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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मोदी, आतंकवाद और भारतीय मुसलमान

अपनी अमरीका यात्रा के ठीक पहले, अन्तर्राष्ट्रीय समाचार चैनल सीएनएन के फरीद ज़कारिया को दिए अपने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत के मुसलमान, भारत के लिए जियेगें और मरेंगे और वे भारत का कुछ भी बुरा नहीं करेंगे। इसके बाद, गत 8 जुलाई को, कजाकिस्तान में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मध्य एशिया और भारत की साँझा इस्लामिक विरासत की चर्चा की और कहा कि यह विरासत, अतिवादी ताकतों और विचारों को हमेशा खारिज करेगी। प्रधानमंत्री ने फरमाया कि भारत और मध्य एशिया, दोनों की इस्लामिक विरासत प्रेम और समर्पण के सिद्धांतों पर आधारित और इस्लाम के उच्चतम आदर्शों  ज्ञान, पवित्रता, करुणा और कल्याण से प्रेरित है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह दावा किया कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और इस्लामिक स्टेट (आईएस) उन्हें आकर्षित नहीं कर सका है।
इन्हीं मोदी ने सन 2001 में दावा किया था कि ‘‘सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते परन्तु सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं’’। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर अपने चुनाव अभियानों में उन्होंने इस जुमले का जमकर इस्तेमाल किया था। सन 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम के बाद, गुजरात का मीडिया मुस्लिम और इस्लाम विरोधी उन्माद भड़काने में लगा था। मोदी ने इस उन्माद को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने काफी बाद में ‘‘सद्भावना उपवास’’ रखे परन्तु यह कहना मुश्किल है कि वे कितनी ईमानदारी और निष्ठा से उपवास कर रहे थे। मोदी ने दंगाईयों की वहशियाना हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराया था। उनके अनुसार, दंगे, साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आगजनी की घटना - जिसे उन्होंने किसी भी जांच के पहले ही मुसलमानों का षड़यंत्र निरुपित कर दिया था - की प्रतिक्रिया थे।
गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के बाद, मोदी ने ‘गुजरात के गौरव’ को पुनस्र्थापित करने के लिए ‘गौरव यात्रा’ निकाली थी। उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा 2002 के दंगों के लिए सभी गुजरातियों को दोषी ठहराने से गुजरात के गौरव को चोट पहुँची है। मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में, गुजरात की पुलिस ने अनेक मुसलमानों को सीमा के उस पार के आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकवादी बताकर गोलियों से भून डाला था। सोहराबुद्दीन और इशरत जहां की हत्या की जांच हुई और इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह सहित कई पुलिस अधिकारी आरोपी बनाये गए।
प्रधानमंत्री मोदी यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों के उनके अलग-अलग, बल्कि
विरोधाभासी आंकलनों में से किसे वे सही मानते हैं। उनकी मुसलमानों के बारे में असली, ईमानदार राय क्या है? या, क्या उनकी सोच बदल गयी है? यदि हाँ, तो उन्हें ऐसी कौनसी नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिसके चलते उनकी सोच में परिवर्तन आया है?
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस महानिदेशकों, महानिरीक्षकों और केंद्रीय पुलिस संगठनों के मुखियाओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए नवंबर 2014 में कहा था कि आईएस, भारतीय उपमहाद्वीप में पैर जमाने की कोशिश  कर रही है और अलकायदा ने गुजरात, असम, बिहार, जम्मू कश्मीर व बांग्लादेश  की बड़ी मुस्लिम आबादी को देखते हुए, भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शाखा स्थापित कर दी है।
भारतीय मुसलमान और आतंकवाद
उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर चाहे जों हों, इसमें कोई संदेह नहीं कि वैष्विक आतंकी नेटवर्कों में भारतीय मुसलमानों की उपस्थिति और भागीदारी बहुत कम है। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं। दुनिया में इंडोनेशिया को छोड़कर इतनी संख्या में मुसलमान किसी अन्य देश में नहीं रहते। इसके बावजूद, भारतीय सुरक्षाबल और गुप्तचर एजेंसियां अब तक केवल चार ऐसे भारतीय मुस्लिम युवाओं की पहचान कर सकी हैं, जिन्होंने आईएस के स्वनियुक्त इस्लामिक खलीफा अबुबकर बगदादी द्वारा शुरू किए गए युद्ध में हिस्सा लिया है। ये चार युवक हैं अरीब मज़ीद, शाहीन तनकी, फरहाद शेख और अमन टण्डेल।
इन चार युवकों के अतिरिक्त, समाचारपत्रों की खबरों के अनुसार, बैंगलुरू में रहने वाले, भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक 24 वर्षीय कर्मचारी मेंहदी मसरूर बिस्वास पर आरोप है कि वह अपने ट्विटर हैंडल के जरिए, आईएस के आतंकी मिशन का प्रचार कर रहा था और बगदादी के नेतृत्व वाली सेना में भर्ती होने के लिए युवकों को प्रेरित कर रहा था। मंेहदी को चैनल 4 को दिए गए उसके एक साक्षात्कार केे आधार पर पकड़ा गया।
अब इसकी तुलना 90 देशों के 20,000 विदेशियों से कीजिए, जो बगदादी की सेना में भर्ती हुए हैं। नेषनल काउंटर टेरोरिज्म सेंटर के निदेशक निकोलस रासम्यूसेन के अनुसार, इनमें से 3,400पश्चिमी  राष्ट्रों से हैं। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक जेम्स क्लेपर के अनुसार, इनमें 180 अमेरिकी, 130 केनेडियन, 1200 फ्रांसीसी, 600 ब्रिटिश, 50 आस्ट्रेलियाई और 600 जर्मन शामिल हैं। इसके मुकाबले, भारत से मात्र चार और बांग्लादेश से मात्र 6 लोगों को आईएस का युद्ध लड़ने का दोषी पाया गया है। 
वैष्विक आतंकी संगठनोें में क्यों शामिल नहीं होते भारतीय?
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने कभी इस प्रश्न  पर विचार नहीं किया कि आखिर क्या कारण है कि भारत के 14 करोड़ मुसलमानों में से आईएस में केवल चार भर्ती हुए। इस प्रश्न पर विचार करने की बजाए, वे यह आरोप लगाने में जुटे रहते हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं। भारतीय मुसलमान देषभक्त हैं और भारत के हितों के खिलाफ नहीं जाएंगे, ये बातें मूलतः मुस्लिम-बहुल देशों की यात्राओं के दौरान कहीं गईं या विदेशी मीडिया से बातचीत में। और इनका उद्धेष्य अपनी ेउदारवादी छवि प्रस्तुत करना था।
जो भी हो, मूल प्रश्न यह है कि भारतीय मुसलमान, वैष्विक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित क्यों नहीं हुए? आईए, हम कुछ संभावित कारणों की चर्चा करें।
1.    भारतीय मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व मुख्यतः दारूल उलूम देवबंद और कुछ अन्य मदरसों जैसे नदवातुल उलेमा, लखनऊ से आता है। दारूल उलूम देवबंद का देश भर में फैले हजारों छोटे मदरसों और मकतबों पर नियंत्रण है। देवबंद के उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा-ए-हिन्द ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों मौलवियों और विद्यार्थियों की मौजूदगी में आतंकवाद के विरूद्ध फतवा जारी किया था। उन्होंने आतंकवाद को जड़मूल से उखाड़ फेंकने की शपथ भी ली थी। दारूल उलूम के रेक्टर हबीबुर रहमान के अनुसार, ‘‘इस्लाम हर तरह की अन्यायपूर्ण हिंसा, शान्ति भंग, खून खराबा, हत्या और लूटपाट का निषेध करता है और किसी भी स्वरूप में इनकी अनुमति नहीं देता।‘‘ जमायत ने लखनऊ, अहमदाबाद, हैदराबाद, कानपुर, सूरत, वाराणसी और कोलकाता में मदरसों के संचालकों की बैठकें और सम्मेलन आयोजित कर अपने आतंकवाद विरोधी संदेश  को उन तक पहुंचाया। जमायत ने एक ट्रेन बुक की, जिसमें उसके सदस्य और समर्थक देश भर में घूमे और शांति  और आतंकवाद-विरोध का संदेश फैलाया।
2.    इस्लाम, भारत में मुख्यतः शांतिपूर्ण ढंग से फैला है। भारत में इस्लाम पहली बार 7वीं सदी में केरल के तट पर अरब व्यवसायियों के साथ पहुंचा। इसका नतीजा यह है कि मुसलमान आज भी स्थानीय परंपराओें का पालन करते हैं औेर स्थानीय संस्कृति में घुलेमिले है। उनकी व गैर मुस्लिमों की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। उदाहरणार्थ, लक्षद्वीप के मुसलमान मातृवंषी परंपरा का पालन करते हैं और केरल के मुसलमानों के लिए ओणम उतना ही बड़ा त्यौहार है, जितना कि गैर मुसलमानों के लिए। अमीर खुसरो ने होली पर रचनाएं लिखी हैं, मौलाना हसरत मोहानी नियमित रूप से मथुरा जाते थे और उन्हंे भगवान कृष्ण से बेइंतहा प्रेम था। रसखान ने भगवान कृष्ण पर कविताएं रची हैं, बिस्मिल्ला खान की शहनाई भगवान शिव को समर्पित थी और दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। ये हमारे देश की सांझा सांस्कृतिक परंपराओं के कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें समाप्त करने की असफल कोशिश अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर देश को विभाजित कर की।
    भारत में इस्लाम के प्रभाव में वृद्धि मुख्यतः समावेशी  सूफी परंपराओं के कारण हुई, जिनकी ओर समाज के वंचित और हाशिए पर पड़े वर्ग सबसे अधिक आकर्षित हुए। सूफी (और भक्ति) संतों का मूलधर्म प्रेम था। वह्दतुलबूजूद (संसार में केवल एक ईश्वर है) और सुल्हकुल (पूर्ण शांति ) - ये सूफी परंपरा के मूल सिद्धांत थे। सूफी केवल ब्राह्यशांति की बात नहीं करते बल्कि अंतर्मन की शांति पर भी जोर देते थे। निजामुद्दीन औलिया रोज सुबह राम और कृष्ण के भजन गाया करते थे।
    कई नगरों और गांवों में ताजियों के जुलूस के दौरान हिन्दू महिलाएं आरती उतारती हैं। इस तरह की सांझा सांस्कृतिक जड़ों के चलते, भारतीय मुसलमानों के दिमागों में जेहाद का जहर भरना नामुमकिन नहीं तो बहुत मुष्किल जरूर है।  भारतीय मुस्लिम चेतना पर सूफी मूल्यों का गहरा प्रभाव है। एक आम भारतीय मुसलमान, अरब और दूसरे देषों के मुसलमानों की संस्कृति और अपनी संस्कृति में कुछ भी समानता नहीं पाता। वहाबी-सलाफी इस्लामिक परंपराओं को ‘‘सही परंपराएं‘‘ सिखाने के नाम पर फैलाने के लिए काफी संसाधन खर्च किए गए और गहन प्रयास हुए परंतु ये परंपराएं आज भी बहुत सीमित क्षेत्र में प्रभावी हैं। अलबत्ता हिन्दू राष्ट्रवादियों और उनके विमर्ष के मजबूत होते जाने से भारतीय मुसलमानों के अरबीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
    इसके विपरीत, कुछ पष्चिमी देशों में मुसलमानों में अलगाव का गहरा भाव है। उनमें से अधिकांश  एशियाई मूल के हैं और पष्चिमी संस्कृति में घुलमिल नहीं पाते। एशियाई मूल के लोग अपने समुदायों के बीच रहना पसंद करते हैं। युवाओं का सांस्कृतिक अलगाव, ‘सभ्यताओं के टकराव‘‘ के सिद्धांत के वशीभूत नस्लवादी शक्तियों द्वारा इस्लाम को निशाना बनाए जाने व ईराक और अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध में पष्चिमी सेनाओं की भागीदारी के कारण, इस्लामवादियों के लिए अपनी सेना में पष्चिमी देशों के युवकों को भर्ती करना अपेक्षाकृत आसान है।
3.     भारतीय मुसलमानों द्वारा की गई आतंकी गतिविधियों के लिए मुख्यतः प्रतिशोध की भावना जिम्मेदार है। 12 व 18 मार्च 1993 को मुंबई के झवेरी बाजार व अन्य स्थानों पर बम हमले, 28 जुलाई 2003 को इसी शहर के घाटकोपर में बेस्ट बस में बम धमाके और 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाके, वे कुछ आतंकी घटनाएं हैं जिनमें मुस्लिम युवक शामिल थे। परंतु इनमें से अधिकांश का उद्धेष्य मुंबई में 1992-93 के दंगों और सन्  2002 के गुजरात कत्लेआम का बदला लेना था। दिनांक 12 मार्च 1993 के बम धमाकों के  दोषी पाए गए कई आरोपियों ने मुकदमे के दौरान अपने बयानों में बताया कि उन्होने इस षड़यंत्र में हिस्सा इसलिए लिया था क्योंकि उन्होंने मुंबई में 1992-93 के दंगों में अपने प्रियजनों को मरते देखा था। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट (1998) में साम्प्रदायिक दंगों और बम धमाकों के परस्पर संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया था, ‘‘सिलसिलेवार बम धमाके, अयोध्या व बंबई के दिसंबर 1992 व जनवरी 1993 के घटनाक्रम की प्रतिक्रिया थे।‘‘  मुस्लिम युवकों के गुस्से और निराशा के भाव का कुछ पाकिस्तानी एजेसिंयों ने दुरूपयोग किया।
    परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि कई अन्य मुस्लिम देशों की तुलना में, भारतीय प्रजातंत्र बहुत बेहतर ढंग से काम कर रहा है। यद्यपि न्यायप्रणाली धीमी गति से काम करती है परंतु तीस्ता सीतलवाड जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों से गुजरात दंगों के पीडि़तों को न्याय मिला है। कुछ अपराधियों को अदालतों ने सजा सुनाई हैं और वे अब जेल में हैं। इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मामलों के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के कड़े रूख के चलते, सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोषों को मार गिराने की घटनाओं में तेजी से कमी आई है। चूंकि भारत में पीडि़तों को न्याय मिलने की उम्मीद रहती है इसलिए वे प्रतिशोध की आग में नहीं जलते और यही कारण है कि आईएस को यहां से अपनी सेना के लिए लड़ाके नहीं मिल पा रहे हैं।
    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए प्रजातांत्रिक स्पेस घटता जा रहा है। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों को लग रहा है कि अब सैयां कोतवाल हो गए हैं और इसलिए वे बिना हिचक के मुसलमानों पर बेसिरपैर के आरोप लगा रहे हैं, उनका मताधिकार छीनने की मांग कर रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं और मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बता रहे हैं। अगर यही कुछ चलता रहा तो मुसलमानों को आईएस और अन्य आतंकवादी संगठनों के चंगुल से लंबे समय तक दूर रखना संभव नहीं होगा।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 15 जून 2015

