महंगाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
महंगाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

समस्यायों का हल


जनसाधारण की समस्याए बढती ही जा रही है |चारो तरफ से बढ़ रही है |आम उपभोग के सामानों की मंहगाई की चरम सीमा रोज बन और बिगड़ रही है |लगता है की अब इस सीमा का चरम बिंदु का निर्धारण ही गलत है |इसके चरम सीमा के बारे में सोचना ही गलत है |साधारण अनपढ़ मजदूरों से लेकर औसत और ठीक ठाक पढ़े -लिखे लोगो में बेकारी , बेरोजगारी बढती जा रही है |स्थायी रोजगार के अवसरों में भारी कटाव -घटाव होता जा रहा है |छोटे और औसत जोतो के मालिक ,किसानो तथा दस्तकारी ,बुनकरी छोटे -मोटे कामधन्धो में लगे तमाम लोगो का काम धंधा संकटग्रस्त ,कमजोर मंदा पड़ता जा रहा है |
उनमे टूटन आती जा रही है |परिवार के अन्य सदस्य ,दूसरों के यहा काम ,मजदूरी करने के लिए बाध्य होते जा रहे है |साधारण मध्यम वर्गीय परिवारों में भी अब एक व्यक्ति की कमाई से साधारण स्तर का भी गुजर -बसर संभव होता नही दिख रहा है |पति -पत्नी दोनों को ही काम या मजदूरी में लगना आवश्यक होता जा रहा है |सस्ती और बेहतर शिक्षा ,चिकित्सा जैसी सुविधायेतो कब की हवा हो चूकि है |आम आदमी के लिए आसानी से सुरक्षा व न्याय पाना दूर की कौड़ी हो गया है |उल्टे वह आज कल सरेआम अन्यायियो व अत्याचारियों की यहा तक की अपराधियों की भी सेवा कर रही है |यह स्थिति जनसाधारण के लिए शासन ,सुशासन के लोप को ही नही ,अपितु जनसाधारण के हितो की दृष्टि से समूची शासन व्यवस्था की जगह राज की अव्यवस्था या कहिये अव्यवस्था का राज स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता जा रहा है |
यह सब दो -चार सालो से नही हो रहा है |बल्कि लम्बे समय से चल रहा है |1947 -50 के बाद आम जनता की आशाओं उम्मीदों से एकदम अलग हो रहा है |उसकी तब की आशाये अब निराशाओं में बदलती जा रही है |सुनहरे भविष्य के सपने ,सोते समय देखे गये सपनो जैसा साबित होते जा रहे है | लेकिन देश के धनी मानी लोगो के लिए ,देश के हुक्मरानों के लिए देश काफी तरक्की पर है |जनता की स्थितिया बेहतर हो रही है |उसकी गरीबी घट रही है |खुशहाली आ रही है |
कमोबेश ऐसा ही आकलन देश के उच्च स्तरीय विद्वानों का भी है |इसीलिए प्रचार माध्यमो में उनके लेखो चर्चाओं में समाज के बहुसंख्यक जनसाधारण की बढती समस्याओं पर समाचारों ,चर्चाओं को महत्व नही मिल पा रहा है |पैसे और चमक दमक से भरपूर खेलो के लिए ,फ़िल्मी सितारों ,गायकों ,नर्तको और अन्य चुटकुलेबाज विदूषको के लिए समाचार पत्रों के दो तीन पेज सुरक्षित है |टी० वी0 के कई चैनल आरक्षित है |सूचनाओं और खबरिया चैनलों पर भी इन्ही उच्च स्तरीय लोगो से सम्बन्धित सूचना एवं खबरे छायी रहती है | आम आदमी से जुडी समस्याए ,खबरे ,छिटपुट इधर -उधर की सूचनाओं ,खबरों के रूप में ही दिखाई सुनाई पड़ती है
यह स्थिति पिछले 20 -25 सालो से लगातार बढती जा रही है |इन सालो में केन्द्रीय व प्रांतीय शासन सत्ता में चढती रही सभी पार्टिया अपने -अपने शासन के बेहतर व जनपक्षधर होने का प्रचार भी चलाती व चलवाती रही है |राज्य के अफसरान हिस्सों और डंडा बंदूक धारी हिस्सों की बात ही छोड़ दे | वे तो कभी भी अपने को आम जनता का सेवक नही मानते रहे है |उल्टे वे अपने ब्रिटिश शासन के जमाने से ही आम जनता का शासक -प्रशासक मानते रहे है |और वैसा ही व्यवहार भी करते रहे है | आम जनता इस या उस पार्टी को वोट भले ही दे दे |भले ही अपना मत धर्म ,जाति,के लगाव आदि के चलते दे दे |लेकिन अब बहुसंख्यक जनसाधारण को किसी भी पार्टी पर यह विश्वास नही रह गया है की वह आम जनता की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देगी ,उनका निराकरण करेगी |उसकी जगह बहुसंख्यक का यह विश्वास बढ़ता जा रहा है की आज तक उसके मतों से शासन -सत्ता में चढती रही पार्टियों के नेता गण फिर से शासन -सत्ता में आने के बाद अपना चरित्र बदलने वाले नही है |उसे राहत देने वाले नही है |मंहगाई ,बेकारी ,भ्रष्टाचार ,असुरक्षा आदि को कम करने वाले नही है |
विभिन्न पार्टियों व नेताओं के प्रति जनसाधारण का बढ़ता यह नजरिया इस बात का सबूत है की अब वे पार्टिया उनकी समूची सत्ता -सरकार और देश का वर्तमान राज्य प्रणाली या व्यवस्था बहुसंख्यक आम जनता को मानवोचित जीवन का अधिकार और न्यायपूर्ण अधिकार नही दे सकता ,और उसे देने में लगातार अक्षम साबित होता जा रहा है |क्या आम जनता की बाद से बदतर होती जा रही स्थितियों में अब विभिन्न पार्टियों की आलोचनाये करके और अपनी उपलब्धिया गिना कर लोगो से चुनावी वोट पाने का अधिकार रह गया है ?क्या आम जन में विश्वास बढाने की जगह अविश्वास बढाने वाले राज्य और उसके प्रतिनिधि आम जनता का मत पाने के अधिकारी रह जाते है ?
इन बिन्दुआओ पर सोचे। क्या हक़ बनता है इन पार्टियों और नेताओं को .....

