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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

याकूब मेमन के जनाज़े में मुसलमानों की भारी उपस्थिति


मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में लगभग 8,000 लोग शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट ने मेमन को 1993 के बंबई बम कांड के षड़यंत्र में शामिल होने का दोषी पाया था। सन् 1993 के 12 मार्च को बंबई के विभिन्न इलाकों में हुए श्रेणीबद्ध बम विस्फोटों में 257 निर्दोष लोग मारे गए थे। मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दे दी गई।
मेमन के जनाज़े में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के हिस्सा लेने पर सोशल मीडिया में काफी रोष व्यक्त किया गया और मुसलमानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। कुछ लोगों का मत था कि मुसलमान, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेमन को दोषी ठहराए जाने को स्वीकार करना ही नहीं चाहते और कुछ ने तो यहां तक कहा कि जो लोग उसके जनाज़े में शामिल हुएए वे आतंकवादियों के समर्थक व राष्ट्रविरोधी हैं। त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय ने ट्वीट किया कि मेमन के परिवार वालों को छोड़कर, जो भी लोग जनाज़े में थे, वे सब भविष्य में आतंकवादी बन सकते हैं।
हमें यह समझने की ज़रूरत है कि मेमन की अंतिम यात्रा में इतनी भारी उपस्थिति क्यों रही। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों के एक तबके में मेमन के प्रति सहानुभूति थी। परंतु इसे आतंकवाद या आतंकवादियों के प्रति समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुसलमानों ने घृणाजनित अपराधों की भेंट चढ़े अपने प्रियजनों का दुख भोगा है। अज़मल कसाब सहित 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला किया था। इनमें से नौ आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया और अज़मल कसाब को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। मुंबई के मुस्लिम संगठनों ने घोषणा की कि उन कब्रिस्तानों, जिनमें लावारिस लाशों को दफनाया जाता है, के दरवाजे इन आतंकियों के लिए बंद रहेंगे क्योंकि वे इस्लाम के सच्चे अनुयायी नहीं थे।
यह पहली बार नहीं है कि लोगों ने किसी अपराधी के प्रति सहानुभूति के चलते, उसके अंतिम संस्कार में भाग लिया हो। विभिन्न जातियों व धर्मों के लोग, बाहुबलियों की अंतिम यात्रा में शामिल होते रहे हैं। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में भाग लिया था,वे सब आवश्यक रूप से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील नहीं थे जो फूलनदेवी द्वारा डाली गई डकैतियों में मारे गए थे। उन्हें शायद केवल यह याद था कि फूलनदेवी स्वयं भी जातिगत दमन का शिकार थीं, यद्यपि उन्होंने इससे मुकाबला करने का गलत रास्ता चुना। वे उन्हें परिस्थितियों का शिकार व्यक्ति मानते थे और शायद फूलनदेवी के अपने दमनकर्ताओं के विरूद्ध हिम्मत से लड़ने के प्रशंसक थे.यद्यपि हो सकता है कि वे फूलनदेवी के प्रतिरोध के तरीके से सहमत न रहे हों। उस समय किसी ने यह नहीं कहा कि फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में, उनके परिवारजनों को छोड़कर, जिन लोगों ने भाग लियाए वे सभी भविष्य में डकैत बन सकते हैं। मुंबई में गैंगस्टर वरदराजन मुदलियार के अंतिम संस्कार में धारावी के निवासियों, विशेषकर तमिलों, ने बड़ी संख्या में भाग लिया। परंतु क्या हम यह कह सकते हैं कि वे हत्या की सुपारी लेने वाले एक डॉन की मौत का शोक मना रहे थे?
बाल ठाकरे की शवयात्रा में करीब 12 लाख लोग शामिल थे। उनकी अंतिम यात्रा इतनी बड़ी थी कि दो किलोमीटर की दूरी तय करने में उसे पांच घंटे लग गए और पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुंबई के बड़े हिस्से में ट्राफिक बंद करना पड़ा। जस्टिस मादोन आयोग ने भिवंडी, जलगांव और महाड में 1970 में हुए सांप्रदायिक दंगों में बाल ठाकरे की भूमिका की निंदा की थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट में कहा था कि बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद, सुलगती मुंबई में बाल ठाकरे इस तरह निकले 'जैसे कोई दिग्गज जनरल अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए निकलता है'। यह अलग बात है कि मुसलमानों और गैर.महाराष्ट्रियनों के बारे में भड़काऊ भाषण देने और दंगों में एक जनरल की तरह अपने सैनिकों का नेतृत्व करने के लिएए बाल ठाकरे पर कभी कोई मुकदमा नहीं चल सका। बाल ठाकरे के सैनिक, उनके हर आदेश को आंख बंद कर मानते थे.ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या कर दो, गैर.महाराष्ट्रियनों के विरूद्ध हिंसा करो,सिनेमा हालों और मीडिया के दफ्तरों पर हमला करो आदि। ठाकरे गर्व से कहते थे कि वे लोकशाही ;प्रजातंत्रद्ध में नहीं बल्कि'ठोकशाही' ;हिंसा और दादागिरी में विश्वास रखते हैं। और ये ठोकशाही वे तब करते थे जब उन्हें जे़ड प्लस सुरक्षा प्राप्त थी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में 1992.93 में हुए दंगों में 900 लोग मारे गए थेए जिनमें से 575 मुसलमान थे, 275 हिंदू व 50 अन्य थे। जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग ने बाल ठाकरे को मुंबई दंगों का दोषी ठहराया था।
