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गुरुवार, 3 मई 2018

लोकसंघर्ष पत्रिका प्रगतिशील साहित्य को प्रोत्साहित कर रही है

लोकसंघर्ष पत्रिका का विमोचन करते हुए प्रकाश बाबू
कोल्लम.  स्पोर्ट्स क्लब,  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 23 वें महाधिवेशन के सांस्कृतिक पंडाल में लोक संघर्ष पत्रिका द्वारा प्रकाशित विशेषांक का विमोचन करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य साथी प्रकाश बाबू सम्बोधित करते हुए प्रकाश बाबू ने कहा कि लोक संघर्ष पत्रिका हिंदी में प्रगतिशील साहित्य को प्रोत्साहित कर रही है. किसानों मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है. 

सांस्कृतिक पंडाल में बोलते हुए रणधीर सिंह सुमन
                  लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने संबोधित करते हुए बताया कि केरल दुनिया में एक ऐसा राज्य है जहाँ पर 1957 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव के माध्यम से सरकार बनाई थी. केरल की पवित्र धरती ने मजदूरों और किसानों को नई उचाईयां दी हैं. देश के अन्दर केरल में कम्युनिस्टों ने एक अच्छी व्यवस्था देकर स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया है. 
अतुल अंजान लोकसंघर्ष पत्रिका के साथ

इस अवसर पर इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अश्विनी बक्शी, हरियाणा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव दरियाव सिंह कश्यप, उत्तर प्रदेश भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सह सचिव इम्तियाज अहमद पूर्व विधायक, जीतेन्द्र हरि पाण्डेय, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद् सदस्य आशा मिश्रा, कांति शुक्ला,  डॉ बाल गोविंद वर्मा आदि प्रमुख लोग थे.

गुरुदास दासगुप्ता लोकसंघर्ष पत्रिका के साथ
        सांस्कृतिक पंडाल खचाखच भरा हुआ था. लोकसंघर्ष पत्रिका विशेषांक की प्रतियाँ पार्टी कांग्रेस में आये हुए सभी प्रतिनिधियों को नि:शुल्क भेँट की गयीं तथा जनता में भी नि:शुल्क वितरित की गईं.

रविवार, 21 जनवरी 2018

काँग्रेस का कमजोर ग्राउण्ड नेटवर्क सुधारने मेँ असफल रहे राजबब्बर

सांगठनिक असफलताओँ को लेकर कार्यकर्ताओँ मेँ उपजा असन्तोष

उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओँ मेँ अब राज्य नेतृत्व के खिलाफ असन्तोष परिलक्षित होने लगा है , कारण यही है कि जमीनी कार्यकर्ताओँ के अभाव को दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश काँग्रेस के अध्यक्ष राजबब्बर ना तो कोई कार्ययोजना ला पाए और जब कोई कार्ययोजना ही नहीँ बनी तो उस पर अमल का सवाल ही नहीँ उठता है ।
इसी कभी के नतीजतन काँग्रेस के युवराज को राजगद्दी पर सिँहारूढ होने के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी मेँ बडे पैमाने पर काले झण्डोँ और मुर्दाबाद के नारोँ का सामना करना पडा । जो सूचनाएँ छन कर बाहर आ रही हैँ उनके अनुसार काँग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी अपने अध्यक्ष बनने के बाद प्रथम उत्तर प्रदेश आगमन पर अमौसी एयरपोर्ट पर बेहद कमजोर स्वागत और अपने निर्वाचन क्षेत्र मेँ विरोधियोँ द्वारा किए गए प्रदर्शन और नारेबाजी को लेकर बेहद खिन्न हैँ ।
दूसरी और काँग्रेस अध्यक्ष के आगमन पर दिखी कमजोरियोँ से पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता भी बेहद नाराज हैँ । उनका कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष ने जब समर्पित कार्यकर्ताओँ की उपेक्षा कर ऎसे लोगोँ को पदोँ से नवाजना शुरू कर दिया जिनका काँग्रेस सँगठन मेँ कभी उल्लेखनीय योगदान नहीँ रहा बस उन्होने अपनी ठेकेदारी की कमाई से प्रदेश अध्यक्ष की सुख सुविधाओँ पर पैसा खर्च किया और उसी पैसे के दम पर प्रदेश अध्यक्ष को अपने घेरे मेँ कैद कर रखा है ।
हाल ही मेँ सोशल मीडिया पर समर्पित कार्यकर्ताओँ ने यह सवाल भी उठाया है कि प्रदेश अध्यक्ष को पार्टी कार्यकर्ताओँ से इतना डरहै कि वे स्पान्सर्ड बाक्सरोँ की टोली से घिर कर पार्टी कार्यालय आते हैँ । इस पोस्ट को लेकर भी काँग्रेस मेँ चर्चाओँ का बाजार गर्म है ।
कार्यकर्ता अभी भी यह आस लगाए हैँ कि हाईकमान तक ये बातेँ पहुँचेँगी और हाईकमान जल्दी ही कोई निर्णय लेगा । लेकिन देरी होने पर कार्यकर्ताओँ का गुस्सा और बढ सकता है ।
कार्यकर्ताओँ का कहना है कि काँग्रेस ने अमेठी का जवाब बनारस मेँ अमित शाह के आगमन पर विरोध प्रदर्शन कर के देने की कोशिश ज़रूर की लेकिन ग्राउण्ड नेटवर्किँग की कमजोरी के चलते जब विरोध प्रदर्शन करने वालोँ की गिरफ्तारियाँ की गयीँ तो गिरफ्तार नेता और कार्यकर्ता मिलाकर भी एक बस भरने भर की सँख्या पूरी नहीँ कर पाए । इस जमीनी कार्यकर्ताओँ की कमजोरी के लिए भी कार्यकर्ता प्रदेश अध्यक्ष को जिम्मेदार ठहरा रहे हैँ ।

- भूपेन्दर पाल सिंह 

शनिवार, 16 सितंबर 2017

काँग्रेस मठाधीश ने अपने प्यादोँ से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को घेरा


उत्तर प्रदेश मेँ निष्प्राण पडी काँग्रेस मेँ प्रत्यक्ष या परोक्ष कब्जेदारी को लेकर अभी भी घात प्रतिघात जारी हैँ और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष फिलहाल इन चालोँ मेँ फँसते दिखाई दे रहे हैँ ।
ऊपरी तौर पर अभी उत्तर प्रदेश काँग्रेस मेँ भले अभी सब ठीक ठाक दिखाई दे रहा हो लेकिन पर्दे के पीछे तलवारेँ भाँजे जाने की शुरूआत हो चुकी है , वजह है काँग्रेस हाईकमान की निगाह मेँ काफी दिनोँ से सँदिग्ध और अपनी सीट बचाने के लिए काँग्रेस की दर्जनोँ सीटेँ समाजवादी पार्टी के हाथ गिरवीँ रखने वाला एक चर्चित मठाधीश बाकी क्षत्रपोँ को प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर को अपने प्यादोँ के जरिए अपनी घेरेबन्दी मेँ कामयाब होता दिखाई दे रहा है ।
दर असल वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष उत्तर प्रदेश मेँ खुद से जुडे कार्यकर्ताओँ की सँख्या के लिहाज से निप्स अकेले हैँ । उनके साथ केवल एक कार्यकर्ता है जो कानपुर का युवा व्यवसाई और साधनसम्पन्न व्यक्ति है लेकिन राजनीतिक समझ और जमीनी पकड के लिहाज से शून्य है , चर्चा है कि राजबब्बर को सँसाधन वही उपलब्ध करवा रहा है और राजबब्बर की राजनीतिक हैसियत का उसी अनुपात मेँ लाभ उठा रहा है । उसकी यह कार्यशैली आमतौर पर प्रदेश काँग्रेस कमेटी मेँ बैठने वालोँ को अखर रही है लेकिन राजबब्बर की राहुल गाँधी पर मजबूत पकड के चलते ये पीसीसी ब्राँड काँग्रेसजन खुद को मजबूर पा रहे हैँ । इसका पूरा फायदा हाईकमान की निगाह मेँ सँदिग्ध उस शातिर मठाधीश ने उठाया और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री के कार्यकाल मेँ पीसीसी मेँ घुसेडे गए अपने प्यादोँ के जरिए वर्तमान अध्यक्ष को पूरी तरह से अपने घेरे मेँ ले लिया ।
इस लिहाज से अगर यह कहा जाए कि वर्तमान अध्यक्ष दिखाने के अध्यक्ष तो खुद हैँ लेकिन पर्दे के पीछे से काँग्रेस की बागडोर उस मठाधीश ने थाम रखी है ।
अब स्थिति यह है कि उस मठाधीश की पकड से राजबब्बर को निकालने के लिए गोलबँदी का दौर शुरू हो चुका है और इस विपक्षी लाबी का कहना है कि राजबब्बर ने उस मठाधीश के प्यादोँ के घेरे से खुद को बाहर ना निकाला तो 2019 मेँ काँग्रेस भाजपा से नहीँ आपस मेँ ही लडती दिखाई देगी ।
इतने दिनोँ तक बाकी क्षत्रप तो चुप रहकर मौके का इँतजार कर रहे थे लेकिन विगत 13 सितँबर को इन्दिरा गाँधी जन्मशती समारोह मेँ राजबब्बर ने यह मौका खुद बाकी मठाधीशोँ को सौप दिया जब इस समारोह का मीडिया सँयोजन प्रदेश काँग्रेस के मीडिया प्रमुख व पूर्वमँत्री सत्यदेव त्रिपाठी की जगह उस मठाधीश की विधायक बेटी व एक अपने एक अन्य प्यादे के हाथ मेँ दिलवा दिया । तिहत्तर वर्षीय सँघर्षशील नेता सत्यदेव त्रिपाठी के लिए यह बडा आघात था और इससे आहत होकर उन्होने त्यागपत्र देने का मन बना लिया था । किन्तु यह बात फैलते ही बाकी क्षत्रप और अन्य उपेक्षित काँग्रेसी सत्यदेव त्रिपाठी के इर्दगिर्द इकट्ठा होने लगे और उन पर इस्तीफा ना देकर काँग्रेस के हित मेँ तन कर खडे होने का दबाव बनाया और वे इसमेँ कामयाब भी हुए ।