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल


   
लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। 'आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं', उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं ? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है ?
मोदी,आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं,जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है। उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं। लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय.समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार.विनिमय करते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को 'हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला' कहा जाता था। उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के क्रिया.प्रतिक्रिया, के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था। दंगों के बाद पीडि़तों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' बताया था।
दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की। दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई। अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए। अहमदाबाद का मुस्लिम.बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है। जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला। उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वालेए सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। धीरे.धीरे मोदी ने अपनी भाषा और अपने शब्दों को 'स्वीकार्य' स्वरुप देना शुरू किया। वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे 'मोदित्व' कहा जाने लगा। 
सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे। उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे 'पिंक रेवोल्यूशन' बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकारए बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है। यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को . जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे . अपना बोरिया.बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था। भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये। सन्  2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था। उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का 'बदला' लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
आरएसएस ने पिछले ;2014 चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें। सत्ता में आने के बादए परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी। आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग.अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई। चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे। दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे। उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई।
हाल ;जून 2015 में दिल्ली के पास अटाली में व्यापक हिंसा हुई जहां एक अधबनी मस्जिद को गिरा दिया गया और सैकड़ों मुसलमानों को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी। इस तरह की घटनाएं देश में जगह.जगह हो रही हैं और इनसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मजबूत हो रहा है। गैर.हिन्दुओं पर'हरामजादे' का लेबिल चस्पा करने वाली मंत्री महोदया अपने पद पर बनीं हुई हैं और निहायत घटिया नस्लीय टिप्पणी करने वाले भी सत्ता के गलियारों में काबिज हैं। हिन्दुत्व के प्रतीक सावरकर और गोड़से का महिमामंडन किया जा रहा है और बहुवाद के पैरोकार नेहरू की या तो निंदा की जा रही है या उनके महत्व को कम करके बताया जा रहा है। गांधीजी को 'सफाईकर्मी' बना दिया गया है और हिन्दू.मुस्लिम एकता के उनके मूल संदेश को दरकिनार कर दिया गया है। केन्द्र सरकार के संस्थानों में ऐसे लोगों को चुन.चुनकर पदस्थ किया जा रहा है जो पौराणिकता और इतिहास में कोई भेद नहीं करते और जातिप्रथा को उचित ठहराते हैं। इनमें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के नए अध्यक्ष प्रोफेसर सुदर्शन राव शामिल हैं। आरएसएस से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाएं सरकार को यह बता रही हैं कि शिक्षा नीति क्या होनी चाहिए और स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देने की कोशिश हो रही है।
मुस्लिम समुदाय की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं? उन्हें प्रधानमंत्री से असल में क्या कहना चाहिए? उन्हें सबसे पहले ऐसी नीतियों की जरूरत है जिससे उनमें सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो। पिछले तीन दशकों में हुई व्यापक और क्रूर हिंसा ने इस समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है। हिंसा के अलावा, मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया गया और सामूहिक सामाजिक सोच को इस तरह से तोड़ा.मरोड़ा गया जिससे विघटनकारी विचारधारा को बढ़ावा मिले और मुसलमानों पर निशाना साधा जा सके। और यह सब करने के बादए पीडि़त समुदाय को ही हिंसा का जनक और कारण बताया जाता रहा है! अल्पसंख्यकों के खिलाफ तरह.तरह के दुष्प्रचार हुए और इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हुआ। जब तक मुसलमानों के खिलाफ समाज में व्याप्त गलत धारणाएं दूर नहीं की जाएंगी तब तक साम्प्रदायिक हिंसा पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।
इस तरहए पूरी व्यवस्था का ढांचागत हिन्दुत्वीकरण किया जा रहा है और बहुवाद, जो कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केन्द्रीय तत्व था, की कीमत पर सावरकर.गोलवलकर की विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है।
मुसलमानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है आर्थिक दृष्टि से उनका हाशिए पर पटक दिया जाना। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि एक मुस्लिम युवक जीशान अली खान को खुल्लमखुल्ला यह कह दिया गया कि उसके धर्म के कारण उसे नौकरी नहीं दी जा सकती और एक मुस्लिम लड़की मिशाब कादरी को उसका घर खाली करने के लिए कहा गया क्योकि वह एक धर्म विशेष में आस्था रखती थी। 'सबका साथ सबका विकास' केवल नारा रह गया है और जैसा कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह ने किसी और संदर्भ में कहा था, वह केवल एक जुमला था। किसी भी विविधतापूर्ण समाज में वंचित समुदायों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठानाए समाज और राज्य की जिम्मेदारी है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भिजवाई गई धनराशि को लौटा दिया था। सच्चर समिति की सिफारिशों की तो अब कोई चर्चा ही नहीं करता। जाहिर है कि 'सबका विकास' इस सरकार के लक्ष्यों में कतई शामिल नहीं है।
मुसलमानों का एक तबका यह तर्क दे रहा है कि मोदी का 'हृदय परिवर्तन' हो गया है और अब वे अपनी पार्टी के सांप्रदायिक तत्वों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आरएसएस की बात सुनना उनने कम कर दिया है। यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जा रहा है और इसे फैलाने वालों में ज़फर सरेसवाला और एसएम मुश्रिफ जैसे लोग शामिल हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब संघ परिवार का कोई न कोई नेता राममंदिर के निर्माण की मांग या धार्मिक अल्पसंख्यकों का अपमान न करे। और यह सब बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। घरवापसी और लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता की आग को सुलगाए रखने की कोशिश हो रही है। जो लोग'हृदय परिवर्तन' की बात कर रहे हैं वे यह नहीं जानते कि आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक, विचारधारा की दृष्टि से कितने कट्टर होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कहा था कि वे आरएसएस के स्वयंसेवक पहले हैं और प्रधानमंत्री बाद में।
कुछ आरएसएस समर्थक मुस्लिम नेता, मोदी के साथ जाना चाहते हैं और मोदी ने उन्हें वायदा किया है कि वे उनके लिए आधी रात को भी उपलब्ध रहेंगे। इन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एहसान जाफरी के साथ क्या हुआ था। वे मोदी से सहायता की भीख मांगते रहे परंतु मोदी शायद बहरे हो गए थे। जाफरी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी जहां थे, जाफरी उससे थोड़ी ही दूरी पर थे और उस समय आधी रात नहीं हुई थी।
समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी यह चाहिए कि वह जागे, आत्मचिंतन करे और बहुवाद व प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करे। मुस्लिम समुदाय को प्रजातांत्रिक ढंग से आंदोलन चलाने होंगे ताकि समुदाय के सदस्यों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। मूलाधिकारों के उल्लंघन का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। इस मामले में वे अंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं जिन्होंने प्रजातांत्रिक रास्ते पर चलकर दलितों की बेहतरी के लिए काम किया। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वो गांधी और मौलाना आजाद की राह पर चले, जो विविधता का अपनी दिल की गहराई से सम्मान करते थे न कि केवल दिखावे के लिए। मुसलमानों के लिए बिछाए जा रहे जाल में उन्हें नहीं फंसना चाहिए। खोखले शब्दों की जगह उन्हें संबंधित व्यक्तियों के कार्यों और उसकी विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