कानून से टकराने वालों के प्रति सहानुभूति
जो लोग कानून से टकराते हैं या उसका उल्लंघन करते हैंए उनके प्रति सहानुभूति के मुख्यतः तीन कारण होते हैं। पहलाए संबंधित व्यक्ति के परिवारजनों, चाहे वे उसकी हरकतों को अनुचित ही क्यों न मानते हों, की उसके प्रति सहानुभूति हो सकती है और उसके अंतिम संस्कार में भाग लेना, उनका मानवीय कर्तव्य तो बनता ही है। दूसरे, कब.जब लोग ऐसे व्यक्ति द्वारा, उनके जीवन में लाए गए परिवर्तन से प्रभावित रहते हैं और उसके द्वारा किए गए अपराधों को वीरतापूर्ण कार्य मानते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वे होते हैं जिनकी सामाजिक.आर्थिक पृष्ठभूमि उसी व्यक्ति जैसी होती है और सामान्यतः वे दमित जातियों या नस्लीय समूहों या अल्पसंख्यक समुदायों जैसे हाशिए पर पड़े वर्गों से संबंधित होते हैं। वे स्वयं को कानून की चहारदिवारी के भीतर रहते हुए, अपने दमन और शोषण का प्रतिरोध करने में असहाय और असमर्थ पाते हैं और इसलिए वे समझ सकते हैं कि उस व्यक्ति के सामने, कानून से टकराने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। उन्हें यह भी लगता है कि उस व्यक्ति ने उनके दमनकर्ताओं का प्रतिरोध किया। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया, उनकी सोच शायद ऐसी ही कुछ रही होगी। अक्सर ऐसे व्यक्ति अपनी लूट का कुछ हिस्सा अपने दमित समुदाय के लोगों में बांटते हैं और इस कारण भी उन्हें उनका समर्थन मिलता है। उदाहरणार्थ, मुंबई का माफिया डॉन अरूण गवली, जो कि एक ओबीसी समुदाय से था,दगड़ी चाल के रहवासियों के बीच काफी लोकप्रिय था। उसी तरहए वरदराजन, धारावी के तमिलों के बीच खासा लोकप्रिय था। इनमें से अधिकतर, तमिल अनुसूचित व पिछड़ी जातियों के थे और दमित व शोषित थे।
हाशिए पर पड़े तबकों के कानून से भिड़ने वाले लोगों को रॉबिनहुड की तरह देखा जाता है। निःसंदेह, वे दमन और शोषण के ढांचे को उखाड़ फेंक नहीं पाते परंतु उनके कारण, दमित और शोषित लोगों को कुछ हद तक सम्मान और गरिमा का अनुभव होता है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पास भी प्रतिरोध करने की ताकत है और कभी.कभी उन्हें आर्थिक लाभ भी होता है जैसे उनकी मज़दूरी में कुछ वृद्धि हो जाती है, उन्हें सामंती दमनकर्ताओं की बेगार नहीं करनी पड़ती और कब.जब वह व्यक्ति ही उन्हें कुछ रोज़गार दे देता है। हाशिए पर पड़े समुदायों के कानून से टकराने वाले लोगए बहुत लंबे समय तक खुलकर काम नहीं कर पाते और अंततः या तो उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़ती है और या वे वर्चस्वशाली श्रेष्ठि वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम करने लगते हैं। तस्कर, उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने लगते हैं और भू.माफिया, बिल्डरों का हित साधने लगता है।
मुस्लिम युवा
भेदभाव, शैक्षणिक व रोज़गार के अवसरों का अभाव व सांप्रदायिक हिंसा ने कुछ मुस्लिम युवाओं को बागी बनाया। उनके पवित्र प्रतीकों और विश्वासों ;जैसे यह दावा कि देश में 3,000 मस्जिदें,मंदिरों को तोड़कर बनाई गई हैं और उनके विरूद्ध क्रूर बलप्रयोग व हिंसाए उनकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं और कभी.कभी उन्हें अमानवीय बना देते हैं।
मुज़फ्फरनगर के एक दंगा पीडि़त ने जब अपनी गांव की मस्जिद को आग में राख होते हुए देखा तो वह बच्चे की तरह फूट.फूटकर रोने लगा। उसने इस लेखक से कहा कि जिस गांव में उसकी मस्जिद जला दी गई, वह वहां कभी लौट नहीं पाएगा। उसने कहा कि गांव वापिस जाने का कोई मतलब नहीं रह गया है और वहां लौटने से उसके आत्मसम्मान और गरिमा को गहरी चोट पहुंचेगी। हरियाणा के बल्लभगढ़ के अटाली गांव में मुसलमानों को उस स्थान पर छत बनाने नहीं दी गई जहां वे पिछले 50 सालों से नमाज़ पढ़ रहे थे। और इस तरह के अनेक उदाहरण हैं। देश भर में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं। मुसलमानों को 'लवजिहाद' करने का दोषी ठहराया जाता हैए उन्हें आतंकवादी बताया जाता है, उन्हें उनकी खानपान की आदतें बदलने पर मजबूर किया जाता है और हिंदू संगठनों के कई नेता उन्हें यह याद दिलाते रहते हैं कि गुजरात और मुजफ्फरनगर फिर से हो सकते हैं। स्वाधीन भारत में मुंबई, भिवंडी, अहमदाबाद, मेरठ, अलीगढ, मुरादाबाद, गोधरा, सीतामढ़ी, भागलपुर, नेल्ली व अन्य स्थानों पर हुए दंगों में कम से कम 40,000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं, उनके परिवारजनों को न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है और जब तीस्ता सीतलवाड जैसी मानवाधिकार कार्यकर्ता, गुजरात के सन 2002 के दंगा पीडि़तों को न्याय दिलवाने की पहल करती हैं तो राज्यतंत्र उन्हें जेल में डालने की कोशिश में जुट जाता है और उन्हें देश का दुश्मन बताया जाता है।