-भूपिंदर पाल सिंह

सोमवार, 24 नवंबर 2014

मुसलमानों की राजनैतिक लामबंदी बदलता स्वरूप भाग.2

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरहए स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों को धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दों पर लामबंद किया। परंतु चूंकि देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हुआ था इसलिए मुसलमानों द्वारा उनकी विशिष्ठ संस्कृति की बात करते ही हिंदू राष्ट्रवादी, इस्लामिक राज्य का हौव्वा खड़ा करने लगते थे। मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के प्रयास को 'हिन्दू' संस्कृति पर हमले और उसके अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता था। इस सब के चलते,सन् 1980 के दशक में देश में सांप्रदायिक हिंसा में जबरदस्त तेजी आई। कांग्रेस, बाबरी मस्जिद को नहीं बचा सकी और मुसलमानों को लगा कि वह पार्टी उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में भी असफल है। अतः वे कांग्रेस से दूर होने लगे। क्षेत्रीय पार्टियों ने सुरक्षा के मुद्दे पर मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद किया। परंतु वे समुदाय को एकसार मानते रहे एवं इन पार्टियों ने समुदाय की विविधतापूर्ण संस्कृति और उसके अलग.अलग तबकों के विविध हितों पर ध्यान नहीं दिया। सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह था कि भविष्य में सांप्रदायिक दंगे नहीं होंगे। परंतु पूर्व में हुई सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों को न्याय दिलवाने की बात ये पार्टियां नहीं करती थीं और ना ही यह गारंटी देने को तैयार थीं कि हिंसा दोहराई नहीं जाएगी। मोटे तौर पर, देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में परिद्रश्य कुछ ऐसा ही था।
सुरक्षा के मुद्दे की वापसी
बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मुसलमानों की संस्कृति और धर्म के ठेकेदार कांग्रेस से दूर हो गए। समुदाय ने शिक्षा और जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। ऐसा लगता था कि आगे बढ़ने का यही एक रास्ता है। परंतु गुजरात के सन 2002 के मुस्लिम कत्लेआम के बाद, सुरक्षा की चिंता एक बार फिर महत्वपूर्ण बन गई, विशेषकर उत्तर भारत में। मुस्लिम मतदाता धीरे.धीरे कांग्रेस की ओर लौटने लगे। जहां सन् 2002 तक हिंदू राष्ट्रवादियों की नीति बड़े और भयावह दंगे कराकर मुसलमानों को निशाना बनाने  की थी वहीं 21वीं सदी के पहले दशक में, खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी और देश का दुश्मन सिद्ध करने के लिए किया जाने लगा। राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुजरात पुलिस के अधिकारी कभी भी कुछ मुस्लिम युवकों को मार डालते थे और उन्हें ऐसा आतंकी बताते थे जो हिंदू नायक नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाहियों में सन् 2004 में इशरत जहां और जावेद शैख मारे गए तो 2005 में सोहराबुद्दीन शैख व कौसर बानो, 2006 में सोहराबुद्दीन का मित्र तुलसीराम प्रजापति, जमाल सादिक और कई अन्य। इन हत्याओं,जिन्हें 'मुठभेड़' बताया जाता था, के बाद मीडिया के जरिए मुस्लिम समुदाय के चेहरे पर कालिख पोतने की भरपूर कोशिश की जाती थी। इस तरह की फर्जी मुठभेड़ें कांग्रेस शासन में भी हुईं जिनमें से एक थी बाटला हाउस मुठभेड़। हर आतंकी हमले के बाद.फिर चाहे उसके शिकार मुसलमान ही क्यों न रहे हों.बड़ी संख्या में निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। उत्तर भारत में मुसलमान धीरे.धीरे कांग्रेस की तरफ आने लगेए विशेषकर उन राज्यों मेंए जहां की राजनीति द्विधुर्वीय थी और कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त कोई तीसरी शक्ति अस्तित्व में ही नहीं थी। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में 9 सीटें जीतीं और सन् 2009 में 15।
हालिया चुनाव में कांग्रेस मुसलमानों के केवल एक हिस्से को ही अपनी ओर आकर्षित कर सकी और वह भी धार्मिक.सांस्कृतिक मसलों को लेकर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और बेहतरी के वायदों के बल पर। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जिसे सच्चर समिति के नाम से जाना जाता है। सच्चर समिति ने यह पाया कि मुसलमानों की सामाजिक.आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और वे अन्य सभी समुदायों से काफी पीछे हैं। कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम भी लागू किया परंतु इसे लागू करने में भारी कोताही बरती गई।
मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व के एक हिस्से ने पिछड़े मुसलमानों ही नहीं बल्कि सभी मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की मांग की और यह दावा किया कि पूरा मुस्लिम समुदाय ही पिछड़ा और भेदभाव का शिकार है। यह सही नहीं था। उदाहरण के लिए, अशरफ मुसलमान.ऊँची जातियों से धर्मपरिवर्तन कर बने मुसलमान.जैसे सैयद और पठान व व्यापारिक समुदाय जैसे बोहरा और मेमनए अन्य मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक पढ़े.लिखे और संपन्न थे। इसके अतिरिक्त, पूरे समुदाय को आरक्षण देना, धर्म के आधार पर भेदभाव करना होता जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 द्वारा प्रतिबंधित है। आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकारों ने तकनीकी रूप से पिछड़ेपन के आधार पर परंतु व्यावहारिक तौर पर लगभग पूरे समुदाय को, आरक्षण प्रदान कर दिया। परंतु अदालतों ने पहले आंध्रप्रदेश और बाद में महाराष्ट्र सरकार के निर्णयों को रद्द कर दिया।
कांग्रेस, समुदाय के युवकों को खुफिया एजेंसियों से बचाने में असफल रही। कांग्रेस उन पुलिस अधिकारियों को सजा भी नहीं दिलवा सकी जिन्होंने फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोष मुस्लिम युवकों की जान ली। फर्जी मुठभेड़ों का सिलसिला तब रूका जब कुछ साहसी व्यक्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसी मुठभेड़ों में शामिल पुलिस अधिकारियों की पहचान कर उन्हें सजा दिलवाने की कोशिशें शुरू कीं। समुदाय के युवक गुस्से से उबल रहे थे और इस बारूद को एक तीली दिखाने भर की देर थी। मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन ने इसी गुस्से का लाभ उठाया। समुदाय को निशाना बनाए जाने के साथ ही शुरू हुआ राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय। उन्होंने विकास का वायदा कर सत्ता पाने में सफलता हासिल कर ली। मोदी का प्रचारतंत्र चाहे कुछ भी कहे परंतु मुसलमान जानते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने का अर्थ है मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र में दूसरे दर्जे के नागरिक बनाए जाने की गंभीर आशंका। हर लोकसभा चुनाव में सदन में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है। जहां 1947 में यह 13.1 प्रतिशत था वहीं 16वीं लोकसभा में यह घटकर 4 प्रतिशत ;22 सांसद रह गया। यह तब जबकि मुसलमान कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत हैं।
धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मोहभंग
निर्दोष मुस्लिम युवकों को निशाना बनाया जा रहा थाए समुदाय की बेहतरी की योजनाएं लागू नहीं की जा रही थीं और हिंदू राष्ट्रवादी दिन प्रति दिन और आक्रामक होते जा रहे थे। ऐसे में मुसलमानों का सभी 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियों से मोहभंग होने लगा। मौलाना मदनी और जमायत उलेमा.ए.हिंद, जो कि कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते थे, तक ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि कांग्रेस केवल हिंदू राष्ट्रवाद का डर दिखाकर मुसलमानों के वोट कबाड़ रही है। मौलाना मदनी और जमायत ने देश भर में कई सभाएं कीं जिनका एक ही संदेश था और वह यह कि केवल मुसलमानों को डराकर उनके वोट हासिल नहीं किए जा सकते। उनके वोट केवल उनकी भलाई के लिए सकारात्मक कदम उठाकर हासिल किए जा सकते हैं। ये कदम क्या होने चाहिए, इस बारे में इन सभाओं में कुछ भी नहीं कहा जाता था। इनमें मुसलमानों की न्यूनतम मांगे पूरी करने की मांग की जाती थी और वे थीं सन् 2006 के मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में आरोपी बनाए गए मुस्लिम युवकों की तुरंत रिहाई क्योंकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ;एनआईए ने उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाया था। इसके अलावा, स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से साफ था कि इस घटना के पीछे हिंदू राष्ट्रवादी थे। उनकी अन्य मांगों में शामिल था निर्दोष मुस्लिम युवकों को फंसाने वाली खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही और नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मुसलमानों के लिए आरक्षण। इमाम बुखारी ने कांग्रेस का साथ दिया परंतु मुसलमानों में बुखारी की पैठ कतई उतनी नहीं है जितनी कि समझी या मानी जाती है। और यह बात एक के बाद अनेक चुनावों में साबित हुई है।
जहां'धर्मनिरपेक्ष पार्टियां' असफल हो गई थीं और मुसलमानों का उनसे मोहभंग हो गया था वहीं मुसलमानों की बहुलता वाले राजनैतिक दलों की स्थापना करने का दबाव बढ़ रहा था। सन् 2008 में मोहम्मद अय्यूब नाम के एक मुस्लिम सर्जन ने उत्तरप्रदेश में पीस पार्टी की स्थापना की। सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने चार सीटें जीतीं। जल्दी ही पीस पार्टी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्यप्रदेश,राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा व छत्तीसगढ़ में फैल गई। मुसलमानों के अधिकांश वोट पीस पार्टी को मिलने लगे। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग मुसलमानों के बीच लोकप्रिय थी।
मालेगांव में बम धमाकों के बाद मुफ्ती इस्माईल की लोकप्रियता बढ़ने लगी। समुदाय में जबरदस्त गुस्सा था क्योंकि मुसलमानों को लगता था कि उनके युवकों को बम धमाकों के मामले में झूठा फंसाया गया है। मालेगांव नगर निगम के सन् 2007 के चुनाव के पहलेए तीसरी महाज या तीसरा मोर्चा बनाया गया और वह कांग्रेस व एनसीपी विरोधी लहर के चलते नगर निगम में सत्ता में आ गया। मुफ्ती इस्माईल ने सन् 2009 का विधानसभा चुनाव जनसुराज्य शक्ति पार्टी के टिकट पर लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार व तत्कालीन विधायक शैख रशीद को हरा दिया। परंतु बाद में मुफ्ती ने एनसीपी की सदस्यता ले ली। पिछले विधानसभा चुनाव में मुफ्ती इस्माईल को कांग्रेस उम्मीदवार शैख रशीद के हाथों हार झेलनी पड़ी। इसका मुख्य कारण यह था कि मुफ्ती ने अपने वायदे पूरे नहीं किए।
महाराष्ट्र में एमआईएम व मुस्लिम.बहुल पार्टियों का उदय
महाराष्ट्र में एमआईएम के उदय को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। मजलिस.ए.इत्तेहाद.अल. मुसलमीन की स्थापना 1927 में हैदराबाद के तत्कालीन शासक को सलाह देने और उनका समर्थन करने के लिए हुई थी। यह सभी मुस्लिम पंथों और बिरादरियों का मिलाजुला संगठन था। रजाकारों की हार और हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय के बाद, एमआईएम सन् 1957 तक निष्क्रिय रही। इस साल उसे सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी ने पुनर्जीवित किया 'ताकि आपके ;मुसलमान तबको  को राजनैतिक बल मिल सके'। सन् 1960 में एमआईएम ने हैदराबाद नगर निगम की 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और इनमें से 19 पर जीत हासिल की। 1967 में एमआईएम के तीन उम्मीदवार विधानसभा सदस्य चुने गए। आंध्रप्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के उदय के बाद, एमआईएम ने यह भविष्यवाणी की कि हैदराबाद के गैर.मुस्लिम वोट, तेलुगूदेशम और कांग्रेस के बीच बंट जाएंगे। एमआईएम अपने भड़काऊ वक्तव्यों के लिए जानी जाती है। उसे सन् 1984 के आम चुनाव में 35 प्रतिशत मुस्लिम मत प्राप्त हुए और तब से लेकर आज तक वह चुनावों में जीत हासिल करती आई है। एमआईएम ने पिछले कुछ वर्षों में एमआईएम.भीम एकता का नारा देकर दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी किया है।
तेलंगाना के बाहर, एमआईएम ने अपनी पहली बड़ी जीत नांदेड़ नगर निगम चुनाव में हासिल की। नांदेड़ में मुसलमान, आबादी का लगभग 30 फीसदी हैं और सन 2012 में हुए चुनाव में एमआईएम ने 81 में से 11 सीटें जीतीं। यह औरगांबाद, मालेगांव आदि के निर्दोष मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और उन्हें आतंकवाद संबंधी मामलों में फंसाए जाने की प्रतिक्रिया थी। हालिया विधानसभा चुनाव में औरगांबाद केंद्रीय सीट से इम्तियाज़ ज़लील और मुंबई की बायकुला सीट से वारिस पठान की जीत भी इन्हीं कारणों से हुई।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र के दो चुनाव क्षेत्रों में एमआईएम की विजय के बाद एक मुस्लिम युवक ने इन पंक्तियों के लेखक से कहाए ' हम हिंदू राष्ट्रवादियों के बढ़ते प्रभाव से डरते नहीं हैं, हम सभी परिणाम झेलने को तैयार हैं। जो कुछ हो चुका है उससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। अब हमें अपनी मांगे मनवानी ही होंगी'। एमआईएम की आक्रामक और भड़काऊ राजनीति की जीतए दरअसल, सभी ' धर्मनिरपेक्षष् पार्टियों की हार है। ये पार्टियां न तो राज्य में कानून के शासन की रक्षा कर सकीं और ना ही राज्य का हिंदूकरण रोक सकीं। एमआईएम, दरअसल, मोदी की भाजपा की प्रतिकृति है। जिस तरह मोदी बहुसंख्यक समुदाय के युवकों  की महत्वाकांक्षाओं को भुना रहे हैं उसी तरह एमआईएम मुस्लिम युवकों की इच्छाओं.आकांक्षाओं से खेल रही है। एमआईएम मुस्लिम युवकों को 'मुस्लिम राजाओं के गौरवशाली इतिहास' के झूठे अहंकार से भर रही है। मीडिया हमें बताती है कि मोदी अब सांप्रदायिक एजेण्डे पर नहीं चल रहे हैं। उन्हें उसकी जरूरत भी नहीं है। लोग यह जान गए हैं कि उनका ब्रांड क्या है और योगी आदित्यनाथ व मोदी के अन्य चेले सांप्रदायिक और भड़काऊ बातें कहने में जरा भी नहीं सकुचाते। परंतु हम सब को समझ लेना चाहिए कि अंततः यह सांप्रदायिक प्रतियोगिता भारत के संवैधानिक प्रजातंत्र को ही निगल लेगी। जो लोग भारतीय संविधान,कानून के राज, उदारवादी मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे भारत के लोगों को यह समझाएं कि देश को आज एक स्वस्थ्य नागरिक आंदोलन की जरूरत है जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करे और जिसकी विविधता और बहुवाद में पूरी आस्था हो।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 23 जून 2014

