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बुधवार, 6 जनवरी 2016

क्या भ्रष्टाचार देश प्रेम है ?

सीमा पर नारकोटिक्स ड्रगस स्मगलिंग व अन्य सामानों की स्मगलिंग सामान्य परिघटनाएं हैं. आज ही पंजाब में अमृतसर के खेमकरन सेक्टर में 30 करोड़ रुपये मूल्य की 6 किलो हेरोइन बी एस एफ ने बरामद की है. सीमा से सटे हुए क्षेत्रों में सीमा प्रहरी, पुलिस,  तस्कर अपराधियों व राजनेताओं के गठजोड़ से स्मगलिंग का कार्य होता रहता है. अभी पठानकोट के मामले में विस्फोटक पदार्थों व आर्म्स को एयर फाॅर्स के एयर बेस तक लाने में स्मगलर्स की भूमिका की चर्चा आई है. वहीँ, एस पी सलविंदर सिंह से स्मगलर्स से सम्बन्ध की भी जांच की जा रही है. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अधिकांश आई पी एस अफसर ईमानदार नहीं हैं. जिस तरह से थानों से वसूली से लेकर बड़े-बड़े माफिया अपराधियों से इन लोगों के सम्बन्ध व वसूली के मामले प्रकाश में आ रहे हैं, उनको देख कर यह कहा जा सकता है कि उनसे किसी भी तरह का कार्य पैसे देकर कराया जा सकता है. अधिकांश अधिकारीयों की संपत्तियां उनके वेतन और भत्तों को मिलाकर भी उतनी संपत्ति नहीं बनायीं जा सकती है. 
          भ्रष्टाचार करना देश द्रोह का कार्य नहीं माना जाता है. जबकि भ्रष्टाचार से ही देश द्रोही बनने की प्रक्रिया शुरू होती है चाहे वह हनी या वाइन या रुपया लेकर की जा रही हो. पाकिस्तान का पहला जासूस गृह मंत्रालय में नियुक्त मोहन लाल कपूर था. वह पाकिस्तानी शराब मुफ्त में पीने के लिए गुप्त कागजात उपलब्ध कराता था. आज पंजाब अकाली-भाजपा शासित है. वहां पर सबसे ज्यादा नवजवान नारकोटिक्स ड्रग्स का शिकार हो रहा है जिसके ऊपर मजबूत स्मगलर्स के मजबूत सिंडिकेट होने के कारण कार्यवाई नहीं हो पा रही है. हवाला कारोबार भी आर्म्स की स्मगलिंग का एक साधन होता है जिसमें बड़े-बड़े राजनेता भी शामिल होते हैं. हवाला कांड की डायरी में देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण अडवानी का नाम भी आया था, कार्यवाई कैसे होती.
पठानकोट की घटना में एसएसपी आरके बक्शी को 4 बजे आतंकियों के बारे में सूचना पहुंचा दी गई थी। वे सलविंदर को पहले से ही शक की निगाहों से देखते हैं, इसलिए एसएचओ को भेज दिया। खुद 10 बजे के बाद आए। लालफीताशाही की वजह से देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का कोई औचित्य नहीं है.
              मीडिया जगत में यह 6 सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं जिनके ऊपर जांच अवश्य की जानी चाहिए.

1.आईजी, डीआईजी, एसएसपी तूर व बख्शी ने पहले चरण में क्या-क्या एक्शन लिए? आईजी खुद मौके पर क्यों नहीं आए? उन्होंने किसे जांच सौंपी?
2.डीआईजी को जानकारी मिल गई थी तो उन्हाेंने सलविंदर से खुद कब बात की?  
3.तूर को जब सलविंदर ने फोन किया तो उन्होंने कंट्रोल रूम में बात करने को क्यों कहा? गंभीरता से क्यों नहीं लिया?  
4.बख्शी और अन्य अफसरों में तालमेल की कमी क्यों रही? 
5.सभी अफसरों की कॉल डिटेल को भी आधार बनाया जाए, क्योंकि इस दौरान सभी अफसरों की आपस में कई बार बात हुई। उससे गंभीरता का अंदाजा लग जाएगा।
6.इस तरह की किसी भी घटना के बाद सुरक्षा एजैंसियों को सूचित करना जरूरी होता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

इस घटना से सम्बद्ध अधिकारीयों की संपत्तियों की जांच भी करायी जाए जिससे भ्रष्टाचार और देश द्रोहियों के संबंधों को उजागर किया जा सके.

सुमन

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

भारत माँ को कर शर्मिंदा करते मोदी

"भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद मैं एक ऐसी कमेटी का गठन करुंगा, जो सभी राजनेताओं पर लगाए गए आरोपों की जांच करेगा और कोई भी भ्रष्टाचारी नेता हो, चाहे वह भाजपा का ही क्यों न हो, उसे निकाल बाहर करुंगा !"
यह शब्द नरेन्द्र दामोदर मोदी ने वेटिंग प्रधानमन्त्री ने कहे थे लेकिन सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान के भ्रष्टाचार के मामले आने के बाद उनके बचाव में पार्टी संगठन के साथ-साथ प्रधानमन्त्री मोदी भी खड़े हुए नजर आये. भ्रष्टाचार के सवाल के ऊपर बड़ी-बड़ी डींगे हांकने वाले आदर्श और नैतिकता की बात करने वाले हिंदुवत्व की गंगा बहाने दिल्ली में लगे हुए हैं. इनकी किसी भी बात का यकीन करना वास्तव में छलावा है.
 डीडीसीए के भ्रष्टाचार मामले पर बीजेपी जेटली के साथ खड़ी नजर आ रही है वहीँ, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है  कि जेटली उसी तरह बेदाग निकल आएंगे, जैसे हवाला कांड में आडवाणी आए थे। 
 इस पर सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा हवाला कांड में आरोप लगने के बाद आडवाणी जी ने इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने सवाल उठाया कि इस मामले की जेटली से तुलना कर क्या पीएम अपने वित्त मंत्री को ऐसा करने का हिंट दे रहे हैं ? सीताराम येचुरी की यह बात भी सही नहीं है. 
                    यूपीए की सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में मंत्रियों के इस्तीफे लेकर कानून को अपना काम करने देती थी लेकिन मोदी सरकार जो उच्च आदर्शों, नैतिकता व हिंदुवत्व की माला चौबीस घंटे जपा करती है वह किसी का इस्तीफा नहीं लेंगे. भ्रष्ट मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों के समर्थन में नागपुर मुख्यालय से लेकर पार्टी का पूरा संगठन उसके बचाव में लग जाता है और उस भ्रष्टाचारी के भ्रष्टाचार को सही साबित करने के लिए विभिन्न भाषाओँ के शब्दकोशों का इस्तेमाल शुरू हो जाता है जिससे उस व्यक्ति के भ्रष्टाचार के ऊपर पर्दा पड़ा रहे. 
हर समय नागपुरी मुख्यालय भारत माँ-भारत माँ की गुहार लगाता फिरता रहता है लेकिन धृतराष्ट्र की तरह मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्यों व मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार नहीं दिखाई देते हैं. यही महिमा है नागपुर मुख्यालय की एक तरफ तो भारत माँ हैं दूसरी तरफ वह कफ़न घसोटों के साथ रहेगा. भारत माँ भ्रष्टाचार से आहत नहीं होती हैं ऐसा मानना है शायद नागपुर मुख्यालय का.

