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शनिवार, 7 सितंबर 2013

पाप के दलदल में धंसे ये ढोंगी

कुछ साल पहले की बात है। निजी बातचीत में मैंने देश के एक प्रमुख धर्मगुरू से पूछा कि वे अपने प्रवचनों के दौरान देश में व्याप्त बुराईयों की चर्चा क्यों  नहीं करते? ‘
‘आप अपनी आभा और प्रभाव का उपयोग
मेरे प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि यदि हम भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध जिहाद छेड़ देंगे तो हमारी और हमारे चेलों की सुख-सुविधाओं का ध्यान कौन रखेगा!

 हमारे देश में धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का धन व वैभव से निकटता का संबंध है। मैंने कभी किसी धर्मगुरू को स्टेशन या हवाईअड्डे से आटो से आते नहीं देखा। एक दिन की बात है।  एक जानेमाने धर्मगुरू भोपाल पधारे थे।  जो कार उन्हें लेने गई थी वह ए.सी. नहीं थी। इस पर उन्होंने उस कार में बैठने से इंकार कर दिया। और जब तक ए.सी. कार नहीं आई, वे स्टेशन पर रूके  रहे।
पिछले कुंभ में मुझे उज्जैन जाने का अवसर मिला था। उज्जैन प्रवास के दौरान मैं अनेक धर्मगुरूओं के शिविर में गया। उनके कैंपों में वे सब सुविधाएं थीं जो शायद एक धनी व्यक्ति भी नहीं जुटा पायेगा। उज्जैन के कुंभ के दौरान साधुओं के शिविरों में कुल मिलाकर 4000 एयरकंडीशनर लगे थे और इन एयरकंडीशनरों को विद्युत प्रदाय करने के लिये राज्य विद्युत मंडल को विशेष इंतजाम करने पड़े थे। ज्ञातव्य है कि एक एयरकंडीशनर में लगभग उतनी ही बिजली की खपत होती है जितनी कि 100 वाट के 15 बल्बों में।
धर्मगुरूओं की एक कमजोरी रहती है। उनकी तीव्र इच्छा होती है कि उनके प्रवचन सुनने मुख्यमंत्री, मंत्री, आला अफसर और नगर के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति अवश्य आएं। फिर, उनकी यह भी इच्छा रहती है कि मुख्यमंत्री या मंत्री मंच पर आकर उन्हें माला पहनायें और उनके चरण छुएं।
यह दुःख की बात है कि सत्ता में बैठे लोगों और धर्मगुरूओं के बीच क्या संबंध हों, इस बारे में अभी तक हमारे देश में कोई सर्वमान्य परंपराएं या नियम नहीं बन सके हैं।
हमारे देश के संविधान के अनुसार, जो भी व्यक्ति संवैधानिक पदों पर रहते हैं, उन्हें हर हालत में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिये। पर प्रायः यह देखा गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इन धर्मगुरूओं के सामने नतमस्तक होते हैं और सार्वजनिक रूप से उनके चरणस्पर्श करते हैं।
कुछ माह पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी अपने मध्यप्रदेश  प्रवास के दौरान जबलपुर के पास स्थित एक आश्रम में वहां के शंकराचार्य से मिलने गए थे। शंकराचार्य से मुलाकात का उनका फोटो अखबारों में छपा था। इस फोटो में शंकराचार्य अपने आसन पर बैठे हैं और राष्ट्रपति, झुककर, हाथ जोड़कर उनका अभिवादन कर रहे हैं। जब भी राष्ट्रपति किसी सभा या महफिल में प्रवेश करते हैं तो उपस्थित सभी लोग खड़े हो जाते हैं। क्या शंकराचार्य को खड़े होकर राष्ट्रपति जी का स्वागत नहीं करना था? ऐसा न करके, क्या शंकराचार्य ने प्रोटोकाल के नियमों का उल्लंघन नहीं किया? हमारे देश के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है। उनके ऊपर किसी का स्थान नहीं है।
नागरिक उड्डयन सुरक्षा  नियमों के अनुसार, कुछ ऐसे लोगों को छोड़कर, जो संवैधानिक पदों पर पदस्थ हैं, कोई भी व्यक्ति बिना सुरक्षा जांच के हवाईजहाज पर सवार नहीं हो सकता। अभी हाल में ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक समाचार के अनुसार, बापू आसाराम को यह सुविधा प्राप्त थी। वे अपनी कार से सीधे हवाईजहाज तक पहुंचते थेे। उन्हें यह सुविधा किन नियमों के अन्तर्गत दी गई थी? किस अधिकारी ने इस तरह की सुविधा देने के आदेश जारी किये थे? ऐसे आदेशों से ही इन धर्मगुरूओं को सिर पर चढ़ाया जाता है।
फिर, प्रश्न यह भी है कि क्या धर्मगुरूओं को संपत्ति रखना चाहिये? ये धर्मगुरू प्रायः अपने अनुयायियों को सादा जीवन बिताने और क्रोध, काम, लोभ व मद से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं। परन्तु ठीक इसके विपरीत, ये धर्मगुरू अरबों की संपत्ति के मालिक बन जाते हैं। समाचारपत्रों में बताया गया है कि आसाराम की संपत्ति कम से कम पांच हजार करोड़ रूपये की है। ऐसा कोई भी बड़ा शहर नहीं है जहां आसाराम का आश्रम न हो। ये आश्रम सैंकड़ों एकड़ जमीन में फैले हुये हैं और कहा जाता है कि अधिकांश आश्रम सरकारी भूमि पर कब्जा कर बनाए गए हैं। 
एक बात और। इन धर्मगुरूओं को सत्ता में बैठे लोगों से बड़ा प्रेम होता है। आसाराम के एक विशेष सहायक थे जो सिर्फ मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और धनकुबेरों के फोन सुनते थे और उनकी आसाराम से बात करवाते थे। आसाराम बापू के उमा भारती, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धराराजे सिंधिया, गुजरात के मंत्री रहे अमित शाह और वर्तमान में सलाखों के पीछे डाल दिये गए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी  डी.जी. बंजारा से प्रगाढ संबंध हैं। सन् 2009 तक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी उनके प्रगाढ़ संबंध थे। आसाराम के अलावा, अन्य धर्मगुरू भी राजनीतिज्ञों से प्रगाढ़ संबंध रखते हैं।
इन धर्मगुरूओं पर आये दिन अनेक आरोप लगते रहते हैं। आसाराम पहले धर्मगुरू नहीं हैं जिन पर यौन शोषण का आरोप लगा है। इसके पूर्व भी अनेक धर्म गुरूओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं।
इन धर्मगुरूओं की एक और विशेषता होती है। ये अपने आश्रमों में बाहुबलियों को भी पालकर रखते हैं। इन बाहुबलियों का उपयोग वे अपने विरोधियों का दमन करने के लिये करते हैं।
आसाराम के बारे में जो सच सामने आ रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि इन धर्मगुरूओं के आश्रम असल में अपराधियों के केन्द्र हैं। इस बात के मद्देनजर  आवश्यकता है कि इस तरह के आश्रमों और उनमें संचालित गतिविधियों पर सतत नजर रखी जाये। इस तरह के धर्मगुरू उतने ही खतरनाक हैं जितने कि आतंकवादी और अन्य ऐसे संगठनों के सदस्य, जो हिंसा का सहारा लेकर अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। अतः इस बात की आवश्यकता है कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिये पुलिस की गुप्तचर शाखा में एक विशेष प्रकोष्ठ स्थापित किया जाये। इनके बारे में एक और प्रश्न पर विचार होना चाहिये। क्यों न इन धर्मगुरूओं द्वारा अर्जित धन पर टैक्स लगाया जाये? ये धर्मगुरू सस्ते दामों पर सरकारों से जमीन लेते हैं और फिर उस जमीन पर तरह तरह के व्यवसाय करते हैं। इनमें से कई दवाईयों के उत्पादन के कारखाने स्थापित कर लेते हैं और अपने तथाकथित श्रद्धालुओं को ये दवाएं बेचकर करोड़ों की कमाई करते हैं। आयुर्वेद के एक डाक्टर हैं, अमित शाह। वे एक समय आसाराम से जुड़े हुए थे। वे आसाराम के दवा उत्पादन व्यवसाय की देखभाल करते थे। उन्होंने बताया है कि जब आसाराम द्वारा उत्पादित दवाईयां लोकप्रिय हो गईं तो आसाराम ने उनसे कहा कि दवाईयों में काम आने वाले कच्चे माल की लागत में कमी करो। ऐसा करने से दवाईयों की गुणवत्ता पर असर होता। उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। ‘‘मैंने उनसे कहा कि मैं आश्रम से विदा होना चाहूंगा‘‘। इस पर आसाराम ने कहा कि वे उनकी डाक्टरी नहीं चलने देंगे। बाद में उन्होंने खुद ही मुझे हटा दिया। उसके बाद आसाराम के लोगों ने इस डाक्टर को एक झूठे मामले में फंसाकर राजस्थान पुलिस द्वारा परेशान करवाया। परन्तु दुःख की बात है कि अमित शाह की शिकायत के बावजूद, दवाईयों की गुणवत्ता को लेकर आसाराम के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस तरह की दवाईयां बेचना न सिर्फ अपराध है वरन् जघन्य पाप भी है।
यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई पाप नहीं है जो साधुओं और धर्मगुरूओं का लबादा ओढ़े ये ढोंगी नहीं करते। 
भ्रष्टाचार, हिंसा, जातिवाद, दहेजप्रथा, साम्प्रदायिकता आदि जैसी बुराईयों के विरूद्ध वातावरण बनाने में क्यों नहीं करते? आप किसी शहर में अपने प्रवास के दौरान धनी एवं प्रभुत्वशाली व्यक्तियों के स्थान पर किसी गरीब की झोपड़ी मंे क्यों नहीं ठहरते?‘‘