सांप्रदायिक घटनाओं में कमी:सांप्रदायिक मानसिकता में वृद्धि

सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा देश के उन इलाकों में भी फैल गई, जहां उसका कोई इतिहास नहीं था। हापुड़ और लोमी ;उत्तरप्रदेश जैसे छोटे शहरों व हरियाणा के गुड़गांव को सांप्रदायिक हिंसा ने अपनी चपेट में ले लिया। सहारानपुर और हैदराबाद में मुसलमानों और सिक्खों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं।
सन् 2014 की लक्षित हिंसा की सबसे भयावह घटना 23 दिसंबर को हुई जब असम के कोकराझार और सोनीपुर जिलों में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैण्ड ;एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े के उग्रवादियों ने महिलाओं और बच्चों सहित, 76 आदिवासियों की जान ले ली। लगभग 7,000 ग्रामीणों को अपने घरबार छोड़कर भागना पड़ा। आदिवासियों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में तीन बोडो मारे गये।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 561 घटनाएं हुईं, जबकि सन् 2013 में ऐसी घटनाओं की संख्या 823 थी। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 लोग मारे गये और 1,688 घायल हुए। सन् 2013 में ये आंकड़े क्रमश: 133 व 2,269 थे। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने 'धार्मिक कारकों, लैंगिक विवादों,मोबाइल एप्स अथवा सोशल मीडिया में धर्म या धार्मिक प्रतीकों के कथित अपमान, धार्मिक स्थलों की जमीन को लेकर विवाद और अन्य मुद्दों' को सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का कारण बताया।
सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में ;असम की नस्लीय हिंसा को शामिल करके  201 व उसे छोड़कर 90 लोग मारे गये। इसकी तुलना में, आतंकी हमलों में 18 लोगों की मृत्यु हुई और 19 घायल हुए। मारे जाने वालों में 3 पुलिसकर्मी और 4 अतिवादी थे। जम्मू.कश्मीर में हुए आतंकी हमलों में 27 लोग मारे गये। इनमें शामिल थे 15 सुरक्षाकर्मी, 4 नागरिक और 8 अतिवादी। इन हमलो में 5 लोग घायल हुए, जिनमें से एक सरपंच और चार सीमा सुरक्षा बल कर्मी थे। इसके बावजूद, गुवाहाटी में 29 नवंबर 2014 को राज्यों के पुलिस महानिरीक्षकों और महानिदेशकों की 49वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद, देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है और सरकार यह सुनिश्चित करने के प्रति प्रतिबद्ध है कि दुनिया के किसी भी आतंकी संगठन को भारत में अपने पैर जमाने की इजाजत न दी जाए। उन्होंने यह संदेह व्यक्त किया कि देश के कुछ पथभ्रष्ट युवा आईसिस जैसे आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित हो सकते हैं परंतु सरकार उन्हें रोकने का हर संभव प्रयास करेगी। सांप्रदायिक हिंसा में मारे गये लोगों की  संख्या,आतंकवादी हमलों की तुलना में 14 गुना थी। परंतु गृहमंत्री के उद्घाटन भाषण में सांप्रदायिक हिंसा का जिक्र तक नहीं था।
अगर हम असम को छोड़ दें,जहां एनडीएफबी के सोंगबिजित धड़े द्वारा मई में बंगाली मुसलमानों और दिसंबर में आदिवासियों पर किए गए हमलों में कुल 111 लोग मारे गये,तो 2014 में सभी राज्यों में उत्तरप्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा की सर्वाधिक घटनाएं हुईं। लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार,सन् 2014 में उत्तरप्रदेश में हुईं 129 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 25 लोग मारे गये और 364 घायल हुए। इस मामले में महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर रहा जहां 82 घटनाओं में 12 लोगों की जानें गईं और 165 घायल हुए। इसी राज्य में,2013 में 88 सांप्रदायिक दंगों में 12 लोग मारे गये थे और 352 घायल हुए थे। तीसरे नंबर पर रहा कर्नाटक जहां 68 घटनाओं में 6 लोगों की मृत्यु हुई और 151 घायल हुए। सन् 2013 में कर्नाटक में 73 घटनाओं में 11 लोग मारे गये थे और 235 घायल हुए थे। गुजरे साल में राजस्थान में सांप्रदायिक हिंसा की 61 घटनाएं हुईं,जिनमें 13 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं और 116 घायल हुए। गुजरात में 59 घटनाओं में 8 लोगों की जानें गईं और 172 घायल हुए। सन् 2013 में गुजरात में 68 हिंसक सांप्रदायिक झड़पों में 10 लोगों की मृत्यु हुई थी और 184 घायल हुए थे। सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के लिहाज से बिहार पांचवे स्थान पर रहाए जहां 51 घटनाओं में 4 लोग मारे गये और 267 घायल हुए। सन् 2013 में बिहार में हुई 63 घटनाओं में 7 लोग मारे गये थे और 283 घायल हुए थे।
हमारे देश में एक सांगठनिक 'दंगा निर्माण प्रणाली'  विकसित हो गई है जो राजनैतिक परिस्थितियों के अनुकूल होने पर, जब चाहे, जहां चाहे दंगें भड़काने में सक्षम है। यह सांगठनिक ढांचा दिन.प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इसके हौसले और बुलंद हुए हैं। यदि सन् 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं और उनमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या, सन् 2013 की तुलना में कम रही तो इसका कारण यह था कि इस वर्ष दंगों या लक्षित हिंसा से कोई विशेष राजनैतिक लाभ मिलने की उम्मीद नहीं थी।
छत्तीसगढ़ के बस्तर में ईसाईयों का सामाजिक बहिष्कार हो रहा है और उनके संगठनों को आरएसएस के निर्देशों के अनुरूप काम करना पड़ रहा है। बस्तर के ईसाई इतने आतंकित हैं कि उनके संगठनों ने एक तथ्यान्वेषण दल ;जिसका गठन धार्मिक स्वातन्त्र्य के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन के मामलों का अध्ययन करने के लिए किया गया थाद्ध से उसकी बस्तर यात्रा रद्द करने को कहा क्योंकि उन्हें डर था इससे उनके खिलाफ हिंसा में और तेजी आयेगी। ऐसा लगता है कि सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी और अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रहने के लिए मजबूर किया जाना.ये दोनों ही हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की सोची.समझी रणनीति का अंग है।
अल्पसंख्यकों को आतंकित करने की इस कोशिश की प्रतिक्रिया में एमआईएम के तेवर और अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं और उसके नेता जहर उगल रहे हैं। इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को दो तरह से लाभ हो रहा है। एक तो जनता और मीडिया का ध्यान उनकी हरकतों से हट रहा है और दूसरेए उन्हें अपनी कार्यवाहियों और कथनों को उचित ठहराने का मौका मिल रहा है। ष्आपष् के नेताओं ने तो भाजपा पर यह आरोप तक लगाया है कि उसने ही दिल्ली के चुनाव में एमआईएम के उम्मीदवारों को प्रायोजित किया है क्योंकि चुनाव मैदान में एमआईएम की मौजूदगी के कारण धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा और अंततः इससे भाजपा लाभान्वित होगी।
सन् 2014 में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक घटनाएं उत्तरी और पष्चिमी भारत में हुईंए यद्यपि घटनाओं और मरने व घायल होने वालों की संख्या में सन् 2013 की तुलना में कमी आई। ऐसा प्रतीत होता है कि सांप्रदायिकता भड़काकर दंगे करवाने का मुख्य लक्ष्य चुनाव में लाभ पाना होता है। दक्षिण भारत में केवल कर्नाटक में सांप्रदायिक हिंसा हुई। मध्यप्रदेश में सन् 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा की 84 घटनाओं की तुलना में सन् 2014 में केवल 42 घटनायें हुईं व इस कारण यह राज्य सांप्रदायिक हिंसा से सबसे अधिक प्रभावित पांच राज्यों की सूची से हट गया। सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में कमी का कारण यह था कि सन् 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव थे और इसलिए सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया गया। कई अध्ययनों से यह साफ हो गया है कि अन्य पार्टियों की तुलना मेंए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से सबसे अधिक लाभ भाजपा को मिलता है। यही कारण है कि चुनाव के कुछ महिने पहले से सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि होने लगती है। सन् 2013 में अकेले उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में सांप्रदायिक दंगों में 77 लोग मारे गये थे। भाजपा और उसके सहयोगियों ने 2014 की शुरूआत में हुए लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में 80 में से 74 लोकसभा सीटों पर विजय हासिल की और भाजपा ने मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी अपने नेताओं का सार्वजनिक रूप से सम्मान किया।
यद्यपि सन् 2014 में पिछले वर्ष की तुलना में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं कम हुईं और इनमें मारे जाने और घायल होने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई परंतु समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने और सांप्रदायिक घृणा फैलाने के प्रयास अनवरत जारी रहे। भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने खुलेआम यह कहा कि वे ऐसे अंतर्राधार्मिक विवाह नहीं होने देंगे जिनमें लड़का मुसलमान और लड़की हिंदू हो। उन्होंने बिना किसी आधार के यह आरोप लगाया कि एक षड़यंत्र के तहतए हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा है। इस षडंयत्र को उन्होंने लवजिहाद का नाम दिया। हिंदू राष्ट्रवादियों ने देश के उत्तरी व पश्चिमी इलाकों में इस तरह के विवाहों के खिलाफ कटु अभियान चलाया और घर.घर इसका विरोध करते हुए पर्चे व पुस्तिकाएं बांटी। इसके बाद राजस्थान में चुनाव सभाओं को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार में मंत्री मेनका गांधी ने बिना कोई प्रमाण प्रस्तुत किए यह आरोप लगाया कि गौवध से होने वाले मुनाफे का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करने के लिए किया जा रहा है। अगर मेनका गांधी के पास इस आशय के कोई पुख्ता सुबूत हैं तो उन्हें ये सुबूत पुलिस को सौंपने चाहिये ताकि उनकी जांच की जा सके। परंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। एक अन्य मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने दिल्ली में एक घिनौने भाषण में कहा कि भारतीयों के दो वर्ग हैं.रामजादे और हरामजादे.अर्थात् सभी गैर.हिंदू अवैध संताने हैं।
विहिप ने आगरा में गरीब मुसलमानों,जो कि कचड़ा बीनकर अपना जीवनयापन करते हैं, को हिंदू बनाने का अभियान चलाया। इसके लिए धमकी और लोभ दोनों का इस्तेमाल किया गया। धमकी यह दी गई कि अगर वे हिंदू न बने तो उनकी झुग्गियों को उखाड़ फेंका जायेगा और लालच यह दिया गया कि अगर वे अपना धर्म बदलने को तैयार हो जायेंगे तो उन्हें राशन व बीपीएल कार्ड आदि उपलब्ध करवाये जायेंगे। इसके बाद यह धमकी भी दी गई कि आगरा में क्रिसमस के आसपास बड़ी संख्या में अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू बनाया जायेगा और प्रवीण तोगडि़या ने यह फरमाया कि भारत में हिंदुओं की आबादी का प्रतिशत 82 से बढ़ाकर 100 किया जायेगा। एक अन्य भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने यह आधारहीन और तथ्यों के विपरीत आरोप लगाया कि सभी मदरसे आतंकी प्रशिक्षण के अड्डे हैं। तथ्य यह है कि कई मदरसों में हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं। साक्षी महाराज ने ही गोडसे को देशभक्त बताया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यह कहा कि वे चाहती हैं कि गीता को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाए।
भाजपा नेताओं व हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा घृणा फैलाने के प्रयासों के ये चंद उदाहरण भर हैं। भाजपा नेताओं ने यह बयान भी दिया कि वे हर मस्जिद से लाउडस्पीकर उतार लेंगे। इस तरह के भड़काऊ और आधारहीन वक्तव्यों में से केवल कुछ ही राष्ट्रीय मीडिया में स्थान पाते हैं और उनसे कुछ ज्यादा को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में जगह मिलती है। परंतु ऐसे अनेक वक्तव्य और भाषण न तो राष्ट्रीय और ना ही क्षेत्रीय मीडिया में प्रकाशित होते हैं। आम चुनाव में भाजपा की जीत के बादए अलग.अलग बैनरों के तहत काम कर रहे हिंदू राष्ट्रवादियों की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। वे यह मानने लगे हैं कि उनकी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा, देश के कानून से ऊपर है और वे जो चाहे कर सकते हैं। वे खुलकर विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच घृणा और शत्रुता को बढ़ावा दे रहे हैं और उनके मुख्य निशाने पर हैं अल्पसंख्यक समुदाय।
कई मामलों में इस तरह के अभियानों से धन भी कमाया जा रहा है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब मवेशियों को ले जा रहे ऐसे ट्रकों, जिनका या तो ड्रायवर अथवा मालिक मुसलमान था, को रोक लिया गया और मवेशियों को हिंदुत्व कार्यकर्ता इस बहाने अपने घर ले गए कि इन ट्रकों में गायों को काटने के लिए ले जाया जा रहा था। ऐसे ट्रकों को तभी आगे जाने दिया जाता है जब या तो ड्रायवर अथवा मालिक बड़ी रकम चुकाने को तैयार हो। इसी तरह, बांग्लादेशी मुस्लिम प्रवासियों को घुसपैठिया बताया जा रहा है और ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में क्रिसमस व नये साल पर होने वाले कार्यक्रमों में हुडदंग मचाने की घटनाएं हो रही हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि ईसाई स्कूल, हिंदू विद्यार्थियों का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। इस तरह के आधारहीन आरोपों को क्षेत्रीय भाषाओं के मीडिया में भारी प्रचार मिलता है और इससे हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,अल्पसंख्यकों की छवि ऐसे एकसार समुदायों के रूप में प्रस्तुत करने में सफल होते हैं जो राष्ट्र.विरोधी और हिंदू.विरोधी हैं। वे सोशल मीडिया के जरिए अल्पसंख्यकों के पवित्र और धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर अल्पसंख्यकों को भड़काने की कोशिश भी करते रहते हैं।
सच तो यह है कि देश में धार्मिक ध्रुवीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि अलग.अलग समुदायों के दो व्यक्तियों के बीच कोई छोटा.सा विवाद भी सांप्रदायिक रंग अख्तियार कर लेता है। सोमनाथ में ऑटोरिक्षा चालक को दस रूपए कम देने के विवाद से भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 25 लोग घायल हो गए। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांप्रदायिक हिंसा पर दस साल के लिए रोक लगाने की बात कही है। परंतु या तो उनकी पार्टी के सदस्य अपने नेता की बात नहीं मान रहे हैं और या फिर भाजपा में कार्यों का स्पष्ट विभाजन है.प्रधानमंत्री विकास की बात करते हैं और अन्य नेता अपना काम करते हैं।
लगातार दुष्प्रचार के जरिये समाज का ध्रुवीकरण तो हुआ ही है आम लोगों के दिमागों में जहर भर गया है और अल्पसंख्यक अपने आप को गंभीर खतरे में महसूस करने लगे हैं। यह इससे भी स्पष्ट है कि सभी जातियों के लोगों ने अपने अल्पसंख्यक.विरोधी रूख के चलते,लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,एक रणनीति के तहत बहुत अधिक हिंसा नहीं कर रहे हैं। वे हिंसा की बजाए लोगों के दिमागों का सांप्रदायिकीकरण करने में जुटे हैं ताकि देश में 1992.93 व 2002 से भी बड़े दंगे करवाये जा सकें। परंतु यह तभी करवाया जायेगा जब सरकार अलोकप्रिय हो जायेगी।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 22 जून 2014

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ऋण लैमार 50 कम्पनियों की सूची

प्रधानमंत्री जी, यह कर्जे कारपोरेट सेक्टर को पिछले एनडीए सरकार में दिए गए थे और अब फिर एनडीए सरकार आ गई है इन लोगों ने एक भी रुपया अदा नहीं किया है।
क्र0सं0      ऋण जो अदा नहीं किया गया     (एनपीए. करोड़ रूपये में)
1.     किंगफिशयर एयरलाइन     2673
2.     विनसम डायमंड एंड ज्वैलरी कं.लि.     2660
3.     इलेक्ट्रोथर्म इंडिया लि.     2211
4.     जूम डेवलपर्स प्रा.लि.     1810
5.     स्टेरलिंग बायोटेक लि.     1792
6.     एस कुमार्स नेशनवाइड लि.     1692
7.     सूर्यविनायक इंडस्ट्रीज लि.     1446
8.     कार्पोरेट इस्पात एलोइज लि.     1360
9.     फोरएवर प्रीशियस ज्वैलरी एंड डायमंड     1254
10.     स्टेरलिंग आयल रिसोर्स लि.     1197
11.     वरूण इंडस्ट्रीज लि.     1129
12.     आर्किड केमिकल्स फार्मास्यूटिकल्स लि.     938
13.     केमरोक इन्डस्ट्रीज एंड एक्सपोर्ट्स लि.     929
14.     मुरली इंडस्ट्रीज एंड एक्सपोटर््स लि.     884
15.     नेशनल एग्रीकल्चरल कोआपरेटिव     862
16.     एसटीसीएल लि.     860
17.     सूर्य फार्मा प्रा.लि.     726
18.     जाइलोग सिस्ट्म्स (इंडिया) लि.     715
19.     पिक्सीओन मीडिया प्रा.लि.     712
20.     डेक्कन क्रोमिकल होल्डिंग्स लि.     700
21.     केएस आयल रिसोर्सेज लि.     678
22.     आईसीएसए (इंडिया) लि.     646
23.     इंडियन टेक्नोमेक कं.लि.     629
24.     सेन्चुरी कम्युनिकेशन लि.     624
25.     मोजरबेयर इंडिया लि. एण्ड ग्रुप कम्पनीज     581
26.     पीएसएल लि.     577
27.     आईसीएसए इंडिया लि.    545
28.     लेंको होसकोर्ट हाइवे लि.     533
29.     हाउसिंग डेवलपमेंट एण्ड इन्फ्रा लि.     526
30.     एम.बी.एस. ज्वैलर्स लि.     524
31.     यूरोनियन प्रोजेक्ट्स एण्ड
    एविएशन लि. स्कूल मेन     510
32.    लियो मेरीडियन इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स    483
33.    पर्ल स्टूडियोज प्रा.लि.     483
34.    एडुकोम्प इन्फ्रास्ट्रक्चर एण्ड स्कूल मेन     447
35.     जैन इन्फ्राप्रोजेक्ट्स लि.     472
36.     के.एम.पी. एक्सप्रेस वे लि.     461
37.     प्रदीप ओवरसीज लि.     437
38.     रजत फार्मा/रजत ग्रुप     434
39.     बंगाल इंडिया ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर लि.     428
40.     स्टेरलिंग एसईजेड एण्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा.लि.     408
41.     शाह एलोइज लि.     408
42.     शिववाणी आॅयल एण्ड गैस एक्सप्लोरेशन लि.     406
43.     आंध्र प्रदेश राजीव स्वगृह कार्यों लि.     385
44.     प्रोग्रेसिव कन्स्ट्रक्शन लि.     351
45.     दिल्ली एयरपोर्ट मेट एक्स लि.     346
46.     ग्वालियर झांसी एक्सप्रेसवे लि.     346
47.     एल्पस इन्डस्ट्रीज लि.     338
48.     स्टेरलिंग पोर्ट लि.     334
49.     अभिजीत फेर्रोटेक लि.     333
50.     सुजाना यूनिवर्सल इन्डस्ट्रीज     330
    कुल     40,528 करोड़ रूपये
आपसे अनुरोध है कि सार्वजनिक बैंक के 40,528 करोड़ रूपये वसूलने के लिए कोई व्यवस्था बनाए।
-उप सम्पादक

लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

फिल्मों में गब्बर, चुनाव में मोदी

 फिल्म शोले में गब्बर सिंह की चर्चा गाँव-गाँव थी.  उसी तरह आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की चर्चा गाँव-गाँव है। गब्बर सिंह को  छोटे-बड़े की ज़बान पर ले जाने का काम फिल्म ने  किया था उसी तरह नरेंद्र मोदी की चर्चा को  इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने करवा  रखी है।  फिल्म शोले ने अकूत मुनाफा कमाया था उसी तरह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस चुनाव में अकूत मुनाफा कमा रहा है।  फिल्म शोले के गब्बर सिंह का अंत अच्छा  नहीं रहा उसी तरह 16 मई को मीडिया के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हश्र होने की सम्भावना है।
          धरातल पर जो चुनाव हो रहा है उसमें  सत्तारूढ़ दल कांग्रेस व सांप्रदायिक संगठनो के विरोधी दल की स्तिथि ख़राब नजर नहीं आ रही है।  जनता में मुद्दों की चर्चा बंद हो गयी है दो दल बन गए हैं।  एक मोदी हराओ और दूसरा मोदी जिताओ।  मोदी जिताओ दल में मीडिया के पत्रकार  ज्यादातर शामिल हैं. जनता की ओर से उनको समर्थन नही मिल पा रहा है। मीडिया द्वारा तरह-तरह की अफवाहें उनके प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन में हो रही है।  कभी समाचार यह आता है कि अमेरिका मोदी के आने से घबरा रहा है तो कभी पाकिस्तान ,  चीन भी भयाकुल है।  वस्तुस्तिथि यह है कि भाजपा के अधिकांश दिग्गज नेता अघोषित तरीके से मीडिया के
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हैं।  जिलों-जिलों से जो खबरें आ रही हैं वह भी मीडिया की बातों को असत्य ही साबित कर रही हैं।  भाजपा के नेतागण उम्मीदवार  हराओ , उम्मीदवार जिताओ के खेमे में बँट गए है। जिससे बहुत सारे प्रत्याशी चुनाव प्रबंधन में कमजोर हो रहे हैं। आज नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से अपना नामांकन पत्र दाखिल किया जिसमें पार्टी के बड़े नेता शामिल नही हुए और वाराणसी के अगल-बगल के जिलों के कार्यकर्ताओं को जुटाकर भीड़ प्रदर्शित की गयी थी। कुल मिलाकर स्तिथि यह होनी है कि माया मिली न राम।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 3 मार्च 2014

मोदी साहब आप किस स्कूल से पढ़े हैं और कितना पढ़े हैं ?

आज बाराबंकी कचेहरी में एक साहब आये और उन्होंने कहा कि मोदी जब सामान्य ज्ञान या इतिहास के ऊपर बोलते हैं तो वह गलत हो जाता है तो आप बताओ कि नरेंद्र मोदी कितना पढ़ा लिखा है ?  मुझे कोई उत्तर नही सूझा साथ में दो पत्रकार भी बैठे हुए थे उनको भी यह जानकारी नहीं थी कि नरेंद्र मोदी ने स्कूल का मुंह देखा है या नही।  फिर क्या था वह साहब कहने लगे कि भाई कुछ लोग देश का प्रधानमंत्री बनाने जा रहे हैं और आप लोगों को यह भी जानकारी नही हो पायी हैं कि मोदी पढ़ा लिखा है या साक्षर है।  फिर उन्होंने हम लोगों के ऊपर धौंस ज़माने के लिए कहा कि मोदी जब कभी-कभी इंग्लिश के वाक्यांश का
प्रयोग करता है तो वह भी गलत-शलत होते हैं। उससे बढ़िया अंग्रेजी तो मैं बोल लेता हूँ।
                               उस शख्स के जाने के बाद मैं सोचने लगा।  अगर  भगत सिंह के अंडमान जेल में बंद होने की बात हमारे प्राइमरी स्कूल के उस समय के हेड मास्टर पंडित श्याम लाल के सामने कही गयी होती तो बेहया का डंडा पूरे शरीर के ऊपर कितने टूट जाते यह उस छात्र को भी नही मालूम होता। जूनियर हाई स्कूल के अध्यापक राजा राम यादव के सामने पटना में सिकंदर की बात किसी छात्र ने कही होती तो मास्टर साहब चटकना से लेकर उस छात्र के ऊपर पूरी तरह से घूसेबाजी कर दिए होते।  यह सब साड़ी ग़लतफहमी मंचासीन कुछ पढ़े लिखे नेताओं और हजारो लोगों कि भीड़ के समक्ष होती रही और किसी भी नेता के मुंह से आह भी नही निकली जैसे कि वह लोग मोदी के व्यक्तिगत नौकर कि भूमिका में हो और बोलने पर नौकरी चले जाने का डर हो। स्मृतियों में खोकर बहुत सारी चीजें याद आने लगी और फिर हंसी। 
वास्तव में कुर्सी का प्रेम सब कुछ छीन लेता है। बुद्धि और विवेक भी, मोदी तिरंगा-तिरंगा चिल्लाते हैं , राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात करते हैं। उनके साथ बैठे हुए लोगों ने मंच पर जब मोदी गलत उवाच कर रहे  होते हैं, तो पढ़े लिखे और संघ के सिद्धांतकार गुरु गोलवलकर , हेड़गवारकर की लिखी हुई किताबों और बातों को भूल जाते हैं।  जिस संगठन का इस देश कि जंगे आजादी की लड़ाई से, संविधान से कोई वास्ता नहीं रहा है वह राष्ट्र और तिरंगे की बात प्रधानमंत्री पद का स्वघोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी करता है तो उनको कैसा लगता है।
             आज सबसे पहले मोदी को अपनी पढाई लिखाई की जानकारी संपूर्ण राष्ट्र को देनी चाहिए साथ में यह भी बताना चाहिए कि उनकी रैलियों का खर्च कौन उठा रहा है अन्यथा यह समझा जायेगा कि कोई कार्पोरेट सेक्टर या विदेशी शक्ति लाखों करोडो रुपये खर्च कर मोदी को मुखौटा बना कर इस देश को कब्ज़ा करना चाहता है।  

सुमन 

शनिवार, 2 नवंबर 2013

पटेल ने भारत को मजबूत बनाया, नेहरू ने आधुनिक

यह अत्यधिक दुःखद है कि नरेन्द्र मोदी यह दावा कर रहे हैं कि जवाहरलाल नेहरू के स्थान पर यदि सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की तस्वीर अलग ही होती। वैसे तो मोदी अपने तर्कों के समर्थन में प्रायः झूठ का सहारा लेते हैं। झूठ बोलने की श्रृंखला में उन्होंने अभी हाल में यह तक कह डाला था कि नेहरू, पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुए थे। पलक झपकते ही मोदी के इस झूठ की पोल खुल गई।
दिनांक 29 अक्टूबर को अहमदाबाद में आयोजित एक समारोह में मोदी ने दावा किया कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की तस्वीर और होती। वैसे तो इतिहास की किसी भी घटना के बारे में किसी भी प्रकार का तर्क दिया जा सकता है। इतिहास में घटित घटनाओं की मीमांसा अनेक प्रकार से हो सकती है। यदि ऐसा होता तो क्या होता, यदि वैसा होता तो क्या होता यह मूलतः व्यर्थ की वैचारिक जुगाली के अतिरिक्त कुछ नहीं है। परन्तु जहां तक नेहरू-पटेल की तुलना का सवाल है, कुछ बुनियादी तथ्यों को याद रखा जाना आवश्यक है।
एक बार महात्मा गांधी से पूछा गया था कि वे किसे आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। इस पर उनका उत्तर था कि मेरे साथियों में दर्जनों ऐसे लोग हैं जिनमें प्रधानमंत्री बनने की काबलियत है परन्तु प्रधानमंत्री पद के लिए मेरी पहली पसंद नेहरू हैं। महात्मा गांधी के अतिरिक्त, देश के करोड़ों नागरिक भी नेहरू को ही प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। कांग्रेस पार्टी के बहुत बड़े हिस्से की पसंद भी नेहरू थे। इसके साथ ही, नेहरू, आजाद भारत के उन नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान ही भविष्य का भारत कैसा होगा, इसकी परिकल्पना की थी। आजादी के आंदोलन के दौरान, कांग्रेस ने एक योजना समिति की स्थापना की थी जिसके अध्यक्ष नेहरू थे। इस समिति ने भविष्य के भारत का एक विस्तृत खाका तैयार किया था। इस योजना के अन्र्तगत यह तय किया गया था कि आजाद भारत का स्वरूप समाजवादी होगा। आजाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को विकसित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत बुनियादीश्उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त, निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों की देश के विकास में निर्णायक भूमिका रहेगी। आजाद भारत में नेहरू के प्रयासो के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रथम स्टील प्लांट की स्थापना भिलाई में हुई। इसी तरह, हैवी इलेक्ट्रिकल कारखाना  भोपाल में स्थापित हुआ। यह फैसला किया गया कि बिजली उत्पादन के कारखाने, सार्वजनिक क्षेत्र में होंगे। इसके साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र में अनेक बुनियादी उद्योग खोले गए। इससे एक औद्योगिक भारत के विकास के दरवाजे खुल गए।
औद्योगिक क्षेत्र के अलावा, कृषि के विकास के प्रति भी ध्यान दिया गया। बिना सिंचाई साधनों के, कृषि उत्पादन नहीं बढ़ सकता। इस उद्देश्य से बड़े-बड़े बांधों की नींव डाली गई। आजाद देश का प्रथम बड़ा भाखड़ा नंगल बांध पंजाब में सतलुज नदी पर बना। नेहरू जी ने स्वयं उसका उद्घाटन किया। आधुनिक भारत के बड़े कारखानों और बांधों को नेहरू ने आधुनिक मंदिर बताया। देश के औद्योगिकरण के लिये प्रतिभावान वैज्ञानिकों की जरूरत पड़ना स्वाभाविक है। वैज्ञानिक तैयार हो सकें, इस उद्देश्य से आई. आई. टी. की स्थापना की गई।
राजनीतिक दृष्टि से भी भारत एक आधुनिक देश बने इसलिए देश के सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार दिया गया। उस समय देश में साक्षरता का प्रतिशत शायद दस ही था। परन्तु अशिक्षितों को भी सरकार चुनने का अधिकार मिला। नेहरू जी के प्रयासों से ही ऐसा संविधान बना जिसके अंतर्गत सभी नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले। मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की नींव डाली गई। सर्वशक्तिमान संसद की स्थापना की गई। पांच वर्ष में आवश्यक रूप से चुनाव होंगे, इसकी संवैधानिक व्यवस्था की गई।
नेहरू जी को इतिहास का गहरा ज्ञान था। उनकी किताबें ‘विश्व इतिहास की झलक’, ‘भारत एक खोज’ आदि इसका प्रतीक हैं। उन्होंने भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन किया था। राजनीति में प्रवेश के पहले, लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा की और देश की जनता की समस्याओं से रूबरू हुए। देश के अतिरिक्त, उन्होंने अनेक बार विदेशों की यात्राएं भी कीं थीं। विश्व के अन्य देशों के आजादी के आंदोलनों का समर्थन, उन देशों में जाकर किया। उन्होंने अनेक बार दुनिया के प्रथम समाजवादी देश सोवियत रूस की यात्रा की। वे सोवियत संघ के प्रशंसकों में से थे। सोवियत क्रांति ने उनके चिंतन को काफी प्रभावित किया। उन्होंने यूरोप में फासीवाद और नाजीवाद के बढ़ते खतरे से भारत के अलावा पूरे विश्व को आगाह किया था। एक बार रोम से गुजरते हुए उन्होंने मुसोलनी से मिलने से इंकार कर दिया था।
आजाद भारत के अलावा, उन्होंने एशियाई देशों की एकता की आवश्यकता प्रतिपादित की थी। इस उद्देश्य से 1946 में उन्होंने दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आयोजित किया था। इस सम्मेलन में शामिल राष्ट्रों में से बहुसंख्यक ऐसे थे जो उस समय आजादी के लिये संघर्षरत थे। इस सम्मेलन का उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। भारत के आजाद होने के बाद, एशियाई देशों का एक विशाल सम्मेलन इंडोनेशिया के शहर बांडुंग मंे आयोजित हुआ। इस सम्मेलन के आयोजन में नेहरू जी की प्रमुख भूमिका थी। इस सम्मेलन में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भी शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में एशियाई देशों के आपसी संबंधों के लिए जो सिद्धांत तय किए गए थे उन्हें पंचशील का नाम दिया गया था।
कुछ समय बाद, इन देशों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास नेहरू जी ने किया। इस प्रयास को गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य भारत को पूंजीवादी और समाजवादी गुटों से दूर रखना था।
इसके अतिरिक्त, नेहरू जी के कारण ही भारत एक सेक्यूलर देश बन सका। अनेक लोगों का प्रयास था कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने। मोदी शायद सोचते हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाता। मेरी राय में मोदी की यह सोच गलत है। नेहरू जी की तरह, पटेल की भी सेक्यूलर आदर्शों में अगाध आस्था थी।
अंत मंे यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पटेल के समर्थन से ही नेहरू प्रधानमंत्री बने थे। पटेल इतने बड़े संगठनकर्ता थे और कांग्रेस पर उनकी इतनी पकड़ थी कि वे कभी भी नेहरू का तख्ता पलट सकते थे। सच पूछा जाए तो पटेल ने नेहरू जी को हमेशा अपना छोटा भाई माना और उन्होंने जीवनभर उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया। मोदी के अलावा, संघ परिवार की ओर से पहले भी ऐसी बातंे की गई हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की शक्ल और होती। पटेल ने देश की सीमाओं को बढ़ाया। भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाया। नेहरू-पटेल दोनों ही आज के भारत के महान नेता थे। सबसे बड़ी बात है कि दोनों महात्मा गांधी के चेले थे। मोदी को दोनों की तुलना करने से बाज आना चाहिए। मोदी में बांटने की बड़ी ताकत है। वे देश को बांट रहे हैं, उसके साथ ही वे नेहरू-पटेल के बीच भी विभाजन की रेखा खींच रहे हैं।
एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि तथाकथित लौहपुरूष आडवाणी ने 2002 के दंगों के बाद मोदी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया। परन्तु यदि उस समय पटेल देश के गृहमंत्री होते तो वे मोदी की सरकार को तुरंत बर्खास्त कर देते। 
-एल.एस. हरदेनिया

