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शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

सांप्रदायिक घटनाओं में कमी:सांप्रदायिक मानसिकता में वृद्धि

सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा देश के उन इलाकों में भी फैल गई, जहां उसका कोई इतिहास नहीं था। हापुड़ और लोमी ;उत्तरप्रदेश जैसे छोटे शहरों व हरियाणा के गुड़गांव को सांप्रदायिक हिंसा ने अपनी चपेट में ले लिया। सहारानपुर और हैदराबाद में मुसलमानों और सिक्खों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं।
सन् 2014 की लक्षित हिंसा की सबसे भयावह घटना 23 दिसंबर को हुई जब असम के कोकराझार और सोनीपुर जिलों में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड ;एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े के उग्रवादियों ने महिलाओं और बच्चों सहित, 76 आदिवासियों की जान ले ली। लगभग 7,000 ग्रामीणों को अपने घरबार छोड़कर भागना पड़ा। आदिवासियों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में तीन बोडो मारे गये।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 561 घटनाएं हुईं, जबकि सन् 2013 में ऐसी घटनाओं की संख्या 823 थी। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 लोग मारे गये और 1,688 घायल हुए। सन् 2013 में ये आंकड़े क्रमश: 133 व 2,269 थे। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने 'धार्मिक कारकों, लैंगिक विवादों,मोबाइल एप्स अथवा सोशल मीडिया में धर्म या धार्मिक प्रतीकों के कथित अपमान, धार्मिक स्थलों की जमीन को लेकर विवाद और अन्य मुद्दों' को सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का कारण बताया।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में ;असम की नस्लीय हिंसा को शामिल करके  201 व उसे छोड़कर 90 लोग मारे गये। इसकी तुलना में, आतंकी हमलों में 18 लोगों की मृत्यु हुई और 19 घायल हुए। मारे जाने वालों में 3 पुलिसकर्मी और 4 अतिवादी थे। जम्मू.कश्मीर में हुए आतंकी हमलों में 27 लोग मारे गये। इनमें शामिल थे 15 सुरक्षाकर्मी, 4 नागरिक और 8 अतिवादी। इन हमलो में 5 लोग घायल हुए, जिनमें से एक सरपंच और चार सीमा सुरक्षा बल कर्मी थे। इसके बावजूद, गुवाहाटी में 29 नवंबर 2014 को राज्यों के पुलिस महानिरीक्षकों और महानिदेशकों की 49वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद, देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है और सरकार यह सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध है कि दुनिया के किसी भी आतंकी संगठन को भारत में अपने पैर जमाने की इजाजत न दी जाए। उन्होंने यह संदेह व्यक्त किया कि देश के कुछ पथभ्रष्ट युवा आईसिस जैसे आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं परंतु सरकार उन्हें रोकने का हर संभव प्रयास करेगी। सांप्रदायिक हिंसा में मारे गये लोगों की  संख्या,आतंकवादी हमलों की तुलना में 14 गुना थी। परंतु गृहमंत्री के उद्घाटन भाषण में सांप्रदायिक हिंसा का जिक्र तक नहीं था।
अगर हम असम को छोड़ दें,जहां एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े द्वारा मई में बंगाली मुसलमानों और दिसंबर में आदिवासियों पर किए गए हमलों में कुल 111 लोग मारे गये,तो 2014 में सभी राज्यों में उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की सर्वाधिक घटनाएं हुईं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार,सन् 2014 में उत्तरप्रदेश में हुईं 129 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 25 लोग मारे गये और 364 घायल हुए। इस मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर रहा जहां 82 घटनाओं में 12 लोगों की जानें गईं और 165 घायल हुए। इसी राज्य में,2013 में 88 सांप्रदायिक दंगों में 12 लोग मारे गये थे और 352 घायल हुए थे। तीसरे नंबर पर रहा कर्नाटक जहां 68 घटनाओं में 6 लोगों की मृत्यु हुई और 151 घायल हुए। सन् 2013 में कर्नाटक में 73 घटनाओं में 11 लोग मारे गये थे और 235 घायल हुए थे। गुजरे साल में राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा की 61 घटनाएं हुईं,जिनमें 13 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं और 116 घायल हुए। गुजरात में 59 घटनाओं में 8 लोगों की जानें गईं और 172 घायल हुए। सन् 2013 में गुजरात में 68 हिंसक सांप्रदायिक झड़पों में 10 लोगों की मृत्यु हुई थी और 184 घायल हुए थे। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के लिहाज से बिहार पांचवे स्थान पर रहाए जहां 51 घटनाओं में 4 लोग मारे गये और 267 घायल हुए। सन् 2013 में बिहार में हुई 63 घटनाओं में 7 लोग मारे गये थे और 283 घायल हुए थे।
हमारे देश में एक सांगठनिक 'दंगा निर्माण प्रणाली'  विकसित हो गई है जो राजनैतिक परिस्थितियों के अनुकूल होने पर, जब चाहे, जहां चाहे दंगें भड़काने में सक्षम है। यह सांगठनिक ढांचा दिन.प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसके हौसले और बुलंद हुए हैं। यदि सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं और उनमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या, सन् 2013 की तुलना में कम रही तो इसका कारण यह था कि इस वर्ष दंगों या लक्षित हिंसा से कोई विशेष राजनैतिक लाभ मिलने की उम्मीद नहीं थी।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में ईसाईयों का सामाजिक बहिष्कार हो रहा है और उनके संगठनों को आरएसएस के निर्देशों के अनुरूप काम करना पड़ रहा है। बस्तर के ईसाई इतने आतंकित हैं कि उनके संगठनों ने एक तथ्यान्वेषण दल ;जिसका गठन धार्मिक स्वातन्त्र्य के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन के मामलों का अध्ययन करने के लिए किया गया थाद्ध से उसकी बस्तर यात्रा रद्द करने को कहा क्योंकि उन्हें डर था इससे उनके खिलाफ हिंसा में और तेजी आयेगी। ऐसा लगता है कि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी और अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रहने के लिए मजबूर किया जाना.ये दोनों ही हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सोची.समझी रणनीति का अंग है।
अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की इस कोशिश की प्रतिक्रिया में एमआईएम के तेवर और अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं और उसके नेता जहर उगल रहे हैं। इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को दो तरह से लाभ हो रहा है। एक तो जनता और मीडिया का ध्यान उनकी हरकतों से हट रहा है और दूसरेए उन्हें अपनी कार्यवाहियों और कथनों को उचित ठहराने का मौका मिल रहा है। ष्आपष् के नेताओं ने तो भाजपा पर यह आरोप तक लगाया है कि उसने ही दिल्ली के चुनाव में एमआईएम के उम्मीदवारों को प्रायोजित किया है क्योंकि चुनाव मैदान में एमआईएम की मौजूदगी के कारण धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और अंततः इससे भाजपा लाभान्वित होगी।
