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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

संसद को झूठ बोलने का मंच मत बनाएं !

भारतीय संसद में सरकार के मंत्री या प्रधानमंत्री जो भी बातें बोलते हैं. वह यह माना जाता है कि वह सत्य हैं किन्तु वर्तमान सरकार के मंत्री जब संसद के दोनों सदनों में बोलते हैं तो सम्बंधित व्यक्तियों द्वारा उसका खंडन आ जाता है. यह भारतीय संसदीय परंपरा के लिए अच्छी बात नही है. हैदराबाद के केन्द्रीय विश्व विद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर बोलते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी ने कई तथ्यों को जान बूझकर छिपाते हुए गलत बयानी की. उनकी गलत बयानी के सम्बन्ध में मृतक परिवार के सदस्यों ने कहा कि मानव संसाधन व विकास मंत्रालय द्वारा विश्व विद्यालय को भेजी गयी चिट्ठियों में रोहित वेमुला को देशद्रोही व कट्टरपंथी कहा गया है जो पूर्णतया गलत बात है. यह बातें किस आधार पर कही गयी हैं. वहीँ उसका वजीफा न रोकने की बात संसद में कही गयी है जबकि वास्तविकता यह है कि रोहित को सात माह से वजीफा नहीं दिया गया था. 
   केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और स्मृति ईरानी ने यह भी कहा था कि रोहित वेमुला दलित नहीं है जबकि उसके जाति प्रमाण पत्र से यह साबित होता है की वह शेड्यूल कास्‍ट सेसम्बंधित था.
प्रधानमंत्री मोदी ने रोहित वेमुला की मृत्यु के बाद बड़े भावनात्मक तरीके से कहा था कि देश ने अपना लाल खोया है और उसी लाल को देशद्रोही व कट्टरपंथी कहना इनकी नागपुरी चाल का एक हिस्सा है. 
          संसद में और संसद के बाहर केंद्र सरकार के मंत्री झूठ बोलने और अफवाहबाजी फैलाने का काम कर रहे हैं. संसद का इस्तेमाल भी यह लोग नागपुरी चालों के हिसाब से चलाकर संसद की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं. संसद की विश्वसनीयता को समाप्त करने का मतलब है की देश के अन्दर लोकतंत्र को समाप्त कर देने की कोशिश की जा रही है.

