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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात

 राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त  गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात
-कमल नयन काबरा
        राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह  सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त
गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता होती है। परन्तु अवसर न मिलने के कारण इनमें से अधिकतर आजीविका विहीन और अभावग्रस्त करोड़ों लोगों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। दुखद है कि सरकार व अधिकारी आर्थिक सामाजिक तथ्यों की आधिकारिक जानकारी होते हुए भी कुछ ठोस सुधारात्मक, सकारात्मक ठोस कदम नहीं उठाते। भारत की सबसे गंभीर समस्या, गैर-बराबरी है। अमानवीय गैर बराबरी के कारण देश की युवा पीढ़ी, बालक एवं वृद्ध फटेहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश इस बड़े मानव संसाधन के प्रयासों से संभावित राष्ट्रीय उपलब्धियों से भी वंचित हो रहा है। नेता शासक कम्पनियाँ मात्र राष्ट्रीय आय के कुल योग और औसत में राष्ट्रीय गौरव खोजने में लगे रहते हैं। अनेक समाज विज्ञानी उनके सुर में सुर मिलाते हैं। उन्हें इन करोड़ों नवयुवकों की ज्ञान क्षमता तथा अनुभव में संभावित योगदान दिखाई नहीं देता। नकली और थोथे राष्ट्रवाद में विषमताएँ भरी हुई हैं। उनके दुष्परिणामों की गणना तो दूर कभी उनकी फेहरिस्त भी नहीं बनाई गई। अधिकारी वर्ग किसी बीते जमाने की खुमारी में डूबे स्वप्नदर्शी स्वाभिमानी की तरह हो गए हैं। वे अपने परिवेश की वंचनाओं और कष्टों की घोर उपेक्षा कर रहे हैं।
    खैर, काफी अरसे बाद जनमत ने राजकीय सत्ता की वैधानिक दुर्बलता को दूर किया है। केन्द्र में एक सशक्त राज्य सत्ता की स्थापना हुई है। लोगों ने भाजपा में गहरा विश्वास और अपनी उम्मीदों की पूर्ति को दंाव पर लगाया है। इस परिप्रेक्ष्य मंे हमें 2014-15 के बजट के चरित्र, प्रावधानों और संभावित प्रभावों को देखना चाहिए। आज के परिवेश में गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और विषमताएँ आपस मंे पूरी तरह गुत्थमगुत्थ हैं। साथ ही यह चतुष्कोण आर्थिक सांस्कृतिक और अन्तर्राष्ट्रीय पटल के सम्बंधों कार्य प्रणाली, शक्ति संतुलन तथा राजकीय नीतियाँ और सुविधाएँ तथा प्रकृति का दुष्परिणाम भी है। हर साल राजकोषीय वित्तीय आवंटन में पुरानी लीक पीटा जाता है। इस वर्ष भी केवल सीमांत, मामूली रद्दोबदल ही किए गए हैं। राजग दो सरकार ने जो बजट पेश किया हैं, उसे देखकर वर्षों से आलोचना और खंडन मंडन में निरंतर, केन्द्रीय सत्ता संचालन के पुराने अनुभवी, अनेक राज्यों की लम्बे समय तक बागडोर सँभालने वाले तथा अपनी स्पष्ट आर्थिक सामाजिक प्रतिबद्धताओं की ताल ठोकने वाले लोग आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि बजट से नई सरकार ने अपनी कोई छाप नहीं छोड़ी। वे ऐसा कह रहे हैं तो कोई कारण भी होगा। कारण खोजने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 1970 के बाद से ही देश में असंतुलन अपना पैर फैलाने लगा था। बड़ी राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी परस्त बाजार यानी निजी लाभ प्रेरित नीतियाँ मामूली फेरबदल के साथ लगातार अपनी पैठ जमाती गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में गैर बराबरी नीति असंतुलित, अनैतिक और अलोकतांत्रिक होने के साथ साथ दीर्घकालीन जनहितों की बलि भी लेता रहा। भारत सरकार ने वित्तीय और विदेशी क्षेत्र को अत्यधिक महत्व दिया, जिससे कृषि और ग्रामीण जीवन की न्यूनतम  जरूरतों की घोर उपेक्षा हुई।
    बाजारोन्मुखी नीतियों को लागू करने के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति निरंतर कमजोर हो रही है। प्रभावी माँग एवं उत्पादन के स्वरूप के बीच असमान्य समीकरण होने की वजह से कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार, काला धन, मानवीय मूल्यों की हत्या, जघन्य अपराधों का तांडव चल रहा है। राजनीति मूल्यहीन घटिया व्यवसाय फरेबी हो गई है। सालाना बजटों की तरह इस साल का बजट भी पिछली नीतियों को ही आगे बढ़ाता है। वर्ष 2014-15 के बजट में सार्वजनिक व्यय को महज 14 प्रतिशत तक रखा गया। जिसमें करीब दस प्रतिशत
