नेहरू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नेहरू लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

नेहरू की विरासत पर हमला ?

भारत का विभाजन, महात्मा गांधी की हत्या और जिन भाजपा नेता ने इस लेख को लिखा है, उनका नाम है बी. गोपालकृष्णन। वे लिखते हैंए 'यदि इतिहास के विद्यार्थी यह महसूस करते हैं कि गोडसे ने गलत व्यक्ति पर निशाना साधा तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश के विभाजन के लिए केवल और केवल नेहरू जिम्मेदार थे।' इस लेख से हम क्या समझें? क्या यह आरएसएस की आधिकारिक राय है? हमेशा की तरहए आरएसएस प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने अपने ही नेता की राय से संघ को अलग कर लिया है। परंतु यह समझना मुश्किल नहीं हैं कि आरएसएस के कुछ लोग नेहरू को गांधी से भी बड़ा खलनायक क्यों मानते हैं।'केसरी' में छपा लेख इसी विचार की अभिव्यक्ति है। इससे पहले कि हम देखें कि देश के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था, आइए हम समझने की कोशिश करें कि महात्मा की जगह नेहरू को दोषी ठहराए जाने का उद्देश्य क्या है।
हाल में, नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि स्वरूप,उनके जन्मदिवस 2 अक्टूबर को 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया। इसके पीछे दो धूर्ततापूर्ण लक्ष्य थे। पहला,  हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति के लिए गांधी का इस्तेमाल करना और दूसरा, गांधी के योगदान को मात्र साफ.सफाई तक सीमित कर देना। गांधीजी निःसंदेह साफ.सफाई पर जोर देते थे परंतु वे हिंदू.मुस्लिम एकता, राष्ट्रीय एकीकरण, अहिंसा और सत्य के पैरोकार भी थे। साफ.सफाई के बारे में गांधीजी की सोच को जरूरत से अधिक महत्व देने का उद्देश्य, उनके अन्य सिद्धांतों का महत्व कम करना है।
उसी तरह,नेहरू की भारतीय राष्ट्रवाद, बहुवाद, धर्मनिरपेक्षता व वैज्ञानिक सोच के प्रति जबरदस्त प्रतिबद्धता के कारण वे हिंदू राष्ट्रवादियों को पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। हिंदू राष्ट्रवाद, इन सभी मूल्यों का धुर विरोधी है। इस लेख का उद्देश्य, नेहरू को विभाजन का दोषी बताकर, उसपर आम जनता और बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया जानना है।
भारत के साम्राज्यवाद.विरोधी स्वाधीनता संग्राम के तीन स्तंभ थे.गांधी, नेहरू और पटेल। गांधी का कद इनमें सबसे ऊँचा था। उन्होंने ही ब्रिटिश विरोधी, भारतीय राष्ट्रवादी जनांदोलन को खड़ा किया, उसे ठोस जमीन दी और उसके नैतिक पथप्रदर्शक बने। उन्होंने अपनी विरासत, नेहरू और पटेल को सौंपी। हिंदू राष्ट्रवादी,जिनमें हिंदू महासभा और आरएसएस शामिल हैं, हिंदू.मुस्लिम एकता स्थापित करने के गांधी के प्रयास के कटु आलोचक थे। मुस्लिम साम्प्रदायिक धारा की प्रतिनिधि मुस्लिम लीग, कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी के रूप में देखती थी जो कि केवल हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है। सत्य यह है कि सभी धर्मों के बहुसंख्यक लोग, गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ थे। हां, सन् 1940 के बाद सांप्रदायिकता में आए उछाल के कारण मुसलमान शनैः शनैः मुस्लिम लीग की ओर झुकने लगे।
दोनों सांप्रदायिक धाराएं गांधी की आलोचक थीं। हिंदू सांप्रदायिक तत्व उन्हें मुसलमानों के तुष्टीकरण का दोषी बतलाते थे तो मुस्लिम संप्रदायवादी उन्हें हिंदुओं का प्रतिनिधि कहते थे। विभाजन के पीछे कई कारक थे,जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण था अंग्रेजों की'फूट डालो और राज करो' की नीतिए जिसने हिंदू और मुस्लिम, दोनों सांप्रदायिक धाराओं को मजबूती दी। ब्रिटेन का अपना साम्राज्यवादी एजेण्डा था। उसे मालूम था कि अगर भारत एक रहा तो वह एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली देश होगा। ब्रिटेन को यह भी अंदाजा था कि आने वाली द्विधुर्वीय दुनिया में, भारत, सोवियत संघ के शिविर में रहेगा। उनकी इस सोच के पीछे कारण यह था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक शक्तिशाली वामपंथी गुट था, जिसका नेतृत्व स्वयं नेहरू करते थे।
विभाजन एक बहुस्तरीय त्रासदी था और उसे केवल एक घटना मानना भूल होगी। वह कई घटनाओं का मिलाजुला नतीजा थी। इसे समझने के लिए हमें एक ओर भारतीय और धार्मिक ;मुस्लिम लीग.हिंदू महासभा, राष्ट्रवादियों के बीच के अंतर को समझना होगा तो दूसरी ओर हमें यह भी देखना होगा कि अंग्रेजों का कुटिल खेल क्या था। तभी हम इस प्रक्रिया को समझ सकेंगे। विभाजन के लिए केवल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने से काम चलने वाला नहीं है।
नेहरू की नीतियां, पिछले कई दशकों से अनवरत बहस का विषय बनी हुई हैं। हर राजनैतिक दल व विचारधारा के लोग, इन तीनों की व्याख्या अपने.अपने ढंग से करते रहे हैं। एक तरह से, ये तीनों, आधुनिक भारतीय इतिहास में मील के पत्थर हैं। भारत का विभाजन और गांधी की हत्याए इस अर्थ में आपस में जुड़े हुए हैं कि गोडसे ने गांधी पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप लगाया था। गोडसे के विचार, तत्कालीन घटनाक्रम की उसकी अधकचरी समझ पर आधारित थे और उसने उसी समझ को गांधीजी की हत्या का औचित्य बना लिया। गोडसे के विचारों से आज के कई हिंदू राष्ट्रवादी सहमत हैं। इनमें से अधिकांश या तो भाजपा.आरएसएस से जुड़े हुए हैं या उनके आसपास हैं। भाजपा के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से उसके कई नेता,अधिक खुलकर इन मुद्दों की हिंदू राष्ट्रवादी व्याख्या को स्वर दे रहे हैं। परंतु इसमें भी अब एक नया पेंच जोड़ दिया गया है। यह पेंच केरल के एक भाजपा नेता द्वारा आरएसएस के मुखपत्र'केसरी' में लिखे गए एक लेख से जाहिर है। यह लेख, अप्रत्यक्ष रूप सेए कहता है कि नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी की जगह जवाहरलाल नेहरू की हत्या करनी थी क्योंकि लेखक के विचार में, असली दोषी नेहरू थे, गांधी नहीं।
अब तक हिंदू सांप्रदायिक तत्व चिल्ला.चिल्लाकर यह कहते आए हैं कि भारत के विभाजन और मुसलमानों के तुष्टिकरण के लिए गांधी जिम्मेदार थे। अब वे नेहरू को खलनायक बनाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गांधी की जरूरत है.परंतु वह भी केवल 'सफाई पसंद नेता के रूप में' न कि सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले महान राष्ट्रपिता बतौर। हिंदू संप्रदायवादी चाहे कितनी ही कोशिश क्यों न करें वे नेहरू पर कब्जा नहीं कर सकते क्योंकि नेहरू ने स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रवाद' बहुवादए उदारवाद और विविधता के मूल्यों को मजबूती देने का काम किया। यही वे मूल्य हैं जो दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन,भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनए का आधार थे। आश्चर्य नहीं कि आरएसएस अपने ही मुखपत्र में प्रकाशित लेख से कन्नी काट रहा है। वैसे भी, यह लेख एक मुखौटा है, जिसका उद्देश्य संघ परिवार के असली इरादों और सोच को छुपाना है।
-राम पुनियानी

