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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

जन विकास की पुख्ता आधारशिलाएँ

 भारत में विकास, सार्वजनिक नीतियों,  राजकाज तथा लोक कल्याण आदि विषयों के बारे में सोच कुछ गहरी विसंगतियों से भरा हुआ है। उसका एक बहुधा नजर आने वाला पक्ष है आर्थिक तथा सामाजिक पक्षों को अलग-अलग करके, कभी कभार तो विरोधी या प्रतिद्वंद्वी रूप में देखना। इस प्रवृत्ति का नतीजा है कि आर्थिक विकास या कल्याण को सामाजिक विकास या कल्याण से अलग करके देखा और पेश किया जाता है। भारत में आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी गयी है। धारणा हैं कि आर्थिक विकास एक तो सामाजिक विकास का रास्ता खोलेगा, दूसरे आर्थिक विकास (यानी ऊँची, सम्पूर्ण तथा प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय) के ऊँचे और तेजी से बढ़ते स्तर के कारण राजकीय राजस्व या आमदनी का ऊँचा स्तर सुलभ हो पाएगा। इस आधार पर राज्य सामाजिक सेवाओं सुविधाओं, सुरक्षा की उपलब्धता में तेजी से इजाफा कर पाएगा। इस तरह माना गया कि एक ओर निजी ऊँची आमदनी तथा दूसरी ओर राज्य द्वारा दी गई सामाजिक सेवाओं का तेजी से प्रसार सारे देश के सामाजिक विकास को लगातार नई ऊँचाइयाँ देता रहेगा। इस तरह यह निष्कर्ष निकाला गया कि आर्थिक विकास सामाजिक विकास का रास्ता भी प्रशस्त करता है। परिणाम स्वरूप विकास के इन दो पक्षों या पहलूओं में कोई मूलभूत या दूरगामी अन्तरविरोध नहीं माना गया। भारत की पाँच साला विकास योजनाओं और सालाना बजटों पर इस सोच की गहरी छाप दिखाई देती है।
    हम आजादी के सात दशक पूरे करने जा रहे हैं। विकास रणनीति, योजनाओं, आर्थिक और सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के कारण आज भारतीय अर्थ व्यवस्था और सामाजिक स्थिति में कड़वे मीठे, सीमित तथा व्यापक फैलाव वाले परिवर्तनों के सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है। हर साल बजट दर बजट कुछ नई आर्थिक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों का एक मिश्रण देश में लागू किया जाता है। आमतौर पर इन नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा में केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों की भूमिका का साझा आकलन किया जाता है। राज्य सरकारों के कामों-नीतियों में जिस तरह भिन्नता नजर आती है, उसी तरह केन्द्र द्वारा भी अपने संसाधनों के प्रादेशिक आवंटन में एक सीमा तक गैर बराबरी का पुट साफ नजर आता है। आवंटन में सबसे बड़ी गंभीर तथा अनुचित असमानता गाँवों तथा शहरों के बीच देखी जाती है। किन्तु देश ने अब तक यह देखा है कि एक ओर जहाँ भारत की बहुआयामी विविधता और विषमताएँ  बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर कुल मिलाकर विकास इन दोनों पैमानों पर काफी नाकाफी भी रहा है।
    इस स्थिति को समझने की कोशिशों का पहला बिन्दु हमें यह नजर आता है कि आर्थिक और सामाजिक विकास को अलग अलग समझना अवास्तविक है। साथ ही आर्थिक विकास की वैशाखी पकड़ कर सामाजिक विकास की ओर बढ़ सकने की परिकल्पना से सामाजिक जीवन के दोनों ही पहलू आहत हुए हैं। खास बात यह है कि इस बिलगाव के असर में आर्थिक तरक्की को प्रधानतः प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय के रूप में देखा गया है आयके समाज के विभिन्न तबकों, समूहों, वर्गों में न्यायपूर्ण और समुचित वितरण की इतनी घोर उपेक्षा की गई कि वितरण की विषमता के विस्तृत होते विष को भी शिरोधार्य कर लिया गया। वास्तव में यह सम्पन्न और सशक्त लोगों के क्षुद्र और संक्रीर्ण हितों और लोभ की वेदी पर करोड़ों नागरिकों की कई पीढि़यों की न्यूनतम मानवीय जरूरतों की आहुति देने जैसा दुष्कर्म साबित होता जा रहा है। सन् 1990 तक सामाजिक शक्ति, क्षमताओं, प्रभाव और सम्पत्ति पर अत्यधिक आधिपत्य जमाये तबकों को आर्थिक एकांगी विकास की बागडोर देते हुए भी उन पर लोकतांत्रिक राज्य का नेतृत्व अपने महावती उत्तरदायित्व का अंकुश रखने की कोशिशों में लगा रहा। इन प्रयासों को असफल करने के बाद तो सन् 1990 के बाद शक्ति सम्पत्ति के शीर्षस्थ तबकों ने सामाजिक विकास को पूरी तरह हासिये पर डाल दिया। रोटी, कपड़ा, मकान की मांग अधर में लटक गई। अब बिजली पानी, सड़क भी आन्दोलनों के मुद्दे बन गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पोषण, स्वच्छता के बदले महानगरों में तेजी से बढ़ती राष्ट्रीय आय सम्पन्नों के अरमान राज्य के केन्द्र बन गए। देसी परदेसी कम्पनियों के हाथों में अभूतपूर्व केन्द्रीकरण हुआ किन्तु न तो राजकीय राजस्व अनुपात बढ़ पाया और न ही उसका सामाजिक विकास के लिए आवंटन बढ़ा। निरपेक्ष रूप से सामाजिक कामों के लिए धन  बढ़ाया गया किन्तु राजकोषीय आवंटन वृद्धिमान आमदनी, उसके स्वरूप, उससे जुड़ी तकनीकों, प्रबंधन व्यवस्था, उसमें बढ़ते सेवाओं के अनुपात और उससे जुड़ी निजीकरण प्रक्रिया आदि के चलते दलितों, वंचितों, आदिवासियों तथा प्रदूषित समावेशन के शिकारों आदि की स्थिति बदतर होती गई। सकल,  वास्तविक राष्ट्रीय आय में विश्व में तीसरे नम्बर पर आया भारत मानव विकास के तुलनात्मक प्रतिमानों की कसौटी पर विश्व में 134वें पायदान पर आ टिका। अब तो आर्थिक और सामाजिक सुधार दोनों पर ग्रहण लग गया है, जाहिर है दर्जनों सुन्दर गुलदस्तों नुमा नौकरशाही तथा नेताओं, छुटभैय्यों की जमात द्वारा नियंत्रित संचालित कार्यक्रम अपने घोषित मकसदों से दूर भटकते गये। युद्धों में मध्यकालिक सेनाओं द्वारा की गई लूट की तरह अब सरकारी अमला और राजनैतिक दलाल दोनों हाथों सामाजिक विकास के लिए बांटी गयी राशि को बटोर रहे हैं। मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आवास योजनाएँ जिन्हें सच्चे विकास पथ से भटके राजनीतिज्ञों के नाम पर प्रचारित करना बेहद घटिया अलोकतांत्रिक मजाक है। खाद्य अधिकार, आदि अपने घोषित उद्देश्यों के बरक्स पूरी तरह बौने हैं। अतः सामाजिक तथा आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के बीच की दीवारों को गिराकर समग्र, सर्वांगीण, सर्व समावेशी, सामाजिक विकास नीतियों और कार्यक्रमों का श्री गणेश होना चाहिए। आर्थिक, तकनीकी, प्रादेशिक ग्रामीण, शहरी आदि सभी प्रकार के विकास आपस में एक दूसरे से अलग-अलग नहीं किए जा सकते। इसी तरह शिक्षा, सुपोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, महिलाओं, बच्चों-वृद्धों की जरूरतों को संभालती सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ आदि भी एक पूरे समवेत पैकेज के रूप में एक निश्चित समय सीमा में सबको और केवल नाम दिखाऊ नहीं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने की गारंटी ही आर्थिक और सामाजिक विकास की एक बरण हुई गंगा यमुना को सदनीरा रूप में प्रवाहित कर सकती है।
    इन चर्चाओं में आंकड़ों की खेती उगाना जन चेतना और अधिकारों के लिए जूझने की तैयारी के रूप में निरर्थक ही साबित होती है। अभी हालिया चुनाव में किस तरह इन कागजी कार्यक्रमों और आम आदमी की कल्पना से कोसों दूर मोटे-मोटे करोड़ों अरबों की राशियों को बखानते आंकड़े प्रभावहीन साबित हुए यह बताने की जरूरत नहीं है। केन्द्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न सामाजिक सेवाओं पर राजस्व खर्च सन् 1990-91 में कई हजार करोड़ रूपयों के लगभग था। महंगाई, जनसंख्या वृद्धि, नई सेवाओं आदि के चलते यह खर्च सन् 2012-13 में लगभग 105 लाख करोड़ रूपये अनुमानित है। यदि यह करीब सत्रह गुणा वृद्धि कुछ गुणात्मक बदलाव का संकेत देती तो भारत के सामाजिक परिदृश्य का कायाकल्प हो गया होता। अतः असली कसौटियाँ हैं-एक अल्पकाल में इन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर उन्हें गारंटी सहित सर्व सुलभ करनी, दूसरे इन सेवाओं की प्रति उपयोगकर्ता पर्याप्त मात्रा तथा तीसरे इन सेवाओं की लोगों की विभिन्न जरूरतों के अनुरूप उपयुक्तता।
    यदि ऐसा किया जाता है तो आर्थिक प्रगति के साथ साथ सामाजिक विकास की गाड़ी भी चल पड़ेगी। किन्तु इन सब सामाजिक सेवाओं की जरूरत संयुक्त रूप से होती है और इनकी उपलब्धता सबसे पहली प्राथमिकता के रूप में हमारे साढ़े छः लाख गाँवों के लिए होनी चाहिए। इनमें कुछ की अनुपलब्धता बाकी की सेवाओं की प्रभावशीलता घटा देती है और हमारे नागरिकों को दुष्प्रभाव्यता ग्रसित बना देती है। इन दिनों लोगों की उम्मीदों का बयान अच्छे दिनों के इन्तजार के रूप में हो रहा है। अतः आज के ग्रामीण भारत के सामाजिक विकास के एजेण्डे के नीचे बताए गए बारहों बिन्दुओं पर एक साथ पक्का, पुख्ता, तीन सालों में पूरा होने वाला कार्यक्रम लागू किया जाना चाहिए। इस 10 जुलाई को हमारे देश के 70 प्रतिशत ग्रामीण केन्द्र और राज्यों के बजट से द्वादश नियामतों के एक समग्र पैकेज की प्रतीक्षा करेंगे। ये हैं:-
1. सारे गाँव में नालियों और पानी की निकास व्यवस्था युक्त पक्की सड़कें। 2. मुख्य बाहरी सड़क से जोड़ती सड़क। 3. शौचालय 4. पेयजल 5. प्राथमिक स्कूल भवन 6. चिकित्सा और स्वास्थ्य केन्द्र  7. पंचायत के नियंत्रण में पक्का गोदाम 8. पंचायत का कम्प्यूटरयुक्त दफ्तर। 9. चारागाह 10. ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था।
11 बैंक 12. सार्वजनिक सभा स्थल और खेल का मैदान जिससे कि जब हम आजादी की 70वीं जयंती मना रहे हों तब सारा भारत इन नागरिक सुविधाओं सेवाओं युक्त हो जाए तो हमारा स्वराज्य रामराज्य की नींव डाल देगा।
 -कमल नयन काबरा
 मोबाइलः 09013504389       
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात

 राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त  गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात
-कमल नयन काबरा
        राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह  सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त
गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता होती है। परन्तु अवसर न मिलने के कारण इनमें से अधिकतर आजीविका विहीन और अभावग्रस्त करोड़ों लोगों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। दुखद है कि सरकार व अधिकारी आर्थिक सामाजिक तथ्यों की आधिकारिक जानकारी होते हुए भी कुछ ठोस सुधारात्मक, सकारात्मक ठोस कदम नहीं उठाते। भारत की सबसे गंभीर समस्या, गैर-बराबरी है। अमानवीय गैर बराबरी के कारण देश की युवा पीढ़ी, बालक एवं वृद्ध फटेहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश इस बड़े मानव संसाधन के प्रयासों से संभावित राष्ट्रीय उपलब्धियों से भी वंचित हो रहा है। नेता शासक कम्पनियाँ मात्र राष्ट्रीय आय के कुल योग और औसत में राष्ट्रीय गौरव खोजने में लगे रहते हैं। अनेक समाज विज्ञानी उनके सुर में सुर मिलाते हैं। उन्हें इन करोड़ों नवयुवकों की ज्ञान क्षमता तथा अनुभव में संभावित योगदान दिखाई नहीं देता। नकली और थोथे राष्ट्रवाद में विषमताएँ भरी हुई हैं। उनके दुष्परिणामों की गणना तो दूर कभी उनकी फेहरिस्त भी नहीं बनाई गई। अधिकारी वर्ग किसी बीते जमाने की खुमारी में डूबे स्वप्नदर्शी स्वाभिमानी की तरह हो गए हैं। वे अपने परिवेश की वंचनाओं और कष्टों की घोर उपेक्षा कर रहे हैं।
    खैर, काफी अरसे बाद जनमत ने राजकीय सत्ता की वैधानिक दुर्बलता को दूर किया है। केन्द्र में एक सशक्त राज्य सत्ता की स्थापना हुई है। लोगों ने भाजपा में गहरा विश्वास और अपनी उम्मीदों की पूर्ति को दंाव पर लगाया है। इस परिप्रेक्ष्य मंे हमें 2014-15 के बजट के चरित्र, प्रावधानों और संभावित प्रभावों को देखना चाहिए। आज के परिवेश में गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और विषमताएँ आपस मंे पूरी तरह गुत्थमगुत्थ हैं। साथ ही यह चतुष्कोण आर्थिक सांस्कृतिक और अन्तर्राष्ट्रीय पटल के सम्बंधों कार्य प्रणाली, शक्ति संतुलन तथा राजकीय नीतियाँ और सुविधाएँ तथा प्रकृति का दुष्परिणाम भी है। हर साल राजकोषीय वित्तीय आवंटन में पुरानी लीक पीटा जाता है। इस वर्ष भी केवल सीमांत, मामूली रद्दोबदल ही किए गए हैं। राजग दो सरकार ने जो बजट पेश किया हैं, उसे देखकर वर्षों से आलोचना और खंडन मंडन में निरंतर, केन्द्रीय सत्ता संचालन के पुराने अनुभवी, अनेक राज्यों की लम्बे समय तक बागडोर सँभालने वाले तथा अपनी स्पष्ट आर्थिक सामाजिक प्रतिबद्धताओं की ताल ठोकने वाले लोग आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि बजट से नई सरकार ने अपनी कोई छाप नहीं छोड़ी। वे ऐसा कह रहे हैं तो कोई कारण भी होगा। कारण खोजने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 1970 के बाद से ही देश में असंतुलन अपना पैर फैलाने लगा था। बड़ी राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी परस्त बाजार यानी निजी लाभ प्रेरित नीतियाँ मामूली फेरबदल के साथ लगातार अपनी पैठ जमाती गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में गैर बराबरी नीति असंतुलित, अनैतिक और अलोकतांत्रिक होने के साथ साथ दीर्घकालीन जनहितों की बलि भी लेता रहा। भारत सरकार ने वित्तीय और विदेशी क्षेत्र को अत्यधिक महत्व दिया, जिससे कृषि और ग्रामीण जीवन की न्यूनतम  जरूरतों की घोर उपेक्षा हुई।
    बाजारोन्मुखी नीतियों को लागू करने के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति निरंतर कमजोर हो रही है। प्रभावी माँग एवं उत्पादन के स्वरूप के बीच असमान्य समीकरण होने की वजह से कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार, काला धन, मानवीय मूल्यों की हत्या, जघन्य अपराधों का तांडव चल रहा है। राजनीति मूल्यहीन घटिया व्यवसाय फरेबी हो गई है। सालाना बजटों की तरह इस साल का बजट भी पिछली नीतियों को ही आगे बढ़ाता है। वर्ष 2014-15 के बजट में सार्वजनिक व्यय को महज 14 प्रतिशत तक रखा गया। जिसमें करीब दस प्रतिशत
कराधान तथा शेष बजट घाटे का है। यह अनुपात कुछ वर्षों पहले करीब 17 प्रतिशत हो चला था। इसे बढ़ाने के बदले घटाया गया है। इसे पूरा करने के लिए भी विनिवेश (यानी सामाजिक सम्पत्ति कर निजी हाथों में हस्तांतरण तथा दीर्घ स्थायी परिसम्पत्तियों को बेचकर उससे चालू खर्चों पर लगाना यानी असामाजिकता और अदूरदर्शिता का कष्टकर संयोग) द्वारा करीब 435 अरब रूपये की उगाही की तजबीज है। कुल राजस्व में 17.7 प्रतिशत वृद्धि की आशा महंगाई की बढ़ी दर पर टिकी है। जिस पर सरकार नियंत्रण करने में विफल हो रही हैं।
    ये सब कदम है व्यवसाय और व्यवसायिक यानी बिजनेस परस्ती या मित्रता के। ये व्यवसायी, खास तौर पर कारपोरेट व्यवसायी बमुश्किल देश के सर्वोच्च आय और सम्पत्ति तथा शासन पर हावी लोग हमारी जनशक्ति, हमारे जन मन गण के एक प्रतिशत के करीब होंगे। इनकी वर्तमान स्थिति को लगातार मजबूती देते कहकर यह परिकल्पना करना कि 99 प्रतिशत लोगों खास तौर पर करीब तीन चैथाई लोगों का सापेक्ष और निरपेक्ष विकास, सामाजिक समावेशन और शक्तिकरण हो जाएगा बालू का भुतहा महल बनाने जैसा शेख चिल्लीपन है।
    लगता है राजग दो सरकार भी निजी सार्वजनिक साझीदारी (पीपीपी) के जरिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के ख्वाब देख रही है। यहाँ तक कि चालू सरकारी स्कूलों तक को व्यापारी वर्ग को सौंपने की तैयारी हो रही है। राज्य के साथ मिलकर अब बड़ी-बड़ी विशाल पूँजी तथा वित्त जुटाने में समर्थ तबके आर्थिक और सामाजिक भूमिका के केन्द्र में हांेगे। परन्तु सरकार भूल रही है कि पीपीपी की बेहिसाब बढ़ोत्तरी ने आय और सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण रूपी कुप्रभावों को बढ़ाया है। इससे सामाजिक राजनैतिक शक्ति के वितरण में भी विषमता का दंश बढ़ा है। गृहस्थ, बैंक तथा वित्तीय क्षेत्र की बचत को उधार लेकर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ राज्य के अधिकारों पर काबिज होती हैं। सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात संचार आदि सार्वजनिक सेवाओं को पूर्णतः निजी हाथों में दे दिया है। इस तरह की निजी दुकानों ने सामाजिक समस्याओं की जड़ों को पहले ही अतिरिक्त मजबूती दे दी है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के साम्यकारी रूप से अर्द्धशिक्षित, निजी शिक्षक और व्यापारी कुलपति अपने पैरों तले कुचल रहे हैं। चिकित्सा के नाम पर निर्धन की सम्पत्तियों की कुर्की हो रही है। सरकार ने अपने बजट में इन असमानताओं को दूर करने के कोई प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि इन्हें प्रोत्साहित ही किया है।
    लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार भी पूँजीपतियों के हाथों का खिलौना प्रतीत होती है। सारे विकल्प नागनाथ और साँपनाथ के बीच चयन तक सिमट जाते हैं। गैर बराबरीमय भूमंडलीकरण इन असमानताओं को आगे बढ़ाता है।
    सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा व्यवसाय में भी तेज मुनाफे खोजे जा रहे हैं। इसके लिए हवा के झोंकों की तरह इधर उधर भागती सट्टोरी विदेशी वित्तीय पूँजी  को बड़ी भूमिका दी जा रही है। कराधान, कर कानूनों में छिद्र, उनकी उपेक्षा तथा कर कानून और प्रशासन में रिश्वतखोरी से पूँजीपतियों को बच निकलने के कई रास्ते मिल जाते हैं। इन मुट्ठी भर लोगों का राष्ट्रीय आय, सम्पत्ति और सुविधाओं के अकल्पनीय बड़े भाग (लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक) पर कब्जा सा हो गया हैं। हमारे आर्थिक वित्तीय नीतिगत सोच पर पश्चिमी देश और उनके द्वारा चयनित स्थानीय पंडितों ने पूरी तरह कब्जा कर रखा है। हम भूल गए हैं कि वर्ष 2008 में धनी पश्चिमी देशों की आर्थिकी कैसे धाराधायी हुई थी। फिर जन  धन की बलि चढ़ाकर उसे उबारा गया था। अफसोस कि पिछले 67 सालों से हर बजट की प्रकृति विषमता वर्धक रही है। लोकतांत्रिक शासक बदल रहे हैं। शासक वर्ग का ब्राण्डनेम बदल रहा है लेकिन असमानता बदस्तूर जारी है। नई सरकार यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, सही खान पान, पर्यावरण तथा छोटे उद्योगों के संरक्षण पर ध्यान दे, गरीबों की जमीन को पूँजीपतियों के हाथों से बचाए तो उनके जीवन के कष्ट कम हो सकते हैं। सबके विकास से ही मजबूत अर्थव्यवस्था की परिकल्पना की जा सकती है।   
   -कमल नयन काबरा
  मोबाइल: 09013504389
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