सुमन 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

अम्मा, मौसी, नानी के बीच संसद

भारतीय संसद में भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर काफी दिनों से अवरोध चल रहा है. प्रधानमंत्री ने मौन धारण कर लिया है. लोकसभा चुनाव के समय गरज-गरज कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात को सिंह गर्जना के रूप में करते थे. आज जब उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भगोड़े अपराधी ललित मोदी की पत्नी के बीमारी को मानवीय बता कर अपने द्वारा किये गए अपराध को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं तो संसद में  प्रधानमंत्री संसद का सामना न कर आरोपी सुषमा स्वराज द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला जारी कर रखा है जो संसदीय मापदंड के अनुरूप नहीं है. सदन में अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने कहा कि आखिर ललित मोदी से राहुल गांधी की मौसी को कितने पैसे मिले हैं। 
वहीँ सुषमा स्वराज ने कहा कि अपनी मां से पूछो राहुल की क्वात्रोच्चि मामले में हमने कितना पैसा खाया था, डैडी आपने ऐंडरसन को क्यों छुड़वाया। जैसे आरोप लगाये . मुख्य सवाल यह है कि सुषमा स्वराज स्वयं स्वीकार कर चुकी हैं कि अपराधी ललित मोदी के मामले में उन्होंने मानवीय आधार पर मदद की थी.
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मानवीय कानून और मानवता का आधार अलग अलग हैं। ललित मोदी ने यूके के बाहर यात्राएं की। वह शादियों और रिजॉर्ट में गया। खड़गे ने कहा,क्या आप ऎसे व्यक्ति को बचाना चाहती हैं जिसने कथित मानवीय आधार पर 460 करोड़ रूपए का घोटाला किया। 
क्षेत्रीय दल पहले सरकार का विरोध करते हुए अचानक पाला बदलते थे और अब भी संसद के आखिरी दिनों में पाला बदलने का खेल शुरू हो रहा है. शोर-शराबा हंगामा होना एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा होता है.
            यू पी ए-2 की सरकार के समय भाजपा के लोग शोर मचा कर संसद नहीं चलने देते थे और आखिरी एक-दो दिन में सरकार बगैर किसी बहस के तमाम सारे विधेयक पास करा लेती थी. जो कॉर्पोरेट सेक्टर के हित में होते थे और मेहनतकश जनता के खिलाफ होते थे और वही खेल मोदी सरकार के समय में खेला जा रहा है. आखिरी दिनों में तमाम सारा विधायी कार्य बगैर किसी बहस के पूरा हो जायेगा . कॉर्पोरेट सेक्टर अपने लाखों-लाख करोड़ रुपये का फायदा पाने के लिए मजदूर किसान विरोधी नयी आर्थिक नीतियों की बुलेट ट्रेन की तरह चला कर लागू कराना चाहती है और इसके लिए उन्होंने सदन के अन्दर सोची-समझी रणनीति के तहत मौनी बाबा-II सदन में चुप रहकर नयी आर्थिक नीति की दुष्प्रभावों की कोई चर्चा न हो. इसीलिए अम्मा, मौसी, नानी के बीच बहस जारी है. 

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पाप के दलदल में धंसे ये ढोंगी

कुछ साल पहले की बात है। निजी बातचीत में मैंने देश के एक प्रमुख धर्मगुरू से पूछा कि वे अपने प्रवचनों के दौरान देश में व्याप्त बुराईयों की चर्चा क्यों  नहीं करते? ‘
‘आप अपनी आभा और प्रभाव का उपयोग
मेरे प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि यदि हम भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध जिहाद छेड़ देंगे तो हमारी और हमारे चेलों की सुख-सुविधाओं का ध्यान कौन रखेगा!