शनिवार, 6 सितंबर 2014

अमरीकी दहशतगर्दी का शिकार एशिया----------------3

इन्दिरा गांधी के बाद भारत में अपने पैर जमाने का रास्ता साम्राज्यी शक्तियों के लिए साफ था। राजीव गांधी से उन्हें अपने विरोध की अधिक उम्मीद नहीं थी। साम्राज्यी शक्तियों ने राजीव को अपने जाल में फंसाने का ताना बाना बुनना प्रारम्भ कर दिया। अमरीकी पार्लियामेन्ट में उन्हें बोलने का अवसर दिया गया, उनकी योग्यता व दर्शन की अमरीका व अन्य यूरोपीय राष्ट्रों की मीडिया ने जमकर तारीफ की। प्रारम्भ में राजीव गांधी, अरुण नेहरू, वीर बहादुर और आरिफ मो0 खान जैसे लीडरों के राय मशवरे पर चलते हुए गल्तियाँ पर गल्तियाँ करते गए और कांग्रेस कमजोर होती चली गई। सिक्खों के बाद हिन्दू आतंकवाद ने सिर उठाना शुरू किया। इससे पूर्व राजा नहीं फकीर का नारा देकर वी0पी0 सिंह ने लोक नायक जय प्रकाश नारायण की टीम के योद्धा लालू यादव, शरद यादव और नीतीश कुमार वो उ0प्र0 से मुलायम सिंह को साथ लिया और कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना हाथ वी0पी0 सिंह से मिला लिया। फिर शुरू हुआ मंडल कमीशन अन्तर्गत पिछड़ों के आरक्षण का खेल और इसके जवाब में लाल कृष्ण अडवाणी के कमंडल का खेल। मंडल व कमंडल ने पूरे देश में रक्तरंजित राजनीति का खेल प्रारम्भ कर दिया और गुजरात के सोमनाथ मंदिर से रथ पर सवार लालकृष्ण अडवाणी के सफर का अंत अयोध्या में राम भक्तों के प्राणों की आहुति पर हुआ। नतीजे में वी.पी. सिंह की हुकूमत गिर गई और भाजपा एन.डी.ए. का गठन कर गैर कांग्रेसी हुकूमत पहली बार अपने नेतृत्व में बनाने में सफल रही। पहले 13 दिन, फिर 13 माह और उसके बाद पूरे पांच साल तक भाजपा ने देश पर हुकूमत की। इस दौरान अपने परिवार के दो राजनेताओं को गँवा कर सहमी हुई सोनिया गांधी ने अपनी हिम्मत बटोर कर कांग्रेस का तिनका जोड़ना प्रारम्भ किया और एन.डी.ए. के विरुद्ध धर्म निरपेक्ष ताकतों के जिसमें वामपंथी भी शामिल थे, मिलाकर यू0पी0ए0 का गठन संयुक्त न्यूनतम साझा कार्यक्रम का एजेन्डा सामने रख कर किया। जनता ने वर्ष 2004 के आम लोक सभा चुनाव में इस नए राजनैतिक गठबंधन को समर्थन दिया तो उसमें मुख्य योगदान, उस समय तक काफी शक्तिशाली हो चुकी इलेक्ट्रानिक मीडिया का रहा। जिसने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के उसी प्रकार कसीदे पढ़े जैसे आज कल नरेन्द्र मोदी के वह पढ़ रही है। मनमोहन सिंह ने साम्राज्यी शक्तियों की इच्छा के अनुरूप पूरे देश में आर्थिक उदारीकरण की ऐसी बयार चलाई और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को उन्होंने इतनी छूट दी कि देसी उद्योगों का जनाजा निकल गया। घरेलू उत्पाद विदेशी उद्योगपतियों के कब्जे में चला गया। किसान मजदूर बेरोजगार होकर आत्महत्या पर मजबूर हो गए। देश के करोड़ों लोगों के हाथों मंे मोबाइल तो आ गया परन्तु करोड़ों लोग भुखमरी का शिकार भी हो गए। परमाणु समझौता एफ0डी0आई0 इत्यादि नीतियों को लेकर कांग्रेस की यू0पी0ए0 सरकार से वामपंथी दल नाराज होकर साथ छोड़ गए। कांग्रेस ने 2009 में दोबारा सत्ता प्राप्त तो कर ली, परन्तु  वामपंथियों का साथ छोड़कर चले जाने से वह काफी कमजोर हो गई। भाजपा का मुकाबला करने के लिए उसके पास राजनैतिक निपुण नेताआंे का अभाव सदन में नजर आने लगा। नतीजा यह हुआ कि वह भाजपा के आक्रामक रुख के आगे रक्षात्मक होती चली गई और अन्ततः 2014 के लोकसभा चुनाव में यू0पी0ए0 चारो खाने चित हो गई। केन्द्र में पहली बार पूर्ण बहुमत से भाजपा को उस व्यक्ति के नेतृत्व में सत्ता की प्राप्ति हो गई जो साम्प्रदायिक एवं साम्राज्यी शक्तियों का समर्थक माना जाता है।
    पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान में पहले निजामें मुस्तफा के नारे पर जिस प्रकार
धर्मराज की स्थापना कर मुस्लिम आतंकवाद का उदय साम्राज्यी शक्तियों ने कराया था और जिसके नतीजे में पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था की ईंट से ईंट बज चुकी है उसी राह पर भारत को भी लेकर साम्राज्यी शक्तियाँ चल पड़ी हैं। हिन्दू राष्ट्र का सपना देशवासियों को इस्लामी राष्ट्र के नाम पर दिखाया जा रहा है। आकाश से तारे तोड़ लाने के सलोने सपने दिखाए जा रहे हैं। साथ ही हिन्दू आतंकवाद का दानव भी तेजी से सिर उठा रहा है। विगत दो ढाई माह के भाजपा शासन काल में अब तक 500 से अधिक साम्प्रदायिक दंगे हो चुके है जिसमें अधिकांश उस उत्तर प्रदेश में हुए हंै जो देश विभाजन की तहरीक व उसके पश्चात राम मंदिर तहरीक मंे भी कमाबेश शान्त रहा था। कमजोर समाजवादी सरकार की नीतियाँ हिन्दू दहशतगर्दी को पूरा सहभोग दे रही हैं। उसके नेताओं की बयान बाजियाँ आग में घी का काम कर रही हैं। देश का माहौल तेजी से गृहयुद्ध की ओर बढ़ रहा है लेकिन केन्द्र सरकार नीरों की तरह बंसी बजा रही है। देशवासियों को उस सुन्दर भविष्य के सपने दिखा रही है जो बगैर साम्प्रदायिक सद्भावना व अहिंसा के सम्भव ही नहीं है। अभी भी समय है देशवासियों को सोचना चाहिए कि जब 99 प्रतिशत एक धर्म के लोगों द्वारा इस्लामी राष्ट्र का प्रयोग पाकिस्तान में सफल न हो सका तो 20 प्रतिशत गैर हिन्दू आबादी वाले भारत में हिन्द राष्ट्र की स्थापना क्या गुल खिलाएगी?
   साम्राज्यी शक्तियों ने जिस प्रकार धार्मिक आतंकवाद के द्वारा मध्य एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया व उपमहाद्वीप को रक्त रंजित किया है और इंसानियत के नाम पर इंसानी जाने लेने का जो क्रम अमरीका व इसके सहयोगी राष्ट्र ईराक, लीबिया में खेल चुके हंै और अपने नए कामयाब हथियार सोशल मीडिया के द्वारा जिस प्रकार इस क्षेत्र में वह अराजकता का माहौल बना कर अपने उद्देश्यों को
साधने में लगे हुए हैं यह विश्व शान्ति एवं जनसुरक्षा के लिए कतई ठीक नहीं है। पहले दो विश्वयुद्धों में यूरोप ही प्रभावित हुआ था एशिया का कुछ अंश ही प्रभावित हुआ। परन्तु अब लगता है तृतीय विश्वयुद्ध का रणक्षेत्र एशिया व अफ्रीका के मध्य रहेगा और उसका तमाशा यूरोप में अपने ड्राइंग रूम में बैठकर उसी प्रकार देखेंगे जैसे जार्ज बुश ईराक पर हवाई हमलों की बमबारी व मिजाइल हमलों का नजारा देखकर ठहाके लगा रहे थे।
-तारिक खान
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
 मो0-09455804309

