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गुरुवार, 30 जून 2016

आज़मगढ़ दंगा-दलित कंधों पर साम्प्रदायिकता की बंदूक

राजनैतिक हलकों में इस बात की आशंका तो पहले से ही जताई जा रही थी कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक खेल खेला जा सकता है। आशंका यह भी थी कि पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश इसकी चपेट में पहले आ सकते हैं। इस लिहाज़ से आज़मगढ़ का दंगा बहुत आश्चर्य में डालने वाला नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरह से एक छोटी सी घटना का लाभ दंगे के लिए उठाया गया वह सोचने पर मजबूर अवश्य करती है। इस पूरी घटना को दलित उत्पीड़न से जिस प्रकार जोड़ा गया वह भी गौर तलब है और दंगों के लिए साम्प्रदायिक ताकतों की पहले से तैयारी को भी जाहिर करता है। आमतौर यह होता आया है कि दंगे भड़काने के लिए किसी लड़की से छेड़छाड़, मूर्तियों को खंडित करने या किसी धार्मिक जुलूस पर पत्थरबाज़ी जैसे आरोप लगाए जाते रहे हैं लेकिन इस बार आज़मगढ़ के खोदादादपूर गाँव में एक मुस्लिम और दलित परिवार के बीच के आपसी रंजिश के मामले को जिस तरह से साम्प्रदायिक रूप दिया गया वह साम्प्रदायिक राजनीति की आगामी रणनीति का खुलासा करने के लिए काफी है। इसे समझने के लिए इस पूरे घटनाक्रम को समझने की ज़रूरत है। खोदादादपूूर आज़मगढ़-लखनऊ रोड पर स्थित गाँव से लगी हुई एक छोटी बाज़ार है जिसके पश्चिमी भाग पर रोड के दोनों तरफ दलित बस्ती है और मुस्लिम आबादी बाज़ार के उत्तर तरफ है। 14 मई की शाम को पहले से चली आ रही एक रंजिश को लेकर दलित युवक मुसाफिर राम ने कथित रूप से दानिश पर कट्टे से फायर किया लेकिन दानिश बच गया और पास में ही वालीबाल खेल रहे अपने गाँव के मुस्लिम नौजवानों की तरफ भागा। आक्रोशित युवकों ने अपने घर की तरफ भागते मुसाफिर का पीछा किया। उसके घर को घेर लिया लेकिन मुसाफिर अपने घर के पीछे से निकल कर फरार हो चुका था। पीछा करने वालों ने मुसाफिर के घर का सामान बाहर निकाल कर आग लगा दिया। जिस समय यह घटना घटित हो रही थी मौके पर एक सब इंस्पेक्टर और चार पाँच पुलिस वाले मौजूद थे लेकिन उन्होंने न तो मुसाफिर को पकड़ने की कोशिश की और न ही भीड़ को आगज़नी से रोकने का कोई प्रयास किया। मुसाफिर आपराधिक पृष्ठिभूमि का है। उस पर हत्या और छिनैती के कई मामले दर्ज हैं। फायर करने की घटना हमेशा ही उत्तेजित करने वाली होती है लेकिन पूरे घटनाक्रम को देखते हुए इस बात में संदेह नहीं रह जाता कि अगर मुसाफिर दलित न होता तो इस घटना से उपजा आक्रोश इस हद तक न होता कि घर का सामान निकाल कर आग के हवाले कर दिया जाता। करीब 6ः30 बजे शाम को फायर की घटना से शुरू होकर यह मामला करीब 7ः00 बजे शाम तक आगज़नी पर जाकर समाप्त हो गया। अब तक पुलिस बल की संख्या भी बढ़ चुकी थी। इस पूरी घटना में भीड़ ने दलित बस्ती के किसी भी दूसरे व्यक्ति को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया और न ही किसी तरह का कोई टकराव हुआ और किसी को चोट आई। आक्रोशित भीड़ का रुख अब प्रशासन की तरफ मुड़ गया। उसने प्रशासन से मुसाफिर की तत्काल गिरफ्तारी और फायर की घटना के बाद मुसाफिर को पकड़ने का प्रयास न करने के लिए सब इंस्पेक्टर के निलंबन की माँग शुरू कर दी। धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती गई और पुलिस बलों की संख्या भी। इस बीच जिले के उच्च अधिकारी भी मौके पर पहुँच गए लेकिन भीड़ अपनी जगह डटी रही। भीड़ में से कुछ लोगों ने पुलिस प्रशासन के खिलाफ अपशब्द कहे और डीएम आज़मगढ़ की विकलांगता को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। स्थिति को बेकाबू होता देख प्रशासन ने लाठी चार्ज किया जिसके जवाब में पथराव हुआ और दोनों तरफ लोगों को चोटें आईं। इसके बाद पुलिस ने आँसू गैस के गोले छोड़े जो गाँव में काफी अंदर जाकर घरों में भी गिरे। भीड़ बिखर गई, भय का राज हो गया, हर तरफ खामोशी छा गई। यह सब कुछ रात में साढ़े आठ बजे तक होता रहा। हालाँकि मुसाफिर के घर पर आग लगाने की घटना हो या फिर पुलिस प्रशासन से दुव्र्यवहार का मामला गाँव में एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ था। उसने इसके खिलाफ आवाज़ भी उठाई लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली। उनमें से कुछ को तो भीड़ का आक्रोश भी झेलना पड़ा। करीब डेढ़ घंटे की खामोशी के बाद अचानक रात में दस बजे के करीब मुख्य मार्ग पर स्थित इलियास अंसारी के घर, जो बाज़ार में किसी मुसलमान का इकलौता घर है, का दरवाज़ा तोड़े जाने और महिलाओं की चीख़-पुकार की आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई दूर तक सुनाई देने लगी। घर की महिलाओं और गाँव वालों का आरोप है कि दरवाज़ा आला अधिकारियों की मौजूदगी में पुलिस बल के लोगों ने तोड़ा था। इस घटना ने पूरे दृश्य को ही बदल दिया। खोदादादपूूर के पश्चिम में पड़ोस के गाँव दाऊदपूर के लोग रोड पर आ गए। खोदादादपूर की मस्जिद के लाउड स्पीकर से बिखर चुकी भीड़ को प्रशासन की ज़्यादती के खिलाफ एकजुट होने की अपील की जाने लगी। अब आक्रोश की जगह भय का माहौल बन चुका था। उधर दाऊदपूर से लोग घटना स्थल की तरफ बढ़ने लगे। लेकिन सही समय पर वहाँ की मस्जिद के लाउड स्पीकर से लोगों को आगे न बढ़ने की अपील की जाने लगी और साथ ही प्रशासन से अनुरोध किया गया कि रात में किसी तरह की कार्रवाई न की जाए। प्रशासन की तरफ से भी लाउड स्पीकर पर ही उक्त सम्बोधन के जवाब में आश्वस्त किया गया कि अब रात में कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। इस तरह से एक बड़ी घटना जिसके बहुत संगीन परिणाम हो सकते थे, टल गई। इसी दौरान खोदादादपूर दलित बस्ती से आग की लपटें उठती हुई दिखाई पड़ीं। तीन घरों में आग लगी थी और बाहर रखे सरपत-घास आदि जलकर खाक हो गए। लेकिन इस सवाल का जवाब मिलना बाकी है कि जिस स्थान पर सैकड़ों की संख्या में पुलिस व पीएसी के जवान तैनात थे ठीक उसके बीचो बीच घरों में आग कैसे लगी जबकि किसी असामाजिक तत्व के वहाँ तक पहुँचने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी? अब तक रात के साढ़े दस बज चुके थे। इस बीच खोदादादपूर से करीब 500-600 मीटर पूर्व में सड़क के किनारे स्थित यादव बहुल गाँव फरीदाबाद से खबरें आने लगीं कि वहाँ राहगीरों को रोक कर उनके धर्म की पहचान करके मुसलमानों को मारा पीटा जा रहा है और पुलिस बल की तैनाती के बाद भी यह सिलसिला जारी है। इसके बाद रात शान्ति से बीती। कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। खोदादादपूर में उसके बाद कोई छोटी सी भी घटना नहीं हुई। अब अराजकता का केंद्र खोदादादपूर की जगह फरीदाबाद बन चुका था। जनपद के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में घर का दरवाज़ा तोड़ने की घटना पुलिस द्वारा ठण्डे दिमाग से की गई कार्रवाई थी जिसे किसी भी तरह अनुमोदित नहीं किया जा सकता। इसे बदले की कार्रवाई तो कहा जा सकता है लेकिन प्रशासनिक दृष्टिकोण से यह घटना उत्तेजना पैदा करने वाली थी जिसे टाला जाना चाहिए था। अगली सुबह साढ़े नौ बजे करीब आईजी पुलिस एस0के0 भगत ने खोदादादपूर  का दौरा किया। स्थानीय पुलिस ने पड़ोस के गाँवों से भी कुछ सम्मानित लोगों को आमंत्रित किया  था। लेकिन आई जी महोदय ने शान्ति स्थापित करने के लिए जनता से किसी तरह के सहयोग की बात नहीं की। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि कानून तोड़ने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और वह दोषियों को पुलिस के हवाले न करने की स्थिति में पुलिसिया तरीके अपनाने की बात कह कर चले गए। आईजी साहब की कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कठोर रुख पर अभी बहस चल ही रही थी कि