बाएँ बाजू की सियासत पर ताला

 चन्द रोज पहले मैं ढाका में था। बांग्लादेश में हमारे लोकसभा चुनाव में इतनी गहरी दिलचस्पी पाई गई कि इस पर यकीन करना ही पड़ता है। लोग चुनाव की छोटी से छोटी तफसील से भी इस तरह वाकिफ थे जैसे अपनी हथेली की लकीरों से। वे पाकिस्तान में वर्जित हिन्दुस्तान टी.वी. चैनल देखते हैं। वे यह देखते हैं कि लोग मोदी की इस रायजनी से बद्दिल हैं कि बांग्लादेशियों को चुनाव के नतायज के एलान वाले दिन यानी 16 मई को बोरिया बिस्तर लपेट कर रुखसत हो जाना चाहिए।
    कोई भी मोदी को हिन्दुस्तान का वजीर-ए-आजम बनते देखना नहीं चाहता। मुसलमानों के खिलाफ इनकी जहर अफशानी बांग्लादेशियों को बाउर कराती है कि सेक्यूलर डेमोक्रेटिक सियासी निजाम वाले मुल्क के बजाए एक शिद्दत पसन्द हिन्दू मुल्क उनका पड़ोसी है। इससे बढ़कर उनको ये खौफ है कि मोदी कहीं इस कुरबत की फिजा को दूषित न कर दें जिसमें दोनों मुल्क बांग्लादेश की आजादी की जद्दोजहद के जमाने से रहते आए हैं। ढाका के सफर के दौरान एक कदम पीछे हटकर चुनाव का जायजा लेने का भी मौका मिला। मैं सियासत में मजहब का दखल देख रहा हूँ। मोदी और बी0जे0पी0 ने अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक मुल्क को धु्रवीकरण करने के लिए हिन्दू कार्ड खेला है। जो नुकसान उन्होंने पहुँचाया है उसकी शायद भरपाई न हो सके। हमारे पुरखों का ये ख्वाब कि मजहब के नाम पर तक्सीम के बावजूद आजादी के बाद हिन्दुस्तान अनेकता में एकता वाला मुल्क होगा, शायद पूरा न हो सके। मोदी हिन्दुस्तानी मुसलमानों में दरार पैदा करने में कामयाब हो गए हंै। ये ऐसी कोशिश है जिसे हम अगस्त 1947 से अब तक कामयाबी के साथ नाकाम बनाते रहे हैं।
    मुझे इसमें शक नहीं कि मुल्क की सियासत के जिस्म में जो जहर भरा गया है वह एक दिन खत्म होगा। लेकिन इस बीच  मुल्क को अविश्वसनीयता और अजनबीपन के मरहले से गुजरना पड़ेगा। दोनांे फिरकों के पक्षपात रहित लोगों को जिनकी तादाद रोज बरोज कम होती जा रही है आइन्दा एक संगीन जंग लड़नी है। सेक्यूलरिज्म की श्रेष्ठता कायम करने के लिए इन्हें ज्यादा लगन से मेहनत करनी पड़ेगी।
    मोदी और बी0जे0पी0 को इससे ज्यादा साजगार मौका नहीं मिल सकता था। अवाम परिवर्तन चाहती है और उनके पास कांग्रेस को हराने का कोई अन्य रास्ता नहीं है, जिसने इन्हें हर मैदान में मायूस किया है चाहे वह आर्थिक तरक्की हो या मुल्क का इन्तजाम। आम आदमी पार्टी अभी हाल ही में वजूद में आयी है जो उत्तर भारत के शहरी इलाकों तक सीमित है।
    इसलिए मोदी और बी0जे0पी0 को डाला गया वोट नकारात्मक वोट होगा। वजीर आजम मनमोहन सिंह को दस साला निष्फल हुकूमत की कीमत कांग्रेस को अपने दोबारा चुनाव की शक्ल में चुकानी पड़ रही है। रोशनी में आने वाले मुख्तलिफ घोटालों ने पार्टी को और अधिक नुकसान पहुँचाया है।
       मोदी की गैर जिम्मेदाराना तकरीरों ने किसी हद तक दोबारा साख बनाने में कांग्रेस की मदद की है। लेकिन कांग्रेस के नायब सदर राहुल गांधी ने अपनी विचारधारा का जो एलान किया है इससे इलाकाई पार्टियों द्वारा हुकूमत बनाने की मनसा पर पानी फिर गया। इन्होंने कांग्रेस की तरफ से तीसरे मोर्चे का नेतृत्व या इसकी हिमायत की पुरजोर मुखालफत की है।
    नेशनल इलेक्शन कमीशन जो बेशक खुद मुख्तार है, इन्तखाबी जाब्ते की खिलाफ वरजी करने वालों के लिए नरमी बरतता रहा है। एक तो मोदी ही हैं जिन्होंने अपनी तकरीरों के लिए मुकदमा चलाने के लिए इलेक्शन कमीशन को ललकारा। इनकी तकरीरों में हर एतबार से मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली बातंे होती हैं। कमीशन का रवैया महज कानून पसन्दाना रहा है। कमीशन का ये रवैया इन्तिखाबात की आजादाना हैसियत पर असर अन्दाज हुआ है।
    चुनाव से मुताल्लिक वाकई बुरी खबर बाएँ बाजू की ताकतों का खात्मा है। वे कट्टर पंथियों की राह में रूकावट डालना चाहते थे और सेक्युलर तत्वों के संभावना को विस्तार देना चाहते थे। दरअसल पूरे हिन्दो पाक में सियासी सरगर्मी का अलमिया यही है।
    1940 की दहाई में मेरे कालेज के दिनों में यह कहा जाता था कि अगर आप 25 साल की उम्र में कम्युनिस्ट नहीं बनते तो आप को किसी डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए। वक्त गुजरने के साथ-साथ ये तसव्वुरात धुँधले पड़ते गए। कट्टर पंथी तत्व अलग-थलग होकर नहीं बैठे रहे। उन्होंने मेहनत करके नवजवानों के जहनों को मुतासिर किया जिनकी आँखंे आज दौलत और हर उस चीज की चमक से चकाचैंध हैं जो उनके भविष्य को रोशन करंे। कार्ल माक्र्स पर गुफ्तगू का तो जिक्र ही क्या इसे तो पढ़ा भी नहीं जाता।
    चुनाव मुहिम में बाएँ बाजू के नजरिए का कहीं जिक्र न आने पर मुझे हैरत नहीं होती। यहाँ तक कि बहुमत ने सोशलिज्म या समता पसन्दी की बात नहीं की। इन्हें भी यकीन हो गया है कि मनमोहन सिंह के दस साल के दौरे एक्तदार में मजबूत हुई बाएँ बाजू की सियासत के लिए शायद ही गुंजाइश बची हो। हैरतनाक जवाब इसका ये है कि माक्र्सज्मि से वफदारी का दम भरने वालों की भी जबान पर ताले पड़े हुए हैं।
    फिर भी ये हकीकत अपनी जगह कायम है कि 1952 के पहले आम चुनाव में कम्युनिस्टों की फतेह हुई थी। बाद में त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल में बाएँ वाजू की हुकूमत बनी। आज वाया बाजू त्रिपुरा तक महदूद है। लोकसभा में इनकी तादाद तेजी से कम हो रही है। बजाहिर इनका जोर बहुत कम हो गया है। मेरा मुशाहिदा यह है कि हिन्दुस्तानी कम्युनिस्टों ने सेक्युलरिज्म पर इतना ज्यादा भरोसा कर लिया कि कम्युनिज्म का किला सोवियत यूनियन के टूटने पर वह खुद को यतीम महसूस करने लगे। इससे कम्युनिस्ट नजरिए पर गहरी चोट लगी। हिन्दुस्तान में इसके हामियों पर इतनी बद्दिली तारी हुई कि वह अमलन इसके किले से दस्तबरदार हो गए और पूँजीपतियों के लिए मैदान खुला छोड़ दिया।
    वास्तव में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इण्डिया (सी.पी.आई.) माक्र्स (सी.पी.आई.एम.) की कोशिश बी0जे0पी0 को एकतदार में आने से रोकने पर केन्द्रित है। अपनी सीमा को एक प्लेटफार्म पर लाकर वह एक तरह के फेडरल फ्रन्ट की स्थापना की उम्मीद रखते हैं।
    यह खयाल माकूल तो है क्यांेकि कांग्रेस और बी0जे0पी0 दोनों ही घोटालों और फिरकापरस्ती में डूबे हुए हैं कि इनकी शिकस्त हिन्दुस्तान के लिए फायदेमन्द होगी। शायद यही वजह है कि राहुल गांधी ने तीसरे मोर्चे की स्थापना पर हमला किया है। उन्हें विश्वास है कि गैर बीजेपी पार्टियाँ यह महसूस करेंगी कि हुकूमत बनाने में कांग्रेस की हिमायत करने के अलावा उनके लिए कोई और चारा नहीं है।
      फिरकापरस्त और घोटालेबाज ताकतों को शिकस्त देना जितना जरूरी है  उतना ही जरूरी बराबरी, एकता के उन्नयन के लिए सकारात्मक सोच की भी जरूरत है। आजादी की जद्दोजहद में इसी असूल की पाबन्दी की गयी थी। फिलहाल दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां समता के बुनियादी फलसफे दूर जा पड़ी हैं। कुछ कारणों से उन्होंने विश्वास कर लिया है कि सेक्यूलरिज्म आखिरकार
    इनका ये अन्दाजा, लगाये जाने वाले पक्षपाती या नफरत भरे नारों से देखा जा सकता है और इनमें ज्यादातर कारपोरेट से इतनी कुरबत रखते हैं कि जब भी इन्हें हुकूमत में शामिल होने का मौका मिला है इन्होंने पब्लिक सेक्टर के किरदार का कोई जिक्र ही नहीं किया। मंजरनामा वाकई निराशाजनक है।
 -कुलदीप नय्यर
सोशालिज्म की तरफ ले जाएगा।
साभार: इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