सुमन 

सोमवार, 24 अगस्त 2015

कोहिनूर जैसा प्याज



साभार
सन 2019 में भारत के किसी मोहल्ले का एक दृश्य। एक घर में मोहल्ले की चार-पांच महिलाएं बैठी पारंपरिक ढंग से गपिया रही हैं। गपियाने के लिए उन्हें न किसी मुद्दे की तरकार थी, न किसी किसी प्रसंग की। उनकी गपगोष्ठी तो राह चलते भी हो जाया करती थी। दो या तीन महिलाओं को बाजार जाना हो, तो वे पूरे रास्ते में ही इस पुनीत कार्य को अंजाम दे देती थीं। इसके लिए उन्हें न तो संसद जैसी कार्यप्रणाली की जरूरत थी, न पक्षी-विपक्षी सांसदों की, जो एक सुर में तो जैसे बोलना ही नहीं जानते। हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा मचाने के लिए ही जैसे संसद जाते हों। बाकी जगह शोर-शराबा मचाने पर जैसे रोक लगी हुई हो। 
हां, तो बात हो रही थी एक घर में महिलाओं के गपियाने की। तो आपके बता दें कि गपियाने के लिए बैठी महिलाओं के बीच शीशे के एक केस में रखा लगभग एक सौ पचहत्तर ग्राम का लाल सुर्ख प्याज अपने भाग्य पर इतरा रहा था। एक महिला ने प्याज को प्यार से निहारते हुए कहा, 'बहन! कितने में पड़ा यह कोहिनूर जैसा प्याज?'
प्याज की मालकिन ने इतराते हुए कहा, 'दीपो की मम्मी...दो सौ तीस रुपये पाव बिक रहा है इन दिनों प्याज। पौने दो सौ ग्राम प्याज का दाम हिसाब लगाकर देख लो। दुकानदार तो हमें लूट ही लेता...वह तो कहो, मेरी चतुराई काम आ गई। मैंने दुकानदार को डपट दिया। हमें कोई नंगा भूखा समझ रखा है क्या? हफ्ते में एकाध दिन हम भी पचास ग्राम प्याज खाते हैं। ठीक..ठीक बताओ। तब जाकर उस नासपीटे ने प्याज के सही दाम लगाए। सल्लू के पापा तो..तुम जानती ही हो बहिनी..एकदम चुगद हैं। आटे भरी बोरी समझो उनको..जिसको जिधर उठाकर रख दिया, तो वैसे ही पड़े रहते हैं। तीन-पांच तो उन्हें जैसे आता ही नहीं है। मेरी बात पर तो सल्लू के पापा बस बिटर-बिटर खड़े मेरा मुंह ताकते रहे।' यह कहकर महिला सांस लेने के लिए रुकी।
दीपो की मम्मी कुछ बोलने का प्रयास करें, उससे पहले ही मिसेज गुप्ता बोल बैठीं, 'प्याज भी तो देखो...कितना सुर्ख है! लगता है, नासिक वाला है। एक बात कहूं, नासिक वाले प्याजों में एक अजीब-सी गंध आती है। मुझे तो उत्तर प्रदेश वाले प्याज ही अच्छे लगते हैं। मैं तो दो महीने पहले दो सौ पंद्रह ग्राम प्याज लाई थी। नासपीटे दुकानदार ने उत्तर प्रदेश वाला बताकर नासिक का प्याज थमा दिया।' 
मिसेज गुप्ता की बात पूरी हो पाती इससे पहले ही मिसेज चौहान बोल उठीं, 'चल झूठी कहीं की...साल में दो बार ही दीपावली और होली पर तेरे घर में प्याज आता है। कहती है कि दो महीने पहले प्याज लाई थी। यह तो हम लोग हैं, जो हर हफ्ते प्याज खाना अफोर्ड कर सकते हैं।'
दरअसल मिसेज गुप्ता और मिसेज चौहान में दो दिन पहले ही बच्चों को लेकर खूब झगड़ा हुआ था। ऐसे में मिसेज गुप्ता को नीचा दिखाने का अवसर भला मिसेज चौहान कैसे चूक जातीं। यह गप गोष्ठी की एक और खासियत थी। आते वक्त तो सब बड़े प्रेम भाव से पगी हुई रहती हैं, लेकिन जब जाती हैं, तो परनिंदा रस का आस्वादन करके ही। इसके बिना तो जैसे गपगोष्ठी पूरी ही नहीं होती है।
'हां...हां, तू ही तो मोहल्ले में सबसे बड़ी धन्ना सेठ है। बाकी सब भिखारी बसे हैं। दो महीने पहले ही तो दीपावली थी। मैंने इसमें गलत क्या कहा था। अरे, भूल गई जब तेरा बड़ा दामाद आया था, तो प्याज की पहली परत तुझे उधार दी थी। तब से आज तक उधार तो वापस कर नहीं सकीं। बड़ी आई है... हर हफ्ते प्याज खाने वाली।' इतना कहकर मिसेज गुप्ता उठी और अपने घर चली गईं।
तभी अंदर से मर्दाना आवाज आई, 'तुम्हारी यह प्याज प्रदशर्नी कब तक चलेगी? इतनी देर से प्याज खुले में रखा है। कहीं सड़ गया, तो समझ लेना। तलाक देकर ही छोड़ूंगा।' प्याज की मालकिन ने शो केस सहित प्याज उठाया और यह कहते हुए अंदर रख दिया, 'बहन! अब आप लोग चलें, मुझे काफी काम करना है।' इसी के साथ वह महिला गप संगोष्ठी खत्म हो गई।
- अशोक मिश्र
mo-- 9811674507