 -एल. एस. हरदेनिया

गुरुवार, 28 मार्च 2013

धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो


पाकिस्तान के आम लोग भारत
से शांतिपूर्ण संबंध चाहते हैं


पाकिस्तान की मेरी हालिया (1828 फरवरी 2013) 11दिवसीय यात्रा के दौरान मैंने यह महसूस किया कि जहां तक भारत के प्रति रूख का प्रश्न है, वहां का समाज दो स्पष्ट तबकों में बंटा हुआ है। एक तबका उन लोगों का है जो भारत व पाकिस्तान के बीच दोस्ती चाहते हैं और दूसरी तरफ वे लोग हैं जो वहां भारत के विरूद्ध घृणा फैलाकर अपना दबदबा कायम रखना चाहते हैं। ये लोग भारत के प्रति दुर्भावना तो रखते ही हैं, वे अपने कारनामों से अपने देश को भी कमजोर कर रहे हैं। पहले तबके में हैं वहां के बुद्धिजीवी, कालेज और विश्वविद्यालयों के शिक्षक, एन.जी.ओ. के कार्यकर्ता, शायर, कहानीकार व अन्य रचनाधर्मी। यह वह वर्ग है जो पाकिस्तान में व्याप्त अशांति से परेशान है, जो चाहता है कि धर्म आधारित भेदभाव समाप्त हो।
मैं पाकिस्तान, उस सम्मान को ग्रहण करने गया था, जो अमरीका की एक संस्था ने मुझे प्रदान किया था। यह संस्था दक्षिण एशिया में शांति और सद्भाव कायम करने के लिये प्रयासरत है। अन्यों के अतिरिक्त यह सम्मान, पाकिस्तान की एक महिला को भी दिया गया था। इस महिला का नाम है शीमा पाकिस्तान की एक प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं। वे भारतीय शास्त्रीय नृत्यकला में पारंगत हैं। वे स्वयं तो नृत्य करती ही हैं पाकिस्तान की बेटियों को भी नृत्य का प्रशिक्षण देती हैं। पाकिस्तान के तानाशाह जियाउल-हक ने उन्हें नृत्यकला सिखाने से मना किया था परन्तु वे तानाशाह के सामने नहीं झुकीं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के बड़े लोग तो मुजरा सुनते हैं और उन्हें नृत्य करने से मना करते हैं। तब से लेकर आज तक नृत्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी है।
सम्मान प्रदान करने के लिये 19 फरवरी को करांची में एक समारोह आयोजित किया गया था। समारोह में करांची के अनेक जानेमाने लोगों ने भाग लिया। समारोह में सभी वक्ताओं ने भारतपाक मित्रता और दोनों देशों के बीच शांति की आवश्यकता पर जोर दिया। समारोह में करांची के अनेक साहित्यकारों, शायरों और बुद्धिजीवियों ने अपने विचार प्रगट किये। सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि यदि दोनों देशों के आम लोग आपस में घुलतेमिलते रहेंगे तो यह शांति की सबसे बड़ी गारंटी होगी।
अमरीकी संस्था ॔एसोसिएशन फार कम्यूनल हार्मोनी॔ की ओर से प्रीतम रोहिला ने सम्मान प्रदान किया। रोहिला ने बताया कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद, अमरीका में निवासरत भारतपाक मूल के अनेक व्यक्तियों ने इस संस्था की स्थापना की। यह संस्था दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत एवं पाकिस्तान के ऐसे लोगों को सम्मानित करती है जो अपनेअपने देशों में सौहार्द और दोस्ती के लिये काम करते हैं और जो यह मानते हैं कि पाकिस्तान व भारत के मधुर संबंध, दक्षिण एशिया में शांति की पहली शर्त है। रोहिला ने कहा कि उनकी व उनके साथियों की यह मान्यता है कि सरकारें चाहे कोशिश करें या न करें, आम जनता को शांति के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। करांची के जानेमाने चिंतक करामत अली ने कहा कि दक्षिण एशिया के सभी देशों को एक संधि पर हस्ताक्षर करना चाहिये, जिसके अंतर्गत वे आपस में युद्ध न करने का वचन दें। उन्होंने कहा कि इन देशों को अपनी सेनाओं और रक्षा बजट में कटौती करनी चाहिये। वीजा जारी करने में उदारता बरती जाये।
कार्यक्रम में बोलते हुये सुप्रसिद्ध शायरा फहमीदा रियाज ने कहा कि भारत व पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों से अतिवादी हिंसक गतिविधियां समाप्त हो सकती हैं। कार्यक्रम को पाकिस्तान के एक और चिंतक एवं सामाजिक सुधारक डॉ. बी.एम. कुट्टी ने भी संबोधित किया। डॉ. कुट्टी उन लोगों में से हैं जो पिछले 40 वर्षों से पाकिस्तान के मजदूरों के कल्याण के लिए प्रयासरत हैं और इस उद्धेश्य से एक संस्था भी चला रहे हैं।
मैंने कार्यक्रम में कहा कि धर्मनिरपेक्षता ही दक्षिण एशिया के देशों की समस्याओं का प्रभावी हल है। मैंने कहा कि पाकिस्तान के निर्माता कायदे आजम जिन्ना भी पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाना चाहते थे। आज पाकिस्तान की बहुसंख्यक जनता भी यही चाहती है। मैंने कहा कि इतिहास, पाकिस्तान के उन शासकों को कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने जिन्ना के इस सपने को चूरचूर कर दिया। मैंने कहा कि धर्मनिरपेक्षता के बारे में जानबूझकर दुष्प्रचार किया जाता है। भारत में भी ऐसे लोग और संगठन हैं जो धर्मनिरपेक्षता को बदनाम करते हैं। शीमा किरमानी ने इस अवसर पर अंग्रेजी की कविता भी पॄकर सुनाई जिसका भावार्थ था
"मैं तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों पर नहीं नाचूंगी,
मैं घृणा की धुन पर नहीं नाचूंगी।
मैं तुम्हारे लिए किसी को नहीं मारुंगी।
मैं तुम्हारे लिए अपनी जान नहीं दूंगी।
मैं तुम्हारे बमों की आवाज पर नहीं नाचूंगी।
परन्तु मैं नाचूंगी,
हां मैं नाचूंगी, विरोध करने के लिये,
मैं नाचूंगी,
अस्तित्व में बने रहने के लिए
हां मैं नाचूंगी, शांति के लिये
जब तक वह स्थापित नहीं हो जाती।’’

