मंगलवार, 25 अगस्त 2015

याकूब मेमन के जनाज़े में मुसलमानों की भारी उपस्थिति


मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में लगभग 8,000 लोग शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट ने मेमन को 1993 के बंबई बम कांड के षड़यंत्र में शामिल होने का दोषी पाया था। सन् 1993 के 12 मार्च को बंबई के विभिन्न इलाकों में हुए श्रेणीबद्ध बम विस्फोटों में 257 निर्दोष लोग मारे गए थे। मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दे दी गई।
मेमन के जनाज़े में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के हिस्सा लेने पर सोशल मीडिया में काफी रोष व्यक्त किया गया और मुसलमानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। कुछ लोगों का मत था कि मुसलमान, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेमन को दोषी ठहराए जाने को स्वीकार करना ही नहीं चाहते और कुछ ने तो यहां तक कहा कि जो लोग उसके जनाज़े में शामिल हुएए वे आतंकवादियों के समर्थक व राष्ट्रविरोधी हैं। त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय ने ट्वीट किया कि मेमन के परिवार वालों को छोड़कर, जो भी लोग जनाज़े में थे, वे सब भविष्य में आतंकवादी बन सकते हैं।
हमें यह समझने की ज़रूरत है कि मेमन की अंतिम यात्रा में इतनी भारी उपस्थिति क्यों रही। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों के एक तबके में मेमन के प्रति सहानुभूति थी। परंतु इसे आतंकवाद या आतंकवादियों के प्रति समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुसलमानों ने घृणाजनित अपराधों की भेंट चढ़े अपने प्रियजनों का दुख भोगा है। अज़मल कसाब सहित 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला किया था। इनमें से नौ आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया और अज़मल कसाब को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। मुंबई के मुस्लिम संगठनों ने घोषणा की कि उन कब्रिस्तानों, जिनमें लावारिस लाशों को दफनाया जाता है, के दरवाजे इन आतंकियों के लिए बंद रहेंगे क्योंकि वे इस्लाम के सच्चे अनुयायी नहीं थे।
यह पहली बार नहीं है कि लोगों ने किसी अपराधी के प्रति सहानुभूति के चलते, उसके अंतिम संस्कार में भाग लिया हो। विभिन्न जातियों व धर्मों के लोग, बाहुबलियों की अंतिम यात्रा में शामिल होते रहे हैं। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में भाग लिया था,वे सब आवश्यक रूप से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील नहीं थे जो फूलनदेवी द्वारा डाली गई डकैतियों में मारे गए थे। उन्हें शायद केवल यह याद था कि फूलनदेवी स्वयं भी जातिगत दमन का शिकार थीं, यद्यपि उन्होंने इससे मुकाबला करने का गलत रास्ता चुना। वे उन्हें परिस्थितियों का शिकार व्यक्ति मानते थे और शायद फूलनदेवी के अपने दमनकर्ताओं के विरूद्ध हिम्मत से लड़ने के प्रशंसक थे.यद्यपि हो सकता है कि वे फूलनदेवी के प्रतिरोध के तरीके से सहमत न रहे हों। उस समय किसी ने यह नहीं कहा कि फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में, उनके परिवारजनों को छोड़कर, जिन लोगों ने भाग लियाए वे सभी भविष्य में डकैत बन सकते हैं। मुंबई में गैंगस्टर वरदराजन मुदलियार के अंतिम संस्कार में धारावी के निवासियों, विशेषकर तमिलों, ने बड़ी संख्या में भाग लिया। परंतु क्या हम यह कह सकते हैं कि वे हत्या की सुपारी लेने वाले एक डॉन की मौत का शोक मना रहे थे?
