और मणिपुर तक रियासतों में मूल निवासी राज कर रहे थे।बंगाल में वर्ण व्यवस्था कभी लागू नहीं रही। आज भी बंगाल में न क्षत्रिय हैं और न राजपूत। आजादी से पहले तीनें अंतरिम सरकार मुसलमान और दलित मिलकर चला रहे थे। आज हालत यह है कि चंडाल आंदोलन के जरिए अस्पृश्यता मोचन का आगाज करने वाले , नील विद्रोह के जरिए किसान आंदलन की अगुवाई करनेवाला, अंबेडकर को संविधान सभा में भेजनेवाला मतुआ आंदोलन की सिरमौर ममता बनर्जी है। इसी तरह तमिलनाडु में पेरियार नारायण गुरू के आंदोलन के नेतृत्व में अयंगर ब्राह्मण जयललिता हैं।तमिलनाडुए बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जो पंजाब जो बहुजन आंदोलन के आधार रहे हैं , खत्म हैं। वहां सर्वत्र अति अल्प संख्यक तबका जीवन के हर क्षेत्र में काबिज हैं और वे बहुजनों का नेतृत्व जिहादी तेवर के साथ करके मुक्ति और मोक्ष का तिलस्मी किला बनाये हुए हैं।
वामपंथियों की व्राह्मणवादी विचारधारा और संगठन में वर्चस्ववादी रवैये पर हम खूब बोल लिख चुके हैं। पर अंबेडकर, फूले, कांशीराम  विचारधारा का कारोबार कर रहे लोगों की आपराधिक गतिविधियों पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। जहां एक ही रणनीति हैए संतों महापुरूषों का नाम जपनाए पराया माल अपना! विचारधारा के नाम पर गाली गलौज और घृणा अभियान!और कैडर के नाम पर मूर्खों और गुंडों की वाहिनी  बनाकर अफसरों, डाक्टरों, इंजीनियरों और वंचितों में मालदार तबके से नियमित एकतरफा वसूली। जिसका कोई हिसाब किताब किसी को देना नहीं होता।निनानब्वे फीसद जनता की पहचान और अस्मिता के नाम पर अगुवाई करने वाले लोगों का मिशन अगर बहुजनों की आजादी का मिशन होता तो कहीं किसी बिंदू पर उनमें भी वहीं एका होता ए जो सत्तावर्ग की तमाम पार्टियों संघ परिवारए कांग्रेस और वामपंथी दलों में है। हर फैसले  हर जनविरोधी कार्रवाई, जनता के खिलाफ युद्ध में उनमें गजब का समन्वय है। पर दलितोंए पिछड़ों, अल्पसंखय्कोंए आदिवासियों के नेताओं में  कोई सहमति और समन्वय की कल्पना तक नहीं की जा सकती। न मायावती और मुलायम , और न ही लालू, पासवान और नीतीश किसी एक एजंडा के लिए काम कर सकते हैं।  
कांशीराम के बामसेफ के हजार टकड़े हो गए। हर टुकड़ा असली, मूलनिवासी संगठन।