करांची प्रवास के दौरान हमें वहां के विश्वविद्यालय जाने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय में हमने अन्तर्राष्ट्रीय संबंध विषय के एम.ए. के विद्यार्थियों को संबोधित किया। एम.ए. क्लास में कम से कम 100 विद्यार्थी थे। विद्यार्थियों में छात्राओं का बहुमत था। कम ही छात्रायें बुर्का पहिने थीं। यद्यपि उनमें से कुछ अपना सिर के थीं। मैंने कक्षा में काफी अनुशासन पाया। हाजिरी लगने के बाद एक छात्रा ने क्लासरूम में प्रवेश करना चाहा। परन्तु क्लास के प्रोफेसर ने उससे कहा तुम लेट हो, भीतर नहीं आ सकतीें। इसी तरह क्लास के दौरान एक युवक आया और उसने प्रोफेसर से अनुरोध किया कि वे क्लास छोड़ दें ताकि छात्रछात्रायें क्रिकेट मैच देख सकें। इस पर प्रोफेसर ने उससे पूछा कि तुम क्लास के भीतर कैसे आये। क्लास जारी रहेगी।
मेरे संक्षिप्त भाषण के बाद छात्रछात्राओं ने अनेक प्रश्न पूछे। उनमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह था कि भारत ने अभी तक पाकिस्तान के अस्तित्व को क्यों नहीं स्वीकारा है? मैंने उन्हें बताया कि यह आरोप सरासर बेबुनियाद है। मैंने कहा कि वैसे यह बात सच है कि हमारे देश के सबसे बड़े नेता, जिन्हें हम राष्ट्रपिता कहते हैं, देश के विभाजन के विरोधी थे। वे कहते थे कि भारत का विभाजन केवल उनकी मृत देह पर होगा। परन्तु जब पाकिस्तान बन ही गया तो गांधीजी ने भी पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया था। विभाजन के बाद भारत को केन्द्रीय बैंक के रिजर्व कोष में पाकिस्तान के हिस्से के बतौर उसे 55 करोड़ रूपये देना बाकी रह गया था। गांधी जी भारत सरकार को बार बार कहते थे कि पाकिस्तान की उधारी शीघ्र चुकाओ। परन्तु उधारी चुकाने में देरी हो रही थी। इस पर भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिये महात्मा गांधी ने अनशन प्रारंभ कर दिया। इसके बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रूपये दे दिये। गांधी जी का रवैया देश के कुछ लोगों को अच्छा नहीं लगा। ऐसे लोगों में नाथूराम गोडसे भी शामिल था। पाकिस्तान को उसका वाजिब हक दिलवाने का गांधीजी का यह प्रयास कुछ लोगों को मुसलमानों और पाकिस्तान का तुष्टिकरण लगा। यही वे लोग थे जिन्होंने बाद में गांधी जी की हत्या की। इस तरह, हमारे देश के सबसे बड़े नेता ने पाकिस्तान के हित की खातिर अपनी जान दे दी। पाकिस्तान को मान्यता देने का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है।
अपने भाषण के अंत में मैंने कहा कि मेरा एक सपना है जो मैं उनसे बांटना चाहता हूँ। मैंने उन्हें याद दिलाया कि अमरीका के एक बड़े नेता थे डॉ. मार्टिन लूथर किंग ॔॔जूनियर’’। वे वहां के काले लोगों के अधिकारों के लिये संघर्ष करते थे। उन्होंने एक दिन एक जोशीला भाषण दिया। अपने भाषण के बीच में वे बारबार दुहराते थे कि ’आई हेव ए ड्रीम॔ (मेरा यह सपना है)।
मैंने कहा कि मेरा भी एक सपना है। और वह यह कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश मिलकर एक महासंघ बना लें। ठीक वैसे ही जैसे यूरोप के देशों ने मिलकर यूरोपीय संघ बनाया है। यूरोप के देशों ने आपस में अनेक युद्ध लड़े। इनमें दो महायुद्ध शामिल हैं। इन युद्धों में करोड़ों लोगों की जान गयी और अरबों की संपत्ति स्वाहा हो गई। इतनी बड़ी जनधन की हानि के बाद अब यूरोपीय देशों ने यह निर्णय किया है कि वे आपस में युद्ध नहीं लड़ेंगे। क्या हम भी युद्ध लड़तेलड़ते थक नहीं गये हैं? पिछले 66 वर्षों में हमने स्वयं का कितना नुकसान किया है। इन वर्षों में हमने अपनी सीमाओं की रक्षा पर जितना खर्च किया है, यदि वह खर्च नहीं हुआ होता तो शायद हम तीनों देशों का एक भी व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे रही रह जाता। हम महासंघ बनायें, युद्ध न करने की कसम खायें, आपस में व्यापार करें, बिना वीजा के तीनों देशों में कहीं भी आजा सकें। मैंने कहा कि स्वार्थी तत्व ही हमें आपस में लड़ाते हैं। इन स्वार्थी तत्वों में पश्चिम के वे देश शामिल हैं जो पहिले ऐसी परिस्थिति पैदा करते हैं जिससे हम आपस में लड़ें और लड़ाई के लिये वे अपने उत्पादित किये गये हथियार हमें बेचते हैं। हमें इन चालाकियों को समझना चाहिये और आपस में न लड़ने की कसम खाना चाहिये।
इतना कहने के बाद मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि क्या वे मेरे इस सपने को पूरा करने में सहायक होंगे। क्या वे अपने देश में ऐसे प्रयास करेंगे जिससे युद्ध समर्थक लोगों की आवाज दबे? इस पर सभी छात्रछात्राओं ने जोरदार तालियां बजाकर मेरे सपने को पूरा करने का आश्वासन दिया। उनके इस समर्थन से यह स्वयंसिद्ध कि पाकिस्तान के आम नागरिक शांति चाहते हैं।