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

अमरीकी दहशतगर्दी का शिकार एशिया-----------------2

 
साम्राज्यी शक्तियों को करारा झटका उस समय लगा जब उनके पिट्ठू पाकिस्तान ने भी भुट्टो के नेतृत्व में आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर अपने कदम बढ़ाने शुरू किए। भारत की सोशलिस्ट आर्थिक नीतियों पर चलते हुए भुट्टो ने भी अपने देश में कुटीर उद्योगों व घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और साम्राज्यवादी शक्तियों का पाकिस्तानी बाजार पर आधिपत्व समाप्त होता नजर आने लगा। इसी दौरान अरब इस्राईल युद्ध छिड़ गया और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो जिनके रिश्ते अमरीका से काफी खराब हो चुके थे, ने सऊदी अरब के शाह फैसल को इस्राईल के समर्थक साम्राज्यी राष्ट्रों के विरुद्ध पेट्रोल बम्ब का प्रयोग किया। सारे अरब देशों में साम्राज्यी शक्तियों के द्वारा संचालित तेल शोधक कार्य बंद हो गया, पूरे विश्व में तेल के अभाव से हाहाकार मच गया। परिणाम स्वरूप इस्राईल के अरब राष्ट्रों की ओर बढ़ते हुए कदम ठिठक गए और साम्राज्यी शक्तियों के सरदार अमरीका ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस्राईल को युद्धविराम के लिए विवश कर दिया।
       अपनी इस शिकस्त का बदला साम्राजी शक्तियों ने शाह फैसल का कत्ल उनके सगे भतीजे से कराकर तुरन्त ले लिया। उसके पश्चात मिश्र के राष्ट्रपति अनवर सादात को उन्हीं के फौजी जनरल ने परेड की सलामी लेते समय गोलियों की बौछार कर कत्ल कर डाला। अब नम्बर आया जुल्फिकार अली भुट्टो व भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का। पहले दोनों की राजनैतिक हत्या का प्रोग्राम बनाया गया। दोनों देशों के अन्तरिक हालात बिगाड़े गए। पाकिस्तान में बलूचिस्तान व पख्तूनिस्तान की समस्या में तेजी पैदा की गई और भारत से पाकिस्तान जाकर बसे मुहाजरीन की तंजीम कौमी मुहाजिर मूवमेन्ट के अगवाकार अलताफ हुसैन के ऊपर साम्राज्यी शक्तियों ने हाथ रखकर भुट्टो की परेशानियाँ बढ़ाई गईं। दूसरी ओर इंदिरा गांधी की साम्राज्य विरोधी नीतियो से परेशान साम्राज्यवादी शक्तियों ने गांधी वादी विचारधारा के मानने वाले कहे जाने वाले लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान करा के देशव्यापी आन्दोलन पैदा कर देश में राजनैतिक अस्थिरता अराजकता उत्पन्न कर दी। इस आन्दोलन में जहाँ एक ओर साम्राज्यी शक्तियों की नीतियों के समर्थक जनसंघ के लोग थे तो वहीं डाॅ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा के समर्थकों का समर्थन प्राप्त रहा और सबसे अधिक अचम्भित करने वाली बात इस आन्दोलन की यह रही कि वामपंथी विचारधारा के लोगों का भी समर्थन इसे प्राप्त हो गया।
      परिणाम स्वरूप देश के बिगड़ते हालात को दृष्टिगत रखते हुए इन्दिरा गांधी ने देश मे आपातकाल घोषित कर दिया और लोकतंत्र की हत्या कर डिक्टेटर की भूमिका में वह सामने आ गईं। इसका नतीजा यह निकला कि देश के गरीबों, अल्पसंख्यकों व अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों से उनकी पार्टी कांग्रेस के रिश्ते बिगड़ गए। इन्दिरा गांधी के इर्द-गिर्द मौजूद संघी विचारधारा के सलाहकारों ने उनसे जबरन नसबंदी व तुर्कमानगेट दिल्ली में मुस्लिम वर्ग के दुकानदारों के ऊपर बर्बर लाठी चार्ज जैसे काम करवा कर मुस्लिम वर्ग को उनसे जुदा कर दिया साथ ही पिछड़े व दलित तबके के लोग भी कांग्रेस से दूर होते चले गए।
    इन्दिरा गांधी को सत्ता से हटाने के लिए प्रेस ने भी कमर कस ली, बदले में पत्रकारों को भी इन्दिरा गांधी ने जेलांे में ठूस दिया। लगभग ढाई वर्ष तक देश में इंदिरा गांधी की नादिर शाही हुकूमत कायम रही जिसका जवाब जनता ने 1977 में हुए आम चुनाव में जनता पार्टी को सफल व कांग्रेस को शिकस्त देकर दे दिया। पहली बार देश में गैर कांग्रेसी हुकूमत कायम हुई और
प्रधानमंत्री पद पर साम्राज्यी नीतियों के समर्थक मोरारजी देसाई विराजमान हुए। परन्तु जनता पार्टी के चूं-चूं का मुरब्बा हुकूमत के दिन अधिक नहीं रहे। मात्र सवा दो वर्ष में ही जनसंघ के सदस्यों की आरएसएस के साथ रिश्तों के चलते आए उबाल से सरकार का पतन हो गया और वर्ष 1980 में हुए आम लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी को क्षमादान देकर देश की जनता ने कांग्रेस को पुनः सत्ता में वापस लाकर राष्ट्र का भविष्य उसके हाथों में सौंप दिया।
       साम्राज्यी शक्तियों को इन्दिरा  गांधी की सत्ता में वापसी से बहुत हताशा हुई। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में भी अमरीका जुल्फिकार अली भुट्टों के हाथों काफी उत्पीडि़त रहा। वर्ष 1977 में जब इन्दिरा गांधी को सत्ता से हटाने में अमरीका कामयाब हो गया था तो जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी राजनैतिक कुटनीतिक चालों से अमरीका को छलते हुए सत्ता दुबारा प्राप्त कर ली। अमरीका ने पाकिस्तान में सेना द्वारा एक बार फिर प्रजातंत्र का गला घोंट डाला और एक धार्मिक कट्टरपंथी जनरल जियाउल को सत्ता में बैठा दिया, जिसने अमरीका के इशारे पर जुल्फिकार अली भुट्टो पर फर्जी आरोपों का मुकदमा चलवा कर तमाम अन्तर्राष्ट्रीय जनमत की उपेक्षा कर जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी के तख्ते पर लटका दिया।
    जुल्फिकार अली भुट्टो के बाद साम्राज्यी शक्तियों का अगला निशाना इन्दिरा गांधी को बनाया गया। इसके लिए उन्हें पाकिस्तान की आईएसआई से पूरी मदद मिली। जिसने खालिस्तान आन्दोलन को हवा  देकर सिक्खों को भारत के विरुद्ध बगावत के लिए उकसाया जिसका दुष्परिणाम आॅपरेशन ब्लूस्टार के रूप में सामने आया और पूरी सिक्ख कौम इन्दिरा गांधी के विरुद्ध उठ खड़ी हुई।
    इसके पश्चात इन्दिरा गांधी को उन्हीं के सिक्ख सुरक्षा कर्मियों ने प्रधानमंत्री  आवास में गोलियों से भूनकर आपरेशन ब्लू स्टार का बदला ले लिया। उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार महात्मा गांधी को मारने वाले हाथ नाथूराम गोड्से के थे परन्तु दिमाग किसी और का, उसी प्रकार इन्दिरा गांधी की हत्या भले ही उनके सुरक्षा कर्मियों ने की लेकिन साजिश रचने वाला दिमाग साम्राज्यवादी शक्तियों का था।
-तारिक खान
क्रमस :
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