कराधान तथा शेष बजट घाटे का है। यह अनुपात कुछ वर्षों पहले करीब 17 प्रतिशत हो चला था। इसे बढ़ाने के बदले घटाया गया है। इसे पूरा करने के लिए भी विनिवेश (यानी सामाजिक सम्पत्ति कर निजी हाथों में हस्तांतरण तथा दीर्घ स्थायी परिसम्पत्तियों को बेचकर उससे चालू खर्चों पर लगाना यानी असामाजिकता और अदूरदर्शिता का कष्टकर संयोग) द्वारा करीब 435 अरब रूपये की उगाही की तजबीज है। कुल राजस्व में 17.7 प्रतिशत वृद्धि की आशा महंगाई की बढ़ी दर पर टिकी है। जिस पर सरकार नियंत्रण करने में विफल हो रही हैं।
    ये सब कदम है व्यवसाय और व्यवसायिक यानी बिजनेस परस्ती या मित्रता के। ये व्यवसायी, खास तौर पर कारपोरेट व्यवसायी बमुश्किल देश के सर्वोच्च आय और सम्पत्ति तथा शासन पर हावी लोग हमारी जनशक्ति, हमारे जन मन गण के एक प्रतिशत के करीब होंगे। इनकी वर्तमान स्थिति को लगातार मजबूती देते कहकर यह परिकल्पना करना कि 99 प्रतिशत लोगों खास तौर पर करीब तीन चैथाई लोगों का सापेक्ष और निरपेक्ष विकास, सामाजिक समावेशन और शक्तिकरण हो जाएगा बालू का भुतहा महल बनाने जैसा शेख चिल्लीपन है।
    लगता है राजग दो सरकार भी निजी सार्वजनिक साझीदारी (पीपीपी) के जरिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के ख्वाब देख रही है। यहाँ तक कि चालू सरकारी स्कूलों तक को व्यापारी वर्ग को सौंपने की तैयारी हो रही है। राज्य के साथ मिलकर अब बड़ी-बड़ी विशाल पूँजी तथा वित्त जुटाने में समर्थ तबके आर्थिक और सामाजिक भूमिका के केन्द्र में हांेगे। परन्तु सरकार भूल रही है कि पीपीपी की बेहिसाब बढ़ोत्तरी ने आय और सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण रूपी कुप्रभावों को बढ़ाया है। इससे सामाजिक राजनैतिक शक्ति के वितरण में भी विषमता का दंश बढ़ा है। गृहस्थ, बैंक तथा वित्तीय क्षेत्र की बचत को उधार लेकर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ राज्य के अधिकारों पर काबिज होती हैं। सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात संचार आदि सार्वजनिक सेवाओं को पूर्णतः निजी हाथों में दे दिया है। इस तरह की निजी दुकानों ने सामाजिक समस्याओं की जड़ों को पहले ही अतिरिक्त मजबूती दे दी है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के साम्यकारी रूप से अर्द्धशिक्षित, निजी शिक्षक और व्यापारी कुलपति अपने पैरों तले कुचल रहे हैं। चिकित्सा के नाम पर निर्धन की सम्पत्तियों की कुर्की हो रही है। सरकार ने अपने बजट में इन असमानताओं को दूर करने के कोई प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि इन्हें प्रोत्साहित ही किया है।
    लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार भी पूँजीपतियों के हाथों का खिलौना प्रतीत होती है। सारे विकल्प नागनाथ और साँपनाथ के बीच चयन तक सिमट जाते हैं। गैर बराबरीमय भूमंडलीकरण इन असमानताओं को आगे बढ़ाता है।
    सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा व्यवसाय में भी तेज मुनाफे खोजे जा रहे हैं। इसके लिए हवा के झोंकों की तरह इधर उधर भागती सट्टोरी विदेशी वित्तीय पूँजी  को बड़ी भूमिका दी जा रही है। कराधान, कर कानूनों में छिद्र, उनकी उपेक्षा तथा कर कानून और प्रशासन में रिश्वतखोरी से पूँजीपतियों को बच निकलने के कई रास्ते मिल जाते हैं। इन मुट्ठी भर लोगों का राष्ट्रीय आय, सम्पत्ति और सुविधाओं के अकल्पनीय बड़े भाग (लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक) पर कब्जा सा हो गया हैं। हमारे आर्थिक वित्तीय नीतिगत सोच पर पश्चिमी देश और उनके द्वारा चयनित स्थानीय पंडितों ने पूरी तरह कब्जा कर रखा है। हम भूल गए हैं कि वर्ष 2008 में धनी पश्चिमी देशों की आर्थिकी कैसे धाराधायी हुई थी। फिर जन  धन की बलि चढ़ाकर उसे उबारा गया था। अफसोस कि पिछले 67 सालों से हर बजट की प्रकृति विषमता वर्धक रही है। लोकतांत्रिक शासक बदल रहे हैं। शासक वर्ग का ब्राण्डनेम बदल रहा है लेकिन असमानता बदस्तूर जारी है। नई सरकार यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, सही खान पान, पर्यावरण तथा छोटे उद्योगों के संरक्षण पर ध्यान दे, गरीबों की जमीन को पूँजीपतियों के हाथों से बचाए तो उनके जीवन के कष्ट कम हो सकते हैं। सबके विकास से ही मजबूत अर्थव्यवस्था की परिकल्पना की जा सकती है।   
   -कमल नयन काबरा
  मोबाइल: 09013504389
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