रविवार, 16 जून 2013

आने वाली बरबादी से बेखबर

बाराबंकी। आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से देश का आम आदमी बुरी तरह प्रभावित हुआ हैं और आश्चर्य की बात यह भी है की वह अपनी आने वाली बरबादी से बेखबर है।
यह बात राम सेवक यादव स्मारक इण्टर कालेज में लोक संघर्ष पत्रिका के तत्वावधान में ’उदारीकरण का प्रभाव आम आदमी पर’ विषय पर मुख्य अतिथि देश के अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने देश का आर्थिक अंाकलन प्रस्तुत करते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था निरन्तर गर्त की ओर जा रही हैं। औद्योगिक प्रगति में गिरावट आ रही है महंगाई का दानव दिन -प्रतिदिन आम आदमी को खाये जा रहा है। विडंबना यह कि आम आदमी चाह कर कुछ नहीं कर पा रहा है देश के प्रमुख राजनीतिक दलो की नीति एवं नियत समान नजर आ रही है। जिस देश में केवल एक अंबानी परिवार्र आिर्थक आय देश की आय का 7 प्रतिशत हो, जिस देश में पूँजीपतियों द्वारा प्रायोजित भ्रष्टचार नए घोटाले कर रहा हो और इन घोटालो से अर्जित धन बाहर के देशो में फर्जी कम्पनियां बना कर वहाॅ खपाया जा रहा हो उस देश में आम आदमी का भविष्य कैसा? इसकी कल्पना आज नहीं की जा सकती है।
    गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे गिरि विकास संस्थान के निदेशक प्रो0 सुरेन्द्र कुमार ने कहा कि उनका संस्थान सरकार द्वारा प्रतिपादित आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करता है तथा समाजिक समस्याओं का विश्लेषण कर सरकार के सामने अपने सुझाव व प्रस्ताव देता है। देश की स्वतंन्त्रता के पश्चात जवाहर लाल नेहरू द्वारा जो आर्थिक व औद्योैगिक नीतियां बनाई गयी थी उनका आधार सार्वजनिक क्षेत्रो में निवेश पद केन्द्रित था वर्ष1990 तक देश में यही नीतियां चलती रही और हमारा औद्यौगिक विकास एवं औद्यौगिक स्थातित्व इसी का नातिजा था परन्तु वर्ष 1991में अमरीकी दबाव के चलते हमार्री आिर्थक नीतियो में जो परिवर्तन किये गए उन्हे आर्थिक उदारीकरण की संज्ञा दी गयी आर्थिक उदारीकरण केवल विदेशी औद्योगिक इकाईयो की देश में स्थापना एवं विदेशी पूँजी निवेश की राह में लाइसेंस पद्वति के रूप में चली आ रही बाधाओं को दूर करना ही था।
    प्रो0 सुरेन्द्र कुमार ने कहा की वह आर्थिक उदारीकरण के सैद्वान्तिक रूप से विरोधी नहीं है उन्होने जपान का उदाहरण देते हुए कहा कि जापान एक वर्ष 1968 में सर्वप्रथम इन्ही नीतियों को अपना कर अपनी आर्थिक प्रगति अर्जित की थी फिर उसी नक्से कदम पर चलते हुए उसकें पड़ोसी मूल्क चीन ने आर्थिक समृद्वि प्राप्त की और आज विश्व में एक प्रबल आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा हुआ है। हमारे देश में आर्थिक नीतियों का लाभ आम आदमी तक पहुँचाने में  हमारा लोकतंत्रिक ढाँचा अपना वह योगदान नहीं दे पा रहा है जो उसे देना था, जब तक ग्रामिण स्तर पर पंचायत राज व्यवस्था मजबूत और पारदर्शी नहीं होगी तब तक आम आदमी उदारीकरण का लाभ नहीं मिल पायेगा और परिणाम स्वरूप अमीर और गरीब की दूरी बढती जायेगी।
    कार्यक्रम में बृजेश कुमार दीक्षित, वसीम राईन, हुमाँयू नईम खान , विनय कुमार सिंह , श्री राम सुमन, पवन वैश्य, पुष्पेन्द्र कुुमार सिंह बलराम सिंह ,विजय प्रताप, उपेन्द्र, प्रदीप सिंह, विनय दास, अजय सिंह, महंत गुर सरन दास, नीरज वर्मा, निर्मल वर्मा, जावेद, एखलाख एडवोकेट, सूफी  उदैर्वरहमान, जगन्नाथ वर्मा सहित अनेको गणमान्य व्यक्ति थे संचालन रणधीर सिंह सुमन तथा धन्यवाद बृजमोहन वर्मा ने ज्ञापित किया।