अमरीकी दहशतगर्दी का शिकार एशिया-----------------1

साम्राज्यवादी शक्तियों ने वर्तमान समय में न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया, दक्षिण एशिया, मध्य एशिया व अफ्रीका को अपने चंगुल में दबा रखा है और इन सभी राष्ट्रों में पूँजीवाद का दानव इंसानियत को शर्मसार करने वाले मजालिम ढाते हुए अपने मकसद को हासिल करने में लगातार जुटा हुआ है। एक-एक करके सारे देशों की प्राकृतिक सम्पदा एवं उनका खनिज खजाना लूटता चला जा रहा है।
       लोकतंत्र की आड़ में अपना साम्राज्यवादी निजाम पूरे विश्व में स्थापित करने में बहुत तेजी के साथ साम्राज्यी शक्तियाँ लगी हुई हैं, उन्होंने अपने उद्देश्यों की पूर्ति में बाधक बनने वाले विश्व के तमाम बड़े लीडरों को एक-एक करके ठिकाने लगा डाला है, चाहे सद्दाम हुसैन हों या कर्नल गद्दाफी चाहे महात्मा गांधी हों या इन्दिरा गांधी। भारत में साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपना पहला निशाना बनाया 79 वर्ष के महात्मा गांधी को। उनका कत्ल करने वाले हाथ तो नाथू राम गोड्से के थे परन्तु दिमाग साम्राज्यी शक्तियों व उनके एजेन्टों का था। कहा तो यह गया कि नाथूराम गोड्से भारत के खजाने से 50 करोड़ रूपया पाकिस्तान को देने के लिए राजी हो चुके महात्मा गाधी से नाराज था इसीलिए उसने उनकी हत्या कर दी, परन्तु यह बात सत्य नहीं है।
    वास्तव में साम्राज्यी शक्तियों को शिकस्त देकर हिन्द महासागर से खदेड़ देने वाले वृद्ध व्यक्ति महात्मा गांधी को साम्राजवादी शक्तियों ने इसलिए मारा कि वह समाजवाद और गरीबों के पक्षधर तथा साम्राज्यवादी व्यवस्था के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने ही असहयोग आन्दोलन के जरिए इन शक्तियों की आर्थिक कमर तोड़ कर उन्हें भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। बाकी काम द्वितीय विश्वयुद्ध ने कर दिखाया था
    गांधी की हत्या के बावजूद भारत में साम्राज्यी शक्तियाँ कई वर्षों तक अपने कदम जमा न सकीं और पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व व उनकी दूरदर्शिता के चलते भारत को आर्थिक, सामाजिक एवं वैज्ञानिक रूप से मजबूत एवं आत्मनिर्भर बनाने का ढांचा बना लिया गया। इस काम में पंडित नेहरू को सोवियत यूनियन से बहुमूल्य मदद प्राप्त हुई।
    परन्तु पंडित नेहरू दो सुपर शक्तियों     के बीच से अपना रास्ता निकालने के पक्षधर थे। अतः उन्होंने यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटू व मिश्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का एक समूह बनाया जिसमें सभी विकासशील देशों ने अपनी सहभागिता निभाई। साम्राज्यवादी शक्तियों को भला यह बात कहाँ कुबूल थी सो उन्होंने नेहरू को पड़ोसी राष्ट्र चीन से भिड़ाने की योजना बना डाली और तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को मैदान में उतार नेहरू से चीन को लड़ाने की योजना पर अपना काम शुरू कर दिया। नतीजा साम्राज्यी शक्तियों की इच्छानुसार निकला और चीन ने भारत पर न केवल हमला कर दिया बल्कि डेढ़ लाख वर्ग मीटर जमीन पर कब्जा भी कर लिया।
         पंडित जवाहर लाल नेहरू की विदेशी एवं सुरक्षा नीतियों का जमकर विरोध विपक्षी पार्टियों जिनका नेतृत्व आरएसएस की राजनैतिक जमात जनसंघ कर रहा था, ने करना शुरू कर दिया। इन सबसे परेशान पंडित नेहरू की हृदयाघात से मृत्यु हो गई और लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। अभी चीन के द्वारा दिए गए आघात से भारत सँभल भी न सका था कि साम्राज्यी शक्तियों के इशारे पर एक दूसरे पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया।
    भारत के मित्र राष्ट्र ने साम्राज्यी शक्तियों की चालों में फँसते भारत को सहारा देने के लिए कदम बढ़ाए और ताशंकद में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री व पाक राष्ट्रपति मिलिट्री शासक जनरल अय्यूब खां को बुलाकर वार्ता उपरान्त समझौता कराने में सफलता प्राप्त कर ली। इससे हतोत्साहित साम्राज्यवादी शक्तियों ने भारत में मौजूद अपने सहयोगी राजनैतिक दलों से विरोध कराना शुरू कर दिया। योजना यहाँ तक बनाई गई कि लाल बहादुर शास्त्री का स्वागत दिल्ली एयरपोर्ट पर काले झण्डों से किया जाएगा। इन खबरों से लाल बहादुर शास्त्री को इतना सदमा पहँुचा कि जिंदा भारत न आ पाए, उनका पार्थिव शरीर भारत पहुँचा।
    भारत में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल पैदा कर साम्रज्यी शक्तियाँ प्रसन्न थीं कि अब कांग्रेस के पास नेहरू की समाजवादी नीतियों की गाड़ी आगे बढ़ाने वाला कोई लीडर नहीं बचा। इंदिरा गांधी अपने पिता पंडित नेहरू की उँगली पकड़ राजनीति का सबक सीख ही रही थीं, लेकिन शास्त्री जी की असामयिक मृत्यु के बाद भारत की सत्ता की डोर सँभालने वाली इंदिरा गाधी जिन्हें उस समय के निपुण राजनेता अटल बिहारी बाजपेयी ने गूँगी गुडि़या के खिताब से नवाजा था, ने अपने नेतृत्व एवं राजनैतिक योग्यता के ऐसे जौहर दिखलाए कि उन्हीं अटल बिहारी बाजपेयी को एक दिन उन्हें दुर्गा का अवतार कहना पड़ा।
    इंदिरा गांधी के दौर में भारत के कदम तेजी के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने लगे। उनकी तेजी से परेशान साम्राज्यी शक्तियों ने उपमहाद्वीप में अपने सबसे चहीते एजेन्ट पाकिस्तान का इस्तेमाल फिर भारत के विरुद्ध किया। उन्होंने पहले तो उस पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी जिसका असर दो कौमी विचाराधारा पर हुआ और लाखों की तादाद में बंगलादेशी पाक सेना के जुल्म से असुरक्षित होकर भारत में घुसने लगे। इंदिरा गांधी ने मुक्ति वाहिनी का समर्थन किया बदले में पाकिस्तान ने     इंदिरा गांधी के दौर में भारत के कदम तेजी के साथ आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने लगे। उनकी तेजी से परेशान साम्राज्यी शक्तियों ने उपमहाद्वीप में अपने सबसे चहीते एजेन्ट पाकिस्तान का इस्तेमाल फिर भारत के विरुद्ध किया। उन्होंने पहले तो उस पाकिस्तान में गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी जिसका असर दो कौमी विचाराधारा पर हुआ और लाखों की तादाद में बंगलादेशी पाक सेना के जुल्म से असुरक्षित होकर भारत में घुसने लगे। इंदिरा गांधी ने मुक्ति वाहिनी का समर्थन किया बदले में पाकिस्तान ने अपना तीसरा हमला भारत पर कर दिया परन्तु इस बार पाकिस्तान को इंदिरा गांधी ने सबक सिखाने वाली शिकस्त देकर उसकी ईंट से ईंट बजा डाली, पाक सेना के 90 हजार फौजी बंदी बनाए गए, कई सौ किमी0 जमीन भी भारत के कब्जे में आ गई, परन्तु पाकिस्तान में तख्ता पलट होने के बाद सत्ता में आए जुल्फिकार अली भुट्टो ने शिमला में इंदिरा गांधी से संधि करके न केवल नियंत्रण रेखा स्थापित की बल्कि भारत से वह अपने युद्ध बंदी फौजी व कब्जा हुआ इलाका भी वापस ले जाने में सफल रहे।
 -तारिक खान
क्रमस :
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