निःसंदेहए देश के कई बड़े अपराधी मुसलमान थे व हैं। इनमें हाजी मस्तान, करीम लाला, दाउद इब्राहिम व टाईगर मेमन जैसे लोग शामिल हैं। हम यह भी नहीं कहते कि जिन मुस्लिम युवकों पर पुलिस आतंकवादी होने का आरोप लगाती है, वे सभी निर्दोष हैं। परंतु साथ ही, यह मानना भी भूल होगी कि चूंकि पुलिस उन्हें आतंकवादी मानती है इसलिए वे आतंकवादी हैं। बड़ी संख्या में निर्दोष युवकों को आतंकी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें सालों तक ज़मानत नहीं मिलती और वे जेलों में सड़ते रहते हैं। बाद में अदालतें उन्हें निर्दोष बताकर बरी कर देती हैं। वे जब वापस आते हैं, तब तक उनके जीवन के सुनहरे साल निकल चुके होते हैं। कई बार उनकी पढ़ाई अधूरी छूट जाती है और उनका रोज़गार जाता रहता है। जब समुदाय को ऐसा लगता है कि उसे न्याय नहीं मिलेगा,तो कई युवक अपने स्तर पर, कानून की हदों से बाहर जाकर प्रतिशोध लेने के लिए निकल पड़ते हैं। उनके इस कदम से समुदाय का बड़ा हिस्सा असहमत नहीं होता और कुछ लोग उनसे सहानुभूति भी रखते हैं।
सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों को सांप्रदायिक राजनीति का विरोधी होने का दावा करने वाली'धर्मनिरपेक्ष पार्टियों' जैसे कांग्रेस, राजद, सपा आदि के शासन में भी न्याय नहीं मिला। इसके अलावा, हिंदू राष्ट्रवादी संगठन और भाजपा नेता, लगातार सार्वजनिक विमर्श में सांप्रदायिकता का रंग घोलते आ रहे हैं। अपनी जातिगतए भाषायी व सांस्कृतिक विभिन्नता और अलग.अलग राजनैतिक वफादारियों के बावजू़द, पूरा मुस्लिम समुदाय ऐसा महसूस करता है कि वह निशाने पर है और चाहता है कि कोई ऐसा शक्तिशाली नेता उभरे, जो उन्हें राजनैतिक दृष्टि से एक करे व सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक न्याय दिलवाए।
मजलिस.ए.इत्तेहादुल मुस्लीमीन के नेता अकबरूद्दीन ओवैसी, इस स्थिति का लाभ उठाकर मुसलमानों के 'मजबूत नेता' और उसके एकमात्र प्रवक्ता के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। वे बहुत होशियारी से इस तरह की बातें करते हैं जो कानून या संविधान के विरूद्ध नहीं होतीं परंतु जिनकी मदद से वे मुस्लिम समुदाय की अन्याय का शिकार होने की भावना का लाभ उठा सकते हैं। वे हर उस पार्टी का विरोध करते हैं जो मुस्लिम समुदाय का समर्थन पाने की कोशिश करती है। वे केवल हैदराबाद तक सीमित अपनी पार्टी को अखिल भारतीय विस्तार देना चाहते हैं और सभी मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के इच्छुक हैं। उन्हें लगता है कि वे देश की सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और मुसलमानों के हित के लिए काम करने वाले संगठनों का स्थान ले लेंगे। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय किसी मुस्लिम पार्टी का समर्थक बन जाता है तो इससे एक ओर हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को लाभ होगा तो दूसरी ओर, मुसलमानों की अशरफ बिरादरियों ;जातियोंद्ध के राजनैतिक श्रेष्ठिवर्ग को। सांप्रदायिक एजेंडे के आधार पर मुसलमानों को एक करने का प्रयास, संविधान में निहित समानता व सामाजिक न्याय और आर्थिक.शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के एजेंडे को हाशिए पर धकेल देगा और उसे अप्रासंगिक बना देगा।
जनाज़े में भीड़
याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह मानना मूर्खता होगी कि जो लोग जनाज़े में शामिल थे, वे 12 मार्च 1993 के बम धमाकों.जिनमें 257 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं.को उचित मानते हैं या उन्हें इन बम धमाकों के पीडि़तों से कोई सहानुभूति नही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन लोगों ने याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में भाग लिया, वे सभी ये चाहते हैं कि बंबई श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के याकूब मेमन सहित सभी दोषियों को उनके किए की सज़ा मिलनी चाहिए। परंतु उनका यह भी मानना है कि मेमन, मौत की सज़ा का हकदार नहीं था और ऐसे कई गैर.मुसलमान भी हैं, जिनकी यही मान्यता थी। कुछ लोग, जो मौत की सज़ा के खिलाफ हैं, उनका यह तर्क था कि याकूब मेमन ने आत्मसमर्पण किया था और जांच एजेंसियों को षड़यंत्र और षड़यंत्रकर्ताओं के बारे में सारी जानकारियां दी थीं इसलिए उसे कम सज़ा दी जानी चाहिए थी। दूसरी ओर, जो लोग मौत की सज़ा के पक्षधर हैं उनका  तर्क था कि 257 लोगों की मौत के लिए जि़म्मेदार अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए और चूंकि याकूब षड़यंत्रकारियों में शामिल था, इसलिए वह मौत की सज़ा का हकदार था। स्पष्टतः, जब मेमन को फांसी दिए जाने के समर्थकों और विरोधियों . दोनों में मुसलमान व हिंदू शामिल थे तब केवल मुसलमानों को दोषी ठहराने का क्या अर्थ है।
अगर हमें भारत के स्वप्न को जिंदा रखना है तो सभी भारतीयों को एक होकर ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो समुदाय, जाति, राष्ट्रीयता, नस्ल, लिंग व भाषा आदि का विचार किए बगैर, सब के साथ न्याय करें। हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को . चाहे वे किसी भी जातिए धर्म, लिंग या नस्ल के हों . आगे बढ़ने में मदद करें और हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण भी करना होगा जो किसी लिंग, जाति, समुदाय या धर्म विशेष के लोगों के साथ हो रहे अन्याय को अनदेखा न करें। हमारे देश की सरकारें ऐसी होनी चाहिए जो जनता के प्रति जवाबदेह और जि़म्मेदार हों। अपराधों में कमी लाने का एक ही तरीका है.न्यायपूर्ण समाज का निर्माण। ज़ुल्म और उत्पीड़न से केवल 'नायकों' का जन्म होता है और हिंसा व प्रतिहिंसा के दुष्चक्र का। अगर न्याय नहीं होगा तो सज़ाएं चाहें कितनी भी कड़ी क्यों न हों, यह क्रम जारी रहेगा।
-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 7 जनवरी 2015