शुक्रवार, 23 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला-2


यह चिकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमनेA ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।
-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

बुधवार, 21 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला




खुदरा व्यापार के विदेशीकरण की केन्द्रीय सरकार की मुहिम भारत के आम लोगों की आजीविका के साधनों पर एक बहुमुखी हमला है। इस निर्णय पर राजनीति के जंग में सरकार एक बार मुँह की खा चुकी है। वास्तव में यह फैसला स0प्र0ग0 दो की सरकार का नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व जोरशोर से इसके पीछे है किन्तु न केवल कुछ बड़े सहयोगी दल, अपितु कांग्रेस के अनेक लोग इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। एक पारिवारिक सम्पत्ति की तरह चलने वाली कांग्रेस पार्टी को कम्पनी क्षेत्र के बड़े स्तम्भ अपने घर की दुकान बता रहे हैं। विदेशी कम्पनियों और सरकारों के पैरोकार, विदेशी तथा देसी अखबार, विदेशी कम्पनियों के भारत प्रवेश को यू0पी0ए0-2 की कुशलता और शक्ति का प्रतीक बता चुके हैं। खुल्लम खुल्ला विदेशी कम्पनियाँ भारत में खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए लाॅबी करने यानी अपने पक्ष में प्रचार करने और रिझाने में मोटा खर्च कर रही हैं। खबर छपी है कि खुदरा व्यापार की एक बड़ी कम्पनी ने अपने पक्ष में निर्णय करने के लिए वर्षों से मुहिम चला रखी थी। वह अब तक 70 करोड़ रूपये इस गोरखधन्धे पर लगा चुकी है। क्या यह भारत की राजनीति और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में बाहरी वित्ती आर्थिक इकाइयों की सीधी-सीधी दखलंदाजी का उदाहरण नहीं है। असली मुद्दा यह भी है कि महज 70 करोड़ रूपये में ऐसा जन विरोधी नीतिगत निर्णय भारतीय लोकतंत्र पर थोपा जा सकता है। हजारों करोड़ रूपये के निवेश को यहाँ के खेती के बाद आम आदमी के रोजगार के दूसरे मुख्य धन्धों में लगाने की इजाजत ऐसी शर्तों, ऐसी प्रतिकूल चालू आर्थिक स्थिति और सरकार की घटती साख के दौरान तकनीकी तथा व्यावहारिक रूप से एक सुगमतम धन्धे में लगाने की आजादी विश्व की विशालतम कम्पनियों को दे दी गई थी। एक बार इसे स्थगित करने के बाद एक ओर तो इस आत्मघाती (आ बैल, मुझे मार नुमा) फैसले के पक्ष में प्रचार बढ़ा दिया गया है, दूसरी ओर यह घोषणा भी की जा रही है कि इसे शीघ्र लागू कराने की कोशिशें जारी हैं।
किस तरह बेहतर राजनैतिक या कम विरोध की स्थितियाँ पैदा की जाएँगी या इस निर्णय में सुधार किए जाएँगे ताकि कम से कम इसके गलत प्रभावों को कमतर किया जा सके, यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है।
हाँ, कई बेतुकी दलीलें देकर जनता को भरमाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। यू0पी0 के विधान सभा चुनावों ने राजनैतिक लोगों को एक बार फिर जनता के दरवाजों पर दस्तक लगाने को मजबूर कर दिया है। इस अवसर का इस्तेमाल खुदरा व्यापार में विशाल विदेशी कम्पनियों की भारत प्रविष्टि के पक्ष में प्रचार करने के लिए भी किया जा रहा है। इस सिलसिले में एक बिना सिर पैर की दलील का उदाहरण इस मुहिम के खोखलेपन की पोल खोलने के लिए पर्याप्त नजर आता है।
कांग्रेस के एक अति शक्तिशाली नेता ने किसानों को एक बहुत ही लचर और सच्चाई से कोसों दूर दलील देकर वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आगमन से मिलने वाले फायदों का खाका खींचा। इस दलील का सार यह है कि किसान के आलू जैसे उत्पादन को अभी बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसका इस्तेमाल करके डिब्बा या थैली बन्द सामान जैसे उत्पाद बनाकर उन्हें कई गुना ऊँचे दामों पर बेच दिया जाता है। इस तरह किसान को अपनी मेहनत का लाभ बहुत नाम मात्र मिल जाता है। दूसरी ओर मुख्य रूप से किसान द्वारा पैदा किए गए सामान को काफी ऊँची या महँगी दरों पर बेचा पाता है। यह सारा लाभ कृषिमाल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादक हजम कर लेते हैं जाहिर है यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है। सरकार और देश के लोग मिलकर इन हालात को बदल नहीं पाए है।
नेता आम सभाओं में कहते हैं कि अब सरकार इस कमी को दूर करके किसान को उसका हक दिलाना चाहती है। अब सरकार विदेशी, मुख्य रूप से यूरोप और अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सहारे यह करने जा रही है।
प्रत्येक कम्पनी जो 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भारत के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में काम कर सकने मंे समर्थ है (कुल 53 शहरों में) उनको अब भारत में खुदरा दुकानें खोलने की इजाजत देना कांग्रेस की सदारत में चलने वाली सरकार का लगभग एक तरफा निर्णय था। अभी तो विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा पा रहा है किन्तु सरकार इस निश्चय पर अडिग है और इसे लागू करवा कर किसान को उसकी उपज के अच्छे दाम दिलाने को कटिबद्ध है। जाहिर है इस सरकार को अति विशाल पूँजीवाली विदेशी कम्पनियों का दामन थामकर किसानों को उनके माल का अच्छा दाम दिलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। अब तक के अपने लम्बे शासनकाल में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिला पाने में नाकामयाब सत्ता अब इन बाहरी विशाल कम्पनियों के माध्यम से इस मकसद को अंजाम देना चाहती है।
यहाँ दो सवाल विचारणीय हैं सच है किसान को उसकी फसल के उचित दाम मिलने में कई बाधाएँ आती हैं। उदारीकरण के बीस सालों में पेप्सी जैसी बाहरी कम्पनियों मैकडोनालड स्टारबक, सब वे, जैसी कई रेस्त्रां सीधे किसानों से फसल खरीदने वाली बहुराष्ट्रीय अनाज व्यापारी कम्पनियों को भारत में न्यौता गया, किन्तु स्थिति सुधरी नहीं। अनुबन्ध खेती में अग्रणी पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ आलू, टमाटर की विदेशी कम्पनियों से अनुबन्ध या कान्ट्रेक्ट, खेती का चलन बहुत बढ़ा, किसानों को आलू सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ा। खाद्य प्रसंस्करण के नाम पर हानिप्रद पैकटों में नमकीन बेचने को इतना बढ़ाया गया कि लाखों हलवाइयों का रोजगार घटा। ये सब बाजार की शक्तिशाली कम्पनियों को बढ़ावा देने का नतीजा है। इन्हीं नीतियों के सूत्रधार अब अपने करतूतों के खराब नतीजों से किसानों को बचाने के लिए और ज्यादा कड़ी, प्रतियोगिता, खुदरा व्यापारियों को न्यौतकर किसान को न्यायपूर्ण वाजिब कीमत दिलाने का झूठा भरोसा दिला रहे हैं। राजस्थानी में कहावत है कि ‘झूठ बोलने वाला और जमीन पर सोने वाला तंगी महसूस नहीं करता’’। इस वादे का दो मुँहा चरित्र और खुलकर सामने आता है जब यह कहा जाता है कि किसान की उपज उससे अच्छे (यानी ऊँचे) दामों पर खरीदी जाएगी और वही फसल उपभोक्ताओं को सस्ती बेच दी जाएगी।
-कमल नयन काबरा
क्रमश:

सोमवार, 5 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला

खुदरा व्यापार के विदेशीकरण की केन्द्रीय सरकार की मुहिम भारत के आम लोगों की आजीविका के साधनों पर एक बहुमुखी हमला है। इस निर्णय पर राजनीति के जंग में सरकार एक बार मुँह की खा चुकी है। वास्तव में यह फैसला 0प्र00 दो की सरकार का नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व जोरशोर से इसके पीछे है किन्तु केवल कुछ बड़े सहयोगी दल, अपितु कांग्रेस के अनेक लोग इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। एक पारिवारिक सम्पत्ति की तरह चलने वाली कांग्रेस पार्टी को कम्पनी क्षेत्र के बड़े स्तम्भ अपने घर की दुकान बता रहे हैं। विदेशी कम्पनियों और सरकारों के पैरोकार, विदेशी तथा देसी अखबार, विदेशी कम्पनियों के भारत प्रवेश को यू0पी00-2 की कुशलता और शक्ति का प्रतीक बता चुके हैं। खुल्लम खुल्ला विदेशी कम्पनियाँ भारत में खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए लाॅबी करने यानी अपने पक्ष में प्रचार करने और रिझाने में मोटा खर्च कर रही हैं। खबर छपी है कि खुदरा व्यापार की एक बड़ी कम्पनी ने अपने पक्ष में निर्णय करने के लिए वर्षों से मुहिम चला रखी थी। वह अब तक 70 करोड़ रूपये इस गोरखधन्धे पर लगा चुकी है। क्या यह भारत की राजनीति और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में बाहरी वित्तीय आर्थिक इकाइयों की
सीधी-सीधी दखलंदाजी का उदाहरण नहीं है। असली मुद्दा यह भी है कि महज 70 करोड़ रूपये में ऐसा जन विरोधी नीतिगत निर्णय भारतीय लोकतंत्र पर थोपा जा सकता है। हजारों करोड़ रूपये के निवेश को यहाँ के खेती के बाद आम आदमी के रोजगार के दूसरे मुख्य धन्धों में लगाने की इजाजत ऐसी शर्तों, ऐसी प्रतिकूल चालू आर्थिक स्थिति और सरकार की घटती साख के दौरान तकनीकी तथा व्यावहारिक रूप से एक सुगमतम धन्धे में लगाने की आजादी विश्व की विशालतम कम्पनियों को दे दी गई थी। एक बार इसे स्थगित करने के बाद एक ओर तो इस आत्मघाती (आ बैल, मुझे मार नुमा) फैसले के पक्ष में प्रचार बढ़ा दिया गया है, दूसरी ओर यह घोषणा भी की जा रही है कि इसे शीघ्र लागू कराने की कोशिशें जारी हैं।
किस तरह बेहतर राजनैतिक या कम विरोध की स्थितियाँ पैदा की जाएँगी या इस निर्णय में सुधार किए जाएँगे ताकि कम से कम इसके गलत प्रभावों को कमतर किया जा सके, यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है।
हाँ, कई बेतुकी दलीलें देकर जनता को भरमाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। यू0पी0 के विधान सभा चुनावों ने राजनैतिक लोगों को एक बार फिर जनता के दरवाजों पर दस्तक लगाने को मजबूर कर दिया है। इस अवसर का इस्तेमाल खुदरा व्यापार में विशाल विदेशी कम्पनियों की भारत प्रविष्टि के पक्ष में प्रचार करने के लिए भी किया जा रहा है। इस सिलसिले में एक बिना सिर पैर की दलील का उदाहरण इस मुहिम के खोखलेपन की पोल खोलने के लिए पर्याप्त नजर आता है।
कांग्रेस के एक अति शक्तिशाली नेता ने किसानों को एक बहुत ही लचर और सच्चाई से कोसों दूर दलील देकर वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आगमन से मिलने वाले फायदों का खाका खींचा। इस दलील का सार यह है कि किसान के आलू जैसे उत्पादन को अभी बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसका इस्तेमाल करके डिब्बा या थैली बन्द सामान जैसे उत्पाद बनाकर उन्हें कई गुना ऊँचे दामों पर बेच दिया जाता है। इस तरह किसान को अपनी मेहनत का लाभ बहुत नाम मात्र मिल जाता है। दूसरी ओर मुख्य रूप से किसान द्वारा पैदा किए गए सामान को काफी ऊँची या महँगी दरों पर बेचा पाता है। यह सारा लाभ कृषिमाल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादक हजम कर लेते हैं जाहिर है यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है। सरकार और देश के लोग मिलकर इन हालात को बदल नहीं पाए है।
नेता आम सभाओं में कहते हैं कि अब सरकार इस कमी को दूर करके किसान को उसका हक दिलाना चाहती है। अब सरकार विदेशी, मुख्य रूप से यूरोप और अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सहारे यह करने जा रही है।
प्रत्येक कम्पनी जो 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भारत के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में काम कर सकने मंे समर्थ है (कुल 53 शहरों में) उनको अब भारत में खुदरा दुकानें खोलने की इजाजत देना कांग्रेस की सदारत में चलने वाली सरकार का लगभग एक तरफा निर्णय था। अभी तो विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा पा रहा है किन्तु सरकार इस निश्चय पर अडिग है और इसे लागू करवा कर किसान को उसकी उपज के अच्छे दाम दिलाने को कटिबद्ध है। जाहिर है इस सरकार को अति विशाल पूँजीवाली विदेशी कम्पनियों का दामन थामकर किसानों को उनके माल का अच्छा दाम दिलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। अब तक के अपने लम्बे शासनकाल में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिला पाने में नाकामयाब सत्ता अब इन बाहरी विशाल कम्पनियों के माध्यम से इस मकसद को अंजाम देना चाहती है।
यहाँ दो सवाल विचारणीय हैं सच है किसान को उसकी फसल के उचित दाम मिलने में कई बाधाएँ आती हैं। उदारीकरण के बीस सालों में पेप्सी जैसी बाहरी कम्पनियों मैकडोनालड स्टारबक, सब वे, जैसी कई रेस्त्रां सीधे किसानों से फसल खरीदने वाली बहुराष्ट्रीय अनाज व्यापारी कम्पनियों को भारत में न्यौता गया, किन्तु स्थिति सुधरी नहीं। अनुबन्ध खेती में अग्रणी पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ आलू, टमाटर की विदेशी कम्पनियों से अनुबन्ध या कान्ट्रेक्ट, खेती का चलन बहुत बढ़ा, किसानों को आलू सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ा। खाद्य प्रसंस्करण के नाम पर हानिप्रद पैकटों में नमकीन बेचने को इतना बढ़ाया गया कि लाखों हलवाइयों का रोजगार घटा। ये सब बाजार की शक्तिशाली कम्पनियों को बढ़ावा देने का नतीजा है। इन्हीं नीतियों के
सूत्रधार अब अपने करतूतों के खराब नतीजों से किसानों को बचाने के लिए और ज्यादा कड़ी, प्रतियोगिता, खुदरा व्यापारियों को न्यौतकर किसान को न्यायपूर्ण वाजिब कीमत दिलाने का झूठा भरोसा दिला रहे हैं। राजस्थानी में कहावत है कि ‘‘झूठ बोलने वाला और जमीन पर सोने वाला तंगी महसूस नहीं करता’’। इस वादे का दो मुँहा चरित्र और खुलकर सामने आता है जब यह कहा जाता है कि किसान की उपज उससे अच्छे (यानी ऊँचे) दामों पर खरीदी जाएगी और वही फसल उपभोक्ताओं को सस्ती बेच दी जाएगी।
यह चैकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमने ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।

-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389
लोकसंघर्ष पत्रिका के मार्च 2012 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