शनिवार, 2 नवंबर 2013

पटेल ने भारत को मजबूत बनाया, नेहरू ने आधुनिक

यह अत्यधिक दुःखद है कि नरेन्द्र मोदी यह दावा कर रहे हैं कि जवाहरलाल नेहरू के स्थान पर यदि सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश की तस्वीर अलग ही होती। वैसे तो मोदी अपने तर्कों के समर्थन में प्रायः झूठ का सहारा लेते हैं। झूठ बोलने की श्रृंखला में उन्होंने अभी हाल में यह तक कह डाला था कि नेहरू, पटेल की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हुए थे। पलक झपकते ही मोदी के इस झूठ की पोल खुल गई।
दिनांक 29 अक्टूबर को अहमदाबाद में आयोजित एक समारोह में मोदी ने दावा किया कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की तस्वीर और होती। वैसे तो इतिहास की किसी भी घटना के बारे में किसी भी प्रकार का तर्क दिया जा सकता है। इतिहास में घटित घटनाओं की मीमांसा अनेक प्रकार से हो सकती है। यदि ऐसा होता तो क्या होता, यदि वैसा होता तो क्या होता यह मूलतः व्यर्थ की वैचारिक जुगाली के अतिरिक्त कुछ नहीं है। परन्तु जहां तक नेहरू-पटेल की तुलना का सवाल है, कुछ बुनियादी तथ्यों को याद रखा जाना आवश्यक है।
एक बार महात्मा गांधी से पूछा गया था कि वे किसे आजाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। इस पर उनका उत्तर था कि मेरे साथियों में दर्जनों ऐसे लोग हैं जिनमें प्रधानमंत्री बनने की काबलियत है परन्तु प्रधानमंत्री पद के लिए मेरी पहली पसंद नेहरू हैं। महात्मा गांधी के अतिरिक्त, देश के करोड़ों नागरिक भी नेहरू को ही प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। कांग्रेस पार्टी के बहुत बड़े हिस्से की पसंद भी नेहरू थे। इसके साथ ही, नेहरू, आजाद भारत के उन नेताओं में से थे जिन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान ही भविष्य का भारत कैसा होगा, इसकी परिकल्पना की थी। आजादी के आंदोलन के दौरान, कांग्रेस ने एक योजना समिति की स्थापना की थी जिसके अध्यक्ष नेहरू थे। इस समिति ने भविष्य के भारत का एक विस्तृत खाका तैयार किया था। इस योजना के अन्र्तगत यह तय किया गया था कि आजाद भारत का स्वरूप समाजवादी होगा। आजाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र को विकसित किया जाएगा, जिसके अंतर्गत बुनियादीश्उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त, निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों की देश के विकास में निर्णायक भूमिका रहेगी। आजाद भारत में नेहरू के प्रयासो के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के प्रथम स्टील प्लांट की स्थापना भिलाई में हुई। इसी तरह, हैवी इलेक्ट्रिकल कारखाना  भोपाल में स्थापित हुआ। यह फैसला किया गया कि बिजली उत्पादन के कारखाने, सार्वजनिक क्षेत्र में होंगे। इसके साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र में अनेक बुनियादी उद्योग खोले गए। इससे एक औद्योगिक भारत के विकास के दरवाजे खुल गए।
औद्योगिक क्षेत्र के अलावा, कृषि के विकास के प्रति भी ध्यान दिया गया। बिना सिंचाई साधनों के, कृषि उत्पादन नहीं बढ़ सकता। इस उद्देश्य से बड़े-बड़े बांधों की नींव डाली गई। आजाद देश का प्रथम बड़ा भाखड़ा नंगल बांध पंजाब में सतलुज नदी पर बना। नेहरू जी ने स्वयं उसका उद्घाटन किया। आधुनिक भारत के बड़े कारखानों और बांधों को नेहरू ने आधुनिक मंदिर बताया। देश के औद्योगिकरण के लिये प्रतिभावान वैज्ञानिकों की जरूरत पड़ना स्वाभाविक है। वैज्ञानिक तैयार हो सकें, इस उद्देश्य से आई. आई. टी. की स्थापना की गई।
राजनीतिक दृष्टि से भी भारत एक आधुनिक देश बने इसलिए देश के सभी वयस्क नागरिकों को मताधिकार दिया गया। उस समय देश में साक्षरता का प्रतिशत शायद दस ही था। परन्तु अशिक्षितों को भी सरकार चुनने का अधिकार मिला। नेहरू जी के प्रयासों से ही ऐसा संविधान बना जिसके अंतर्गत सभी नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले। मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की नींव डाली गई। सर्वशक्तिमान संसद की स्थापना की गई। पांच वर्ष में आवश्यक रूप से चुनाव होंगे, इसकी संवैधानिक व्यवस्था की गई।
नेहरू जी को इतिहास का गहरा ज्ञान था। उनकी किताबें ‘विश्व इतिहास की झलक’, ‘भारत एक खोज’ आदि इसका प्रतीक हैं। उन्होंने भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन किया था। राजनीति में प्रवेश के पहले, लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा की और देश की जनता की समस्याओं से रूबरू हुए। देश के अतिरिक्त, उन्होंने अनेक बार विदेशों की यात्राएं भी कीं थीं। विश्व के अन्य देशों के आजादी के आंदोलनों का समर्थन, उन देशों में जाकर किया। उन्होंने अनेक बार दुनिया के प्रथम समाजवादी देश सोवियत रूस की यात्रा की। वे सोवियत संघ के प्रशंसकों में से थे। सोवियत क्रांति ने उनके चिंतन को काफी प्रभावित किया। उन्होंने यूरोप में फासीवाद और नाजीवाद के बढ़ते खतरे से भारत के अलावा पूरे विश्व को आगाह किया था। एक बार रोम से गुजरते हुए उन्होंने मुसोलनी से मिलने से इंकार कर दिया था।
आजाद भारत के अलावा, उन्होंने एशियाई देशों की एकता की आवश्यकता प्रतिपादित की थी। इस उद्देश्य से 1946 में उन्होंने दिल्ली में एशियाई देशों का सम्मेलन आयोजित किया था। इस सम्मेलन में शामिल राष्ट्रों में से बहुसंख्यक ऐसे थे जो उस समय आजादी के लिये संघर्षरत थे। इस सम्मेलन का उद्घाटन महात्मा गांधी ने किया था। भारत के आजाद होने के बाद, एशियाई देशों का एक विशाल सम्मेलन इंडोनेशिया के शहर बांडुंग मंे आयोजित हुआ। इस सम्मेलन के आयोजन में नेहरू जी की प्रमुख भूमिका थी। इस सम्मेलन में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई भी शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में एशियाई देशों के आपसी संबंधों के लिए जो सिद्धांत तय किए गए थे उन्हें पंचशील का नाम दिया गया था।
कुछ समय बाद, इन देशों को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास नेहरू जी ने किया। इस प्रयास को गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य भारत को पूंजीवादी और समाजवादी गुटों से दूर रखना था।
इसके अतिरिक्त, नेहरू जी के कारण ही भारत एक सेक्यूलर देश बन सका। अनेक लोगों का प्रयास था कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने। मोदी शायद सोचते हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाता। मेरी राय में मोदी की यह सोच गलत है। नेहरू जी की तरह, पटेल की भी सेक्यूलर आदर्शों में अगाध आस्था थी।
अंत मंे यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पटेल के समर्थन से ही नेहरू प्रधानमंत्री बने थे। पटेल इतने बड़े संगठनकर्ता थे और कांग्रेस पर उनकी इतनी पकड़ थी कि वे कभी भी नेहरू का तख्ता पलट सकते थे। सच पूछा जाए तो पटेल ने नेहरू जी को हमेशा अपना छोटा भाई माना और उन्होंने जीवनभर उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया। मोदी के अलावा, संघ परिवार की ओर से पहले भी ऐसी बातंे की गई हैं कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बनते तो देश की शक्ल और होती। पटेल ने देश की सीमाओं को बढ़ाया। भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने भारत को आधुनिक राष्ट्र बनाया। नेहरू-पटेल दोनों ही आज के भारत के महान नेता थे। सबसे बड़ी बात है कि दोनों महात्मा गांधी के चेले थे। मोदी को दोनों की तुलना करने से बाज आना चाहिए। मोदी में बांटने की बड़ी ताकत है। वे देश को बांट रहे हैं, उसके साथ ही वे नेहरू-पटेल के बीच भी विभाजन की रेखा खींच रहे हैं।
एक बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि तथाकथित लौहपुरूष आडवाणी ने 2002 के दंगों के बाद मोदी की सरकार को बर्खास्त नहीं किया। परन्तु यदि उस समय पटेल देश के गृहमंत्री होते तो वे मोदी की सरकार को तुरंत बर्खास्त कर देते। 
-एल.एस. हरदेनिया