सन् 2014 में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं उत्तरी और पष्चिमी भारत में हुईंए यद्यपि घटनाओं और मरने व घायल होने वालों की संख्या में सन् 2013 की तुलना में कमी आई। ऐसा प्रतीत होता है कि सांप्रदायिकता भड़काकर दंगे करवाने का मुख्य लक्ष्य चुनाव में लाभ पाना होता है। दक्षिण भारत में केवल कर्नाटक में सांप्रदायिक हिंसा हुई। मध्यप्रदेश में सन् 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की 84 घटनाओं की तुलना में सन् 2014 में केवल 42 घटनायें हुईं व इस कारण यह राज्य सांप्रदायिक हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित पांच राज्यों की सूची से हट गया। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी का कारण यह था कि सन् 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव थे और इसलिए सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। कई अध्ययनों से यह साफ हो गया है कि अन्य पार्टियों की तुलना मेंए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिलता है। यही कारण है कि चुनाव के कुछ महिने पहले से सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि होने लगती है। सन् 2013 में अकेले उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में सांप्रदायिक दंगों में 77 लोग मारे गये थे। भाजपा और उसके सहयोगियों ने 2014 की शुरूआत में हुए लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में 80 में से 74 लोकसभा सीटों पर विजय हासिल की और भाजपा ने मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी अपने नेताओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया।
यद्यपि सन् 2014 में पिछले वर्ष की तुलना में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं कम हुईं और इनमें मारे जाने और घायल होने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई परंतु समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के प्रयास अनवरत जारी रहे। भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने खुलेआम यह कहा कि वे ऐसे अंतर्राधार्मिक विवाह नहीं होने देंगे जिनमें लड़का मुसलमान और लड़की हिंदू हो। उन्होंने बिना किसी आधार के यह आरोप लगाया कि एक षड़यंत्र के तहतए हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है। इस षडंयत्र को उन्होंने लवजिहाद का नाम दिया। हिंदू राष्ट्रवादियों ने देश के उत्तरी व पश्चिमी इलाकों में इस तरह के विवाहों के खिलाफ कटु अभियान चलाया और घर.घर इसका विरोध करते हुए पर्चे व पुस्तिकाएं बांटी। इसके बाद राजस्थान में चुनाव सभाओं को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार में मंत्री मेनका गांधी ने बिना कोई प्रमाण प्रस्तुत किए यह आरोप लगाया कि गौवध से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करने के लिए किया जा रहा है। अगर मेनका गांधी के पास इस आशय के कोई पुख्ता सुबूत हैं तो उन्हें ये सुबूत पुलिस को सौंपने चाहिये ताकि उनकी जांच की जा सके। परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। एक अन्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक घिनौने भाषण में कहा कि भारतीयों के दो वर्ग हैं.रामजादे और हरामजादे.अर्थात् सभी गैर.हिंदू अवैध संताने हैं।
विहिप ने आगरा में गरीब मुसलमानों,जो कि कचड़ा बीनकर अपना जीवनयापन करते हैं, को हिंदू बनाने का अभियान चलाया। इसके लिए धमकी और लोभ दोनों का इस्तेमाल किया गया। धमकी यह दी गई कि अगर वे हिंदू न बने तो उनकी झुग्गियों को उखाड़ फेंका जायेगा और लालच यह दिया गया कि अगर वे अपना धर्म बदलने को तैयार हो जायेंगे तो उन्हें राशन व बीपीएल कार्ड आदि उपलब्ध करवाये जायेंगे। इसके बाद यह धमकी भी दी गई कि आगरा में क्रिसमस के आसपास बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू बनाया जायेगा और प्रवीण तोगडि़या ने यह फरमाया कि भारत में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत 82 से बढ़ाकर 100 किया जायेगा। एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने यह आधारहीन और तथ्यों के विपरीत आरोप लगाया कि सभी मदरसे आतंकी प्रशिक्षण के अड्डे हैं। तथ्य यह है कि कई मदरसों में हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं। साक्षी महाराज ने ही गोडसे को देशभक्त बताया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह कहा कि वे चाहती हैं कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाए।
भाजपा नेताओं व हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा घृणा फैलाने के प्रयासों के ये चंद उदाहरण भर हैं। भाजपा नेताओं ने यह बयान भी दिया कि वे हर मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार लेंगे। इस तरह के भड़काऊ और आधारहीन वक्तव्यों में से केवल कुछ ही राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पाते हैं और उनसे कुछ ज्यादा को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में जगह मिलती है। परंतु ऐसे अनेक वक्तव्य और भाषण न तो राष्ट्रीय और ना ही क्षेत्रीय मीडिया में प्रकाशित होते हैं। आम चुनाव में भाजपा की जीत के बादए अलग.अलग बैनरों के तहत काम कर रहे हिंदू राष्ट्रवादियों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। वे यह मानने लगे हैं कि उनकी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, देश के कानून से ऊपर है और वे जो चाहे कर सकते हैं। वे खुलकर विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और शत्रुता को बढ़ावा दे रहे हैं और उनके मुख्य निशाने पर हैं अल्पसंख्यक समुदाय।
कई मामलों में इस तरह के अभियानों से धन भी कमाया जा रहा है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब मवेशियों को ले जा रहे ऐसे ट्रकों, जिनका या तो ड्रायवर अथवा मालिक मुसलमान था, को रोक लिया गया और मवेशियों को हिंदुत्व कार्यकर्ता इस बहाने अपने घर ले गए कि इन ट्रकों में गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा था। ऐसे ट्रकों को तभी आगे जाने दिया जाता है जब या तो ड्रायवर अथवा मालिक बड़ी रकम चुकाने को तैयार हो। इसी तरह, बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों को घुसपैठिया बताया जा रहा है और ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में क्रिसमस व नये साल पर होने वाले कार्यक्रमों में हुडदंग मचाने की घटनाएं हो रही हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि ईसाई स्कूल, हिंदू विद्यार्थियों का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। इस तरह के आधारहीन आरोपों को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में भारी प्रचार मिलता है और इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,अल्पसंख्यकों की छवि ऐसे एकसार समुदायों के रूप में प्रस्तुत करने में सफल होते हैं जो राष्ट्र.विरोधी और हिंदू.विरोधी हैं। वे सोशल मीडिया के जरिए अल्पसंख्यकों के पवित्र और धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर अल्पसंख्यकों को भड़काने की कोशिश भी करते रहते हैं।
सच तो यह है कि देश में धार्मिक ध्रुवीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि अलग.अलग समुदायों के दो व्यक्तियों के बीच कोई छोटा.सा विवाद भी सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लेता है। सोमनाथ में ऑटोरिक्षा चालक को दस रूपए कम देने के विवाद से भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 25 लोग घायल हो गए। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक हिंसा पर दस साल के लिए रोक लगाने की बात कही है। परंतु या तो उनकी पार्टी के सदस्य अपने नेता की बात नहीं मान रहे हैं और या फिर भाजपा में कार्यों का स्पष्ट विभाजन है.प्रधानमंत्री विकास की बात करते हैं और अन्य नेता अपना काम करते हैं।
लगातार दुष्प्रचार के जरिये समाज का ध्रुवीकरण तो हुआ ही है आम लोगों के दिमागों में जहर भर गया है और अल्पसंख्यक अपने आप को गंभीर खतरे में महसूस करने लगे हैं। यह इससे भी स्पष्ट है कि सभी जातियों के लोगों ने अपने अल्पसंख्यक.विरोधी रूख के चलते,लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,एक रणनीति के तहत बहुत अधिक हिंसा नहीं कर रहे हैं। वे हिंसा की बजाए लोगों के दिमागों का सांप्रदायिकीकरण करने में जुटे हैं ताकि देश में 1992.93 व 2002 से भी बड़े दंगे करवाये जा सकें। परंतु यह तभी करवाया जायेगा जब सरकार अलोकप्रिय हो जायेगी।
-इरफान इंजीनियर