धारा 144 लागू होने और पुलिस बल की नाक के नीचे फरीदाबाद में दंगाइयों की भीड़ जमा होने की खबरें गश्त करने लगीं। दोपहर बाद तीन बजे के करीब भाजपा के बाहुबली नेता रमाकांत यादव अपने दल बल के साथ खोदादादपूर दलित बस्ती में करीब दस मिनट रुकने के बाद फरीदाबाद गए और पाँच बजे तक कई अन्य गाँवों का दौरा किया। भाजपा जिला अध्यक्ष सहजानंद राय भी आ गए। भीड़ तेज़ी से बढ़ने लगी। करीब डेढ़ से दो हज़ार लोग फरीदाबाद में मुख्य सड़क से इतने करीब इकट्ठा थे कि कोई भी आने जाने वाला आसानी से उसे देख सकता था। उतनी ही भीड़ उनकी उत्तर दिशा में रेलवे लाइन के पास और दक्षिण दिशा में नहर के दूसरी तरफ भी मौजूद थी। वहाँ से गुज़रने वालों ने तो उस भीड़ को देखा और अनुमान भी लगा लिया कि अगले कुछ घंटों में क्या होने वाला है लेकिन जिला प्रशासन और फरीदाबाद में तैनात पुलिस बल ने कुछ नहीं देखा। पुलिस की निष्क्रियता को देखते हुए समाजवादी पार्टी के हिंदू मुस्लिम सभी नेताओं से सम्पर्क किया गया लेकिन उन्होंने यह कह कर घटना स्थल तक आने से इनकार कर दिया कि प्रशासन ने नेताओं के वहाँ जाने पर रोक लगा रखी है और वह प्रशासन से सम्पर्क में हैं। शाम को करीब साढ़े पाँच से पौने छः बजे के बीच फरीदाबाद मे मौजूद दंगाई भीड़ ने अचानक खोदादादपूर गाँव पर पूरब से हमला कर दिया। हाथों में तेल के गैलन, लाठी, भाला और तमंचे लिए हुए तेज़ी से गाँव के बिल्कुल करीब पहुँच गए। गाँव के लोगों ने बहुत कम संख्या बल के बावजूद उनका मुकाबला किया और उन्हें भागने पर विवश कर दिया। जिस समय भीड़ हमलावर थी उस समय घटना स्थल से थोड़ी ही दूर दो ट्रक पीएसी के जवान मौजूूद थे लेकिन मूक दर्शक बने रहे, पुलिस अधिकारियों ने भी कोई जुंबिश नहीं की। इसी दौरान डीएम आज़मगढ़ भी वहाँ पहुँच गए और पीएसी के जवानों के साथ भागती हुई भीड़ को वापस फरीदाबाद तक ले गए।
    कुछ देर बाद भीड़ वहाँ से बिखर गई। रेलवे लाइन के पास और नहर के दूसरी तरफ की भीड़ जो अपनी जगह खड़ी पूरा नज़ारा देख रही थी, छंटने लगी। फरीदाबाद से वापस जाती हुई दंगाइयों की टोलियों ने फरीदाबाद के पूर्व बनगाँव बाज़ार जहाँ मुसलमानों की केवल पाँच दुकानें थीं, को लूटा और जलाया और पास में ही स्थित शेखावत की आरा मशीन को तेल छिड़क कर आग लगी दी। इसके साथ ही दंगा कई किलोमीटर के दायरे में फैल गया। रात में करीब आधा दर्जन से अधिक जगहों पर राहगीरों में मुसलमानों की पहचान करके महिलाओं बच्चों समेत पचास से ज़्यादा लोगों को बुरी तरह पीटा और लूटा गया, कई वाहनों में तोड़फोड़ की गई और जलाया गया। भारी संख्या में पुलिस व पीएसी बल की मौजूदगी के बावजूद प्रशासन नाम की कोई चीज़ कहीं दिखाई नहीं पड़ रही थी। देर रात तक अराजकता का माहौल बना रहा। अगले दिन 16 मई को प्रशासन अलग रंग में दिखा। गश्त बढ़ गई। रैपिड एक्शन फोर्स का मार्च शुरू हो गया। राहगीरों की पिटाई की एक घटना को छोड़ दें तो सब कुछ शान्त रहा। तीन दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं। पास के बाज़ार और जिले के स्कूल कालेज भी बंद कर दिए गए। चैबीस घंटे में ही स्थिति काबू में आ गई और तीसरे दिन स्थिति काफी हद तक सामान्य हो गई। इसके बाद कानूनी कारवाई का सिलसिला शुरू हुआ। पहले दिन की घटना की पुलिस की तरफ से एफ.आई.आर. दर्ज की गई जो केवल मुसलमानों के खिलाफ थी। हत्या के प्रयास समेत कई अन्य गम्भीर धाराओं में 21 नामज़द और 250 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इस बात की भी व्यवस्था की गई कि खोदादादपूर के लोगों का कहीं मेडिकल न होने पाए। जहाँ भी लोगों ने मेडिकल करवाने का प्रयास किया उन्हें साफ मना कर दिया गया। जिन राहगीरों को गम्भीर चोटें आई थीं उनको इलाज के नाम पर अस्पतालों से मरहम पट्टी करवाकर घर भेज दिया गया। जिनकी हड्डियाँ टूटी थीं उनका एक्स रे तक नहीं किया गया। दूसरी तरफ 15 मई को दंगाई भीड़ द्वारा खोदादादपूर पर किए जाने वाले एकतरफा दंगाई हमले को दो समुदायों के बीच टकराव का रूप दे दिया गया और कहा गया कि 100-150 हिंदू और 200-250 मुसलमानों की आपस में भिड़न्त हुई। हिंदू भीड़ की तरफ से मुसाफिर और दो तीन अन्य दलितों को नामज़द करते हुए इस बात का संकेत भी दे दिया गया कि यह टकराव दलितों और मुसलमानों के बीच हुआ। जबकि दंगाई भीड़ की तरफ से यादव समाज के लोग अग्रणी भूमिका में थे। यादव बहुल गाँव फरीदाबाद उसके केंद्र में था। जिन स्थानों पर राहगीरों पर हमले किए गए उनमें भी एक दो को छोड़कर सभी घटनाएँ यादव बहुल आबादी के गाँवों के पास ही हुई थीं। इस बीच हिंदी मीडिया पुलिस के प्रवक्ता की तरह काम करता रहा। दंगाई भीड़ के हमले या राहगीरों की इतने व्यापक स्तर पर पिटाई उनके लिए कोई खबर नहीं थी। दरअसल खोदादादपूर की घटना का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए ही उसे हिंदू-मुस्लिम बनाया गया थी। इसकी तैयारी पहले से ही चल रही थी। पिछली होली में 24 मार्च को फरीदाबाद में कुछ युवकों ने मुख्यमार्ग पर होली खेलना शुरू कर दिया और आने जाने वालों पर रंग डालने लगे। जब उन्होंने दाढ़ी वाले मुसलमानों और बुरकापोश महिलाओं पर जबरन रंग डाला तो बात बढ़ गई। अपनी इस हरकत पर शर्मिन्दा होने के बजाए मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को एकजुट करने के लिए कई हिंदू गाँवों में माहौल बनाने का उस समय प्रयास भी किया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। खोदादादपूर में एक दलित के घर में आगज़नी की घटना पर फरीदाबाद के यादव समाज की प्रतिक्रिया उनका दलित प्रेम नहीं मुस्लिम दुश्मनी और राजनैतिक पैंतरेबाज़ी थी। इस उदाहरण से इसे आसानी से समझा जा सकता है। ग्राम खिल्लूपूर के एक दलित युवक का एक यादव लड़की से प्रेम हो गया और दोनों घर से फरार हो गए। इस घटना से आक्रोशित फरीदाबाद के यादव नौजवानों ने तीन किलोमीटर दूर खिल्लूपूर जाकर उक्त दलित के घर में तोड़फोड़ की और पूरा घर जला कर राख कर दिया। हद तो यह है कि हैंड पम्प तक तोड़ डाला और महिलाओं को बुरी तरह मारा पीटा। दलित परिवार को घर छोड़ कर भागने पर मजबूर कर दिया। डेढ़ साल तक दलित परिवार को अपने ही घर वापस नहीं आने दिया और न ही उनकी एफआईआर किसी थाने में दर्ज होने दी। इसके बावजूद अगर उसी जगह से दलित अत्याचार के नाम पर बदला लेने के लिए दंगे जैसी स्थिति पैदा की जाती है तो उसे स्वभाविक कैसे माना जा सकता है? वास्तविकता यह है कि दलितों के कंधे पर बंदूक रख कर साम्प्रदायिक उन्माद उत्पन्न करने का यह पूरा खेल भाजपा और समाजवादी पार्टी का मिला जुला खेल है जिसमें एक ने दंगे जैसी स्थिति पैदा की तो दूसरे ने अपनी आँखें बंद कर लीं। इस घटना के बाद सपा को यह एहसास होने लगा कि यादव समाज भाजपा के बाहुबली नेता रमाकांत यादव की झोली में चला जाएगा जिसे बचाने के लिए उसने उन्हें मुकदमों के जंजाल से बचा कर एहसान कर दिया। दूसरी तरफ मुसलमानों पर बड़े पैमाने पर शान्तिभंग की आशंका 107/116 का नोटिस जारी कर दिया गया। इसमें वह गाँव भी शामिल हैं जो खोदादादपूर से कई किलोमीटर की दूरी पर है और उन जगहों पर कोई घटना भी नहीं हुई थी। इस तरह सपा के मुस्लिम नेताओं को यह मौका दिया गया कि वह मुसलमानों को इस नई बला से बचाने के नाम पर अपनी पार्टी का कृतज्ञ बना सकें। इस तरह जहाँ एक तरफ भाजपा दलित वोट बैंक में  सेंधमारी की फिराक में है तो सपा नाराज़ मुसलमानों को अपने जाल में फँसाने के दाव खेल रही है।
-मसीहुद्दीन संजरी
मो 0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पाप के दलदल में धंसे ये ढोंगी

