सोमवार, 24 अगस्त 2015

कोहिनूर जैसा प्याज



साभार
सन 2019 में भारत के किसी मोहल्ले का एक दृश्य। एक घर में मोहल्ले की चार-पांच महिलाएं बैठी पारंपरिक ढंग से गपिया रही हैं। गपियाने के लिए उन्हें न किसी मुद्दे की तरकार थी, न किसी किसी प्रसंग की। उनकी गपगोष्ठी तो राह चलते भी हो जाया करती थी। दो या तीन महिलाओं को बाजार जाना हो, तो वे पूरे रास्ते में ही इस पुनीत कार्य को अंजाम दे देती थीं। इसके लिए उन्हें न तो संसद जैसी कार्यप्रणाली की जरूरत थी, न पक्षी-विपक्षी सांसदों की, जो एक सुर में तो जैसे बोलना ही नहीं जानते। हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा मचाने के लिए ही जैसे संसद जाते हों। बाकी जगह शोर-शराबा मचाने पर जैसे रोक लगी हुई हो। 
हां, तो बात हो रही थी एक घर में महिलाओं के गपियाने की। तो आपके बता दें कि गपियाने के लिए बैठी महिलाओं के बीच शीशे के एक केस में रखा लगभग एक सौ पचहत्तर ग्राम का लाल सुर्ख प्याज अपने भाग्य पर इतरा रहा था। एक महिला ने प्याज को प्यार से निहारते हुए कहा, 'बहन! कितने में पड़ा यह कोहिनूर जैसा प्याज?'
प्याज की मालकिन ने इतराते हुए कहा, 'दीपो की मम्मी...दो सौ तीस रुपये पाव बिक रहा है इन दिनों प्याज। पौने दो सौ ग्राम प्याज का दाम हिसाब लगाकर देख लो। दुकानदार तो हमें लूट ही लेता...वह तो कहो, मेरी चतुराई काम आ गई। मैंने दुकानदार को डपट दिया। हमें कोई नंगा भूखा समझ रखा है क्या? हफ्ते में एकाध दिन हम भी पचास ग्राम प्याज खाते हैं। ठीक..ठीक बताओ। तब जाकर उस नासपीटे ने प्याज के सही दाम लगाए। सल्लू के पापा तो..तुम जानती ही हो बहिनी..एकदम चुगद हैं। आटे भरी बोरी समझो उनको..जिसको जिधर उठाकर रख दिया, तो वैसे ही पड़े रहते हैं। तीन-पांच तो उन्हें जैसे आता ही नहीं है। मेरी बात पर तो सल्लू के पापा बस बिटर-बिटर खड़े मेरा मुंह ताकते रहे।' यह कहकर महिला सांस लेने के लिए रुकी।
दीपो की मम्मी कुछ बोलने का प्रयास करें, उससे पहले ही मिसेज गुप्ता बोल बैठीं, 'प्याज भी तो देखो...कितना सुर्ख है! लगता है, नासिक वाला है। एक बात कहूं, नासिक वाले प्याजों में एक अजीब-सी गंध आती है। मुझे तो उत्तर प्रदेश वाले प्याज ही अच्छे लगते हैं। मैं तो दो महीने पहले दो सौ पंद्रह ग्राम प्याज लाई थी। नासपीटे दुकानदार ने उत्तर प्रदेश वाला बताकर नासिक का प्याज थमा दिया।' 
मिसेज गुप्ता की बात पूरी हो पाती इससे पहले ही मिसेज चौहान बोल उठीं, 'चल झूठी कहीं की...साल में दो बार ही दीपावली और होली पर तेरे घर में प्याज आता है। कहती है कि दो महीने पहले प्याज लाई थी। यह तो हम लोग हैं, जो हर हफ्ते प्याज खाना अफोर्ड कर सकते हैं।'
दरअसल मिसेज गुप्ता और मिसेज चौहान में दो दिन पहले ही बच्चों को लेकर खूब झगड़ा हुआ था। ऐसे में मिसेज गुप्ता को नीचा दिखाने का अवसर भला मिसेज चौहान कैसे चूक जातीं। यह गप गोष्ठी की एक और खासियत थी। आते वक्त तो सब बड़े प्रेम भाव से पगी हुई रहती हैं, लेकिन जब जाती हैं, तो परनिंदा रस का आस्वादन करके ही। इसके बिना तो जैसे गपगोष्ठी पूरी ही नहीं होती है।
'हां...हां, तू ही तो मोहल्ले में सबसे बड़ी धन्ना सेठ है। बाकी सब भिखारी बसे हैं। दो महीने पहले ही तो दीपावली थी। मैंने इसमें गलत क्या कहा था। अरे, भूल गई जब तेरा बड़ा दामाद आया था, तो प्याज की पहली परत तुझे उधार दी थी। तब से आज तक उधार तो वापस कर नहीं सकीं। बड़ी आई है... हर हफ्ते प्याज खाने वाली।' इतना कहकर मिसेज गुप्ता उठी और अपने घर चली गईं।
तभी अंदर से मर्दाना आवाज आई, 'तुम्हारी यह प्याज प्रदशर्नी कब तक चलेगी? इतनी देर से प्याज खुले में रखा है। कहीं सड़ गया, तो समझ लेना। तलाक देकर ही छोड़ूंगा।' प्याज की मालकिन ने शो केस सहित प्याज उठाया और यह कहते हुए अंदर रख दिया, 'बहन! अब आप लोग चलें, मुझे काफी काम करना है।' इसी के साथ वह महिला गप संगोष्ठी खत्म हो गई।
- अशोक मिश्र
mo-- 9811674507

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-08-2015) को "कहीं गुम है कोहिनूर जैसा प्याज" (चर्चा अंक-2079) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'