बाल ठाकरे की शवयात्रा में करीब 12 लाख लोग शामिल थे। उनकी अंतिम यात्रा इतनी बड़ी थी कि दो किलोमीटर की दूरी तय करने में उसे पांच घंटे लग गए और पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुंबई के बड़े हिस्से में ट्राफिक बंद करना पड़ा। जस्टिस मादोन आयोग ने भिवंडी, जलगांव और महाड में 1970 में हुए सांप्रदायिक दंगों में बाल ठाकरे की भूमिका की निंदा की थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट में कहा था कि बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद, सुलगती मुंबई में बाल ठाकरे इस तरह निकले 'जैसे कोई दिग्गज जनरल अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए निकलता है'। यह अलग बात है कि मुसलमानों और गैर.महाराष्ट्रियनों के बारे में भड़काऊ भाषण देने और दंगों में एक जनरल की तरह अपने सैनिकों का नेतृत्व करने के लिएए बाल ठाकरे पर कभी कोई मुकदमा नहीं चल सका। बाल ठाकरे के सैनिक, उनके हर आदेश को आंख बंद कर मानते थे.ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या कर दो, गैर.महाराष्ट्रियनों के विरूद्ध हिंसा करो,सिनेमा हालों और मीडिया के दफ्तरों पर हमला करो आदि। ठाकरे गर्व से कहते थे कि वे लोकशाही ;प्रजातंत्रद्ध में नहीं बल्कि'ठोकशाही' ;हिंसा और दादागिरी में विश्वास रखते हैं। और ये ठोकशाही वे तब करते थे जब उन्हें जे़ड प्लस सुरक्षा प्राप्त थी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में 1992.93 में हुए दंगों में 900 लोग मारे गए थेए जिनमें से 575 मुसलमान थे, 275 हिंदू व 50 अन्य थे। जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग ने बाल ठाकरे को मुंबई दंगों का दोषी ठहराया था।
कानून से टकराने वालों के प्रति सहानुभूति
जो लोग कानून से टकराते हैं या उसका उल्लंघन करते हैंए उनके प्रति सहानुभूति के मुख्यतः तीन कारण होते हैं। पहलाए संबंधित व्यक्ति के परिवारजनों, चाहे वे उसकी हरकतों को अनुचित ही क्यों न मानते हों, की उसके प्रति सहानुभूति हो सकती है और उसके अंतिम संस्कार में भाग लेना, उनका मानवीय कर्तव्य तो बनता ही है। दूसरे, कब.जब लोग ऐसे व्यक्ति द्वारा, उनके जीवन में लाए गए परिवर्तन से प्रभावित रहते हैं और उसके द्वारा किए गए अपराधों को वीरतापूर्ण कार्य मानते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वे होते हैं जिनकी सामाजिक.आर्थिक पृष्ठभूमि उसी व्यक्ति जैसी होती है और सामान्यतः वे दमित जातियों या नस्लीय समूहों या अल्पसंख्यक समुदायों जैसे हाशिए पर पड़े वर्गों से संबंधित होते हैं। वे स्वयं को कानून की चहारदिवारी के भीतर रहते हुए, अपने दमन और शोषण का प्रतिरोध करने में असहाय और असमर्थ पाते हैं और इसलिए वे समझ सकते हैं कि उस व्यक्ति के सामने, कानून से टकराने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। उन्हें यह भी लगता है कि उस व्यक्ति ने उनके दमनकर्ताओं का प्रतिरोध किया। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया, उनकी सोच शायद ऐसी ही कुछ रही होगी। अक्सर ऐसे व्यक्ति अपनी लूट का कुछ हिस्सा अपने दमित समुदाय के लोगों में बांटते हैं और इस कारण भी उन्हें उनका समर्थन मिलता है। उदाहरणार्थ, मुंबई का माफिया डॉन अरूण गवली, जो कि एक ओबीसी समुदाय से था,दगड़ी चाल के रहवासियों के बीच काफी लोकप्रिय था। उसी तरहए वरदराजन, धारावी के तमिलों के बीच खासा लोकप्रिय था। इनमें से अधिकतर, तमिल अनुसूचित व पिछड़ी जातियों के थे और दमित व शोषित थे।
हाशिए पर पड़े तबकों के कानून से भिड़ने वाले लोगों को रॉबिनहुड की तरह देखा जाता है। निःसंदेह, वे दमन और शोषण के ढांचे को उखाड़ फेंक नहीं पाते परंतु उनके कारण, दमित और शोषित लोगों को कुछ हद तक सम्मान और गरिमा का अनुभव होता है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पास भी प्रतिरोध करने की ताकत है और कभी.कभी उन्हें आर्थिक लाभ भी होता है जैसे उनकी मज़दूरी में कुछ वृद्धि हो जाती है, उन्हें सामंती दमनकर्ताओं की बेगार नहीं करनी पड़ती और कब.जब वह व्यक्ति ही उन्हें कुछ रोज़गार दे देता है। हाशिए पर पड़े समुदायों के कानून से टकराने वाले लोगए बहुत लंबे समय तक खुलकर काम नहीं कर पाते और अंततः या तो उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़ती है और या वे वर्चस्वशाली श्रेष्ठि वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम करने लगते हैं। तस्कर, उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने लगते हैं और भू.माफिया, बिल्डरों का हित साधने लगता है।