कुछ साल पहले की बात है। निजी बातचीत में मैंने देश के एक प्रमुख धर्मगुरू से पूछा कि वे अपने प्रवचनों के दौरान देश में व्याप्त बुराईयों की चर्चा क्यों  नहीं करते? ‘
‘आप अपनी आभा और प्रभाव का उपयोग
मेरे प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि यदि हम भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध जिहाद छेड़ देंगे तो हमारी और हमारे चेलों की सुख-सुविधाओं का ध्यान कौन रखेगा!

 हमारे देश में धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का धन व वैभव से निकटता का संबंध है। मैंने कभी किसी धर्मगुरू को स्टेशन या हवाईअड्डे से आटो से आते नहीं देखा। एक दिन की बात है।  एक जानेमाने धर्मगुरू भोपाल पधारे थे।  जो कार उन्हें लेने गई थी वह ए.सी. नहीं थी। इस पर उन्होंने उस कार में बैठने से इंकार कर दिया। और जब तक ए.सी. कार नहीं आई, वे स्टेशन पर रूके  रहे।
पिछले कुंभ में मुझे उज्जैन जाने का अवसर मिला था। उज्जैन प्रवास के दौरान मैं अनेक धर्मगुरूओं के शिविर में गया। उनके कैंपों में वे सब सुविधाएं थीं जो शायद एक धनी व्यक्ति भी नहीं जुटा पायेगा। उज्जैन के कुंभ के दौरान साधुओं के शिविरों में कुल मिलाकर 4000 एयरकंडीशनर लगे थे और इन एयरकंडीशनरों को विद्युत प्रदाय करने के लिये राज्य विद्युत मंडल को विशेष इंतजाम करने पड़े थे। ज्ञातव्य है कि एक एयरकंडीशनर में लगभग उतनी ही बिजली की खपत होती है जितनी कि 100 वाट के 15 बल्बों में।
धर्मगुरूओं की एक कमजोरी रहती है। उनकी तीव्र इच्छा होती है कि उनके प्रवचन सुनने मुख्यमंत्री, मंत्री, आला अफसर और नगर के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति अवश्य आएं। फिर, उनकी यह भी इच्छा रहती है कि मुख्यमंत्री या मंत्री मंच पर आकर उन्हें माला पहनायें और उनके चरण छुएं।
यह दुःख की बात है कि सत्ता में बैठे लोगों और धर्मगुरूओं के बीच क्या संबंध हों, इस बारे में अभी तक हमारे देश में कोई सर्वमान्य परंपराएं या नियम नहीं बन सके हैं।
हमारे देश के संविधान के अनुसार, जो भी व्यक्ति संवैधानिक पदों पर रहते हैं, उन्हें हर हालत में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिये। पर प्रायः यह देखा गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इन धर्मगुरूओं के सामने नतमस्तक होते हैं और सार्वजनिक रूप से उनके चरणस्पर्श करते हैं।
कुछ माह पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी अपने मध्यप्रदेश  प्रवास के दौरान जबलपुर के पास स्थित एक आश्रम में वहां के शंकराचार्य से मिलने गए थे। शंकराचार्य से मुलाकात का उनका फोटो अखबारों में छपा था। इस फोटो में शंकराचार्य अपने आसन पर बैठे हैं और राष्ट्रपति, झुककर, हाथ जोड़कर उनका अभिवादन कर रहे हैं। जब भी राष्ट्रपति किसी सभा या महफिल में प्रवेश करते हैं तो उपस्थित सभी लोग खड़े हो जाते हैं। क्या शंकराचार्य को खड़े होकर राष्ट्रपति जी का स्वागत नहीं करना था? ऐसा न करके, क्या शंकराचार्य ने प्रोटोकाल के नियमों का उल्लंघन नहीं किया? हमारे देश के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है। उनके ऊपर किसी का स्थान नहीं है।
नागरिक उड्डयन सुरक्षा  नियमों के अनुसार, कुछ ऐसे लोगों को छोड़कर, जो संवैधानिक पदों पर पदस्थ हैं, कोई भी व्यक्ति बिना सुरक्षा जांच के हवाईजहाज पर सवार नहीं हो सकता। अभी हाल में ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक समाचार के अनुसार, बापू आसाराम को यह सुविधा प्राप्त थी। वे अपनी कार से सीधे हवाईजहाज तक पहुंचते थेे। उन्हें यह सुविधा किन नियमों के अन्तर्गत दी गई थी? किस अधिकारी ने इस तरह की सुविधा देने के आदेश जारी किये थे? ऐसे आदेशों से ही इन धर्मगुरूओं को सिर पर चढ़ाया जाता है।
फिर, प्रश्न यह भी है कि क्या धर्मगुरूओं को संपत्ति रखना चाहिये? ये धर्मगुरू प्रायः अपने अनुयायियों को सादा जीवन बिताने और क्रोध, काम, लोभ व मद से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं। परन्तु ठीक इसके विपरीत, ये धर्मगुरू अरबों की संपत्ति के मालिक बन जाते हैं। समाचारपत्रों में बताया गया है कि आसाराम की संपत्ति कम से कम पांच हजार करोड़ रूपये की है। ऐसा कोई भी बड़ा शहर नहीं है जहां आसाराम का आश्रम न हो। ये आश्रम सैंकड़ों एकड़ जमीन में फैले हुये हैं और कहा जाता है कि अधिकांश आश्रम सरकारी भूमि पर कब्जा कर बनाए गए हैं। 
एक बात और। इन धर्मगुरूओं को सत्ता में बैठे लोगों से बड़ा प्रेम होता है। आसाराम के एक विशेष सहायक थे जो सिर्फ मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और धनकुबेरों के फोन सुनते थे और उनकी आसाराम से बात करवाते थे। आसाराम बापू के उमा भारती, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धराराजे सिंधिया, गुजरात के मंत्री रहे अमित शाह और वर्तमान में सलाखों के पीछे डाल दिये गए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी  डी.जी. बंजारा से प्रगाढ संबंध हैं। सन् 2009 तक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी उनके प्रगाढ़ संबंध थे। आसाराम के अलावा, अन्य धर्मगुरू भी राजनीतिज्ञों से प्रगाढ़ संबंध रखते हैं।
इन धर्मगुरूओं पर आये दिन अनेक आरोप लगते रहते हैं। आसाराम पहले धर्मगुरू नहीं हैं जिन पर यौन शोषण का आरोप लगा है। इसके पूर्व भी अनेक धर्म गुरूओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं।
इन धर्मगुरूओं की एक और विशेषता होती है। ये अपने आश्रमों में बाहुबलियों को भी पालकर रखते हैं। इन बाहुबलियों का उपयोग वे अपने विरोधियों का दमन करने के लिये करते हैं।
आसाराम के बारे में जो सच सामने आ रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि इन धर्मगुरूओं के आश्रम असल में अपराधियों के केन्द्र हैं। इस बात के मद्देनजर  आवश्यकता है कि इस तरह के आश्रमों और उनमें संचालित गतिविधियों पर सतत नजर रखी जाये। इस तरह के धर्मगुरू उतने ही खतरनाक हैं जितने कि आतंकवादी और अन्य ऐसे संगठनों के सदस्य, जो हिंसा का सहारा लेकर अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। अतः इस बात की आवश्यकता है कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिये पुलिस की गुप्तचर शाखा में एक विशेष प्रकोष्ठ स्थापित किया जाये। इनके बारे में एक और प्रश्न पर विचार होना चाहिये। क्यों न इन धर्मगुरूओं द्वारा अर्जित धन पर टैक्स लगाया जाये? ये धर्मगुरू सस्ते दामों पर सरकारों से जमीन लेते हैं और फिर उस जमीन पर तरह तरह के व्यवसाय करते हैं। इनमें से कई दवाईयों के उत्पादन के कारखाने स्थापित कर लेते हैं और अपने तथाकथित श्रद्धालुओं को ये दवाएं बेचकर करोड़ों की कमाई करते हैं। आयुर्वेद के एक डाक्टर हैं, अमित शाह। वे एक समय आसाराम से जुड़े हुए थे। वे आसाराम के दवा उत्पादन व्यवसाय की देखभाल करते थे। उन्होंने बताया है कि जब आसाराम द्वारा उत्पादित दवाईयां लोकप्रिय हो गईं तो आसाराम ने उनसे कहा कि दवाईयों में काम आने वाले कच्चे माल की लागत में कमी करो। ऐसा करने से दवाईयों की गुणवत्ता पर असर होता। उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। ‘‘मैंने उनसे कहा कि मैं आश्रम से विदा होना चाहूंगा‘‘। इस पर आसाराम ने कहा कि वे उनकी डाक्टरी नहीं चलने देंगे। बाद में उन्होंने खुद ही मुझे हटा दिया। उसके बाद आसाराम के लोगों ने इस डाक्टर को एक झूठे मामले में फंसाकर राजस्थान पुलिस द्वारा परेशान करवाया। परन्तु दुःख की बात है कि अमित शाह की शिकायत के बावजूद, दवाईयों की गुणवत्ता को लेकर आसाराम के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस तरह की दवाईयां बेचना न सिर्फ अपराध है वरन् जघन्य पाप भी है।
यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई पाप नहीं है जो साधुओं और धर्मगुरूओं का लबादा ओढ़े ये ढोंगी नहीं करते। 
भ्रष्टाचार, हिंसा, जातिवाद, दहेजप्रथा, साम्प्रदायिकता आदि जैसी बुराईयों के विरूद्ध वातावरण बनाने में क्यों नहीं करते? आप किसी शहर में अपने प्रवास के दौरान धनी एवं प्रभुत्वशाली व्यक्तियों के स्थान पर किसी गरीब की झोपड़ी मंे क्यों नहीं ठहरते?‘‘