 बाबा साहेब भीमराव  अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी भी हजार धड़ों में बंटाधार। अठावले चाहे तो मुंबई ठप कर दें। पर उनका गठजोड़ हिंदू राष्ट्रवाद के धारक वाहक बाल ठाकरे परिवार से है। अठावले शिवशक्ति भीमशक्ति के गठजोड़ से जाति उन्मूलन और बाबा साहेब के आर्थिक सशक्तीकरण,जाति उन्मूलन और सामाजिक न्याय के कार्यक्रम को अंजाम दे रहे हैं।
 मुलायम के मुकाबले मोर्चे में जमा हुआ है मायावती का सर्वजन समाज। मायावती और मुलायम न दलितों, न पिछड़ों, न बहुजनों और न सर्वजन समाज, न देश की तमाम बहिष्कृत जनता और न देश के हित में कोई फैसला करते हैं। केंद्र को समर्थन हो या आर्थिक नीतियों को विरोध वे दरअसल एक दूसरे के खिलाफ सत्ता की लड़ाई के मद्देनजर फैसला करते हैं। और बहिष्कृत जनता को उम्मीद है कि ये लोग समता और सामाजिक न्याय का राजमार्ग तैयार करेंगे।
गांधी नेहरु परिवार के वंशवाद के खिलाफ देश में विरोध की राजनीति चलती है। पर विरोध की राजनीति में वंसवाद का क्या कहिये। उत्तर दश्क्षिम पूर्व पश्चिम चारों दिशाओं में क्षत्रपों के संगठन और दलों में वंसावाद परिवारवाद हावी है। विधवा और पुत्र उत्तराधिकारी, यह तो शुरू से चलन रहा  है। अब सत्ता में भागेदीरी के जरिये पूरे कुनबे को खपाने का काम हो रहा है। बहिष्कृत समुदायों का नेतृत्व न सिर्फ तानाशाह हैए बल्कि वे वंशवाद और कुनबाबाद के निकृष्ट उदाहरण है। मजबूत जातियां ब्राह्ममों की स्थानापन्न हो रही हैं और कमजोर जातियों का सत्यानाश हो रहा है। आरक्षण पर भी जाति वर्चस्व हावी है। बहुत सी अछूतए आदिवासी और शरणार्थी जातियों को आरक्षण सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि आरक्षण पर काबिज मलाईदार तबका उन्हें सामाजिक न्याय का हकदार नहीं मानतीं।
इन संगठनों और दलों का एकमात्र मिशन है फंडिंग। ये आंदोलन वगैरह दिखावे के लिए करते हैं।आदिवासियों, शरमार्थियों, बस्तीवालों और बंजारों में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती। उनमें भी नहीं जो नकद भुगतान न कर सकें। मजे की बात है कि ऐसे संगठनों और दलों की सारी चल अचल संपत्ति व्यक्तिगत खाते में हैं। नेतृत्व बदल नहीं सकता, क्योंकि संपत्ति से बेदखल होने का खतरा है। लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं है, सवाल पूछने का अधिकार नहीं है और यहां तक भी साथ बैठने तक का भी हक नहीं है। अब तो ब्राह्मण और सवर्ण जातियां तक बहुजनों के साथ ऐसी अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं करतीए जैसा कि इनके नेता और मसीहा करते हैं। कार्यकर्ताओं के लिए दाल भात और सूखी रोटी। नेताओं  और उनके परिजनों के लिए पांच सितारा जीवन जेवरात और विदेश यात्राएं। कोई समझदार, जानकार, प्रतिबद्ध आदमी मिशन के झांसे में इनके यहां पहुंच भी गया तो उन्हें बदनाम करके अलग करने में देरी नहीं लगती। बदनामी के लिए बिना सबूत कोई भी आरोप काफी है। इतना भी काफी है कि फलां अमूक दल या ग्रुप के लिए काम कर रहा है या अमूक असल में ब्राह्मण हैं। हमारे लोग इतने बुरबक हैं, कि बहुत जल्दी बहकावे में आ जाते हैं। कोई तहकीकात नहीं होती।
नतीजतन इन संगठनों और दलों में सामूहिक नेतृत्व तो दूर, द्विती तृतीय श्रेनी का नेतृत्व भी नहीं है। प्रादेशिक, जिला या पंचायत स्तर तक का फैसला तानाशाह करता है। चुनाव होते नहीं हैं। हों तो नेतृत्व खतरे में पड़ जाये, मनोनयन से काम चल जाता है। इनके यहां इतिहासए अर्थशास्त्र, विज्ञान, समाज के अध्येता के लिए कोई जगह नहीं है। ये समाज को अपढ़ और अज्ञानी बनाये रखते हुए दुश्मनों के खिलाफ छायायुद्ध करके घृणा अभियान के जरिये अकूत संपत्ति जमा करने और भोगने का मिशन  चला रहे हैं।
कल और आज मायावती के कथनी करनी का रहस्य यही है। जो बाकी लोगों की कथनी और करनी से किसी मायने में अलग नहीं है।
राम पुनियानी आईआईटी में २००४ तक प्राध्यापक थे। वे विश्वविख्यात चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी यह पुस्तक भारत की असली तस्वीर पेश करती है। अंबेडकर के बारे में उनके अनुयायियों और विरोधियों में अनेक भ्रांतियां है। अंबेडकर की पूजा हो रही है मनुस्मति व्यव्स्था बनाये रखने के लिए और कारपोरेट साम्राज्यवाद, जिओनिज्म व ग्लोबल ब्राहमणवादी वर्चस्व बनाये रखने के लिएए जबकि उनकी विचारधारा और जाति उन्मूलन, सामाजिक आर्थिक न्याय के कार्यक्रमए जो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत के लिए सबसे जरूरी हैं, को कचरा पेटी में डाला जा रहा है। हिंदुत्व के झांसे में फंस गये हैं खुला बाजार की व्यवस्था में जीते मरते दलित आदिवासी पिछड़े मूलनिवासी बहुजन।इस दुश्चक्र को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पाठ्य है, जिसके आधार पर प्रतिरोध की जमीन बन सकती है।
बाबा साहेब आम्बेड़कर की जयंती हर साल धूम धाम से मनाई जाती है। प्रश्न यह है कि जिन मूल्यों के लिए डॉ.आम्बेड़कर ने जीवन भर संघर्ष किया, वे मूल्य अब कहॉं हैं, प्रश्न यह है कि उन दलितों की . जिनकी बेहतरी के लिए डॉ. आम्बेड़कर ने अपना जीवन होम कर दिया . आज क्या स्थिति है