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक

दक्षिण एशिया में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने ऐसी नीतियां अपनाईं जिनसे आमजन साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि धार्मिक पहचान, अन्य पहचानों-जैसे क्षेत्रीय, भाषायी व लैंगिक-से अधिक महत्वपूर्ण बन र्गइं। भारत में 19वीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेज शासकों ने सीमित मताधिकार के आधार पर स्थानीय संस्थाओं के चुनाव करवाने शुरू किए। उनका कहना था कि यह देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरूआत का प्रयास है। परंतु इसने देश को विभाजित किया। तत्कालीन समाज पिछड़ा हुआ था व उसकी सोच सामंती थी। इस पृष्ठभूमि में, उम्मीदवारों को चुनावों में समर्थन और वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पहचान का उपयोग, सबसे आसान रास्ता नजर आया।
यह भांपकर कि इन चुनावों के जरिए अंग्रेज देश पर अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहते हैं, सर सैय्यद अहमद खान ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर हिन्दू पार्टी का लेबिल चस्पा कर दिया और मुसलमानों से आव्हान किया कि वे उससे दूर रहें। औपनिवेशिक शासन के प्रति मुसलमानों की कोई सामूहिक रणनीति नहीं थी। बदरूद्दीन तैयबजी और कई अन्य मुसलमानों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंध बनाए रखे और सर सैय्यद के आव्हान को नजरअंदाज कर दिया। तैयबजी तो आगे चलकर कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। सर सैय्यद का प्रयास यह था कि मुसलमानों को उनकी परंपरा-जनित जड़ता से बाहर निकाला जाए और अंग्रेजी शिक्षा को एक हथियार बतौर इस्तेमाल कर, उनमें आधुनिक सोच को बढ़ावा दिया जाए। सर सैय्यद, इस्लाम की पुनव्र्याख्या करना चाहते थे और मुसलमानांे के दिमागों मंे घर कर चुके जालों को हटाना चाहते थे। मुसलमानों के धार्मिक श्रेष्ठि वर्ग ने पश्चिमी औपनिवेशिक संस्कृति का प्रतिरोध किया और इसके कारण, मुस्लिम समुदाय का झुकाव कट्टरता और परंपरागतता की ओर हो गया। गुजरे हुए वक्त को वापिस लाने के प्रयास में मुस्लिम समुदाय, कुएं का मेढ़क बन गया।
मुस्लिम समुदाय में साम्प्रदायिकता व अल्पसंख्यक होने का भाव दो प्रक्रियाओं की प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न हुआ। पहली थी धार्मिक और सामंती श्रेष्ठि वर्ग द्वारा ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का प्रतिरोध और दूसरी, पश्चिमी शिक्षा हासिल कर औपनिवेशिक शासनतंत्र में स्थान पाने की इच्छा। पहली प्रक्रिया औपनिवेशिक शासकों के हाथों में सत्ता चले जाने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी जबकि दूसरी, औपनिवेशिक शासन के यथार्थ को स्वीकार कर और उसका हिस्सा बन, समुदाय का सशक्तिकरण करने की रणनीति। विडंबना यह है कि दोनों का एक ही नतीजा हुआ-अर्थात मुसलमानों में अल्पसंख्यक होने के भाव का घर कर जाना। 19वीं सदी की शुरूआत में प्रारंभ हुए वहाबी और फरीजी आंदोलन, पहली प्रक्रिया के उदाहरण थे अर्थात ब्रिटिश शासन का प्रतिरोध। सर सैय्यद अहमद खान का अंग्रेजी शिक्षा पर जोर, दूसरी रणनीति का उदाहरण था, जिसका उद्धेश्य था समुदाय के सदस्यों को ब्रिटिश नौकरशाही और सत्ता के ढांचे में स्थान दिलवाना।
धार्मिक श्रेष्ठि वर्ग, उलेमा और मौलवियों ने समुदाय को औपनिवेशिक शासन का प्रतिरोध करने के लिए गोलबंद करने के उद्धेश्य से धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक मंचों का इस्तेमाल किया। इस्लामिक पुनरूत्थानवादियों का उद्धेश्य था औपनिवेशिक शासन का विरोध, पश्चिमी संस्कृति का प्रतिरोध और लोगों की रोजाना की जिंदगी पर पश्चिम के प्रभाव को कम करना। इसके लिए वे अन्य ब्रिटिश विरोधी ताकतों और भारतीय राष्ट्रवादियों से हाथ मिलाने के लिए तैयार थे। इस पुनरूत्थानवादी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे धार्मिक श्रेष्ठि वर्ग को उम्मीद थी कि भविष्य में जो भी व्यवस्था अस्तित्व में आएगी उसमें मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करने की पूरी आजादी होगी। वहाबी और फरियाजी पुनरूत्थानवादी आंदोलनों को 19वीं सदी के मध्य तक सख्ती से कुचल दिया गया। इसके बाद, ब्रिटिश शासन के पुनरूत्थानवादी विरोधियों ने इस्लाम की शुद्धता को बनाए रखने और मुसलमानों का धार्मिक मसलों में पथप्रदर्शन करने के लिए देवबन्द में दारूल उलूम की स्थापना की। धार्मिक पुनरूत्थानवादियों का मूल लक्ष्य अंग्रेजी शासन का विरोध था और यही कारण है कि देवबन्द ने हमेशा भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का साथ दिया। हां, देवबन्द यह आश्वासन अवश्य चाहता था कि भविष्य में जो भी तंत्र स्थापित होगा उसमें मुसलमानों को धार्मिक आजादी मिलेगी।
मुस्लिम लीग को सर सैय्यद के आधुनिकीकरण और सुधार कार्यक्रमों से लाभ हुआ। पुनरूत्थानवादियों और औपनिवेशिक शासन के उनके प्रतिरोध के विपरीत, सुधारक और आधुनिकतावादी, हिन्दू समुदाय को अपना प्रतियोगी मानते थे। वे यह भी मानते थे कि हिन्दू, सत्ता में भागीदारी हासिल करने की उनकी इच्छा को पूरा करने में बाधक हैं। बीच-बीच में ये लोग सत्ता में अधिक भागीदारी के लिए ब्रिटिश शासकों से हाथ मिला लेते थे तो कभी-कभी शासकांे द्वारा नजरअंदाज कर दिए जाने के बाद, वे राष्ट्रवादी आंदोलन से जुड़ने की कोशिश करते थे ताकि उनकी मांगें पूरी हो सकें। परंतु चाहे ब्रिटिश शासकों के साथ मोलभाव हो या राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ-दोनों ने साम्प्रदायिक सोच को बढ़ावा दिया और इसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम समुदाय को एक अलग राष्ट्र कहा जाने लगा। साम्प्रदायिक राष्ट्रवादी हिन्दू समुदाय को अपने लिए एक समस्या बताने लगे और अंग्रेज शासकों से मिलकर अपने लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करने लगे।
मुस्लिम श्रेष्ठि वर्ग में अल्पसंख्यक होने के भाव का उदय और बहुसंख्यक समुदाय को अपना प्रतियोगी और यहां तक कि शत्रु मानने की प्रवृत्ति से औपनिवेशिक शासकों को लाभ हुआ। ब्रिटिश शासकों ने मुसलमानों में अल्पसंख्यक होने के भाव को और बढ़ावा दिया। इसके लिए उन्होंने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और अतीत को ‘मुस्लिम काल‘ और ‘हिन्दू काल‘ में विभाजित किया। उन्होंने ऐसा साम्प्रदायिक रिअर व्यू मिरर लगाया जिसमें झांकने पर भूतकाल की हर घटना साम्प्रदायिक रंग में रंगी दिखने लगी। पृथक मताधिकार और ब्रिटिश शासकों द्वारा लिए गए कई अन्य निर्णयों ने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। सन् 1905 में धार्मिक आधार पर बंगाल के विभाजन, जनगणना व धार्मिक परंपराओं और प्रथाओं के दस्तावेजीकरण सहित कुछ अन्य कदमों के कारण समुदाय में साम्प्रदायिकता के भाव ने और जोर पकड़ा। ब्रिटिश नीतियों ने मुसलमानों में अल्पसंख्यक होने के भाव को बढ़ावा दिया, अल्पसंख्यक अधिकारों पर विमर्श की नींव रखी और अलगाववाद को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार, अल्पसंख्यक होने का भाव, ब्रिटिश शासन की देन और उसक प्रतिक्रिया दोनों थीं। इसी तरह, हिंदुत्व की मूल प्रकृति भी राजनैतिक थी और उसका उदय वी.डी. सावरकर के लेखन से हुआ, जिसमें मुसलमानों व ईसाईयों को विदेशी व हिन्दुओं के हितों का विरोधी निरूपित किया गया और जिसमें हिन्दू राष्ट्रवादियों से आह्वान किया गया कि वे हिन्दू हितों की रक्षा के लिए आगे आएं। मुस्लिम राष्ट्रवादियों की तरह, हिन्दू राष्ट्रवादी भी ब्रिटिश को अपना मित्र मानते थे।