 -एल. एस. हरदेनिया

सोमवार, 5 अगस्त 2013

इंडिया फर्स्ट या उच्च जातियों का कुलीन वर्ग फर्स्ट ?

साम्प्रदायिक बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता


भाजपा अपनी हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति की आकर्षक पैकेजिंग करने के लिए, एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास कर रही है। हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति का आधार है अल्पसंख्यकों - विशेषकर मुसलमानों व ईसाइयों - को बदनाम करना। इन दोनों समुदायों का दानवीकरण, इस उद्देश्य से किया जाता है कि बहुसंख्यक समुदाय का कम से कम एक तबका, इस दुष्प्रचार पर यकीन करने लगे कि अल्पसंख्यक समुदाय उसके लिए बड़ा खतरा है। जाहिर है कि असल में इस खतरे का कोई अस्तित्व नहीं होता। बहुसंख्यक समुदाय के इन आशंकित और भयग्रस्त लोगों का इस्तेमाल, एकाधिकारवादी व दमनकारी संस्कृति को, राज्य के जरिए, देश पर लादने के लिए किया जा सकता है। यह संस्कृति केवल आर्थिक व सामाजिक उच्च वर्ग को लाभान्वित करती है। हिन्दू राष्ट्रवादी, वर्षों से ईसाइयों व मुसलमानों पर वही घिसेपिटे आरोप लगाते आ रहे हैं। ईसाइयों के बारे में उनका कहना है कि वे लोभ-लालच व भय के जरिए, बड़ी संख्या में हिन्दुओं को ईसाई बना रहे हैं (यह इस तथ्य के बावजूद कि भारत की आबादी में ईसाइयों का प्रतिशत, सन् 1971 के 2.6 से घटकर सन् 2001 में 2.3 रह गया है)। मुसलमानों पर वे आतंकवादी होने का आरोप लगाते हैं (यह ‘स्वामी’ असीमानंद के इकबालिया बयान व ‘साध्वी’ प्रज्ञा सिंह ठाकुर व अन्यों पर आतंकी हमले अंजाम देने के आरोपों के बावजूद)। वे यह भी कहते हैं कि मुसलमानों की भारत के प्रति वफादारी संदिग्ध है, यह कि मुसलमान हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के प्रति अधिक वफादार हैं व यह कि पाकिस्तान व आईएसआई, भारतीय मुसलमानों का इस्तेमाल, भारत को अस्थिर करने और यहां आतंकी वारदातें करने के लिए करता है। यह भी कहा जाता है कि मुसलमान विघटनकारी हैं, उनमें बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन है, जिसके कारण उनकी आबादी तेजी से बढ़ रही है, यह कि वे पड़ोसी बांग्लादेश व पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर भारत में घुसपैठ कर रहे हैं व यह कि मुस्लिम शासकांे ने हिन्दू धर्म का नाश करने के लिए हिन्दू मंदिरों को ढहाया था।
अल्पसंख्यकों के दानवीकरण से राज्य को असीमित शक्तियों से लैस करना आसान हो जाता है। राज्य अक्सर इन शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करता है और उसके सुरक्षा तंत्र से पारदर्शिता गायब हो जाती है। इससे पूंजीपतियों को  श्रमिकों, किसानों, भूमिहीनों, दलितों आदिवासियों, महिलाओं व समाज के अन्य वंचित वर्गों की कीमत पर, प्रोत्साहन देना आसान हो जाता है। राज्य का सुरक्षातंत्र, वंचित वर्गों को आतंकित रखने के काम आता है। आशंकित और भयग्रस्त वंचित वर्ग, ‘राज्य की सुरक्षा’ के नाम पर अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों को समर्पित कर देता है - उन अधिकारों को, जिनका इस्तेमाल वह अपने सामूहिक हितों की रक्षा करने के लिए कर सकता था। हिन्दू राष्ट्रवाद का एक लक्ष्य यह भी है कि बहुसंख्यक समुदाय के सदस्यों, विशेषकर निचले तबके को, प्राचीन हिन्दू गौरव के नाम पर जाति-आधारित सामंती गुणानुक्रम व परम्पराओं से चिपके रहने के लिए प्रेरित किया जाए। दरअसल, वे एक एकाधिकारवादी राज्य की स्थापना करना चाहते हैं, जिसमें अल्पसंख्यकों को दबाकर रखा जायेगा। इसे वे ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’ बताते हैं। दूसरी ओर, भाजपा, कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ बताती है और कहती है कि वह ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण’ के अतिरिक्त कुछ नहीं है। अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के आरोप से भाजपा का मतलब यह है कि कांग्रेस, अल्पसंख्यकों के उतने खिलाफ नहीं है, जितनी कि वह है।
मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने के मामले में कांग्रेस का रिकार्ड भी कोई बहुत अच्छा नहीं रहा है। आजादी के बाद से अब तक भारत में साम्प्रदायिक दंगों में 40,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें से अधिकांश अल्पसंख्यक समुदाय से थे। दंगों के दोषियों को बहुत कम मामलों में सजा मिल सकी है। कांग्रेस के राज में हुए दंगों में शामिल हैं - जबलपुर (1961), अहमदाबाद (1969 व 1984), भिवण्डी (1970 व 1984), नेल्ली (1983), सिक्ख-विरोधी दंगे (1984), भागलपुर (1989), मुरादाबाद व गोधरा (1981), मेरठ (1987) इत्यादि। इसके अतिरिक्त, पंजाब में सिक्खों व मंुबई, हैदराबाद, दिल्ली (बाटला हाउस) व अन्य शहरों में मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या की जाती रही है। इन फर्जी मुठभेड़ों से मीडिया को अल्पसंख्यकों के चेहरे पर कालिख पोतने वाली खबरों का प्रसारण/प्रकाशन करने का मौका मिलता है, जिससे उनकी टीआरपी और बिक्री बढ़ती है। इससे आतंकवाद से मुकाबला करने के नाम पर एएफएसपीए, यूएपीए, टाडा व पोटा जैसे प्रजातंत्र-विरोधी कानून बनाना आसान हो जाता है। इन कानूनों से सुरक्षा एजेन्सियों को ढेर सारे अधिकार मिल जाते हैं और वह भी बिना किसी जवाबदेही के। अल्पसंख्यकों को वे अवसर उपलब्ध नहीं होते जो अन्य नागरिकों को होते हैं। उनके साथ शिक्षा, सरकारी नौकरियों, बैंक से मिलने वाले कर्जो, सरकारी ठेकों आदि के मामलों में किस तरह भेदभाव किया जाता है, इसका सच्चर समिति विशद दस्तावेजीकरण कर चुकी है। सुरक्षाभाव न होने, बैंकों द्वारा कर्ज देने मे आनाकानी करने, सरकारी ठेके व नौकरियां न मिलने व रहवास के इलाकों में अधोसंरचना की कमी के कारण, मुसलमान शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़ गये हैं। भाजपा नेतृत्व के एक हिस्से ने भी सच्चर समिति की रपट आने के बाद यह स्वीकार किया कि मुसलमानों के साथ भेदभाव होता रहा है।