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

देखो ! घोटालों का बाप

'खाऊंगा ना खाने दूंगा', प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव अभियान में जनता से यही वादा किया था. भ्रष्टाचार उनका सबसे अहम मुद्दा था. यानी ना वो ख़ुद भ्रष्ट होंगे ना अपने इर्द-गिर्द भ्रष्टाचार होने देंगे.लेकिन यह बात पूरी तौर से गलत साबित हो रही है. आज संसद अनिश्चितकालीन के लिए स्थगित हो गयी है और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ललित मोदी मामले का कोई समाधान नहीं हो पाया. प्रधानमंत्री मौनी बाबा-II साबित हुए सदन में वह कुछ कहना नहीं चाहते और जन सभाओं को वह चुनावी सभा समझ कर जो मन में आया कहते रहते हैं.
        उच्चतम न्यायलय में सीबीआई ने हलफनामा देकर कहा है कि मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले के बाद इस घोटाले का बाप मध्यप्रदेश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एडमिशन के लिए होने वाली परीक्षा डीमेट (डेंटल एंड मेडिकल एडमिशन टेस्ट) घोटाला है,  फर्जी डॉक्टर बनाने वाले मप्र डीमेट घोटाले के मामले में देश की सबसे ताकतवर और धारदार जांच ऐजेंसी सीबीआई भी हैरान, परेशान है कि जांच करे तो कैसे। यह इतना बड़ा घोटाला है कि सीबीआई के अफसर भी पसीना-पसीना हो गए। बुधवार को सुप्रीमकोर्ट में पेश हलफनामे में सीबीआई ने माना कि हमारे पास इतने संसाधन और मैनपावर नहीं है, जो डीमेट जैसे घोटाले की जांच कर सकें।
           दस हज़ार करोड़ का यह घोटाला है और डीमेट के जरिये गलत तरीके से अपने बच्चों और रिश्तेदारों को मेडिकल और डेंटल कॉलेज में एडमिशन दिलाने वालों की लिस्ट लंबी है। इनमें नेताओं के अलावा अफसर भी शामिल हैं। चर्चा है कि प्रदेश के पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने बेटी आकांक्षा और अवंतिका का, अजय विश्नोई ने बेटे अभिजीत का, कमल पटेल ने भतीजी प्रियंका और इंदौर की विधायक मालिनी गौड़ ने कर्मवीर गौड़ का दाखिला कराया। कटारे ने कुछ और नाम लिए थे। इनमें स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्र, शिक्षा मंत्री उमाशंकर गुप्ता, पूर्व मंत्री प्रकाश सोनकर, हरनाम सिंह राठौड़, नेहरू युवा केंद्र के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा और पीस कमेटी के अखिलेश पांडे शामिल हैं। 
            प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन घोटालों की तरफ पूरी तरह से आँख मूंदे हैं और उनके आँख मूंदने का मतलब इन बड़े-बड़े घोटालों को संरक्षण देना है अन्यथा अब तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का इस्तीफा हो चुका होता. हमेशा आदर्श, सुचिता, नैतिकता, राष्ट्रवाद, देश भक्ति की फर्जी दुहाई देने वाला देश का संस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत मौनी बाबा का असाधारण रूप धारण किये हुए हैं. देश की एकता और अखंडता को नुक्सान पहुँचाने के लिए हिन्दू,मुसलमान, सिख, ईसाईयों के बीच में वैन्मस्यता कायम करने वाली नीति अपनाता है. उसकी राष्ट्रभक्ति को अमेरिकी वेबसाइट ने उसको आतंकी संगठन घोषित कर रखा है. अमेरिका में उसको आतंकी संगठन घोषित करने के लिए सिखों के संगठन ने न्यायलय में वाद दाखिल कर रखा है. इस तरह से जो चेहरे अपने को सफ़ेद साबित कर रहे थे . अब उन्ही चेहरों पर सबसे ज्यादा कालिख नजर आने लगी है. यूपीए-2 की सरकार ने इतनी बेशर्मी नहीं दिखाई थी जितनी बेशर्मी वर्तमान सत्तारूढ़ दल दिखा रहा है.