शनिवार, 6 जुलाई 2013

दुश्मन से यारी



क्या अल्पसंख्यकों को मोदी एण्ड कंपनी के जाल में फंसना चाहिए?
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सन् 2002 के कत्लेआम के बादए भारत, और विशेषकर गुजरात की राजनीति में एक नए सितारे का उदय हुआ.नरेन्द्र मोदी का। उनके प्रचारतंत्र के अथक प्रयासों से उनकी छवि एक ऐसे नेता की बना दी गई जो आर्थिक विकास का पुरोधा है, जिसे भ्रष्टाचार छू तक नहीं गया है और जो ,कड़े कदम उठाने से डरता नहीं है।
समाज के एक बड़े हिस्से ने इस प्रचार को आंख मूदकर निगल लिया है। मोदी ने भाजपा के अंदर भी दादागिरी करए स्वयं को सन् 2014 के चुनाव के लिए गठित चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित करवा लिया और अब वे इशारों ही इशारों में यह कह रहे हैं कि वे भाजपा.एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। इसी सिलसिले में वे मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सम्मेलनों का आयोजन कर रहे हैं। वे भाजपा के नेताओं को भी यह सलाह दे रहे हैं कि वे अल्पसंख्यकों को स्वयं को जोड़ें।

इसी सिलसिले में, अहमदाबाद में विभिन्न समुदायों के लगभग 200 सामाजिक कार्यकर्ताओं और विद्वानों का सम्मेलन, हाल ;जून 2013द्ध में आयोजित किया गया। प्रतिभागियों में से 30 मुसलमान थे। कई मुस्लिम नेताओंए कार्यकर्ताओं और विद्वानों ने आयोजकों द्वारा बहुत जोर दिए जाने पर भीए सम्मेलन में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। उनका तर्क था कि मुसलमान नेताओं को अपने सम्मेलन में बुलाकर, मोदी अपनी साख बढ़ाना चाहते हैं। परन्तु किसी भी समुदाय या समूह के सभी लोगों के विचार एक से नहीं होते। कुछ मुस्लिम नेताओं ने सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया। उनमें से एक, सैयद जफर महमूद ने सम्मेलन में एक विस्तृत प्रस्तुतिकरण दिया। सम्मेलन से पहले महमूद से पूछा गया कि मोदी की नीतियों के कटु आलोचक होने के बावजूदए वे बैठक में हिस्सा क्योंकि ले रहे हैं। इस पर उनका उत्तर था कि उनसे यह प्रश्न तब पूछा जाए जब वे बैठक में अपनी बात रख चुकें। महमूद, सच्चर समिति में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी थे और वर्तमान में "ज़कात फाउण्डेशन ऑफ इंडिया" के अध्यक्ष हैं।
शायद उन्होंने सम्मेलन में भागीदारी करना इसलिए उचित समझा  होगा क्योंकि इससे उन्हें अपने समुदाय की बदहाली से मोदी को परिचित करवाने का मौका मिलता और वे मुसलमानों की समस्याओं को सामने ला पाते। महमूद ने अपने प्रस्तुतीकरण में मुस्लिम समुदाय की वर्तमान हालत पर विस्तार से प्रकाश डाला और भाजपा की उसकी नीतियों के आधार पर कड़ी आलोचना की। उनका प्रस्तुतीकरण शोधपूर्ण था। उन्होंने भाजपा को यह सलाह भी दी कि आने वाले समय में उसे क्या करना चाहिए। उनके प्रस्तुतीकरण का सार.संक्षेप  यह था कि भाजपा, विचारधारात्मक स्तर पर ही मुस्लिम.विरोधी है। महमूद ने केवल देश के वंचित मुसलमानों के लिए न्याय और संवैधानिक अधिकारों की मांग ही नहीं की. उन्होंने भाजपा की अधिकृत वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह दर्शाया कि भाजपा, मुसलमानों से किस हद तक नफरत करती है। जैसे, उन्होंने कहा कि भाजपा की वेबसाइट पर उपलब्ध एक लेख, जिसका शीर्षक है, हिन्दुत्व,महान राष्ट्रीयतावादी विचारधारा, मुसलमानों के प्रति नफरत और उनके बारे में भड़काऊ बातों से भरपूर हैं। एक अन्य लेख, जिसका शीर्षक है गिव अज़ दिस डे अवर सेंस ऑफ मिशन व जिसे एमव्ही कामथ ने लिखा है, में मुसलमानों से आह्वान किया गया है कि वे हिन्दू नाम रखें और मुस्लिम महिलाओं को कहा गया है कि वे मंगलसूत्र पहनें। जिस तीसरे लेख से उन्होंने उद्धृण प्रस्तुत किए उसका शीर्षक है सेमिटिक मोनो थिएजम;यहूदी एकेश्वरवादद्। इस लेख में मुसलमानों और इस्लाम को पूरी दुनिया के लिए समस्या बताया गया है। लेख कहता हैए हम सबको यह समझना होगा कि परंपरावादी और परिवर्तन.विरोधी इस्लामिक समाज, भारत के लिए एक बड़ी समस्या है। इस्लाम के इस चरित्र को समाप्त कर समावेशी हिन्दुत्व की स्थापना की जानी आवश्यक है।
यहां तक तो सब ठीक है। ये सारी बातें सही हैं और बिना किसी शक.शुब्हे के मुस्लिम.विरोधी हैं। मुस्लिम समुदाय की हालत का बयान करते हुए महमूद ने यह मांग की कि उनकी बेहतरी के लिए नई योजनाएं लागू की जाएं और प्रभावी कदम उठाए जायें। उन्होंने मोदी से मांग की कि सच्चर समिति की रपट को लागू किया जाए। गुजरात उन चंद राज्यों में से एक है जो मुस्लिम विद्यार्थियों को वजीफा देने के लिए केन्द्र द्वारा उपलबध करवाई गई धनराशि को  उपयोग किए बिना वापस लौटाता आ रहा है। यहां यह भी बताते चलें कि एक अन्य भाजपा मुख्यमंत्री ने भी यह घोषणा की है कि वे सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू नहीं करेंगे। महमूद ने अहमदाबाद में मुस्लिम समुदाय के बुरे हाल का भी वर्णन किया।
हम सबको यह सहर्ष स्वीकार है कि महमूद ने जो.जो बातें कहीं, वे अक्षरशः सही हैं। परन्तु असली मुद्दा कुछ ओर है। जो कुछ उन्होंने कहा, वह कोई नई जानकारी नहीं है। कई सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक गला फाड़.फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि गुजरात में मुसलमानों की हालत दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। मुस्लिम अपने मोहल्लों में सिमट गये हैं, उन्हें बैंकिंग व शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं और वे समाज की मुख्यधारा से कट गए हैं.ये सभी बातें कई बारए अलग.अलग मंचों से कही जा चुकी हैं। इस विषय पर कई रपटें, लेख और किताबें उपलब्ध हैं। समाज और राजनीतिक नेता उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, यह एक अलग मुद्दा है। मोदी इन सब तथ्यों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। उनके सद्भावना उपवास से यह स्पष्ट हो गया है कि उन्हें भारत की विविधता स्वीकार्य नहीं है। जहां उन्होंने अन्य लोगों द्वारा भेंट की गई रंग बिरंगी टोपियों को पहन लिया वहीं एक मुस्लिम मौलवी द्वारा दी गई टोपी को पहनने से इंकार कर दिया। वे मुसलमानों के साथ भेदभाव करते हैं, यह सारा देश जानता है।
यह दावा किया जाता है कि गुजरात के मुसलमान, देश के अन्य राज्यों के मुसलमानों से बेहतर स्थिति में हैं। तथ्य यह है कि गुजरात के मुसलमानों का जीवन स्तर हमेशा से भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले मुसलमानों से अच्छा रहा है, परन्तु यहां मुद्दा यह है कि मोदी की ताकत बढ़ने के , मुसलमानों, और कुछ हद तक ईसाईयों, की हालत में गिरावट आई है।
गुजरात के मुसलमान पिछले बारह सालों में मोदी को अच्छी तरह से पहचान गए हैं। वे मोदी की फासीवादी और साम्प्रदायिक नीतियों से परिचित हैं। मोदी ने मुसलमानों के खिलाफ सन् 2002 के कत्लेआम का नेतृत्व किया था। तब फिर, मोदी को वे बातें बताकर, जो वे पहले से जानते हैं, और मुसलमानों को वह बताकर, जो वे भोग रहे हैं, महमूद आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि मोदी ने महमूद को आश्वासन दिया कि वे उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार करेंगे। परन्तु साथ ही, महमूद के भाषण को ब्लेक आउट कर दिया गया। इसके विपरीत, मुस्लिम नेतृत्व के एक तबके की स्वीकार्यता हासिल करने के अपने प्रयास में मोदी सफल रहे। गुजरात के जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. बंदूकवाला, जो कि गुजरात के कत्लेआम के स्वयं भी शिकार रहे हैंए कहते हैंए इस समय मोदी को केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही है और मुसलमानों के कड़े विरोध के चलतेए उनके लिए इस कुर्सी को हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए वे मजबूरी में कुछ प्रमुख मुस्लिम नेताओं के साथ सार्वजनिक मंचों पर आकर यह दिखाना चाहते हैं कि वे सभी मुसलमानों को स्वीकार्य हैं। दुख की बात यह है कि हमारे नेताओं ने मोदी को ऐसा करने का सुनहरा मौका दे दियाए वह भी इस बचकानी मान्यता के कारण कि वे मोदी को मुस्लिम समुदाय की भावनाओं से अवगत करना चाहते हैं! क्या जफर महमूद को यह नहीं पता कि इन मुद्दों पर पिछले ग्यारह सालों में गुजरात के मुसलमानों ने असंख्य मौकों पर प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया से बात की है?
मोदी ने सम्मेलनों के आयोजन के लिए जो समय चुना, उससे भी महमूद और उनके जैसे अन्य नेताओं को सावधान हो जाना चाहिए था। वे भले ही ऐसा मानते रहें कि सम्मेलनों में भाग लेने से उन्हें समुदाय की मांगों को प्रस्तुत करने का मौका मिलेगा परन्तु तथ्य यह है कि वे मोदी की एक सोची.समझी चाल में फंस रहे हैं, जिसका उद्देश्य है अपनी साख बढ़ाना और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को अपना अनुयायी बनाना। ठीक उसी तरहए जैसे उन्होंने एक बड़े व्यावसायी ज़फर सरेसवाला को अपने जाल में फंसा लिया है और अब जफर पूरी वफादारी से मोदी की सेवा में जुटें हुए हैं। यह सही है कि महमूद ने भाजपा की वेबसाइट को खंगालकर उसमें से मुस्लिम विरोधी साम्रगी को काफी मेहनत से छांटकर निकाला। परन्तु वे और उम्मीद भी क्या कर सकते थे?भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है और अपने पूरे जीवनकाल में इस पार्टी ने जो भी मुद्दे उठाएं हैं, उनसे इसका मुस्लिम.विरोध झलकता रहा है.फिर चाहे वह राममंदिर आंदोलन हो, जिसका अंत बाबरी मस्जिद के ध्वंस से हुआ या गौहत्या का मुद्दा हो या धारा 370 का। हमें यह समझना होगा कि भाजपा स्वतंत्र नहीं है। वह आरएसएस के अधीन काम करती है और संघ के स्वयंसेवक, भाजपा का संचालन करते हैं। ऐसे ही स्वयंसेवकों में से एक मोदी हैं। आरएसएस का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण। स्वाधीनता आंदोलन में आरएसएस का क्या योगदान था? उसने स्वाधीनता आंदोलन का विरोध किया और कहा कि वह आन्दोलन केवल ब्रिटिश विरोधी क्यों है! आरएसएस किस तरह का संविधान चाहता है? भाजपा और एनडीए ने केन्द्र में अपने शासन के दौरान, संविधान का पुनर्वलोकन करने का प्रयास क्यों किया था।
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आरएसएस और उसके बाल.बच्चों के एजेण्डे पर केन्द्रित पुस्तकों और लेखों में सहर्ष उपलब्ध हैं। मोदी ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने के लिए अस्थाई रूप से एक मुखौटा लगा लिया है। उन्होंने गिरगिट की तरह, केवल अपनी त्वचा का रंग बदला है। उनका दिलोदिमाग वही है। सन् 2014 के चुनाव के मद्देनजर मोदी अपने मुखौटे के बल पर वोट हासिल करना चाहते हैं। इन प्रयासों को महत्व देने और मोदी द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भाग लेने से मुस्लिम नेताओं को कुछ क्षणों की प्रसिद्धि मिल सकती है.शायद कुछ टी.वी. इन्टरव्यू भी। उन्हें यह संतोष भी हो सकता है कि उन्होंने अपनी बात रख दी। परन्तु सच यह है कि मुस्लिम समुदाय के लिए यह एक घोर प्रतिगामी कदम है। यह ऐसा ही है मानो यहूदियों के नेता हिटलर से मिलते और उन्हें बताते कि किस तरह यहूदियों को गैस चेम्बरों में मारा जा रहा है। और यह सोचकर खुश होते की उन्होंने अपनी बात रख दी है।
अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य और उनके नेता, जो सामने दिख रहा है उसके पीछे झांककर देखें। वे इस प्रश्न पर विचार करें कि आरएसएस का एजेण्डा क्या है और आरएसएस क्यों अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना चाहता है। कुछ पुस्तकों का अध्ययन भी उन लोगों की आंखे खोल सकता हैए जो यह मानते हैं कि भाजपा अपना दूरगामी एजेण्डा बदल सकती है या यह कि मोदी के सम्मेलन में जाकर भाषण देने से भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियां बदल जाएंगी। इनमें से कुछ पुस्तकें हैं व्ही. ऑर नेशनहुड डिफाइण्ड जो अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिटलर द्वारा की गई कार्यवाहियों की प्रशंसा करती है और ए बंच ऑफ थौट्सजो मुसलमानों, ईसाईयों और कम्युनिस्टों को हिन्दू राष्ट्र के लिए आंतरिक खतरा बताती है। इन दोनों पुस्तकों के लेखक आरएसएस के पूर्व प्रमुख एमएस गोलवलकर हैं।

-राम पुनियानी

शुक्रवार, 17 मई 2013

आखिर भारत सरकार किसके प्रति जवाबदेह है?