अल्पसंख्यकों में व्याप्त सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए - देरी से ही सही, घोर अपर्याप्त ही सही - कांग्रेस जब भी कोई कदम उठाती है, उसे अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने के आरोप से दो चार होना पड़ता है। कांग्रेस पर भाजपा द्वारा एक और संदर्भ  अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया जाता है। वह यह कि कांग्रेस, अल्पसंख्यकों को उनके पारिवारिक मसलों में पारम्परिक कानून का पालन करते रहने की इजाजत दे रही है। सच यह है कि कांग्रेस ने उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग को मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक तरजीह दी है। इस वर्ग के सांस्कृतिक प्रतिमानों को संपूर्ण बहुसंख्यक समुदाय पर लाद दिया गया है। इनमें शामिल हैं परिवार संबंधी नियम, गौवध निषेध व धर्मांतरण-विरोधी कानून। इनमें से कुछ कानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है। विहिप के सदस्यों ने कुछ पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर ऐसे दल गठित कर लिये हैं जिनका काम है जानवरों के परिवहन के व्यवसाय में रत अल्पसंख्यकांे से अवैध वसूली करना। यह वसूली तब भी की जाती है जब वे कोई गैरकानूनी काम नहीं कर रहे होते हैं। वसूली की राशि शनैः-शनैः इतनी बढ़ गई है कि कई मुसलमान इस व्यवसाय से बाहर हो गए हैं और उनका स्थान अन्य समुदायों के व्यक्तियों ने ले लिया है।
कांग्रेस सरकारें, उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग की संस्कृति व धार्मिक विश्वासों को, कानून के जरिए, देश के अन्य निवासियों पर लाद रही है। उदाहरण के लिए, पहले सरकार ने बाबरी मस्जिद की भूमि का अधिग्रहण किया और बाद में मस्जिद को गिर जाने दिया। इसके बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद की भूमि को तीन बराबर भागों में बांट कर तीनों ‘पक्षकारों’ को उनका हिस्सा दे दिया। दो-तिहाई भूमि हिन्दू पक्षकारों को मिल गई जबकि जमीन के मूल मालिक को केवल एक-तिहाई हिस्सा मिला और वह भी जमीन के एक कोने में। अगर जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया होता और मस्जिद गिराई न गई होती तो उच्च न्यायालय इस तरह का निर्णय दे ही नहीं सकता था। कुल मिलाकर, हिन्दू राष्ट्रवादी, समाज के उस तबके, जो उच्च जाति के श्रेष्ठि वर्ग का हिस्सा नहीं है, की विविधवर्णी संस्कृति को नष्ट कर देना चाहता है और यह सुनिश्चित करना चाहता है कि राजनीति में केवल उच्च जातियों की संस्कृति का बोलबाला रहे। कांग्रेस, अल्पसंख्यकों की संस्कृति को थोड़ी अधिक तरजीह देती है और राजनैतिक रणनीति के तहत उनके प्रति कुछ नर्म रहती है। भाजपा द्वारा कांग्रेस पर  छद्म धर्मनिरपेक्षता (या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण) की नीति अपनाने का आरोप व कांग्रेस का उसे साम्प्रदायिक पार्टी बताना, इसी संघर्ष को प्रतिबिम्बित करते हैं।
भारत पहले
नरेन्द्र मोदी, जो कि स्वयं को एक राष्ट्रीय नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बतौर प्रस्तुत कर रहे हैं, ने धर्मनिरपेक्षता की एक नई परिभाषा दी है-इण्डिया फस्र्ट। रपटों के अनुसार, उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को ‘परिभाषित’ करते हुए कहा कि ‘‘भारत की भलाई के अलावा, हमारा कोई लक्ष्य नहीं होना चाहिए और जब ऐसा हो जाएगा, तो धर्मनिरपेक्षता स्वमेव हमारी रगों में बहने लगेगी’’। इस परिभाषा से कई प्रश्न उपजते हैं। पहली बात तो यह है कि ‘भारत की भलाई’ किस में है? यदि कार्पोरेट सेक्टर देश के संसाधनों पर कब्जा कर अटूट मुनाफा कमाए, तो क्या यह देश की भलाई है? क्या ऐसी ‘प्रगति,’ जो गरीबों को न तो रोजगार दे और न सुरक्षित भविष्य, देश की भलाई है? क्या ‘स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर’ द्वारा भारत को बेहतर रेटिंग दी जाना देश की भलाई है? क्या जीडीपी में बढ़ोत्तरी को हम देश की प्रगति का सूचक मान सकते हैं? क्या उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण के कारण, देश में अस्थाई तौर पर, ढेर सारे जोखिमों के साथ, विदेशी पूंजी आना, देश की भलाई है? या फिर देश की भलाई इसमें है कि प्रगति ऐसी हो, जिसका लाभ गरीब से गरीब व्यक्ति तक पहुंचे, विकास स्थाई हो और वंचित वर्गों के जीवनस्तर को बेहतर बनाया जाए। यद्यपि मोदी इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देते परन्तु उनकी प्राथमिकताएं इतनी स्पष्ट हैं कि उनके उत्तर क्या होंगे, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। शायद मोदी ‘इण्डिया फस्र्ट’ के नारे के जरिए यह कहना चाहते हैं कि ‘‘सब से गरीब फस्र्ट नहीं, जिसके साथ भेदभाव होता हो, वह फस्र्ट नहीं, पिछड़े क्षेत्र फस्र्ट नहीं, सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग फस्र्ट नहीं, आर्थिक प्रगति के विस्थापित फस्र्ट नहीं, कमजोर, फस्र्ट नहीं’’। क्योंकि अगर इन वर्गों को प्राथमिकता दी जाती है, फस्र्ट रखा जाता है, तो ‘स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर’, भारत की रेटिंग को नहीं बढ़ायेगा और ना ही जल्दी से जल्दी ढेर सारा मुनाफा कमाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर विदेशी धनकुबेर, भारत में पूंजी निवेश करेंगे।
भाजपा की ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’