कुछ तो होगा
कुछ तो होगा
अगर मैं बोलूँगा
टूटे टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर का एक कायर टूटेगा
टूट मेरे मन टूट
अब अच्छी तरह टूट
झूठ मूठ अब मत रूठ

सुनील दत्ता
पत्रकार

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

शरद पवार पर थप्पड़ या व्यवस्था पर थप्पड़


भारतीय राजनीतिक तंत्र देशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा संचालित हो रहा है। उसके प्रतिनिधि के रूप में चाहे डॉ मनमोहन सिंह हों या नितिन गडकरी या लाल कृष्ण अडवाणी क्षेत्रिय नेताओं में मुलायम सिंह यादव से लेकर मायावती तक जनता के बीच में जाने के लिये कठोर सुरक्षा कवच की आवश्यकता होती है और लगभग यही स्तिथि नौकरशाहों की है। अगर इनका सुरक्षा कवच हटा लिया जाए तो जनता के साथ इन लोगों ने जो-जो भ्रष्टाचार घोटाले और गबन कर रखे हैं। उसके एवज में जनता फूल लेकर नहीं थप्पड़ों से ही आगे आएगी। इस व्यवस्था ने अघोषित रूप से लोगों को गुलाम बना रखा है और लोग बेबस हैं, मुनाफा सिर्फ बड़ी बड़ी कंपनियों के हिस्से में आता है अगर विजय माल्या के किंगफिशर को घटा होता है तो भारतीय स्टेट बैंक से लेकर प्रधानमंत्री तक चिंतित नजर आते हैं वहीँ हमारे गाँव में भूख से मरने वाले लोगों को कफ़न भी आसानी से नसीब नहीं होता है। उसके लिये कोई राजनेता चिंतित नहीं होता है।
चुनाव में कांग्रेस से लेकर भाजपा, बसपा, सपा के नेतागण गला फाड़-फाड़ कर किसानो और मजदूरों की समस्याओं को हल करने के लिये दिन रात भाषण करते रहते हैं और संसद और विधानसभाएं आम जनता के लिये रोज कानून बनाती रहती हैं। आम आदमी की थाली से दाल नदारद हो गयी है। इतने बढ़िया-बढ़िया कानून जनता के हित में बनाये गए हैं। दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुनाफा हजारो-हजार करोड़ रुपये बढ़ता जा रहा है उनके फायदे के लिये कोई राजनीतिक दल कानून बनाने की बात करता है न ही उनके हितों के लिये कानून बनाने के लिये वोट ही मांगता है। शरद पवार को थप्पड़ पड़ चुका है। सुरक्षा कवच के बगैर नेतागण जनता में आयें तो उनका हश्र इससे ख़राब ही होगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 14 नवंबर 2011

आंकड़ो के जरिये घटाई जा रही गरीबी वाह रे सरकार .......