शनिवार, 29 नवंबर 2014

समाज में निहित है ‘हेट स्पीच’






   चुनाव आए और गए, पर सवाल उन विवादास्पद सवालों का है जिनसे ‘हेट स्पीच’ के नाम से हम परिचित होते हंै। हेट स्पीच से हमारा वास्ता सिर्फ चुनावों में ही नहीं होता, पर यह जरूर है कि चुनावों के दरम्यान ही उनका मापन होता है कि वह हेट स्पीच के दायरे में है। हम यहाँ इस पर कतई नहीं बात करेंगे कि ऐसे मामलों में क्या कार्रवाई हुई? पर इस पर जरूर बात करेंगे कि उस हेट स्पीच का हम पर क्या असर हुआ, वहीं उनके बोलने वालों की प्रवृत्ति में क्या कोई बदलाव आया?
    अगर, हम हेट स्पीच की शिकायतों का अध्ययन करें तो वे ज्यादातर अल्पसंख्यक विरोधी या फिर मुस्लिम विरोधी होती हैं। पिछले दिनों जो मसला चाहे वह ‘लव जिहाद’ को लेकर उछला हो या फिर धर्मांतरण का, चुनाव के खात्मे के साथ ऐसे मुद्दों की जो बाढ़ सी आ गई थी, उनके समाचारों में भी काफी कमी या कहें कि न के बराबर हो गई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि समाज में जिन ‘लव जिहादियों’ की बात की जा रही थी, वे एकाएक कहाँ चले गए? मुजफ्फरनगर को ही लें, जहाँ अगस्त-सितंबर 2013 में इसी मुद्दे के इर्द-गिर्द सांप्रदायिक तनाव का पूरा खाका रचा गया। बीते 2014 उपचुनाव के पहले भी एक बार फिर माहौल बनाया गया धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ का। दरअसल, हमारे समाज का पूरा ढाँचा सामंती, पुरुषवादी सत्ता के साँचे पर गढ़ा गया है। उसमें वे सभी तत्व निहित हैं जो आज किसी भी फासीवादी राजनीति की जरूरत होती है। मतलब कि हमारे समाज की पूरी बनावट और उसको उद्वेलित करने वाली राजनीति एक दूसरे काइस्तेमाल करती है। न कि राजनीति ही सिर्फ समाज का इस्तेमाल करती है।
    समाज और उसमें पल-बढ़ रहे प्रेम संबन्धों पर अगर गौर किया जाए तो जो लोग इन दिनों इस बात का आरोप लगा रहे थे कि मुस्लिम समाज के लड़के हिंदू समाज की लड़की को प्रेम में फँसाकर धर्मांतरण और विवाह करते हैं, उनके प्रेम और विवाहांे पर स्थिति का भी आकलन किया जाना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं है कि समाज का सामंती ढाँचा एक तीर से दो निशाने साध रहा है और बड़ी खूबसूरती से कह भी दे रहा है कि हमारी तो मेल-जोल की संस्कृति थी। अगर, मेल-जोल की संस्कृति थी तो वह संस्कृति किसी एक चुनाव या फिर किसी हिन्दुत्ववादी संगठन के प्रभाव में बदल जाती है, तो इतनी आसानी से बदलने वाली ऐसी ‘संस्कृति’ भी सवालिया निशाने पर आ जाती है। इसका आकलन सिर्फ हिंदू-मुस्लिम लड़की और लड़के के मामले से हटकर अगर किया जाए तो देखेने को मिलता है कि महिला हिंसा की वारदातों के बाद समाज उद्वेलित होता है। पर जैसे ही सवाल लड़की-लड़के के प्रेम संबन्धों पर आकर टिकता है, उससे समाज पीछे भागने लगता है या फिर एक दूसरी जाति या समुदाय की उस लड़की के चरित्र पर ही सवाल उठाने लगता है। ठीक यही प्रवृत्ति संचार माध्यमों की भी है।
             उत्तर प्रदेश बदायूँ प्रकरण खासा चर्चा में रहा जहाँ, दो लड़कियों के शव पेड़ पर टँगे मिले। जिस पर राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दलित संगठनों ने विरोध किया। पर जैसे ही मामला सामने आया कि लड़कियाँ पिछड़ी जाति की थीं तो विरोध की ‘दलित आवाजें’ गायब होने लगीं। दरअसल, समाज में लड़की के साथ हुई हिंसा को लड़की के साथ हुई हिंसा न मानकर हमारे जाति या हमारे समुदाय के साथ हिंसा होना मानकर चला जाता है। अगर इसी बीच कहीं से यह बात सामने आ जाए कि लड़की के प्रेम संबन्ध थे, तो विरोध के स्वर और धीमे हो जाते हैं। वही लड़की जिसके मेधावी छात्रा होने या ऐसे गुणों पर समाज गर्व करता है, वह उससे किनारा करने लगता है। इसे पिछले दिनों अमानीगंज, फैजाबाद में हुई घटना में भी देख सकते हैं, जिसमे ‘लव जिहाद’ का प्रोपोगंडा किया गया। पर जैसे ही यह बात साफ हुई कि लड़की और लड़का बहुत दिनों से एक दूसरे को न सिर्फ जानते थे, बल्कि उनके बीच प्रेम भी था, उनके आपस में बात-चीत के 1600 मोबाइल काल के रिकार्ड और ऐसी बातों के आने के बाद मामला शांत हो गया। ‘ये तो होना ही था’ मानने वाला समाज ‘ऐसी लड़की’ से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता है और जो उसके साथ हुआ ऐसा ही कुछ वह भी करता इसका भी साफ संकेत देता है। मतलब, कि लड़की के साथ हुई हिंसा के प्रति समाज नहीं खड़ा हुआ था वह तो अमुक जाति और समुदाय के खिलाफ खड़ा हुआ था, पर जैसे ही उसे पता चला कि उसके प्रेम संबन्ध थे वह उससे रिश्ता तोड़ लेता है। इसका, मतलब कि लड़के-लड़कियों को लेकर हो रहे तनाव के लिए सिर्फ फासीवादी राजनीति ही नहीं जिम्मेदार है बल्कि हमारा समाज भी सह अभियुक्त है। जो अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसे अवसरों की तलाश करता है।
    अब बात अगर हेट स्पीच करने वालों की करें तो पिछले दिनों भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ का आजमगढ़ जिले में 2008 उपचुनाव के दौरान दिए गए उस वीडियो फुटेज के सामने आने के बाद खासा चर्चा में रहा, जिसमें वे एक हिंदू लड़की के बदले सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनाने की बात कर रहे हैं। डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘सैफ्रन वार’ के इस वीडियो फुटेज, जिसको आजमगढ़ जिला प्रशासन ने नकार दिया था कि ऐसा कोई भाषण आदित्यनाथ ने दिया ही नहीं, उसे न सिर्फ आदित्यनाथ ने अपना माना बल्कि उससे बढ़कर उसे सही ठहराने की भी कोशिश की। यहाँ सवाल है कि अगर उस वीडियो फुटेज में ऐसा कुछ आपत्तिजनक नहीं था तो उस पर क्यों बहस हो रही थी? मतलब कुछ न कुछ था जिससे आदित्यनाथ को बचाने के लिए प्रशासन ने झूठ बोला। वहीं आदित्यनाथ उससे एक कदम आगे बढ़कर सार्वजनिक रूप से और अधिक आक्रमक हुए। आखिर यह हौसला उनको कहाँ से मिला, इसके लिए सिर्फ चुनाव आचार संहिता के दरम्यान उनको दी गई चुनावी छूट ही नहीं जिम्मेदार थी, बल्कि समाज की आचार संहिता की छूट की भी आपराधिक भूमिका थी।
    आज इसीलिए कहा जाता है कि सांप्रदायिकता के सवाल को मत उठाइए क्योंकि इससे सांप्रदायिक ताकतों को ही लाभ मिल जाएगा, दरअसल इसलिए कि हमारे समाज में सांप्रदायिकता निहित है, जो बस किसी एक चिंगारी की बाट जोहती है।
   -राजीव यादव
मो0- 09452800752 
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014