 भारतीय संविधान को मानने वाले लोग बेहिचक कहेंगे कि निश्चय ही संसद के प्रति।एकदम सही जवाब है। अमिताभ बच्चन सीटपर होते और आप उनके मुखातिब रहे होते तो इस सवाल के जवाब में दस लाखपति भी बन सकते थे। हमें संसदीय गणतंत्र के बारे में पढ़ाते हुए तोतारटंत कराया जाता है कि भारत की सरकार संसद के प्रति जिम्मेदार होती है क्योंकि भारतीय संसद भारत की जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च​​ संस्था है। हम जानते हैं कि भारतीय संसद की सहमति से ही इस देश का राजकाज चलाया जाना है। नीति निर्धारण की कोई कार्यवाही संसद की अवहेलना नहीं कर सकती। भारत सरकार के निर्णयों की वैधता , उस जनादेश में निहित है, जो उसे बहुमत के कारण मिलता है।देश के लिए कानून भी संसद ही बनाती है। क्या भारत में अब ऐसी किसी संसद का अस्तित्व है, जिसका किसीतरह का अंकुश कारपोरेट हितों के लिए कारपोरेट ​​द्वारा संचालित इस निरंकुश सरकार पर है?
संसद ;पार्लियामेंट, भारत का सर्वोच्‍च विधायी निकाय है। भारतीय संसद में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन . लोकसभा ;लोगों का सदन, एवं राज्यसभा ;राज्‍यों की परिषद, होते हैं। राष्‍ट्रपति के पास संसद के दोनों में से किसी भी सदन को बुलाने या स्‍थगित करने अथवा लोकसभा को भंग करने की शक्ति है। भारतीय संसद का संचालन "संसद भवन" में होता है। जो कि नई दिल्ली में स्थित है।लोक सभा में राष्ट्र की जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं जिनकी अधिकतम संख्या ५५२ है। राज्य सभा एक स्थायी सदन है जिसमें सदस्य संख्या २५० है,राज्या सभा के सदस्यों का निर्वाचन, मनोनयन ६ वर्ष के लिए होता है। जिसके १.३ सदस्य प्रत्येक २ वर्ष में सेवानिवृत्त होते है।
यह पुस्तकीय तथ्य है और स्थितियां इसके विपरीत है। जो सरकार राजकाज चलाती है,वह नवउदारवादी बाजार नियंत्रित संसद में अल्पमत होकर भी अवैध जनादेश के तहत संसद की अवहेलना करके राजकाज चला रही है। आंखों में उंगली डालकर यह बताने की जरुरत नहीं है।
भारत सरकार अगर संसद के प्रति जिम्मेदार होती तो अचानक संसद कासत्रावसान समयपूर्व सिर्फ इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि सरकार संसद चलाने की हालत में नहीं है और संसद के सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं है।
सीबीआई पर सुप्रीम कोर्ट में जो खुलासा हुआए उसके बाद कटघरे में खड़े प्रधानमंत्री को भारतीय संसद में खड़े होकर देशवासियों की आस्था हासिल करके ही अपने पद पर रहना था। आज रेल गेट के कारण रेलमंत्री पवन बंसल और कोलगेट के लिए सीबीआई के दुरुपयोग के लिए कानून मंत्री की बलि चढ़ाने की ज कारवाई चालू है वह की गरदन बचाने की बेशर्म कवायद है। क्योंकि कोलगेट में तो मुख्य अभियुक्त भारत के ​​प्रधानमंत्री स्वयं है।
संसद अगर भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व कर रही​​ होती तो जनहित के प्रयोजन से उसकी कार्यवाही नियंत्रित होती न कि राजनीतिक हितों की आड़ में कारपरेट हितों दवारा। बेशर्म तरीके से ​​भारतीय संसद को सर्वदलीय सहमति और मिलीभगत से अप्रासंगिक बना दिया गया है और यह सरकार जनविरोधी नीतियों पर चलते हुए सार्वभौम गणराज्य और इसके संविधान की दिन प्रतिदिन हत्या कर रही है।​
सीबीआई का मामला तो प्रक्षेपित है और कोई अचरज नहीं कि इस मामले को प्रधानमंत्री को बचाने के लिए इतना तुल दिया जा रहा है। क्योंकि ऐसा पहलीबार नहीं हो रहा है कि सीबीआई केंद्र सरकार के कहे मुताबिक काम कर रही है।कोई भी केंद्रीय एजंसी स्वायत्त नहीं है।
यह तो सेकेंडरी मामला है। असली मामला तो कोलगेट घोटाला का है।पर प्रधानमंत्री संसद का सामना करने को तैयार नहीं है और न ही भारत के तमाम राजनीतिक दलों के निर्वाचित जनप्रतिनिधि संसदीय कार्यवाही जारी रखकर प्रधानमंत्री से जवाबतलब करने के लिए तैयार थे।
दरअसल संसद में हंगामा और वाकआउट के जरिये राजनीति जनप्रतिबद्धता का प्रदर्शन तो करता है, लेकिन संसदीय कार्यवाही ठप करके ​​कारपोरेट नीति निर्धारण और बिना बहस के विधेयक पारित कराने के अलोकतांत्रिक राष्ट्रविरोधी कार्य संपादन में उनकी अप्रतिम दक्षता ​​प्रश्नातीत है।

संसद में विधेयकों को पारित कराने का खेल किसी आईपीएल से कम नहीं है।गुपचुप  कानून बनकर लागूहो जाता है। कानोंकान खबर नहीं होती। या फिर खूब हंगामा और वाकआउट के बीच सत्तापक्ष एतरफा तौर पर कानून पास कर देता है विपक्ष की अनुपस्थिति में। विपक्ष का​​ यह खेल सिर अपनी जिम्मेवारी टालने का है।इसमें कोई जनसरोकार है ही नहीं।
इसीतरह अल्पमत सरकार से सहयोग के बहाने जो असंसदीय सौदेबाजी होती है, उसीके गर्भ में तमाम घोटाले होते हैं। जनादेश में मिलावट की कीमत वसूलते हुए पूरी राजनीतिक जमात भ्रष्ट हो गयी है।मसलन, अभी बंगाल में शारदा कांड के खुलासे से पक्ष विपक्ष के तमाम पवित्र चेहरों की गंदगी सड़कों पर उछलने लगी है।
यह विडंबना ही है कि संसदीय ​​व्यवस्था का नियंत्रक जो राष्ट्रपतिपद है, उसकी गरिमा भी भूलुंठित है। तमाम घोटालों के तार सर्वोच्च पदों तक पहुंचते है। यही अनंत प्रक्रिया ही हमारी संसदीय प्रणाली बन गयी है। जिसमें सबका अपना अपना रक्षा कवच है, सबके अपने अपने कवच कुंडल है और वे सारे देवता और देवियां अपराजेय हैं, उनका पाप उन्हें स्पर्श ही नहीं करता।
निहत्था तो आम जनगण हैं, जो मर मर कर जीने को अभिशप्त है। आज सार्वभौम गणतंत्र से ​​इसके सिवाय कोई दूसरा तात्पर्य हो तो बतायें।​
उनके पापों से सर्वानाश हो जाता राष्ट्र का, जनगण का। संविधान की बारंबार हत्या हो जाती । पर कातिलों का कहीं कोई सूराग नहीं होता। राजपथ पर खून की नदियां बहतीं। ग्लेशियर से लेकर समुंदर तक लहूलुहान, पर इस खून का कोई नामोनिशान नहीं है।
तमाम गैर जरुरी मुद्दों पर वक्त बमतलब जाया हो जाता है, बेहद जरुरी मुद्दों पर चर्चा ही नहीं होती। सूचना का अधिकार है, पर जनता को सूचनाएं होती ही नहीं।पारदर्शिता अपारदर्शी है। जनसमस्याएं फिर फिर इन सूर्यकिरणों से प्रत्यावर्तित होकर जनता के बीच ही सीमाबद्ध रहती है, जिनका कभी समाधान ही नहीं होता।फिर जनता जब विरोध  प्रतिरोध पर उतर आती है,इसी संसदीय प्रमाली से निर्मित सैन्य राष्ट्रशक्ति जनता का निर्मम दमन करती है। ​
राजकाजका मतलब है जल जंगल जमीन नागरिकता आजीविका मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों से निलंबन। जनता के विरुद्द इस अविराम युद्ध​​ के विरुद्ध हमारी संसद में एक आवाज बुलंद नहीं होती।अंडरवर्ल्ड, माफिया, प्रोमोटर से लेकर हर असमाजिक असंवैधानिक तत्वों के नस्ली​​ वर्चस्व में निहित है इसके प्राण, जिसमें भारतीय बहुसंख्य जनता के प्राणों का कोई स्पंदन प्रतिध्वनित नहीं होती।
-पलाश विश्वास


शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री होंगे ?

कभी नहीं, जो लोग सांप्रदायिक आधार पर प्रधानमंत्री पद पर नरेन्द्र मोदी को पदासीन देखना चाहते हैं। उनको इस देश की सीमाओं की जानकारी नही है। गुजरात में जो नरसंहार हुआ है, उसके बाद भी अगर कोई इस धर्म निरपेक्ष भारत में यह सोचता है कि उग्र हिन्दुवत्व का प्रतीक नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हो जायेगा तो यह उनका दिवा स्वप्न है। मोदी को विकास पुरुष का प्रमाणपत्र टाटा और अम्बानी सहित बड़े-बड़े उद्योगपति दे रहे हैं। उनके द्वारा स्थापित मीडिया नरेन्द्र मोदी को विकास पुरुष की छवि बनाने में लगा हुआ है। गुजरात में खेत मजदूरों, किसानो, फैक्ट्री मजदूरों की हालत बाद से बदतर होती जा रही है। मल्टी नेशनल भारतीय कंपनियों को जो रियायतें दी जा रही हैं। श्रम कानूनों का गला घोटा जा रहा है। उससे आम जनता वाकिफ है और अगर गुजरात का यह तबका मोदी के समर्थन में होता तो गुजरात में अधिकांश सीटें मोदी को मिली होती। भारतीय जनता पार्टी कुछ प्रदेशों की ही पार्टी है। सम्पूर्ण भारत में उसकी कोई पकड़ नहीं है। इनके नेतागण आपस में नित्य लड़ते झगड़ते रहते हैं। भ्रष्टाचार में इनके नेतागण उसी तरीके से लिप्त हैं जिस तरह से कांग्रेस के नेतागण। बंगारू लक्ष्मण से लेकर नितिन गडकरी तक यह लोग बड़े बेइज्जत होकर राजनीति के गलियारे से वापस गए हैं। जर्मन नाजीवादी विचारधारा से लैस इस पार्टी को कभी भी बहुमत नहीं मिलना है। दुनिया की साम्राज्यवादी ताकतों के प्रतिनिधि यूरोपियन यूनियन या अमरीका चाहे जितनी कोशिश करे कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाएँ लेकिन बन नहीं पाएंगे। विदेशी ताकतें मोदी के लिए लोबिंग शुरू कर दी है। इस सम्बन्ध में इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि 7 जनवरी को दिल्ली में जर्मन राजदूत एम. स्टेनर के घर पर यूरोपियन यूनियन के देशों के राजदूत नरेंद्र मोदी से लंच पर मिले थे। इसके 15 दिन पहले ही मोदी लगातार चौथी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। लंच के दौरान राजदूतों ने 2002 के दंगों के बारे में सरकार की कथित निष्क्रियता को लेकर मोदी से सवाल भी किए। बकौल स्टेनर मोदी ने उन लोगों को भरोसा दिलाया कि गुजरात में अब कभी दंगे नहीं होंगे। जर्मन राजदूत ने यह भी कहा कि मोदी भारतीय राजनीति में बड़ी हस्ती हैं। इस मीटिंग के दौरान मोदी ने राजदूतों को धैर्य के साथ सुना और गवर्नेंस के अपने मॉडल के बारे में बताया।
                     आर्थिक विकास का मोदी माडल मात्र इतना है कि उद्योगपतियों को हर संभव मदद करके उनके मुनाफे को लाखो गुना बढ़ने में मदद करना है। दंगे, फसाद कराकर आप भारतीय जनमानस का दिल नही जीत सकते हैं जब तक मजदूरों किसानो के सम्बन्ध में आपके पास सोच होगी तो देश का विकास होना संभव नही है। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। खेत मजदूर, बुनकर, शिल्पकार  भुखमरी के रास्ते पर हैं। कारखानों में काम के घंटे 8 से ज्यादा बढ़ा दिए गए हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास इन तबको के बारे में कोई सोच नहीं है।