गरीबी की किन्ही सीमा रेखाओं से उसे दूर करने के नाम पर चलाई जा रही योजनाओं का फैलाव बढ़ाव में भले ही गरीबी के कुछ हिस्सों को थोड़ी देर के लिए राहत मिल जाए , पर इससे गरीबो की गरीबी यानी साधनहीनता की स्थितियों में कोई कमी नही आनी है | क्योंकि थोड़े से लोगो में अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढावा देने का रास्ता ही यही है की देश व दुनिया के ज्यादातर देशो के जनसाधारण को गरीबी की तरफ ढकेला जाए | उन्हें अधिकाधिक साधनहीन बनाया जाए |
20 सितम्बर 2011 को योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था की ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिदिन 26 रूपये और शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 32 रूपये प्रति व्यक्ति खर्च करने वाले को गरीब नही माना जाएगा | फिर इसी प्रति व्यक्ति खर्च के आंकड़े का हिसाब लगाकर गाँव में 3905 रूपये प्रति माह तथा शहर में 4824 रूपये प्रति माह खर्च करने वाले पांच व्यक्तियों के परिवार को भी गरीब नही मानने की सीमा तय कर दी गयी |इस हलफनामे के बाद योजना आयोग और उसके उपाध्यक्ष मोटेक सिंह अहलुवालिया की तथा केंद्र सरकार की चौतरफा आलोचना शुरू हो गयी | खाद्यान्नो तथा अन्य आवश्यक एवं न्यूनतम उपभोग के सामानों की बढती महगाई को उठाकर योजना आयोग व सरकार से यह सवाल पूछा जाने लगा की आखिर गाँव में प्रति व्यक्ति 26 रुपया और शहर में 32 रुपया खर्च करने वाले को गरीब नही मानने का आधार क्या है ? यह आलोचना भी आती रही है की प्रति माह लाखो रूपये के वेतन , भत्ते खर्च करने वाले सांसदों , विधायको , मत्रियो , अधिकारियों को आखिर यह कहने का क्या अधिकार बनता हैं की 26 रूपये व 32 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नही हैं | योजना आयोग व केंद्र सरकार की उपरोक्त आलोचनाये गलत नही हैं ठीक हैं |ठीक इसलिए भी हैं की यह हलफनामा गरीब को गरीब मानने से इन्कार कर रहा हैं | हालाकि यह समाज की तथ्यगत सच्चाई हैं की देश की आबादी का एक खासा हिस्सा प्रतिदिन के बहुत कम आय व खर्च पर जी रहा हैं | लेकिन सवाल हैं किऐसी स्थितियों में जीते मरते लोगो को वर्तमान दौर की महगाई में 26 रूपये या 32 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाले लोगो को क्या कहा जाए ? क्या उसे गरीबी रेखा से उपर इसलिए मान लिया जाए की वह अभी जीवित हैं या फि उससे भी कम खर्च करने वाली आबादी उसके नीचे मौजूद हैं ?
यह तो गरीब को गरीबी रेखा से उपर करने का षड्यंत्र हैं | उसके लिए आंकड़ो की घपलेबाजी भी हैं | ऐसे षड्यंत्र व घपलेबाजी पहले भी की जाती रही हैं |समाज में थोड़े से लोगो में बढती अमीरी के साथ बहुसख्यक समाज में बढती गरीबी को आंकड़ो के जरिये भी छिपाया भरमाया जाता रहा हैं | दशको पहले ' गरीबी हटाओ ' के नारे इस तरह से लगाये जाते रहे है , मानो उन नारों व प्रोग्रामो से गरीबी बस मिटने ही जा रही है | अब गरीबी को घटाने - मिटाने का कुछ वैसा ही काम योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त आंकड़ो के जरिये किया गया हैं | प्रति व्यक्ति आय की जगह प्रति व्यक्ति खर्च का आंकड़ा पहली घपलेबाजी हैं | साफ़ बात है की प्रतिदिन इतनी कम खर्च करने वाले के पास बचत की आमतौर पर गुंजाइश नही हो सकती | अत:उसके खर्च की यह सीमा दरअसल उसके आय की सीमा हैं | पहले वह कमाएगा तब खर्च करगा | आंकड़े में दूसरी घपलेबाजी उस खर्च (व आय )को प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के रूप में पेश करते हुए उसी से हिसाब लगाकर पांच व्यक्तियों के परिवार के ( खर्च व आय ) प्रतिमाह के रूप में पेश कर देना हैं | सभी जानते है की परिवार में हर आदमी कमाई नही करता | हर एक या दो कमाने वाले पर तीन - चार या इससे अधिक लोग निर्भर होते हैं , जो स्वंय कमाई नही करते | तब प्रति व्यक्ति के आंकड़े को पांच गुना बनाकर उसे परिवार की आय या खर्च बनाकर पेश करना आंकड़ो के जरिये घपलेबाजी नही तो क्या है ?
इस संदर्भ में समाज के सबसे निचले स्तर का एक दिलचस्प आंकडा देखिये | गाँवों में मनेरेगा के तहत 100 दिन काम करने वाले मजदूर की आय 120 x100 =12000 रुपया प्रति वर्ष होगी | इसे प्रतिदिन की आय में बदलने पर यह रकम (12000 /365 रुपया यानी ) 32 रूपये 87 पैसे या मोटे तौर पर 33 रूपये होगी | यह भी मान ले की दूसरे कामो से वह स्वंय या परिवार का कोई दुसरा सदस्य इतना और कमा लेता है | तब भी दोनों की कुल कमाई 66 रुपया प्रतिदिन होगी | इसे आप और ज्यादा बढाकर 100 रूपये प्रतिदिन कर दे तो , भी कम से कम दो बच्चो या एक ही बूढ़े आश्रित को लेकर पांच व्यक्तियों के परिवार की प्रति व्यक्ति कमाई या क्रच ( 100 /5 यानी ) 20 रूपये रोजाना ही आयेगा |
लेकिन अगर परिवार को हटाकर इसे प्रति व्यक्ति या क्रच के रूप में देखा जाए तो वह ( 100 /2 यानी ) 50 रूपये प्रति व्यक्ति के रूप में आ जायेगी | फिर उसी कमाई को पांच गुना ( यानी 250 रुपया रोजाना या 7500 रुपया महीना ) कर देने पर वह और उसका परिवार गरीबी रेखा से उपर उठ जाएगा | गरीब नही कहलायेगा | योजना आयोग ने इसे ध्यान में रखकर ही 26 रुपया व 32 रुपया प्रतिदिन कर खर्च का तथा उसी हिसाब से प्रति परिवार प्रति माह 3900 रुपया और 4800 रुपया खर्च का हलफनामा लगाया भी हैं | इस हलफनामे से मनरेगा में काम करने वाला मजदूर भी 33 रुपया प्रतिदिन के आय या खर्च के साथ गरीबी रेखा से उपर उठ गया है | लेकिन आंकड़ो में इस घपलेबाजी का लाभ ?