मंगलवार, 5 नवंबर 2013

संघ परिवार और सांप्रदायिक दंगे -भाग2


हमने यह तर्क दिया था कि भले ही कांग्रेसशासित प्रदेशों में अधिक संख्या में दंगे हुए हों परन्तु उनके लिए हिन्दुत्ववादी शक्तियां अधिक जिम्मेदार थीं। हमने रघुवर दयाल व मादोन न्यायिक जांच आयोगों की रपटों पर भी नजर डाली थी। इन रपटों में महाराष्ट्र के भिवण्डी और शोलापुर और बिहार के मुजफ्फरपुर में हुए दंगों में संघ परिवार की भूमिका पर तीखी टिप्पणियां की गई थीं। हम यहां कुछ और दंगा जांच आयोगों की रपटों की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं।
केरल के तेल्लीचेरी में 28 दिसम्बर, 1971 को हुए दंगों की जांच के लिए नियुक्त जोसेफ विथ्याहिल आयोग ने अपनी रपट में कहा कि दंगों की जड़ में, जनसंघ द्वारा मुस्लिम लीग के सरकार में शामिल हो जाने के बाद लीग के विरूद्ध किया गया दुष्प्रचार था। इससे हिन्दुओं के मन में यह आशंका घर कर गई कि जिन मामलों में मुसलमान आरोपी होंगे, उनमें पुलिस हिन्दुओं के साथ न्याय नहीं करेगी। जनसंघ और आरएसएस अनवरत मुस्लिम लीग पर कटु हमले करते रहे। वे लगातार यह कहते रहे कि लीग, प्रशासनिक मामलों में दखलअंदाजी कर रही है।
जमशोदपुर में 11 अप्रैल 1979 को भड़के दंगों की जांच जितेन्द्र नारायण आयोग ने की। आयोग ने कहा कि दंगे की जड़ में हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा दिम्माबस्ती अखाड़े के जुलूस के रास्ते को लेकर की गई दादागिरी व जिद थी। जमशोदपुर में रामनवमी के त्यौहार के दिन हिंसा हुई। अतिवादी साम्प्रदायिक हिन्दू यह मांग कर रहे थे कि अखाड़े का जुलूस, विवादित रोड नंबर 14 से ही निकलेगा। यह एक संकीर्ण सड़क थी, जिसके दोनों ओर मुसलमानों के घर थे और एक मस्जिद भी थी। आयोग का कहना था कि आरएसएस ने इस मामले में कोई भी समझौता करने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि उसे उम्मीद थी कि इससे उसकी राजनैतिक शाखा भाजपा को बल मिलेगा। श्रीरामनवमी अखाड़ा समिति की ओर से एक पर्चा बांटा गया जिसमें हिन्दुओं से उनके मजहब के नाम पर यह आह्वान किया गया कि चाहे जो हो, हिन्दुओं को प्रतिबंधित रास्ते से ही जुलूस निकालना चाहिए। प्रशासन कुछ भी कहे या करे, हिन्दुओं को झुकना नहीं चाहिए।
आरएसएस ने संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को चुनौती दी। आयोग ने कहा कि तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने रीगल मैदान पर 1 अपै्रल 1979 को अपने भाषण में कहा कि अरब देशों में हिन्दुओं को अपने मंदिर बनाने की इजाजत नहीं है, जबकि भारत में, जहां कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं, न केवल मुसलमानों और ईसाईयों को मस्जिदों और चर्चों का निर्माण करने की पूरी स्वतंत्रता है बल्कि उन्हें अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत भी है...। आयोग ने दंगों के लिए आरएसएस को सीधे दोषी ठहराते हुए कहा कि उसने धार्मिक मुद्दों को लेकर लोगों की भावनाओं को भड़काया और साम्प्रदायिक जुनून उत्पन्न किया। आयोग ने अपनी रपट में यह सिफारिश भी की कि आरएसएस व जमायतए-इस्लामी जैसे साम्प्रदायिक संगठनों को आमसभाएं आयोजित करने की अनुमति कतई नहीं दी जानी चाहिए।
महाराष्ट्र के बीड जिले के उमापुर में साम्प्रदायिक हिंसा की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूति मावलंकर आयोग ने दंगा शुरू होने की कारण की विवेचना करते हुए कहा कि 10 मई 1986 को कुछ शिवसैनिक, शाम लगभग सा़े छःह बजे अब्दुल हमीद चौक पर पहुंचे और वहां स्थापित गणेश प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। उसके बाद वे श्री गुलाम गौस के पास पहुंचे जो दूध कट्टा में अपनी दुकान में दूध बेच रहे थे। उन्होंने श्री गौस से गणेश उत्सव का चंदा मांगा। श्री गौस ने उन्हें 20 रूपए दिए। इसके कुछ देर बाद, राजेन्द्र बागुल, श्याम कनकरिया और कुछ अन्य लोग फिर से श्री गौस के पास पहुंचे और उनसे चंदे के नाम पर और पैसे देने को कहा। श्री गौस ने और पैसे देने से इंकार कर दिया। इसके बाद चंदा, मांगने वालों ने उनके साथ मारपीट की जिससे वे बेहोश होकर गिर गए। इससे गुस्साए शकील व जावेद की शिवसैनिकों से हाथापाई हुई। शकील और जावेद के साथ शिवसैनिकों ने जमकर मारपीट की। इसके तुरंत बाद हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई और हिंसा भड़क उठी।
लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा अपने पीछे साम्प्रदायिक दंगों की एक लंबी श्रृंखला छोड़ गई। रथयात्रा के दौरान आडवाणी ने निहायत भड़काऊ भाषण दिए। श्री आर एच हीरा मानसिंह आयोग ने पाया कि बिहार में श्री एल के आडवाणी की 23 अक्टूबर 1990 को गिरफ्तारी के बाद, आन्ध्रप्रदेश के रंगारेड्डी जिले और हैदराबाद व सिकंदराबाद में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं। हिंसा अक्टूबर से लेकर दिसम्बर 1990 तक जारी रही।
सन 199293 में मुंबई में हुए दंगों के दौरान, कांग्रेस सरकार दंगों को रोकने में असफल और असहाय साबित हुई। मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाईक, बाबरी मस्जिद के हाए जाने के बाद की स्थिति के लिए जरा भी तैयार नहीं थे। दंगों की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण आयोग ने कहा कि ॔॔यद्यपि 15 दिसम्बर 1992 और 05 जनवरी 1993 के बीच हिंसा की कई घटनाएं हुईं परंतु बड़े पैमाने पर दंगों और हिंसा की शुरूआत 6 जनवरी 1993 से हुई, जब हिंदू साम्प्रदायिक संगठनों और सामना व नवाकाल जैसे अखबारों द्वारा किए गए साम्प्रदायिक दुष्प्रचार ने जुनून भड़काया। हिंसा की कमान शिवसेना और उसके नेताओं ने संभाल ली और वे अपने वक्तव्यों और हरकतों के जरिए, साम्प्रदायिक उन्माद को हवा देते रहे। उन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निर्देशों पर ऐसा किया। शिवसेना का क्या दृष्टिकोण था, यह बाल ठाकरे द्वारा टाईम पत्रिका को दिए गए उनके साक्षात्कार से जाहिर है। बाल ठाकरे ने बारबार ॔प्रतिशोध’ की बात कही और श्री सरपोत्तदार एवं श्री मनोहर जोशी ने जोर देकर कहा कि शिवसैनिकों का आतंक ही हिन्दुओं की सुरक्षा की गारंटी है। शहर के किसी एक इलाके में आपराधिक चरित्र के मुसलमानों द्वारा निर्दोष हिन्दुओं की हत्या का बदला, शहर के दूसरे इलाकों में निर्दोष मुसलमानों को मारकर लिया जाने लगा।’’
जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग ने बिल्कुल ठीक कहा कि एल.के.आडवाणी की रथयात्रा, जो सोमनाथ मंदिर से शुरू हुई थी और जिसे अयोध्या पहुंचना था, ने साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने में मुख्य भूमिका अदा की। छःह दिसम्बर 1992 आजाद भारत का सबसे बुरा दिन था। इस दिन बाबरी मस्जिद को जमींदोज कर दिया गया और मुंबई में इतना खूनखराबा हुआ, जितना उससे पहले कभी नहीं हुआ था। शिवसैनिकों ने विजय जुलूस निकाले।
निष्कर्ष
बिहार के भागलपुर में 24 अक्टूबर 1989 को हुए दंगों की जांच के लिए नियुक्त पांचसदस्यीय आयोग के सदस्यों न्यायमूर्ति रामानद प्रसाद, न्यायमूर्ति रामचंद्र प्रसाद सिन्हा व न्यायमूर्ति एस. शम्सुल हसन ने अपनी रपट में कहा, ॔॔हमने उन सभी कारकों की विस्तृत चर्चा की है, जिनके अंतिम नतीजे बतौर साम्प्रादायिक हिंसा हुई। दंगों के एक साल पहले से ही माहौल में साम्प्रदायिकता घुलने लगी थी। दोनों समुदायों के बीच संदेह और घृणा की दीवार खड़ी हो गई थी। इसके पीछे थीं गलतफहमियां, धार्मिक कट्टरता और राजनैतिक अवसरवाद। जिला प्रशासन ने हालात को बिगड़ने दिया और गुंडा तत्वों को हिरासत में नहीं लिया। जिला प्रशासन निष्पक्ष नहीं था और इस तथ्य ने भी हिंसा को ब़ावा दिया’’।
यह टिप्पणी साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासनदोनों की भूमिकाओं को रेखांकित करती है। साम्प्रदायिक तत्व, छोटेमोटे झगड़ों और घटनाओं को साम्प्रदायिक रंग देकर तनाव पैदा करते हैं। किसी धार्मिक समुदाय के एक या दो व्यक्तियों द्वारा की गई बेजा हरकत के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराया जाता है। यह सिलसिला कई दिनों तक और कबजब महीनों तक चलता रहता है। इस के बिना कभी दंगे शुरू नहीं हो सकते। और यह काम मुख्यतः संघ परिवार करता है। पॉल ब्रास कहते हैं कि देश के कुछ क्षेत्रों, विशोषकर उत्तरी व पिश्चमी राज्यों में, दंगों का ॔संस्थागत तंत्र’ विकसित हो गया है, जिसे राजनैतिक आवश्यकता पड़ने पर या चुनावों के दौरान, सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा शायद ही कभी अपने आप भड़कती है। ब्रास का तर्क है कि दंगों के ॔उत्पादन’ के लिए पहले से तैयारी की जाती है। इसमें शामिल होता है दंगाईयों की भर्ती, भड़काऊ गतिविधियां, अफवाहों का प्रचार व संदेशों का आदानप्रदान। पूर्वाभ्यास किए जाते हैं और उपयुक्त समय पर हिंसा शुरू हो जाती है। कांग्रेस का दोष यह है कि उसने हमेशा इस ॔संस्थागत दंगा तंत्र’ की अनदेखी की। रामानद प्रसाद आयोग ने कांग्रेस की इस असफलता पर जोर दिया है। दंगे, और उनके बाद दोषियों को सजा दिलवाने में असफलता से यह तंत्र मजबूत होता जाता है और साथ ही वे संगठन भी, जो दंगों को भड़काते और प्रायोजित करते हैं। जहां विभिन्न समुदायों के बीच भेद नहीं होता, वहां साम्प्रदायिक गड़बड़ियां इसे जन्म देती हैं और जहां यह भेद होता है, वहां उसे गहरा करती हैं। साम्प्रदायिक हिंसा के बाद, आरएसएस व संघ परिवार घावों को भरने नहीं देते। वे उन्हें कुरेदते रहते हैं, जब तक की घाव, मवाद से भरा फोड़ा नहीं बन जाता। पिछले कुछ वर्षों में संस्थागत दंगा तंत्र को काफी मजबूत व कार्यकुशल बना दिया गया है। दंगे पहले से ज्यादा जानलेवा व विनाशकारी हो गए हैं। पहले दंगे शहरों के सीमित इलाकों में हुआ करते थे। अब वे चक्रीय नियमितता से होते हैं और 72 घंटे या उससे भी लंबे समय तक चलते रहते हैं। इनमें बड़े पैमाने पर नरसंहार होता है। सन 1983 में असम के नेल्ली में हुए दंगों में 3000 से अधिक निर्दोष नागरिक मारे गए थे। गुजरात में सन 2002 में दंगे एक माह से भी अधिक समय तक चलते रहे और इनमें लगभग 2500 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं। कन्धमाल में ठेठ ग्रामीण इलाके में एक महीने तक हिंसा चली जिसमें 70 लोग मारे गए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस शासनकाल में, भाजपा शासनकाल की तुलना में अधिक दंगे हुए हैं परन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि कांग्रेस साम्प्रदायिक है और भाजपा नहीं। भाजपा के दोहरे मानदण्ड का एक सुबूत यह है कि वह अपने शासनकाल में हुए दंगों के लिए अपनी जिम्मेदारी कभी स्वीकार नहीं करती। श्री नरेन्द्र मोदी ने कभी यह नहीं माना कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए वे या उनकी सरकार या उनकी पार्टी जिम्मेदार थी। अगर भाजपा शासनकाल में हुए दंगों के लिए भाजपा स्वयं को जिम्मेदार नहीं मानती तब फिर कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों के लिए उसे दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? दंगों की जिम्मेदारी स्वीकार करना तो दूर, मोदी तो उनके लिए खेद व्यक्त करने के लिए भी तैयार नहीं है। उल्टै वे 2002 के कत्लओम के पीड़ितों को ॔कुत्ते के पिल्ले’ बताते हैं। इस सबका यह अर्थ नहीं है कि कांग्रेस पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष है।
न्याय और शांति के लिए अनवरत, सघन प्रयास से ही हम साम्प्रदायिकता के दानव पर विजय प्राप्त कर सकते हैं और एक ऐसे शांतिपूर्ण भारत का निर्माण कर सकते हैं, जिसमें सभी को आगे ब़ने और गरिमापूर्ण जीवन बिताने का मौका मिले। इसके लिए हमें साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों और सोच के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाना होगा। यह काम मुश्किल जरूर है परंतु असंभव नहीं। हम सब को शुरूआत स्वयं से करनी होगी। हम एक दूसरे को हिंदू या मुसलमान के रूप में देखना बंद करें और हर व्यक्ति को उसके गुणअवगुण के आधार पर परखें, उसके मजहब के आधार पर नहीं।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 4 मार्च 2013

भगवा आतंकवाद के उद्गम स्थल की पुष्टि-2

दूसरी महत्वपूर्ण बात जो षिंदे ने कही वह है धमाके को अंजाम देकर अल्पसंख्यकों के सिर आरोप मढ़ने की। नया इसमें भी कुछ नहीं है। अब यह बात पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। मालेगाँव, अजमेर, हैदराबाद और समझौता एक्सप्रेस  धमाकों में इस साजिष का परदा फाष हो चुका है। जो कुछ बचा है वह सिर्फ इतना कि और कितनी आतंकी वारदातों में यह खेल खेला गया है। जमीनी वास्तविकता और निमेष आयोग की रिपोर्ट से उत्तर प्रदेष की कचहरियों में होने वाले सिलसिलेवार धमाकों में ऐसे ही षड्यंत्र की प्रबल आषंका बनती है। कचहरी धमाकोें के बाद प्रदेष के उच्च पुलिस अधिकारियों ने भी कहा था कि इन धमाकों और मक्का मस्जिद की वारदात में काफी समानताएँ हैं। कानपुर में बम बनाते समय होने वाले विस्फोट में विष्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के मारे जाने और भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री बरामद होने से यह साबित भी हो गया था कि ऐसे तत्व प्रदेष में मौजूद हैं। फिर भी तत्कालीन मायावती सरकार ने साम्प्रदायिक शक्तियों से साँठ-गाँठ करके इतने बड़े मामले पर फाइनल रिपोर्ट लगवा कर दफन करवा दिया। यही खेल कांग्रेस शासित महाराष्ट्र के नान्देड़ में किया गया था। यदि साम्प्रदायिकता और मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह अपनी भूमिका न अदा करता तो कोई कारण नहीं था कि नान्देड़ में बम बनाते समय संघ और उसके द्वारा संचालित अन्य संगठनों के सदस्यों के मारे जाने और घायल होने की घटना के बाद ही असली षड्यन्त्रकारियों के चेहरे से नकाब न उतर जाती। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि 5,अपैल 2006 के नान्देड़ धमाके के जिम्मेदार अपने अंजाम को पहुँचे होते तो उसके बाद उसी वर्ष 8, सितंबर को मालेगाँव घटना और सन् 2007 में 19, फरवरी को समझौता एक्सप्रेस, 18, मई को मक्का मस्जिद और 11, अक्तूबर को अजमेर दरगाह की आतंकी वारदातों को होने से रोका जा सकता था। लेकिन उस समय नान्देड़ की घटना को पहले पटाखा धमाका बता कर बन्द करने का प्रयास किया गया बाद में जिंदा बम बरामद होने पर यह थ्योरी खारिज हो गई। परन्तु जिंदा बम के साथ आमतौर पर मुसलमानों के वेषभूषा की सामग्री कुर्ता पाजामा, टोपी, नकली दाढ़ी आदि का बरामद होना इस बात का साफ संकेत था कि
धमाके करने के साथ साथ मुसलमानों के सिर आरोप मढ़ने की योजना भी उनके षड्यंत्र का हिस्सा थी। इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह सब एक बडे़ षड्यंत्र का हिस्सा था और षड्यंत्रकारियों का संघ से अहम रिष्ता भी। इन तत्वों द्वारा अंजाम दी गईं वारदातें देष के जितने बड़े भूभाग में फैली हुई हैं और इतने बड़े धमाकों के लिए जिस ताने बाने की आवष्यक्ता होगी उससे तय है कि यह काम मात्र दस बारह लोगों का ही नहीं था जिन्हें अब तक आरोपी बनाया गया है और न ही इस षड्यंत्र को उन्हीं वारदातों तक सीमित समझा जा सकता है जो अब तक सामने आ चुकी हैं। कम से कम 2006 और 2007 में देष में होने वाले अन्य धमाकों की भी इस दृष्टिकोण से जाँच होनी चाहिए थी। परन्तु ऐसा होना तो बहुत दूर स्वयं नान्देड़ की घटना की जाँच पहले ए0टी0एस0 उसके बाद सी0बी0आई0 ने ठंडे बसते में डाल दिया। ऐसा भी अकारण नहीं हुआ है। यदि संघ परिवार के पास सांगठनिक ताकत और भा0ज0पा0 के रूप में राजनैतिक शक्ति न होती और कांग्रेस के पास इच्छा शक्ति का अभाव न होता तो इतने बड़े-बड़े मामलों को बहुत आसानी के साथ दफन नहीं किया जा सकता था। अब गृहमंत्री श्री षिंदे ने नान्देड़ की घटना के साथ जालना, पूरना और प्रभनी की मस्जिदों में होने वाले विस्फोटों की जाँच एन0आई0ए0 को सौंप दी है। इस जाँच का अंजाम क्या होगा यह तो कहना मुष्किल है लेकिन जब तक इन घटनाओं की पिछली जाँचों में राजनैतिक दखलअंदाजी और उन्हें बन्द कर दिए जाने के कारणों को जाँच में शामिल नहीं किया जाता इसे पूर्ण नहीं माना जा सकता। 
-मसीहुद्दीन संजरी