 हमारे देश में धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का धन व वैभव से निकटता का संबंध है। मैंने कभी किसी धर्मगुरू को स्टेशन या हवाईअड्डे से आटो से आते नहीं देखा। एक दिन की बात है।  एक जानेमाने धर्मगुरू भोपाल पधारे थे।  जो कार उन्हें लेने गई थी वह ए.सी. नहीं थी। इस पर उन्होंने उस कार में बैठने से इंकार कर दिया। और जब तक ए.सी. कार नहीं आई, वे स्टेशन पर रूके  रहे।
पिछले कुंभ में मुझे उज्जैन जाने का अवसर मिला था। उज्जैन प्रवास के दौरान मैं अनेक धर्मगुरूओं के शिविर में गया। उनके कैंपों में वे सब सुविधाएं थीं जो शायद एक धनी व्यक्ति भी नहीं जुटा पायेगा। उज्जैन के कुंभ के दौरान साधुओं के शिविरों में कुल मिलाकर 4000 एयरकंडीशनर लगे थे और इन एयरकंडीशनरों को विद्युत प्रदाय करने के लिये राज्य विद्युत मंडल को विशेष इंतजाम करने पड़े थे। ज्ञातव्य है कि एक एयरकंडीशनर में लगभग उतनी ही बिजली की खपत होती है जितनी कि 100 वाट के 15 बल्बों में।
धर्मगुरूओं की एक कमजोरी रहती है। उनकी तीव्र इच्छा होती है कि उनके प्रवचन सुनने मुख्यमंत्री, मंत्री, आला अफसर और नगर के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति अवश्य आएं। फिर, उनकी यह भी इच्छा रहती है कि मुख्यमंत्री या मंत्री मंच पर आकर उन्हें माला पहनायें और उनके चरण छुएं।
यह दुःख की बात है कि सत्ता में बैठे लोगों और धर्मगुरूओं के बीच क्या संबंध हों, इस बारे में अभी तक हमारे देश में कोई सर्वमान्य परंपराएं या नियम नहीं बन सके हैं।
हमारे देश के संविधान के अनुसार, जो भी व्यक्ति संवैधानिक पदों पर रहते हैं, उन्हें हर हालत में सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिये। पर प्रायः यह देखा गया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग इन धर्मगुरूओं के सामने नतमस्तक होते हैं और सार्वजनिक रूप से उनके चरणस्पर्श करते हैं।
कुछ माह पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी अपने मध्यप्रदेश  प्रवास के दौरान जबलपुर के पास स्थित एक आश्रम में वहां के शंकराचार्य से मिलने गए थे। शंकराचार्य से मुलाकात का उनका फोटो अखबारों में छपा था। इस फोटो में शंकराचार्य अपने आसन पर बैठे हैं और राष्ट्रपति, झुककर, हाथ जोड़कर उनका अभिवादन कर रहे हैं। जब भी राष्ट्रपति किसी सभा या महफिल में प्रवेश करते हैं तो उपस्थित सभी लोग खड़े हो जाते हैं। क्या शंकराचार्य को खड़े होकर राष्ट्रपति जी का स्वागत नहीं करना था? ऐसा न करके, क्या शंकराचार्य ने प्रोटोकाल के नियमों का उल्लंघन नहीं किया? हमारे देश के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है। उनके ऊपर किसी का स्थान नहीं है।
नागरिक उड्डयन सुरक्षा  नियमों के अनुसार, कुछ ऐसे लोगों को छोड़कर, जो संवैधानिक पदों पर पदस्थ हैं, कोई भी व्यक्ति बिना सुरक्षा जांच के हवाईजहाज पर सवार नहीं हो सकता। अभी हाल में ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपे एक समाचार के अनुसार, बापू आसाराम को यह सुविधा प्राप्त थी। वे अपनी कार से सीधे हवाईजहाज तक पहुंचते थेे। उन्हें यह सुविधा किन नियमों के अन्तर्गत दी गई थी? किस अधिकारी ने इस तरह की सुविधा देने के आदेश जारी किये थे? ऐसे आदेशों से ही इन धर्मगुरूओं को सिर पर चढ़ाया जाता है।
फिर, प्रश्न यह भी है कि क्या धर्मगुरूओं को संपत्ति रखना चाहिये? ये धर्मगुरू प्रायः अपने अनुयायियों को सादा जीवन बिताने और क्रोध, काम, लोभ व मद से ऊपर उठने का उपदेश देते हैं। परन्तु ठीक इसके विपरीत, ये धर्मगुरू अरबों की संपत्ति के मालिक बन जाते हैं। समाचारपत्रों में बताया गया है कि आसाराम की संपत्ति कम से कम पांच हजार करोड़ रूपये की है। ऐसा कोई भी बड़ा शहर नहीं है जहां आसाराम का आश्रम न हो। ये आश्रम सैंकड़ों एकड़ जमीन में फैले हुये हैं और कहा जाता है कि अधिकांश आश्रम सरकारी भूमि पर कब्जा कर बनाए गए हैं। 
एक बात और। इन धर्मगुरूओं को सत्ता में बैठे लोगों से बड़ा प्रेम होता है। आसाराम के एक विशेष सहायक थे जो सिर्फ मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और धनकुबेरों के फोन सुनते थे और उनकी आसाराम से बात करवाते थे। आसाराम बापू के उमा भारती, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुन्धराराजे सिंधिया, गुजरात के मंत्री रहे अमित शाह और वर्तमान में सलाखों के पीछे डाल दिये गए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी  डी.जी. बंजारा से प्रगाढ संबंध हैं। सन् 2009 तक गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी उनके प्रगाढ़ संबंध थे। आसाराम के अलावा, अन्य धर्मगुरू भी राजनीतिज्ञों से प्रगाढ़ संबंध रखते हैं।
इन धर्मगुरूओं पर आये दिन अनेक आरोप लगते रहते हैं। आसाराम पहले धर्मगुरू नहीं हैं जिन पर यौन शोषण का आरोप लगा है। इसके पूर्व भी अनेक धर्म गुरूओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं।
इन धर्मगुरूओं की एक और विशेषता होती है। ये अपने आश्रमों में बाहुबलियों को भी पालकर रखते हैं। इन बाहुबलियों का उपयोग वे अपने विरोधियों का दमन करने के लिये करते हैं।
आसाराम के बारे में जो सच सामने आ रहे हैं, उनसे ऐसा लगता है कि इन धर्मगुरूओं के आश्रम असल में अपराधियों के केन्द्र हैं। इस बात के मद्देनजर  आवश्यकता है कि इस तरह के आश्रमों और उनमें संचालित गतिविधियों पर सतत नजर रखी जाये। इस तरह के धर्मगुरू उतने ही खतरनाक हैं जितने कि आतंकवादी और अन्य ऐसे संगठनों के सदस्य, जो हिंसा का सहारा लेकर अपनी गतिविधियां संचालित करते हैं। अतः इस बात की आवश्यकता है कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिये पुलिस की गुप्तचर शाखा में एक विशेष प्रकोष्ठ स्थापित किया जाये। इनके बारे में एक और प्रश्न पर विचार होना चाहिये। क्यों न इन धर्मगुरूओं द्वारा अर्जित धन पर टैक्स लगाया जाये? ये धर्मगुरू सस्ते दामों पर सरकारों से जमीन लेते हैं और फिर उस जमीन पर तरह तरह के व्यवसाय करते हैं। इनमें से कई दवाईयों के उत्पादन के कारखाने स्थापित कर लेते हैं और अपने तथाकथित श्रद्धालुओं को ये दवाएं बेचकर करोड़ों की कमाई करते हैं। आयुर्वेद के एक डाक्टर हैं, अमित शाह। वे एक समय आसाराम से जुड़े हुए थे। वे आसाराम के दवा उत्पादन व्यवसाय की देखभाल करते थे। उन्होंने बताया है कि जब आसाराम द्वारा उत्पादित दवाईयां लोकप्रिय हो गईं तो आसाराम ने उनसे कहा कि दवाईयों में काम आने वाले कच्चे माल की लागत में कमी करो। ऐसा करने से दवाईयों की गुणवत्ता पर असर होता। उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। ‘‘मैंने उनसे कहा कि मैं आश्रम से विदा होना चाहूंगा‘‘। इस पर आसाराम ने कहा कि वे उनकी डाक्टरी नहीं चलने देंगे। बाद में उन्होंने खुद ही मुझे हटा दिया। उसके बाद आसाराम के लोगों ने इस डाक्टर को एक झूठे मामले में फंसाकर राजस्थान पुलिस द्वारा परेशान करवाया। परन्तु दुःख की बात है कि अमित शाह की शिकायत के बावजूद, दवाईयों की गुणवत्ता को लेकर आसाराम के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस तरह की दवाईयां बेचना न सिर्फ अपराध है वरन् जघन्य पाप भी है।
यह स्पष्ट है कि ऐसा कोई पाप नहीं है जो साधुओं और धर्मगुरूओं का लबादा ओढ़े ये ढोंगी नहीं करते। 
भ्रष्टाचार, हिंसा, जातिवाद, दहेजप्रथा, साम्प्रदायिकता आदि जैसी बुराईयों के विरूद्ध वातावरण बनाने में क्यों नहीं करते? आप किसी शहर में अपने प्रवास के दौरान धनी एवं प्रभुत्वशाली व्यक्तियों के स्थान पर किसी गरीब की झोपड़ी मंे क्यों नहीं ठहरते?‘‘


 -एल. एस. हरदेनिया

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

हिन्दुवत्व और 20 हजार करोड़

हिदुवत्व वादी संगठन व उसकी सोच वाले लोग हर समय कांग्रेसी भ्रष्टाचार को कोसते रहते हैं लेकिन उनकी निगाहें अपनी तरफ कभी नहीं होती हैं। गडकरी के भ्रष्टाचार की चर्चा समाप्त नहीं हुई थी की कट्टर हिन्दुवत्व वादी नेता नरेन्द्र मोदी 20 हजार करोड़ रुपये के घोटाले  संप्लिप्त पाए गए हैं. 
मोदी सरकार ने केजी बेसिन में गैस के ठेके के लिए 2003 में एक ऐसी कंपनी को दिया जो 6 दिन पहले बनी थी और कोई अनुभव नहीं था. गुजरात सरकार ने बिना किसी योगदान के जियोग्लोबल नाम की कंपनी पर 20 हजार करोड़ रुपए लुटा दिए.
   सन 2003 में केजी बेसिन में गैस की निकासी के लिए गुजरात सरकार की कंपनी जीएसपीसी ने एक कंसोर्शियम बनाई. टेक्निनकल एक्सपर्टीज के नाम पर 10 प्रतिशत इक्विटी बारबाडोस की कंपनी जियोग्लोबल को दी गई, जबकि कंपनी महज 6 हफ्ते पहले और सिर्फ 64 डॉलर से वजूद में आई थी. इतना ही नहीं, जरुरत पड़ने पर जियोग्लोबल की टेक्निकल एक्सपर्टीज काम न आई और 2 करोड 64 लाख में दूसरी कंपनी ने ये काम किया. इस तरह से बड़े-बड़े घोटालेबाजों में श्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं। फर्क इतना है कि यह लोग हर समय मुंह में राम बगल में छुरी वाला मुहावरा चरितार्थ करते रहते हैं।
          कांग्रेस भ्रष्टाचार का ए संस्करण है तो भारतीय जनता पार्टी व हिन्दुवत्व वादी संगठन उसके बी संस्करण हैं। मौका मिलते ही सभी बंगारू हो जाते हैं या गडकरी। आर्थिक सुधारों के सवाल के नाम पर हो रही लूट में दोनों दल शामिल हैं। दोनों दलों की निष्ठां इस समय अमेरिकी साम्राज्यवाद में है।

सुमन 

रविवार, 19 अगस्त 2012

कोयला महाकाव्य के नायक भी हर महाकाव्य की तरह मर्यादा पुरुषोत्तम!