किस घर में रहेंगे घर वापस आने वाले ?

इस समय धर्मांतरण, घरवापसी, लव जिहाद, नाथूराम गोडसे के महिमामंडन के प्रयास आदि को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ी हुई है।केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत अनेक लोग इस बात की मांग कर रहे हैं कि धर्मांतरण को लेकर एक विस्तृत कानून बने।
इन तमाम मुद्दों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। सर्वप्रथम इस प्रश्न पर विचार आवश्यक है कि कुछ लोग अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को क्यों अपनाते हैं?
अपने धर्म को त्यागने के अनेक कारण होते हैं। कुछ लोग धर्मपरिवर्तन आध्यात्मिक और दार्शनिक कारणों से करते हैं। हमारे यहां का उदाहरण लें तो हमारे देश के कुछ महान व्यक्तियों ने दार्शनिक और आध्यात्मिक कारणों से हिंदू धर्म को त्यागा। इस सूची में सबसे पहला नाम राजकुमार सिद्धार्थ का है। उन्हें अपने धर्म में कुछ ऐसी विषमताएं महसूस हुईं कि उन्होंने न सिर्फ अपना धर्म छोड़ा वरन् एक राजा को उपलब्ध ऐशोआराम की सुविधायें त्याग दीं और एक नये धर्म की स्थापना की। यह धर्म बुद्ध धर्म के नाम से जाना गया।
हमारे देश के ही एक महान व्यक्ति डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भी हिंदू धर्म को त्यागा। उनके द्वारा धर्म परिवर्तन के कारण दार्शनिक भी थे और भौतिक भी। उन्हें एक दलित होने के नाते तरह-तरह की यंत्रणाएं भोगना पड़ी थीं। अनेक बार अपमान के घूंट पीने पड़े थे। स्वयं के अनुभव के साथ-साथ उन्हें अपनी जाति के लोगों की दयनीय स्थिति ने भी बौद्ध धर्म को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया था। उन्होंने जीवनभर यह प्रयास किया कि उच्च जाति के लोगों का दलितों के प्रति रवैय्या बदले। शायद इसी इरादे से उन्होंने आजाद भारत के संविधान निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। इसी इरादे से दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की। परंतु उन्होंने जब महसूस किया कि सवर्णों के रवैय्ये में रंचमात्र भी अंतर नहीं आया है तो उन्होंने 1956 में हिंदू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अंगीकृत किया।
उसके बाद भारी संख्या में दलितों ने हिंदू धर्म से विदा ली। हमारे देश के एक और महान व्यक्ति ने भी इन्हीं कारणों से हिंदू धर्म त्यागा था। उनका नाम था राहुल सांक्रत्यायन।
शायद संविधान निर्माताओं को यह भरोसा था कि आरक्षण के कारण दलितों की स्थिति में सुधार आयेगा परंतु वैसा नहीं हुआ और दलितों को अपमान भरी स्थितियों में अभी भी जीवनयापन करना पड़ रहा है। आजकल जब यह बात कही जाती है कि दलितों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है तो अनेक लोग इस दावे को चुनौती देते हुए कहते हैं कि दलितों को सभी अधिकार प्राप्त हैं और उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो रहा है। परंतु उनका दावा कितना खोखला है यह समय-समय पर हुए सर्वेक्षणों से सिद्ध होता है।
वर्ष 2007 में एक जनसुनवाई आयोजित की गई थी। जनसुनवाई के लिए एक ट्रिब्यूनल गठित किया गया था। इस ट्रिब्यूनल में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के. रामास्वामी, मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एच. सुरेश, केरल मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष डॉ. एस. बाला रमन, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईन्सेज के प्रोफेसर ए. रमैया, स्वामी अग्निवेश, डॉ. माजा दारूवाला, पूर्व आईएएस अधिकारी के.बी. सक्सेना, हर्षमंदर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नंदूराम एवं आशा के निदेशक संदीप पांडे थे।
इस ट्रिब्यूनल के सामने देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए दलितों ने अपनी पीड़ा के रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण दिए थे। एक लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल इस नतीजे पर पहुंचा था कि आज भी बड़े पैमाने पर दलितों के साथ भेदभाव जारी है। इसमें  दलितों को मंदिरों में प्रवेश न करने देना, पानी भरने और नहाने के स्थानों पर उनके साथ भेदभाव, उनसे मैला ढोने का काम करवाना, देवदासी प्रथा, दलित महिलाओं का यौन शोषण, स्कूलों में एवं अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव आदि शामिल हैं। अनेक कानूनों के बावजूद यह सब हो रहा है।
वर्ष 2007 में ट्रिब्यूनल द्वारा प्राप्त जानकारी के अतिरिक्त, 2014 में मध्यप्रदेश में दलितों की स्थिति जानने के लिए एक विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण वैज्ञानिक पद्धति से किया गया था। सर्वेक्षण में  मध्यप्रदेश में एक भी गांव ऐसा नहीं पाया गया जहां दलित समुदाय के साथ छुआछूत न होता हो। मध्यप्रदेश के पांच क्षेत्रों के 10 जिलों के सभी 30 गांवों में दलित समुदाय के साथ किसी न किसी तरह का भेदभाव होना पाया गया। यदि हम इन गांवों में दलित समुदाय के साथ होने वाली विभिन्न प्रकार की छुआछूत की गिनती करें तो पाते हैं कि यहां कुल मिलाकर 70 प्रकार की छुआछूत होती हैं। इनमें सार्वजनिक स्थानों से लेकर स्कूल एवं अन्य सार्वजनिक सेवाओं, होटलों, दुकानों तथा कार्य स्थल पर दलित समुदाय के मजदूरों के साथ व्यापक रूप से छुआछूत का प्रचलन देखा गया है।
भेदभाव के कुछ उदाहरण हैं:
(1) दलित समुदाय के लोगों को ऊपर से पानी पिलाना।
(2) दलितों के नाम बिगाड़कर बोलना।
(3) दलित मोहल्लों को जातिगत नामों से पुकारना।
(4) दलितों को धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल न करना।
(5) दलित समुदाय के लोगों को अलग लाईन में बैठाकर खाना खिलाना।
(6) दलित लोगों से बेगारी करवाना।
(7) चाय पीने के बाद कप धुलवाना और अलग स्थान पर रखवाना।
(8) दलितों से दूसरों के और अपने भोजन के पत्तल उठवाना।
(9) अपमानजनक तरीके से, गाली देते हुए जाति का नाम लेना।
(10) पंचायत भवन एवं अन्य सार्वजनिक सेवाओं के संबंधित भवन दलित बस्ती से दूर बनाना।
(11) स्कूल में खाना बनाने के काम में किसी दलित महिला की नियुक्ति न करना।
(12) स्कूल में खाना बनाने के स्थान (किचन शेड) में दलित बच्चों को नहीं जाने देना।
(13) स्कूल में मध्यान्ह भोजन में दलित बच्चों को रोटी ऊपर से फेंककर परोसना।