- इसका पहला लाभ तो यह है कि बिना कुछ किए धरे ही केवल इन आंकड़ो के जरिये गरीबो कि संख्या तुरन्त - तुरन्त कम हो जायेगी देश के बहुप्रचारित आधुनिक विकास के साथ गरीबी कि रेखा से नीचे के लोग भी ऊँचे उठते नजर आ जायेगे , जैसा कि पहले से भी प्रचारित किया जाता रहा हैं | दुसरा काम यह है कि देश में लागू की जाती रही आर्थिक नीतियों के सभी समर्थको को इन प्रचारों व आकंड़ो से भी यह कुतर्क करने का मौक़ा मिल जाएगा कि ये नीतिया सर्वसमावेशी हैं | राष्ट्र के आर्थिक विकास के साथ राष्ट्र के सभी अमीर - गरीब का विकास करने वाली हैं |उन्हें उंचा उठाने वाली है | फिर इसका तीसरा लाभ यह है की गरीबो की घटती संख्या दिखाकर सरकारों के लिए गरीबी रेखा से नीचे के लोगो के लिए चलायी जा रही योजनाओं , प्रोग्रामो और उसके आवंटित धन में कटौती करने का आधार मिल जाएगा | योजना आयोग के इन आकंड़ो से विरोधी पार्टियों सहित प्रचार माध्यमि विद्वानों को भी इसका लाभ इस रूप में मिल गया हैं की उन्हें योजना आयोग और सरकार की आलोचना के साथ खुद को गरीबो का हमदर्द बताने व प्रचारित करने का नया अवसर मिल गया है | लेकिन गरीबी कम करने के लिए ' गरीबी हटाओ ' जैसे नारे लगाना या आकंड़ो के जरिये उसे कम होता दिखाना या फिर ऐसे कामो की आलोचनाओं के जरिये स्वंय को गरीब हिमायती दिखाना एक बात है और गरीबी घटाने - मिटाने के लिए वास्तविक प्रयास करनी एकदम दूसरी बात हैं | गरीब होने का वास्तविक मतलब ही है कि जीवन निर्वाह के आवश्यक साधनों से अंशत:या पूर्णत: वंचित होना |गरीबी दूर करने के नाम पर चलायी गयी बी0 पी0 एल0 योजनाओं से उन्हें राहत तो मिल सकता है पर उन्हें जीविकापार्जन के लिए स्थाई काम या साधन नही मिल सकता | आप भी जानते हैं की बहु प्रचारित मनेरगा के तहत भी महज 100 दिन काम पाने का ही कानून ( न की वास्तविक ) गारंटी मिली हुई हैं | फिर पिछले 20 सालो से लागू होती वैश्वीकरणवादी नीतियों के तहत देश व विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के हर क्षेत्र में बढ़ते घुसपैठ और अधिकार के साथ आम किसानो , दस्तकारो तथा छोटे व साधारण उद्यमियों आदि के रोजी - रोटी के स्थाई साधनों को भी काटा जा रहा है | उन्हें साधनहीन व गरीब बनाया जा रहा है | अत: देश की अर्थव्यवस्था की दशा - दिशा गरीबी हटाने की नही बल्कि बढाने की ही रही है | इसे अंधाधुंध यंत्रीकरण के जरिये साधारण मजदूरों तथा साधारण पढ़े - लिखे लोगो के श्रम के अवसरों की कटौती के रूप में , फिर बड़ी कम्पनियों तथा आयातित मालो , सामानों की अधिकाधिक घुसपैठ से छोटे उद्यमियों के टूटन के रूप में देखा जा सकता है |इसके साथ अब इसे खेती किसानी के बढ़ते संकटों के साथ कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण के रूप में तथा फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बड़ी कम्पनियों के बढती घुसपैठ से छोटे दुकानदारों की बर्बादी आदि के रूप में भी देखा जा सकता हैं | साफ़ बात है कि वैश्वीकरणवादी नीतियों के जरिये चली आ रही देश की अर्थव्यवस्था की दशा - दिशा गरीबी हटाने की नही बल्कि बढाने की है | सत्ता सरकारों में भागीदार करती हुई सभी पार्टिया तथा देश के अन्य उच्च स्तरीय हिस्से इन नीतियों के समर्थक एवं वाहक बनकर एक तरफ तो देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से की अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढाते जा रहे है तो दूसरी तरफ जनसाधारण को साधनहीन बनाते जा रहे है | इसलिए गरीबी की किन्ही सीमा रेखाओं से उसे दूर करने के नाम पर चलाई जा रही योजनाओं के फैलाव में भले ही गरीबो के कुछ हिस्सों को थोड़ी देर के लिए राहत मिल जाए | पर इससे गरीबो की गरीबी यानी साधनहीनता की स्थितियों में कोई कमी नही आनी हैं |हां उसमे बढ़ोत्तरी जरुर होनी है |क्योंकि थोड़े से लोगो में अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढावा देने का रास्ता ही यही है कि देश व दुनिया के ज्यादातर देशो के जनसाधारण को गरीबी कि तरफ ढकेला जाए | उन्हें साधनहीन बनाया जाए | अत:गरीबी रेखा निर्धारित करने व उसे हटाने - मिटाने कि योजनाये प्रस्तुत करने या उसकी कमियों कि आलोचनाये करके स्वंय को गरीबो का हमदर्द दिखाने - बताने का सारा काम गरीबी को बनाये रखकर अमीरी को बढावा देने का काम हो रहा है |गरीबी हटाने का वास्तविक काम गरीबी हटाने में नही अमीरी का निरंतर विरोध करते हुए उसे हटाने - मिटाने में निहित है |
ऐसे में मुझे जन कवि आलोक धन्वा की कुछ लाइने याद आ रही है ..............
बर्फ़ काटने वाली मशीन से आदमी काटने वाली मशीन तक
कौंधती हुई अमानवीय चमक के विरूद्ध
जलतें हुए गाँवों के बीच से गुज़रती है मेरी कविता;
तेज़ आग और नुकीली चीख़ों के साथ
जली हुई औरत के पास
सबसे पहले पहुँचती है मेरी कविता;
जबकिं ऐसा करते हुए मेरी कविता जगह-जगह से जल जाती है
और वे आज भी कविता का इस्तेमाल मुर्दागाड़ी की तरह कर रहे हैं
शब्दों के फेफड़ों में नये मुहावरों का ऑक्सीजन भर रहे हैं,
लेकिन जो कर्फ़्यू के भीतर पैदा हुआ,
जिसकी साँस लू की तरह गर्म है
उस नौजवान खान मज़दूर के मन में
एक बिल्कुल नयी बंदूक़ की तरह याद आती है मेरी कविता।
जब कविता के वर्जित प्रदेश में
मैं एकबारगी कई करोड़ आदमियों के साथ घुसा
तो उन तमाम कवियों को
मेरा आना एक अश्लील उत्पात-सा लगा
जो केवल अपनी सुविधाके लिए
अफ़ीम के पानी में अगले रविवार को चुरा लेना चाहते थे
अब मेरी कविता एक ली जा रही जान की तरह बुलाती है,
भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में-
उस गर्भवती औरत के साथ
जिसकी नाभि में सिर्फ़ इसलिए गोली मार दी गयी
कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाय।