-एल. एस. हरदेनिया

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

संघ की दकियानूसी, पुरूषवादी मानसिकता का प्रतीक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत ने महिलाओं को जो परामर्श दिया है और बलात्कार के जो कारण बताये हैं, वे उनकी पुरूषवादी व पितृसत्तात्मक सोच के प्रतीक हैं। डाॅ. भागवत ने कहा कि ‘‘बलात्कार इंडिया में होते हैं भारत में नहीं‘‘।
यह कहना कठिन है कि डा. भागवत का ‘इंडिया‘ और  ‘भारत‘ से क्या आशय है। डा. भागवत के ‘भारत‘ के दो अर्थ हो  सकते हैं। एक अर्थ हो सकता है प्राचीन भारत। यदि डा. भागवत का इशारा प्राचीन भारत की ओर है, तो क्या हम भूल सकते हैं कि प्राचीन भारत में पुरूषों ने द्रौपदी के साथ जो व्यवहार किया था, वह बलात्कार से कम नहीं था। पहले तो पांडवों ने द्रोपदी को जुएं में दांव पर लगा दिया। उसके बाद कौरवों ने द्रोपदी को भरी सभा में नंगा करने का प्रयास किया। द्रोपदी को नंगा किए जाने के शर्मनाक कृत्य को महान आत्माएं, जिनमें भीष्म पितामह शामिल थे, मौन होकर देख रहीं थीं। महिलाओं के अपमान के अनेक ऐसे दृष्टांत प्राचीन भारत और हिन्दू धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं। राम ने गर्भवती सीता को जिस ढंग से अपने महल से निकाला था, वह भी नारी जाति का अपमान अपमान था।
यदि भागवत के अनुसार, इंडिया का अर्थ शहरी क्षेत्र और भारत का अर्थ ग्रामीण क्षेत्र है तो हमें डा. भागवत से यह पूछने का अधिकार है कि क्या गांवों में बलात्कार नहीं होते हैं? सच पूछा जाए तो गांवों में महिलाओं के विरूद्ध शहरों से कहीं ज्यादा हिंसा होती है और सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि वे उसके विरूद्ध शिकायत भी नहीं कर पातीं। गांवों में महिलाओं के विरूद्ध होने वाले अत्याचार, सामंतवादी व्यवस्था की देन हैं।
हमारे देश में आज भी गांवों में सामंती व्यवस्था कायम है। इस सामंती व्यवस्था के कर्ताधर्ता उच्च जातियों के लोग होते हैं। ये लोग गांव में निवास कर रहे दलितों को इंसान नहीं मानते। दलितों की बहू बेटियों को भोग्या मानते हैं। आज भी हमारे देश में कुछ ऐसे गांव हैं जहां दलितों के घर आने वाली वधू पर पहला अधिकार इन दबंगों का समझा जाता है।
हरियाणा की खाप पंचायतें ग्रामीण भारत की महिलाओं के संबंध में सोच को इंगित करती हैं। इन पंचायतों ने महिलाओं के साथ घोर आपत्तिजनक व्यवहार किया है। झारखंड सहित कई राज्यों में महिलाओं को डायन घोषित कर उन्हें नंगा घुमाने और उनकी हत्या तक कर देने की घटनाएं आम हैं। 
आये दिन समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है कि कोई महिला जिस समय रात के अंधेरे में शौच को गयी उसके साथ बलात्कार किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांवों में होने वाली इन घटनाओं की पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस पर इन सामंती तत्वों का दबदबा रहता है। डाक्टर भी इनके दबदबे के कारण बलात्कार की घटना की पुष्टि नहीं कर पाते हैं।
इस तरह भागवत का यह कहना कि गांवों में बलात्कार नहीं होते बेबुनियाद है और देश को इंडिया और भारत में बांटने का दुष्प्रयास है। सच पूछा जाये तो बलात्कार चाहे शहर में हों या गांव में, इनके लिये वह दृष्टिकोण उŸारदायी है जो मनुस्मृति से हमें धरोहर के रूप में मिला है। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सवाल है, वह तो केवल पुरूषों की  संस्था है। संघ के संस्थापकों ने आरएसएस से महिलाओं को दूर रखा है। इस मामले में संघ और इस्लामिक व्यवस्था में समानता है। इस्लाम के धार्मिक ठेकेदार, महिलाओं को पुरूषों के साथ मस्जिद में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं देते हैं। उसी तरह, संघ अपनी शाखाओं में महिलाओं को प्रवेश नहीं देता है। कुल मिलाकर, भागवत अपनी पुरूषवादी सोच को ही प्रगट कर रहे हैं।
भागवत के बलात्कार संबंधी बयान से उत्पन्न विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि उन्होंने एक और बयान दे डाला, जिसमें उन्होंने  महिलाओं को घर की चहारदीवारी में वैसे ही बंद रहने की सलाह दी जैसे तालिबानी, मुस्लिम महिलाओं को देते हैं। उनके इस बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए संघ के प्रवक्ता राम माधव ने कहा कि भागवत ने यह बयान पश्चिम के परिवारों के बारे में दिया है। यदि उन्होंने ऐसा किया है तो यह पश्चिम की महिलाओं का अपमान है।
भागवत के अलावा, मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी बलात्कार की घटनाओं पर आपŸिाजनक बयान दिया है। विजयवर्गीय ने युवतियों और महिलाओं को यह सलाह दी है कि वे लक्ष्मण रेखा को न लांघंे। यह सच है कि शायद सीता का अपहरण नहीं होता यदि वे लक्ष्मण रेखा नहीं लांघतीं। परन्तु आज के रावण तो स्वयं लक्ष्मण रेखा के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। क्या कैलाश विजयवर्गीय यह नहीं जानते कि आज के दानव, घरों में घुसकर महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते हैं। अभी कुछ दिन पहले असम में कांग्रेस से जुड़े एक व्यक्ति ने रात्रि को एक महिला के घर में घुस कर उसके साथ बलात्कार किया। बाद में लोगों ने उसकी जमकर पिटाई की।
फिर, बलात्कार तो अबोध बच्चियों के साथ भी होते हैं। विजयवर्गीय बतायें कि ये बच्चियां कौन सी लक्ष्मण रेखा लांघती हैं। भागवत और विजयवर्गीय द्वारा दिये गये इन बयानों से अपराधियों के हौसले बुलन्द होते हैं। ऐसा लगता है कि भागवत और उनकी विचारधारा, महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लिए महिलाओं को ही दोषी मानती हैं।  
भागवत और विजयवर्गीय ऐसे संगठन और पार्टी से जुड़े हैं जिनके हाथों में अनेक राज्यों की सŸाा है और जिनकी महत्वाकांक्षा पुनः केन्द्र की सŸाा हथियाना है। यदि इतने जिम्मेदार लोग इतने गैर जिम्मेदाराना बयान देंगे तो ऐसे जघन्य अपराधों पर कैसे नियंत्रण पाया जा सकेगा?
न सिर्फ राजनैतिक नेता ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं वरन् वे जो आध्यात्मिक क्षेत्र की हस्ती होने का दावा करते हैं, भी इस मामले में गैर जिम्मेदाराना बातें कर रहे हैं। आसाराम बापू ने कहा कि दिल्ली की सामूहिक बलात्कार की पीडि़त लड़की यदि हाथ-पैर जोड़ती, बलात्कारियों के पैर पड़ती, गिड़गिड़ाती और उनमें से एक को अपना भाई बना लेती तो वह स्वयं को बचा सकती थी।
क्या आज तक किसी हत्यारे ने अपने दुश्मन को इसलिये छोड़ दिया है क्योंकि उसने उसके पैर छू लिये और उसके सामने समर्पण कर दिया? क्या कोई डाकू इसलिये लूट का इरादा छोड़ देता है क्योंकि जिसे वह लूट रहा है उसने उससे दया की भीख मांगी हो?
- एल. एस. हरदेनिया