दलितों और समाज के अन्य दबे.कुचले वर्गों के अतिरिक्तए इस देश के क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के लिए डॉ. आम्बेड़कर आज भी एक महानायक हैं। जो राजनैतिक दल, सामाजिक न्याय के विरोधी हैं, वे तक डॉ. आम्बेड़कर के विरुद्ध एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते।
बाबा साहेब सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे जमींदारों की आर्थिक गुलामी और ऊँची जातियों की सामाजिक गुलामी से दलितों की मुक्ति के भी अक्षय प्रतीक हैं। पीएचडी और डीएससी होते हुए भी उन्हें अपने कार्यस्थल पर अपमान सहना पड़ा। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि राजनैतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन रहेगी जब तक उसके साथ.साथ सामाजिक बदलाव नहीं होता जब तक शूद्रों और महिलाओं को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलती। राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम किया।
आम्बेड़कर ने स्वाधीनता आंदोलन के लक्ष्यों में सामाजिक परिवर्तन को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे चमत्वृळत कर देने वाली मेधा के धनी थे और उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्यए दलितों की बेहतरी था। वे निरंतर हमारे देश की जाति प्रथा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे। उन्होंने इस देश में राजनैतिक व सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को गति दी। यह अकारण ही नहीं था कि वे कमजोर वर्गों के संघर्ष के प्रतीक और अगुवा थे। और यही कारण है कि देश के सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उनकी भूमिका को नकारने या कम करके प्रस्तुत करने की कोशिशें हो रही हैं। चूंकि उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है। इसलिए प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया जाये और फिर उनके प्रिय सिद्धांतों और आदर्शों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जावे। उनके योगदान के महत्व को घटा कर प्रस्तुत करने के भी योजनाबद्ध प्रयास हो रहे हैं।
मायावती के फैसले से कांग्रेस ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली होगी। हालांकि कांग्रेस के रणनीतिकारों को भरोसा था कि फिलहाल मायावती समर्थन वापसी जैसा फैसला नहीं लेंगी। कल की रैली में उन्होंने एफडीआई के फैसले का जमकर विरोध किया थाए जिससे कांग्रेस के अंदरखाने में चिंता थी लेकिन पार्टी के प्रबंधक इसे राजनीतिक मजबूरी भर मान रहे थे। उनका कहना था कि माया यूपीए सरकार को जितना भी कोसें वह अपना समर्थन जारी रखेंगी।
इससे पहले समाजवादी पार्टी के खिलाफ खुलकर गुस्से का इजहार करते हुए रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने कहा कि यह सरकार काम कम और ढिंढोरा खूब पीट रही है। मुलायम और उनके परिवार पर हमला करते हुए माया ने कहा कि अगर आरक्षण न होता तो यह पूरा परिवार भैंस चराता।एसपी सरकार पर हमेशा से जुर्म को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। पूर्व सीएम माया ने कहा कि इस सरकार को गुंडे चला रहे हैं जिससे महिलाएं बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं।
बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा बसपा रैली में सपा पर लगाए गए आरोपों पर आजमगढ़ में कन्या विद्याधन और बेरोजगारी भत्ता बांटने गए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी सजा चुनाव में हार होती है और यह सजा यूपी की जनता ने बसपा को दे दी है। 
मायावती जिन दलित महापुरुषों के अपमान की बात कर रही हैं और वह जरा सा भी उन महापुरुषों को मानतीं तो प्रदेश में भीमराव अम्बेडकर और दूसरे महापुरुषों के नाम पर बनाए गए पार्कों में अरबों रुपयों की लूट नहीं करतीं। दरअसल मायावती ने रैली में कहा कि अगर अम्बेडकर नहीं होते तो मुलायम और अखिलेश भैंस चरा रहे होते।
सीएम ने कहा कि समाजवादी पार्टी अपने वायदों पर खरी उतरती हैए इसी लिए सिर्फ 6 महीने में कन्या विद्याधन बेरोजगारी भत्ता बंटने लगा है। मायावती को यह जानकार तकलीफ हो रही है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार सिर्फ बेरोजगारी भत्ता ही नहीं रोजगार दिलाने की भी कोशिश में है। तभी तो प्रदेश में नए उद्योग लगाने के लिए नई उद्योग नीति बनाई जा रही है। इससे लाखों युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद है।
माया ने अपने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि हमारे शासन में राज्य की कानून व्यवस्था दुरुस्त थी लेकिन वर्तमान सरकार के 6 महीने के कार्यकाल में ही एक दर्जन दंगे हो गए। राज्य सरकार पर दलित विरोधी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि कुल अपराधों में से सिर्फ 20 फीसदी की ही एफआईआर दर्ज की गई हैं। पूर्व सीएम ने कहा कि यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है और एसपी शासन में गुंडों को प्रमोशन दिया जा रहा है।