कोयला माफिया की बात करें तो जेहन में फौरन धनबाद और कोरबा के नाम कौंधते हैं। अनुराग कश्यप की फिल्म ट्विन वासेपुर गैंग्स ने कोयला माफिया का दायरा धनबाद के एक मोहल्ले और दो परिवारों के खूनी रंजिश में सीमाबद्ध कर दिया। पर कोयला आवंटन मामले में कैग की रिपोर्ट के बाद सरकार कितनी मुश्किल में फंसी यह तो कहना मुश्किल है, पर कोयला माफिया के राष्ट्रीय चेहरे की झलक दीखने लगी है, जिसके आगे धनबाद कोरबा के माफिया बेहद बौने हो गये हैं।सीएजी की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि कॉर्पोरेट घरानों को कोयले की खानें सरकार ने कौड़ियों के भाव दी है। इस रपट से खूनी रंजिश के बजाय कारपोरेट वार की महाभारती पृष्ठभूमि भी साफ नजर आती है। रिलायंस को यूएमपीपी के ठेके देने में नियमों की धज्जियां उड़ा दी गई।इंदिरा जमाने में रिलांयस के हैरतअंगेज उत्थान को भी लोग भूल चुके हैं, जिसे अब तरह तरह के माध्यमों में महिमामंडित किया जाता है। ये आवंटन 2004 से 2006 के बीच हुए जब कोयला मंत्रालय खुद पीएम मनमोहन सिंह देख रहे थे।रिलायंस पावर ने अतिरिक्त कोयला आवंटन पर सीएजी का खंडन किया है। कोयला खानों के राष्ट्रीयकरण के बाद से यह खेल जारी है, जिससे देश की राजनीति चलती रही है। लोग शायद यह किस्सा भूल चुके होंगे कि कैसे केंद्र में काबिज एक प्रधानमंत्री से धनबाद के मफिया सरताज के मधुरतम रिश्ते रहे हैं। तब सत्तादल के राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए धनबाद के कनात काफी चर्चा में आये थे।इस कैग रपट को बी भुला देने में शायद ज्यादा देर नहीं लगेगी। तमाम घोटालों से घिरी सरकार ने जो राजनीतिक और प्रशासनिक दक्षता उन घोटालों को रफा दफा करने में दिखाया है, किंचित देश चलाने और जनता की तकलीफों को दूर करने में यही करतब दिखाया होता, तो विकास दर कथा में नियतिबद्ध होते हम। कोयला महाकाव्य के नायक भी हर महाकाव्य की तरह मर्यादा पुरुषोत्तम दीखते हों,तो यह परंपरा और संस्कृति दोनों के माफिक ठीक है और कारोबार के लिहाज से अत्यंत सुविधाजनक। इस कैग रपट से पहले पहले से संकट में फंसे कोल इंडिया को निजी बिजली कंपनियों को कोयला आपूरिति सुनिश्चित करने के लिए सीधे राष्ट्रपति भवन से डिक्री जारी हुआ था। पर इस कारपोरेट लाबिंइंग पर मीडिया और राजनीति दोनों ने रणनीतिक मौन धारण किये रखा।अब मौन जरूर टूटता दीख रहा है, लेकिन हर घोटाले के बेपर्दा होने के बाद यह तो सत्ता समीकरण साधने की परंपरागत कवायद है, कालेधन की व्यवस्था को बदलने के लिए नहीं।कैग ने संसद में आज तीन रिपोर्ट पेश कीं, जिनमें कहा गया है कि निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया है। इस पर रिलायंस पावर ने त्वरित प्रतिक्रिया में कहा कि अंकेक्षण आकलन में घरेलू कोयले के उत्पादन को बढ़ाने के हित को ध्यान में नहीं रखा गया। अपने बचाव में दिल्ली इंटरनैशनल एयरपोर्ट लि. (डायल) की नियंत्रक कंपनी जीएमआर ने नवंबर 2006 के उच्चतम न्यायालय के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें बोली प्रक्रिया को वैध और सही करार दिया गया था। सरकार की दलील है कि सीएजी का विंडफॉल गेन्स का दाव भ्रामक, अनुमानित और काल्पनिक है। सासन यूएमपीपी का 160 मीट्रिक टन सरप्लस कोयला सिर्फ 1,700 करोड़ रुपये था। वहीं सासन यूएमपीपी का 29,033 करोड़ रुपये का आकलन 1700 फीसदी ज्यादा है। कोल इंडिया की कीमतों पर नुकसान का अंदाजा लगाना गलत है। कोयला मंत्रालय कैप्टिव ब्लॉक के सरप्लस कोल पर पॉलिसी बना रहा है। माना जा रहा है कि सरकारी कंपनियों को बिना बोली लगाए कोल ब्लॉक मिलेंगे। वहीं कोल ब्लॉक के आवंटन में देरी के लिए कंपनियों को जिम्मेदार ठहराना गलत है।

बहरहाल कैग की रिपोर्ट के बाद सीएजी द्वारा कोल ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी का आरोप लगाने से बाजारों ने शुरुआती मजबूती गंवाई। कोयला ब्लॉक पाने वाली कंपनियों के शेयरों में आज खासी गिरावट देखी गई। बंबई स्टॉक एक्सचेंज पर आर पावर का शेयर 5.60 फीसदी, जेएसपीएल का 4.25 फीसदी, टाटा पावर 3.71 फीसदी, जीएमआर इन्फ्रा 3.07 फीसदी और टाटा स्टील का शेयर 0.85 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ।बंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स कारोबार के दौरान 140 अंक चढ़ने के बाद कोयला ब्लॉकों पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट आने के बाद 'घबरा' गया और अंत में यह मात्र 34 अंक की बढ़त के साथ बंद हुआ।वैसे तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट अक्सर हड़कंप मचाती रही हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसने सरकार के लिए परेशानियां पैदा की हैं। सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की कैग रिपोर्टों से काफी फजीहत हुई है। मामला चाहे 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट का हो या राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी अनियमितताओं का, कैग की रिपोर्ट ने सियासी गलियारों में खलबली मचाई। 2जी लाइसेंस और स्पेक्ट्रम आवंटन मसले से जुड़ी कैग की विवादास्पद रिपोर्ट 16 नवंबर, 2010 को संसद में पेश की गई। उससे दो दिन पहले संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री राजा ने अपने पद से इस्तीफा दिया था क्योंकि इस रिपोर्ट के संसद में पेश किए जाने से पहले ही स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद पर काफी हो-हल्ला मच रहा था। दरअसल उस वक्त तक मीडिया में भी 2जी स्पेक्ट्रम से जुड़ी खबरें सुर्खियां बनने लगी थीं। कोयला खदानों के विश्लेषण पर आधारित रिपोर्ट में 2G से भी बडे नुकसान की बात कही गई है।

2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद सरकार पर कोयला ब्लाकों का आवंटन भारी पड़ गया है। मामला महज कोयला ब्लाकों के हस्तांतरण का नहीं है।खान परियोजनाओं के लिए पांचवी छठीं अनुसूचियों के खुला उल्लंघन,वनक्षेत्र के बेरहम सफाये से प्रकृति और मनुष्य के सर्वनाश और खनन अधिनियम, पर्यावरण अधिनियम, वनाधिकार कानून, पंचायती राज कानून, पीसा, खान सुरक्षा कानून के खुले उल्लंघन का जो कारोबार चलता है, वह राष्ट्रीय मापिया के बिना असंभव है। कर्नाटक के अवैध खदानों से खनन उद्योग में सत्ता की गहरी पैठ उजागर हो ही चुकी है।कैग रपट से तो महज इसका कारपोरेट चेहरा उजागर हुआ है। मुक्त बाजार में अकूत मुनाफा कमाने के लिए कारपोरेट को रंग बिरंगे राहत दिये जाने के इस स्वर्ण युग में जबकि राष्ट्रपति भवन से लेकर पंचायतों तक में औद्यौगिक घरानों की घुसपैठ है,विपक्ष और सत्तादल समान रुप से उनके हितों को सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते तो मामूली कैग रपट की क्या औकात कि इस स्वर्णिम व्यवस्था को बदल दें।सीएनजी ने कोयला मंत्रालय को दोषी ठहराते हुए आरोप लगाया है कि सरकार ने बैंक गारंटी ही नहीं ली। सीएजी ने सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया है कि रिलायंस पावर को अतिरिक्त कोयले के इस्तेमाल की इजाजत दी गई। रिलायंस पावर को सासन यूएमपीपी में फायदा पहुंचाया गया है। सीएजी ने सरकार को सासन यूएमपीपी को आवंटित तीसरे कोल ब्लॉक की समीक्षा करने को कहा है। रिलायंस पावर को सासन यूएमपीपी से 29,003 करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। रिलायंस पावर को अतिरिक्त कोयले के इस्तेमाल की इजातत के लिए नीलामी प्रक्रिया का उल्लंघन किया गया। सीएजी ने सासन यूएमपीपी के लिए अतिरिक्त कोल ब्लॉक की इजाजत देने के लिए ऊर्जा मंत्रालय की खिंचाई की है। रिपोर्ट में ये भी आरोप लगाया गया है कि मुंद्रा, कृष्णापट्टनम पावर डेवलपर्स को अतिरिक्त जमीन दी गई है।रिलायंस पावर का कहना है कि एडवांस टेक्नोलॉजी की वजह से कंपनी के पास अतिरिक्त कोयला है। कंपनी को दिए गए कोयले के ब्लॉक्स को ईजीओएम से मंजूरी मिली थी। कोयले की मौजूदा कमी को देखते हुए सीएजी की रिपोर्ट निर्थक है। सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के लिए कोयला ब्लॉक्स के आवंटन में कंपनी का कोई लेना-देना नहीं थी।