(14) प्रसूति के दौरान दलित महिला से मल-मूत्र साफ करवाना और बाद में उसे घर में आने नहीं देना।
सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि न तो प्रशासन और ना ही राजनीतिक पार्टियां पीड़ित दलितों की मदद करती हैं।
इस तरह की विषम परिस्थितियों में जिन्हें हिंदू समाज छोड़ना पड़ा, उन्हें फिर से हिंदू समाज में वापस लाने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को घरवापसी का नाम दिया गया है। परंतु जो उन्हें वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जब ये लोग वापस आ जायेंगे तो उन्हें किस घर में रखा जाएगा। क्या उन्हें उसी मुहल्ले और उसी घर में रख दिया जायेगा जहां वे पहले रहते थे? क्या उन्हें यह गारंटी दी जाएगी कि उनके साथ वैसा व्यवहार नहीं होगा, जो उनसे उच्च जाति के लोग, हिंदू समाज छोड़ने के पहले करते थे?
यदि यह गारंटी देने की स्थिति में वे नहीं हैं, जो घरवापसी करा रहे हैं तो घर वापसी का क्या अर्थ है? जब तक इन शंकाओं का उत्तर नहीं मिलता तब तक घर वापसी का नारा एक धोखा है। यह मात्र समाज में तनाव फैलाने का एक औजार है।
-एल.एस. हरदेनिया