विज्ञान में पिछड़ता भारत ? आखिर क्यों ?

विज्ञान के प्रोत्साहन में आ रही कमी का ही परीलक्षण है की अब बच्चे विज्ञान की उच्च कक्षाओं के छात्र बनने की जगह इंजीनियरिंग , प्रबन्धन , एवं प्रशाशन के क्षेत्र में ही अधिकाधिक जाने का प्रयास कर रहे है |


एक हिन्दी दैनिक दी गयी सूचनाओं के अनुसार प्रधान मंत्री ने कुछ महीने पहले भारतीय विज्ञान कांग्रेस को संबोधित करते हुए कहा की ' पिछले कुछ दशको में विज्ञान के क्षेत्र में गिरावट आई है | अमेरिका व यूरोपीय देशो में ही नही बल्कि पड़ोसी देश चीन से हम पिछड़ते जा रहे है |' इसी तरह 2010 के अधिवेशन को संबोधित करते हुए प्रधान मंत्री ने कहा था की ' देश में विज्ञान व शोध के विकास को बढावा देने में निजी क्षेत्र की भूमिकa निराशाजनक है |

कुछ साल पहले एडमिनिस्ट्रेटीव स्टाफ कालेज आफ इंडिया ' द्वारा कराए गये अध्ययन से पता चला था की 80% से ज्यादा भारतीय कम्पनिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर कोई खर्च नही करती है |फिर सरकारी क्षेत्रो में भी विज्ञान कोबढावा बहुत कम दिया जा रहा है |

विज्ञान के प्रोत्साहन में आ रही कमी का ही परीलक्षण है की अब बच्चे विज्ञान की उच्च कक्षाओं के छात्र बनने की जगह इंजिनियर , प्रबन्धन एवं प्रशासन के क्षेत्र में ही अधिकाधिक पहुचने का प्रयास कर रहे है | इंजीनियरिंग की पढाई में भी मामला तकनीकि ज्ञान के विकास और नए शोध का नही है बल्कि झटपट प्लेसमेंट वाली तथा भारी भरकम पॅकेज वाली नौकरियों का है | वैज्ञानिक शिक्षा तथा शोध व विकास को हतोत्साहित किए जाने का परीलक्षण है की भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलौर में आवश्यक 478 प्राध्यापकों की जगह 250
प्राध्यापक ही मौजूद है | फिर यह बात भी सच है की सरकारी विद्यालयों एवं उच्च विद्यालयों में भी नए खोजो अनुसन्धानो और फंड अनुदान में भारी कमी की गयी है |