बुधवार, 18 सितंबर 2013

अपने खां साहब की नाराजगी का राज़

उत्तर प्रदेश के सुपर पॉवर प्राप्त मंत्री माननीय आजम खां साहब की भूमिका मुज़फ्फरनगर की हिंसा के सम्बन्ध में एक टीवी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के द्वारा साफ़ कर दी और इसी कारण से खां साहब की नाराजगी का राज़ भी खुल गया. सत्तारूढ़ दल के नेताओं को इस बात का अंदाजा नहीं था की दंगा इतने  बड़े पैमाने पर हो जायेगा कि स्तिथि को कण्ट्रोल करने में सेना की मदद लेनी पड़ेगी खां साहब हमेशा नाराज की भूमिका में रहते हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के सबसे बड़े हितैषी होने का दावा भी करते हैं लेकिन उस दावे में कोई दम नहीं होती है. मुज़फ्फरनगर की हिंसा में भी उनके दावों की पोल खुलने लगी और सीधे सीधे मुज़फ्फरनगर के प्रभारी मंत्री होने के नाते सभी जिम्मेदारियां उनके हिस्से में जाती हैं। जिस तरह से लूट, खसोट, बलात्कार हुए हैं उसकी भी जिम्मेदारी खां साहब के चमकते कुर्ते की चमक की सफेदी को धूमिल कर देते हैं।  
पुलिस महानिरीक्षक (कानून-व्यवस्था) राजकुमार विश्वकर्मा ने बताया ‘‘हमने स्टिंग आपरेशन सम्बन्धी रिपोर्ट देखी है और मेरठ के पुलिस महानिरीक्षक से उसकी जांच करने को कहा गया है.’’ 
कुछ पुलिस कर्मियों को स्टिंग ऑपरेशन के नाम पर निलंबित भी कर दिया गया है।
यूपी पुलिस ने 16 लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया है, इनमें अलग-अलग पार्टियों के दस नेता शामिल हैं।
हुकुम सिंह, नेता, बीजेपी विधानमंडल दल, संगीत सोम, बीजेपी विधायक, सरधना,  सुरेश राणा, बीजेपी विधायक, कुंवर भारतेंद्र सिंह, बीजेपी विधायक, बिजनौर, साध्वी प्राची, नेता, बीजेपी, नरेश टिकैत, अध्यक्ष, भारतीय किसान यूनियन, राकेश टिकैत, नेता, भारतीय किसान यूनियन, कादिर राणा, बीएसपी सांसद, मुजफ्फरनगर, नूर सलीम राणा, बीएसपी विधायक, जमील अहमद, बीएसपी विधायक, सईदउज्जमा, पूर्व सांसद कांग्रेस, सईदउज्जमा के बेटे सलमान की गिरफ्तारी संभव नहीं हो पायी है क्यूंकि यह लोग साहित्यकार कँवल भारती नहीं है . इसलिए खां साहब का नाराज होना आवश्यक था क्यूंकि स्टिंग ऑपरेशन के अनुसार उन्ही के इशारे पर डीएम, एसपी  का स्थानान्तरण किया गया था और आज इस बात की जांच करने की जरुरत है की किस नेता के कहने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट की तहरीर बदली गयी थी और पुलिस द्वारा गिरफ्तार अभियुक्तों को छोड़ा गया था और मुख्य बात यह भी है की सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी के कितने नेता इस हिंसा में शामिल थे उनके खिलाफ क्या कार्यवाई की जा रही है। 

सुमन 

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

संतों महापुरूषों का नाम जपना पराया माल अपना!