सोमवार, 24 नवंबर 2014

मुसलमानों की राजनैतिक लामबंदी बदलता स्वरूप भाग.2

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरहए स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों को धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दों पर लामबंद किया। परंतु चूंकि देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हुआ था इसलिए मुसलमानों द्वारा उनकी विशिष्ठ संस्कृति की बात करते ही हिंदू राष्ट्रवादी, इस्लामिक राज्य का हौव्वा खड़ा करने लगते थे। मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के प्रयास को 'हिन्दू' संस्कृति पर हमले और उसके अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता था। इस सब के चलते,सन् 1980 के दशक में देश में सांप्रदायिक हिंसा में जबरदस्त तेजी आई। कांग्रेस, बाबरी मस्जिद को नहीं बचा सकी और मुसलमानों को लगा कि वह पार्टी उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में भी असफल है। अतः वे कांग्रेस से दूर होने लगे। क्षेत्रीय पार्टियों ने सुरक्षा के मुद्दे पर मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद किया। परंतु वे समुदाय को एकसार मानते रहे एवं इन पार्टियों ने समुदाय की विविधतापूर्ण संस्कृति और उसके अलग.अलग तबकों के विविध हितों पर ध्यान नहीं दिया। सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह था कि भविष्य में सांप्रदायिक दंगे नहीं होंगे। परंतु पूर्व में हुई सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों को न्याय दिलवाने की बात ये पार्टियां नहीं करती थीं और ना ही यह गारंटी देने को तैयार थीं कि हिंसा दोहराई नहीं जाएगी। मोटे तौर पर, देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में परिद्रश्य कुछ ऐसा ही था।
सुरक्षा के मुद्दे की वापसी
बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मुसलमानों की संस्कृति और धर्म के ठेकेदार कांग्रेस से दूर हो गए। समुदाय ने शिक्षा और जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। ऐसा लगता था कि आगे बढ़ने का यही एक रास्ता है। परंतु गुजरात के सन 2002 के मुस्लिम कत्लेआम के बाद, सुरक्षा की चिंता एक बार फिर महत्वपूर्ण बन गई, विशेषकर उत्तर भारत में। मुस्लिम मतदाता धीरे.धीरे कांग्रेस की ओर लौटने लगे। जहां सन् 2002 तक हिंदू राष्ट्रवादियों की नीति बड़े और भयावह दंगे कराकर मुसलमानों को निशाना बनाने  की थी वहीं 21वीं सदी के पहले दशक में, खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी और देश का दुश्मन सिद्ध करने के लिए किया जाने लगा। राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुजरात पुलिस के अधिकारी कभी भी कुछ मुस्लिम युवकों को मार डालते थे और उन्हें ऐसा आतंकी बताते थे जो हिंदू नायक नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाहियों में सन् 2004 में इशरत जहां और जावेद शैख मारे गए तो 2005 में सोहराबुद्दीन शैख व कौसर बानो, 2006 में सोहराबुद्दीन का मित्र तुलसीराम प्रजापति, जमाल सादिक और कई अन्य। इन हत्याओं,जिन्हें 'मुठभेड़' बताया जाता था, के बाद मीडिया के जरिए मुस्लिम समुदाय के चेहरे पर कालिख पोतने की भरपूर कोशिश की जाती थी। इस तरह की फर्जी मुठभेड़ें कांग्रेस शासन में भी हुईं जिनमें से एक थी बाटला हाउस मुठभेड़। हर आतंकी हमले के बाद.फिर चाहे उसके शिकार मुसलमान ही क्यों न रहे हों.बड़ी संख्या में निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। उत्तर भारत में मुसलमान धीरे.धीरे कांग्रेस की तरफ आने लगेए विशेषकर उन राज्यों मेंए जहां की राजनीति द्विधुर्वीय थी और कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त कोई तीसरी शक्ति अस्तित्व में ही नहीं थी। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में 9 सीटें जीतीं और सन् 2009 में 15।
हालिया चुनाव में कांग्रेस मुसलमानों के केवल एक हिस्से को ही अपनी ओर आकर्षित कर सकी और वह भी धार्मिक.सांस्कृतिक मसलों को लेकर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और बेहतरी के वायदों के बल पर। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जिसे सच्चर समिति के नाम से जाना जाता है। सच्चर समिति ने यह पाया कि मुसलमानों की सामाजिक.आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और वे अन्य सभी समुदायों से काफी पीछे हैं। कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम भी लागू किया परंतु इसे लागू करने में भारी कोताही बरती गई।
मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व के एक हिस्से ने पिछड़े मुसलमानों ही नहीं बल्कि सभी मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की मांग की और यह दावा किया कि पूरा मुस्लिम समुदाय ही पिछड़ा और भेदभाव का शिकार है। यह सही नहीं था। उदाहरण के लिए, अशरफ मुसलमान.ऊँची जातियों से धर्मपरिवर्तन कर बने मुसलमान.जैसे सैयद और पठान व व्यापारिक समुदाय जैसे बोहरा और मेमनए अन्य मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक पढ़े.लिखे और संपन्न थे। इसके अतिरिक्त, पूरे समुदाय को आरक्षण देना, धर्म के आधार पर भेदभाव करना होता जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 द्वारा प्रतिबंधित है। आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकारों ने तकनीकी रूप से पिछड़ेपन के आधार पर परंतु व्यावहारिक तौर पर लगभग पूरे समुदाय को, आरक्षण प्रदान कर दिया। परंतु अदालतों ने पहले आंध्रप्रदेश और बाद में महाराष्ट्र सरकार के निर्णयों को रद्द कर दिया।
कांग्रेस, समुदाय के युवकों को खुफिया एजेंसियों से बचाने में असफल रही। कांग्रेस उन पुलिस अधिकारियों को सजा भी नहीं दिलवा सकी जिन्होंने फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोष मुस्लिम युवकों की जान ली। फर्जी मुठभेड़ों का सिलसिला तब रूका जब कुछ साहसी व्यक्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसी मुठभेड़ों में शामिल पुलिस अधिकारियों की पहचान कर उन्हें सजा दिलवाने की कोशिशें शुरू कीं। समुदाय के युवक गुस्से से उबल रहे थे और इस बारूद को एक तीली दिखाने भर की देर थी। मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन ने इसी गुस्से का लाभ उठाया। समुदाय को निशाना बनाए जाने के साथ ही शुरू हुआ राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय। उन्होंने विकास का वायदा कर सत्ता पाने में सफलता हासिल कर ली। मोदी का प्रचारतंत्र चाहे कुछ भी कहे परंतु मुसलमान जानते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने का अर्थ है मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र में दूसरे दर्जे के नागरिक बनाए जाने की गंभीर आशंका। हर लोकसभा चुनाव में सदन में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है। जहां 1947 में यह 13.1 प्रतिशत था वहीं 16वीं लोकसभा में यह घटकर 4 प्रतिशत ;22 सांसद रह गया। यह तब जबकि मुसलमान कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत हैं।
धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मोहभंग