सूचना यह भी है की भारत में विज्ञान एवं शोध व विकास के लिए सकल घरेलू उत्पाद का नगण्य हिस्सा खर्च किया जाता है , जबकि अमेरिका से लेकर जापान , कोरिया , चीन तथा ताइवान तक इस क्षेत्र में अपने सकल घरेलू उत्पाद का कही ज्यादा धन खर्च करते है |
यह तो देश में विज्ञान एवं शोध व विकास के बारे में प्रधानमन्त्री के बयान और उसके तथ्यगत सबूत | अब अगला महत्वपूर्ण सवाल है की आखिर ऐसा है क्यों ?
प्रधानमन्त्री का कहना है की पिछले कुछ दशको से विज्ञान की स्थिति में गिरावट आई है ...................फिर 2010 में उनका यह भी कहना है की विज्ञान की उच्च शिक्षा एवं शोध व विकास को बढावा देने में निजी क्षेत्र की भूमिका नगण्य है | प्रधानमन्त्री जी के दोनों बयानों में उनकी अपनी भूमिका के साथ एक परस्पर सम्बन्धित तथ्य मौजूद है |वह यह की 1991 से उसे उदारीकरणवादी निजीकरणवादी तथा वैश्वीकरणवादी अन्तराष्ट्रीय नीतियों को नयी आर्थिक नीतियों के नाम से लागू करने वाले वित्त मंत्री और कोई नही , बल्कि वर्तमान प्रधान मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ही थे | देश में इन नीतियों '' सुधारों को आगे बढाते हुए निजी क्षेत्र को ही अर्थात निजी क्षेत्र के देशी व विदेशी बड़े मालिको को ही सर्वाधिक बढावा दिया गया | पहले के सार्वजनिक क्षेत्रो को भी निजीकरण , के तहत निजी मालिको को सौपने का काम किया जाता रहा | इसीलिए विज्ञान एवं शोध व विकास में निजी क्षेत्र की नगण्य भूमिका और ज्यादा उभरकर सामने आ गयी | पहले की तुलना में विज्ञान एवं शोध व विकास की स्थिति में और गिरावट आ गयी है |
वैसे तो वैज्ञानिक अनुसंधान में यूरोप के मुकाबले पूरा एशिया ही पीछे है | हमारे देश में ब्रिटिश काल में हुए चंद वैज्ञानिकों के अलावा आधुनिक वैज्ञानिक खोजो की जानी मानी हस्ती न तो पहले है और न बाद में | इसके वावजूद पहले के तीन दशको में सरकारे जितना भी इस क्षेत्र के लिए प्रयास कर रही थी , बाद के दशको में वह भी ढीला पद गया , कमजोर हो गया क्योंकि ---पहले शिक्षा को वैज्ञानिक शिक्षा को , वैज्ञानिक खोज को बढाने का जिम्मा सरकारों को था | निजी क्षेत्र की हैसियत औकात व अधिकार कम थे , नियंत्रित थे | सरकारे किसी हद तक विज्ञान को बढावा भी दे रही थी | इसका सबूत यह भी है की तब मेधावी व अध्ययनशील छात्रों का बड़ा समूह विज्ञान की शिक्षा और वह भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लालायित रहता था | इस संदर्भ में यह भी याद रखना चाहिए उस समय सरकारे देश की आत्मनिर्भरता के नारे लगाती रही थी |आत्मनिर्भर वैज्ञानिक एवं तकनिकी विकास के सपने भी दिखा रही थी | पर आत्मनिर्भरता के लिए वैज्ञानिक व तकनिकी विकास का काम कभी नही हुआ , उल्टे विदेशी वैज्ञानिक एवं तकनिकी उपलब्धियों के आयात को लगातार बढावा देना जारी रखा गया | इसके बावजूद उस समय तक भारत में वैज्ञानिक शिक्षा पर आज से कही ज्यादा जोर था और वह जोर कुछ न कुछ आत्मनिर्भरता के नाम पर था |
पर अब पिछले तीन दशको से देश के आत्म निर्भर विकास के नाम -- नारे को भी छोडकर वैश्वीकरण का नारा लगाया जाने लगा | विकसित देशो से पूंजी व तकनीकि का अंधाधुंध आयात बढने लग गया | देश में वैज्ञानिक खोज करने कराने की जगह उसे विदेशो से आयात करने और देश में उसे हतोत्साहित करने का काम बढने लग गया है | वैज्ञानिक एवं तकनीकि खोजो को करने करवाने और फिर उसे आयात करके लाभ दर लाभ कमाने तथा भारत जैसे विकासशील देशो को तकनीकि तौर पर निर्भर बनाने में माहिर बहुराष्ट्रीय कम्पनिया और उनकी साम्राज्यी सरकारे पहले से लगी रही है | वे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दबाव डालकर भी इन देशो में वैज्ञानिक एवं तकनीकि खोजो को कमजोर करवाती रही है | फिर देश की निजी क्षेत्र के बड़े धनाढ्य मालिक इसके लिए पहले से ही ( ब्रिटिश काल ) से तैयार रहे है , ताकि उन्हें वैज्ञानिक खोज पर धन न खर्च करना पड़े न समय लगाना पड़े | उनकी जगह उन खोजो तकनीको के आयात से अधिक उत्पादन व बिक्री का लाभ उन्हें तुरंत मिल जाए | पिछले तीन दशको में विदेशी व देशी धनाढ्य कम्पनियों को मिलती रही छूटो व अधिकार ने वैज्ञानिक व तकनिकी खोज के आयात को अंधाधुंध बढावा देकर तात्कालिक रूप से आर्थिक वृद्धि को तो दर्शा दिया पर देश में वैज्ञानिक व तकनिकी अनुसन्धान को लगातार लम्जोर करने का काम किया | जाहिर सी बात है की वैज्ञानिक शिक्षा तथा खोज व अनुसंधान का यह काम देशी व विदेशी धनाढ्य कम्पनियों को विदेशी तकनीक के आयात को बढावा देते हुए हरगिज नही हो सकता | यह काम उन पर नियंत्रण लगाने के साथ तथा देश के आत्मनिर्भर विकास के लिए वैज्ञानिक शिक्षा व तकनिकी खोज को बढावा देते हुए ही हो सकता है |
सुनील दत्ता
पत्रकार