माया को कुर्सी से हटाकर सीएम पद पर काबिज हुए अखिलेश यादव पर हमला करते हुए माया ने कहा कि वह सिर्फ घोषणा सीएम तक ही सीमित हैं। माया ने कहा कि हमने बेरोजगारों के हाथों में भत्ते की जगह नौकरियां दीं लेकिन अखिलेश घोषणाओं में अपने बाप मुलायम से भी आगे आ गए हैं। अखिलेश सरकार की लैपटॉप और टैबलेट देने के योजना पर हमला करते हुए माया ने कहा कि इसका अंत इनके दुकानों पर बिकने से होगा।
राज्य की जनता की पीड़ा के लिए बीजेपी.कांग्रेस को भी निशाने पर लेते हुए माया ने कहा कि इन दो दलों ने भी चुनाव में यह सोचकर काम किया कि मायावती दोबारा सत्ता में न आने पाए। वह हमारी कामयाबी से डर चुके थे। माया ने कहा कि अगर बीजेपी.कांग्रेस कमजोर उम्मीदवारों को खड़ा कर एसपी उम्मीदवारों की जीत का मार्ग प्रशस्त न करती तो हम 250 सीट जीतते। 
बीते दिनों यूपी के कद्दावर मंत्री और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव ने प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में घूस लेने की सलाह दे डाली थी। माया ने इसी बयान पर एसपी की खिंचाई करते हुए कहा कि यहां मंत्री ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। रिटेल में एफडीआई से किसानों के नुकसान का जिक्र करते हुए माया ने कहा कि अगर इससे किसानों को फायदा हुआ तो ही समर्थन दिया जाएगा।
दरअसल कांग्रेस के इस भरोसे का आधार भी था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो मायावती अभी लोकसभा चुनाव से बचना चाहती हैं। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की हार से अभी तक उनकी पार्टी उबर नहीं पाई है। हार के बाद कल मायावती ने उत्तर प्रदेश में पहली बार शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की। लोकसभा चुनावों के लिए बसपा सांगठनिक रूप से तैयार नहीं हैए यह बात पार्टी के रणनीतिकार भी बखूबी समझते हैं। पिछले एक साल में मायावती सरकार के पूर्व मंत्रियों और पार्टी नेताओं के खिलाफ कई घोटाले और अपराध के मामले भी सामने आए हैं। ये ऐसे पेंच है जिनकी वजह से मायवती को हमेशा ही केंद्र की सरपरस्ती की दरकार रहेगी।  
मायावती खुद भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसी हैं। सीबीआई और अदालती कार्रवाही का खौफ भी उन्हें यूपीए की बांह थामने के लिए मजबूर कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन ने मायावती पर यही आरोप लगाकर उनसे सफाई भी मांग ली है। हुसैन ने कहा है कि मायावती जैसे नेता एक ओर तो एफडीआई के मुद्दे पर केंद्र की आलोचना कर रहे हैंए दूसरी ओर उसी का समर्थन कर रहे हैं। क्या ये नेता सीबीआई से डरे हुए हैं राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी कहना है कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को जांच के लिए स्वतंत्र है कह कर उन्हें पिछले पायदान पर ला दिया। अब वह समर्थन वापस नहीं ले सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच करने के लिए स्वतंत्र है। इस मामले में मायावती को क्लीन चिट देने के फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकारए सीबीआई और बसपा सुप्रीमो को नोटिस जारी करते हुए शीर्ष अदालत ने यह बात कही।
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अदालत ने कभी यह नहीं कहा कि मायावती की संपत्ति के मामले की जांच सीबीआई नहीं कर सकती। एजेंसी जांच करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि इसके लिए एजेंसी को प्रदेश सरकार से मंजूरी लेनी होगी। जस्टिस पी सदाशिवम् और जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह मामला निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग पर अपने निर्णय को स्पष्ट करेगी। ओपन कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि अदालत केंद्र सीबीआई और मायावती को सिर्फ स्पष्टीकरण के लिए नोटिस जारी कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि आय से अधिक संपत्ति का मामला निरस्त करने का निर्णय किसी को संरक्षण प्रदान करने के लिए नहीं है।
वहीं याचिकाकर्ता कमलेश वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि सरकार ऐसे मामले में मंजूरी नहीं देगी। ऐसे मसलों पर तो वे एक.दूसरे को बचाते हैंए तब अदालतों को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 अक्तूबर 04 को आय से अधिक संपत्ति के मसले पर एजेंसी को जांच के लिए तीन माह का समय दिया था।
इसके बाद 7 अगस्तए 06 के आदेश में ताज कॉरिडोर और संपत्ति की जांच के लिए मसले को अलग किया था। दोनों ही पूर्ववर्ती आदेशों से यह स्पष्ट है कि सीबीआई को संपत्ति की जांच का आदेश शीर्ष अदालत ने दिया था। भूषण के तर्क पर पीठ ने अपने फैसले में दी गई व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए नोटिस जारी कर दिया।
पुनर्विचार याचिका में वर्मा ने सर्वोच्च अदालत से उसके 6 जुलाई के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए दलील दी है कि मायावती के खिलाफ सीबीआई की ओर से एकत्र किए गए सबूतों पर गौर किए बगैर अदालत ने तकनीकी आधार पर इस मामले का निपटारा कर दिया।