निर्दोष मुस्लिम युवकों को निशाना बनाया जा रहा थाए समुदाय की बेहतरी की योजनाएं लागू नहीं की जा रही थीं और हिंदू राष्ट्रवादी दिन प्रति दिन और आक्रामक होते जा रहे थे। ऐसे में मुसलमानों का सभी 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियों से मोहभंग होने लगा। मौलाना मदनी और जमायत उलेमा.ए.हिंद, जो कि कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते थे, तक ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि कांग्रेस केवल हिंदू राष्ट्रवाद का डर दिखाकर मुसलमानों के वोट कबाड़ रही है। मौलाना मदनी और जमायत ने देश भर में कई सभाएं कीं जिनका एक ही संदेश था और वह यह कि केवल मुसलमानों को डराकर उनके वोट हासिल नहीं किए जा सकते। उनके वोट केवल उनकी भलाई के लिए सकारात्मक कदम उठाकर हासिल किए जा सकते हैं। ये कदम क्या होने चाहिए, इस बारे में इन सभाओं में कुछ भी नहीं कहा जाता था। इनमें मुसलमानों की न्यूनतम मांगे पूरी करने की मांग की जाती थी और वे थीं सन् 2006 के मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में आरोपी बनाए गए मुस्लिम युवकों की तुरंत रिहाई क्योंकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ;एनआईए ने उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाया था। इसके अलावा, स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से साफ था कि इस घटना के पीछे हिंदू राष्ट्रवादी थे। उनकी अन्य मांगों में शामिल था निर्दोष मुस्लिम युवकों को फंसाने वाली खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही और नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मुसलमानों के लिए आरक्षण। इमाम बुखारी ने कांग्रेस का साथ दिया परंतु मुसलमानों में बुखारी की पैठ कतई उतनी नहीं है जितनी कि समझी या मानी जाती है। और यह बात एक के बाद अनेक चुनावों में साबित हुई है।
जहां'धर्मनिरपेक्ष पार्टियां' असफल हो गई थीं और मुसलमानों का उनसे मोहभंग हो गया था वहीं मुसलमानों की बहुलता वाले राजनैतिक दलों की स्थापना करने का दबाव बढ़ रहा था। सन् 2008 में मोहम्मद अय्यूब नाम के एक मुस्लिम सर्जन ने उत्तरप्रदेश में पीस पार्टी की स्थापना की। सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने चार सीटें जीतीं। जल्दी ही पीस पार्टी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्यप्रदेश,राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा व छत्तीसगढ़ में फैल गई। मुसलमानों के अधिकांश वोट पीस पार्टी को मिलने लगे। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग मुसलमानों के बीच लोकप्रिय थी।
मालेगांव में बम धमाकों के बाद मुफ्ती इस्माईल की लोकप्रियता बढ़ने लगी। समुदाय में जबरदस्त गुस्सा था क्योंकि मुसलमानों को लगता था कि उनके युवकों को बम धमाकों के मामले में झूठा फंसाया गया है। मालेगांव नगर निगम के सन् 2007 के चुनाव के पहलेए तीसरी महाज या तीसरा मोर्चा बनाया गया और वह कांग्रेस व एनसीपी विरोधी लहर के चलते नगर निगम में सत्ता में आ गया। मुफ्ती इस्माईल ने सन् 2009 का विधानसभा चुनाव जनसुराज्य शक्ति पार्टी के टिकट पर लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार व तत्कालीन विधायक शैख रशीद को हरा दिया। परंतु बाद में मुफ्ती ने एनसीपी की सदस्यता ले ली। पिछले विधानसभा चुनाव में मुफ्ती इस्माईल को कांग्रेस उम्मीदवार शैख रशीद के हाथों हार झेलनी पड़ी। इसका मुख्य कारण यह था कि मुफ्ती ने अपने वायदे पूरे नहीं किए।
महाराष्ट्र में एमआईएम व मुस्लिम.बहुल पार्टियों का उदय
महाराष्ट्र में एमआईएम के उदय को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। मजलिस.ए.इत्तेहाद.अल. मुसलमीन की स्थापना 1927 में हैदराबाद के तत्कालीन शासक को सलाह देने और उनका समर्थन करने के लिए हुई थी। यह सभी मुस्लिम पंथों और बिरादरियों का मिलाजुला संगठन था। रजाकारों की हार और हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय के बाद, एमआईएम सन् 1957 तक निष्क्रिय रही। इस साल उसे सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी ने पुनर्जीवित किया 'ताकि आपके ;मुसलमान तबको  को राजनैतिक बल मिल सके'। सन् 1960 में एमआईएम ने हैदराबाद नगर निगम की 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और इनमें से 19 पर जीत हासिल की। 1967 में एमआईएम के तीन उम्मीदवार विधानसभा सदस्य चुने गए। आंध्रप्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के उदय के बाद, एमआईएम ने यह भविष्यवाणी की कि हैदराबाद के गैर.मुस्लिम वोट, तेलुगूदेशम और कांग्रेस के बीच बंट जाएंगे। एमआईएम अपने भड़काऊ वक्तव्यों के लिए जानी जाती है। उसे सन् 1984 के आम चुनाव में 35 प्रतिशत मुस्लिम मत प्राप्त हुए और तब से लेकर आज तक वह चुनावों में जीत हासिल करती आई है। एमआईएम ने पिछले कुछ वर्षों में एमआईएम.भीम एकता का नारा देकर दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी किया है।
तेलंगाना के बाहर, एमआईएम ने अपनी पहली बड़ी जीत नांदेड़ नगर निगम चुनाव में हासिल की। नांदेड़ में मुसलमान, आबादी का लगभग 30 फीसदी हैं और सन 2012 में हुए चुनाव में एमआईएम ने 81 में से 11 सीटें जीतीं। यह औरगांबाद, मालेगांव आदि के निर्दोष मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और उन्हें आतंकवाद संबंधी मामलों में फंसाए जाने की प्रतिक्रिया थी। हालिया विधानसभा चुनाव में औरगांबाद केंद्रीय सीट से इम्तियाज़ ज़लील और मुंबई की बायकुला सीट से वारिस पठान की जीत भी इन्हीं कारणों से हुई।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र के दो चुनाव क्षेत्रों में एमआईएम की विजय के बाद एक मुस्लिम युवक ने इन पंक्तियों के लेखक से कहाए ' हम हिंदू राष्ट्रवादियों के बढ़ते प्रभाव से डरते नहीं हैं, हम सभी परिणाम झेलने को तैयार हैं। जो कुछ हो चुका है उससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। अब हमें अपनी मांगे मनवानी ही होंगी'। एमआईएम की आक्रामक और भड़काऊ राजनीति की जीतए दरअसल, सभी ' धर्मनिरपेक्षष् पार्टियों की हार है। ये पार्टियां न तो राज्य में कानून के शासन की रक्षा कर सकीं और ना ही राज्य का हिंदूकरण रोक सकीं। एमआईएम, दरअसल, मोदी की भाजपा की प्रतिकृति है। जिस तरह मोदी बहुसंख्यक समुदाय के युवकों  की महत्वाकांक्षाओं को भुना रहे हैं उसी तरह एमआईएम मुस्लिम युवकों की इच्छाओं.आकांक्षाओं से खेल रही है। एमआईएम मुस्लिम युवकों को 'मुस्लिम राजाओं के गौरवशाली इतिहास' के झूठे अहंकार से भर रही है। मीडिया हमें बताती है कि मोदी अब सांप्रदायिक एजेण्डे पर नहीं चल रहे हैं। उन्हें उसकी जरूरत भी नहीं है। लोग यह जान गए हैं कि उनका ब्रांड क्या है और योगी आदित्यनाथ व मोदी के अन्य चेले सांप्रदायिक और भड़काऊ बातें कहने में जरा भी नहीं सकुचाते। परंतु हम सब को समझ लेना चाहिए कि अंततः यह सांप्रदायिक प्रतियोगिता भारत के संवैधानिक प्रजातंत्र को ही निगल लेगी। जो लोग भारतीय संविधान,कानून के राज, उदारवादी मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे भारत के लोगों को यह समझाएं कि देश को आज एक स्वस्थ्य नागरिक आंदोलन की जरूरत है जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करे और जिसकी विविधता और बहुवाद में पूरी आस्था हो।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