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

सोने-चाँदी के आसमान छूते दामों की अन्तर्कथा

आजकल सोने चाँदी के भाव अनेक और परस्पर विरोधी कारणों से आम आदमी के लिए भी चर्चा और चिंता के मसले बन गए हैं। कहा जा सकता है कि आम आदमी भारत में गरीब का दूसरा नाम है। सोना चाँदी उसकी पहुँच या आर्थिक वित्तीय बूते के बाहर की बात है। ये दोनों बहुमूल्य धातुएँ आम आदमी की ही नहीं किसी भी इंसान की बुनियादी या अपरिहार्य जीवनोपयोगी जरूरत का हिस्सा भी नहीं हैं। एक बहु प्रचलित आर्थिक नीति सूत्र यह कहता है कि एक अच्छी अर्थव्यवस्था और उसके राज्य की आर्थिक नीति मूलभूत आवश्यकताओं की संतुष्टि करने वाले साजो सामान की उपलब्ध मात्रा प्रचुर और कीमतों को अपेक्षाकृत नीचे स्तर पर और साथ में उन्हें यथासंभव स्थिर रखती है। कीमत नीति का एक दूसरा सूत्र भी ध्यान देने योग्य है। इसके अनुसार शानो शौकत विलासिता और दिखावा करने वाली चीजे धनी वर्ग को प्रिय होती हैं। इन चीजों की महत्ता उनके दामों से आँकी जाती है। जितने ऊँचे उनके दाम, उतना ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है उनका खरीददार, केवल अपनी नजर में बल्कि शेष समाज की नजर में भी। अतः बहुमूल्य वस्तुओं का बहुत लेनदेन और उनके दामों में निरन्तर बढ़ोत्तरी सीधे सीधे सम्पन्न लोगों के हाथ में सम्पत्ति के बढ़ते संग्रहण या केन्द्रीयकरण की सूचक है। 21वीं सदी के विश्व की दो विशेषताएँ एक सोने चाँदी की महँगाई और दूसरे विषमताओं का उछलता ज्वार मूलतः परस्पर जुड़ी हुई बातंे हैं। ’’तुलसी के आदर्श राजाराम ने भी-
‘‘मणि माणिक महँगे किए,
सहँगे तृण जल नाज’’
तो आज की अर्थ प्रधान, निजी स्वार्थ साधना और समृद्धि को सफलता का सोपान मानने वाले विषमतर होते समाज में सोने चाँदी की कीमतों में नित्य नये शिखर स्वाभाविक ही माने जाने चाहिए।
यदि स्याह और सफेद के दो भागों में बँटी हमारी सामाजिक यथार्थ की समझ सही पर्याप्त और उचित होती तो शायद उपर्युक्त कथनांे के आगे या पीछे कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं होती। किन्तु सामाजिक यथार्थ बहुरंगी, बहुपक्षीय और अनेक जटिलताओं से भरा होता है। क्षुद्र स्वार्थ उसको विकृत करते रहते हैं, फलतः इसमें अनेक उलझे हुए आपसी रिश्ते होते हैं। अतः कीमतों का स्तर निरपेक्ष या अपने आप में कोई पूरी कहानी नहीं कह पाता है। विभिन्न वस्तुओं की कीमतों के आपसी सम्बन्ध यानी उनकी सापेक्षिकता भी कम महत्वपूर्ण और प्रभावशाली नहीं होती है। सामाजिक उत्पादन और सम्पत्ति में जिन वस्तुओं की जितनी ही अहमियत होती है उतनी ही दूरगामी व्यापक और गहरे उनके कीमतों के स्तर के सापेक्ष और निरपेक्ष प्रभाव होते हैं। इस तरह केवल जीवनोपयोगी होने मात्र से अथवा मनोकामनाओं के आधार पर ही, वस्तुओं का महत्व उनके कीमतों के निर्धारण में अपना दखल नहीं दे पाता है। सम्पत्ति, शक्ति, प्रभाव और समाज में प्रतिष्ठा प्रदान करने में भी विभिन्न वस्तुओं की भूमिका भिन्नता पूर्ण हो जाती है। यह नुक्ता भी सोने-चाँदी की कीमतों की चाल ढाल समझने में सहायक होता हैं। उदाहरणार्थ हम कह सकते हैं कि जमीन की महत्ता और ऊँची कीमतें भी इन्हीं प्रभावों और प्रक्रियाओं के प्रतिफल हैं। अब तक सोने चाँदी के दामों की प्रकृति और प्रभाव के चर्चा के सिलसिले में हमने कुछ सामान्य और व्यापक विचारों का उल्लेख किया है, हमें यह कई कारणों से जरूरी लगा। सामान्यतः किसी भी वस्तु की कीमत उसकी माँग और पूर्ति के प्रभावों के द्वारा समझी जाती है किन्तु बहुधा इन दो व्यापक और मूलभूत तत्वों को बहुत स्थूल और सतही रूप में ले लिया जाता है। इनके पीछे छिपे, इनको प्रभावित करने वाले बिन्दुओं और मसलों पर बहुत चर्चा यदा कदा ही की जाती है।
सोने एवं चाँदी की कुछ खास विशेषताएँ उनकी माँग और आपूर्ति को प्रभावित करती हैं। ये दोनों धातुएँ तुलनात्मक दृष्टि से अत्यधिक उच्च कीमतों वाली वस्तुओं की श्रेणी में आती हैं। अतः ये सम्पत्ति संग्रह की साधन और वैभव की प्रतीक मानी जाती हैं। इन्हें सौन्दर्य प्रसाधन और कलात्मक अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में भी जाना जाता है। इनका स्थानान्तरण सुगम होने के कारण धन के स्थानान्तरण के माध्यम के रूप में भी इन दोनों धातुओं की उपादेयता जगजाहिर है। सम्पत्ति को दीर्घ काल तक सुरक्षित और अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए भी सोने-चाँदी का उपयोग होता रहा है। भौतिक रूप में भी इनका क्षरण नहीं होता है।
ऐसी विशेषताओं से युक्त चीजों की बाजार में माँग और उनकी आपूर्ति के पीछे कुछ विशेष दीर्घ कालिक और परिवर्तनीय प्रभाव छिपे रहते हैं। उन पर विचार विमर्श सोने-चाँदी के दामों की उच्चतर दिशा में प्रवृत्त गतिमानता को समझने में सहायक होना चाहिए। साथ ही यह विश्लेषण इस विषय पर प्रचलित अनेक भ्रांतियों को दूर करने में भी सहायक होता है।
मानवीय आर्थिक-सामाजिक जीवन के इतिहास का बड़ा भाग लगातार वृद्धिमान, बहुमुखी विषमताओं का इतिहास रहा है। हाँ, इन विषमताओं के कारण, तौर-तरीके और प्रभाव अवश्य कई रूपों और अर्थों में बदलते रहे हैं। इन विषमतामय समाजों में उच्च स्थानासीन तबकों की जीवन शैली, कार्य व्यवस्था और मूल्य, शेष समाज से अपनी अलग पहचान रखते आए हैं, अपने लगातार जारी तथा बदलते दोनों रूपों में। इससे भी ज्यादा खास बात यह है कि इन तबकों की आर्थिक वित्तीय जरूरतें भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। प्राचीन काल में मुद्रा यानी सिक्कों के रूप में इस्तेमाल के कारण इन उच्च कीमत की धातुओं की बहुत अहमियत रही थी उसी तरह सुदूर प्रदेशों के आपसी व्यापार में वस्तु विनिमय के साथ साथ व्यापार में निर्यात आधिक्य का भुगतान भी कीमती धातुओं, मणि-माणिक और हीरे मोती के रूप में मुख्य रूप से लिया और दिया जाता था। राज्यों की सैन्य शक्ति के लिए भी बेशकीमती धातुओं के भण्डार की जरूरत होती थी, इसलिए युद्ध में विजय का पारितोषक भी सोने-चाँदी के भण्डारों की लूट के रूप में एकत्रित किया जाता था।