सुमन 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

अम्मा, मौसी, नानी के बीच संसद

भारतीय संसद में भ्रष्टाचार के सवाल को लेकर काफी दिनों से अवरोध चल रहा है. प्रधानमंत्री ने मौन धारण कर लिया है. लोकसभा चुनाव के समय गरज-गरज कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात को सिंह गर्जना के रूप में करते थे. आज जब उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भगोड़े अपराधी ललित मोदी की पत्नी के बीमारी को मानवीय बता कर अपने द्वारा किये गए अपराध को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं तो संसद में  प्रधानमंत्री संसद का सामना न कर आरोपी सुषमा स्वराज द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाने का सिलसिला जारी कर रखा है जो संसदीय मापदंड के अनुरूप नहीं है. सदन में अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने कहा कि आखिर ललित मोदी से राहुल गांधी की मौसी को कितने पैसे मिले हैं। 
वहीँ सुषमा स्वराज ने कहा कि अपनी मां से पूछो राहुल की क्वात्रोच्चि मामले में हमने कितना पैसा खाया था, डैडी आपने ऐंडरसन को क्यों छुड़वाया। जैसे आरोप लगाये . मुख्य सवाल यह है कि सुषमा स्वराज स्वयं स्वीकार कर चुकी हैं कि अपराधी ललित मोदी के मामले में उन्होंने मानवीय आधार पर मदद की थी.
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि मानवीय कानून और मानवता का आधार अलग अलग हैं। ललित मोदी ने यूके के बाहर यात्राएं की। वह शादियों और रिजॉर्ट में गया। खड़गे ने कहा,क्या आप ऎसे व्यक्ति को बचाना चाहती हैं जिसने कथित मानवीय आधार पर 460 करोड़ रूपए का घोटाला किया। 
क्षेत्रीय दल पहले सरकार का विरोध करते हुए अचानक पाला बदलते थे और अब भी संसद के आखिरी दिनों में पाला बदलने का खेल शुरू हो रहा है. शोर-शराबा हंगामा होना एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा होता है.
            यू पी ए-2 की सरकार के समय भाजपा के लोग शोर मचा कर संसद नहीं चलने देते थे और आखिरी एक-दो दिन में सरकार बगैर किसी बहस के तमाम सारे विधेयक पास करा लेती थी. जो कॉर्पोरेट सेक्टर के हित में होते थे और मेहनतकश जनता के खिलाफ होते थे और वही खेल मोदी सरकार के समय में खेला जा रहा है. आखिरी दिनों में तमाम सारा विधायी कार्य बगैर किसी बहस के पूरा हो जायेगा . कॉर्पोरेट सेक्टर अपने लाखों-लाख करोड़ रुपये का फायदा पाने के लिए मजदूर किसान विरोधी नयी आर्थिक नीतियों की बुलेट ट्रेन की तरह चला कर लागू कराना चाहती है और इसके लिए उन्होंने सदन के अन्दर सोची-समझी रणनीति के तहत मौनी बाबा-II सदन में चुप रहकर नयी आर्थिक नीति की दुष्प्रभावों की कोई चर्चा न हो. इसीलिए अम्मा, मौसी, नानी के बीच बहस जारी है. 

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

क्या सांप्रदायिक हिंसा विधेयक संसद में प्रस्तुत होगा?