सोने-चाँदी के आसमान छूते दामों की अन्तर्कथा

आजकल सोने चाँदी के भाव अनेक और परस्पर विरोधी कारणों से आम आदमी के लिए भी चर्चा और चिंता के मसले बन गए हैं। कहा जा सकता है कि आम आदमी भारत में गरीब का दूसरा नाम है। सोना चाँदी उसकी पहुँच या आर्थिक वित्तीय बूते के बाहर की बात है। ये दोनों बहुमूल्य धातुएँ आम आदमी की ही नहीं किसी भी इंसान की बुनियादी या अपरिहार्य जीवनोपयोगी जरूरत का हिस्सा भी नहीं हैं। एक बहु प्रचलित आर्थिक नीति सूत्र यह कहता है कि एक अच्छी अर्थव्यवस्था और उसके राज्य की आर्थिक नीति मूलभूत आवश्यकताओं की संतुष्टि करने वाले साजो सामान की उपलब्ध मात्रा प्रचुर और कीमतों को अपेक्षाकृत नीचे स्तर पर और साथ में उन्हें यथासंभव स्थिर रखती है। कीमत नीति का एक दूसरा सूत्र भी ध्यान देने योग्य है। इसके अनुसार शानो शौकत विलासिता और दिखावा करने वाली चीजे धनी वर्ग को प्रिय होती हैं। इन चीजों की महत्ता उनके दामों से आँकी जाती है। जितने ऊँचे उनके दाम, उतना ही अपने को गौरवान्वित अनुभव करता है उनका खरीददार, केवल अपनी नजर में बल्कि शेष समाज की नजर में भी। अतः बहुमूल्य वस्तुओं का बहुत लेनदेन और उनके दामों में निरन्तर बढ़ोत्तरी सीधे सीधे सम्पन्न लोगों के हाथ में सम्पत्ति के बढ़ते संग्रहण या केन्द्रीयकरण की सूचक है। 21वीं सदी के विश्व की दो विशेषताएँ एक सोने चाँदी की महँगाई और दूसरे विषमताओं का उछलता ज्वार मूलतः परस्पर जुड़ी हुई बातंे हैं। ’’तुलसी के आदर्श राजाराम ने भी-
‘‘मणि माणिक महँगे किए,
सहँगे तृण जल नाज’’
तो आज की अर्थ प्रधान, निजी स्वार्थ साधना और समृद्धि को सफलता का सोपान मानने वाले विषमतर होते समाज में सोने चाँदी की कीमतों में नित्य नये शिखर स्वाभाविक ही माने जाने चाहिए।
यदि स्याह और सफेद के दो भागों में बँटी हमारी सामाजिक यथार्थ की समझ सही पर्याप्त और उचित होती तो शायद उपर्युक्त कथनांे के आगे या पीछे कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं होती। किन्तु सामाजिक यथार्थ बहुरंगी, बहुपक्षीय और अनेक जटिलताओं से भरा होता है। क्षुद्र स्वार्थ उसको विकृत करते रहते हैं, फलतः इसमें अनेक उलझे हुए आपसी रिश्ते होते हैं। अतः कीमतों का स्तर निरपेक्ष या अपने आप में कोई पूरी कहानी नहीं कह पाता है। विभिन्न वस्तुओं की कीमतों के आपसी सम्बन्ध यानी उनकी सापेक्षिकता भी कम महत्वपूर्ण और प्रभावशाली नहीं होती है। सामाजिक उत्पादन और सम्पत्ति में जिन वस्तुओं की जितनी ही अहमियत होती है उतनी ही दूरगामी व्यापक और गहरे उनके कीमतों के स्तर के सापेक्ष और निरपेक्ष प्रभाव होते हैं। इस तरह केवल जीवनोपयोगी होने मात्र से अथवा मनोकामनाओं के आधार पर ही, वस्तुओं का महत्व उनके कीमतों के निर्धारण में अपना दखल नहीं दे पाता है। सम्पत्ति, शक्ति, प्रभाव और समाज में प्रतिष्ठा प्रदान करने में भी विभिन्न वस्तुओं की भूमिका भिन्नता पूर्ण हो जाती है। यह नुक्ता भी सोने-चाँदी की कीमतों की चाल ढाल समझने में सहायक होता हैं। उदाहरणार्थ हम कह सकते हैं कि जमीन की महत्ता और ऊँची कीमतें भी इन्हीं प्रभावों और प्रक्रियाओं के प्रतिफल हैं। अब तक सोने चाँदी के दामों की प्रकृति और प्रभाव के चर्चा के सिलसिले में हमने कुछ सामान्य और व्यापक विचारों का उल्लेख किया है, हमें यह कई कारणों से जरूरी लगा। सामान्यतः किसी भी वस्तु की कीमत उसकी माँग और पूर्ति के प्रभावों के द्वारा समझी जाती है किन्तु बहुधा इन दो व्यापक और मूलभूत तत्वों को बहुत स्थूल और सतही रूप में ले लिया जाता है। इनके पीछे छिपे, इनको प्रभावित करने वाले बिन्दुओं और मसलों पर बहुत चर्चा यदा कदा ही की जाती है।
सोने एवं चाँदी की कुछ खास विशेषताएँ उनकी माँग और आपूर्ति को प्रभावित करती हैं। ये दोनों धातुएँ तुलनात्मक दृष्टि से अत्यधिक उच्च कीमतों वाली वस्तुओं की श्रेणी में आती हैं। अतः ये सम्पत्ति संग्रह की साधन और वैभव की प्रतीक मानी जाती हैं। इन्हें सौन्दर्य प्रसाधन और कलात्मक अभिव्यक्ति के एक माध्यम के रूप में भी जाना जाता है। इनका स्थानान्तरण सुगम होने के कारण धन के स्थानान्तरण के माध्यम के रूप में भी इन दोनों धातुओं की उपादेयता जगजाहिर है। सम्पत्ति को दीर्घ काल तक सुरक्षित और अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए भी सोने-चाँदी का उपयोग होता रहा है। भौतिक रूप में भी इनका क्षरण नहीं होता है।
ऐसी विशेषताओं से युक्त चीजों की बाजार में माँग और उनकी आपूर्ति के पीछे कुछ विशेष दीर्घ कालिक और परिवर्तनीय प्रभाव छिपे रहते हैं। उन पर विचार विमर्श सोने-चाँदी के दामों की उच्चतर दिशा में प्रवृत्त गतिमानता को समझने में सहायक होना चाहिए। साथ ही यह विश्लेषण इस विषय पर प्रचलित अनेक भ्रांतियों को दूर करने में भी सहायक होता है।
मानवीय आर्थिक-सामाजिक जीवन के इतिहास का बड़ा भाग लगातार वृद्धिमान, बहुमुखी विषमताओं का इतिहास रहा है। हाँ, इन विषमताओं के कारण, तौर-तरीके और प्रभाव अवश्य कई रूपों और अर्थों में बदलते रहे हैं। इन विषमतामय समाजों में उच्च स्थानासीन तबकों की जीवन शैली, कार्य व्यवस्था और मूल्य, शेष समाज से अपनी अलग पहचान रखते आए हैं, अपने लगातार जारी तथा बदलते दोनों रूपों में। इससे भी ज्यादा खास बात यह है कि इन तबकों की आर्थिक वित्तीय जरूरतें भी अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। प्राचीन काल में मुद्रा यानी सिक्कों के रूप में इस्तेमाल के कारण इन उच्च कीमत की धातुओं की बहुत अहमियत रही थी उसी तरह सुदूर प्रदेशों के आपसी व्यापार में वस्तु विनिमय के साथ साथ व्यापार में निर्यात आधिक्य का भुगतान भी कीमती धातुओं, मणि-माणिक और हीरे मोती के रूप में मुख्य रूप से लिया और दिया जाता था। राज्यों की सैन्य शक्ति के लिए भी बेशकीमती धातुओं के भण्डार की जरूरत होती थी, इसलिए युद्ध में विजय का पारितोषक भी सोने-चाँदी के भण्डारों की लूट के रूप में एकत्रित किया जाता था।