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला-2


यह चिकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमनेA ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।
-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

बुधवार, 21 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला




खुदरा व्यापार के विदेशीकरण की केन्द्रीय सरकार की मुहिम भारत के आम लोगों की आजीविका के साधनों पर एक बहुमुखी हमला है। इस निर्णय पर राजनीति के जंग में सरकार एक बार मुँह की खा चुकी है। वास्तव में यह फैसला स0प्र0ग0 दो की सरकार का नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व जोरशोर से इसके पीछे है किन्तु न केवल कुछ बड़े सहयोगी दल, अपितु कांग्रेस के अनेक लोग इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। एक पारिवारिक सम्पत्ति की तरह चलने वाली कांग्रेस पार्टी को कम्पनी क्षेत्र के बड़े स्तम्भ अपने घर की दुकान बता रहे हैं। विदेशी कम्पनियों और सरकारों के पैरोकार, विदेशी तथा देसी अखबार, विदेशी कम्पनियों के भारत प्रवेश को यू0पी0ए0-2 की कुशलता और शक्ति का प्रतीक बता चुके हैं। खुल्लम खुल्ला विदेशी कम्पनियाँ भारत में खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए लाॅबी करने यानी अपने पक्ष में प्रचार करने और रिझाने में मोटा खर्च कर रही हैं। खबर छपी है कि खुदरा व्यापार की एक बड़ी कम्पनी ने अपने पक्ष में निर्णय करने के लिए वर्षों से मुहिम चला रखी थी। वह अब तक 70 करोड़ रूपये इस गोरखधन्धे पर लगा चुकी है। क्या यह भारत की राजनीति और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में बाहरी वित्तीय आर्थिक इकाइयों की सीधी-सीधी दखलंदाजी का उदाहरण नहीं है। असली मुद्दा यह भी है कि महज 70 करोड़ रूपये में ऐसा जन विरोधी नीतिगत निर्णय भारतीय लोकतंत्र पर थोपा जा सकता है। हजारों करोड़ रूपये के निवेश को यहाँ के खेती के बाद आम आदमी के रोजगार के दूसरे मुख्य धन्धों में लगाने की इजाजत ऐसी शर्तों, ऐसी प्रतिकूल चालू आर्थिक स्थिति और सरकार की घटती साख के दौरान तकनीकी तथा व्यावहारिक रूप से एक सुगमतम धन्धे में लगाने की आजादी विश्व की विशालतम कम्पनियों को दे दी गई थी। एक बार इसे स्थगित करने के बाद एक ओर तो इस आत्मघाती (आ बैल, मुझे मार नुमा) फैसले के पक्ष में प्रचार बढ़ा दिया गया है, दूसरी ओर यह घोषणा भी की जा रही है कि इसे शीघ्र लागू कराने की कोशिशें जारी हैं।
किस तरह बेहतर राजनैतिक या कम विरोध की स्थितियाँ पैदा की जाएँगी या इस निर्णय में सुधार किए जाएँगे ताकि कम से कम इसके गलत प्रभावों को कमतर किया जा सके, यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है।
हाँ, कई बेतुकी दलीलें देकर जनता को भरमाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। यू0पी0 के विधान सभा चुनावों ने राजनैतिक लोगों को एक बार फिर जनता के दरवाजों पर दस्तक लगाने को मजबूर कर दिया है। इस अवसर का इस्तेमाल खुदरा व्यापार में विशाल विदेशी कम्पनियों की भारत प्रविष्टि के पक्ष में प्रचार करने के लिए भी किया जा रहा है। इस सिलसिले में एक बिना सिर पैर की दलील का उदाहरण इस मुहिम के खोखलेपन की पोल खोलने के लिए पर्याप्त नजर आता है।