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव, जिनके नतीजे ८ दिसंबर २०१३ को घोषित किए गए, में कांग्रेस की हार के बाद यह कहना मुश्किल है कि सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक २०१३ का क्या होगा। यह विधेयक यूपीए.२ सरकार के कार्यकाल के संसद के आखिरी शीलकालीन सत्र में प्रस्तुत किया जाना था।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने २००४ के अपने चुनाव घोषणापत्र में यह वायदा किया था किए कांग्रेस सांप्रदायिक शांति और सद्भाव को बढ़ावा देने और बनाए रखने के लिए सभी संभव उपाय करेगी, विशेषकर संवेदनशील इलाकों में। वह सभी प्रकार की सामाजिक हिंसा की रोकथाम के लिए एक नया व्यापक कानून बनाएगी, जिसमें केन्द्रीय एजेंसी द्वारा जांच, विशेष अदालतों में अभियोजन और जीवनए सम्मान व संपत्ति के नुकसान के लिए समान दर पर मुआवजे संबंधी प्रावधान होंगे। इस वायदे की पूर्ति के लिए यूपीए.१ सरकार ने सन् २००५ में एक विधेयक प्रस्तावित किया परंतु इसे नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि इसके प्रावधान जरूरत से ज्यादा सख्त हैं।
सन् २००९ के चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने अपने वायदे को दोहराते हुए कहाए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह विश्वास है कि सांप्रदायिक, नस्लीय व जातीय हिंसा के शिकार सभी लोगों को एक न्यूनतम स्तर के मुआवजे और पुनर्वसन का अधिकार है और इस स्तर का मुआवजा देना और पुनर्वसन करना, प्रत्येक सरकार का आवश्यक कर्तव्य है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक ऐसा कानून बनाएगी जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सांप्रदायिक व जातिगत हिंसा के सभी मामलों की जांच और अभियोजन की निगरानी करने का अधिकार होगा। जाहिर है कि दोनों घोषणापत्रों में दंगा निरोधक कानून के संबंध में महत्वपूर्ण अंतर थे। पहला यह कि सामाजिक हिंसा शब्द को ष्सांप्रदायिक, नस्लीय व जातीय हिंसा के रूप में परिभाषित किया गया। सन् २००९ के घोषणापत्र में पीडि़तों के मुआवजा पाने और पुनर्वसन के अधिकार पर जोर दिया गया। जहां सन् २००४ के घोषणापत्र में केन्द्रीय एजेंसी द्वारा जांच की बात कही गई थी वहीं २००९ के घोषणापत्र में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सांप्रदायिक व जातीय हिंसा के सभी मामलों की जांच व अभियोजन की निगरानी करने के अधिकार देने की बात कही गई है।
सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने शांति कार्यकर्ताओं और कानूनविदों से परामर्श कर २०११ में कानून का एक मसविदा तैयार किया। कुछ कमियों के बावजूद, २०११ का मसविदा सही दिशा में एक कदम था। शांति और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम करने वाले अधिकांश संगठनों ने विधेयक का समर्थन किया।
दूसरी ओरए भाजपा और हिन्दुत्व विचारधारा वाले पत्रकारों और लेखकों ने विधेयक के विरूद्ध एक कुटिल दुष्प्रचार अभियान छेड़ दिया। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को गैर.संवैधानिक संस्था बताकर उसकी आलोचना की गई। यद्यपि इस परिषद ने पहले भी अनेक विधेयकों का मसविदा तैयार किया था परंतु उस पर पहली बार हमला बोला गया। बिल की इस आधार पर भी आलोचना की गई कि वह बहुसंख्यक वर्ग के खिलाफ है और उसके प्रावधानों का इस्तेमाल केवल तभी किया जा सकेगा जब अल्पसंख्यक हमले के शिकार हों। आलोचना का तीसरा बिंदु यह था कि विधेयक भारत की संघीय व्यवस्था पर चोट करता है और राज्य सरकारों की शक्तियों पर अतिक्रमण। इस आलोचना का उद्देश्य गैर कांग्रेस दलों की राज्य सरकारों को भड़काना था।
भाजपा की चिंता
भाजपा और संघ परिवार, सांप्रदायिक दंगों के बाद होने वाले ध्रुवीकरण से हमेशा लाभान्वित होते रहे हैं। गुजरात में सन् २००२ के दंगों ने मोदी की सत्ता को मजबूत किया। अधिकतर लोगों का यह मानना है कि इस साल मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के कारण, अगले साल होने वाले आमचुनाव में भाजपा,उत्तरप्रदेश से ज्यादा सीटें जीतेगी। प्रस्तावित विधेयक, शासकीय सेवकों को कर्तव्यपालन में लापरवाही बरतने और अपने अधिकारों का गलत प्रयोग करने या प्रयोग न करने के कारण होने वाली सांप्रदायिक हिंसा के लिए सजा का प्रावधान करता है। उदाहरणार्थ, अगर यह कानून लागू हो गया होता तो सांप्रदायिक तनाव से ग्रस्त मुजफ्फरनगर में हथियारों से लैस लाखों लोगों को जाट महापंचायत में जुटने की इजाजत देने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती थी। इसी तरह, वे सभी पुलिस अधिकारी दंड के भागी होते जिन्होंने गुजरात २००२ के दंगों के पहलेए कारसेवकों की लाशें विहिप नेताओं को सौंपी ताकि वे उन्हें जुलूस में गोधरा से अहमदाबाद ले जा सकें।