सोमवार, 12 नवंबर 2012

नेहरू ही हैं आधुनिक भारत के निर्माता

1945 के शिमला सम्मेलन के लिए जाते हुए ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खां, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल
14 नवम्बर जयंती पर विशेष
हमारे देश के कुछ संगठन, विशेषकर संघ परिवार के सदस्यए जब भी सरदार वल्लभभाई पटेल की चर्चा करते हैं, वे उनके बारे में दो बातें अवश्य कहते हैं। पहली यह कि सरदार पटेल आज के भारत के निर्माता हैं और दूसरी यह कि यदि कश्मीर की समस्या सुलझाने का उत्तरदायित्व सरदार पटेल को दे दिया जाता तो पूरे कश्मीर पर भारत का कब्जा होता।
संघ परिवार का हमेशा यह प्रयास रहता है कि आजाद भारत के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका को कम करके पेश किया जाये और यह भी कि आज यदि पूरा कश्मीर हमारे कब्जे में नहीं है, तो उसके लिये सिर्फ और सिर्फ नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाए। संघ परिवार इस बात को भूल जाता है कि आजाद भारत में पंड़ित नेहरू और सरदार पटेल की अपनी.अपनी भूमिकायें थीं। जहां सरदार पटेल ने अपनी सूझबूझ से सभी राजे.रजवाड़ों का भारत में विलय करवाया और भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप दिया वहीं नेहरू ने भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक नींव देने के लिए आवश्यक योजनायें बनाईं और उनके क्रियान्वयन के लिये उपयुक्त वातावरण भी।
नेहरू जी के योगदान को तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला,ऐसी शक्तिशाली संस्थाओं का निर्माणए जिनसे भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थायी हो सके। इन संस्थाओं में संसद एवं विधानसभायें व पूर्ण स्वतंत्र न्यायपालिका शामिल हैं।
दूसराए प्रजातंत्र को जिंदा रखने के लिये निश्चित अवधि के बाद चुनावों की व्यवस्था और ऐसे संवैधानिक प्रावधान, जिससे भारतीय प्रजातंत्र धर्मनिरपेक्ष बना रहे।
तीसरा, मिश्रित अर्थव्यवस्था और उच्च शिक्षण संस्थानों की बड़े पैमाने पर स्थापना। वैसे  नेहरू समाजवादी व्यवस्था के समर्थक नहीं थे परंतु वे भारत को पूंजीवादी देश भी नहीं बनाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने भारत में एक मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। इस व्यवस्था में उन्होंने जहां उद्योगों में निजी पूँजी की भूमिका बनाये रखी वहीं उन्होंने अधोसंरचनात्मक उद्योगों की स्थापना के लिये सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया। उन्होंने कुछ ऐसे उद्योग चुने जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में ही रखा गया। ये ऐसे उद्योग थे जिनके बिना निजी उद्योग पनप ही नहीं सकते थे। बिजली का उत्पादन पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया। इसी तरह इस्पातए बिजली के भारी उपकरणों के कारखानेए रक्षा उद्योग, एल्यूमिनियम एवं परमाणु ऊर्जा भी सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गए। देश में तेल की खोज की गई और पेट्रोलियम की रिफाईनिंग व एलपीजी की बाटलिंग का काम भी केवल सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गये। औद्योगिकरण की सफलता के लिये तकनीकी ज्ञान में माहिर लोगों की आवश्यकता होती है। उद्योगों के संचालन के लिये प्रशिक्षित प्रबंधक भी चाहिए होते हैं। 
उच्च तकनीकी शिक्षा के लिये आईआईटी स्थापित किये गये। इसी तरह, प्रबंधन के गुर सिखाने के लिए आईआईएम खोले गए। इन उच्चकोटि के संस्थानों के साथ.साथ संपूर्ण देश के पचासों छोटे.बड़े शहरों में इंजीनियरिंग कालेज व देशवासियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये मेडिकल कॉलेज स्थापित किये गये। 
चूँकि अंग्रेजों के शासन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी इसलिये उसे वापिस पटरी पर लाने के लिये अनेक बुनियादी कदम उठाये गये। उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश का योजनाबद्ध विकास। इसके लिये योजना आयोग की स्थापना की गई। स्वयं नेहरू जी योजना आयोग के अध्यक्ष बने। योजना आयोग ने देश के चहुंमुखी विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। उस समय पंचवर्षीय योजनाएं सोवियत संघ सहित अन्य समाजवादी देशों में लागू थीं परंतु पंचवर्षीय योजना का ढांचा एक ऐसे देश में लागू करना नेहरूजी के ही बूते का था जो पूरी तरह से  समाजवादी नहीं था।
उस समय भारत के सामने एक और समस्या थी और वह थी बुनियादी उद्योगों के लिये वित्तीय साधन उपलब्ध करवाना। पूँजीवादी देश इस तरह के उद्योगों के लिये पूँजी निवेश करने को तैयार नहीं थे। इन देशों का इरादा था कि भारत और भारत जैसे अन्य नव.स्वाधीन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि.आधारित बनी रहे। चूँकि पूँजीवादी देश भारत के औद्योगिकरण में हाथ बंटाने को तैयार नहीं थे इसलिये नेहरू जी को सोवियत रूस समेत अन्य समाजवादी देशों से सहायता मांगनी पड़ी और समाजवादी देशों ने दिल खोलकर सहायता दी। समाजवादी देशों ने सहायता देते हुये यह स्पष्ट किया कि वे यह सहायता बिना किसी शर्त के दे रहे हैं। समाजवादी देशों की इसी नीति के अन्तर्गत हमें सार्वजनिक क्षेत्र के पहले इस्पात संयत्र के लिये सहायता मिली और यह प्लांट भिलाई में स्थापित हुआ।
जब पूँजीवादी देशों को यह महसूस हुआ कि यदि वे अपनी नीति पर चलते रहे तो वे समस्त नव.स्वाधीन देशों का समर्थन खो देंगे व इससे उन्हें भारी नुकसान होगा तब उन्होंने भी भारी उद्योगों के लिये सहायता देना प्रारंभ कर दिया।
इस तरहए धीरे.धीरे हमारा देश भारी उद्योगों के मामले में काफी प्रगति कर गया। आजादी के बाद जब हमें समाजवादी देशों से उदार सहायता मिलने लगी तो हमारे देश के प्रतिक्रियावादी राजनैतिक दलों और अन्य संगठनों ने यह आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया कि हम सोवियत कैम्प की गोद में बैठ गये हैं।
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटो में विभाजित हो गया था। एक गुट का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे गुट का सोवियत संघ। भारत ने यह फैसला किया कि वह दोनों में से किसी गुट में शामिल नहीं होगा।
इसी निर्णय के अन्तर्गत हमने अपनी विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता को बनाया। भारत द्वारा की गई इस पहल को भारी समर्थन मिला और अनेक नव.स्वाधीन देशों ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया। गुटनिरपेक्षता की नीति की अमेरिका द्वारा सख्त निंदा की गई। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने कहा कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे  विरूद्ध है।
हमारे देश के अंदर भी जनसंघ ने गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना की और कहा कि हम समाजवादी देशों के पिछलग्गू बन गये हैं। परंतु हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण सारी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी और जवाहरलाल नेहरूए गुटनिरपेक्ष देशों के सर्वाधिक शक्तिशाली नेता बन गये। नेहरूजी के बाद इंदिरा गांधी भी इस नीति पर चलीं परंतु अब भारत ने इस नीति को पूरी तरह से भुला दिया है।
आर्थिक और विदेश नीति के निर्धारण में मौलिक योगदान के साथ.साथ नेहरू ने हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत कीं और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नेहरू ने भारत को पूरी ताकत लगाकर एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया।
चूँकि हमने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया इसलिए हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें गहरी होती गईं। जहां अनेक नव.स्वाधीन देशों में प्रजातंत्र समाप्त हो गया है और तानाशाही कायम हो गई है वहीं भारत में प्रजातंत्र का कोई बाल बांका तक नहीं कर सका है।
इस तरहए कहा जा सकता है कि जहां सरदार पटेल ने भारत को भौगोलिक दृष्टि से एक राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने ऐसा राजनीतिक.आर्थिक एवं सामाजिक आधार निर्मित किया जिससे भारत की एकताए अखण्डता व प्रजातंत्र को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकी। आधुनिक भारत के निर्माण में पटेल और नेहरू दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है।
- एल. एस. हरदेनिया