तो बहुसंख्यक समुदायों दलित पिछड़ा अल्पसंख्यक आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेताअस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं उनकी क्या भूमिका है संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं  वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैंउत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों मजदूरों महिलाओं छात्रों आदिवासियों युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैं
हम एक अनंत अंधेरी सुरंग में फंसे हुए हैं और बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है।विडंबना यह है कि हम निनानब्वे फीसद बहिष्कृत जनता ब्लैक होल में जीने के आदी हो गये हैं।अंधेरा हमारी आंखों में किरचों के मानिंद बिंधता नहीं है।इस अंधेरे में हम कार्निवाल मना रहे हैं।अंधेरे को खत्म करना हमारे ख्वाब का सबब नहीं है और न हम अंधेरे को अंधेरा मानने को तैयार हैं।जाहिर हैए हाथ पांव हिलाने की जरुरत बी महसूस नहीं होती। ममता बनर्जी ने रसोई गैस में सब्सिडी खत्म करने के खिलाफ समर्थन वापस लिया केंद्र सरकार से  पर बंगाल के  पूजा बाजार में अंधाधुंध खरीददारी शापिंग माल में उमड़ती भीड़ और महीनों से तैयार किया जा रहा पूजा परिवेश में लगता नहीं कि कहीं  रसोई में आग लगी है। मध्य और निम्न मध्य वर्ग के लोग रोजाना हजारों फूंकने के लिए बाजार में गुत्थमगुत्था है। दूसरी ओरए मान्यवर  कांशीराम की राख में बची खुची चिनगारी से आग पैदा करने की मायावती की चुनावी कवायद का हश्र यह कि ऐन मौके पर सुप्रीम कोर्ट से आय से बाहर की संपत्ति पर जांच के लिए सीबीआई को हरी झंडी होते न होते आर्थिक नीतियों पर भारी गर्जन तर्जन के बाद फिरउसी कारपोरेट सरकार को समर्थन जारी रखने का फैसला।खोदा पहाड़, निकली चूहिया!बहिष्कृतो बहुजनों का नेतृत्व करेने वाले तमाम दलित, पिछड़ा, आदिवासी, अल्पसंख्यक द्रविड़ नेताओं की जान तोते में है। तोते की गरदन पर दबाव पड़ते न पड़ते ये सारे लोग सुर ताल में नाचने गाने लगते हैं।
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार से समर्थन वापसी का फैसला फिलहाल टाल दिया है। मायावती ने कहा है कि डीजल की बढ़ी कीमतों और खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश ;एफडीआईद्ध जैसे फैसले पर विरोध के बावजूद वह केंद्र सरकार से समर्थन वापस नहीं लेंगी।लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी ;बसपाद्ध की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व संसदीय बोर्ड की बैठक के बाद मायावती ने यूपीए सरकार का आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही हैए जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। इसके बाद भी समर्थन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि फिलहाल वह यथास्थिति ही चाहती हैं। समर्थन वापसी का फैसला उचित समय पर किया जाएगा।
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच के लिए सीबीआई स्वतंत्र है।उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले की जांच से केन्द्रीय जांच ब्यूरो को रोका नहीं गया है।
इससे पहले बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन करके साबित किया है कि वह विधानसभा चुनाव भले ही हार गई हों पर बीएसपी का जनाधार अभी भी कायम है। वहीं दूसरी ओर यह भी जता दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में वह नए जातीय समीकरणों का इस्तेमाल करेंगी। संकल्प रैली में भारी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने माया के विरोधियों को करारा जवाब दे दिया है।  रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने केंद्र और राज्य की अखिलेश सरकार पर हमला बोला। कांशीराम की पुण्यतिथि पर घोषित अवकाश को रद्द किए जाने के एसपी सरकार के फैसले पर माया ने राज्य सरकार को घेरा तो इसे राष्ट्रीय शोक न मनाने के फैसले पर केंद्र पर भी हमला किया। माया ने दोनों दलों को दलित विरोधी बताया।
यूपी विधानसभा चुनाव में हार के बाद पहली बार किसी रैली को संबोधित करते हुए माया ने कहा कि वर्तमान एसपी सरकार शहर और योजनाओं के नाम बदल रही है। इन्हें बाबा साहब अंबेडकर और अन्य दलित नेताओं के नामों पर रखा गया था और एसपी शासन में कुल 24 मूर्तियां तोड़ी गईं हैं। यही नहीं मेरी मूर्ति को भी तोड़ा गया। दलित राजनीति करने वाली माया ने इस बार भी इसी ओर अपने भाषण का रुख मोड़ते हुए नौकरियों में आरक्षण के बिल की बात कही। माया ने कहा कि यह बिल अभी तक संसद में अटका है।प्रदेश में 6 महीने पहले ही जीतकर आई समाजवादी पार्टी की सरकार पर हमला करते हुए पूर्व सीएम मायावती ने कहा इस सरकार को यादवों को छोड़ न तो ओबीसी की फिक्र है न मुस्लिमों की। एसपी पर चुनावी वादे पूरे न करने का आरोप लगाते हुए माया ने कहा कि इस राज में यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है।
इस रैली और यूपी के बदले माहौल को देखते हुए लग रहा है कि अब वह अपनी रणनीति बदल रही हैं। अब तक सर्वसमाज की बात करने वाली मायावती अब दलित.मुस्लिम समीकरण पर ध्यान दे रही हैं। जिन अगड़ों के सहारे वे 2007 में यूपी की सत्ता पर काबिज हुई थीं वे अब उनकी प्राथमिकता में नहीं है। संकल्प रैली स्थल पर किसी वर्ग विशेष को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। राजनैतिक विश्लेषक यह मान रहे हैं कि मायावती अब अपना ध्यान मुसलमानों पर केंद्रित कर रही हैं। उन्हें इस बात का अहसास है कि उनकी सत्ता मुसलमानों की वजह से ही गई है। इसलिए अब उनका पूरा ध्यान दलितों के साथ.साथ मुसलमानों पर है। रैली में माया दलित अत्याचार पर तो अपने स्वभाव के अनुकूल बोलीं लेकिन उन्होंने प्रदेश की सत्ता में भागीदारी मुसलमानों के साथ पक्षपात की भी बात कही। उन्होंने मुस्लिम आरक्षण का सवाल भी उठाया।
माना जा रहा है कि माया अब दलित मुस्लिम गठजोड़ को फिर से ताकत देने का काम करेंगी। दलित अत्याचार के साथ.साथ मुसलमानों के साथ श्धोखाश् उनका अहम मुद्दा होने वाला है। माया को यह अच्छी तरह मालूम है कि सपा के मुस्लिम नेताओं में आपसी खींचतान चल रही है। हवा के साथ बहे मुस्लिम मतदाताओं को बीएसपी के साथ वापस जोड़ने में ये नेता ही अहम भूमिका निभाएंगे। एसपी द्वारा मुसलमानों के साथ किए गए वायदे उनका मुख्य मुद्दा होंगे। जहां तक आम मुसलमानों का सवाल है कम से कम कानून व्यवस्था के मामले में वे मायावती सरकार को अब याद कर रहे हैं।  