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के खिलाफ नौ साल से लंबित संपत्ति मामला निरस्त करने के साथ ही सीबीआई को आड़े हाथों लिया था। अदालत ने फैसले में कहा था कि मायावती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के बारे में किसी निर्देश के बगैर ही एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसा किया।
सीबीआई ने अदालत के आदेशों को ठीक तरीके से समझे बगैर ही बसपा सुप्रीमो के खिलाफ कार्यवाही की। अदालत का आदेश ताज कॉरिडोर प्रकरण में बगैर मंजूरी के उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कथित रूप से 17 करोड़ रुपये के भुगतान के मामले तक सीमित था।


-पलाश विश्वास

बुधवार, 11 जुलाई 2012

कंधमाल पर संगमा और भाजपा एकमत


चुनावी राजनीति का खेल भी अजब है। अक्सर ऐसे गठबंधन बन जाते हैं जिनका कोई वैचारिक आधार नहीं होता। केवल चुनाव जीतने के लिए अलग-अलग और कब-जब विपरीत विचारधाराओं वाली पार्टियां, एक मंच पर आ जाती हैं। हमारी चुनाव व्यवस्था में जो कई खामियां हैं उनमें से एक यह है कि जिसे सबसे अधिक मत मिलते हैं, वह विजेता बन जाता है, फिर चाहे कुल मतों में उसकी हिस्सेदारी कितनी ही कम क्यों न हो। इस व्यवस्था के कारण जनता के असली प्रतिनिधियों के लिए चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है। कई बार, राजनीति की बिसात पर जीत की खातिर कुछ चुनिंदा तथ्य बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये जाते हैं तो कुछ को नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह अक्सर इसलिए होता है क्योंकि राजनैतिक मजबूरियों के चलते, हर दल को अपने गठबंधन के साथियों को प्रसन्न रखना होता है। यह कहना मुश्किल है कि राजनीति के खिलाड़ी सचमुच तथ्यों से अनजान रहते हैं या फिर वे जानबूझ कर केवल वही बातें करते और कहते हैं जो उनके राजनैतिक हितसाधन या उनका अस्तित्व बनाये रखने के लिए जरूरी हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं।

हाल में (25 जून 2012) राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पी.ए. संगमा ने कंधमाल हिंसा और पास्टर ग्राहम स्टेंस की हत्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका के बारे में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि इन घटनाओं में संघ-भाजपा की संलिप्तता के कोई सुबूत नहीं हैं। उनसे संघ परिवार और जयललिता के ईसाई-विरोधी रूख के बारे में भी प्रश्न पूछे गए। हम नही जानते कि संगमा आदिवासी इलाकों के घटनाक्रम पर कितनी नजर रख रहे हैं, जहां ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा आम बात है। चाहे वह गुजरात हो या मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र या ओडीसा, आदिवासी क्षेत्रों में रह रहे ईसाईयों और वहां काम कर रहे पादरियों और ननों को आये दिन हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। क्या हम यह भूल सकते हैं कि जयललिता ने धर्मांतरण-निरोधक विधेयक प्रस्तुत किया था, जिसे बाद में दबाव के चलते वापस ले लिया गया।

ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा का सबसे घृणित और भयावह उदाहरण था ओडीसा के मनोहरपुर जिले के क्योंझार में पास्टर ग्राहम स्टिवर्डस स्टेंस और उनके दो बच्चों को 23 जनवरी 1999 की रात जिंदा जला दिया जाना। पास्टर स्टेंस और उनके दो मासूम लड़के, टिमोथी व फिलिप, जिनकी आयु क्रमशः 10 व 6 वर्ष थी, एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद अपनी जीप में सो रहे थे। बजरंग दल के दारा सिंह ने जीप में आग लगा कर तीनों को जिंदा भस्म कर दिया। अगले दिन, तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने फरमाया कि बजरंग दल ऐसा जघन्य कार्य कर ही नहीं सकता क्योंकि वे इस संगठन को अच्छी तरह जानते-समझते हैं। इसके बाद मुरली मनोहर जोशी, जार्ज फर्नांडीज व नवीन पटनायक की सदस्यता वाला, केन्द्रीय मंत्रियों का एक दल, क्योंझार पहुंचा और घोषणा की कि अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने एनडीए सरकार को अस्थिर करने के लिए यह साजिश रची है।