सोमवार, 30 जुलाई 2012

इसलिए मांगनी चाहिए मोदी को माफी

नरेन्द्र मोदी से शायद ही कोई यह अपेक्षा करेगा कि वे किसी से क्षमा मांगेगे। क्षमा मांगने का नैतिक साहस और शक्ति उनमें होती है जो उदार होते हैं, जिनका दिल बड़ा होता है. और दुनिया जानती है कि नरेन्द्र मोदी का दिल बड़ा नहीं है।

दुनिया के इतिहास में अनेक महान और प्रतिष्ठित लोगों ने क्षमा मांगी है या उनको माफ किया है जिन्होंने उन पर तरह-तरह की ज्यादतियां की थीं। दक्षिण अफ्रीका में गोरों का शासन समाप्त हुआ और नेल्सन मंडेला, आजाद दक्षिण अफ्रीका के प्रथम राष्ट्रपति बने। एक भव्य समारोह में उन्होंने शपथ ली। समारोह में विभिन्न देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजे-महाराजे आदि शामिल हुये। समारोह के अंत में नेल्सन मंडेला ने घोषणा की कि मैं आपका परिचय दो विशिष्ट अतिथियों से कराना चाहता हूँ। सभी विशिष्ट अतिथियों ने सोचा कि ऐसे कौन से विशिष्ट अतिथि हैं जो हमसे भी ज्यादा विशिष्ट हैं और जिनका परिचय मंडेला कराना चाहते हैं। मंडेला की घोषणा के बाद दो गोरे व्यक्ति मंच आये। दोनों को मंडेला ने अपने दोनों ओर खड़ा किया। उन्होंने कहा कि मैं जब जेल मे था उस समय इन दोनों ने मुझ पर तरह-तरह के जुल्म किए। परन्तु आज मैं इन्हें क्षमा कर रहा हूँ और इनके माध्यम से मैं दक्षिण अफ्रीका के उन सभी गोरों को माफ कर रहा हूँ जिन्होनें यहां के मूल निवासियों पर वर्षों तक अत्याचार किये थे। इस तरह का क्षमादान नेल्सन मंडेला जैसा महान हृदय व्यक्ति ही कर सकता है। क्षुद्र हृदय नरेन्द्र मोदी के पास इतना बड़ा दिल नहीं है।

कुछ वर्षों पहले, ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ भारत आईं थीं। अपनी भारत यात्रा के दौरान वे अमृतसर भी गयीं थीं। अमृतसर प्रवास के दौरान उन्होनें जलियांवाला बाग गोलीकांड के लिये क्षमा मांगी। एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में एकत्रित हजारों लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं थीं जिससे सैकड़ो लोग मारे गये थे। जनरल डायर की करतूत की निंदा भारत में तो की ही गई थी ब्रिटेन में भी की गई थी। इसलिए महारानी एलिजाबेथ ने अपने भारत प्रवास के दौरान जलियांवाला बाग में हुई हत्याओं के लिये माफी मांगी। सन् 1984 में सिक्खों के कत्लेआम के लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अनेक कांग्रेस नेताओं ने माफी मांगी।

हेम बरूआ एक प्रखर समाजवादी नेता थे। लोकसभा में चीनी आक्रमण की निन्दा करते हुये उन्होने नेहरू को गधा और देशद्रोही कह दिया। थोड़े समय बाद नेहरू जी की मृत्यु हो गई। हेम बरूआ भी उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुये। हेम बरूआ ने तीन बार नेहरू जी के पैर छुए। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुये उन्होने धर्मयुगसाप्ताहिक में एक लेख लिखा था। उन्होने लेख में कहा कि मैंने एक बार नेहरू जी के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते पैर छुए, दूसरी बार मैंने एक महान प्रधानमंत्री का नमन किया और तीसरी बार मैंने नेहरू जी से क्षमा मांगी-उन्हें गधा कहने के लिए। हेम बरूआ एक महान नेता थे। इसलिये उनका दिल भी महान था।