सुमन 

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

पुलिस और सांप्रदायिक दंगे





प्रथम दृष्टया, यह अत्यंत घिसापिटा विषय लगता है। सांप्रदायिक फसादों के दौरान और उनके बाद व पहले, पुलिस की भूमिका के बारे में पूर्व से ही हम सब बहुत-कुछ जानते हैं। हाल में, राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में, प्रधानमंत्री ने देश में सांप्रदायिक हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जाहिर की थी। इस सम्मेलन में गुप्तचर सेवाओं के अधिकारियों ने भी भाग लिया था। स्पष्टतः, जब देश के प्रधानमंत्री किसी समस्या पर चिंता व्यक्त करते हैं तब उसे हम सभी को गंभीरता से लेना चाहिए।
इस वर्ष के पहले चार महीनों के दौरान देश में साम्प्रदायिक हिंसा की कोई वारदात नहीं हुई और मुझे लगने लगा कि दंगा-मुक्त वर्ष का मेरा सपना पूरा होने जा रहा है। परंतु मेरा यह स्वप्न जल्दी ही टूट गया। उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में दंगे भड़क उठे। देश के अन्य हिस्सों में भी सांप्रदायिक हिंसा हुई। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से वहाँ सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। इससे एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि दंगों के पीछे राजनैतिक मंतव्य होते हैं और धर्म का इनसे कोई लेनादेना नहीं होता। राजनैतिक उद्देश्यों से धार्मिक पूर्वाग्रह फैलाए जाते हैं।
दंगो के मामलों में पुलिस की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पुलिस को गुप्तचर सूचनाएं इकट्ठा करनी होती हैं, शरारती तत्वों की पहचान कर उन्हें पहले से गिरफ्तार करना होता है, हिंसा शुरू हो जाने की स्थिति में उसे रोकना होता है और दंगे समाप्त हो जाने के बाद, दंगाईयांे को कानूनी तंत्र के जरिए ऐसी सजा दिलवानी होती है ताकि वे आगे से हिंसा करने की हिम्मत न कर सकें। पुलिस की दंगो के दौरान भूमिका के मेरे कई दशकों के अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि इस वर्ष हुए दंगों में भी पुलिस के व्यवहार में तनिक भी परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ।
यह आश्चर्यजनक है कि उत्तरप्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, उत्तरप्रदेश पुलिस के व्यवहार में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है। हम सबको अपेक्षा थी कि मुलायम सिंह, जो कि मुख्यतः मुसलमानो के समर्थन से सत्ता में आए हैं, पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लावेंगे। परंतु हम सबको निराशा ही हाथ लगी। अगर मुलायम सिंह ने पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव लाने की कोशिश की भी है तो पुलिस पर उसका कोई असर नहीं दिखलाई पड़ रहा है। पुलिस ने खुलकर दंगाईयों का साथ दिया। ऐसा लग रहा था मानों सत्ता में आने के तुरंत बाद, मुलायम सिंह सरकार को बदनाम करने का षडयंत्र अंजाम दिया जा रहा हो।
मैं इस निष्कर्ष पर भी पहुँचा कि शासन चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो, पुलिस का व्यवहार एक सा ही बना रहता है। पुलिसकर्मियों के दिमागों मंे इतना जहर भर दिया गया है कि तुलनात्मक रूप से अधिक धर्मनिरपेक्ष सरकार के अधीन भी वे वैसा ही व्यवहार करते रहते हैं। परन्तु फिर, हमारे सामने बिहार और पश्चिम बंगाल के उदाहरण भी हैं, जहां लालू प्रसाद यादव और ज्योति बसु व बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में, क्रमशः 15 और 30 वर्षों तक कोई बड़ा साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। बिहार और पश्चिम बंगाल में क्रमशः नितिश कुमार और ममता बेनर्जी के नेतृत्व मंे भी साम्प्रदायिक अमन कायम है।
शायद मुलायम सिंह यादव का व्यक्तित्व उतना मजबूत और चमत्कारिक नही है जितना कि बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों का। यह साफ है कि किसी भी निश्चित नतीजे पर पहुंचने के लिए अत्यन्त गहराई से अध्ययन किये जाने की जरूरत है। प्राथमिक तौर पर हम केवल यही कह सकते हैं कि पुलिस उन मुख्यमंत्रियों की सुनती हैं जो शक्तिशाली होते है और पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए नही करते। इन मुख्यमंत्रियों के कम से कम कुछ सिद्धांत होते हैं और वे पुलिस तक सही संदेश पहुंचाने में सफल होते हंै।
यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि क्या संपूर्ण पुलिस तंत्र का सांप्रदायिकीकरण हो गया है  या केवल निचले और मध्यम श्रेणी के पुलिस अधिकारी इस रोग से ग्रस्त हैं। एक बार, हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में एक संगोष्ठी के दौरान, मैने यह मत व्यक्त किया कि पुलिस के उच्च अधिकारी, निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों की तुलना में कम साम्प्रदायिक और जातिवादी हैं। एक वरिष्ठ आई.पी.एस अधिकारी, जो कि मेरी ही तरह अकादमी में व्याख्यान देने आये थे, ने मुझसे असहमती जताते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारी तो अपने मातहतों से कहीं ज्यादा फिरकापरस्त और जातिवादी हैं। मैने इस पर सिर्फ यही कहा कि आई.पी.एस. अधिकारी होने के नाते वे शायद मुझसे बेहतर जानते हैं।
मेरा स्वयं का अनुभव यह है कि पुलिस के उच्च अधिकारी वर्ग में दोनो तरह के लोग होते हैं- कुछ घोर साम्प्रदायिक तो कुछ पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष। गुजरात इन दोनो तरह के अधिकारियों का अच्छा उदाहरण है। वहां ऐसे आईपीएस अधिकारी थे जिन्होंने मुख्यमंत्री के आगे घुटने टेक दिये और उनके सभी जायज-नाजायज आदेशों को शिरोधार्य किया। कुछ अधिकारी ऐसे भी थे जो नहीं झुके, जिन्होंने अवैधानिक आदेश मानने से इंकार कर दिया और जबरदस्त दबाव के बाद भी जो अपने मत पर दृढ़ रहे। मैने इनमें से दूसरी श्रेणी के अधिकारियों के साथ कई बार कार्यक्रमों में शिरकत की है।
ऐसा भी नही हैं कि वे सब अधिकारी दलित थे। उनमें से कुछ ब्राम्हण सहित अन्य उच्च जातियों के भी थे और कुछ निचली जातियांे के। मंै ऐसे दो आईपीएस अधिकारियों को जानता हूँ जो भाई-भाई हैं, एक ऊँची जाति से आते हैं, पुलिस महानिदेशक के दर्जे के हैं और  जिनकी धर्मनिरपेक्षता किसी भी संदेह के परे हैं। वे अपने पूरे कार्यकाल के दौरान अपने सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध बने रहे और उन्होंने बड़े साहस से साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं का मुकाबला किया।
यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के अधिकारी एक अपवाद हंै और मेरे पास इस तर्क का कोई जवाब भी नही है। परन्तु मैंने ऐसे कई अन्य अधिकारी भी देखे हैं। हैदराबाद की राष्ट्रीय पुलिस अकादमी में आयोजित एक कार्यशाला में पूरे देश से आये प्रोबेशनर आईपीएस अधिकारियों को साम्प्रदायिक दंगो और उन्हें रोकने में पुलिस की भूमिका पर केस स्टडी प्रस्तुत करनी थी। इस कार्यशाला में प्रोफेसर राम पुनियानी और मैं निर्णायक मंडल में थे। कई आईपीएस अधिकारियों का प्रस्तुतिकरण इतना अच्छा था कि मैंने प्रोफेसर पुनियानी से मजाक में कहा कि अब हम लोगों को इस क्षेत्र से सन्यास ले लेना चाहिए क्योंकि युवा पुलिस अधिकारी पहले से ही धर्मनिरपेक्षता के प्रति इतने प्रतिबद्ध है कि उन्हें किसी प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता नही है।
यद्यपि यह सच है परन्तु पूरा सच नही। और शायद आने वाले लम्बे समय तक यह पूरा सच नही बन सकेगा। हर धर्मनिरपेक्ष अधिकारी के पीछे विभिन्न स्तरों के अनेक साम्प्रदायिक अधिकारी होते हैं। उनकी जातिवादी और साम्प्रदायिक सोच साफ झलकती है। मैंने बम्बई (1992-93), मेरठ (1987), गुजरात (1985, 2002) व भिवन्डी (1984) दंगो में पुलिस की इस पुर्वाग्रहपूर्ण सोच का अनुभव किया है।
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि पूर्वाग्रहग्रस्त अधिकांश अधिकारी निचले दर्जे के थे परन्तु शीर्ष स्तर पर भी, कुछ अपवादों को छोड़ कर, हालात बहुत भिन्न नही थे। मुम्बई में निचले स्तर के अधिकांश पुलिसकर्मी मराठी सामना पढ़ते हैं और मुसलमानों के बारे में सामना की ही भाषा में बात करते हैं। फिर भला हम उनसे कैसे यह उम्मीद करें कि वे उत्तेजना फैलाने वाले लेखन के लिए सामना के विरूद्ध कार्यवाही करेंगे। मुम्बई दंगो के समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नायक का रवैया देखिए। जब मुम्बई के गणमान्य नागरिकों का एक
प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और दंगों को रोकने का आग्रह किया तो उनका जवाब था कि “आप लोग बाल ठाकरे से मिल लंे क्यों कि वे ही दंगा भड़का रहे हैं”। साफ तौर पर श्री नायक ने अपने अधिकार, ठाकरे के पास गिरवी रख दिये थे। इतने कमजोर मुख्यमंत्री से हम कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह दंगों को रोकेगा। यह शर्मनाक है कि महाराष्ट्र सहित कई अन्य स्थानों पर जो पुलिस अधिकारी दंगों पर नियंत्रण पाने में असफल रहे और जिनकी दंगा जांच आयोगो ने कड़ी निंदा की, उन्हें सजा मिलना तो दूर, उनकी पदोन्नति कर दी गई।
उदाहरणार्थ, सन् 1970 के भिवन्डी-जलगाँव दंगों की जांच के लिए नियुक्त मादोन आयोग ने अपनी रपट में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जमकर खिंचाई करते हुए कहा था कि उन्होंने निर्दाेषांे को गिरफ्तार किया और दोषियों को बख्शा। परन्तु इसके बाद भी उन्हें एक के बाद एक पदोन्नतियां मिलती गईं और अंततः वे महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुये। एक अन्य उदाहरण मुम्बई पुलिस के एक संयुक्त आयुक्त का है जिन्होेंने आठ मदरसा छात्रों को दंगाई बताकर गोली मार दी थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी जांच रपट में इस अधिकारी की इस भूल की कड़े शब्दों में निंदा की थी परन्तु उन्हें शिवसेना सरकार के कार्यकाल मंे मुम्बई का पुलिस आयुक्त बना दिया गया। उनकी सेवानिवृति के बाद, एक अदालत ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया परन्तु वे दिल का दौरा पड़ने का बहाना लेकर एक अस्पताल में भर्ती हो गए और वहीं रहते हुए उन्होंने एक अदालत से जमानत ले ली। इस प्रकार वे एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए।
इस तरह के तो कई उदाहरण हैं। परन्तु हाल में मुम्बई में ही इसका ठीक विपरीत उदाहरण सामने आया। मुम्बई के पुलिस आयुक्त अरूप पटनायक ने हिंसा पर उतारू भीड़ को नियंत्रित करने में अनुकरणीय साहस और योग्यता दिखाई। वे पचास हजार लोगो की उत्तेजित भीड़ को चुपचाप अपने घर जाने के लिए प्रेरित कर सके। इसके लिए वे ईनाम के हकदार थे परन्तु इसके उलट राज ठाकरे के दबाव में महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने उनका तबादला सड़क परिवहन के महानिदेशक के पद पर कर दिया। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पटनायक के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते हुए लगभग 45 हजार लोगों का जुलूस निकाला था।
राज ठाकरे अब तक मुसलमानों के खिलाफ चुप्पी बनाए हुए थे और यहां तक कि कुछ मामलों में वे मुसलमानों का समर्थन भी कर रहे थे। परन्तु अब शायद सन् 2014 के चुनाव के परिपेक्ष्य में उनका दृष्टिकोण बदल गया है और वे हिन्दुत्व कार्ड खेलने पर आमादा हैं। पटनायक को हटाने की मांग को लेकर विशाल रैली निकालने के पीछे उनका उद्देश्य एक पत्थर से दो पक्षियों का शिकार करना था। पहला यह कि इससे वे शिवसेना के नजदीक आ गये और शिवसेना के साथ सन् 2014 के चुनाव में उनकी पार्टी के गठबंधन की संभावना बढ़ गई। दूसरे, उन्होेंने महाराष्ट्र की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया। परन्तु इस राजनैतिक खेल में एक अत्यन्त कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी की बली चढ़ गई, जिन्होंने एक गम्भीर स्थिति से सफलतापूर्वक मुकाबला किया था।
शायद यही कारण है कि कार्यशालाओं के दौरान कई पुलिस अधिकारी मुझसे कहते हैं कि वे इस मामले मंे कुछ खास नहीं कर सकते क्योंकि वे तो राजनीतिज्ञों के मोहरे भर है। इस बात में दम है। गुजरात मंे कई पुलिस अधिकारियों ने राजनैतिक दबाव का मुकाबला करने की कोशिश की परन्तु असफल रहे। अलबत्ता, हमेशा ऐसा नहीं होता। पुलिस अधिकारियों की सोच में पूर्वाग्रह बिल्कुल साफ नजर आते हैं। इस सोच को खत्म करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों तक के पाठ्यक्रमों में आमूलचूल परिवर्तन लाने होगें। हमे हमारे पुलिसकर्मियों को धर्मनिरपेक्ष बनाना होगा।
यह भी जरूरी है कि अहमदाबाद के नरोदा पाटिया मामले में जिस तरह का निर्णय आया है वैसे ही निर्णय आगे भी सुनाए जाते रहंे। एक पूर्व मंत्री को दंगे भड़काने के आरोप में 28 साल के कारावास की सजा से वे राजनेता हतोत्साहित होंगे जो अपने मतदाताओं के साम्प्रदायिक तबके का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करते हैं। इस मामले मंे न्यायाधीश ज्योत्सना याज्ञनिक बधाई की पात्र हैं।
-डा. असगर अली इंजीनियर