हमने अपनी पत्रकारिता धनबाद से शुरू की। कोयलांचल और कोयलाखानों में चार साल खपाये। राजनेताओं और कोयला माफिया के चोली दामन के साथ का चश्मदीद गवाह रहा हूं। बिना काम किये भुगतान से लेकर, खान दुर्घटनाओं और उन्हें रफा दफा करने के चाक चौबंद बंदोबस्त, कोयला मजूर यूनियनों का खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी और अवैध खनन का कारोबार, सबकुछ देखा है।कोयला माफिया कहीं और कभी स्थानीय नहीं हुआ।जैसा कि मीडिया रपटों और फिल्मी चाशनी में बताया जाता है। कोयला का गोरखधंधा हमेशा उन तारों की लंबाई और ताकत पर निर्भर रहा है जो या तो सूबे की राजधानी से या फिर सीधे दिल्ली से जुड़े रहे हैं। संसद में पेश कैग की रिपोर्ट इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय [पीएमओ] के फैसलों पर भी सवालिया निशान खड़े करती है। बोली के जरिये कोयला ब्लाक आवंटन के फैसले को लागू करने में हुई सात साल की देरी को लेकर भी कैग ने हैरानी जताई है।कोयला घोटाले पर कैग ने अपनी बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट शुक्रवार को संसद में पेश कर दी। रिपोर्ट में हालांकि सरकार को हुए नुकसान का आंकड़ा करीब तीन महीने पहले लीक हुई रिपोर्ट के आंकड़े से बेहद कम है। लीक हुई रिपोर्ट में निजी कंपनियों को 57 कोल ब्लाकों के आवंटन से 10.67 लाख करोड़ रुपये के नुकसान का आंकड़ा सामने आया था। लेकिन, इस रिपोर्ट में केवल 1.86 लाख करोड़ का आंकड़ा है। कैग ने इसे सरकार को नुकसान नहीं बल्कि कंपनियों को हुआ फायदा बताया है। चूंकि कैग एक संवैधानिक संस्था है इसलिए यदि वह इसे सरकार को हुए नुकसान के रूप में पेश करती तो उसका असर सरकार के राजस्व संग्रह में हुए नुकसान के रूप में देखा जाता।कैग ने निजी कंपनियों को हुए फायदे का अनुमान ओपन कास्ट खनन के जरिये निकलने वाले कोयले की औसत उत्पादन लागत और 2010-11 के मूल्य के अंतर के आधार पर लगाया है। कैग ने प्रतिस्पर्धी बोली के जरिये कोल ब्लाकों के आवंटन के फैसले तक पहुंचने में हुई देरी का सिलसिलेवार ब्योरा रिपोर्ट में प्रस्तुत किया है। इसमें कोयला मंत्रालय और पीएमओ के बीच हुए संवाद का पूरा ब्योरा शामिल है। 2004 से 2009 के दौरान एक बड़े अरसे तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्रालय का कामकाज भी देख रहे थे।सीएजी की रिपोर्ट ने देश में भूचाल ला दिया है। बीजेपी ने कोयला आवंटन घोटाले को अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग की। वहीं समाजवादी पार्टी जैसे सहयोगी ने भी केंद्र सरकार को घोटालेबाजों की सरकार तक करार दिया।सरकार ने कैग की उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कोयला, विमानन तथा बिजली क्षेत्र की निजी कंपनियों को 3.06 लाख करोड़ रुपये का अनुचित लाभ देने की बात कही गयी है। सरकार का कहना है कि यह रिपोर्ट भ्रमित करने वाली है और गलत है। साथ ही यह भी कहा कैग अपने अधिकारों के दायरे में रहकर काम नहीं कर रहा है।

कोयला ब्लाक आवंटन सहित कैग की रिपोर्ट को लेकर विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को निशाना बनाये जाने के बीच कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शुक्रवार को वरिष्ठ मंत्रियों और पार्टी के नेताओं के साथ बैठक की।सोनिया गांधी के निवास पर हुई इस रणनीति बैठक में हिस्सा लेने वालों में रक्षा मंत्री के एंटनी, वित्त मंत्री पी चिदम्बरम, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल और संसदीय कार्य राज्य मंत्री वी नारायणसामी शामिल थे। यह बैठक कैग की रिपोर्ट संसद में आने के कुछ घंटे बाद हुई।विमानान मंत्रालय का कहना है कि दिल्ली एयरपोर्ट से संबंधित सभी मामलों पर फैसले ईजीओएम और कैबिनेट की ओर से लिए गए हैं। सीएजी की इन रिपोर्टों से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर होने के आसार हैं। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की तेज प्रगति में ऐसी रिपोर्ट रोड़ा बन सकती हैं। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले विमानन मंत्रालय की राय नहीं ली है। दिल्ली एयरपोर्ट के लिए मंगाई गई बोली पारदर्शी थी और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में नीलामी प्रक्रिया पूरी हुई थी। वहीं एयरपोर्ट रेगुलेटर की ओर से डेवलपमेंट फीस तय की जाती है। डेवलपमेंट फीस तय करने में विमानन मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं होती। दिल्ली एयरपोर्ट पीपीपी के चलते एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को 3 लाख करोड़ रुपये का लाभ हुआ है।

इसी के मध्य कोयला खानों के आवंटन में कथित अनियमितताओं की जांच में तेजी लाते हुए सीबीआई ने उन वरिष्ठ अधिकारियों से शुक्रवार को पूछताछ की जो 2006-09 के दौरान कोयला मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे।
सीबीआई सूत्रों ने कहा कि जांच एजेंसी ने सचिवों संयुक्त सचिव सहित जांच समिति के सदस्यों से भी पूछताछ की।

सूत्रों ने कहा कि वे आज संसद में पेश की गई कैग की रपट का अध्ययन करेंगे, लेकिन तभी कोई मामला दर्ज करेंगे जब जांच के दौरान कुछ आपराधिक तथ्य सामने आते हैं।उन्होंने कहा कि उस दौरान कोयला खानों के आवंटन में शामिल मुद्दों को समझने के लिए जांच समिति के प्रमुखों से पूछताछ की गई।सूत्रों ने कहा कि जांच एजेंसी ने करीब 15 कंपनियों के नाम छांटे हैं जिन्होंने कथित तौर पर कोयला खदान आवंटन के नियमों का उल्लंघन किया और उनके अधिकारियों से पूछताछ जारी है।

सीबीआई ने केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा उसे सौंपी गई एक शिकायत के संबंध में अज्ञात लोगों के खिलाफ आरंभिक पूछताछ (पीई) दर्ज किया जो कि सीबीआई जांच शुरू करने का पहला कदम है।

कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि कच्चे तेल को छोड़कर खदानों के आवंटन के लिए अब तक बोली प्रक्रिया के तौर तरीकों को नहीं अपनाया जा सका है। हालांकि कोयला ब्लॉकों की बोली प्रक्रिया के लिए वैधानिक संशोधन के जरिये मंजूरी दी जा चुकी है। कोयला मंत्रालय ने कहा कि संप्र्रग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2004 में प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिये कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर विचार किया गया था।2004 में जब इन कोयला ब्लॉकों का आवंटन हुआ था, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा, 'इसके लिए प्रधानमंत्री सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। अब वह किसी तर्क के पीछे नहीं छिप सकते और 2जी मामले की तरह इसमें उनके पास राजा या चिदंबरम जैसी ढाल भी नहीं है।' प्रधानमंत्री के बचाव में उतरे प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री वी नारायणसामी ने कहा कि कैग अपने कार्यक्षेत्र के बाहर जाकर काम कर रहा है।

इसी बीच टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने जमीन अधिग्रहण कोयला ब्लॉक की नीलामी को बड़ी चुनौती बताते हुए कहा है कि इससे देश के पावर सेक्टर के विकास में रुकावट पैदा हो रही है।टाटा पावर की सालाना आम बैठक में टाटा ने कहा, 'बढ़ती ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए मुख्य ईंधन कोयला। जमीन अधिग्रहण तथा कोयला ब्लॉक की नीलामी को लेकर सवाल है। यह चिंता का कारण है।' उन्होंने कहा, 'सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध कराना चुनौती है।'टाटा ने यह बात ऐसे समय में कही है जब कैग की संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि कोयला ब्लाक बिना प्रतिस्पधीर् बोली के देने से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में टाटा समूह की टाटा स्टील तथा टाटा पावर के भी नाम हैं जिन्हें विभिन्न राज्यों में कोयला ब्लॉक मिले हैं। टाटा ने कहा कि टाटा पावर के सामने जमीन अधिग्रहण तथा पर्यावरण मंजूरी प्रमुख चुनौती है।मोनेट इस्पात के संदीप जाजोडिया का कहना है कि सीएजी द्वारा 1.86 लाख करोड़ रुपये के घाटे के अनुमान को लेकर कई सवाल हैं। अगर कोल ब्लॉक्स का आवंटन रद्द किया जाता है तो कंपनियों को भारी नुकसान होगा। किसी भी कंपनी ने कोयला खदानों का दुरुपयोग नहीं किया है। मंजूरी मिलने में देरी होने की वजह से कोयला खदानों में उत्पादन लटकता है, जिसको दूर करने के लिए सरकार को कदम उठाने चाहिए।

भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने संसद में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में सरकार की नीतियों में खामी को सामने लाते हुए कहा कि यदि कोयला क्षेत्र का आवंटन मनमाना तरीके से कर प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर किया जाता तो सरकार को 1.85 लाख करोड़ रुपये का राजस्व हासिल होता। साथ ही कैग ने अनिल अंबानी की कंपनी को करीब 29,033 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचाए जाने की बात भी कही है।रिपोर्ट के मुताबिक मंत्रियों के अधिकारप्राप्त समूह [ईजीओएम] ने अनिल अंबानी की इस कंपनी को यह सहूलियत 2008 में मध्य प्रदेश सरकार के कहने पर दी थी। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को नवंबर, 2007 में इस बाबत खत लिखकर अनुरोध किया था। शुक्रवार को राज्यसभा में कोल ब्लॉक आवंटन के अलावा पावर और सिविल एविएशन पर भी कैग की रिपोर्ट पेश की गई। बिजली और विमानन के मामले में भी कैग ने सरकार के पक्षपातपूर्ण रवैये पर सवाल खड़े किए हैं।कोयले पर कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्लॉकों की प्रतिस्पर्धी तरीके से नीलामी कराने की वजह से प्राइवेट कंपनियों को 1 लाख 85 हजार 591 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ और सरकार को इतने का ही नुकसान हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक, मनमानी पूर्ण आवंटन के बजाय इन खदानों की नीलामी की गई होती तो सरकारी खजाने में करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का ज्यादा राजस्व आता। कैग ने अपनी रिपोर्ट में रिलायंस पावर, टाटा स्टील, टाटा पावर, भूषण स्टील, जिंदल स्टील ऐंड पावर, हिंडाल्को और एस्सार ग्रुप समेत 25 कॉर्पोरेट घरानों को फायदा मिलने की बात कही है।कैग ने कहा है कि उसने यह अनुमान कोल इंडिया की वर्ष 2010-11 के दौरान कोयला उत्पादन की औसत लागत और खुली खदान से कोयला बिक्री के औसत मूल्य के आधार पर लगाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'यदि कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धी बोलियां मंगाने के कई साल पहले लिए गए फैसले पर अमल कर लिया जाता तो कंपनियों को होने वाले इस अनुमानित वित्तीय लाभ का कुछ हिस्सा सरकारी खजाने में पहुंच सकता था।'

कैग के मुताबिक कोयला ब्लाक प्रतिस्पर्धी बोली के जरिये आवंटित करने की नीति लागू करने में हुई देरी का फायदा निजी कंपनियों को हुआ। कैग ने रिपोर्ट में कोयला सचिव के 28 जून, 2004 के उस नोट का जिक्र भी किया है जिसमें इस नीति को स्वीकार किया गया था। सरकार इसे 2012 में लागू करवा पाई। जबकि, कैग के मुताबिक इस नीति को 2006 तक लागू हो जाना चाहिए था। कोयला ब्लाकों का आवंटन 2005 से 2009 के बीच हुआ था।पीएमओ ने इस रिपोर्ट को शुरुआती रिपोर्ट बताते हुए कहा है कि कैग ने अपनी सीमाओं से परे जाकर काम किया है। लेकिन, इससे कैग रिपोर्ट की गंभीरता खत्म नहीं होती। जानकारों का मानना है कि सरकार ने इसे संसद में पेश किया है और वह इस पर संज्ञान लेते हुए आगे की कार्रवाई कर सकती है जैसा कि 2जी घोटाले और राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में हुए घपले पर कैग की रिपोर्ट के मामले में हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार सासन अल्ट्रा मेगा पावर परियोजना के लिए सालाना 1.6 करोड़ टन कोयले की जरूरत को देखते हुए सरकार ने रिलायंस पावर को मोहर, मोहर-अमलोहरी एक्सटेंशन और छत्रसाल की तीन कोयला खदानें दी थीं। लेकिन रिलायंस ने इनके कोयले का इस्तेमाल अपनी दूसरी परियोजनाओं के लिए करने की अनुमति लेकर 29,033 करोड़ का अनुचित फायदा उठा लिया। खास बात यह है कि अन्य परियोजनाओं के लिए बिजली टैरिफ आधारित बिडिंग के जरिए बेची जानी थी।

सासन मुंद्रा के ठेके देने में कदम-कदम पर नियमों के साथ खिलवाड़ किया गया। पहली गड़बड़ी कंसल्टेंसी का ठेका देने में हुई, जिसे सबसे कम बोली लगाने के बावजूद इक्रा के बजाय अन्र्स्ट एंड यंग [ईएंडवाइ] को दे दिया गया। यही नहीं, कृष्णापत्तनम और तिलैया यूएमपीपी की कंसल्टेंसी बिना निविदा मंगाए ही ईएंडवाइ को दी गई। वैसे, बाद में पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन [पीएफसी] ने गड़बड़ियों के कारण ईएंडवाइ को तीन साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया।