कोई भी ऐसा कानून जो सरकारी अधिकारियों को दंगों को रोकने या उन्हें नियंत्रित करने में असफल रहने पर जवाबदेह बनाता है और उन्हें मजबूर करता है कि वे दोषियों को सजा दिलवाएं और जो पीडि़तों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया रखता है.ऐसे किसी भी कानून के बनने से दंगे करवाना मुश्किल और जोखिम भरा हो जाएगा। यही भाजपा की असली चिंता है। जिन आधारों पर भाजपा इस विधेयक का विरोध कर रही है वे मात्र बहाने हैं। पार्टी की असली चिंता कुछ और ही है। आइए, हम भाजपा द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों का परीक्षण करें।
संघीय व्यवस्था का उल्लंघन
राज्यों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप का आरोप लगाने का एक आधार यह था कि मसौदे में पहले राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सांप्रदायिक सद्भाव, न्याय व क्षतिपूर्ति अधिकरण स्थापित किए जाने का प्रस्ताव था। अब ताजा मसविदे में इस अधिकरण के कार्य राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोगों को सौंपे गए हैं। शायद इस परिवर्तन का उद्देश्य यह है कि यह आरोप न लगाया जा सके कि नए कानून के जरिए केन्द्र सरकार, राज्यों के अधिकारक्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है। परंतु यह महत्वपूर्ण है कि प्रस्तावित अधिकरण के अधिकार भी सलाह देने और सिफारिश करने तक सीमित थे। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि अधिकरण को पुलिस के अधिकार होंगे या वह दंड प्रक्रिया संहिता के तहत जांच एजेंसी का काम करेगा। यह काम पहले की ही तरह,देश के आम कानूनों के तहत,पुलिस ही करेगी। ऐसा कोई प्रावधान भी प्रस्तावित विधेयक में नहीं था कि अधिकरण की सलाह या सिफारिशें सरकार पर बंधनकारी होंगी। संघ परिवार राज्य सरकारों और क्षेत्रीय पार्टियों को अकारण डराने का प्रयास कर रहा है।
वैसे भीए संविधान का अनुच्छेद ३५५ कहता है कि संघ का यह कर्तव्य है कि वह ब्राह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाया जाना सुनिश्चित करे। सांप्रदायिक दंगे,आंतरिक अशांति की श्रेणी में आते हैं क्योंकि दंगाग्रस्त क्षेत्र के सभी रहवासियों, विशेषकर अल्पसंख्यकों का जीवन व स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाते हैं। इस तरह की परिस्थितियों में अक्सर संघीय सशस्त्रबलों की तैनाती की जाती है और संघ का यह कर्तव्य होता है कि वह यह सुनिश्चित करे कि राज्य की सरकार संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार चलाई जा रही है।
जब कथित तौर पर आतंकवाद से निपटने के लिए टाडा और पोटा जैसे भयावह कानून बनाए जाते हैं, जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया जाता है या जब नजरबंदी संबंधी कानून बनाए जाते हैंए तब भाजपा उनका समर्थन करती है। भाजपा ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी के गठन का विरोध नहीं किया जबकि उसे आपराधिक मामलों की जांच करने और अदालतों में आरोपपत्र प्रस्तुत करने का अधिकार है। दंगा निरोधक कानून के अंतर्गत जिस अधिकरण के गठन की बात कही गई थी, उसे ये अधिकार नहीं थे। टाडा और पोटा ने कई नए अपराध परिभाषित किए और इन कानूनों के अंतर्गत की जाने वाली कार्यवाही के संबंध में ऐसे प्रावधान किए गए जिससे ढीली ढाली जांच या झूठे सुबूतों के आधार पर भी आरोपियों को दोषी ठहराना आसान हो गया। भाजपा ने इन कानूनों को कभी राज्यों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप या देश के संघीय ढांचे पर चोट करने वाला नहीं बताया। सच यह है कि ये सभी कानून सार्वजनिक व्यवस्था के बारे में हैं और इन सभी ने संवैधानिक चुनौतियों की बाधा पार कर ली है।
हिन्दू विरोधी कानून