क्या हिन्दू धर्म का चेहरा बदल रहा है?

जाने माने विधिवेत्ता फाली एस नरीमन ने हाल में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही। वर्तमान राजनैतिक स्थिति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि 'हिंदू धर्म, पारंपरिक रूप से, अन्य सभी भारतीय धर्मों से तुलनात्मक रूप में सबसे अधिक सहिष्णु रहा है' परंतु हाल में कट्टरवादियों द्वारा फैलाये जा रहे धार्मिक तनाव और घृणा फैलाने वाले भाषणों से ऐसा लगता है कि'हिंदू धर्म अपना सौम्य चेहरा बदल रहा है'
इन दिनों आरएसएस की विचारधारा, अर्थात हिंदुत्व विचारधारा, से जुड़े संगठन लगातार ऐसी बातें कह रहे हैं जिनसे यह ध्वनित होता है कि भारत हमेशा से हिंदू राष्ट्र है और रहेगा। उनमे से कुछ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी प्रगट कर रहे हैं। हिंदू एक धर्म है। हिंदुत्व एक राजनैतिक विचारधारा है। हिंदुत्ववादी संगठन तरह.तरह की बेहूदा बातें कर रहे हैं। वे दूसरे समुदायों के प्रति घृणा का वातावरण पैदा करने के लिए जहां एक ओर लव जिहाद जैसे मुद्दे उठा रहे हैं तो दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि 'हम सब हिंदू हैं'। इसके साथ ही, उदारवादी हिंदू धर्म पर हमले भी हो रहे हैं। जिन लोगों ने एक मुस्लिम परिवार में जन्में सूफी संत शिरडी के सांई बाबा को अपना भगवान मान लिया है, उनसे यह कहा जा रहा है कि उन्होंने ठीक नहीं किया। हिंदुत्ववादी कई अलग.अलग बातें कह रहे हैं और उनके दावों में परस्पर विरोधाभास भी है। परंतु सबका लक्ष्य एक ही है.किसी न किसी तरीके, किसी न किसी बहाने से धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना। जो मूल प्रश्न पूछा जाना चाहिए वह यह है कि क्या संघ परिवार से उठ रही आवाजें, हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करती हैं या वे हिंदू धर्म के नाम पर राजनीति करने का प्रयास है। यह प्रश्न अधिक जटिल इसलिए बन जाता है क्योंकि इन दिनों अलकायदा और आईसिस जैसे कई संगठनए इस्लाम के नाम पर अपनी कुत्सित गतिविधियां चला रहे हैं।
स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा गांधी और मौलाना आजाद जैसे नेता शामिल थे जो अपने.अपने धर्मों में गहरी आस्था रखते थे। परंतु जहां तक उनकी राजनीति का प्रश्न है, वह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष थी। उसी दौर में सावरकर और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग भी थे जो'धार्मिक' तो नहीं थे परंतु हिंदू धर्म और इस्लाम के नाम पर अपनी राजनीति करते थे।
संघ परिवार, हिंदू धर्म को इस धर्म की एक संकीर्ण धारा.ब्राह्मणवाद.से जोड़ रहा है। हिंदू धर्म किसी एक पुस्तक, पैगम्बर या पुरोहित वर्ग पर आधारित नहीं है। हिंदू धर्म में ढे़र सारे देवता हैं, ईश्वर की कई तरह की मीमांसाएं हैं और सैंकड़ों पवित्र ग्रंथ हैं।
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान  गांधीजी ने यह दिखाया कि किस प्रकार हिंदू धर्म की उदारवादी परंपराओं का इस्तेमाल कर, धर्म को राजनीति से पृथक रखा जा सकता है। गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखी। उनका भारतीय राष्ट्रवाद, उस हिंदू राष्ट्रवाद से एकदम अलग था, जिसके प्रतिपादक हिंदू महासभा और आरएसएस थे। इन संगठनों का हिंदू धर्म संकीर्ण और असहिष्णु था।
चूंकि अधिकांश हिंदू, गांधीजी के अनुयायी थे,इसलिए हिंदू महासभा.आरएसएस का असहिष्णु हिंदू धर्म हाशिए पर पड़ा रहा। परंतु पिछले तीन दशकों में राममंदिर आंदोलन से शुरू होकर, राजनीति में 'दूसरों' के बारे में असहिष्णु दुष्प्रचार का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है। इस समय देश पर भाजपा का शासन है। स्वाभाविक तौर पर भाजपा और उससे जुड़े संगठनों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है और इसलिये वे और खुलकर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा फैला रहे हैं।
वे उन लोगों को आतंकित करना चाहते हैं जो राजनीति और धर्म के उनके संस्करण से सहमत नहीं हैं। आरएसएस की राजनीति केवल 'दूसरों' को आतंकित करने तक सीमित नहीं है। वह उन हिंदुओं पर भी निशाना साध रही है जो संघ से भिन्न राय रखते हैं। मुझ जैसे लोगों को रोजाना अपमानित करने वाले और अश्लील भाषा में लगभग गालियां देने वाले संदेश बड़ी संख्या में मिलते हैं। जैसे.जैसे धर्म के नाम पर राजनीति परवान चढ़ती जायेगी,समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी। हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग.अलग चीजें हैं। इस संदर्भ में श्री नरीमन का वक्तव्य, उस प्रजातांत्रिक उदारवादी वर्ग की आह है, जो संघ परिवार के नेतृत्व में चल रही हिंदुत्वादी राजनीति के तेजी से आगे बढ़ते कदमों से अचंभित और परेशान है।
 -राम पुनियानी

रविवार, 17 जुलाई 2011

दिग्विजय सिंह ने ग़लत नही कहा

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना 1925 को जर्मन नाजीवादी विचारों से प्रेरित होकर हुई थी. राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाई में इस संगठन का कोई योगदान नही था इसके विपरीत यह संगठन ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मदद करता रहा और आज़ादी क बाद इस देश क महानायक महात्मा गाँधी की हत्या भी इस संगठन के लोगों के हाथों से हुई. साध्वी प्रगया की गिरफ्तारी क बाद हिंदूव्त्व वादी आतंकवाद का पर्दाफाश हुआ और स्वामी असीमनंद क अंतर्गत धारा 164 सी आर पी सी के बयान के बाद यह स्थिति और भी सॉफ हो गयी किी इस संगठन का हाथ आतंकवादी गतिविधियों में है मुंबई आतंकी घटना का दूसरा चरण उस समय होता है जब देश की स्तितियाँ ठीक ना हो मंट्रिगन घोटाले में फँस रहे हों. कालका मैल जैसी भीषण दुर्घटना हो चुकी ही ऐसे समय देश की जनता का ध्यान हटआअनए क लिए कुछ भी संभव है. अमेरिकन साम्राज्यवाद की दूसरी पसंद संघ है और संघ चाहता यह है किी हिंदू मुसलमान की राजनीति बढ़े जिससे उसकी मुख्य मुखौटा पार्टी को लाभ हो. दिग्विजय सिंह का बयान भी यह संकेत करता है की संघ क नेताओं की तरफ भी जाँच की जानी चाहिए और भारत सरकार को चाहिए इस बात की पुख़्ता जाँच कराए.

सुमन

लो क सं घ र्ष !

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