सोमवार, 4 जून 2012

मोदी के मुंह पर तमाचा







प्रसिद्ध कहावत है “सूत न कपास, जुलाहों में लठा-लठी“। यह कहावत भारतीय जनता पार्टी पर पूरी तरह लागू हो रही है। देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के मद्देनजर अगले चुनाव में भाजपा द्वारा लोकसभा में बहुमत पाने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। अपने बलबूते पर तो भाजपा बहुमत हासिल कर ही नहीं सकती अन्य पार्टियों के साथ मिलकर भी उसके सरकार बनाने की संभावना नजर नहीं आती। फिर भी जोर-शोर से यह प्रचार किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे।
वैसे भाजपा में भी औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री के पद के लिये मोदी का नाम प्रस्तावित नहीं किया गया है। अभी तक एक ही भाजपा नेता ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लायक माना है। वे हैं भ्रष्टाचार शिरोमणि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा।
अभी हाल में बम्बई में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक संपन्न हुई। बैठक के पहले यह अनिश्चित था कि नरेन्द्र मोदी कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेंगे या नहीं? मोदी, भाजपा के नेतृत्व से नाराज थे। नाराजगी का कारण था संजय जोशी का पुनर्वास।
मोदी संजय जोशी को अपना प्रतिद्वन्दी मानते हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जोशी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी का उत्तरदायित्व सौंपा। इससे मोदी इतने नाराज हुये कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में प्रचार करने से इंकार कर दिया। इसके साथ उन्होंने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में भाग लेना भी बन्द कर दिया। मुंबई बैठक के ठीक पहले गडकरी ने संजय जोशी का त्यागपत्र ले लिया। इसके बाद ही मोदी ने बम्बई बैठक में भाग लिया। मोदी की यह शर्त कि वे कार्यकारिणी की बैठक में तभी भाग लेंगे जब जोशी को कार्यकारिणी से हटाया जाय-बचकानी तो है ही और इससे यह भी सिद्ध होता है कि मोदी कितने संकुचित विचारों वाले व्यक्ति हैं। क्या इतने संकुचित विचारों वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर बैठने लायक है?
भले ही सतही तौर पर कुछ भी नजर आ रहा हो परंतु भाजपा में ऐसे कम ही लोग हैं जो मोदी को प्रधानमंत्री के पद सुशोभित देखना चाहेंगे। इसके ठीक विपरीत, केन्द्रीय नेतृत्व में बहुसंख्यक ऐसे है जो मोदी के रास्ते में हर संभव रोड़े खड़े करेंगे। बम्बई की बैठक के दौरान ही इसके स्पष्ट संकेत मिले।
इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेत था लालकृष्ण आडवानी और सुषमा स्वराज का भाजपा की रैली में शामिल होने से इंकार। स्पष्ट है कि आडवानी और सुषमा स्वराज उस मंच से भाषण नहीं देना चाहते थे जिस पर मोदी बैठे हों। कार्यकारिणी की बैठक के फौरन बाद नितिन गडकरी ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसे मोदी के मुंह पर तमाचा ही कहा जा सकता है। यह निर्णय था संजय जोशी को उत्तर प्रदेश का प्रभार पुनः सौंपना। घोषणा के अनुसार सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी संजय जोशी ही उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहेंगे। चूँकि लोकसभा के चुनाव के दौरान भी संजय जोशी उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहेंगे इसलिए मोदी फिर चुनाव प्रचार के लिए उत्तरप्रदेश नहीं जायेंगे। क्या कोई ऐसा नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकता है जिसे उत्तर प्रदेश का समर्थन प्राप्त न हो? इस तरह गडकरी ने राजनैतिक चालबाजी से मोदी के रास्ते में एक बड़ा बैरियर खड़ा कर दिया है।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में सबसे प्रमुख रोड़ा उनका स्वभाव है। उनकी प्रवृत्ति तानाशाही है। वे अपने प्रतिद्वन्दी को जड़मूल से समाप्त करने में विशवास रखते हैं। गुजरात में उन्होंने अनेक प्रतिद्वंद्वियों को नेस्तोनाबूद कर दिया है। राजनीति के अलावा प्रषासन में भी मोदी ने उन अधिकारियों को ठिकाने लगा दिया है जिन्होंने उनके आदेशों का अक्षरशः पालन नहीं किया। संजय जोशी तो उनकी तानाशाही प्रवृत्ति के सबसे बड़े शिकार हैं। अभी हाल में गुजरात भाजपा के अनेक प्रमुख नेताओं, जिनमें केशुभाई पटेल और सुरेश मेहता शामिल हैं, ने मोदी को तानाशाह निरूपित किया है। जोशी का राजनैतिक कैरियर समाप्त करने के लिये मोदी ने हर प्रकार के हथकंड़े अपनाये। यौन संबंधों को लेकर जोशी की सीडी भी सार्वजनिक हुई। कुछ लोगों का आरोप है कि जोशी का चरित्र हनन करने वाली सीडी के पीछे भी मोदी का हाथ था। मोदी ने गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशु भाई पटेल को हर तरह से सताने का प्रयास किया। नतीजे में केशुभाई ने राजनीति से लगभग सन्यास ले लिया है। मोदी ने अपनी ही पार्टी के अनेक नेताओं को सिर्फ इसलिए घर बैठा दिया क्योंकि वे उन्हें अपने रास्ते का कांटा मानते है।
मोदी के एक अन्य प्रतिद्वन्दी थे हरेन पंडया। हरेन पंडया की अत्यधिक रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में हत्या कर दी गई। हरेन पंडया के पिता ने मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके पुत्र, जोकि गुजरात के पूर्व गृहमंत्री थे, की हत्या में मोदी का हाथ है।
हमारे देश के इतिहास में शायद ही किसी मंत्री या मुख्यमंत्री को अमरीका ने वीजा देने से इंकार किया हो। परंतु अमरीका ने मोदी को अभी तक वीजा नहीं दिया है। सन् 2002 के दंगों के बाद विश्व की निगाह में वे नायक नहीं खलनायक समझे जाने लगे।

प्रधानमंत्री बनने के लिए विश्व स्तर पर स्वीकार्यता के मुकाबले देश में स्वीकार्यता अधिक आवश्यक है। लालकृष्ण आडवानी, मोदी के संरक्षक माने जाते हैं। आडवानी ने हमेशा मोदी की प्रशंसा की है। सन् 2002 के दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे परंतु आडवानी ने वाजपेयी का घोर विरोध किया और मोदी को बचा लिया। वही आडवानी अब मोदी से खफा हो गए हैं। अभी कुछ माह पहले आडवानी ने एक और रथयात्रा की थी। आडवानी चाहते थे कि उनकी यात्रा का शुभारंभ गुजरात से हो परंतु मोदी ने ऐसा नहीं होने दिया और अंततः आडवानी की यात्रा की शुरूआत बिहार से हुई। शायद तबसे ही मोदी, आडवानी को अपना प्रतिद्वन्दी मानने लगे थे। मोदी की सोच होगी कि भाजपा में आडवानी ही ऐसे नेता हैं जो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनके प्रमुख प्रतिद्वन्दी हो सकते हंै। आडवानी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उनका वरदहस्त अब मोदी पर नहीं है। बम्बई में मोदी के साथ पार्टी की रैली में शामिल न होकर आडवानी ने मोदी के प्रति अपना रवैया साफ कर दिया।
देष के भीतर स्वीकार्यता का एक मापदंड यह भी होता है कि अल्पसंख्यक वर्ग संबंधित व्यक्ति का मूल्यांकन कैसे करते हैं। यदि हमारे देश में राय ली जाय कि वह नेता कौन है जिसे मुसलमान और कुछ हद तक ईसाई सर्वाधिक घृणा करते हैं तो सभी की जुबान पर नरेन्द्र मोदी का नाम ही आयेगा। मुसलमान मोदी से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी यहूदी, हिटलर से करते थे। अभी तक हमारे देश में जितने भी प्रधानमंत्री हुये हैं उनकी देश के सभी वर्गों में कम-बढ़ स्वाकार्यता थी। यह बात अटल बिहारी वाजपेयी पर भी लागू होती है। यद्यपि वे जीवन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे इसके बावजूद मुसलमानों का एक हिस्सा उन्हें पसंद करता था। परंतु मोदी के मामले में ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। यह एक प्रमुख आधार है जो मोदी के , में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध होगा। मोदी स्वयं घृणा की राजनीति करते हैं और घृणा के आधार पर कोई भी राष्ट्र ज्यादा दिनों विश्व के नक़्शे पर नहीं रह सकता। जर्मनी इस बात का जीता जागता उदाहरण है।

-एल. एस. हरदेनिया,,



गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

प्रधानमंत्री द्वारा एक सच्चाई की स्वीकारोक्ति ----लेकिन किस लिए ?

16 नवम्बर के समाचार पत्रों में प्रधानमंत्री का एक बयान छपा है | उसमे उन्होंने देश में गरीबी , स्वास्थ्य , पर्यावरण की समस्याओं को दूर करने के लिए नयी सोच और नई कार्य -प्रणाली की जरूरत को उठाया है | इस संदर्भ में नये परिवर्तन के लिए बने 'इनोवेशन फण्ड (प्रवर्तन कोष ) की शुरुआत के लिए सरकार द्वारा 100 करोड़ रूपये देने की घोषणा भी की गयी है | यहा तक इस खबर में कोई ख़ास बात नही हैं |कयोंकि इसमें तमाम प्रोग्रामो की घोषणाये आये दिन होती रहती है | लेकिन उनका कोई उल्लेखनीय परिणाम आम समाज में आज तक दिखाई नही पड़ता | इस मौके पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक महत्वपूर्ण सच्चाई को भी स्वीकार किया |उसे आप भी सुनिए | पहले तो उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक ' नई सोच ' का इस्तेमाल अमीरों की जरूरते पूरा करने के लिए हुआ हैं | लेकिन अब गरीबो के लिए कुछ करने की जरूरत है |फिर इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि 'हमने अन्तरिक्ष ,प्रैद्योगिकी , परमाणु उर्जा और वाहन जैसे क्षेत्रो में बहुत कुछ नया किया है |हमारे देश में यह नव प्रवर्तन ज्यादातर अमीरों की जरुरतो को ध्यान में रखकर किया गया है और गरीबो की समस्याओं को दूर करने पर पर्याप्त ध्यान नही दिया गया है |हम चाहते है कि इस दिशा में भी कुछ किया जाए | नव प्रवर्तन कि अवधारणा फण्ड एक बड़ा बदलाव लाने में कारगर साबित होगा |
यह देश का प्रधानमन्त्री कह रहा है कि अभी तक किया जाता रहा नव प्रवर्तन अमीरों की जरूरते पूरी करता रहा है और उसमे गरीबो की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नही दिया गया है | इस सच्चाई और उसकी स्वीकारोक्ति के लिए प्रधामंत्री जी को गरीबो कि तरफ से धन्यवाद जरुर दिया जाना चाहिए | लेकिन साथ ही उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्हें इसकी जानकारी कब हुई ? अगर यह जानकारी उन्हें पहले से ही थी तो वे देश के बहुमत गरीबो को अब तक उपेक्षित करके अमीरों के हितो के अनुसार नव प्रवर्तन का काम क्यों होने दीये ? उसे शुरू से ही देश के बहुसख्यक गरीबो के हित की दिशा में क्यों नही मोड़ा ?
लेकिन इससे अलग और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे ? अमीरों का भला और गरीबो कि उपेक्षा क्यों कर होती रही | 1991 के वित्त मंत्री और अब के प्रधानमन्त्री के रूप में वे स्वंय तथा अन्य कांग्रेसी व गैर कांग्रेसी नेतागण 20 साल से लागू की जाती रही नीतियों से देश के तीव्र आर्थिक विकास के साथ देश से गरीबी , बेकारी दूर करने की बाते कहते रहे है | वैश्वीकरण की ' नई सोच ' नये आधुनिकतम तकनीकी विकास के नव -प्रवर्तन के जरिये देश को 21 वी सदी में ले जाने तथा वैभव , शक्ति से सम्पन्न बनाने के बयानों प्रचारों को चलाते , चलवाते रहे है | क्या माना जाए कि तब हमारे नेतागण व् विद्वान् अर्थशास्त्री गण और इन दोनों के सिरमौर , वर्तमान अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री जी भी यह नही जानते थे कि इस नई सोच व नई तकनीकी विकास आदि के नव - प्रवर्तन के जरिये देश के गरीबो का नही बल्कि अमीरों का ही भला होना है ?यह बात कत्तई मानने लायक नही हैं | साफ़ बात है वे और अन्य उच्च स्तरीय नेतागण यह बात बखूबी जानते थे और जानते है कि देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों को छूटे व अधिकार देते हुए देश के मेहनतकश व् गरीब जनसाधारण हिस्से की छूटो व् अधिकारों को काटा व् घटाया जाना जरूरी है | क्योंकि देश दुनिया को बढावा देने का कोई ' नया रास्ता ' ' नई तकनिकी ' न तो है और न ही हो सकती है | इसलिए आम किसानो , मजदूरों , दस्तकारो , छोटे उद्यमियों तथा साधारण पढ़े - लिखे नौजवानों की छूटो व अधिकारों , अवसरों तथा स्थायी साधनों की निरन्तर कटौती के रूप में यह काम किया भी जाता रहा | अब अगर गरीबो के लिए ' नई सोच ' नई तकनीक ' या नव प्रवर्तन के जरिये कुछ करना है तो उसका एक ही रास्ता है की अमीरों की बढती अमीरी पर सख्त रोक लगाई जाए | लेकिन यह काम वैश्वीकरणवादी , उदारीकरणवादी ,निजीकरणवादी नीतियों को वापस लिए बिना सम्भव नही है | या कहिये की इसकी शुरुआत ही अब यही से करनी पड़ेगी | लेकिन प्रधानमंत्री जी का मंत्रीपरिषद तो उन नीतियों को आगे बढाने में जुटा हुआ हैं | उसके लिए विधयेक पर विधयेक तैयार कर रहा है | फिर यही काम पिछले 15 सालो से सभी प्रमुख पार्टिया केन्द्रीय शासन - सत्ता में बैठकर करती रही है | ऐसी स्थितियों में प्रधानमन्त्री महोदय का या किसी अन्य राजनेता व विद्वान् का गरीबो की भलाई के लिए नई सोच व नई तरकीब के लिए प्रयास करने के बयान व चिंताए जनसाधारण गरीब जनता के लिए एक और झूठ व छलावा ही साबित होना हैं | प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर मुझे नागार्जुन बाबा के यह शब्द याद आ गये

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

-सुनील दत्ता
पत्रकार
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