आडवाणी ने घटना की जांच के लिए वाधवा आयोग की नियुक्ति की। अपनी रपट में आयोग ने इस बात की पुष्टि की कि दारा सिंह उर्फ रविन्दर कुमार पाल ही पास्टर स्टेंस और उनके मासूम बच्चों का हत्यारा था। रपट में यह भी कहा गया कि दारा सिंह ने स्थानीय लोगों को भड़काया। यह प्रचार किया गया कि पास्टर स्टेंस, हिन्दू-विरोधी हैं और कुष्ठ रोगियों की सेवा के बहाने वे हिन्दुओं को ईसाई बना रहे हैं। दारा सिंह, बजरंग दल और संघ परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा समय-समय पर क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेता रहता था। वाधवा आयोग ने यह भी पाया कि जिस इलाके में पास्टर स्टेंस काम करते थे, वहां की ईसाई आबादी में कोई विशेष वृद्धि दर्ज नही की गई। सन् 1991 में ईसाईयों की आबादी कुल जनसंख्या का 0.299 प्रतिशत थी जो 1999 में बढ़कर 0.307 प्रतिशत हो गई। पास्टर स्टेंस की हत्या, दरअसल, पिछले दो दशकों से देश में हो रही ईसाई-विरोधी हिंसा का भाग थी। इस हिंसा के लिए मुख्यतः संघ परिवार, विश्व हिन्दू परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम और बजरंग दल द्वारा किया जा रहा दुष्प्रचार जिम्मेदार है। स्थानीय स्तर के भाजपा नेता भी ईसाई-विरोधी गतिविधियों में खासे सक्रिय रहते हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्य एक-दूसरे की मदद करने में पीछे नही हटते। ओडीसा में कई भाजपा विधायक और नेता, ईसाई-विरोधी गतिविधियों में शामिल थे।

ईसाई-विरोधी हिंसा की जांच, समय-समय पर, विभिन्न जन न्यायाधिकरणों और जांच समितियों ने की है। गुजरात में जनसमिति की रपट सन् 2006 में "गुजरात में हिन्दूकरण की अनकही कथा" शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। ओडीसा में भूतपूर्व न्यायमूर्ति के.के. ऊषा की अध्यक्षता वाले भारतीय जन न्यायाधिकरण ने इस मामले की तहकीकात की थी। सन् 2010 में न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय जन न्यायाधिकरण ने कन्धमाल हिंसा की जांच की थी। ये सभी रपटें बताती हैं कि सांप्रदायिक संगठनों द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में चलाया जा रहा घृणा फैलाने का अभियान ही हिंसा के लिए जिम्मेदार है। मजे की बात यह है कि जब ईसाई मिशनरियां शहरों में अपने स्कूल खोलती हैं तब उनका कोई विरोध नहीं होता परन्तु यही काम जब वे आदिवासी क्षेत्रों में करती हैं तो उनके खिलाफ हिंसा की जाती है। मिशनरियों के विरूद्ध आदिवासी क्षेत्रों में जाकर जहर उगलने वाले नेताओं के पुत्र-पुत्रियां शहरों के मिशनरी स्कूलों में पढ़ते हैं।

कंधमाल में तो हालात बहुत ही खराब थे। राष्ट्रीय जन न्यायाधिकरण ने पाया कि कई भाजपा नेता, ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा में खुलकर शामिल थे। रपट कहती है, “ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा को भड़काने और उसे अंजाम देने में हिन्दुत्ववादी संगठनों की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है“। विधानसभा में पूछे गये एक प्रश्न के लिखित उत्तर में ओडीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने स्वीकार किया कि जांच से यह पता चला है कि “आर.एस.एस., विहिप और बजरंग दल” के सदस्य हिंसा मे शामिल थे। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि आर.एस.एस के 85, विहिप के 321 और बजरंग दल के 118 सदस्यों को इन हमलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा कि इनमें से 27 लोग अब भी जेल में हैं। यह तो एक उदाहरण मात्र है। ईसाईयों के खिलाफ हिंसा की हर जांच से यही साबित हुआ है कि इसके पीछे संघ परिवार का हाथ था।