ऐसा समझा जाता है कि २०१३ के नए विधेयक में सांप्रदायिक व लक्षित हिंसा के स्थान पर  सांप्रदायिक हिंसा शब्दों का प्रयोग किया जाएगा। विधेयक का जो मसविदा २०११ में तैयार किया गया था, उसके अंतर्गत इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल बलात्कार व अन्य सेक्स अपराधों, किसी समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने,संगठित सांप्रदायिक या लक्षित हिंसा या कानून के अंतर्गत अपराध घोषित किसी भी गतिविधि के लिए आर्थिक या किसी अन्य प्रकार की सहायता देने की स्थिति में भी किया जा सकता था। उसी तरहए इस कानून का इस्तेमाल तब भी हो सकता था जब धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकोंए अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के विरूद्ध लक्षित हिंसा की जाती। यह प्रावधान इसलिए किया गया था क्योंकि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक व अनुसूचित जातियों व जनजातियों के सदस्य अक्सर निशाने पर रहते हैं।
बहुसंख्यक समुदाय ;चाहे वह किसी भी धर्म का हो की उच्च जातियों के सदस्यों की सत्ता प्रतिष्ठानों में पैठ होती है और इसलिए उनकी जाति, धर्म या भाषा के आधार पर उन्हें हिंसा का निशाना बनाए जाने की कम संभावना रहती है। सन् २०११ के विधेयक के प्रावधानों का इस्तेमाल, मुसलमानों या हिन्दुओं.किसी को भी.लक्षित हिंसा का शिकार बनाए जाने पर किया जा सकता था। इसका इस्तेमाल तब भी हो सकता था जब भाषाई अल्पसंख्यक या अनुसूचित जातियों या जनजातियों के सदस्य ;चाहे वे किसी भी धर्म के हों के विरूद्ध हिंसा हो। विधेयक में ऐसा कहीं नहीं कहा गया था कि सांप्रदायिक व लक्षित हिंसा करने वाले समूह किसी धर्म विशेष के ही होने चाहिए। परंतु हिन्दुत्ववादियों ने यह दुष्प्रचार किया कि यह विधेयक हिन्दुओं के विरूद्ध है और उसके अंतर्गत केवल हिन्दुओं को सांप्रदायिक हिंसा करने वाले समूह के रूप में चिन्हित किया गया है। यद्यपि २०१३ के विधेयक में लक्षित हिंसा की बात नहीं कही गई है और किसी भी धर्म के व्यक्ति के विरूद्ध हिंसा को अपराध ठहराया गया है परंतु यह प्रचार जारी है कि विधेयक हिन्दू विरोधी है। न तो २०११ का विधेयक हिन्दू विरोधी था और ना ही २०१३ का है। दोनों ही विधेयक सांप्रदायिक हिंसा करने वालों के विरूद्ध थे जो शांतिए सौहार्द और सार्वजनिक व्यवस्था भंग करना चाहते हैं व दंगों के बाद होने वाले ध्रुवीकरण से लाभ उठाते हैं। ये दोनों ही मसविदे ऐसे लोगों के खिलाफ भी थे जो दंगों में हिंसा करने के बाद भी कानून के पंजे से बचे रहते हैं।
संसद में प्रस्तुत होने वाले प्रस्तावित विधेयक में यह प्रावधान है कि राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग सांप्रदायिक दंगों के दौरान हुई हिंसा से संबंधित मुकदमों की कार्यवाही पर नजर रखेंगे। न्यायिक कार्यवाही को भी पीडि़तों के लिए आसान बनाया गया हैए जैसे इसमे यह प्रावधान है कि एफ.आई.आर. राहत शिविरों में दर्ज की जाएगीं और सरकारी वकीलों की नियुक्तियों में पीडि़तों की राय को महत्व दिया जाएगा। यह व्यवस्था भी है कि मुकदमे, जिस जिले में दंगे हुए हैंए उसके अतिरिक्त किसी दूसरे जिले में चलाए जा सकेंगे।
निष्कर्ष
यूपीए.२ को सांप्रदायिक ताकतों की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए और बिना किसी देरी के नया कानून बनाने के लिए त्वरित कदम उठाने चाहिए। दंगा निरोधक कानून प्रजातंत्र की जड़ों को गहरा करेगा और शांति व सौहार्द की शक्तियों को मजबूती देगा।
निःसंदेह यह विधेयक मूल प्रस्तावित कानून से बहुत कमजोर है और समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग द्वारा इसके दुरूपयोग की संभावना बनी रहेगी।
चिंता का एक अन्य विषय यह है कि राष्ट्रीय वा राज्य अधिकरणों का कार्य राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोगों को सौंपा जा रहा है। कई मानवाधिकार संगठनों की यह शिकायत है कि ये आयोग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं। उनके पास लंबित मामलों की संख्या बहुत हो गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सन् २००२ के गुजरात दंगों के मामले में प्रशंसनीय कार्यवाही की परंतु उसके बाद से उसने दंगों के संबंध में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाए।
.-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 28 अगस्त 2013