कांग्रेस के एक अति शक्तिशाली नेता ने किसानों को एक बहुत ही लचर और सच्चाई से कोसों दूर दलील देकर वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आगमन से मिलने वाले फायदों का खाका खींचा। इस दलील का सार यह है कि किसान के आलू जैसे उत्पादन को अभी बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसका इस्तेमाल करके डिब्बा या थैली बन्द सामान जैसे उत्पाद बनाकर उन्हें कई गुना ऊँचे दामों पर बेच दिया जाता है। इस तरह किसान को अपनी मेहनत का लाभ बहुत नाम मात्र मिल जाता है। दूसरी ओर मुख्य रूप से किसान द्वारा पैदा किए गए सामान को काफी ऊँची या महँगी दरों पर बेचा पाता है। यह सारा लाभ कृषिमाल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादक हजम कर लेते हैं जाहिर है यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है। सरकार और देश के लोग मिलकर इन हालात को बदल नहीं पाए है।
नेता आम सभाओं में कहते हैं कि अब सरकार इस कमी को दूर करके किसान को उसका हक दिलाना चाहती है। अब सरकार विदेशी, मुख्य रूप से यूरोप और अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सहारे यह करने जा रही है।
प्रत्येक कम्पनी जो 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भारत के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में काम कर सकने मंे समर्थ है (कुल 53 शहरों में) उनको अब भारत में खुदरा दुकानें खोलने की इजाजत देना कांग्रेस की सदारत में चलने वाली सरकार का लगभग एक तरफा निर्णय था। अभी तो विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा पा रहा है किन्तु सरकार इस निश्चय पर अडिग है और इसे लागू करवा कर किसान को उसकी उपज के अच्छे दाम दिलाने को कटिबद्ध है। जाहिर है इस सरकार को अति विशाल पूँजीवाली विदेशी कम्पनियों का दामन थामकर किसानों को उनके माल का अच्छा दाम दिलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। अब तक के अपने लम्बे शासनकाल में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिला पाने में नाकामयाब सत्ता अब इन बाहरी विशाल कम्पनियों के माध्यम से इस मकसद को अंजाम देना चाहती है।
यहाँ दो सवाल विचारणीय हैं सच है किसान को उसकी फसल के उचित दाम मिलने में कई बाधाएँ आती हैं। उदारीकरण के बीस सालों में पेप्सी जैसी बाहरी कम्पनियों मैकडोनालड स्टारबक, सब वे, जैसी कई रेस्त्रां सीधे किसानों से फसल खरीदने वाली बहुराष्ट्रीय अनाज व्यापारी कम्पनियों को भारत में न्यौता गया, किन्तु स्थिति सुधरी नहीं। अनुबन्ध खेती में अग्रणी पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ आलू, टमाटर की विदेशी कम्पनियों से अनुबन्ध या कान्ट्रेक्ट, खेती का चलन बहुत बढ़ा, किसानों को आलू सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ा। खाद्य प्रसंस्करण के नाम पर हानिप्रद पैकटों में नमकीन बेचने को इतना बढ़ाया गया कि लाखों हलवाइयों का रोजगार घटा। ये सब बाजार की शक्तिशाली कम्पनियों को बढ़ावा देने का नतीजा है। इन्हीं नीतियों के सूत्रधार अब अपने करतूतों के खराब नतीजों से किसानों को बचाने के लिए और ज्यादा कड़ी, प्रतियोगिता, खुदरा व्यापारियों को न्यौतकर किसान को न्यायपूर्ण वाजिब कीमत दिलाने का झूठा भरोसा दिला रहे हैं। राजस्थानी में कहावत है कि ‘‘झूठ बोलने वाला और जमीन पर सोने वाला तंगी महसूस नहीं करता’’। इस वादे का दो मुँहा चरित्र और खुलकर सामने आता है जब यह कहा जाता है कि किसान की उपज उससे अच्छे (यानी ऊँचे) दामों पर खरीदी जाएगी और वही फसल उपभोक्ताओं को सस्ती बेच दी जाएगी।
-कमल नयन काबरा
क्रमश:

मंगलवार, 7 जून 2011

बीजो के उत्पादन व विकास में विदेशी निवेश की छूट

हमारी स्तिथि


यह किसानो की खेती में बढ़ायी जा रही मुहताजी का अगला चरण है विदेशी निवेश को बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा एक नया परिपत्र "एकीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश परिपत्र " जारी कर दिया गया है |इस नये परिपत्र के जरिये बीजो के उत्पादन एवं विकास में विदेशी निवेश को खुली छूट की इज़ाज़त दे दी गयी है | अब इस छूट के बाद विदेशी कम्पनिया ,बिना किसी रोक - टोक के ,या बिना पूर्व शर्त के कृषि के बीज क्षेत्र में प्रवेश कर सकती है |अब कोई भी भी विदेशी कम्पनी खाद्यान्न के बीजो ,सब्जी ,बागबानी यहा तक कि मछली पालन और पशुपालन के लिए भी बीजो के उत्पादन व विकास का काम कर सकती है |सरकार और देश के प्रचार माध्यम कृषि में प्रत्यक्ष निवेश को तथा विदेशी कम्पनियों की छुट को दूसरी हरित क्रांति का रास्ता बता रहे है |कंही भी ,किसी भी प्रमुख पार्टी द्वारा इसका कोई कारगर विरोध नही किया जा रहा है |जाहिर सी बात है की पूरा शासकीय हल्का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तैयार है |यह तैयारी पहले से चल रही है |खेती में डंकल -प्रस्ताव लागू किये जाने के बाद खेती पर विदेशी कम्पनियों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष अधिकारों में तेज़ी से बढ़ाव शुरू हो गया था |आप को याद होगा कि ,डंकल -प्रस्ताव की खेती पर लागू होने वाली प्रमुख धारा "ट्रिप्स " के अंतर्गत ,विदेशी साम्राज्यी ताकतों और उनकी बहुराष्ट्रीय बीज कम्पनियों ने आधुनिक शोधित बीजो पर अपना पेटेंटी अधिकार मान लेने यानी सर्वेसर्वा अधिकार मान लेने का प्रस्ताव किया था |जनवरी १९९५ में डंकल -प्रस्ताव को स्वीकार किये जाने के बाद स्वाभाविक रूप से उन्हें यह अधिकार मिल भी चुका है |इसके बाद यह सभी जानते है की खेती की लागत का तेज़ी से बढना ,खेती में सरकारी छूटो व सुविधाओं में तेज़ी से कमी आना ,सरकारों द्वारा सिचाई जैसी बुनियादी व सावर्जनिक ढाचे को उपेक्षित किया जाना ,विदेशो से महगे अनाजो का आयात किया जाना ,परन्तु देश के किसानो को बढती लागत के मुकाबले भी कम मूल्य दिए जाने आदि की प्रकिर्या लगातार बढती रही है |फलस्वरूप खेती में किसान का घाटा तेज़ी से बढ़ता रहा है |किसानो का खासा बड़ा हिस्सा संकटोमें ,कर्जो में फसने के लिए मजबूर होता रहा है |
डंकल -प्रस्ताव को स्वीकार करने के ४ - ५ साल बाद से ,यानी 2000 से लेकर 2010 तक की सरकारी रिपोर्टो के अनुसार २ लाख ६० हजार किसान आत्महत्याए कर चुके है |वास्तविक संख्या इससे कंही ज्यादा होगी या है |फिर अभाव ग्रस्तता के चलते निरंतर होते जीवन के क्षरण से टूटने व मरने वालो की संख्या तो और ज्यादा होगी |इसी बीच धनाढ्य कम्पनियों द्वारा ठेके पर खेती (अनुबंध खेती )करने का सिलसिला