संगमा ऐसे पहले राजनेता नहीं हैं जो आमजनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जिन दिनो मायावती का भाजपा से गठबंधन था, उन्होंने गुजरात चुनाव में मोदी के समर्थन में प्रचार करते हुए गुजरात कत्लेआम के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराया था। संगमा अपने गले में एक बड़ा सा क्रास लटकाये रहते हैं और बार बार यह कहते हैं कि क्षमाशीलता ईसाई धर्म के मूल तत्वों में से एक है। बिलकुल ठीक। पास्टर स्टेंस की विधवा ग्लेडियस स्टेंस ने भी यही किया था। परन्तु जहां तक एक समूह या संगठन को सामूहिक रूप से माफ कर देने का प्रश्न है, ऐसा तभी किया जा सकता है जब संबंधित संगठन अपने किए पर पछतावा व्यक्त करे और माफी मांगे। यहां तो सांप्रदायिक हिंसा के मामलों में दोषी सीना फुलाये घूम रहे हैं, उनकी राजनैतिक शक्ति बढ़ गई है और वे पीड़ितों को ही हिंसा के लिए दोषी बता रहे हैं। क्षमा का सिद्धांत उन लोगों पर कैसे लागू हो सकता है जो अपने अपराध को उचित ठहरा रहे हैं? और इस मामले में तो क्षमा करने का अधिकार केवल उन लोगों को है जिनके परिवारजन हिंसा में मारे गये हैं या जो स्वयं हिंसा के शिकार हुए हैं।

यह संयोग मात्र नहीं है कि कंधमाल हिंसा में संघ परिवार की कोई भूमिका नहीं थी, यह बात संगमा को तब पता चली जब भाजपा ने राष्ट्रपति चुनाव में उनको समर्थन देने का निर्णय किया।

-राम पुनियानी

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

न्याय की देवी की आँखें खुली हैं

माननीय उच्चतम न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति मामले की सी.बी.आई की प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर दिया है। मुख्य बात यह है कि आठ वर्ष पूर्व मायावती की पूर्व घोषित संपत्ति लगभग 11 करोड़ रुपये की थी जो अब बढ़कर लगभग 111 करोड़ हो गयी है। यही मामला अगर किसी सामान्य व्यक्ति का होता तो न्यायालय यह आदेशित करता इस तारीख तक अधीनस्थ न्यायालय में उपस्थित होकर अपनी जमानत कराओ।
बहुधा, यह देखने में आता है की सामान्य व्यक्तियों का उत्पीडन कानून और प्रक्रिया के नाम पर होता रहता है और असाधारण विशेषाधिकार प्राप्त उच्च न्यायालय आँख मूंदे रहते हैं लेकिन जैसे ही बड़ी-बड़ी कंपनियों, राजनेताओं, अफसरशाहों के मामले आते हैं तो उसमें प्रक्रिया यदि दोषपूर्ण हुई तो उसका लाभ उसको तुरंत मिलता साधारण व्यक्तियों के मामले में प्रक्रिया का पालन हो या न हो वह दंड का भागीदार हो जाता है। क्यूंकि न्याय की देवी की अब आँखें खुली हुई हैं और तराजू में पसंघा भी पैदा हो गया है। इसका इलाज वर्तमान व्यवस्था में मौजूद ही नहीं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 6 जून 2012

मायावती की पुलिस व अखिलेश की पुलिस में कोई अंतर नहीं


मायावती सरकार की ए.टी.एस और एस.टी.ऍफ़ एक नियोजित साजिश के तहत मुसलमानों के बच्चों को दहशतगर्दी के आरोप में निरुद्ध कर रही थी। चुनाव के वक्त समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में यह घोषणा की थी कि किसी भी तबके के नौजवानों को फर्जी आरोपों में निरुद्ध नहीं किया जायेगा किन्तु समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद भी ए.टी.एस और एस.टी.ऍफ़ के कार्यकलापों में कोई अंतर नहीं आया है।
पिछले कुछ वर्षों से दहशतगर्दी के नाम पर जिस तरह से मुस्लिम समाज कोबदनाम करने की सियासत चल रही है उसने पूरे समाज को दहशत में जीने कोमजबूर कर दिया है। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है पर अब इसके निशाने पर पर हमारा जिला सीतापुर और उसके आस-पास के गांव और कस्बे आ गए हैं। पिछले दिनों इसी सिलसिले में पांच फरवरी 2012 को बसीर हसन को जब वे अपने बेटे मुसन्ना के इलाज के लिए बांगरमऊ जिला उन्नाव से संडीला जिला हरदोई जा रहे थे उसी दरम्यान उन्हें एटीएस ने उठा लिया। तो वहीं 12 मई 2012 को मो0 शकील जो दुबग्गा लखनउ से मलीहाबाद कटौली के लिए मकतब के काम से जा रहे थे को रास्ते में एटीएस ने उठा लिया। इन गिरफ्तारियों के बाद प्रदेश सरकार के ऊपर सवाल उठता है जिसने अपने चुनावी घोषणापत्र और चुनावी भाषणों में वादा किया था कि आतंकवाद के नाम पर जेलों में बंद बेगुनाह मुस्लिमों को छोड़ा जाएगा। पर छोड़ने की बात तो दूर यहां फिर से प्रदेश मंे बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को फंसाने की मुहीम चल पड़ी है। इसी कड़ी में 24 मई 2012 को आजमगढ़ के जमीयतुल फलाह के दो कश्मीरी छात्रों मुहम्मद वसीम बट और सज्जाद अहमद बट को एटीएस ने अलीगढ़ रेलवे स्टेशन से उठा लिया। इस अवैध गिरफ्तारी के खिलाफ जब जनता हजारों की तादाद में आजमगढ़ और कश्मीर समेत तमाम जगहों पर सपा सरकार के खिलाफ उतरी तब जाकर 31 मई को उन्हें छोड़ा गया। गौरतलब है कि बसीर और शकील दोनों ही कुतुबपुर और उसके आस-पास से ही अपनी रोजी-रोटी चला रहे थे। आज पुलिस उन पर खतरनाक दहशतगर्द होने और विदेशों में ट्रेनिंग लेने का आरोप लगा रही है। जो निहायत ही झूठ और काबिले नाबर्दाश्त है। ऐसे में आपको यह तय करना है कि सरकार के इस झूठ के खिलाफ जोरदार आवाज उठाएं।