मुस्लिम युवा
भेदभाव, शैक्षणिक व रोज़गार के अवसरों का अभाव व सांप्रदायिक हिंसा ने कुछ मुस्लिम युवाओं को बागी बनाया। उनके पवित्र प्रतीकों और विश्वासों ;जैसे यह दावा कि देश में 3,000 मस्जिदें,मंदिरों को तोड़कर बनाई गई हैं और उनके विरूद्ध क्रूर बलप्रयोग व हिंसाए उनकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं और कभी.कभी उन्हें अमानवीय बना देते हैं।
मुज़फ्फरनगर के एक दंगा पीडि़त ने जब अपनी गांव की मस्जिद को आग में राख होते हुए देखा तो वह बच्चे की तरह फूट.फूटकर रोने लगा। उसने इस लेखक से कहा कि जिस गांव में उसकी मस्जिद जला दी गई, वह वहां कभी लौट नहीं पाएगा। उसने कहा कि गांव वापिस जाने का कोई मतलब नहीं रह गया है और वहां लौटने से उसके आत्मसम्मान और गरिमा को गहरी चोट पहुंचेगी। हरियाणा के बल्लभगढ़ के अटाली गांव में मुसलमानों को उस स्थान पर छत बनाने नहीं दी गई जहां वे पिछले 50 सालों से नमाज़ पढ़ रहे थे। और इस तरह के अनेक उदाहरण हैं। देश भर में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं। मुसलमानों को 'लवजिहाद' करने का दोषी ठहराया जाता हैए उन्हें आतंकवादी बताया जाता है, उन्हें उनकी खानपान की आदतें बदलने पर मजबूर किया जाता है और हिंदू संगठनों के कई नेता उन्हें यह याद दिलाते रहते हैं कि गुजरात और मुजफ्फरनगर फिर से हो सकते हैं। स्वाधीन भारत में मुंबई, भिवंडी, अहमदाबाद, मेरठ, अलीगढ, मुरादाबाद, गोधरा, सीतामढ़ी, भागलपुर, नेल्ली व अन्य स्थानों पर हुए दंगों में कम से कम 40,000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं, उनके परिवारजनों को न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है और जब तीस्ता सीतलवाड जैसी मानवाधिकार कार्यकर्ता, गुजरात के सन 2002 के दंगा पीडि़तों को न्याय दिलवाने की पहल करती हैं तो राज्यतंत्र उन्हें जेल में डालने की कोशिश में जुट जाता है और उन्हें देश का दुश्मन बताया जाता है।
निःसंदेहए देश के कई बड़े अपराधी मुसलमान थे व हैं। इनमें हाजी मस्तान, करीम लाला, दाउद इब्राहिम व टाईगर मेमन जैसे लोग शामिल हैं। हम यह भी नहीं कहते कि जिन मुस्लिम युवकों पर पुलिस आतंकवादी होने का आरोप लगाती है, वे सभी निर्दोष हैं। परंतु साथ ही, यह मानना भी भूल होगी कि चूंकि पुलिस उन्हें आतंकवादी मानती है इसलिए वे आतंकवादी हैं। बड़ी संख्या में निर्दोष युवकों को आतंकी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें सालों तक ज़मानत नहीं मिलती और वे जेलों में सड़ते रहते हैं। बाद में अदालतें उन्हें निर्दोष बताकर बरी कर देती हैं। वे जब वापस आते हैं, तब तक उनके जीवन के सुनहरे साल निकल चुके होते हैं। कई बार उनकी पढ़ाई अधूरी छूट जाती है और उनका रोज़गार जाता रहता है। जब समुदाय को ऐसा लगता है कि उसे न्याय नहीं मिलेगा,तो कई युवक अपने स्तर पर, कानून की हदों से बाहर जाकर प्रतिशोध लेने के लिए निकल पड़ते हैं। उनके इस कदम से समुदाय का बड़ा हिस्सा असहमत नहीं होता और कुछ लोग उनसे सहानुभूति भी रखते हैं।
सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों को सांप्रदायिक राजनीति का विरोधी होने का दावा करने वाली'धर्मनिरपेक्ष पार्टियों' जैसे कांग्रेस, राजद, सपा आदि के शासन में भी न्याय नहीं मिला। इसके अलावा, हिंदू राष्ट्रवादी संगठन और भाजपा नेता, लगातार सार्वजनिक विमर्श में सांप्रदायिकता का रंग घोलते आ रहे हैं। अपनी जातिगतए भाषायी व सांस्कृतिक विभिन्नता और अलग.अलग राजनैतिक वफादारियों के बावजू़द, पूरा मुस्लिम समुदाय ऐसा महसूस करता है कि वह निशाने पर है और चाहता है कि कोई ऐसा शक्तिशाली नेता उभरे, जो उन्हें राजनैतिक दृष्टि से एक करे व सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक न्याय दिलवाए।