पर मोदी तो किसी से भी माफी मांगने को तैयार नहीं हैं। जब भी कोई दंगा होता है या आगजनी में लोग मारे जाते हैं, बाढ़ और भूकम्प में अपना सब कुछ खो देते हैं तो प्रधानमंत्री और मंत्रीगण पीड़ितों की खबर लेने जाते हैं। वे प्रायः इस बात के लिये खेद व्यक्त करते हैं कि उन्हें पीड़ित व्यक्तियों की जितनी सहायता करनी चाहिए थी वे. नही कर पाये। वे मृत व्यक्तियों के परिवारवालों से मिलते हैं। वे दुःखी लोगों का दुःख बांटने का प्रयास करते हैं। जबकि उस प्राकृतिक विभीषिका के लिए वे स्वयं किसी भी तरह से दोषी नहीं होते।

इसके विपरीत, नरेन्द्र मोदी एक भी दंगा पीड़ित के पास नही गये। उनका हाल चाल पूछने का प्रयास तक नहीं किया। क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे पूर्व सांसद एहसान जाफरी, जिनकी बड़ी क्रूरता से हत्या की गई थी, की पत्नी से मिलकर शोक व्यक्त करते, और क्षमा मांगते कि पुलिस सही समय पर उनकी रक्षा के लिए नहीं आ सकी? क्या नरेन्द्र मोदी का यह फर्ज नहीं था कि वे उन पुलिसकर्मियों को दंडित करते जो जाफरी को आश्वासन तो देते रहे परंतु उनकी सहायता के लिये नहीं पहुंचे? क्या उन्हें उन हजारों लोगों से मिलकर माफी नहीं मांगनी थी जो राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे थे। शिविर में रह रहे पीड़ितो से मिलना तो दूर की बात है, उलटे नरेन्द्र मोदी ने इन पीड़ितों के बारे में अत्यधिक घटिया टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ये शिविर बच्चे पैदा करने के कारखाने बन गए हैं। क्या इस तरह की घटिया बात करने वाले व्यक्ति से क्षमा मांगने की अपेक्षा की जानी चाहिए?

कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि गोधरा में जो कुछ हुआ था वह मोदी द्वारा रचे गये षड़यंत्र का हिस्सा था। क्या मोदी को इस बात का पता नही था कि गोधरा स्टेशन पर लगभग प्रतिदिन अयोध्या से वापिस आने वाले कारसेवकों और स्थानीय मुसलमानों के बीच टकराव की घटनाएं हो रहीं थीं? इन घटनाओ के मद्देनजर क्या गोधरा में व विशेषकर रेलवे स्टेशन पर पुलिस की तैनाती बढ़ाई नहीं जानी थी? जिस दिन, जैसा कि आरोपित है, मुसलमान एस-6 कोच में आग लगा रहे थे तब पुलिस ने उन्हें रोका नहीं? क्या पुलिस को ऐसे तत्वो पर गोली नहीं चलानी थी? परन्तु ऐसा नहीं हुआ और अनेक
कारसेवक मारे गये। उसके बाद मोदी ने लाशों पर राजनीति की। सभी लाशों को अहमदाबाद ले जाया गया और क्षत-विक्षत शरीरों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। हिन्दू धर्म की परम्परा के अनुसार मृत व्यक्ति की अंतिम क्रिया जल्दी से जल्दी की जानी चाहिये। ऐसा न करना, मृत व्यक्ति का अपमान माना जाता है। क्या लाशों पर राजनीति करना उचित था? कम से कम नरेन्द्र मोदी को उन परिवारों के पास जाकर क्षमा मांगनी थी जिन्होंने अपने प्रियजनों को गोधरा के अग्निकांड में खोया था।

गुजरात दंगे के दौरान अनेक लोगों के घर जला दिये गये थे। जिनके घर जले वे अपने घरो को छोड़कर चले गये। उनमें से कई आज तक वापस नहीं आये हैं। क्या उन्हें वापस लाने का प्रयास मोदी को नही करना था? कश्मीर में अनेक पंडित परिवार घर-बार छोड़कर चले गये हैं। उन्हें वापस लाने का प्रयास कश्मीर की जनता और सरकार कर रही है। अभी हाल में अनेक पंडित एक धार्मिक समारोह में शामिल हुये। इस समारोह मे आने वाले पंडितों का भव्य स्वागत स्थानीय मुसलमानों ने किया। ऐसा कुछ गुजरात की सरकार और वहां के हिन्दू क्यों नही कर रहे हैं? क्यों वे उन मुसलमानों से फिर से अपने शहर और गांव में बसने की अपील नहीं कर सकते जो दंगों के बाद भाग गए थे? क्या इस तरह के हजारों लोगों से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है जो आतंकित होकर अपने गांवो और घरों को छोड़कर चले गये? क्या मोदी को यह स्वीकार करने मे हिचक है कि उनकी पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और दंगाईयों से मिलीभगत के चलते इन लोगों को अपने घरों को छोड़ना पड़ा।

मोदी जी, आपने एक नहीं सैकड़ों गलतियां की हैं जिनके लिये आपको क्षमा मांगना चाहिये। लेकिन आप तो बेशर्मी से कहते हैं कि मैं माफी क्यों मांगूं
- एल. एस. हरदेनिया