आपूर्ति पक्ष के चंद खास बिन्दुओं का संक्षिप्त विवरण भी सोने-चाँदी के आर्थिक पक्ष को स्पष्ट करने के लिए जरूरी है। इन धातुओं का खनन बहुत मेहनत माँगता है और जोखिम भरा होता है। इनकी खानों की खोज और उत्खनन भी बहुत श्रम साध्य और तकनीकी रूप से कठिन तरीकों पर आधारित होता है। इन धातुओं की उपलब्धि सर्वत्र नहीं होती, बल्कि कुछ खास इलाकों में केन्द्रित पाई गई है। किन्तु इनकी माँग सर्वत्र होती है। इनकी चाह तो स्वर्ण मृग की तमन्ना के रूप में अतृप्त और अदम्य चाहनाओं का दूसरा नाम बन चुकी है। आभूषणों, बर्तनों, पूजा सामग्री आदि के अलावा सोने-चाँदी का उपयोग कई औद्योगिक कच्चे या मध्यवर्ती सामान के रूप में भी होता हैं। किसी भी सामान्य वर्ष में आम तौर पर सोने चाँदी की जितनी माँग होती है, उसके मुकाबले इनका सालाना उत्पादन काफी कम यानी उसका छोटा सा भाग होता है। सोने के उत्पादक देश और खास तौर पर उसके निर्यातक देश संख्या में काफी कम हैं, किन्तु इनकी माँग तो हर देश में होती है। यह एक विरोधाभासों भरा तथ्य है कि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा आयातक देश है और कहा तो यह भी जाता है कि भारत के लोगों के पास विश्व का विशालतम स्वर्ण भण्डार जमा है। यही नहीं, अब विषमता वर्धन को अघोषित रूप से आार्थिक सफलता मानना भारत की सरकारों और मुख्य राजनैतिक गैर वामदलों की विचारधारा का अभिन्न अंग बन चुका है। भ्रष्टाचार विरोध का नाटक करने वाले बाबा या तथाकथित संत भी उसकी जड़, गैर बराबरी वर्धन के खेल के स्वयं धुरंधर खिलाड़ी बन गए हैं। अतः अब भारत के विशाल आयात खर्च का दसवाँ हिस्सा सोने-चाँदी जैसे अनावश्यक आयातों पर खर्च होता है। फूल, प्याज और अनाज का निर्यात करके सोने-चाँदी का देशी जखीरा बढ़ा रहे हैं और वह भी चंद लोगों के हाथों में। पेट की भूख बढ़ाकर आभूषणों की भूख मिटाने का ही यह एक नजारा है।
इन तथ्यों एवं मतों की सोने-चाँदी की कीमतों की ऊँची उड़ान की व्याख्या करने में बहुत अहम भूमिका है। साथ ही भारतीय अर्थ और समाज व्यवस्था का असली रूप समझने में यह एक बड़ा तथ्य है। जब से भारत में विषमतावर्धक आर्थिक उत्पादन बढ़त को राष्ट्रीय प्रगति का सर्वोच्च ही नहीं एकमेव प्रतिमान माना और प्रचारित किया जाता है, सोने-चाँदी के आयात की छूट दे दी गई है। सरकारी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं और अन्य वित्तीय व्यवसायिकों द्वारा स्वर्ण संचयन के पक्ष में विज्ञापन दिए जाते हैं। जिस काम को कल तक तस्करी के रूप में अवैध माना जाता था, नव उदारीकरण की छत्र छाया मंे वह फल-फूल रहा है। अब सोने का सालाना अयात लगभग एक हजार टन हो रहा है। जो लोग विदेशों से मँगाकर सोना खरीदते हैं, उन्हें विदेशी बैंकों में अपना कालाधन जमा कराने की जहमत मोल नहीं लेनी पड़ती है। सोना-चाँदी खरीदों उसे कहीं गुप्त घरों में, फार्म हाउसों में जमा करके रखो, उसको जब चाहों देस परदेस में बेच दो, टैक्स चुराओ और सोने में लगाओ तथा उसके ऊँचे चढ़ते दामों के कारण भारी भरकम मुनाफा कमाओ, आदि-आदि आज के आर्थिक परिदृश्य के वास्तविक चित्र हैं जिनकी तह में सरकारी सभी गैर वामदलों की घोषित और डंके की चोट पर लागू की गईं नीतियांँ हैं। अजीब बात है कि सोने की ऊँची कीमतों को कारण बताकर इस पर कर की दर काफी नीची रखी जाती है। कर देयता की कुलराशि पर ध्यान दिया जाता है उसकी सापेक्षिक न्यूनता अपर्याप्तता पर नहीं। उसके गैर जरूरी प्रकृति तक उसके अन्य नकारात्मक पहलुओं को भी नज़रअंदाज कर दिया गया है। सोने का उपयोग स्वर्णधारक द्वारा देश के बाहर जमा काले धन की तरह जब चाहे देश के बाहर भी किया जा सकता है। विदेश में इसे हवाला के जरिये भेजना भी नहीं पड़ता है। विदेश यात्रा में इसे साथ ले जाया जाता है, और वहाँ इसका निवेश भी हो सकता है।
इस तरह प्राप्त राशि से विदेशों में वहाँ के अय्याशी के अड्डों में गुलछर्रे भी उड़ाए जा सकते हैं। रिश्वत देने-लेने में भी इन महँगी धातुओं का इस्तेमाल धड़ल्ले से और बेखौफ हो रहा है। स्त्रीधन के रूप में प्रचारित घोषित करके स्वर्ण राशि और स्वर्ण आभूषण विशाल धनराशि के संचयन तथा काले धन को छिपाने के माध्यम बन गए हैं। इन नए समाज विरोधी रुझानों और प्रवृत्तियों की ही एक झाँकी मिलती है, आर्थिक आँकड़ों की नई परिभाषाओं और गणना के बदले हुए तरीकों मंे। पहले सोने-चाँदी, मणि-माणिक मंे लगी राशि को अनुत्पादक मानकर उनकी कीमत को राष्ट्रीय निवेश में शामिल नहीं किया जाता था। लेकिन अब पूरी तरह निजी स्वर्णाभूषण, रजत भण्डार और जवाहरात में लगी राशि को राष्ट्रीय निवेश दर की गणना में शुमार किया जाता है। नीतिगत सोच के बदले और सीमित स्वार्थ आधारित रुझानों की यह एक झाँकी भर है।
उपर्युक्त तथ्य सोने-चाँदी को निजी धन संचय, मुनाफा प्राप्ति तथा कई प्रकार की ‘सुविधाओं’ की जननी की भूमि को रेखांकित करते है। इनके साथ में राष्ट्रीय सामाजिक लाभ की दृष्टि से एक संभावना जरूर छिपी रहती है। अन्तर्राष्ट्रीय वित्त के क्षेत्र में स्वर्ण भण्डार की भूमिका पूरी तरह परिवर्तनीय या विनिमयक्षम मुद्राओं के समान अथवा समकक्ष होती है। अतः सामाजिक उद्देश्यों से प्रेरित सरकारें देश में भण्डारित स्वर्ण, रजत राशि का उपयोग विदेशी लेन देन में कर सकती है। बशर्ते इसके लिए पर्याप्त राजनैतिक इच्छा शक्ति और प्रतिबद्धता हो। ये सब बातें आधुनिक काल में सोने चाँदी की माँंग की प्रबलता और उनकी कीमतों की लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति को परिलक्षित करती हैं। इसमें एक बात और जोड़ दीजिए तो सोने-चाँदी की ऊँची बढ़ती कीमतों की कहानी को नई ताकत और स्फूर्ति मिल जाएगी। सोने-चाँदी की ऊँची कीमतें उसके भण्डारण और आवागमन को एक भारी जोखिम भरा मामला बना देती हंै। बार-बार उसकी शुद्धता की गारन्टी भी हासिल करनी पड़ती है। इन दिक्कतों के निवारण के साथ-साथ खरीद-बिक्री की सुविधा, खरीददारों ओर विक्रेताओं की खोज को भी सरल और विश्वव्यापी बनाने के लिए अभौतिक रूप में वायदा बाजारों में सोना-चाँदी महत्वपूर्ण स्थान रखने लगे हैं। इस तरह स्वर्ण बाजार की तरलता बढ़ गई है। शेयरों और विदेशी मुद्रा की तरह या किसी भी वित्तीय रुक्के की भाँति सोने चाँदी के वायदा बाजारो का लगातार विस्तार हो रहा है। इन बाजारों में पल-पल अरबों, खरबों रुपये के सोने-चाँदी का लेन-देन होता है। नई-नई बदली हुई कीमतें सामने आती हैं और फिर भी एक औंस या रत्ती भर सोने-चाँदी का स्थानान्तरण नहीं करना पड़ता है। केवल व्यापारित सोने-चाँदी की मिल्कियत के कागजात के हस्तांतरण द्वारा जब लेन-देन के एक चक्र की समाप्ति होती है केवल उनकी घोषित कीमत के एक अंश के लेन-देन के आधार पर बड़े-बड़े सौदे हो जाते हैं। अतः अब विश्व बाजारों में सोने-चाँदी की उपलब्ध मात्रा से कितने ही गुना ज्यादा मात्रा में सोने-चाँदी का लेन-देन या उनके नाम पर किए गए सौदे का लेन-देन उनको पाटना या आगे खिसकाना आदि होते हैं। इनको ठोस आर्थिक वित्तीय परिघटनाओं की तरह ही सट्टोरियों का मूड उनकी मानसिकता या धारणाएँ प्रभावित करती हंै।