धर्मनिरपेक्षता से क्या आशय है, इस विषय पर बहस जारी है और हर देश, धर्मनिरपेक्षता के अपने अपने संस्करण को लागू कर रहा है। परन्तु धर्मनिरपेक्षता पर कोई स्कूली पाठ्यपुस्तक पढ़ने से भी यह साफ हो जायेगा कि धर्मनिरपेक्षता की सभी परिभाषाओं में कुछ बातें समान हैं। जैसे, राज्य धार्मिक संस्थाओं, धर्मग्रन्थों व धार्मिक शिक्षा  से दूरी बनाए रखेगा और किसी धार्मिक गतिविधि पर अपने संसाधन खर्च नहीं करेगा। परन्तु भाजपा की केन्द्र व राज्य सरकारों के कार्यकलापों से यह साफ है कि भाजपा, धर्मनिरपेक्षता की इस न्यूनतम परिभाषा को भी स्वीकार नहीं करती। जब भाजपा केन्द्र में सत्ता में थी, तब तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने वैदिक ज्योतिष विज्ञान, कर्मकाण्ड और योग चेतना आदि को उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाने का प्रस्ताव किया था। क्या अब भारत के विश्वविद्यालयों से हिन्दू पंडित पढ़कर निकलेंगे? अगर आप वेद पढ़ाते हैं तो आप सकारात्मक धर्मनिरपेक्षतावादी हैं। परन्तु यदि आप कुरान या बाईबिल पढ़ाते हैं तो आप छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में गीता की पढ़ाई शुरू की है और वह सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों पर सभी धार्मिक समुदायों के बच्चों को योग व सूर्यनमस्कार सिखाने और सरस्वती वंदना का गायन करवाने के लिए दबाव डाल रही है। राज्य भाजपा सरकार ने एक योजना शुरू की है जिसके अन्तर्गत वरिष्ठ नागरिकों को सरकारी खर्च पर भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों की  यात्रा करवाई जाती है। एकाध को छोड़कर ये सभी तीर्थस्थल हिन्दू हैं इसलिए कोई मुस्लिम बुजुर्ग शायद ही इस योजना का लाभ उठायेगा। अगर हज यात्रियों को अनुदान दिया जाता है तो यह अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण है परन्तु यदि सरकारी खर्च पर हिन्दुओं को उनके तीर्थस्थलों की यात्रा करवाई जाती है तो यह सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता है? हम हाजियों को दिये जाने वाले अनुदान की निंदा करते हैं। और उतनी ही निंदा हम राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति की धार्मिक आस्थाओं पर किये जाने वाले खर्च की भी करते हैं।
भाजपा की यह मांग रही है कि देश में ऐसे कानून बनाए जाएं जिनसे धर्मांतरण पर राज्य का नियंत्रण स्थापित हो सके। परंतु इसके साथ ही, हिन्दू राष्ट्रवादी कंधमाल जिले में ईसाईयों को जबरदस्ती हिन्दू बना रहे हैं। सन् 2007-08 की ईसाई-विरोधी हिंसा के पीडि़तों को राहत शिविरों में रहने पर मजबूर थे। वे न तो अपने गांव लौट सकते थे, न अपनी जमीन पर खेती कर सकते थे और ना अपने मकानों का पुनर्निमाण कर सकते थे, जब तक कि वे हिन्दू बनने के लिए राजी न हो जाएं। उनपर कड़ी शर्तें लागू की गईं थीं। उन्हें अपने सिर मंुंडवाने होते थे, पूर्व में ईसाई धर्म का पालन करने के लिए भारी जुर्माना चुकाना पड़ता था और यह वायदा करना होता था कि यदि ‘गांव‘ ईसाईयों पर हमला करने का निर्णय करेगा तो वे हमलावरों में शामिल होंगे। जहां किसी भी अन्य धर्म से जबरदस्ती हिन्दू बनाने को ‘घरवापसी‘ कहा जाता है वहीं अपनी इच्छा से ईसाई या मुसलमान बनने वाले व्यक्ति के बारे में यह आरोप लगाया जाता है कि उसका धर्मपरिवर्तन लालच देकर या डरा-धमकाकर कराया गया है।  हिन्दू धर्म त्यागकर इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने की हर घटना का का विरोध होता है।  ऐसे अधिकांश लोग हिन्दू धर्म की दमनकारी जाति व्यवस्था के शिकार होते हैं और उन्हें यह उम्मीद होती है कि उनके नए धर्म में उन्हें गरिमा और बराबरी का दर्जा प्राप्त होगा। स्वैच्छिक धर्मांतरण के अन्य कारण भी हैं जिन पर हम यहां चर्चा नहीं करना चाहेंगे। भाजपा शासनकाल में राजस्थान की सरकार ने एक कानून बनाया, जिसमें यह प्रावधान था कि अपने पूर्वजों के धर्म (अर्थात हिन्दू) को अपनाने को धर्मांतरण नहीं माना जाएगा। मोदी राज में गुजरात विधानसभा ने राज्य के धर्मांतरण-विरोधी कानून को संशोधित करते हुए एक विधेयक पारित किया, जिसके अनुसार सिक्ख, बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म में आपसी धर्मांतरण का कोई नियमन नहीं किया जाएगा क्यांेकि सिक्ख, बौद्ध और जैन अलग धर्म नहीं है वरन् हिन्दू धर्म के पंथ हैं। गुजरात और राजस्थान दोनों सरकारों द्वारा पारित बिलों को वहां के राज्यपालों ने स्वीकृति नहीं दी और उन्हें राष्ट्रपति को अग्रेषित कर दिया। ‘इंडिया फस्र्ट‘ ब्रांड की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह है कि ईसाईयों को जबरदस्ती हिन्दू बनाया जा सकता है परंतु दलितों को ईसाई धर्म या इस्लाम अपनाने का अधिकार नहीं है। व यह भी कि नागरिकों को उनकी पसंद का धर्म मानने की स्वतंत्रता देना, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण और राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है।
देश में गौवध निषेध कानून कड़े, और कड़े बनते जा रहे हैं और भाजपा-शासित प्रदेशों में उनका इस्तेमाल, अल्पसंख्यकों का दमन करने के लिए हो रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने गौवध निषेध कानून में परिवर्तन कर, अपराधियो को सात वर्ष तक के कारावास से दंडित किए जाने का प्रावधान कर दिया है और स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर डाल दी गई है। इस तरह के अपराधों में अब जमानत नहीं मिलेगी। पुलिस को यदि संदेह हो कि किसी घर में गौमांस पकाया जा रहा है तो वह रसोईघर में घुसकर बर्तन, खाना पकाने व उसे संग्रहित करने (अर्थात रेफ्रिजेटर इत्यादि) के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपकरण आदि जब्त कर सकेगी। यह कानून भेदभावपूर्ण और अल्पसंख्यक-विरोधी है। इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों का दमन करने के लिए किया जा रहा है। गौवध निषेध कानून का केवल एक आधार है-उच्च हिन्दू जातियों की धार्मिक आस्था। आखिर राज्य को क्या अधिकार है कि वह यह तय करे कि देश के नागरिक क्या खाएं और क्या नहीं। और यहां तक कि उनके रसोईघरों में घुसकर, धर्म-आधारित विचारधारा को जबरदस्ती उनपर लादे। इसी तर्ज पर जैनी यह मांग कर सकते हैं कि सरकार को प्याज और लहसुन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और मुस्लिम यह कह सकते हैं कि देश में सुअर का मांस नहीं बिकना चाहिए।