मजलिस.ए.इत्तेहादुल मुस्लीमीन के नेता अकबरूद्दीन ओवैसी, इस स्थिति का लाभ उठाकर मुसलमानों के 'मजबूत नेता' और उसके एकमात्र प्रवक्ता के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। वे बहुत होशियारी से इस तरह की बातें करते हैं जो कानून या संविधान के विरूद्ध नहीं होतीं परंतु जिनकी मदद से वे मुस्लिम समुदाय की अन्याय का शिकार होने की भावना का लाभ उठा सकते हैं। वे हर उस पार्टी का विरोध करते हैं जो मुस्लिम समुदाय का समर्थन पाने की कोशिश करती है। वे केवल हैदराबाद तक सीमित अपनी पार्टी को अखिल भारतीय विस्तार देना चाहते हैं और सभी मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के इच्छुक हैं। उन्हें लगता है कि वे देश की सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और मुसलमानों के हित के लिए काम करने वाले संगठनों का स्थान ले लेंगे। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय किसी मुस्लिम पार्टी का समर्थक बन जाता है तो इससे एक ओर हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को लाभ होगा तो दूसरी ओर, मुसलमानों की अशरफ बिरादरियों ;जातियोंद्ध के राजनैतिक श्रेष्ठिवर्ग को। सांप्रदायिक एजेंडे के आधार पर मुसलमानों को एक करने का प्रयास, संविधान में निहित समानता व सामाजिक न्याय और आर्थिक.शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के एजेंडे को हाशिए पर धकेल देगा और उसे अप्रासंगिक बना देगा।
जनाज़े में भीड़
याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह मानना मूर्खता होगी कि जो लोग जनाज़े में शामिल थे, वे 12 मार्च 1993 के बम धमाकों.जिनमें 257 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं.को उचित मानते हैं या उन्हें इन बम धमाकों के पीडि़तों से कोई सहानुभूति नही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन लोगों ने याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में भाग लिया, वे सभी ये चाहते हैं कि बंबई श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के याकूब मेमन सहित सभी दोषियों को उनके किए की सज़ा मिलनी चाहिए। परंतु उनका यह भी मानना है कि मेमन, मौत की सज़ा का हकदार नहीं था और ऐसे कई गैर.मुसलमान भी हैं, जिनकी यही मान्यता थी। कुछ लोग, जो मौत की सज़ा के खिलाफ हैं, उनका यह तर्क था कि याकूब मेमन ने आत्मसमर्पण किया था और जांच एजेंसियों को षड़यंत्र और षड़यंत्रकर्ताओं के बारे में सारी जानकारियां दी थीं इसलिए उसे कम सज़ा दी जानी चाहिए थी। दूसरी ओर, जो लोग मौत की सज़ा के पक्षधर हैं उनका  तर्क था कि 257 लोगों की मौत के लिए जि़म्मेदार अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए और चूंकि याकूब षड़यंत्रकारियों में शामिल था, इसलिए वह मौत की सज़ा का हकदार था। स्पष्टतः, जब मेमन को फांसी दिए जाने के समर्थकों और विरोधियों . दोनों में मुसलमान व हिंदू शामिल थे तब केवल मुसलमानों को दोषी ठहराने का क्या अर्थ है।
अगर हमें भारत के स्वप्न को जिंदा रखना है तो सभी भारतीयों को एक होकर ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो समुदाय, जाति, राष्ट्रीयता, नस्ल, लिंग व भाषा आदि का विचार किए बगैर, सब के साथ न्याय करें। हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को . चाहे वे किसी भी जातिए धर्म, लिंग या नस्ल के हों . आगे बढ़ने में मदद करें और हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण भी करना होगा जो किसी लिंग, जाति, समुदाय या धर्म विशेष के लोगों के साथ हो रहे अन्याय को अनदेखा न करें। हमारे देश की सरकारें ऐसी होनी चाहिए जो जनता के प्रति जवाबदेह और जि़म्मेदार हों। अपराधों में कमी लाने का एक ही तरीका है.न्यायपूर्ण समाज का निर्माण। ज़ुल्म और उत्पीड़न से केवल 'नायकों' का जन्म होता है और हिंसा व प्रतिहिंसा के दुष्चक्र का। अगर न्याय नहीं होगा तो सज़ाएं चाहें कितनी भी कड़ी क्यों न हों, यह क्रम जारी रहेगा।
-इरफान इंजीनियर

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (27-08-2015) को "धूल से गंदे नहीं होते फूल" (चर्चा अंक-2080) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'