-राजीव यादव

बुधवार, 16 नवंबर 2011

प्रदेश विभाजन - फिर देश विभाजन

हमारे प्रदेश उत्तर प्रदेश में 2007 से 2010 तक नेशनल रुरल हेल्थ मिशन के तहत 7200 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। जिसमें लगभग 3500 करोड़ का घोटाला हुआ है प्रदेश सरकार के कई मंत्री लोकायुक्त जांच के बाद हटाये जा चुके हैं और कई मंत्री विभिन्न अपराधों में जेल की शोभा बाधा रहे हैं। अराजकता का बोलबाला है। सरकार की माली हालत यह है कि आये दिन मुख्यमंत्री मायावती केंद्र सरकार से गोहार लगाती हैं इस योजना के लिये पैकेज दो और कभी-कभी वेतन बांटने के लिये विभिन्न वित्तीय हथकंडे अपनाये जाते हैं। उत्तर प्रदेश निश्चित रूप से 75 जिलो वाला बड़ा प्रदेश है। जिसकी व्यवस्था की जिम्मेदारी सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के हाथों में है। और वह व्यवस्था प्रदेश की करने में असमर्थ पाकर चार भागों में प्रदेश को बांटने का संकल्प विधानसभा में पारित करने जा रही है। बुंदेलखंड, अवध प्रदेश, पूर्वांचल और पश्चिम प्रदेश के नाम के नए राज्य होंगे। एक- एक प्रदेश की राजधानी के निर्माण हेतु लाखों लाख करोड़ की आवश्यकता होगी जिससे जनता के ऊपर करो का और बोझ डाला जायेगा। प्रदेश में छोटे-छोटे जिले मायावती सरकार ने बनाये हैं। जिनमें आज भी समुचित प्रारंभिक व्यवस्था तक नही कर पायी हैं। कुछ प्रस्तावित नए प्रदेशों को अपने राज्य की नौकरशाही व कर्मचारियों को वेतन देने के लिये हमेशा कोई न कोई वित्तीय हथकंडा अपनाना पड़ेगा। हाँ अवध प्रदेश की राजधानी यदि लखनऊ होती हैं तो मूर्तियों के आशीर्वाद से शायद कोई चमत्कार हो जाए। कुछ लोगों का तर्क यह हो सकता है कि छोटे राज्यों के होने से विकास होगा किन्तु वास्तव में ऐसा नही है। कंक्रीट की दीवार खड़ा कर देने का नाम विकास समझते हैं वास्तविक धरातल पर देखा जाए तो आम जनता की थाली से अरहर की दाल काफी पहले गायब हो चुकी है। पढाई लिखाई के लिये फीस देने के लिये बैंको से लोन लेना पड़ रहा है। नए प्रदेशों के बनने के बाद भ्रष्टाचारी तबकों की एक ऐसी बढ़ आती है कि आम आदमी के पास कुछ बचता ही नहीं है।
चुनाव आ रहे हैं अपने काले कारनामो की तरफ से राजनितिक दल जनता की भवनों से खेल रहे हैं। कुर्सी पाने के लिये तरह-तरह के राग अलापे जा रहे हैं मुख्यमंत्री मायावती ने अपने सरकार के काले कारनामो को छिपाने के लिये प्रदेश विभाजन का संकल्प विधानसभा में पारित करने का लिया है जिससे प्रदेश में विभाजन को लेकर जनता तू-तू मैं-मैं करने लगे और जनता की विकास सम्बन्धी भावनाओ का लाभ उठा कर पुन: राज्य सरकार स्थापित की जा सके। वास्तव में यह पृथक्तावादी सोच के राजनेता अगर केंद्र सरकार की कुर्सी के ऊपर बैठे हों और अपने काले कारनामो को छिपाने के लिये तथा पुन: सत्ता में आने के लिये देश का विभाजन भी कर सकते हैं। इसके पीछे भी उनका तर्क होगा कि देश में हजारो समस्याएं है जिनका समाधान इतने बड़े मुल्क में करना संभव नही है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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