निविदा प्रपत्रों के लिए विधि विभाग से जरूरी परामर्श नहीं लिया गया। उलटे विद्युत मंत्रालय समय-समय पर शर्तो में ढील देता रहा। बोली लगाने वाली कंपनियों के लिए शुरू में यह शर्त थी कि इनमें मूल कंपनी की 51 फीसद हिस्सेदारी होनी चाहिए। बाद में इसे 26 फीसद कर दिया गया। यूएमपीपी द्वारा क्षमता का कम से कम 85 फीसद बिजली उत्पादन करने की शुरुआती शर्त को भी बाद में 80 और फिर 75 प्रतिशत कर दिया गया। तिलैया और कृष्णापत्तनम में चुनी गई कंपनी पर इक्विटी-लॉक इन की अवधि को 12 से घटाकर 5 साल कर दिया गया। चारों प्रोजेक्ट में कंपनियों को दो साल में ही अपनी इक्विटी 51 से 26 फीसद करने की सुविधा दे दी गई। कंपनियों के लिए नेट वर्थ की शर्त भी बहुत ढीली रखी गई। सार्वजनिक निजी भागीदारी [पीपीपी] प्रोजेक्ट में वित्त मंत्रालय की शर्त है कि बोली लगाने वाली की नेट वर्थ परियोजना लागत की 15 प्रतिशत होनी चाहिए। लेकिन यूएमपीपी के मामले में इसे पांच प्रतिशत रखा गया। यानी 20 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए केवल 1,000 करोड़ की नेट वर्थ। और तो और मुंद्रा कृष्णापत्तनम यूएमपीपी के मामले में कंपनियों को क्रमश: 1,538 एकड़ और 1,096 एकड़ फालतू जमीन भी दे दी गई।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पर जहां प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से तत्काल इस्तीफे की मांग की है, वहीं सरकार ने सीएजी के निष्कर्ष को खारिज कर दिया।कोयला आवंटन मामले में कैग की रिपोर्ट के बाद मुश्किल में फंसी सरकार ने विपक्षी पार्टियों की कई राज्य सरकारों को भी लपेटे में ले लिया है। साथ ही सरकार ने कैग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि इस बारे में सरकार की नीति पारदर्शी थी और उसमें कुछ गलत नहीं हुआ।कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने जोर देकर कहा कि कोल ब्लॉक आवंटन इससे बेहतर तरीके से नहीं हो सकता था। जायसवाल ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने भी टेंडर पॉलिसी का विरोध किया था। विरोध करने वालों में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल की सरकारें थीं। इन राज्य सरकारों का कहना था कि टेंडर की प्रक्रिया से कोयले की कीमत बढ़ जाएगी और और बिजली भी महंगी हो जाएगी, जो आम जनता के हित में नहीं है। गौरतलब है कि उस वक्त राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार थी।कोयला मंत्री ने कहा कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन के लिए अपनाई गई नीति में कोई खामी नहीं थी। कोयला ब्लॉकों के आवंटन के लिए इससे पारदर्शी और नीति नहीं हो सकती थी, क्योंकि 2004 में प्रतिस्पर्धी बोली की व्यवस्था ही नहीं थी। जायसवाल ने यहां तक कहा, उस वक्त 3 राज्य सरकारों का कहना था कि तत्कालीन आवंटन नीति में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। संघीय ढांचा में हमें राज्यों की भावनाओं का सम्मान करना पड़ता है।



गौरतलब है कि कोयला ब्लॉक आवंटन के लिए प्रतिस्पर्धी बोली व्यवस्था को समय पर लागू करने में विफल रहने के लिए सरकार की आलोचना करते हुए कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यदि बोली के जरिए आवंटन की प्रक्रिया लागू कर दी जाती तो 1.86 लाख करोड़ रुपये का कुछ हिस्सा सरकार के खजाने में सकता था।

जायसवाल ने कहा कि उनका मंत्रालय कैग की रिपोर्ट के सभी पहलुओं से सहमत नहीं है। ऑडिटर ने जो आकलन किया है उसमें कोयला ब्लॉक आवंटन के कुछ ही पहलुओं को आधार बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्राइवेट कंपनियों को कोयला ब्लॉकों के विकास का काम इसलिए दिया गया, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया देश की बढ़ती जरूरत को पूरा नहीं कर पा रही थी। सीएजी के आकलन पर जायसवाल ने कहा कि ये आंकड़े काल्पनिक हैं। जब कोयला खदान चालू नहीं थे, ऐसे में किसी किस्म के नफे-नुकसान का आकलन करना सही आइडिया नहीं है। उन्होंने कहा कि प्राइवेट कंपनियों को आवंटित 57 कोयला ब्लॉकों में से अभी सिर्फ एक से कोयला निकाला जा रहा है।

एविएशन पर कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर यात्रियों से डिवेलपमंट फीस वसूलने की इजाजत देकर जीएमआर के नेतृत्व वाली डायल को 3415.35 करोड़ का फायदा पहुंचाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा करके नीलामी की शर्तों का उल्लंघन किया गया है। सरकारी ऑडिटर की रिपोर्ट में कहा गया है कि डायल को 100 रुपये सालाना लीज पर जमीन उपलब्ध कराई गई और इससे वह 60 साल के दौरान 1 लाख 63 हजार 557 करोड़ रुपये कमा सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों को धता बताकर सिविल एविएशन मंत्रालय ने डायल को डिवेलपमंट फीस लगाने की मंजूरी दी। पावर पर भी कैग ने सरकार को लपेटा है। रिपोर्ट में अनिल अंबानी के नियंत्रण वाली रिलायंस पावर लिमिटेड (आरपीएल) को आवंटित खदानों से कोयला सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्लांट (यूएमपीपी) डाइवर्ट किए जाने का मसला उठाया गया है।

इसके अलावा यह भी आरोप लगा है कि 'महाराजा' से भिखारी बन चुकी इंडियन एयरलाइंस की इस हालत के लिए पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को जिम्मेदार हैं। एआई के पूर्व प्रमुख संजीव अरोड़ा ने वर्ष 2005 में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बी.के. चतुर्वेदी को चिट्ठी लिखकर प्रफुल्ल पटेल और उनके ओएसडी के. एन. चौबे की शिकायत की थी। उन्होंने पटेल पर आरोप लगाया था कि एआई को नुकसान पहुंचाने वाले कई फैसले लेने के लिए उन्हें और एआई बोर्ड को मजबूर किया गया।

अरोड़ा ने आरोप लगाया है कि प्रफुल्ल पटेल ने जरूरत से ज्यादा विमान खरीदने को मजबूर किया और इंडियन एयरलाइंस को फायदा मिलने वाले रूट उड़ान भरने से रोका गया। इस पूरी प्रक्रिया में प्राइवेट एयरलाइंस को फायदा पहुंचाया गया। चिट्ठी सामने आने के बाद अब लोकसभा में विपक्ष के दो सांसद प्रबोध पांडा (सीपीआई) और निशिकांत दुबे ने सीवीसी से संजीव अरोड़ा के आरोपों की जांच कराने की मांग की है।

डायल को लीज पर दी गई जमीन के बारे में कैग की रिपोर्ट को सिविल एविएशन मिनिस्ट्री ने गुमराह करने वाला करार दिया है। रिपोर्ट में कैग का कहना है कि दिल्ली इंटरनैशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (डायल) को सस्ते में जमीन लीज पर दिए जाने से सरकार को 1.63 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ेगा। मंत्रालय ने कहा कि कैग ने उसके अधिकारियों के साथ बातचीत में कई मसलों- मसलन जमीन, एरोनॉटिकल, नॉन-एरोनॉटिकल सर्विस और बिडिंग की शर्तों का जिक्र नहीं किया। एविएशन सेक्रेटरी सचिव नसीम जैदी ने कैग विनोद राय को लिखी चिट्ठी में कहा है कि कैग की ड्राफ्ट रिपोर्ट में इन मुद्दों को शामिल किया गया है। हालांकि, ये मसले ऐसे हैं जिन पर या तो विचार-विमर्श नहीं हुआ या फिर मंत्रालय को इन पर अपनी स्थिति साफ करने का मौका नहीं दिया गया।

आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय का कहना है कि उसे सफाई देने का मौका नहीं दिया गया। ऐसे में अंतिम रिपोर्ट में शामिल किए गए मुद्दे तथ्यों की दृष्टि से सही नहीं हैं। जैदी द्वारा राय को लिखी गई चिट्टी में कहा गया है कि कैग के नतीजों में कुछ ऐसे मुद्दों को शामिल किया गया है, जिन पर ऑडिट के दौरान विचार नहीं हुआ। इसके मुताबिक, रिपोर्ट में जो 1,63,560.19 करोड़ रुपए के आंकड़े का जिक्र किया गया है, जो वास्तव में गुमराह करने वाला है।

गौरतलब है कि कैग की इस रिपोर्ट को अभी संसद में पेश किया जाना बाकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर सरकार डायल को 100 रुपए सालाना की रियायती दर पर जमीन लीज पर देती है, तो उसे 1.63 लाख करोड़ रुपए के रेवेन्यू का नुकसान होगा। माना जा रहा है कि मंत्रालय ने कैग से इन मुद्दों पर सफाई देने को कहा है। साथ ही, उसने कहा है कि ऑडिटर द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उसे स्पष्टीकरण का मौका दिया जाए।

-पलाश विश्वास

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

समस्यायों का हल


जनसाधारण की समस्याए बढती ही जा रही है |चारो तरफ से बढ़ रही है |आम उपभोग के सामानों की मंहगाई की चरम सीमा रोज बन और बिगड़ रही है |लगता है की अब इस सीमा का चरम बिंदु का निर्धारण ही गलत है |इसके चरम सीमा के बारे में सोचना ही गलत है |साधारण अनपढ़ मजदूरों से लेकर औसत और ठीक ठाक पढ़े -लिखे लोगो में बेकारी , बेरोजगारी बढती जा रही है |स्थायी रोजगार के अवसरों में भारी कटाव -घटाव होता जा रहा है |छोटे और औसत जोतो के मालिक ,किसानो तथा दस्तकारी ,बुनकरी छोटे -मोटे कामधन्धो में लगे तमाम लोगो का काम धंधा संकटग्रस्त ,कमजोर मंदा पड़ता जा रहा है |
उनमे टूटन आती जा रही है |परिवार के अन्य सदस्य ,दूसरों के यहा काम ,मजदूरी करने के लिए बाध्य होते जा रहे है |साधारण मध्यम वर्गीय परिवारों में भी अब एक व्यक्ति की कमाई से साधारण स्तर का भी गुजर -बसर संभव होता नही दिख रहा है |पति -पत्नी दोनों को ही काम या मजदूरी में लगना आवश्यक होता जा रहा है |सस्ती और बेहतर शिक्षा ,चिकित्सा जैसी सुविधायेतो कब की हवा हो चूकि है |आम आदमी के लिए आसानी से सुरक्षा व न्याय पाना दूर की कौड़ी हो गया है |उल्टे वह आज कल सरेआम अन्यायियो व अत्याचारियों की यहा तक की अपराधियों की भी सेवा कर रही है |यह स्थिति जनसाधारण के लिए शासन ,सुशासन के लोप को ही नही ,अपितु जनसाधारण के हितो की दृष्टि से समूची शासन व्यवस्था की जगह राज की अव्यवस्था या कहिये अव्यवस्था का राज स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता जा रहा है |
यह सब दो -चार सालो से नही हो रहा है |बल्कि लम्बे समय से चल रहा है |1947 -50 के बाद आम जनता की आशाओं उम्मीदों से एकदम अलग हो रहा है |उसकी तब की आशाये अब निराशाओं में बदलती जा रही है |सुनहरे भविष्य के सपने ,सोते समय देखे गये सपनो जैसा साबित होते जा रहे है | लेकिन देश के धनी मानी लोगो के लिए ,देश के हुक्मरानों के लिए देश काफी तरक्की पर है |जनता की स्थितिया बेहतर हो रही है |उसकी गरीबी घट रही है |खुशहाली आ रही है |
कमोबेश ऐसा ही आकलन देश के उच्च स्तरीय विद्वानों का भी है |इसीलिए प्रचार माध्यमो में उनके लेखो चर्चाओं में समाज के बहुसंख्यक जनसाधारण की बढती समस्याओं पर समाचारों ,चर्चाओं को महत्व नही मिल पा रहा है |पैसे और चमक दमक से भरपूर खेलो के लिए ,फ़िल्मी सितारों ,गायकों ,नर्तको और अन्य चुटकुलेबाज विदूषको के लिए समाचार पत्रों के दो तीन पेज सुरक्षित है |टी० वी0 के कई चैनल आरक्षित है |सूचनाओं और खबरिया चैनलों पर भी इन्ही उच्च स्तरीय लोगो से सम्बन्धित सूचना एवं खबरे छायी रहती है | आम आदमी से जुडी समस्याए ,खबरे ,छिटपुट इधर -उधर की सूचनाओं ,खबरों के रूप में ही दिखाई सुनाई पड़ती है
यह स्थिति पिछले 20 -25 सालो से लगातार बढती जा रही है |इन सालो में केन्द्रीय व प्रांतीय शासन सत्ता में चढती रही सभी पार्टिया अपने -अपने शासन के बेहतर व जनपक्षधर होने का प्रचार भी चलाती व चलवाती रही है |राज्य के अफसरान हिस्सों और डंडा बंदूक धारी हिस्सों की बात ही छोड़ दे | वे तो कभी भी अपने को आम जनता का सेवक नही मानते रहे है |उल्टे वे अपने ब्रिटिश शासन के जमाने से ही आम जनता का शासक -प्रशासक मानते रहे है |और वैसा ही व्यवहार भी करते रहे है | आम जनता इस या उस पार्टी को वोट भले ही दे दे |भले ही अपना मत धर्म ,जाति,के लगाव आदि के चलते दे दे |लेकिन अब बहुसंख्यक जनसाधारण को किसी भी पार्टी पर यह विश्वास नही रह गया है की वह आम जनता की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देगी ,उनका निराकरण करेगी |उसकी जगह बहुसंख्यक का यह विश्वास बढ़ता जा रहा है की आज तक उसके मतों से शासन -सत्ता में चढती रही पार्टियों के नेता गण फिर से शासन -सत्ता में आने के बाद अपना चरित्र बदलने वाले नही है |उसे राहत देने वाले नही है |मंहगाई ,बेकारी ,भ्रष्टाचार ,असुरक्षा आदि को कम करने वाले नही है |
विभिन्न पार्टियों व नेताओं के प्रति जनसाधारण का बढ़ता यह नजरिया इस बात का सबूत है की अब वे पार्टिया उनकी समूची सत्ता -सरकार और देश का वर्तमान राज्य प्रणाली या व्यवस्था बहुसंख्यक आम जनता को मानवोचित जीवन का अधिकार और न्यायपूर्ण अधिकार नही दे सकता ,और उसे देने में लगातार अक्षम साबित होता जा रहा है |क्या आम जनता की बाद से बदतर होती जा रही स्थितियों में अब विभिन्न पार्टियों की आलोचनाये करके और अपनी उपलब्धिया गिना कर लोगो से चुनावी वोट पाने का अधिकार रह गया है ?क्या आम जन में विश्वास बढाने की जगह अविश्वास बढाने वाले राज्य और उसके प्रतिनिधि आम जनता का मत पाने के अधिकारी रह जाते है ?
इन बिन्दुआओ पर सोचे। क्या हक़ बनता है इन पार्टियों और नेताओं को .....

कुछ तो होगा
कुछ तो होगा
अगर मैं बोलूँगा
टूटे टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा
टूट मेरे मन टूट
अब अच्छी तरह टूट
झूठ मूठ अब मत रूठ

सुनील दत्ता
पत्रकार
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