अगर जैनियों और मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों को नागरिकों के खानपान पर नियंत्रण का आधार नहीं बनाया जाता तो फिर उच्च जातियों के हिन्दुओं की धार्मिक आस्थाओं को अन्य नागरिकों पर क्यों लादा जाना चाहिए? क्या यह इंडिया फस्र्ट है या उच्च जातियां फस्र्ट। 
नैतिक पुलिस
हिन्दू राष्ट्रवादियों ने एम एफ हुसैन की चित्र प्रदर्शनियों में इस आधार पर तोड़फोड़ की कि वे नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती थीं। हिंसा और मुकदमेबाजी से परेशान हो हुसैन अंततः देश छोड़कर चले गए। इसी तरह, वाराणसी में ‘वाटर‘ फिल्म की शूटिंग नहीं होने दी गई। बाल ठाकरे ने फिल्म निर्माताओं को अपनी फिल्मों के कई उन हिस्सों को हटाने पर मजबूर किया जिनसे उनके या उनकी पार्टी के हित प्रभावित हो रहे थे। यह इस तथ्य के बावजूद कि फिल्म सेंसर बोर्ड ने इन हिस्सों को अपनी स्वीकृति दी थी। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने महिलाओं पर ड्रेस कोड लादने की कोशिश की। वे वेलेन्टाइन डे का विरोध करते हैं, पबों में महिलाओं के साथ मारपीट करते हैं और युवा लड़के-लड़कियों की पार्टियो ंमें बाधा डालते हैं।
इस सिलसिले में हम अन्य कई मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं समान नागरिक संहिता के नाम पर उच्च जातियों के पारिवार-संबंधी नियमों को लादने की कोशिश। स्थान की कमी के कारण हम इन मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। इंडिया फस्र्ट, असल में राजनैतिक सत्ता पाने की सीढ़ी है और पितृसत्तातमक, सामंती व ऊँचनीच को उचित ठहराने वाली उच्च जातियों की संस्कृति को अन्य भारतीयों पर लादने की कोशिश- उन भारतीयों पर जिनकी समृद्ध और विविधवर्णी सांस्कृतिक परंपराएं हैं। भारतीयों को अपनी विविधताओं के बावजूद सद्भाव के साथ रहना अच्छी तरह आता है और इस परंपरा को समाप्त करने की किसी भी कोशिश की केवल निंदा ही की जा सकती है।