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

हिन्दुवत्व और 20 हजार करोड़

हिदुवत्व वादी संगठन व उसकी सोच वाले लोग हर समय कांग्रेसी भ्रष्टाचार को कोसते रहते हैं लेकिन उनकी निगाहें अपनी तरफ कभी नहीं होती हैं। गडकरी के भ्रष्टाचार की चर्चा समाप्त नहीं हुई थी की कट्टर हिन्दुवत्व वादी नेता नरेन्द्र मोदी 20 हजार करोड़ रुपये के घोटाले  संप्लिप्त पाए गए हैं. 
मोदी सरकार ने केजी बेसिन में गैस के ठेके के लिए 2003 में एक ऐसी कंपनी को दिया जो 6 दिन पहले बनी थी और कोई अनुभव नहीं था. गुजरात सरकार ने बिना किसी योगदान के जियोग्लोबल नाम की कंपनी पर 20 हजार करोड़ रुपए लुटा दिए.
   सन 2003 में केजी बेसिन में गैस की निकासी के लिए गुजरात सरकार की कंपनी जीएसपीसी ने एक कंसोर्शियम बनाई. टेक्निनकल एक्सपर्टीज के नाम पर 10 प्रतिशत इक्विटी बारबाडोस की कंपनी जियोग्लोबल को दी गई, जबकि कंपनी महज 6 हफ्ते पहले और सिर्फ 64 डॉलर से वजूद में आई थी. इतना ही नहीं, जरुरत पड़ने पर जियोग्लोबल की टेक्निकल एक्सपर्टीज काम न आई और 2 करोड 64 लाख में दूसरी कंपनी ने ये काम किया. इस तरह से बड़े-बड़े घोटालेबाजों में श्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं। फर्क इतना है कि यह लोग हर समय मुंह में राम बगल में छुरी वाला मुहावरा चरितार्थ करते रहते हैं।
          कांग्रेस भ्रष्टाचार का ए संस्करण है तो भारतीय जनता पार्टी व हिन्दुवत्व वादी संगठन उसके बी संस्करण हैं। मौका मिलते ही सभी बंगारू हो जाते हैं या गडकरी। आर्थिक सुधारों के सवाल के नाम पर हो रही लूट में दोनों दल शामिल हैं। दोनों दलों की निष्ठां इस समय अमेरिकी साम्राज्यवाद में है।

सुमन 

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

कारपोरेट राज के भंडाफोड़ से कांग्रेस और भाजपा दोनों को गुस्सा आया।

दूसरी ओर,जो आरोप केजरीवाल ने लगाये हैंए उनमें नया कुछ भी नहीं है।जल जंगल जमीन और आजीविका से बहुसंख्य जनता को बेदखल करकेए उत्पादन प्रणाली को तहस नहस करके, उत्पादक जनसमूहों के कत्लेआम के जरिये प्रकृतिक संसाधनों की बंदरबांट के सिद्धांत पर आजादी के तुरंत बाद से कारपोरेट राज जारी है। पूंजी के इस खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी के खिलाफ आजतक कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। भंडाफोड़ करने की रघुकुल रीति चली आयी, पर उसका क्या अंजाम हुआ केजरीवाल अपने गुरिल्ला युद्ध को किस अंजाम तक कैसे लि जायेंगे, इसका अभी​खुलासा नहीं है। इसके बावजूद सत्तवर्ग का एकजुट होकर उनके खिलाफ मोर्चा खोलना हैरतअंगेज है। क्या कहीं कुछ टूटने लगा है? केजरीवाल और प्रशांत भूषण के आरोपों के जवाब में भाजपा प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि केजरीवाल टीम हिट एंड रन ;वार करो और फरार हो जाओ की मासिक मंडी और साप्ताहिक बाजार बनकर रह गई है। रंजन भट्टाचार्य और नीरा राडिया के ऑडियो के बाबत कोई टिप्पणी करने से उन्होंने इनकार कर दिया।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

केजरीवाल ने रिलायंस को केजी बैसिन का आबंटन रद्द करने की मांग की है।अरविंद केजरीवाल ने इस बार मशहूर उद्योगपति और रियायंस इंडस्ट्री के मुकेश अंबानी को निशाने पर लिया।रिलायंस इंडस्ट्रीज में 2017 तक शेयर मूल्य के हिसाब से 100 अरब डॉलर की हैसियत की कंपनी बनने की क्षमता है।अरबपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुखिया मुकेश अंबानी देश के सबसे धनी व्यक्ति हैं। हालांकि उनका नेटवर्थ पिछले एक साल में 1ण्6 अरब डॉलर कम होकर 21 अरब डॉलर रहाए लेकिन इसके बावजूद वह दूसरे पायदान पर रहे लक्ष्मी मित्तल से आगे हैं। केजरीवाल ने आरोप लगाए हैं कि सरकार ने मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फायदा पहुंचाया है।भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और गांधी परिवार के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर सवाल खड़े करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने बुधवार को प्रेसवार्ता कर भारत की दिग्गज कार्पोरेट कंपनी रिलायंस पर सवाल खड़े किए।केजरीवाल ने एक बार फिर चौंकाया और निशाने पर लिया देश के सबसे बड़े बिजनेसमैन मुकेश अंबानी को। केजरीवाल ने अंबानी की कंपनी रिलायंस को मिले केजी बेसिन के ठेके और उसमें हुई कथित गड़बड़ियों का मामला उठाया और सरकार के कंपनी के सामने नतमस्तक होने का आरोप मढ़ा। केजरीवाल का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों मुकेश अंबानी की जेब में हैं। उन्होंने कहा कि बढती महंगाई के लिए उद्योगपति और राजनेता जिम्मेदार हैं। केजरीवाल जब अंबानी पर आरोप लगा रहे थे इसी दौरान उनकी प्रेस कांफ्रेंस में हंगामा हो गया। यह हंगामा सवाल पूछने की बात को लेकर हुआ।कृष्णा.गोदावरी बेसिन यानी केजी बेसिन आबादी से 25 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी में बना है। देश की सबसे अमीर शख्सियत मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्री ने यहां से 2008 में तेल निकालना शुरू किया था और इसी के साथ उनकी कंपनी पानी के नीचे से तेल निकालने वाली पहली कंपनी बन गई थी।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के तीन सवाल 

1ण् क्या केजी बेसिन में स्थित गैस सिर्फ रिलायंस की हैघ् जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है गैस देश के लोगों की है।
2ण् क्या इस सरकार को देश के उद्योग घराने चला रहे हैं क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी मजबूरी में इन फैसलों पर अमल कर रहे हैं
दो मांग 

1ण् इन खुलासों के साथ ही केजरीवाल ने कहा कि सरकार रिलांयस इंडस्ट्रीज का केजी बेसिन का ठेका रद्द करे।
2ण् गैस निकासी का ठेका नए सिरे से किसी बिजली बनाने वाली सरकारी कंपनियों को दे। 

पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी.डी6 क्षेत्र में हुए खर्च की कैग की लेखापरीक्षा के लिये तय बैठक आगे के लिये टाल दी।कैग ने केजी डी6 गैस ब्लॉक के दूसरे दौर की लेखापरीक्षा शुरु करने के लिये रिलायंस इंडस्ट्रीज और पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ शुरुआती बैठक बुलाई थी।इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी.डी6 क्षेत्र में 2008.09 और 2011.12 में किए गए खर्च की लेखापरीक्षा की जानी है।मामले से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को सभी पक्षों को पत्र लिखकर बैठक स्थगित होने के बारे में सूचित किया।बताया जाता है कि यह बैठक इसलिए स्थगित की गईए क्योंकि कैग के ऑडिट की प्रकृति और दायरे को लेकर मतभेद थे।रिलायंस ने यह लिखित आश्वासन मांगा था कि कैग की लेखापरीक्षा केवल उत्पादन भागीदारी करार ष्पीएससीष् के तहत सिर्फ बहीखातों और रिकार्ड तक सीमित होगी।कंपनी को पीएससी के तहत लेखा प्रक्रियाओं की धारा 1ण्9 से अलग कोई दस्तावेज उपलब्ध कराने को नहीं कहा जाएगा और न ही किसी तरह का स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।
इसके साथ ही कंपनी ने यह शर्त भी रखी कि लेखापरीक्षा उसके परिसर में होनी चाहिये और रिपोर्ट को पीएससी के तहत पेट्रोलियम मंत्रालय को सौंपा जाएए संसद को नहीं।वहीं दूसरी ओर मंत्रालय ने जोर देकर कहा था कि कंपनी कैग को अपने बही खातों को बिना किसी रुकावट के दिखाए।इसके लंबित रहने तक मंत्रालय ने कंपनी के निवेश प्रस्तावों को मंजूरी रोकी हुई हैण्
सूत्रों ने बताया कि यह बैठक इसीलिए स्थगित की गई ताकि मतभेदों को सुलझाया जा सके।

मंत्रालय ने 23 अक्टूबर को रिलायंस इंडस्ट्रीज को पत्र लिखकर कहा था कि कैग कंपनी के प्रदर्शन का ऑडिट नहीं करेगा और निगरानी समिति ने पहले ही कंपनी के विकास प्रस्तावों को मंजूरी दे दी है।सूत्रों ने हालांकिएबताया कि केजी.डी6 ब्लाक में 2010.11ए 2011.12 और 2012.13 के लिए सालाना पूंजीगत खर्च के प्रस्ताव को अभी तक मंजूर नहीं किया गया है। केजी.डी6 ब्लॉक पर प्रबंधन समिति ने 7 अगस्त को पिछले तीन साल के लिए निवेश प्रस्ताव को मंजूर किया हैए लेकिन अभी तक इस प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं हुए हैं।

दो साल के लंबे इंतजार के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज को कृष्णा गोदावरी ख्केजी, बेसिन में 1ण्53 अरब डॉलर और निवेश करने की सरकार से मंजूरी मिल गई है। इस राशि का इस्तेमाल डी6 ब्लॉक के आसपास के चार क्षेत्रों के विकास में होगा। इससे इन क्षेत्रों से रोजाना एक करोड़ 36 लाख घनमीटर गैस का उत्पादन हो सकेगा।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने गुरुवार को लोकसभा में यह जानकारी दी। इनमें डी2ए डी6ए डी19 और डी22 क्षेत्र शामिल हैं। यहां से वर्ष 2016 के मध्य तक गैस उत्पादन होने लगेगा। इन चार क्षेत्रों में 617 अरब घन मीटर गैस का भंडार है। यहां से आठ साल तक उत्पादन हो सकेगा। केजी.डी6 ब्लॉक की निगरानी समिति ने 3 जनवरी को इस निवेश योजना को मंजूरी दी। इस समिति में पेट्रोलियम मंत्रालय और हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय के अधिकारी शामिल हैं।

इन क्षेत्रों में ब्रिटेन की बीपी और कनाडा की निको रिसोर्सेज भी रिलायंस की भागीदार हैं। इस नए निवेश से केजी.डी6 ब्लॉक में घटते उत्पादन को संभाला जा सकेगा। पिछले 18 महीने में डी6 ब्लॉक के उत्पादन में 40 फीसदी की कमी आई है। यहां से फिलहाल 3ण्4 करोड़ घन मीटर गैस का रोजाना उत्पादन हो रहा है। पूर्व योजना के मुताबिक अब तक यहां से रोजाना आठ करोड़ घन मीटर गैस का उत्पादन होना था।

सरकार ने जब से सबसिडी वाले सिलेंडरों की गिनती तय कर दी हैए तब से लोग इसी कोशिश में हैं कि किसी तरह उन्हें कम कीमत पर अधिक सिलेंडर मिल पाएं। हालांकि कई कुछ राज्यों में सस्ते सिलेंडरों की गिनती छह से नौ कर दी गई हैए पर कुछ राज्यों में लोगों को महंगी एलपीजी से ही गुजारा करना पड़ेगा। ऐसे में इन लोगों के लिए यह खबर खुशखबरी साबित हो सकत है।सूत्रों से जानकारी मिली है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की घरेलू रसोई गैस के रिटेल कारोबार में उतरने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक अनसब्सिडाइज्ड एलपीजी मार्केट में पकड़ बनाने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज आकर्षक कीमतें तय करेगी। गुजरात और महाराष्ट्र से कंपनी एलपीजी कारोबार शुरू करेगी। कंपनी के पास बाजार भाव पर 200.300 रुपये का मार्जिन है।


कारपोरेट राज का यह आलम भी देखिये।जानकारी मिली है कि जीएएआर को 1 और साल के टाला जा सकता है। जीएएआर को पहले ही वित्त वर्ष 2014 तक टाला जा चुका है।सूत्रों के मुताबिक सरकार वित्त वर्ष 2015 से जीएएआर लागू करने का मन बना रही है। माना जा रहा है कि शोम कमेटी ने जीएएआर को 3 साल के लिए टालने की सिफारिश की थी। मामले पर गुरुवार को सरकार अंतिम फैसला सुना सकती है।पुरानी तारीख से टैक्स वसूलने को लेकर शोम कमेटी में मतभेद हो गया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिर कई सदस्य इस कानून के पक्ष में नहीं हैं।शोम पैनल में पिछली तारीख से टैक्स वसूलने को लेकर मतभेद हो गए हैं। सूत्रों के मुताबिक कई सदस्य पिछली तारीख से टैक्स वसूली के पक्ष में नहीं हैं। सूत्रों का ये भी कहना है कि सदस्य रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लागू करने के फैसले पर सहमति नहीं बन पा रही है।सूत्रों के मुताबिक वैलिडेशन क्लॉज पर कल चर्चा हो सकती है। पुरानी तारीख से टैक्स वसूली पर अंतिम फैसला वित्त मंत्री लेंगे।वित्त वर्ष 2013 की पहली छमाही खत्म हो गई है। इस दौरान बाजार में अच्छी तेजी जरूर देखने को मिली। तेजी के इस दौर में बाजार के 6ए000 तक जाने की उम्मीद जताई जाने लगी। हालांकि अब बाजार पर दबाव दिख रहा है और निफ्टी के 6ए000 तक पहुंचने के आसार नहीं दिख रहे हैं। लिहाजा बाजार के दिग्गज जानकार वित्त वर्ष 2014 में बाजार में जबर्दस्त तेजी आने की उम्मीद जता रहे हैं।