भी चालू हुआ |किसानो की खेती ठेके पर लेकर उनसे अपने खेत में मजदूरी कराने और ज्यादा से ज्याद लाभ कमाने के कुछ सालो बाद आमतौर पर खेतो को अन -उपजाऊ बनाकर वे कम्पनिया चम्पत भी होती रही है| अब नई हरित क्रांति के रूप में अनुबंध खेती ,ठेके पर खेती ,कार्पोरेट खेती की वकालत की जा रही है |इसे आगे बढाया जा रहा है |और इस तर्क के साथ बढाया जा रहा है कि आम किसान खेती में लागत लगा पाने में कमजोर है| अत: अनुबंध खेती के जरिये ,अपनी लागत के बोझ से किसान समुदाय मुक्ति पा सकते है| इससे खेती के उत्पादन में वृद्धि भी कंही ज्यादा हो जाएगी |इन प्रचारों के विपरीत ,अभी तक होती रही अनुबंध खेती के जरिये खाद्यान्न उत्पादन को तो आमतौर पर कंही बढावा नही मिल पाया है |इसमें नकदी फसलो के उत्पादन को ही बढावा मिलता रहा है और वह भी अस्थायी रूप में| अब विदेशी बीज कम्पनियों को बीज उत्पादन व विकास में निवेश की पूरी छुट देकर ,किसानो द्वारा अपने बीजो के उत्पादन व विकास पर पूर्ण विराम लगाने का काम हो रहा है |सरकारों द्वारा बीज के उत्पादन व विकास के काम से पूरी तरह हाथ खीच लेने का भी काम हो रहा है |खेती को देशी धनाढ्य कम्पनियों के साथ ,विदेशी कम्पनियों के हवाले किये जाने के काम को आगे बढाया जा रहा है |
यह कृषि के बीज व विकास के लिए विदेशी निवेश को ,विदेशी कम्पनियों को छूट देना ही नही है |बल्कि किसानो को बीज के लिए मुहताज बनाना भी है |किसानो के बीज पर अधिकारों को काटते -घटाते जाना भी है |यह एक प्रक्रिया है जो पहले हरित क्रांति के जरिये धीरे -धीरे चलायी बढ़ाई गयी और अब इसे तेज़ी से बढाया जा रहा है |पहले उनसे उनके परम्परागत बीज छीने गये ,फिर शोधित बीजो की समय पर आपूर्ति में कमी से उसकी मंहगाई को बढाकर किसानो की कम्पनियों के बीजो पर निर्भरता बढ़ाई गयी |खेती पर डंकल -प्रस्ताव के पेटेन्ट कानून लागू कर बीजो के उत्पादन व विकास पर किसानो के स्वाभविक अधिकार को लुटेरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को सौप दिया गया और अब उन्ही को बीज के उत्पादन व विकास का प्रत्यक्ष अधिकार दिया जा रहा है |इसी के साथ किसानो की जमीनों को हडपने का काम भी लगातार बढ़ता जा रहा है |सरकार के अगले परिपत्रो के द्वारा किसानो की जमीनों पर विदेशी कम्पनियों को पूर्ण मालिकाने का अधिकार भी जरुर मिल जाएगा |यह दशा है ,किसानो से खेती -किसानी करने और जमीनों के मालिकाने के अधिकारों को छीनते जाने की |स्वाभाविक तौर पर डंकल -प्रस्ताव और इन तमाम परिपत्रो के प्रति अपने विरोधो को उठाना और उसे संगठित करना अब मुख्यत:किसानो का ही कार्यभार है |
जागो -जागो दोस्तों अब अपनी आँखे बंद मत रखो उठो अगर हमारी जमीन हमारी ही नही रही तो हम कंहा रहेगे ?


-सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

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