कांग्रेस और संघपरिवार अल्पसंख्यक बाजार वर्चस्व वाले तबके के हितों के मद्देनजर राजनीति के जरिये हिंदू राष्ट्रवाद के तहत मनुस्मृति  की व्यवस्था कायम करके कारपोरेट साम्राज्यवादी यहूदी हिंदू गठजोड़ की विश्वव्यवस्था के मुताबिक अर्थ व्यवस्था को खुला बाजार में तब्दील करके बहुसंख्यक जनता को जल जंगल जमीन आजीविका रोजगार और उत्पादन के साधनों से वंचित करने में लगी हैं।नागरिकता और मानवाधिकार निलंबित है। राष्ट्र का सैन्यीकरण हो रहा है तो अंतरिक्ष का भी।समता और न्याय की बलि चढ़ा दी गयी है। रोज संसदीय व्यवस्था को धता बताते हुएए संविधान की हत्या करते हुए एक के बाद एक फैसले लागू किये जा रहे हैं कारपोरेट नीति निर्धारण के जरिये। वाशिंगटन और तेल अबीब के निर्देशन में। ज्यादातर हिमालयी क्षेत्र और पूरे मध्यभारत में सशस्त्र बल विशेष सैन्य कानून लागू है या फिर तरह तरह के सैन्य अभियानों या सलवा जुड़ुम जैसे सरकारी कार्यक्रम के तहत इस कानून के प्रवधान लागू हैं।जिन लोगों पर शासन किया जा रहा है उन पर नियंत्रण रखने के लिए सूचना एकत्रित करना किसी भी शासक सत्ता का मूलभूत सिद्धांत है। जिस समय भूमि अधिग्रहण और नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध भारत में बढ़ता जा रहा हैए तब मध्य भारत में खुल्लमखुल्ला जंग की छाया मेंसरकार ने नियंत्रण तकनीक के तौर पर एक विशाल बायोमेट्रिक कार्यक्रम का प्रारंभ कियाए यूनिक आइडेंटीफिकेशन नंबर ;विशिष्ट पहचान संख्या या यूआइडी जो शायद दुनिया का सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी और बड़ी लागत की सूचना एकत्रीकरण परियोजना है। लोगों के पास पीने का साफ पानीए या शौचालयए या खानाए या पैसा नहीं है मगर उनके पास चुनाव कार्ड या यूआइडी नंबर होंगे। क्या यह संयोग है कि इनफोसिस के पूर्व सीईओ नंदन नीलकेणी द्वारा चलाया जा रहा यूआइडी प्रोजेक्टए जिसका प्रकट उद्देश्य गरीबों को सेवाएं उपलब्ध करवाना है आइटी उद्योग में बहुत ज्यादा पैसा लगाएगा जो आजकल कुछ परेशानी में है;यूआइडी बजट का मोटा अंदाज भी भारत सरकार के वार्षिक शिक्षा खर्च से ज्यादा है। द्ध इतनी ज्यादा तादाद में नाजायज और पहचान रहित  लोग जो झुग्गियों में रहने वाले हैंए खोमचे वाले हैंए ऐसे आदिवासी हैं जिनके पास भूमि के पट्टे नहीं. जनसंख्या वाले देश को ष्डिजीटलाइजष् करने का असर यह होगा कि उनका अपराधीकरण हो जायेगाए वे नाजायज से अवैध हो जायेंगे। योजना यह है कि एन्क्लोजर ऑफ कॉमंस का डिजिटल संस्करण तैयार किया जाए और लगातार सख्त होते जा रहे पुलिस राज्य के हाथों में अपार अधिकार सौंप दिए जाएं। तो बहुसंख्यक समुदायों दलितए पिछड़ाए अल्पसंख्यकए आदिवासी और द्रविड़ समुदायों के नेता,अस्मिता और पहचान की राजनीति करने वाले लोग इस अश्वमेध यज्ञ में क्या कर रहे हैं उनकी क्या भूमिका है संसद और विधानसभाओं में वे किसका हित साध रहे हैं विचारधारा के नाम पर जो जनवादी और बहुजनवादी संगठन हैं  वे पिछले बीस साल से क्या कर रहे हैंउत्पादक और सामाजिक शक्तियों को लामबंद करके परिवर्तन का दम ठोंकने वाले किसानों मजदूरोंए महिलाओं छात्रों आदिवासियों युवाओं के संगठन अपने अपने तीस मार खां की अगुवाई में किसका खजाना लूट रहे हैंअमेरिका में हो रहे ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन के विपरीत हजारे आंदोलन ने निजीकरण कॉर्पोरेट ताकत और आर्थिक सुधारों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला। उसके विपरीत इसके प्रमुख मीडिया समर्थकों ने बड़े.बड़े कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार घोटालों ;जिनमें नामी पत्रकारों का भी पर्दाफाश हुआ थाद्ध से जनता का ध्यान सफलतापूर्वक हटा दिया और राजनीतिकों की जन.आलोचना का इस्तेमाल सरकार के विवेकाधीन अधिकारों में और कमी लाने एवं और अधिक निजीकरण की मांग करने के लिए इस्तेमाल किया। ;2008 में अण्णा हजारे ने विश्व बैंक से उत्कृष्ट जन सेवा का पुरस्कार लिया।  विश्व बैंक ने वाशिंगटन से एक वक्तव्य जारी किया कि यह आंदोलन उसकी नीतियों से पूरी तरह मेल खाता है।
हालत कितनी विकराल है कल जब पूरे देश में हिंदी और अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के टीवी चैनल लखनऊ में बहुजनों की मेगा रैली की लाइव टेलीकास्ट कर रहे थेए तो बंगाल के तमाम टीवी चैनल ने स्क्रालिंग तक में इसका उल्लेख नहीं किया। आज के अखबारों में भी इसकी सूचना नहीं है। लेकिन बंगाल में ब्राह्मणवादी व्यवस्था तो आजादी के बाद ही लागू हुई। ग्यरहवीं सदी तक यहा बौद्धकाल रहा। फिर अठारवीं सदी तक मुसलमानों का शासन। अठारवीं सदी तक महाराष्ट्र और केरल तमिलनाडु से लेकर चटगांव और मणिपुर तक रियासतों में मूल निवासी राज कर रहे थे।बंगाल में वर्ण व्यवस्था कभी लागू नहीं रही। आज भी बंगाल में न क्षत्रिय हैं और न राजपूत। आजादी से पहले तीनें अंतरिम सरकार मुसलमान और दलित मिलकर चला रहे थे। आज हालत यह है कि चंडाल आंदोलन के जरिए अस्पृश्यता मोचन का आगाज करने वाले , नील विद्रोह के जरिए किसान आंदलन की अगुवाई करनेवाला, अंबेडकर को संविधान सभा में भेजनेवाला मतुआ आंदोलन की सिरमौर ममता बनर्जी है। इसी तरह तमिलनाडु में पेरियार नारायण गुरू के आंदोलन के नेतृत्व में अयंगर ब्राह्मण जयललिता हैं।तमिलनाडुए बंगाल, महाराष्ट्र और पंजाब जो पंजाब जो बहुजन आंदोलन के आधार रहे हैं , खत्म हैं। वहां सर्वत्र अति अल्प संख्यक तबका जीवन के हर क्षेत्र में काबिज हैं और वे बहुजनों का नेतृत्व जिहादी तेवर के साथ करके मुक्ति और मोक्ष का तिलस्मी किला बनाये हुए हैं।
वामपंथियों की व्राह्मणवादी विचारधारा और संगठन में वर्चस्ववादी रवैये पर हम खूब बोल लिख चुके हैं। पर अंबेडकर, फूले, कांशीराम  विचारधारा का कारोबार कर रहे लोगों की आपराधिक गतिविधियों पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। जहां एक ही रणनीति हैए संतों महापुरूषों का नाम जपनाए पराया माल अपना! विचारधारा के नाम पर गाली गलौज और घृणा अभियान!और कैडर के नाम पर मूर्खों और गुंडों की वाहिनी  बनाकर अफसरों, डाक्टरों, इंजीनियरों और वंचितों में मालदार तबके से नियमित एकतरफा वसूली। जिसका कोई हिसाब किताब किसी को देना नहीं होता।निनानब्वे फीसद जनता की पहचान और अस्मिता के नाम पर अगुवाई करने वाले लोगों का मिशन अगर बहुजनों की आजादी का मिशन होता तो कहीं किसी बिंदू पर उनमें भी वहीं एका होता ए जो सत्तावर्ग की तमाम पार्टियों संघ परिवारए कांग्रेस और वामपंथी दलों में है। हर फैसले  हर जनविरोधी कार्रवाई, जनता के खिलाफ युद्ध में उनमें गजब का समन्वय है। पर दलितोंए पिछड़ों, अल्पसंखय्कोंए आदिवासियों के नेताओं में  कोई सहमति और समन्वय की कल्पना तक नहीं की जा सकती। न मायावती और मुलायम , और न ही लालू, पासवान और नीतीश किसी एक एजंडा के लिए काम कर सकते हैं।  
कांशीराम के बामसेफ के हजार टकड़े हो गए। हर टुकड़ा असली, मूलनिवासी संगठन।