रिजर्व बैंक ने मंगलवार को मौद्रिक नीति की मध्यावधि समीक्षा में नकद आरक्षित अनुपात ;सीआरआरद्ध में 0ण्25 फीसदी की कटौती कीए लेकिन रेपो और रिवर्स रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया। आरबीआई के इस कदम से कर्ज का बोझ कुछ कम होने की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को तो निराशा हुई ही हैए साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री पीण् चिदंबरम भी खासे खफा नजर आ रहे हैं।आगामी 3 नवंबर से सीआरआर 4ण्50 से 4ण्25 फीसदी हो जाएगा। आरबीआई के ऐलान के बाद ही बैंकों ने साफ संकेत दे दिया कि हाल.फिलहाल कर्ज सस्ता होने की संभावना नहीं है। इस बीचए चिदंबरम ने कहा कि महंगाई जितना ही महत्व आर्थिक विकास को भी दिया जाना चाहिए। आर्थिक विकास भी एक चुनौती है और अगर विकास के लिए सरकार को अकेले ही आगे बढ़ना होगा तो हम अकेले ही बढ़ेंगे।आरबीआई ने भले ही महंगाई का हवाला देते हुए रेपो रेट को यथावत रखा होए लेकिन वित्त मंत्री पीण् चिदंबरम उसके इस तर्क से कतई सहमत नहीं हैं। चिदंबरम ने मंगलवार को यहां कहाए श्महंगाई को काबू में रखना जितनी बड़ी चुनौती हैए उतना ही बड़ा चैलेंज विकास भी है।श् इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कुछ कठोर लहजे में कहाए श्अगर जरूरत पड़ी तो सरकार अकेले ही इस चुनौती का सामना करने के लिए निकल पड़ेगी।श्मौद्रिक नीति की समीक्षा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए चिदंबरम ने कहाए श्सरकार साफ.साफ शब्दों में यह संदेश दे रही है कि वह सरकारी खजाने की हालत दुरुस्त करने और राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाने की दिशा में अग्रसर है। मुझे उम्मीद है कि फिस्कल कंसोलिडेशन को लेकर सरकार द्वारा जताई जा रही प्रतिबद्धता को हर कोई समझने की कोशिश करेगा।श्मौद्रिक नीति का आगे जिक्र करते हुए उन्होंने कहाए श्मैंने इस स्टेटमेंट के अंत में लिखे कुछ पैराग्राफ नहीं पढ़े हैं। हालांकिए अगर उनमें भविष्य को लेकर उम्मीदें जाहिर की गई हैं तो मैं उस आने वाले समय को ध्यान में रखूंगा।श् वित्त मंत्री ने यह टिप्पणी संभवतरू मौद्रिक नीति के उस पैराग्राफ को ध्यान में रखकर की है जिसमें कहा गया है कि अंतिम तिमाही में रेपो रेट घटाया जा सकता है।

अरविंद केजरीवाल ने प्रेस कांफ्रेंस में नीरा राडिया के टेप भी सुनवाए। उन्होंने नीरा राडिया और रिश्ते में पूर्व प्रधानमंत्री के दामाद रंजन भट्टाचार्य के बीच हुई बातचीत का टेप सुनवाया। इस टेप में नीरा राडिया और रंजन यह बात कर रहे हैं कि मंत्री वही बनेगा जिसे अंबानी परिवार चाहेगा। भट्टाचार्य ने कांग्रेस के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा. कांग्रेस तो अपनी ही दुकान है। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने सिर्फ कांग्रेस पर ही निशाना नहीं साधा बल्कि भाजपा को भी रिलायंस के हाथों बिका हुआ बताया। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भाजपा सरकार के वक्त अनुचित फायदा पहुंचाकर रिलायंस को गैस ब्लॉक दिए गए। गौरतलब है कि साल 2000 में रिलायसं को केजी बेसिन का ठेका मिला था। रिलायंस पर आरोप लगाते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहाए श्सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए रिलायंस ने गैस का उत्पादन कम कर दिया। रिलायंस ने सरकार को मजबूर करके अपनी पसंद के लोगों को मंत्री बनवाया ताकि देश में गैस के दाम बढ़ाए जा सके।श्

अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर पद का दुरुपयोग कर मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया है। केजरीवाल के मुताबिक पहले भाजपा नीत राजग सरकार ने इस कंपनी को फायदा पहुंचाने वाली शर्तो पर इसे प्राकृतिक गैस का ठेका दिया। इसके बाद कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने पहले से तय दर में वृद्धि कर दी। अरविंद ने रिलायंस पर गैस की जमाखोरी का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस.भाजपा दोनों मुकेश अंबानी की जेब में हैं। ऐसा लगता है देश को मुकेश अंबानी ही चला रहे हैं।

केंद्रीय मंत्रिपरिषद में रविवार को हुए फेरबदल पर उन्‍होंने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री जयपाल रेड्डी को पद से हटाए जाने पर सवाल खड़ा किया है। केजरीवाल ने रेड्डी का पक्ष लेते हुए कहा क्‍या सरकार ने ईमानदार रेड्डी को पद रिलायंस को खुश करने के लिए हटायाघ्जयपाल रेड्डी के स्‍थान पर अब वीरप्पा मोइली नए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हैं तो अब क्‍या एलपीजी और बिजली की कीमतें फिर बढ़ेंगी। जयपाल रेड्डी को ईमानदार होने की सजा मिलीए सलमान खुर्शीद भ्रष्‍ट हैं इसलिए उन्‍हें प्रमोशन दिया गया। उन्‍होंने इस फेरबदल पर ट्विट किया और बोल भ्रष्‍ट मंत्रियों को प्रमोशन दिया गया हैण् उन्‍होंने कहा कि इस फेर बदल से कोई लाभ नहीं है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि रिलायंस को एनडीए सरकार ने केजी बेसिन का ठेका दिया था ताकि वह गैस निकालकर देश की जरूरतें पूरी कर सके। ये गैस रिलायंस को साल 2017 तक सवा दो डॉलर प्रति यूनिट बेचनी थी लेकिन 2006 में ही इसके लिए कंपनी ने सवा चार डॉलर प्रति यूनिट मांगे। तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर इसके लिए राजी नहीं थे इसलिए हटा दिए गए और रिलायंस के आदमी माने जाने वाले मुरली देवड़ा को ये मंत्रालय मिला।इसके बाद वर्ष 2007 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह ने रिलायंस के दबाव के आगे झुकते हुए 2014 तक 4ण्25 डॉलर प्रति युनिट के हिसाब से अनुमति दे दी। आज रिलायंस सरकार से इसके लिए सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट मांग रही है। रिलायंस की इसी मांग का विरोध करने के चलते पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी को हटाकर वीरप्पा मोइली को मंत्री बनाया गया है।

केजरीवाल ने कहा कि अगर मोइली ने रिलायंस की सवा 14 डॉलर प्रति यूनिट गैस की मांग मान ली तो इस देश में बिजली सात रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से मिलेगी। देश को करीब 43 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होगा। अगर जनता को ये मंजूर है तो ठीक है लेकिन अगर नहीं है तो वो इसके खिलाफ खड़ी हो ताकि सरकार मजबूर होकर रिलायंस की मांग ठुकरा दे।
केजरीवाल ने कहा कि केजी बेसिन का ठेका रिलायंस को मिला लेकिन रिलायंस ने जुलाई 2011 में इसका एक हिस्सा ब्रिटिश पेट्रोलियम को 35 हजार करोड़ रुपये में बेच दिया। लेकिन किसी ने सवाल नहीं उठाए और सरकार देखती रही। रिलायंस गैस की जमाखोरी कर रही है ताकि जब सरकार दाम बढ़ा दे तब वो उसे बेचे और फायदा कमाए।

रिलायंस को सरकार को 8 हजार करोड़ यूनिट गैस देनी थी लेकिन उसने दी महज 2 हजार करोड़ यूनिट। रिलायंस ने गैस प्रोडक्शन जानबूझकर घटा दी। उसने 2009 से गैस का उत्पादन तय सीमा से एक तिहाई कर दिया। केजरीवाल ने कहा कि इसकी वजह से गैस आधारित बिजली घरों को बंद करना पड़ा।

केजरीवाल ने कहा कि जब जयपाल रेड्डी ने रिलायंस की कारगुजारियों के खिलाफ आवाज उठाई और 7000 करोड़ रुपये के जुर्माने का नोटिस भेजा तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। मुकेश अंबानी के दबाव में रेड्डी को मंत्रालय से हटा दिया गया।

कांग्रेस ने आज अरविंद केजरीवाल के आरोपों को ष्निराधारष् बताते हुए खारिज किया और पलटवार करते हुए इंडिया अगेंसट करप्शन की फंडिंग स्रोत को लेकर सवाल उठाए। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार मुकेश अंबानी का पक्ष ले रही है।कांग्रेस महासचिव बीके हरिप्रसाद ने संवाददाताओं को कहाए ष्यह निराधार है। आजकल आईएसी के लिए आरोप लगाना फैशन हो गया है। आपके पास फंड कहां से आ रहे हैंघ् आईएसी को फंड कौन दे रहा हैघ् रामलीला मैदान से लेकर इस संवाददाता सम्मेलन तक यह फोर्ड फाउंडेशन है।ष् भाजपा और केजरीवाल के बीच गठजोड़ की बात कहते हुए हरिप्रसाद ने सवाल कियाए ष्वह उन प्रदेशों में क्यों नहीं जा रहे जो आंकठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। उन्हें दूसरों पर आरोप लगाने से पहले अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देनी चाहिए।ष्उन्होंने कहाए ष्अगर सरकार को मुकेश अंबानी चला रहे हैं तो आईएसी को विदेश में बैठे लोग चला रहे हैं।ष् उन्होंने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल मीडिया को आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के कारोबार की गड़बडिय़ां उजागर होने के बाद अब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नेता अरविंद केजरीवाल भाजपाइयों के निशाने पर हैं। मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय मुखपत्र कमल संदेश के संपादक प्रभात झा ने केजरीवाल के पीछे विदेशी करेंसी का खेल होने की आशंका जताई है। कमल संदेश के ताजा अंक में झा ने संपादकीय में तल्ख भाषा का इस्तेमाल करते हुए केजरीवाल और उनकी टीम को कुकुरमुत्तों जैसे शब्द से संबोधित किया है।तो दूसरी ओरएप्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अभय दुबे ने केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को लिखे एक पत्र में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया के एनजीओ को मिली विदेशी सहायता की जांच की मांग की है। दुबे ने उनके एनजीओ को मिली विदेशी सहायता पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि जो विदेशी एनजीओ केजरीवाल और सिसौदिया की मदद करते हैंए उनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं।गडकरी को दूसरा कार्यकाल मिलने की संभावना के साथ ही झा भी दूसरा कार्यकाल मिलने की उम्मीद कर रहे थे। पार्टी भले ही गडकरी के बचाव की मुद्रा में होए लेकिन संघ के हाथ खींच लेने से संगठन चुनाव असमंजस से घिर गए हैं। झा के संपादकीय को पार्टी में गडकरी के समर्थन में मुहिम के तौर पर देखा जा रहा है। झा ने कहा है कि केजरीवाल का खेल करेंसी का है।डाण्मनमोहन सिंह को यह पता लगाना चाहिए कि यह करेंसी भारत की है या फिर भारत को कमजोर करने वाली शक्तियों की। झा ने गडकरी को केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार की क्लीन चिट को केजरीवाल के मुंह पर करारा तमाचा बताया है। झा ने केजरीवाल को ब्लैकमेलरए अन्ना के साथ विश्वासघात करने वाला बताते हुए लिखा कि केजरीवाल की चाहत पिटने की हैए ताकि जनता का भावनात्मक समर्थन मिलने लगे। झा यहीं नहीं रुके उन्होंने न्यूज चैनलों के बारे में कहा कि उन्होंने कुकुरमुत्तों को मुंह लगाकर अपना कीमती समय बर्बाद किया और जनता को भी गुमराह किया।

अनिल अंबानी की अगुआई वाले रिलायंस समूह ने एक बार फिर मध्य प्रदेश को मोटे निवेश का भरोसा दिलाया है। अपनी विस्तार योजना की घोषणा करते हुए कंपनी ने कहा कि वह राज्य में अपने कुल निवेश के आंकड़े को 30ए000 करोड़ रुपये के मौजूदा स्तर से बढ़ाकर 50ए000 करोड़ रुपये के पार पहुंचा देगी। रिलायंस समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी ने प्रदेश सरकार के आयोजित वैश्विक निवेशक सम्मेलन में कहाए श्हम अगले कुछ साल के  दौरान प्रदेश में कोयला खननए बिजली उत्पादन और सीमेंट निर्माण के क्षेत्र में 50ए000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश करेंगे।श् उन्होंने बताया  कि  रिलायंस समूह प्रदेश में इन तीनों क्षेत्रों में 30ए000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं पर आगे बढ़ रहा है। अंबानी ने बतायाए श्हमारी कोयला खनन परियोजना का पहला चरण शुरू हो चुका है। हम अपने सासन संयंत्र में 660 मेगावॉट बिजली उत्पादन जल्द शुरू कर देंगे।बिना किसी खास एजंडे के केजरीवाल के इस गुरिल्ला युद्ध पर बीबीसी ने मौजूं सवाल किया है।कौन है केजरीवाल का अगला निशाना देखें
सोनिया गाँधी के दामाद क्लिक करें रॉबर्ड वाड्रा , विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के बाद क्लिक करें अरविंद केजरीवाल का अगला निशाना कौन होगा और उसका संबंध किस पार्टी के साथ होगा बुधवार को अपनी प्रेसवार्ता से कुछ घंटे पहले इंडिया अगेंस्ट करप्शन सदस्य अरविंद केजरीवाल ने अपने ट्वीट में कहा,आज के पर्दाफाश को देखें ये बहुत बड़ा हो सकता जब अरविंद केजरीवाल ने क्लिक करें रॉबर्ड वाड्रा के खिलाफ डीएलएफ के साथ मिलकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था तब विपक्षी भाजपा ने जाँच की तो मांग की थी लेकिन बहुत शोर.शराबा नहीं मचाया.