-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष : भगवान बौना है

भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से होता है।
बाबा नागार्जुन ने दंगों के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक वातावरण पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिखी है जिसका शीर्षक है ‘तेरी खोपड़ी के अन्दर ’ । दंगों के बाद किस तरह मुसलमानों की मनोदशा बनती है । वे हमेशा आतंकित रहते हैं। उनके सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल उठ खड़ा होता है ,इत्यादि बातों का सुंदर रूपायन नागार्जुन ने किया है।
यह एक लंबी कविता है एक मुस्लिम रिक्शावाले के ऊपर लिखी गयी है।लेकिन इसमें जो मनोदशा है वह हम सब के अंदर बैठी हुई है। मुसलमानों के प्रति भेदभाव का देश में सामान्य वातावरण हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों ने बना दिया है। प्रचार किया जाता रहा है कि किसी मुसलमान की दुकान से कोई हिन्दू सामान न खरीदे,कोई भी हिन्दू मुसलमान को घर भाड़े पर न दे, कोई भी हिन्दू मुसलमान के रिक्शे पर न चढ़े। साम्प्रदायिक हिंसा ने धीरे-धीरे मुसलमानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी और आर्थिक हिंसाचार की शक्ल ले ली है। मुसलमानों के खिलाफ बड़े ही सहजभाव से हमारे अंदर से भाव और विचार उठते रहते हैं।
हमारे चारों ओर साम्प्रदायिक ताकतों और कारपोरेट मीडिया ने मुसलमान की शैतान के रूप में इमेज विकसित की है। एक अच्छे मुसलमान,एक नागरिक मुसलमान,एक भले पड़ोसी मुसलमान, एक सभ्य मुसलमान, एक धार्मिक मुसलमान,एक देशभक्त मुसलमान की इमेज की बजाय पराए मुसलमान, आतंकी मुसलमान,गऊ मांस खानेवाला मुसलमान,हिंसक मुसलमान, बर्बर मुसलमान,स्त्री विरोधी मुसलमान ,परायी संस्कृति वाला मुसलमान आदि इमेजों के जरिए मुस्लिम विरोधी फि़जा तैयार की गयी है। नागार्जुन की कविता में मुसलमान के खिलाफ बनाए गए मुस्लिम विरोधी वातावरण का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचा गया है।
कुछ अंश देखें-

‘‘यों तो वो
कल्लू था-
कल्लू रिक्शावाला
यानी कलीमुद्दीन...
मगर अब वो
‘परेम परकास’
कहलाना पसन्द करेगा...
कलीमुद्दीन तो भूख की भट्ठी में
खाक हो गया था ’’
आगे पढ़ें-
‘‘जियो बेटा प्रेम प्रकाश
हाँ-हाँ ,चोटी जरूर रख लो
और हाँ ,पूरनमासी के दिन
गढ़ की गंगा में डूब लगा आना
हाँ-हाँ तेरा यही लिबास
तेरे को रोजी-रोटी देगा
सच,बेटा प्रेम प्रकाश,
तूने मेरा दिल जीत लिया
लेकिन तू अब
इतना जरूर करना
मुझे उस नाले के करीब
ले चलना कभी
उस नाले के करीब
जहाँ कल्लू का कुनबा रहता है
मैं उसकी बूढ़ी दादी के पास
बीमार अब्बाजान के पास
बैठकर चाय पी आऊँगा कभी
कल्लू के नन्हे -मुन्ने
मेरी दाढ़ी के बाल
सहलाएंगे... और
और ?
‘‘ और तेरा सिर... ’’
मेरे अंदर से
एक गुस्सैल आवाज आयी...-
बुडढ़े,अपना इलाज करवा
तेरी खोपड़ी के अंदर
गू भर गयी है
खूसट कहीं का
कल्लू तेरा नाना लगता है न ?
खबरदार साले
तुझे किसने कहा था
मेरठ आने के लिए ?...
लगता है
वो गुस्सैल आवाज
आज भी कभी-कभी
सुनाई देती रहेगी...

एक जमाने में भाजपा को जनसंघ के नाम से जानते थे। जनसंघ पर बाबा ने लिखा -

‘‘तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप
वो जनसंघी ,वो स्वतंत्र हैं जिनके परम समीप
उनकी लेंड़ी घोल-घोल कर लो यह आँगन लीप
उनके लिए ढले थे मोती,हमें मुबारक सीप
तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
नया जमाना


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