 बाबा साहेब भीमराव  अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी भी हजार धड़ों में बंटाधार। अठावले चाहे तो मुंबई ठप कर दें। पर उनका गठजोड़ हिंदू राष्ट्रवाद के धारक वाहक बाल ठाकरे परिवार से है। अठावले शिवशक्ति भीमशक्ति के गठजोड़ से जाति उन्मूलन और बाबा साहेब के आर्थिक सशक्तीकरण,जाति उन्मूलन और सामाजिक न्याय के कार्यक्रम को अंजाम दे रहे हैं।
 मुलायम के मुकाबले मोर्चे में जमा हुआ है मायावती का सर्वजन समाज। मायावती और मुलायम न दलितों, न पिछड़ों, न बहुजनों और न सर्वजन समाज, न देश की तमाम बहिष्कृत जनता और न देश के हित में कोई फैसला करते हैं। केंद्र को समर्थन हो या आर्थिक नीतियों को विरोध वे दरअसल एक दूसरे के खिलाफ सत्ता की लड़ाई के मद्देनजर फैसला करते हैं। और बहिष्कृत जनता को उम्मीद है कि ये लोग समता और सामाजिक न्याय का राजमार्ग तैयार करेंगे।
गांधी नेहरु परिवार के वंशवाद के खिलाफ देश में विरोध की राजनीति चलती है। पर विरोध की राजनीति में वंसवाद का क्या कहिये। उत्तर दश्क्षिम पूर्व पश्चिम चारों दिशाओं में क्षत्रपों के संगठन और दलों में वंसावाद परिवारवाद हावी है। विधवा और पुत्र उत्तराधिकारी, यह तो शुरू से चलन रहा  है। अब सत्ता में भागेदीरी के जरिये पूरे कुनबे को खपाने का काम हो रहा है। बहिष्कृत समुदायों का नेतृत्व न सिर्फ तानाशाह हैए बल्कि वे वंशवाद और कुनबाबाद के निकृष्ट उदाहरण है। मजबूत जातियां ब्राह्ममों की स्थानापन्न हो रही हैं और कमजोर जातियों का सत्यानाश हो रहा है। आरक्षण पर भी जाति वर्चस्व हावी है। बहुत सी अछूतए आदिवासी और शरणार्थी जातियों को आरक्षण सिर्फ इसलिए नहीं मिलता कि आरक्षण पर काबिज मलाईदार तबका उन्हें सामाजिक न्याय का हकदार नहीं मानतीं।
इन संगठनों और दलों का एकमात्र मिशन है फंडिंग। ये आंदोलन वगैरह दिखावे के लिए करते हैं।आदिवासियों, शरमार्थियों, बस्तीवालों और बंजारों में इनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती। उनमें भी नहीं जो नकद भुगतान न कर सकें। मजे की बात है कि ऐसे संगठनों और दलों की सारी चल अचल संपत्ति व्यक्तिगत खाते में हैं। नेतृत्व बदल नहीं सकता, क्योंकि संपत्ति से बेदखल होने का खतरा है। लोकतंत्र की गुंजाइश नहीं है, सवाल पूछने का अधिकार नहीं है और यहां तक भी साथ बैठने तक का भी हक नहीं है। अब तो ब्राह्मण और सवर्ण जातियां तक बहुजनों के साथ ऐसी अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं करतीए जैसा कि इनके नेता और मसीहा करते हैं। कार्यकर्ताओं के लिए दाल भात और सूखी रोटी। नेताओं  और उनके परिजनों के लिए पांच सितारा जीवन जेवरात और विदेश यात्राएं। कोई समझदार, जानकार, प्रतिबद्ध आदमी मिशन के झांसे में इनके यहां पहुंच भी गया तो उन्हें बदनाम करके अलग करने में देरी नहीं लगती। बदनामी के लिए बिना सबूत कोई भी आरोप काफी है। इतना भी काफी है कि फलां अमूक दल या ग्रुप के लिए काम कर रहा है या अमूक असल में ब्राह्मण हैं। हमारे लोग इतने बुरबक हैं, कि बहुत जल्दी बहकावे में आ जाते हैं। कोई तहकीकात नहीं होती।
नतीजतन इन संगठनों और दलों में सामूहिक नेतृत्व तो दूर, द्विती तृतीय श्रेनी का नेतृत्व भी नहीं है। प्रादेशिक, जिला या पंचायत स्तर तक का फैसला तानाशाह करता है। चुनाव होते नहीं हैं। हों तो नेतृत्व खतरे में पड़ जाये, मनोनयन से काम चल जाता है। इनके यहां इतिहासए अर्थशास्त्र, विज्ञान, समाज के अध्येता के लिए कोई जगह नहीं है। ये समाज को अपढ़ और अज्ञानी बनाये रखते हुए दुश्मनों के खिलाफ छायायुद्ध करके घृणा अभियान के जरिये अकूत संपत्ति जमा करने और भोगने का मिशन  चला रहे हैं।
कल और आज मायावती के कथनी करनी का रहस्य यही है। जो बाकी लोगों की कथनी और करनी से किसी मायने में अलग नहीं है।
राम पुनियानी आईआईटी में २००४ तक प्राध्यापक थे। वे विश्वविख्यात चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनकी यह पुस्तक भारत की असली तस्वीर पेश करती है। अंबेडकर के बारे में उनके अनुयायियों और विरोधियों में अनेक भ्रांतियां है। अंबेडकर की पूजा हो रही है मनुस्मति व्यव्स्था बनाये रखने के लिए और कारपोरेट साम्राज्यवाद, जिओनिज्म व ग्लोबल ब्राहमणवादी वर्चस्व बनाये रखने के लिएए जबकि उनकी विचारधारा और जाति उन्मूलन, सामाजिक आर्थिक न्याय के कार्यक्रमए जो धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत के लिए सबसे जरूरी हैं, को कचरा पेटी में डाला जा रहा है। हिंदुत्व के झांसे में फंस गये हैं खुला बाजार की व्यवस्था में जीते मरते दलित आदिवासी पिछड़े मूलनिवासी बहुजन।इस दुश्चक्र को समझने के लिए यह पुस्तक अवश्य पाठ्य है, जिसके आधार पर प्रतिरोध की जमीन बन सकती है।
बाबा साहेब आम्बेड़कर की जयंती हर साल धूम धाम से मनाई जाती है। प्रश्न यह है कि जिन मूल्यों के लिए डॉ.आम्बेड़कर ने जीवन भर संघर्ष किया, वे मूल्य अब कहॉं हैं, प्रश्न यह है कि उन दलितों की . जिनकी बेहतरी के लिए डॉ. आम्बेड़कर ने अपना जीवन होम कर दिया . आज क्या स्थिति है
दलितों और समाज के अन्य दबे.कुचले वर्गों के अतिरिक्तए इस देश के क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के लिए डॉ. आम्बेड़कर आज भी एक महानायक हैं। जो राजनैतिक दल, सामाजिक न्याय के विरोधी हैं, वे तक डॉ. आम्बेड़कर के विरुद्ध एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं कर सकते।
बाबा साहेब सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे जमींदारों की आर्थिक गुलामी और ऊँची जातियों की सामाजिक गुलामी से दलितों की मुक्ति के भी अक्षय प्रतीक हैं। पीएचडी और डीएससी होते हुए भी उन्हें अपने कार्यस्थल पर अपमान सहना पड़ा। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि राजनैतिक स्वतंत्रता तब तक अर्थहीन रहेगी जब तक उसके साथ.साथ सामाजिक बदलाव नहीं होता जब तक शूद्रों और महिलाओं को गुलामी से मुक्ति नहीं मिलती। राष्ट्रीय आंदोलन में उन्होंने इन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए काम किया।
आम्बेड़कर ने स्वाधीनता आंदोलन के लक्ष्यों में सामाजिक परिवर्तन को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे चमत्वृळत कर देने वाली मेधा के धनी थे और उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्यए दलितों की बेहतरी था। वे निरंतर हमारे देश की जाति प्रथा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे। उन्होंने इस देश में राजनैतिक व सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को गति दी। यह अकारण ही नहीं था कि वे कमजोर वर्गों के संघर्ष के प्रतीक और अगुवा थे। और यही कारण है कि देश के सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य में उनकी भूमिका को नकारने या कम करके प्रस्तुत करने की कोशिशें हो रही हैं। चूंकि उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज करना संभव नहीं है। इसलिए प्रयास किया जा रहा है कि उन्हें देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठापित कर दिया जाये और फिर उनके प्रिय सिद्धांतों और आदर्शों को कचरे की टोकरी में फेंक दिया जावे। उनके योगदान के महत्व को घटा कर प्रस्तुत करने के भी योजनाबद्ध प्रयास हो रहे हैं।
मायावती के फैसले से कांग्रेस ने निश्चित रूप से राहत की सांस ली होगी। हालांकि कांग्रेस के रणनीतिकारों को भरोसा था कि फिलहाल मायावती समर्थन वापसी जैसा फैसला नहीं लेंगी। कल की रैली में उन्होंने एफडीआई के फैसले का जमकर विरोध किया थाए जिससे कांग्रेस के अंदरखाने में चिंता थी लेकिन पार्टी के प्रबंधक इसे राजनीतिक मजबूरी भर मान रहे थे। उनका कहना था कि माया यूपीए सरकार को जितना भी कोसें वह अपना समर्थन जारी रखेंगी।
इससे पहले समाजवादी पार्टी के खिलाफ खुलकर गुस्से का इजहार करते हुए रमाबाई मैदान से हुंकार भरते हुए मायावती ने कहा कि यह सरकार काम कम और ढिंढोरा खूब पीट रही है। मुलायम और उनके परिवार पर हमला करते हुए माया ने कहा कि अगर आरक्षण न होता तो यह पूरा परिवार भैंस चराता।एसपी सरकार पर हमेशा से जुर्म को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। पूर्व सीएम माया ने कहा कि इस सरकार को गुंडे चला रहे हैं जिससे महिलाएं बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं।
बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा बसपा रैली में सपा पर लगाए गए आरोपों पर आजमगढ़ में कन्या विद्याधन और बेरोजगारी भत्ता बांटने गए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी सजा चुनाव में हार होती है और यह सजा यूपी की जनता ने बसपा को दे दी है। 
मायावती जिन दलित महापुरुषों के अपमान की बात कर रही हैं और वह जरा सा भी उन महापुरुषों को मानतीं तो प्रदेश में भीमराव अम्बेडकर और दूसरे महापुरुषों के नाम पर बनाए गए पार्कों में अरबों रुपयों की लूट नहीं करतीं। दरअसल मायावती ने रैली में कहा कि अगर अम्बेडकर नहीं होते तो मुलायम और अखिलेश भैंस चरा रहे होते।
सीएम ने कहा कि समाजवादी पार्टी अपने वायदों पर खरी उतरती हैए इसी लिए सिर्फ 6 महीने में कन्या विद्याधन बेरोजगारी भत्ता बंटने लगा है। मायावती को यह जानकार तकलीफ हो रही है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार सिर्फ बेरोजगारी भत्ता ही नहीं रोजगार दिलाने की भी कोशिश में है। तभी तो प्रदेश में नए उद्योग लगाने के लिए नई उद्योग नीति बनाई जा रही है। इससे लाखों युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद है।
माया ने अपने कार्यकाल की याद दिलाते हुए कहा कि हमारे शासन में राज्य की कानून व्यवस्था दुरुस्त थी लेकिन वर्तमान सरकार के 6 महीने के कार्यकाल में ही एक दर्जन दंगे हो गए। राज्य सरकार पर दलित विरोधी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए बीएसपी सुप्रीमो ने कहा कि कुल अपराधों में से सिर्फ 20 फीसदी की ही एफआईआर दर्ज की गई हैं। पूर्व सीएम ने कहा कि यूपी क्राइम प्रदेश बन गया है और एसपी शासन में गुंडों को प्रमोशन दिया जा रहा है।
माया को कुर्सी से हटाकर सीएम पद पर काबिज हुए अखिलेश यादव पर हमला करते हुए माया ने कहा कि वह सिर्फ घोषणा सीएम तक ही सीमित हैं। माया ने कहा कि हमने बेरोजगारों के हाथों में भत्ते की जगह नौकरियां दीं लेकिन अखिलेश घोषणाओं में अपने बाप मुलायम से भी आगे आ गए हैं। अखिलेश सरकार की लैपटॉप और टैबलेट देने के योजना पर हमला करते हुए माया ने कहा कि इसका अंत इनके दुकानों पर बिकने से होगा।
राज्य की जनता की पीड़ा के लिए बीजेपी.कांग्रेस को भी निशाने पर लेते हुए माया ने कहा कि इन दो दलों ने भी चुनाव में यह सोचकर काम किया कि मायावती दोबारा सत्ता में न आने पाए। वह हमारी कामयाबी से डर चुके थे। माया ने कहा कि अगर बीजेपी.कांग्रेस कमजोर उम्मीदवारों को खड़ा कर एसपी उम्मीदवारों की जीत का मार्ग प्रशस्त न करती तो हम 250 सीट जीतते। 
बीते दिनों यूपी के कद्दावर मंत्री और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव ने प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक में घूस लेने की सलाह दे डाली थी। माया ने इसी बयान पर एसपी की खिंचाई करते हुए कहा कि यहां मंत्री ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। रिटेल में एफडीआई से किसानों के नुकसान का जिक्र करते हुए माया ने कहा कि अगर इससे किसानों को फायदा हुआ तो ही समर्थन दिया जाएगा।
दरअसल कांग्रेस के इस भरोसे का आधार भी था। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो मायावती अभी लोकसभा चुनाव से बचना चाहती हैं। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की हार से अभी तक उनकी पार्टी उबर नहीं पाई है। हार के बाद कल मायावती ने उत्तर प्रदेश में पहली बार शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की। लोकसभा चुनावों के लिए बसपा सांगठनिक रूप से तैयार नहीं हैए यह बात पार्टी के रणनीतिकार भी बखूबी समझते हैं। पिछले एक साल में मायावती सरकार के पूर्व मंत्रियों और पार्टी नेताओं के खिलाफ कई घोटाले और अपराध के मामले भी सामने आए हैं। ये ऐसे पेंच है जिनकी वजह से मायवती को हमेशा ही केंद्र की सरपरस्ती की दरकार रहेगी।  
मायावती खुद भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसी हैं। सीबीआई और अदालती कार्रवाही का खौफ भी उन्हें यूपीए की बांह थामने के लिए मजबूर कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन ने मायावती पर यही आरोप लगाकर उनसे सफाई भी मांग ली है। हुसैन ने कहा है कि मायावती जैसे नेता एक ओर तो एफडीआई के मुद्दे पर केंद्र की आलोचना कर रहे हैंए दूसरी ओर उसी का समर्थन कर रहे हैं। क्या ये नेता सीबीआई से डरे हुए हैं राजनीतिक पर्यवेक्षकों का भी कहना है कि मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को जांच के लिए स्वतंत्र है कह कर उन्हें पिछले पायदान पर ला दिया। अब वह समर्थन वापस नहीं ले सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में जांच करने के लिए स्वतंत्र है। इस मामले में मायावती को क्लीन चिट देने के फैसले पर दायर पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकारए सीबीआई और बसपा सुप्रीमो को नोटिस जारी करते हुए शीर्ष अदालत ने यह बात कही।
सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अदालत ने कभी यह नहीं कहा कि मायावती की संपत्ति के मामले की जांच सीबीआई नहीं कर सकती। एजेंसी जांच करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि इसके लिए एजेंसी को प्रदेश सरकार से मंजूरी लेनी होगी। जस्टिस पी सदाशिवम् और जस्टिस दीपक मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट किया कि वह मामला निरस्त करने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग पर अपने निर्णय को स्पष्ट करेगी। ओपन कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि अदालत केंद्र सीबीआई और मायावती को सिर्फ स्पष्टीकरण के लिए नोटिस जारी कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि आय से अधिक संपत्ति का मामला निरस्त करने का निर्णय किसी को संरक्षण प्रदान करने के लिए नहीं है।
वहीं याचिकाकर्ता कमलेश वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने कहा कि सरकार ऐसे मामले में मंजूरी नहीं देगी। ऐसे मसलों पर तो वे एक.दूसरे को बचाते हैंए तब अदालतों को सक्रिय भूमिका निभानी पड़ती है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 अक्तूबर 04 को आय से अधिक संपत्ति के मसले पर एजेंसी को जांच के लिए तीन माह का समय दिया था।
इसके बाद 7 अगस्तए 06 के आदेश में ताज कॉरिडोर और संपत्ति की जांच के लिए मसले को अलग किया था। दोनों ही पूर्ववर्ती आदेशों से यह स्पष्ट है कि सीबीआई को संपत्ति की जांच का आदेश शीर्ष अदालत ने दिया था। भूषण के तर्क पर पीठ ने अपने फैसले में दी गई व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए नोटिस जारी कर दिया।
पुनर्विचार याचिका में वर्मा ने सर्वोच्च अदालत से उसके 6 जुलाई के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करते हुए दलील दी है कि मायावती के खिलाफ सीबीआई की ओर से एकत्र किए गए सबूतों पर गौर किए बगैर अदालत ने तकनीकी आधार पर इस मामले का निपटारा कर दिया।

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने मायावती के खिलाफ नौ साल से लंबित संपत्ति मामला निरस्त करने के साथ ही सीबीआई को आड़े हाथों लिया था। अदालत ने फैसले में कहा था कि मायावती के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के बारे में किसी निर्देश के बगैर ही एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसा किया।
सीबीआई ने अदालत के आदेशों को ठीक तरीके से समझे बगैर ही बसपा सुप्रीमो के खिलाफ कार्यवाही की। अदालत का आदेश ताज कॉरिडोर प्रकरण में बगैर मंजूरी के उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कथित रूप से 17 करोड़ रुपये के भुगतान के मामले तक सीमित था।


-पलाश विश्वास
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