विश्व अर्थ व्यवस्था के घोर विषमतामय होते रवय्ये के साथ ही उसका वित्तीयकरण (फाईनेन्शियलाईजेशन) यानी वित्त या मुद्रा या ऐसी ही परिसम्पत्तियों, अस्तियों के लेन-देन की प्रवृत्ति बढ़ती है। इससे इन परिसम्पत्तियों के दामों के निरन्तर उच्चतर स्तर की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति जन्म लेती है और सतत बलवती होती रहती है। आधुनिक विश्व में सोने-चाँदी के दामों में उछाल की कहानी के पीछे ये ठोस सामाजिक-आर्थिक और वित्तीय प्रक्रियाएँ और प्रवृतियाँ सक्रिय हैं।
यहाँ एक और तथ्य का खुलासा इस सवाल पर हमारी समझ को स्पष्ट करने में सहायक होगा। विश्व वस्तु व्यापार तथा वित्तीय लेन-देन लगातार बढ़ते जा रहे हैं। वास्तव में मुद्रा, पँूजी, विदेशी मुद्रा, विभिन्न किस्म के वित्तीय रुक्को आदि का लेन-देन वास्तविक वस्तु व्यापार से हजारांे गुना ज्यादा होता जा रहा है। ये सब वित्तीय अस्तियाँ या रुक्के एक दूसरे का स्थान बखूबी ग्रहण कर लेने में सक्षम बना दिए गए हैं। सट्टोरिये, निवेशक, वित्तीय कम्पनियाँ विभिन्न वित्तीय बाजारों के बीच कीमतों, लाभ-हानि की गणना, भावी अनुमानों आशंकाओं के अनुसार अपनी परिसम्पत्तियों को घटाते-बढ़ाते रहते हंै। लक्ष्मी की चंचलता के बेजोड़ उदाहरण हैं ये।
एक विदेशी मुद्रा को किसी भी शेयर, सोने-चाँदी, ऋण पत्र आदि के बदले खरीद-बेच सकते हंै। किन्तु अपनी अन्तर्राष्ट्रीय सर्वव्यापक स्वीकार्यता के चलते इन बाजारांे में अमरीकी डाॅलर की भूमिका, महत्ता लम्बे अरसे से बेजोड़ है। किन्तु इन दिनों अमरीकी वर्चस्व वाला दुनिया का एकल ध्रुवीकरण समाप्ति की ओर है। अमरीका, अमरीकी अर्थव्यवस्था और डाॅलर अपनी सर्वोच्च स्थिति से हटते जा रहे हंै। एक ओसामा बिन लादेन को बरसों की जद्दोजहद के बाद अपनी पूरी ताकत झोंक कर मार गिराने को ही अब विश्व शक्ति होने का प्रमाण माना जा रहा है। यह भूलतेे हुए की वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान आदि में किस तरह एक अस्तांचल गामी शक्ति की झलक मिलने लगी है। किन्तु 2008 में शुरू, अमरीका में उत्पन्न हो, सारे संसार को लील लेने वाली बड़ी आर्थिक गिरावट ने तो विश्व अर्थव्यवस्था की रंगत ही बदल डाली। सच है यह बड़ी गिरावट सन् 1930 के दशक जैसी विश्व व्यापक महामंदी नहीं बन पाई। किन्तु तमाम ताबड़तोड़, भारी भरकम और विश्वव्यापी संभावित माने जाने वाले प्रयासों के बावजूद इस बड़ी गिरावट का भूत दुनिया का पिंड नहीं छोड़ रहा है। चीन, जापान तथा पेट्रोल धनी देशों के पास अमरीकी डाॅलर का विशाल जखीरा है। अमरीकी अर्थव्यवस्था तीनों तरह के (व्यापार, राजकोषीय और बचत) घाटों के चक्र में आकंठ फँसी हुई है। फलतः अन्य शक्तिमान होते देशों के पास अमरीकी डाॅलर जमा हो रहे हैं और अमरीकी राज्य उन देशों को अपनी प्रतिभूतियाँ बेच कर अपना घाटा पाट रहा है। नतीजन डाॅलर कमजोर हो रहा है। अब उसकी विश्वव्यापी रिजर्व करेंसी की भूमिका के पैर उखड़ने लगे हैं। विकल्प तलाशे और बनाए जा रहे है। इन हालात में डूबते डाॅलर को स्वयं अमरीका भी बड़ी मात्रा में नए डाॅलर छाप कर और ज्यादा कमजोर कर रहा है ताकि अन्य देशों के डाॅलर भण्डारों का मोल घट जाए। इन सब कारणों से वित्तीय और विदेशी मुद्रा बाजारों में भारी हलचल है। लोग कभी किसी वित्तीय परिसम्पत्ति से पलायन करते हैं तो कभी किसी अन्य अस्ति का वरण करते हैं। इसका नतीजा इन परिसम्पत्तियों की कीमतों की भारी अस्थिरता में नजर आता है। सोने-चाँदी का इस्तेमाल भी एक वित्तीय अस्ति के रूप में हो रहा है। इनकी माँग में दीर्घकालिक ही नहीं अल्पकालिक स्तर पर भी चढ़ाव का रुख है। चाहे तेजडि़यों का दौर हो या मन्दडि़यों का बोलबाला सोने-चाँदी की तो आम तौर पर बल्ले-बल्ले ही बनी रहती है। हम सोने-चाँदी में अपना पैसा डालने के लाभों का और न्यूनतम जोखिम की चर्चा कर चुके हंै। अतः न केवल बहरहाल बल्कि आने वाले समय में काफी दूर तक शायद ही कोई ऐसी अन्य अस्ति या मुद्रा नजर आए जो अपने कम वजन की गागर में इतने विशाल मूल्य की सर्व स्वीकार्य चिरन्तन क्रय शक्ति के इतने विशाल सागर को भरने की डाॅलर की क्षमता को टक्कर दे सके। अतः इनके दामों का हिमालय जैसी ऊँचाइयों की ओर बढ़ते रहना ही संभावित है। जिसके पास जितनी मात्रा सोने-चाँदी की है वह इनके आसमानगामी दामों से उतना ही प्रसन्न है और जैसे जैसे यह प्रसन्नता बढ़ती है, इन
धातुओं की खरीद बढ़ती है। यह एक परस्पर वृद्धि कारक प्रक्रिया बन चुकी है।
अब यह स्पष्ट है कि सोेने की अदम्य ललक की वजह से इस स्वर्ण मृग की तृष्णा में भारत का मध्यवर्ग किस तरह अति सम्पन्न तबकों के हाथ का उनकी स्वार्थ सिद्धि मंे सहायक, खिलौना बन गया है। एक व्यक्ति के स्तर पर सोने-चाँदी में निवेश लाभ का सौदा है यदि भौतिक सुरक्षा की गारन्टी हो। किन्तु मध्य आय वर्ग अपनी सामाजिक साख, प्रतिष्ठा और दिखावे के चक्कर में अपनी गाढ़ी मेहनत मशक्कत की कमाई इन धातुओं मंे लगा कर एक ओर तो रोजगार वर्द्धक तथा जरूरी आवश्यकता की चीजों के उत्पादन से निवेश को हटाता है, दूसरे शादी-ब्याह और भेंट के अपने खर्च को बढ़ाता है। साथ ही अतिसम्पन्न वर्ग की शक्ति के सम्मुख अपनी शक्ति क्षरण करने में मध्यम आमदनी वाला तबका खुद ही मददगार होता है। किस तरह सामाजिक ध्येय तथा स्वार्थ सतही सोच और निर्णयों से व्यक्तिगत हित साधना से टकराते है इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है सोने-चाँदी के दामों की ताजा तरीन प्रवृत्तियाँ।