आपूर्ति पक्ष के चंद खास बिन्दुओं का संक्षिप्त विवरण भी सोने-चाँदी के आर्थिक पक्ष को स्पष्ट करने के लिए जरूरी है। इन धातुओं का खनन बहुत मेहनत माँगता है और जोखिम भरा होता है। इनकी खानों की खोज और उत्खनन भी बहुत श्रम साध्य और तकनीकी रूप से कठिन तरीकों पर आधारित होता है। इन धातुओं की उपलब्धि सर्वत्र नहीं होती, बल्कि कुछ खास इलाकों में केन्द्रित पाई गई है। किन्तु इनकी माँग सर्वत्र होती है। इनकी चाह तो स्वर्ण मृग की तमन्ना के रूप में अतृप्त और अदम्य चाहनाओं का दूसरा नाम बन चुकी है। आभूषणों, बर्तनों, पूजा सामग्री आदि के अलावा सोने-चाँदी का उपयोग कई औद्योगिक कच्चे या मध्यवर्ती सामान के रूप में भी होता हैं। किसी भी सामान्य वर्ष में आम तौर पर सोने चाँदी की जितनी माँग होती है, उसके मुकाबले इनका सालाना उत्पादन काफी कम यानी उसका छोटा सा भाग होता है। सोने के उत्पादक देश और खास तौर पर उसके निर्यातक देश संख्या में काफी कम हैं, किन्तु इनकी माँग तो हर देश में होती है। यह एक विरोधाभासों भरा तथ्य है कि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा आयातक देश है और कहा तो यह भी जाता है कि भारत के लोगों के पास विश्व का विशालतम स्वर्ण भण्डार जमा है। यही नहीं, अब विषमता वर्धन को अघोषित रूप से आार्थिक सफलता मानना भारत की सरकारों और मुख्य राजनैतिक गैर वामदलों की विचारधारा का अभिन्न अंग बन चुका है। भ्रष्टाचार विरोध का नाटक करने वाले बाबा या तथाकथित संत भी उसकी जड़, गैर बराबरी वर्धन के खेल के स्वयं धुरंधर खिलाड़ी बन गए हैं। अतः अब भारत के विशाल आयात खर्च का दसवाँ हिस्सा सोने-चाँदी जैसे अनावश्यक आयातों पर खर्च होता है। फूल, प्याज और अनाज का निर्यात करके सोने-चाँदी का देशी जखीरा बढ़ा रहे हैं और वह भी चंद लोगों के हाथों में। पेट की भूख बढ़ाकर आभूषणों की भूख मिटाने का ही यह एक नजारा है।
इन तथ्यों एवं मतों की सोने-चाँदी की कीमतों की ऊँची उड़ान की व्याख्या करने में बहुत अहम भूमिका है। साथ ही भारतीय अर्थ और समाज व्यवस्था का असली रूप समझने में यह एक बड़ा तथ्य है। जब से भारत में विषमतावर्धक आर्थिक उत्पादन बढ़त को राष्ट्रीय प्रगति का सर्वोच्च ही नहीं एकमेव प्रतिमान माना और प्रचारित किया जाता है, सोने-चाँदी के आयात की छूट दे दी गई है। सरकारी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं और अन्य वित्तीय व्यवसायिकों द्वारा स्वर्ण संचयन के पक्ष में विज्ञापन दिए जाते हैं। जिस काम को कल तक तस्करी के रूप में अवैध माना जाता था, नव उदारीकरण की छत्र छाया मंे वह फल-फूल रहा है। अब सोने का सालाना अयात लगभग एक हजार टन हो रहा है। जो लोग विदेशों से मँगाकर सोना खरीदते हैं, उन्हें विदेशी बैंकों में अपना कालाधन जमा कराने की जहमत मोल नहीं लेनी पड़ती है। सोना-चाँदी खरीदों उसे कहीं गुप्त घरों में, फार्म हाउसों में जमा करके रखो, उसको जब चाहों देस परदेस में बेच दो, टैक्स चुराओ और सोने में लगाओ तथा उसके ऊँचे चढ़ते दामों के कारण भारी भरकम मुनाफा कमाओ, आदि-आदि आज के आर्थिक परिदृश्य के वास्तविक चित्र हैं जिनकी तह में सरकारी सभी गैर वामदलों की घोषित और डंके की चोट पर लागू की गईं नीतियांँ हैं। अजीब बात है कि सोने की ऊँची कीमतों को कारण बताकर इस पर कर की दर काफी नीची रखी जाती है। कर देयता की कुलराशि पर ध्यान दिया जाता है उसकी सापेक्षिक न्यूनता अपर्याप्तता पर नहीं। उसके गैर जरूरी प्रकृति तक उसके अन्य नकारात्मक पहलुओं को भी नज़रअंदाज कर दिया गया है। सोने का उपयोग स्वर्णधारक द्वारा देश के बाहर जमा काले धन की तरह जब चाहे देश के बाहर भी किया जा सकता है। विदेश में इसे हवाला के जरिये भेजना भी नहीं पड़ता है। विदेश यात्रा में इसे साथ ले जाया जाता है, और वहाँ इसका निवेश भी हो सकता है।
इस तरह प्राप्त राशि से विदेशों में वहाँ के अय्याशी के अड्डों में गुलछर्रे भी उड़ाए जा सकते हैं। रिश्वत देने-लेने में भी इन महँगी धातुओं का इस्तेमाल धड़ल्ले से और बेखौफ हो रहा है। स्त्रीधन के रूप में प्रचारित घोषित करके स्वर्ण राशि और स्वर्ण आभूषण विशाल धनराशि के संचयन तथा काले धन को छिपाने के माध्यम बन गए हैं। इन नए समाज विरोधी रुझानों और प्रवृत्तियों की ही एक झाँकी मिलती है, आर्थिक आँकड़ों की नई परिभाषाओं और गणना के बदले हुए तरीकों मंे। पहले सोने-चाँदी, मणि-माणिक मंे लगी राशि को अनुत्पादक मानकर उनकी कीमत को राष्ट्रीय निवेश में शामिल नहीं किया जाता था। लेकिन अब पूरी तरह निजी स्वर्णाभूषण, रजत भण्डार और जवाहरात में लगी राशि को राष्ट्रीय निवेश दर की गणना में शुमार किया जाता है। नीतिगत सोच के बदले और सीमित स्वार्थ आधारित रुझानों की यह एक झाँकी भर है।
उपर्युक्त तथ्य सोने-चाँदी को निजी धन संचय, मुनाफा प्राप्ति तथा कई प्रकार की ‘सुविधाओं’ की जननी की भूमि को रेखांकित करते है। इनके साथ में राष्ट्रीय सामाजिक लाभ की दृष्टि से एक संभावना जरूर छिपी रहती है। अन्तर्राष्ट्रीय वित्त के क्षेत्र में स्वर्ण भण्डार की भूमिका पूरी तरह परिवर्तनीय या विनिमयक्षम मुद्राओं के समान अथवा समकक्ष होती है। अतः सामाजिक उद्देश्यों से प्रेरित सरकारें देश में भण्डारित स्वर्ण, रजत राशि का उपयोग विदेशी लेन देन में कर सकती है। बशर्ते इसके लिए पर्याप्त राजनैतिक इच्छा शक्ति और प्रतिबद्धता हो। ये सब बातें आधुनिक काल में सोने चाँदी की माँंग की प्रबलता और उनकी कीमतों की लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति को परिलक्षित करती हैं। इसमें एक बात और जोड़ दीजिए तो सोने-चाँदी की ऊँची बढ़ती कीमतों की कहानी को नई ताकत और स्फूर्ति मिल जाएगी। सोने-चाँदी की ऊँची कीमतें उसके भण्डारण और आवागमन को एक भारी जोखिम भरा मामला बना देती हंै। बार-बार उसकी शुद्धता की गारन्टी भी हासिल करनी पड़ती है। इन दिक्कतों के निवारण के साथ-साथ खरीद-बिक्री की सुविधा, खरीददारों ओर विक्रेताओं की खोज को भी सरल और विश्वव्यापी बनाने के लिए अभौतिक रूप में वायदा बाजारों में सोना-चाँदी महत्वपूर्ण स्थान रखने लगे हैं। इस तरह स्वर्ण बाजार की तरलता बढ़ गई है। शेयरों और विदेशी मुद्रा की तरह या किसी भी वित्तीय रुक्के की भाँति सोने चाँदी के वायदा बाजारो का लगातार विस्तार हो रहा है। इन बाजारों में पल-पल अरबों, खरबों रुपये के सोने-चाँदी का लेन-देन होता है। नई-नई बदली हुई कीमतें सामने आती हैं और फिर भी एक औंस या रत्ती भर सोने-चाँदी का स्थानान्तरण नहीं करना पड़ता है। केवल व्यापारित सोने-चाँदी की मिल्कियत के कागजात के हस्तांतरण द्वारा जब लेन-देन के एक चक्र की समाप्ति होती है केवल उनकी घोषित कीमत के एक अंश के लेन-देन के आधार पर बड़े-बड़े सौदे हो जाते हैं। अतः अब विश्व बाजारों में सोने-चाँदी की उपलब्ध मात्रा से कितने ही गुना ज्यादा मात्रा में सोने-चाँदी का लेन-देन या उनके नाम पर किए गए सौदे का लेन-देन उनको पाटना या आगे खिसकाना आदि होते हैं। इनको ठोस आर्थिक वित्तीय परिघटनाओं की तरह ही सट्टोरियों का मूड उनकी मानसिकता या धारणाएँ प्रभावित करती हंै।