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

शनिवार, 23 जून 2012

भाजपा आरक्षण विरोधी

उच्चतम न्यायालय द्वारा पिछले साल दिसम्बर में मुसलमानों के लिए कोटे के अंदर कोटा निर्धारित करने की प्रक्रिया पर अप्रसन्नता व्यक्त किए जाने के बाद से सरकार न्यायालय में तत्संबंधी आंकड़े प्रस्तुत करने की तैयारी में लगी हुई है। उच्चतम न्यायालय ने सरकार से कहा है कि वह मुसलमानों के लिए 4ण्50 प्रतिशत का आरक्षण देने का आधार बताए। समीचीन अध्ययनों और दस्तावेजों के आधार पर सरकार अपने कदम का औचित्य सिद्ध करना चाहती है। उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के जून 2011 के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए दिया जिसमें उच्च न्यायालय ने मुसलमानों के लिए कोटे के अंदर कोटा निर्धारित करने का सरकार का निर्णय रद्द कर दिया था। आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय का कहना था कि धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है। यह निर्णय संविधान की कुछ अजीब सी व्याख्या पर आधारित था। संविधान की मूल भावना यह है कि यद्यपि जातिए धर्म और वर्ग के आधार पर देश के नागरिकों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा तथापि यदि कुछ समुदाय सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं और वंचित हैंए तब सामाजिक असमानता दूर करने के उद्देश्य से ऐसे समुदायों को आरक्षण की सुविधा का लाभ दिया जा सकेगा।

भारतीय जनता पार्टी ने अपनी अल्पसंख्यक.विरोधी और आरक्षण.विरोधी नीति के अनुरूपए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक न लगाए जाने का स्वागत किया। भाजपा के प्रवक्ता ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि वह अपने साम्प्रदायिक एजेन्डे को लागू कर रही है और वोट बैंक की राजनीति खेल रही है। इससे यह अर्थ निकाला जाना स्वाभाविक है कि भाजपा चाहती है कि वर्तमान सामाजिक असमनाताएं बनीं रहें। भाजपा का लक्ष्य समानता और न्याय पर आधारित समाज का निर्माण नहीं है। धर्म.आधारित राष्ट्रवाद भाजपा का वास्तविक पथप्रदर्शक है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कांग्रेस भी असल में मुसलमानों को आरक्षण देना नहीं चाहती है। इस मान्यता का आधार यह है कि कांग्रेस ने कभी भी समाज के कमजोर वर्गों व विशेषकर अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाने की राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।

संविधान में शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। वर्तमान भारत के मुसलमान निःसंदेह आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़े हुए हैं। उनके शैक्षणिक पिछड़ेपन को केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय व गृह मंत्रालय की अनेक रपटों में समय-समय पर रेखांकित किया जाता रहा है। जहां तक मुसलमानों की आर्थिक बदहाली का प्रश्न है सच्चर समिति ;2006 व रंगनाथ मिश्र आयोग ;2007 की रपटों ने इसे देश के सामने रखा है। इन तथ्यों के प्रकाश में मुसलमानों को आरक्षण प्रदान कर हमारे देश की सामाजिक और राजनैतिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए कौन.सा कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता हैए यह तय करना केन्द्र सरकार के लिए एक चुनौती है।

कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे को उत्तरप्रदेश के सन् 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद से गंभीरता से लेना शुरू किया है। उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरानए कांग्रेस ने मुसलमानों को 4ण्50 प्रतिशत आरक्षण देने का वायदा किया था। चूंकि यह वायदा चुनाव प्रचार के दौरान किया गया था अतः इसे एक राजनैतिक चाल के रूप में भी देखा जा रहा था। सच तो यह है कि हमारे देश में कमजोर वर्गों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाने अत्यंत आवश्यक हैं। हमारे देश में पहले से ही अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण है। भाजपा आरंभ से ही आरक्षण की इस नीति की विरोधी रही है। भाजपा का कहना है कि आरक्षण से गुणानुक्रम का महत्व समाप्त हो जाता है। हमारे समाज में गुणानुक्रम का वैसे भी कोई महत्व नहीं है। गुणानुक्रम को पैसे से खरीदा जाना आम है। कैपिटेशन फीस लगभग सभी निजी कालेजों में वसूली जाती है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में सीटें खरीदने का प्रचलन आम है। क्या इससे सीधे-सीधे गुणानुक्रम की उपेक्षा नहीं होती गुणानुक्रम को सामाजिक.आर्थिक असमानताएं भी प्रभावित करती हैं और ये असमानताएं ही समाज के कुछ वर्गों के पिछड़ेपन का कारण हैं। देश में समय-समय पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का विरोध करने वाले आंदोलन होते रहे हैं।

इस मुद्दे के कई पहलू हैं। एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। इस सिद्धांत से कोई असहमत नहीं हो सकता। परंतु मुद्दा यह है कि मुसलमानों को उनके आर्थिक.शैक्षणिक.सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा हैए उनके धर्म के आधार पर नहीं। इस प्रश्न को हम पलटकर देखें। क्या किसी वंचित वर्ग को सिर्फ इस आधार पर आरक्षण न दिया जाना उचित होगा कि वह किसी धर्म.विशेष का अनुयायी है यह तो भेदभाव की हद होगी। वैसे भी सभी मुसलमानों को आरक्षण देने पर विचार नहीं हो रहा है। केवल अन्य पिछड़े वर्गों के मुसलमानों को आरक्षण देने की बात कही जा रही है। एक समय था जब मुस्लिम उलेमा यह दावा करते थे कि चूंकि मुसलमानों में जाति प्रथा नहीं है इसलिए उनमें से कुछ को आरक्षण दिया जाना अनुचित होगा। यह सही है कि इस्लामिक धर्मशास्त्र में जाति के लिए कोई स्थान नहीं है। सैद्धांतिक तौर पर सभी मुसलमान एक बराबर हैं। परंतु सामाजिक यथार्थ यह है कि मुसलमानों में भी जातियां हैं और इस तथ्य को अनेक जांच आयोगों ने बार-बार स्वीकार किया है। यह तर्क कि मुसलमानों के लिए आरक्षण को अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग की स्वीकृति के बिना लागू नहीं किया जा सकता उचित है और सरकार को इस प्रक्रिया से गुजरना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय के मुसलमानों को आरक्षण के औचित्य व आधार से संबंधित प्रश्न का समाधानकारक उत्तर दिया जाना चाहिए। सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग ने इस संबंध में अत्यंत तथ्यपरक और व्यापक अध्ययन किए हैं और सरकार को इन रपटों को आधार बनाकरए अपना पक्ष उच्चतम न्यायालय के समक्ष रखना चाहिए। इन रपटों के आंकड़ों का समुचित इस्तेमाल सरकार के पक्ष को मजबूत करेगा। एक प्रश्न यह भी है कि मुसलमानों को केवल 4ण्50 प्रतिशत आरक्षण ही क्यों दिया जाए। रंगनाथ मिश्र आयोग ने उन्हें 8ण्40 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की है। यह मुद्दा बहस का विषय हो सकता है परंतु यह स्पष्ट है कि किसी भी वर्ग को आबादी में उसके अनुपात के अनुरूप आरक्षण दिया जाना हमेशा संभव नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ अन्य पिछड़ा वर्ग देश की आबादी का 52 प्रतिशत हैं परंतु उन्हें केवल 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। और इसी 27 प्रतिशत में से मुसलमानों के लिए उप.कोटा निर्धारित किया जाना है।

इसके समानांतर चुनाव और राजनीति के क्षेत्रों में भी कुछ कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। हम सब जानते हैं कि हमारी संसद और राज्य विधानसभाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता जा रहा है। स्वतत्रंता के पूर्वए पृथक मताधिकार के मुद्दे ने देश में हंगामा बरपा कर दिया था और इसने ही सामाजिक अलगाव और अंततः देश के त्रासद विभाजन की नींव रखी थी। इसलिए पृथक मताधिकार की व्यवस्था के बारे में तो सोचा तक नहीं जाना चाहिए। राजनैतिक दलों से मुसलमानों को अधिक संख्या में टिकिट देने की अपीलें बेकार साबित हुई हैं। हां हम इस बात पर अवश्य विचार कर सकते हैं कि कुछ निर्वाचन क्षेत्र मुसलमानों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं। हमारे देश की विधि.निर्माण संस्थाओं में देश के एक बड़े वर्ग का नगण्य प्रतिनिधित्व होए यह स्थिति अस्वीकार्य है और अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। हमारा अंतिम लक्ष्य ऐसे समाज का निर्माण होना चाहिए जिसमें व्यक्ति के धर्म जाति और वर्ग का कोई महत्व ही न रह जाए। परंतु जब तक हम ऐसे आदर्श समाज का निर्माण नहीं कर पाते तब तक वंचित वर्गों के विशेष व्यवस्थाएं की जाना परम आवश्यक है। कहने की आवश्यकता नहीं कि समान अवसर आयोग का कोई विकल्प नहीं है और हमें इस दिशा में अपने प्रयास तेज करने चाहिए। न केवल मुसलमानों बल्कि सभी पिछड़े समुदायों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए।

इस उद्देश्य से नीति.निर्माण की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं साम्प्रदायिक पार्टियां। ये पार्टियां सकारात्मक कदमों को तोड़.मरोड़कर प्रस्तुत करती हैं। वे लगातार यह आरोप लगाती हैं कि ये कदम अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए उठाए जा रहे हैं और इनसे एक तरह की साम्प्रदायिकता फैलेगी। यह सच्चाई को उल्टी तरफ से देखने के समान है। समानता तभी आ सकती है जब असमानता खत्म हो। जब हम समानता की बात करते हैं तब हमें असमानता को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाने ही होंगे। बेशक ये कदम अंतरिम होंगे और हमें एक ऐसे देश के निर्माण का संकल्प लेना होगा जिसमें किसी समुदाय की धर्म या जातिए उसकी प्रगति में बाधक न बने। इस मुद्दे पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने के प्रयासों का मजबूती से मुकाबला किया जाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि सच्चे अर्थों में न्यायपूर्ण समाज की स्थापना पिछड़े समुदायों को आगे बढ़ने के समुचित व समान मौके देकर ही की जा सकती है।
-राम पुनियानी