जैसे-जैसे धर्म, भारतीय उपनिवेश के नागरिकों की पहचान को परिभाषित करने का मुख्य माध्यम बनता गया, दोनों समुदायों में एक सांप्रदायिक कुलीन वर्ग उभरने लगा जो ब्रिटिश शासकों से अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने की जद्दोजहद में जुट गया। जाहिर है कि इससे औपनिवेशिक शासकों को मान्यता व वैधता मिली। सांप्रदायिक श्रेष्ठि वर्ग, जिसके अधिकांश सदस्य सामंती तत्व थे, ने धार्मिक प्रतीकों व धार्मिक विमर्श का इस्तेमाल कर, अपने-अपने धर्मों के लोगों को अपने साथ जोड़ना प्रारंभ कर दिया। वे सांप्रदायिक पहचान पर जोर देने लगे व सांझा क्षेत्रीय, सांस्कृतिक, भाषायी व ऐतिहासिक जुड़ाव की महŸाा को कम करके बताने लगे। इससे रोजमर्रा के जीवन में मानवीय मूल्यों का क्षरण हुआ। अपने-अपने धर्मों को एकसार बनाने के लिए उन्होंने चुनिंदा धार्मिक परपंराओं का इस्तेमाल किया।  अन्य पंरपराओं को या तो त्याग दिया गया या उनमें इस प्रकार के परिवर्तन कर दिए गए जिनसे धार्मिक-सांस्कृतिक प्रथाओं को एकसार बनाया जा सके। अपने धर्म के अनुयायियों को एक करने के लिए सांप्रदायिक श्रेष्ठि वर्ग ने न केवल अपने धर्म की धार्मिक परंपराओं और प्रतीकों का इस्तेमाल किया बल्कि ‘‘दूसरे’’ समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं को भी एकसार बताने का प्रयास किया। उन्होंने एक धार्मिक समुदाय की पहचान को दूसरे समुदाय की पहचान की विरोधी और उसके अस्तित्व के लिए खतरा बताना प्रारंभ कर दिया।
अतः, दक्षिण एशिया में राजनैतिक प्रक्रिया और उपनिवेश के इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने के प्रयास से धर्म-आधारित धार्मिक पहचानों का उद्भव हुआ। इन पहचानों के हित परस्पर विरोधी हैं, ऐसा प्रतिपादित किया गया। इससे संख्यात्मक दृष्टि से कमजोर समुदाय के श्रेष्ठि वर्ग में अल्पसंख्यक होने के भाव ने घर कर लिया। इस प्रक्रिया से अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक वर्ग दो विरोधी धु्रव बन गए। अपने-अपने समुदाय की संख्यात्मक शक्ति के आधार पर अधिकारों के लिए मोलभाव होने लगा।
सन् 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के नक्शे में नई सीमाएं खींचने से अल्पसंख्यकों की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ-न सीमा के इस पार और न उस पार। बल्कि उनकी समस्याएं बढ़ी हीं। नक्शे में नई रेखाएं खींचने से भड़की हिंसा ने सीमा के दोनांे ओर लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया। एक देश के बहुसंख्यक, दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गए। दक्षिण एशिया के देशों का अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार के मामले में रिकार्ड कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। अल्पसंख्यक समुदायों पर बहुसंख्यक विश्वास नहीं करते, उनके साथ राज्य व उसके अधिकारी भेदभाव करते हैं, उन्हें उनके धर्म का पालन करने से रोका जाता है और उन्हें सिर्फ इसलिए प्रताडि़त किया जाता है क्योंकि वे बहुसंख्यकों से अलग हैं। पाकिस्तान में ईसाई, हिन्दू, अहमदिया और शिया हिंसा के शिकार बन रहे हैं। शियाओं को मस्जिदों के अंदर मौत के घाट उतारा जा रहा है, अहमदियों पर असंख्य अत्याचार हो रहे हैं, हिन्दुओं को जबरन धर्मपरिवर्तन करने पर मजबूर किया जा रहा है। हिन्दू महिलाओं की जबरदस्ती शादी कर उन्हें इस्लाम कुबूल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। ईसाईयों को ईशनिंदा कानून के फंदे में लेकर, उनके बच्चों तक को मौत की सजाएं सुनाई जा रही हैं।
भारत में, मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ बेजा हिंसा हो रही है। उन पर राज्य तंत्र भी अत्याचार कर रहा है। उन्हें राष्ट्रविरोधी, आतंकवादी व विश्वासघाती बता कर सुरक्षा एजेन्सियां उन पर निशाना साध रही हैं। सन् 1984 के सिक्ख-विरोधी दंगों में 4000 से अधिक सिक्खों की जान ले ली गई और लाखों घायल हुए। सच्चर समिति की रपट से साफ है कि सरकारी नौकरियों, शिक्षा, बैंकों से कर्ज, सरकारी ठेकों व राजनीति के क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव हो रहा है।
बांग्लादेश में भी दक्षिणपंथी, खुलेआम हिन्दू अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रहे हैं और उन्हें भारत मंे शरण लेने पर मजबूर कर रहे हैं। श्रीलंका में तमिल अल्पसंख्यकों के विरूद्ध चले लंबे युद्ध के दौरान उनके मानवाधिकारों के खुलेआम उल्लंघन के आरोप हैं। एलओसी के दोनों ओर रह रहे कश्मीरी, दो राष्ट्रों के बीच दशकों से चल रहे संघर्ष का नतीजा भोग रहे हैं।
दक्षिण एशिया को अल्पसंख्यक अधिकारों के एक घोषणापत्र की आवश्यकता है। इससे सभी देशों के नागरिक लाभान्वित होंगे क्योंकि जो समुदाय एक देश में बहुसंख्यक है वह दूसरे देश या देशों में अल्पसंख्यक है। अल्पसंख्यकों के अधिकारों का एक सर्वमान्य चार्टर तैयार करने से सभी समुदायों को लाभ होगा। दक्षिण एशिया, अल्पसंख्यकों को प्रजातांत्रिक हक देने के मामले में दुनिया के लिए एक माडल बन सकता है। पूरी दुनिया में अल्पसंख्यकों को तीन श्रेणियों के अधिकारों की आवश्यकता पड़ती है। पहला, साम्प्रदायिक या नस्लीय आधार पर भेदभाव से मुक्ति और सुरक्षा का अधिकार। दूसरा, अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार, अपनी भाषा व अपनी संस्कृति का ज्ञान अपनी अगली पीढि़यों को देने का अधिकार व तीसरा, राज्य द्वारा भेदभाव नहीं किए जाने का अधिकार। नस्लीय अल्पसंख्यकों को अपना शासक चुनने की भी सीमित स्वतंत्रता होनी चाहिए। ये अधिकार अल्पसंख्यकों को तभी उपलब्ध करवाए जा सकते हैं जब हम बहुसंस्कृतिवाद को आदर्श बतौर स्वीकार करें और यह भी स्वीकार करें कि राज्य को उसके नागरिकों के सांस्कृतिक अधिकारों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
हमारे सामने लियाकत-नेहरू संधि का उदाहरण है जो विभाजन के बाद हुए भयावह दंगों के बीच, सन् 1950 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित की गई थी। लियाकत-नेहरू संधि एक द्विपक्षीय संधि थी जिसका उद्धेश्य था दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी और दोनों देशों के बीच युद्ध की संभावना को समाप्त करना। दक्षिण एशिया के सभी देशों के बीच इस तरह की संधि की जरूरत है।
 -इरफान इंजीनियर