-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में बढ़ती महंगाई, रोता आम आदमी और भरोसा दिलाते प्रधानमंत्री

दो साल से ज्यादा हो गये जब वाम मोर्चा ने संप्रग-1 सरकार से समर्थन वापस लेते समय जो कारण गिनाये थे उनमें एक मुद्दा महंगाई का भी था। आजादी के बाद के इतिहास में महंगाई बढ़ने की अभूतपूर्व गति बरकरार है। कृषि मंत्री शरद पवार जब भी मुंह खोलते हैं, महंगाई और बढ़ जाती है। प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष इत्मीनान से बंसी बजा रहे हैं कि आने वाले तीन महीनों में महंगाई पर काबू पा लिया जायेगा लेकिन महंगाई बढ़ती जा रही है, आम आदमी रो रहा है और प्रधानमंत्री मार्च 2011 तक महंगाई पर काबू पाने का भरोसा दिला रहे हैं परन्तु कर ऐसा कुछ रहे नहीं हैं जिससे महंगाई पर काबू पाया जा सके।
कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने एक आम आदमी की चर्चा की है। वे मानते हैं कि ”आम आदमी“ वह है जिसका उनकी व्यवस्था से कोई सम्पर्क नहीं है। शायद यही कारण है कि उसके दर्द को भूमंडलीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की यह व्यवस्था समझने को तैयार नहीं है। इस आम आदमी का रेखाचित्र बनाते हुए एक काव्यात्मक अंदाज में कांग्रेस के युवराज ने कहा - ”वह गरीब हो या अमीर, शिक्षित हो या अशिक्षित, हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, अगर वह इस व्यवस्था से नहीं जुड़ा है तो वह ‘आम आदमी’ है। ..... यह आम आदमी नियमगिरि का वह आदिवासी बालक है, जिसे अपनी जमीन से बिना किसी कानून के बेदखल कर दिया जाता है। यह आम आदमी झांसी का वह दलित बालक है जिसे अपनी कक्षा में दलित होने के कारण सबसे पीछे बिठाया जाता है। वह बंगलुरू का वह युवा प्रोफेशनल है, जिसके बच्चे को ऊंची कैपिटेशन फीस न दे पाने के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला नहीं मिल पाया। वह शिलांग के विश्वविद्यालय का टाॅपर है, जिसे इसलिए काम नहीं मिल सका, क्योंकि वह सही लोगों को नहीं जानता। वह अलीगढ़ का वह किसान है जिसे अपनी जमीन का उचित मुआवजा नहीं मिला है। वह हैदराबाद का बिजनेसमैन है जिसके अपने सम्पर्क नहीं हैं। यह ऐसा नौकरशाह है, जिसका भविष्य समझौता न करने की वजह से जोखिम में है। यह वह मेट्रो वर्कर है जिसने अपने खून-पसीने से उसे बनाया है, लेकिन जिसका उसे कोई श्रेय नहीं मिलता है। ...... वह जी-जान से इस देश को रोज बनाता है फिर भी हमारी व्यवस्था उसे हर कदम पर कुचलती है।“ आम आदमी को कुचलने का धमंड कांग्रेस में कूट-कूट कर भरा हुआ है।
इस रेखाचित्र में महंगाई और भ्रष्टाचार का मारा वह आम आदमी कहीं राहुल गांधी को नहीं दिखाई देता जिसके दुःख दर्दों के लिए उनकी तीन पीढ़ियां जिम्मेदार हैं। वे तीन पीढ़ियां जिन्होंने इस देश पर लम्बे समय तक शासन किया है। उनकी दादी इंदिरा गांधी के युग में इस आदमी के नाम का अखण्ड जाप कांग्रेस और सरकार रात-दिन करती रहती थी परन्तु उसके लिए करती कुछ नहीं थीं। उससे केवल वोट लेती थी। इस रेखाचित्र से कई सवाल उठते हैं, लेकिन एक सवाल को उठाना जरूरी है - आखिर कौन है जिम्मेदार जिसके कारण नियमगिरि का आदिवासी बालक अपनी जमीन से बेदखल होता है, दलित बालक को सबसे पीछे बैठना पड़ता है, पूरे देश के गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय लोगों की संतानें शिक्षा से वंचित रह जा रही हैं, टाॅपरों को रोजगार नहीं मिलता आदि आदि। क्या जिम्मेदार वे सरकारें नहीं जो केन्द्र में या राज्यों में कांग्रेस चला रही है? क्या जिम्मेदार वे नीतियां नहीं जिन्हें उनकी पार्टी ने इस देश में चलाना शुरू किया था? राहुल गांधी इस आम आदमी को एक बार फिर बेवकूफ बना कर वोट बटोरने की राजनीति खेल रहे हैं।
कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि मार्च 2011 तक महंगाई दर गिर कर 5.5 प्रतिशत हो जायेगी। इसे पढ़ कर या सुनकर अजीब सी अनुभूति होती है। उनकी सरकार के अनुसार तो महंगाई दर गिर कर नवम्बर में 7.48 प्रतिशत आ गयी है लेकिन आज प्याज 70 रूपये किलो बिक रहा है। पेट्रोल के भाव पिछले पांच महीनों में पांच बार कीमतें बढ़ाकर 60 रूपये प्रति लीटर सरकार ने पहुंचा ही दिये हैं। डीजल, किरोसिन और रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने की तैयारी है। खाद्यान्न व्यापार में विदेशी पूंजी को अनुमति दी जा रही है, सट्टेबाजी कराई जा रही है और आयात-निर्यात का खेल चल रहा है। आम आदमी भूखों मरता है तो मरे। 87 करोड़ जनता 20 रूपये प्रतिदिन से कम आमदनी पर जीवित है, महंगाई के बावजूद गरीबी की इस रेखा में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी में कोई अन्तर नहीं आया है। उस आम आदमी की कोई पीड़ा उनके चेहरे पर नहीं झलकती।
कांग्रेस के इसी अधिवेशन में प्रस्तुत एक आर्थिक प्रस्ताव कहता है कि विकासशील देश में कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि उनकी आपूर्ति और मांग के मध्य असंतुलन होता है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि कई सेवाओं और वस्तुओं के निर्माताओं को ज्यादा कीमत दिये जाने की जरूरत होती है। कुछ कीमतें इसलिए बढ़ती हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी कीमतें ऊपर चली जाती हैं। इस प्रस्ताव में भी कहीं दर्द नहीं झलकता उस आम आदमी का। यानी सब कुछ किसी न किसी कारक का सहज परिणाम है क्योंकि मुक्त अर्थव्यवस्था में सब कुछ सरमाया करता है, सरकारें कुछ नहीं। सरकारें तो केवल घोटाले, घपले और भ्रष्टाचार के लिए बनाई जाती हैं जिनसे आम आदमी का कोई सम्पर्क नहीं है। शायद वह समय आ गया है जब यह सवाल भी खड़ा किया जाये कि सरकारों की फिर जरूरत क्या है?
कांग्रेस के बुरांड़ी अधिवेशन ने आम आदमी को एक बार फिर ललकारा है कि तेरा कोई वजूद नहीं, तेरा कोई महत्व नहीं, तेरी कोई जरूरत नहीं, तेरी कोई अस्मिता नहीं।
आम आदमी का खून अगर अब भी इस ललकार से नहीं खौलता तो शायद वह पानी ही है खून नहीं!

प्रदीप तिवारी
(लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश का कोषाध्यक्ष है)

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

मनमोहन जी के नाम


भाई रे भाई बड़ी महंगाई
मार गई सबको महंगाई
सभी कीर्तन सा करते हैं
सब ही रटते हैं महंगाई

गैस चढ़ गई , तेल जल गया
बिजली दर कौंधी आँखों में
मेरी रसोई भी कांप रही है
देख के तेरे रंग महंगाई

बीबी खटती मैं भी खटता
लेकिन खर्च नहीं ये पटता
निसदिन थाली खाली होती
अरे तेरे ही कारण महंगाई

अब माँ-बाबा चुप रहते हैं
कहते डरते लाओ दवाई
बीबी नहीं मांगती अब कुछ
खुशियाँ सब छीनी महंगाई

अब बच्चे भी समझ गए हैं
तेरे सदमे मेरे पढ़कर चहेरे
मरने से भी डर लगता है
कफ़न पे चढ़ी हुई महंगाई

त्योहारों के रंग फीके हैं
सावन आंसू से भीगे हैं
रिश्तों में भी रंग नहीं है
अरे तेरे ही कारण महंगाई

सुरसा जैसी बढती जाती
जन जन की आशाएं खाती
मीठे से मधुमेह जैसा है
अरे तेरे ही कारण महंगाई

रहम करो अरे सत्ता वालो
काबू में रखो महंगाई
बनकर मौत सा पहरा देती
भाई रे भाई बड़ी महंगाई


केदारनाथ"कादर"

Share |