सोमवार, 4 जून 2012

मोदी के मुंह पर तमाचा







प्रसिद्ध कहावत है “सूत न कपास, जुलाहों में लठा-लठी“। यह कहावत भारतीय जनता पार्टी पर पूरी तरह लागू हो रही है। देश की वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों के मद्देनजर अगले चुनाव में भाजपा द्वारा लोकसभा में बहुमत पाने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती। अपने बलबूते पर तो भाजपा बहुमत हासिल कर ही नहीं सकती अन्य पार्टियों के साथ मिलकर भी उसके सरकार बनाने की संभावना नजर नहीं आती। फिर भी जोर-शोर से यह प्रचार किया जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे।
वैसे भाजपा में भी औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री के पद के लिये मोदी का नाम प्रस्तावित नहीं किया गया है। अभी तक एक ही भाजपा नेता ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लायक माना है। वे हैं भ्रष्टाचार शिरोमणि कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा।
अभी हाल में बम्बई में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक संपन्न हुई। बैठक के पहले यह अनिश्चित था कि नरेन्द्र मोदी कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेंगे या नहीं? मोदी, भाजपा के नेतृत्व से नाराज थे। नाराजगी का कारण था संजय जोशी का पुनर्वास।
मोदी संजय जोशी को अपना प्रतिद्वन्दी मानते हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने जोशी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें उत्तर प्रदेश के पार्टी प्रभारी का उत्तरदायित्व सौंपा। इससे मोदी इतने नाराज हुये कि उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में प्रचार करने से इंकार कर दिया। इसके साथ उन्होंने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में भाग लेना भी बन्द कर दिया। मुंबई बैठक के ठीक पहले गडकरी ने संजय जोशी का त्यागपत्र ले लिया। इसके बाद ही मोदी ने बम्बई बैठक में भाग लिया। मोदी की यह शर्त कि वे कार्यकारिणी की बैठक में तभी भाग लेंगे जब जोशी को कार्यकारिणी से हटाया जाय-बचकानी तो है ही और इससे यह भी सिद्ध होता है कि मोदी कितने संकुचित विचारों वाले व्यक्ति हैं। क्या इतने संकुचित विचारों वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री के पद पर बैठने लायक है?
भले ही सतही तौर पर कुछ भी नजर आ रहा हो परंतु भाजपा में ऐसे कम ही लोग हैं जो मोदी को प्रधानमंत्री के पद सुशोभित देखना चाहेंगे। इसके ठीक विपरीत, केन्द्रीय नेतृत्व में बहुसंख्यक ऐसे है जो मोदी के रास्ते में हर संभव रोड़े खड़े करेंगे। बम्बई की बैठक के दौरान ही इसके स्पष्ट संकेत मिले।
इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेत था लालकृष्ण आडवानी और सुषमा स्वराज का भाजपा की रैली में शामिल होने से इंकार। स्पष्ट है कि आडवानी और सुषमा स्वराज उस मंच से भाषण नहीं देना चाहते थे जिस पर मोदी बैठे हों। कार्यकारिणी की बैठक के फौरन बाद नितिन गडकरी ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसे मोदी के मुंह पर तमाचा ही कहा जा सकता है। यह निर्णय था संजय जोशी को उत्तर प्रदेश का प्रभार पुनः सौंपना। घोषणा के अनुसार सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी संजय जोशी ही उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहेंगे। चूँकि लोकसभा के चुनाव के दौरान भी संजय जोशी उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहेंगे इसलिए मोदी फिर चुनाव प्रचार के लिए उत्तरप्रदेश नहीं जायेंगे। क्या कोई ऐसा नेता प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकता है जिसे उत्तर प्रदेश का समर्थन प्राप्त न हो? इस तरह गडकरी ने राजनैतिक चालबाजी से मोदी के रास्ते में एक बड़ा बैरियर खड़ा कर दिया है।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में सबसे प्रमुख रोड़ा उनका स्वभाव है। उनकी प्रवृत्ति तानाशाही है। वे अपने प्रतिद्वन्दी को जड़मूल से समाप्त करने में विशवास रखते हैं। गुजरात में उन्होंने अनेक प्रतिद्वंद्वियों को नेस्तोनाबूद कर दिया है। राजनीति के अलावा प्रषासन में भी मोदी ने उन अधिकारियों को ठिकाने लगा दिया है जिन्होंने उनके आदेशों का अक्षरशः पालन नहीं किया। संजय जोशी तो उनकी तानाशाही प्रवृत्ति के सबसे बड़े शिकार हैं। अभी हाल में गुजरात भाजपा के अनेक प्रमुख नेताओं, जिनमें केशुभाई पटेल और सुरेश मेहता शामिल हैं, ने मोदी को तानाशाह निरूपित किया है। जोशी का राजनैतिक कैरियर समाप्त करने के लिये मोदी ने हर प्रकार के हथकंड़े अपनाये। यौन संबंधों को लेकर जोशी की सीडी भी सार्वजनिक हुई। कुछ लोगों का आरोप है कि जोशी का चरित्र हनन करने वाली सीडी के पीछे भी मोदी का हाथ था। मोदी ने गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशु भाई पटेल को हर तरह से सताने का प्रयास किया। नतीजे में केशुभाई ने राजनीति से लगभग सन्यास ले लिया है। मोदी ने अपनी ही पार्टी के अनेक नेताओं को सिर्फ इसलिए घर बैठा दिया क्योंकि वे उन्हें अपने रास्ते का कांटा मानते है।
मोदी के एक अन्य प्रतिद्वन्दी थे हरेन पंडया। हरेन पंडया की अत्यधिक रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में हत्या कर दी गई। हरेन पंडया के पिता ने मोदी पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके पुत्र, जोकि गुजरात के पूर्व गृहमंत्री थे, की हत्या में मोदी का हाथ है।
हमारे देश के इतिहास में शायद ही किसी मंत्री या मुख्यमंत्री को अमरीका ने वीजा देने से इंकार किया हो। परंतु अमरीका ने मोदी को अभी तक वीजा नहीं दिया है। सन् 2002 के दंगों के बाद विश्व की निगाह में वे नायक नहीं खलनायक समझे जाने लगे।

प्रधानमंत्री बनने के लिए विश्व स्तर पर स्वीकार्यता के मुकाबले देश में स्वीकार्यता अधिक आवश्यक है। लालकृष्ण आडवानी, मोदी के संरक्षक माने जाते हैं। आडवानी ने हमेशा मोदी की प्रशंसा की है। सन् 2002 के दंगों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी, मोदी को मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे परंतु आडवानी ने वाजपेयी का घोर विरोध किया और मोदी को बचा लिया। वही आडवानी अब मोदी से खफा हो गए हैं। अभी कुछ माह पहले आडवानी ने एक और रथयात्रा की थी। आडवानी चाहते थे कि उनकी यात्रा का शुभारंभ गुजरात से हो परंतु मोदी ने ऐसा नहीं होने दिया और अंततः आडवानी की यात्रा की शुरूआत बिहार से हुई। शायद तबसे ही मोदी, आडवानी को अपना प्रतिद्वन्दी मानने लगे थे। मोदी की सोच होगी कि भाजपा में आडवानी ही ऐसे नेता हैं जो प्रधानमंत्री पद की दौड़ में उनके प्रमुख प्रतिद्वन्दी हो सकते हंै। आडवानी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि उनका वरदहस्त अब मोदी पर नहीं है। बम्बई में मोदी के साथ पार्टी की रैली में शामिल न होकर आडवानी ने मोदी के प्रति अपना रवैया साफ कर दिया।
देष के भीतर स्वीकार्यता का एक मापदंड यह भी होता है कि अल्पसंख्यक वर्ग संबंधित व्यक्ति का मूल्यांकन कैसे करते हैं। यदि हमारे देश में राय ली जाय कि वह नेता कौन है जिसे मुसलमान और कुछ हद तक ईसाई सर्वाधिक घृणा करते हैं तो सभी की जुबान पर नरेन्द्र मोदी का नाम ही आयेगा। मुसलमान मोदी से उतनी ही घृणा करते हैं जितनी यहूदी, हिटलर से करते थे। अभी तक हमारे देश में जितने भी प्रधानमंत्री हुये हैं उनकी देश के सभी वर्गों में कम-बढ़ स्वाकार्यता थी। यह बात अटल बिहारी वाजपेयी पर भी लागू होती है। यद्यपि वे जीवन भर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे इसके बावजूद मुसलमानों का एक हिस्सा उन्हें पसंद करता था। परंतु मोदी के मामले में ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। यह एक प्रमुख आधार है जो मोदी के , में सबसे बड़ी बाधा सिद्ध होगा। मोदी स्वयं घृणा की राजनीति करते हैं और घृणा के आधार पर कोई भी राष्ट्र ज्यादा दिनों विश्व के नक़्शे पर नहीं रह सकता। जर्मनी इस बात का जीता जागता उदाहरण है।

-एल. एस. हरदेनिया,,



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