सोमवार, 12 नवंबर 2012

नेहरू ही हैं आधुनिक भारत के निर्माता

1945 के शिमला सम्मेलन के लिए जाते हुए ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खां, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल
14 नवम्बर जयंती पर विशेष
हमारे देश के कुछ संगठन, विशेषकर संघ परिवार के सदस्यए जब भी सरदार वल्लभभाई पटेल की चर्चा करते हैं, वे उनके बारे में दो बातें अवश्य कहते हैं। पहली यह कि सरदार पटेल आज के भारत के निर्माता हैं और दूसरी यह कि यदि कश्मीर की समस्या सुलझाने का उत्तरदायित्व सरदार पटेल को दे दिया जाता तो पूरे कश्मीर पर भारत का कब्जा होता।
संघ परिवार का हमेशा यह प्रयास रहता है कि आजाद भारत के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका को कम करके पेश किया जाये और यह भी कि आज यदि पूरा कश्मीर हमारे कब्जे में नहीं है, तो उसके लिये सिर्फ और सिर्फ नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाए। संघ परिवार इस बात को भूल जाता है कि आजाद भारत में पंड़ित नेहरू और सरदार पटेल की अपनी.अपनी भूमिकायें थीं। जहां सरदार पटेल ने अपनी सूझबूझ से सभी राजे.रजवाड़ों का भारत में विलय करवाया और भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप दिया वहीं नेहरू ने भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक नींव देने के लिए आवश्यक योजनायें बनाईं और उनके क्रियान्वयन के लिये उपयुक्त वातावरण भी।
नेहरू जी के योगदान को तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला,ऐसी शक्तिशाली संस्थाओं का निर्माणए जिनसे भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थायी हो सके। इन संस्थाओं में संसद एवं विधानसभायें व पूर्ण स्वतंत्र न्यायपालिका शामिल हैं।
दूसराए प्रजातंत्र को जिंदा रखने के लिये निश्चित अवधि के बाद चुनावों की व्यवस्था और ऐसे संवैधानिक प्रावधान, जिससे भारतीय प्रजातंत्र धर्मनिरपेक्ष बना रहे।
तीसरा, मिश्रित अर्थव्यवस्था और उच्च शिक्षण संस्थानों की बड़े पैमाने पर स्थापना। वैसे  नेहरू समाजवादी व्यवस्था के समर्थक नहीं थे परंतु वे भारत को पूंजीवादी देश भी नहीं बनाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने भारत में एक मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। इस व्यवस्था में उन्होंने जहां उद्योगों में निजी पूँजी की भूमिका बनाये रखी वहीं उन्होंने अधोसंरचनात्मक उद्योगों की स्थापना के लिये सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया। उन्होंने कुछ ऐसे उद्योग चुने जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में ही रखा गया। ये ऐसे उद्योग थे जिनके बिना निजी उद्योग पनप ही नहीं सकते थे। बिजली का उत्पादन पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया। इसी तरह इस्पातए बिजली के भारी उपकरणों के कारखानेए रक्षा उद्योग, एल्यूमिनियम एवं परमाणु ऊर्जा भी सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गए। देश में तेल की खोज की गई और पेट्रोलियम की रिफाईनिंग व एलपीजी की बाटलिंग का काम भी केवल सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गये। औद्योगिकरण की सफलता के लिये तकनीकी ज्ञान में माहिर लोगों की आवश्यकता होती है। उद्योगों के संचालन के लिये प्रशिक्षित प्रबंधक भी चाहिए होते हैं। 
उच्च तकनीकी शिक्षा के लिये आईआईटी स्थापित किये गये। इसी तरह, प्रबंधन के गुर सिखाने के लिए आईआईएम खोले गए। इन उच्चकोटि के संस्थानों के साथ.साथ संपूर्ण देश के पचासों छोटे.बड़े शहरों में इंजीनियरिंग कालेज व देशवासियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये। 
चूँकि अंग्रेजों के शासन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी इसलिये उसे वापिस पटरी पर लाने के लिये अनेक बुनियादी कदम उठाये गये। उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश का योजनाबद्ध विकास। इसके लिये योजना आयोग की स्थापना की गई। स्वयं नेहरू जी योजना आयोग के अध्यक्ष बने। योजना आयोग ने देश के चहुंमुखी विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। उस समय पंचवर्षीय योजनाएं सोवियत संघ सहित अन्य समाजवादी देशों में लागू थीं परंतु पंचवर्षीय योजना का ढांचा एक ऐसे देश में लागू करना नेहरूजी के ही बूते का था जो पूरी तरह से  समाजवादी नहीं था।
उस समय भारत के सामने एक और समस्या थी और वह थी बुनियादी उद्योगों के लिये वित्तीय साधन उपलब्ध करवाना। पूँजीवादी देश इस तरह के उद्योगों के लिये पूँजी निवेश करने को तैयार नहीं थे। इन देशों का इरादा था कि भारत और भारत जैसे अन्य नव.स्वाधीन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि.आधारित बनी रहे। चूँकि पूँजीवादी देश भारत के औद्योगिकरण में हाथ बंटाने को तैयार नहीं थे इसलिये नेहरू जी को सोवियत रूस समेत अन्य समाजवादी देशों से सहायता मांगनी पड़ी और समाजवादी देशों ने दिल खोलकर सहायता दी। समाजवादी देशों ने सहायता देते हुये यह स्पष्ट किया कि वे यह सहायता बिना किसी शर्त के दे रहे हैं। समाजवादी देशों की इसी नीति के अन्तर्गत हमें सार्वजनिक क्षेत्र के पहले इस्पात संयत्र के लिये सहायता मिली और यह प्लांट भिलाई में स्थापित हुआ।
जब पूँजीवादी देशों को यह महसूस हुआ कि यदि वे अपनी नीति पर चलते रहे तो वे समस्त नव.स्वाधीन देशों का समर्थन खो देंगे व इससे उन्हें भारी नुकसान होगा तब उन्होंने भी भारी उद्योगों के लिये सहायता देना प्रारंभ कर दिया।
इस तरहए धीरे.धीरे हमारा देश भारी उद्योगों के मामले में काफी प्रगति कर गया। आजादी के बाद जब हमें समाजवादी देशों से उदार सहायता मिलने लगी तो हमारे देश के प्रतिक्रियावादी राजनैतिक दलों और अन्य संगठनों ने यह आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया कि हम सोवियत कैम्प की गोद में बैठ गये हैं।
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटो में विभाजित हो गया था। एक गुट का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे गुट का सोवियत संघ। भारत ने यह फैसला किया कि वह दोनों में से किसी गुट में शामिल नहीं होगा।
इसी निर्णय के अन्तर्गत हमने अपनी विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता को बनाया। भारत द्वारा की गई इस पहल को भारी समर्थन मिला और अनेक नव.स्वाधीन देशों ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया। गुटनिरपेक्षता की नीति की अमेरिका द्वारा सख्त निंदा की गई। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने कहा कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे  विरूद्ध है।
हमारे देश के अंदर भी जनसंघ ने गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना की और कहा कि हम समाजवादी देशों के पिछलग्गू बन गये हैं। परंतु हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण सारी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी और जवाहरलाल नेहरूए गुटनिरपेक्ष देशों के सर्वाधिक शक्तिशाली नेता बन गये। नेहरूजी के बाद इंदिरा गांधी भी इस नीति पर चलीं परंतु अब भारत ने इस नीति को पूरी तरह से भुला दिया है।
आर्थिक और विदेश नीति के निर्धारण में मौलिक योगदान के साथ.साथ नेहरू ने हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत कीं और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नेहरू ने भारत को पूरी ताकत लगाकर एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया।
चूँकि हमने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया इसलिए हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें गहरी होती गईं। जहां अनेक नव.स्वाधीन देशों में प्रजातंत्र समाप्त हो गया है और तानाशाही कायम हो गई है वहीं भारत में प्रजातंत्र का कोई बाल बांका तक नहीं कर सका है।
इस तरहए कहा जा सकता है कि जहां सरदार पटेल ने भारत को भौगोलिक दृष्टि से एक राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने ऐसा राजनीतिक.आर्थिक एवं सामाजिक आधार निर्मित किया जिससे भारत की एकताए अखण्डता व प्रजातंत्र को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकी। आधुनिक भारत के निर्माण में पटेल और नेहरू दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है।
- एल. एस. हरदेनिया

Share |