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

चुनावी समीकरण और धर्मनिरपेक्ष मूल्य

उत्तरप्रदेश में फरवरी 2012 में हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। चुनाव परिणाम आने के पहले तक कांग्रेस यह दावा कर रही थी कि नतीजे विस्मयकारी होंगे अर्थात कांग्रेस का प्रदशर्न आशातीत रहेगा। नतीजों से यह साफ हो गया कि न तो कांग्रेस के दावों में कुछ दम था और न ही उसकी अपेक्षाएं यर्थाथपूर्ण थीं। चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश के कांग्रेस नेताओं ने जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया। मुसलमानों को आरक्षण का लालच दिया गया और बाटला हाऊस मुठभेड़ पर श्रीमती सोनिया गांधी के आंसुओं का विशद विवरण सुनाया गया। अब यह साफ है कि इन सबका मुस्लिम मतदाताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। अभी कुछ वषोर्ं पहले तक कांग्रेस के मुसलमानों ेजिसे पार्टी के विरोधी मुस्लिम वोट बैंक भी कहते हैंसे काफी सौहार्दपूर्ण संबंध थे। यह समझा जाता था कि चूंकि मुसलमान साम्प्रदायिक भाजपा का साथ नहीं दे सकते इसलिए उनके पास धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
आईए, हम स्थिति का यर्थाथपरक विश्लेषण करें। यह सही है कि मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा यह अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए भाजपा को मत देने का विकल्प उपलब्ध ही नहीं है। भाजपा साम्प्रदायिक राजनीति की प्रतीक है और आरएसएस की राजनैतिक शाखा है। आरएसएस अपने परिवार की विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसी अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के अपने एजेन्डे पर काम कर रहा है। जहां तक साम्प्रदायिक हिंसा का सवाल है, सन 1984 के सिक्खविरोधी दंगों के दौरान कांग्रेस की भूमिका अत्यंत निंदनीय थी। मुसलमानों के कत्लओम और मुस्लिमविरोधी साम्प्रदायिक दंगों की भी कांग्रेस मूकदशर्क बनी रही। कांग्रेस ने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिए कभी कुछ नहीं किया तब भी नहीं जब वह सत्ताधारी गठबंधन में शामिल थी या अकेले सत्ता में थी। सन 1992-93 के मुंबई दंगों के पीड़ितों को नजरअंदाज करना और उन्हें हाशिए पर पटक देना कांग्रेस की इस कुत्सित प्रवॢत्ति के उदाहरण हैं। मक्का मस्जिद, मालेगांव, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस आदि आतंकी हमलों के बाद कांग्रेसशासित राज्यों की सरकारों ने निर्दोष मुस्लिम युवकों को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन नौजवानों को गिरफ्तार किया गया, उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी गई, उनके कैरियर बर्बाद कर दिए गए और बाद में सुबूतों के अभाव में बिना कोई मुआवजा दिए उन्हें रिहा कर दिया गया। उनके सामाजिकआर्थिक पुनर्वसन के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए।
इन सब कमियों के बावजूद, मुस्लिम समुदाय को इस बात का अहसास है कि कांग्रेस उसकी उतनी बड़ी शत्रु नहीं है जितनी कि भाजपा। गुजरात में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के कत्लओम ने इस अहसास को और मजबूत किया है। गुजरात में राज्य के प्रजातांत्रिक शासनतंत्र का चरित्र रातोंरात फासीवादी बन गया और वह हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों के इशारों पर नाचने लगा। मुसलमान इस तथ्य से भी नावाकिफ नहीं हैं कि अंततः यह साबित हो गया है कि देश में हुए कई आतंकी हमलों के पीछे संघी विचारधारा वाले और संघ से जुड़े हुए लोग थे और भाजपा ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की।
सन 1998 से 2004 के बीच केन्द्र की एनडीए गठबंधन सरकार के कार्यकलापों पर नजर डालने से कांग्रेस और भाजपा के बीच का अंतर और स्पष्ट हो जाता है। यदि मुसलमान चुनावी मैदान में भाजपा के अस्तित्व को भूल भी जाएं तो भी हमें कांग्रेस के इस दावे की सूक्ष्मता से जांच करनी होगी कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। हम पाते हैं कि इस मामले में कांग्रेस का रिकार्ड मिश्रित रहा है। एक ओर कांग्रे्रस ने सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की निुयक्ति की जिससे मुसलमानों की आर्थिकसामाजिक बदहाली देश के सामने आ सकी। दूसरी ओर समिति व आयोग की सिफारिशों पर अमल की गति इतनी धीमी है कि यह समझ पाना ही मुश्किल है कि अमल की दिशा में कोई प्रयास हो भी रहा है या नहीं। आतंकित मुसलमानों को ऐसी सरकारी नीतियों की दरकार है जो उन्हें उस घुटन से मुक्ति दिला सकें जो उनके विरूद्ध भयावह हिंसा और उनके दानवीकरण से जन्मी है। मुसलमानों को उनके मोहल्लों में कैद कर दिया गया है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी सेवाओं में आरक्षण पाने की इच्छा रखता है परंतु इस सिलसिले में केवल चुनावी वायदों से उन्हें बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। विशेषकर तब जबकि वे सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रपटों को धूल खाते देख रहे हैं।
बाटला हाऊस मुठभेड़, उसकी गहन जांच कराने से यूपीए2 का इंकार और मुस्लिम युवकों को आतंकी करार देने के अभियान ने मुसलमानों को गहरा धक्का पहुंचाया है। मुसलमान आगे ब़ने के लिए, आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए और अपनी योग्यतानुसार काम पाने के लिए छटपटा रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि मुसलमानों के ये सपने पूरे हो सकें। बाटला हाऊस मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच कराने में कांग्रेस का रूचि न लेना यह दशार्ता है कि पार्टी में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भाव देने वाले कदम उठाने का राजनैतिक साहस नहीं है। श्रीमती सोनिया गांधी के आसुंओं से मुसलमानों की जानें बचने वाली नहीं हैं। दिल्ली के पड़ोस में स्थित कांग्रेसशासित राजस्थान में पुलिस का एक मस्जिद में घुसकर वहां मौजूद लोगों पर गोलियां चलाना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है।
ऐसा लगता है कि कांगे्रस नेतृत्व में ऐसे लोगों की अच्छीखासी तादाद है जो धर्मनिरपेक्षता के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नहीं हैं। इस मामले में कांग्रेस अवसरवादी नीतियां अपनाती रही है। वह कुछ दूर तक तो आगे ब़ती है परंतु प्रजातांत्रिकधर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निर्णयात्मक कदम उठाने से झिझकती है। यह सर्वज्ञात है कि सरकारी तंत्र का जबरदस्त साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है और धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने के लिए दृ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। उत्तरप्रदेश में मुसलमानों के सामने दो विकल्प थेमुलायम सिंह और कांग्रेस। मुलायम सिंह ने भी कुछ समय के लिए कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था। ये वही कल्याण सिंह हैं जिनके मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद ़ढहाई गई थी। , के शासनकाल में उत्तरप्रदेश में मऊ और कुछ अन्य स्थानों पर दंगे भी हुए थे। इसके बावजूद मुसलमानों ने मुलायम सिंह को कांग्रेस की तुलना में कम बुरा समझाऐसा चुनाव नतीजों से जाहिर है।
क्या यह वही कांग्रेस है जिसके महात्मा गांधी और पंडित नेहरू जैसे नेताओं ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? आज की कांग्रेस का ुलमुल रवैया और उसकी कथनी व करनी में फर्क मुसलमानो को स्वीकार्य नहीं है। कांग्रेस के युवा नेताओं के दिमागों में भी साम्प्रदायिकता का जहर भर गया है। क्या सवा सौ साल पुरानी इस पार्टी को यह आवश्यक नहीं लगता कि वह अपने कार्यकर्ताओं में धर्मनिरपेक्षता की समझ विकसित करे? क्या कांग्रेस को अपने सदस्यों को यह नहीं बताना चाहिए कि अल्पसंख्यकों के बारे में फैलाए गए मिथकों और पूर्वाग्रहों का सच क्या है? क्या कांग्रेस नेताओं को यह नहीं जानना चाहिए कि किस तरह महात्मा गांधी ने हिन्दूमुस्लिम एकता की खातिर अपनी जान न्यौछावर कर दी थी और कैसे पंडित नेहरू, बहुवादी मूल्यों की रक्षा के लिए एक चट्टान की तरह डटे रहे थे? किसी भी पार्टी का निर्माण करते हैं उसके आम कार्यकर्ता और उनकी सोच। जब वे देखते हैं कि उनकी पार्टी के नेतृत्व का रवैया ही ढुलमुल है तो वे यह समझ नहीं पाते कि वे साम्प्रदायिक राजनीति के प्रति क्या रूख अपनाएं और दंगों के शिकार मुस्लिम समुदाय के साथ कैसा व्यवहार करें, क्या संवाद रखें? उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम, कांग्रेस के लिए एक चेतावनी हैं। अगर उसे भारतीय प्रजातंत्र की रक्षा करने का महती उत्तरदायित्व निभाना है तो उसे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की विरासत पर चलना होगा, उनकी राह अपनानी होगी।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला-2


यह चिकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमनेA ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।
-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

बुधवार, 21 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला




खुदरा व्यापार के विदेशीकरण की केन्द्रीय सरकार की मुहिम भारत के आम लोगों की आजीविका के साधनों पर एक बहुमुखी हमला है। इस निर्णय पर राजनीति के जंग में सरकार एक बार मुँह की खा चुकी है। वास्तव में यह फैसला स0प्र0ग0 दो की सरकार का नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व जोरशोर से इसके पीछे है किन्तु न केवल कुछ बड़े सहयोगी दल, अपितु कांग्रेस के अनेक लोग इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। एक पारिवारिक सम्पत्ति की तरह चलने वाली कांग्रेस पार्टी को कम्पनी क्षेत्र के बड़े स्तम्भ अपने घर की दुकान बता रहे हैं। विदेशी कम्पनियों और सरकारों के पैरोकार, विदेशी तथा देसी अखबार, विदेशी कम्पनियों के भारत प्रवेश को यू0पी0ए0-2 की कुशलता और शक्ति का प्रतीक बता चुके हैं। खुल्लम खुल्ला विदेशी कम्पनियाँ भारत में खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए लाॅबी करने यानी अपने पक्ष में प्रचार करने और रिझाने में मोटा खर्च कर रही हैं। खबर छपी है कि खुदरा व्यापार की एक बड़ी कम्पनी ने अपने पक्ष में निर्णय करने के लिए वर्षों से मुहिम चला रखी थी। वह अब तक 70 करोड़ रूपये इस गोरखधन्धे पर लगा चुकी है। क्या यह भारत की राजनीति और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में बाहरी वित्ती आर्थिक इकाइयों की सीधी-सीधी दखलंदाजी का उदाहरण नहीं है। असली मुद्दा यह भी है कि महज 70 करोड़ रूपये में ऐसा जन विरोधी नीतिगत निर्णय भारतीय लोकतंत्र पर थोपा जा सकता है। हजारों करोड़ रूपये के निवेश को यहाँ के खेती के बाद आम आदमी के रोजगार के दूसरे मुख्य धन्धों में लगाने की इजाजत ऐसी शर्तों, ऐसी प्रतिकूल चालू आर्थिक स्थिति और सरकार की घटती साख के दौरान तकनीकी तथा व्यावहारिक रूप से एक सुगमतम धन्धे में लगाने की आजादी विश्व की विशालतम कम्पनियों को दे दी गई थी। एक बार इसे स्थगित करने के बाद एक ओर तो इस आत्मघाती (आ बैल, मुझे मार नुमा) फैसले के पक्ष में प्रचार बढ़ा दिया गया है, दूसरी ओर यह घोषणा भी की जा रही है कि इसे शीघ्र लागू कराने की कोशिशें जारी हैं।
किस तरह बेहतर राजनैतिक या कम विरोध की स्थितियाँ पैदा की जाएँगी या इस निर्णय में सुधार किए जाएँगे ताकि कम से कम इसके गलत प्रभावों को कमतर किया जा सके, यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है।
हाँ, कई बेतुकी दलीलें देकर जनता को भरमाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। यू0पी0 के विधान सभा चुनावों ने राजनैतिक लोगों को एक बार फिर जनता के दरवाजों पर दस्तक लगाने को मजबूर कर दिया है। इस अवसर का इस्तेमाल खुदरा व्यापार में विशाल विदेशी कम्पनियों की भारत प्रविष्टि के पक्ष में प्रचार करने के लिए भी किया जा रहा है। इस सिलसिले में एक बिना सिर पैर की दलील का उदाहरण इस मुहिम के खोखलेपन की पोल खोलने के लिए पर्याप्त नजर आता है।
कांग्रेस के एक अति शक्तिशाली नेता ने किसानों को एक बहुत ही लचर और सच्चाई से कोसों दूर दलील देकर वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आगमन से मिलने वाले फायदों का खाका खींचा। इस दलील का सार यह है कि किसान के आलू जैसे उत्पादन को अभी बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसका इस्तेमाल करके डिब्बा या थैली बन्द सामान जैसे उत्पाद बनाकर उन्हें कई गुना ऊँचे दामों पर बेच दिया जाता है। इस तरह किसान को अपनी मेहनत का लाभ बहुत नाम मात्र मिल जाता है। दूसरी ओर मुख्य रूप से किसान द्वारा पैदा किए गए सामान को काफी ऊँची या महँगी दरों पर बेचा पाता है। यह सारा लाभ कृषिमाल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादक हजम कर लेते हैं जाहिर है यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है। सरकार और देश के लोग मिलकर इन हालात को बदल नहीं पाए है।
नेता आम सभाओं में कहते हैं कि अब सरकार इस कमी को दूर करके किसान को उसका हक दिलाना चाहती है। अब सरकार विदेशी, मुख्य रूप से यूरोप और अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सहारे यह करने जा रही है।
प्रत्येक कम्पनी जो 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भारत के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में काम कर सकने मंे समर्थ है (कुल 53 शहरों में) उनको अब भारत में खुदरा दुकानें खोलने की इजाजत देना कांग्रेस की सदारत में चलने वाली सरकार का लगभग एक तरफा निर्णय था। अभी तो विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा पा रहा है किन्तु सरकार इस निश्चय पर अडिग है और इसे लागू करवा कर किसान को उसकी उपज के अच्छे दाम दिलाने को कटिबद्ध है। जाहिर है इस सरकार को अति विशाल पूँजीवाली विदेशी कम्पनियों का दामन थामकर किसानों को उनके माल का अच्छा दाम दिलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। अब तक के अपने लम्बे शासनकाल में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिला पाने में नाकामयाब सत्ता अब इन बाहरी विशाल कम्पनियों के माध्यम से इस मकसद को अंजाम देना चाहती है।
यहाँ दो सवाल विचारणीय हैं सच है किसान को उसकी फसल के उचित दाम मिलने में कई बाधाएँ आती हैं। उदारीकरण के बीस सालों में पेप्सी जैसी बाहरी कम्पनियों मैकडोनालड स्टारबक, सब वे, जैसी कई रेस्त्रां सीधे किसानों से फसल खरीदने वाली बहुराष्ट्रीय अनाज व्यापारी कम्पनियों को भारत में न्यौता गया, किन्तु स्थिति सुधरी नहीं। अनुबन्ध खेती में अग्रणी पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ आलू, टमाटर की विदेशी कम्पनियों से अनुबन्ध या कान्ट्रेक्ट, खेती का चलन बहुत बढ़ा, किसानों को आलू सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ा। खाद्य प्रसंस्करण के नाम पर हानिप्रद पैकटों में नमकीन बेचने को इतना बढ़ाया गया कि लाखों हलवाइयों का रोजगार घटा। ये सब बाजार की शक्तिशाली कम्पनियों को बढ़ावा देने का नतीजा है। इन्हीं नीतियों के सूत्रधार अब अपने करतूतों के खराब नतीजों से किसानों को बचाने के लिए और ज्यादा कड़ी, प्रतियोगिता, खुदरा व्यापारियों को न्यौतकर किसान को न्यायपूर्ण वाजिब कीमत दिलाने का झूठा भरोसा दिला रहे हैं। राजस्थानी में कहावत है कि ‘झूठ बोलने वाला और जमीन पर सोने वाला तंगी महसूस नहीं करता’’। इस वादे का दो मुँहा चरित्र और खुलकर सामने आता है जब यह कहा जाता है कि किसान की उपज उससे अच्छे (यानी ऊँचे) दामों पर खरीदी जाएगी और वही फसल उपभोक्ताओं को सस्ती बेच दी जाएगी।
-कमल नयन काबरा
क्रमश:
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