विश्व अर्थ व्यवस्था के घोर विषमतामय होते रवय्ये के साथ ही उसका वित्तीयकरण (फाईनेन्शियलाईजेशन) यानी वित्त या मुद्रा या ऐसी ही परिसम्पत्तियों, अस्तियों के लेन-देन की प्रवृत्ति बढ़ती है। इससे इन परिसम्पत्तियों के दामों के निरन्तर उच्चतर स्तर की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति जन्म लेती है और सतत बलवती होती रहती है। आधुनिक विश्व में सोने-चाँदी के दामों में उछाल की कहानी के पीछे ये ठोस सामाजिक-आर्थिक और वित्तीय प्रक्रियाएँ और प्रवृतियाँ सक्रिय हैं।
यहाँ एक और तथ्य का खुलासा इस सवाल पर हमारी समझ को स्पष्ट करने में सहायक होगा। विश्व वस्तु व्यापार तथा वित्तीय लेन-देन लगातार बढ़ते जा रहे हैं। वास्तव में मुद्रा, पँूजी, विदेशी मुद्रा, विभिन्न किस्म के वित्तीय रुक्को आदि का लेन-देन वास्तविक वस्तु व्यापार से हजारांे गुना ज्यादा होता जा रहा है। ये सब वित्तीय अस्तियाँ या रुक्के एक दूसरे का स्थान बखूबी ग्रहण कर लेने में सक्षम बना दिए गए हैं। सट्टोरिये, निवेशक, वित्तीय कम्पनियाँ विभिन्न वित्तीय बाजारों के बीच कीमतों, लाभ-हानि की गणना, भावी अनुमानों आशंकाओं के अनुसार अपनी परिसम्पत्तियों को घटाते-बढ़ाते रहते हंै। लक्ष्मी की चंचलता के बेजोड़ उदाहरण हैं ये।
एक विदेशी मुद्रा को किसी भी शेयर, सोने-चाँदी, ऋण पत्र आदि के बदले खरीद-बेच सकते हंै। किन्तु अपनी अन्तर्राष्ट्रीय सर्वव्यापक स्वीकार्यता के चलते इन बाजारांे में अमरीकी डाॅलर की भूमिका, महत्ता लम्बे अरसे से बेजोड़ है। किन्तु इन दिनों अमरीकी वर्चस्व वाला दुनिया का एकल ध्रुवीकरण समाप्ति की ओर है। अमरीका, अमरीकी अर्थव्यवस्था और डाॅलर अपनी सर्वोच्च स्थिति से हटते जा रहे हंै। एक ओसामा बिन लादेन को बरसों की जद्दोजहद के बाद अपनी पूरी ताकत झोंक कर मार गिराने को ही अब विश्व शक्ति होने का प्रमाण माना जा रहा है। यह भूलतेे हुए की वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान आदि में किस तरह एक अस्तांचल गामी शक्ति की झलक मिलने लगी है। किन्तु 2008 में शुरू, अमरीका में उत्पन्न हो, सारे संसार को लील लेने वाली बड़ी आर्थिक गिरावट ने तो विश्व अर्थव्यवस्था की रंगत ही बदल डाली। सच है यह बड़ी गिरावट सन् 1930 के दशक जैसी विश्व व्यापक महामंदी नहीं बन पाई। किन्तु तमाम ताबड़तोड़, भारी भरकम और विश्वव्यापी संभावित माने जाने वाले प्रयासों के बावजूद इस बड़ी गिरावट का भूत दुनिया का पिंड नहीं छोड़ रहा है। चीन, जापान तथा पेट्रोल धनी देशों के पास अमरीकी डाॅलर का विशाल जखीरा है। अमरीकी अर्थव्यवस्था तीनों तरह के (व्यापार, राजकोषीय और बचत) घाटों के चक्र में आकंठ फँसी हुई है। फलतः अन्य शक्तिमान होते देशों के पास अमरीकी डाॅलर जमा हो रहे हैं और अमरीकी राज्य उन देशों को अपनी प्रतिभूतियाँ बेच कर अपना घाटा पाट रहा है। नतीजन डाॅलर कमजोर हो रहा है। अब उसकी विश्वव्यापी रिजर्व करेंसी की भूमिका के पैर उखड़ने लगे हैं। विकल्प तलाशे और बनाए जा रहे है। इन हालात में डूबते डाॅलर को स्वयं अमरीका भी बड़ी मात्रा में नए डाॅलर छाप कर और ज्यादा कमजोर कर रहा है ताकि अन्य देशों के डाॅलर भण्डारों का मोल घट जाए। इन सब कारणों से वित्तीय और विदेशी मुद्रा बाजारों में भारी हलचल है। लोग कभी किसी वित्तीय परिसम्पत्ति से पलायन करते हैं तो कभी किसी अन्य अस्ति का वरण करते हैं। इसका नतीजा इन परिसम्पत्तियों की कीमतों की भारी अस्थिरता में नजर आता है। सोने-चाँदी का इस्तेमाल भी एक वित्तीय अस्ति के रूप में हो रहा है। इनकी माँग में दीर्घकालिक ही नहीं अल्पकालिक स्तर पर भी चढ़ाव का रुख है। चाहे तेजडि़यों का दौर हो या मन्दडि़यों का बोलबाला सोने-चाँदी की तो आम तौर पर बल्ले-बल्ले ही बनी रहती है। हम सोने-चाँदी में अपना पैसा डालने के लाभों का और न्यूनतम जोखिम की चर्चा कर चुके हंै। अतः न केवल बहरहाल बल्कि आने वाले समय में काफी दूर तक शायद ही कोई ऐसी अन्य अस्ति या मुद्रा नजर आए जो अपने कम वजन की गागर में इतने विशाल मूल्य की सर्व स्वीकार्य चिरन्तन क्रय शक्ति के इतने विशाल सागर को भरने की डाॅलर की क्षमता को टक्कर दे सके। अतः इनके दामों का हिमालय जैसी ऊँचाइयों की ओर बढ़ते रहना ही संभावित है। जिसके पास जितनी मात्रा सोने-चाँदी की है वह इनके आसमानगामी दामों से उतना ही प्रसन्न है और जैसे जैसे यह प्रसन्नता बढ़ती है, इन
धातुओं की खरीद बढ़ती है। यह एक परस्पर वृद्धि कारक प्रक्रिया बन चुकी है।
अब यह स्पष्ट है कि सोेने की अदम्य ललक की वजह से इस स्वर्ण मृग की तृष्णा में भारत का मध्यवर्ग किस तरह अति सम्पन्न तबकों के हाथ का उनकी स्वार्थ सिद्धि मंे सहायक, खिलौना बन गया है। एक व्यक्ति के स्तर पर सोने-चाँदी में निवेश लाभ का सौदा है यदि भौतिक सुरक्षा की गारन्टी हो। किन्तु मध्य आय वर्ग अपनी सामाजिक साख, प्रतिष्ठा और दिखावे के चक्कर में अपनी गाढ़ी मेहनत मशक्कत की कमाई इन धातुओं मंे लगा कर एक ओर तो रोजगार वर्द्धक तथा जरूरी आवश्यकता की चीजों के उत्पादन से निवेश को हटाता है, दूसरे शादी-ब्याह और भेंट के अपने खर्च को बढ़ाता है। साथ ही अतिसम्पन्न वर्ग की शक्ति के सम्मुख अपनी शक्ति क्षरण करने में मध्यम आमदनी वाला तबका खुद ही मददगार होता है। किस तरह सामाजिक ध्येय तथा स्वार्थ सतही सोच और निर्णयों से व्यक्तिगत हित साधना से टकराते है इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है सोने-चाँदी के दामों की ताजा तरीन प्रवृत्तियाँ।

-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389
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