पहले बिकेगा सोना और फिर संसद

भारत के राजनेता अमेरिकी नेताओं के जूतों में कीचड़ लग जाने पर उसको साफ़ करने में अपना गौरव समझते हैं उसी कड़ी में ध्वस्त अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लाभ पहुँचाने के लिए कई वर्षों से विभिन्न प्रकार की कोशिशें की जा रही थी जिसका लाभ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को होना शुरू हुआ है. रुपये को डॉलर के मुकाबले और झटका लगा। रुपया डॉलर के मुकाबले अबतक के सबसे निचले स्तर पर चला गया। शुरुआती कारोबार में बुधवार को अमेरिकी डालर के मुकाबले रुपया 118 पैसे की गिरावट के साथ 67.42 प्रति डालर के न्यूनतम स्तर पर आ गया। एक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में यह अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है। अभी और गिरावट होगी पहले बिकेगा सोना और फिर संसद। 
  शेयर मार्किट में सरकारी व इजारेदार कंपनियों द्वारा जुआ खेला जाता है. इस जुए की खास बात यह है कि जुआ विभिन्न बैंको व वित्तीय संस्थानों से ऋण लेकर ही खेल जाता है और हार जीत का परिणाम देश के मत्थे मढ़ दिया जाता है. 
शेयर मार्किट में सिर्फ जुआ ही हो रहा है उद्योगिक उत्पादन, कृषि उत्पादन से इसका कोई सम्बन्ध नही है. उद्योगिक उत्पादन आयत और निर्यात से समझा जा सकता है.  कितना हो रहा है सबको मालूम है ?
          भारत को चाहिए कि तुरंत जिन देशों से उनकी मुद्रा व भारतीय मुद्रा में व्यापार हो सकता है व्यापार करना चाहिए। डॉलर की निर्भरता तुरंत ख़त्म  करनी चाहिए। अमेरिकी साम्राज्यवाद की चापलूसी बंद करनी चाहिए क्यूंकि  जब भी जनता को लाभ देने की बात उठती है विदेशी साजिश के तहत शेयर मार्किट डावांडोल होने लगता है कल्पित मुनाफा व कल्पित हानि से न कुछ बनता है न कुछ बिगड़ता है. हम समृद्ध हैं और शक्तिशाली हैं. हमारे राजनेता जरूर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नौकर हैं.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 14 जुलाई 2013

"इशरत जहां मामले में जांच कर रहे अधिकारी ने कहा, संसद पर हमले की साजिश सरकार ने रची"

Govt behind Parliament attack, 26/11: Ishrat probe officerनई दिल्ली।। होम मिनिस्ट्री के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि इशरत जहां मामले की जांच कर रही सीबीआई-एसआईटी टीम के एक अधिकारी ने तब की सरकारों पर संसद और 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया था।

गृह मंत्रालय के यह अफसर हैं इशरत जहां मुठभेड़ मामले की जांच में सरकार की तरफ से कोर्ट में हलफनामों पर दस्तखत करने वाले अंडर सेक्रटरी आर. वी. एस. मणि। मणि का कहना है कि सीबीआई-एसआईटी टीम के मेंबर रहे सतीश वर्मा ने उन्हें बताया था कि आतंकवाद विरोधी कानून को मजबूत करने के लिए ही संसद और 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों की साजिश रची गई थी।






"आतंकी हमले सरकार ने करानई दिल्ली।। होम मिनिस्ट्री के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि इशरत जहां मामले की जांच कर रही सीबीआई-एसआईटी टीम के एक अधिकारी ने तब की सरकारों पर संसद और 26/11 के मुंबई आतंकी हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया थागृह मंत्रालय के यह अफसर हैं इशरत जहां मुठभेड़ मामले की जांच में सरकार की तरफ से कोर्ट में हलफनामों पर दस्तखत करने वाले अंडर सेक्रटरी आर. वी. एस. मणि। मणि का कहना है कि सीबीआई-एसआईटी टीम के मेंबर रहे सतीश वर्मा ने उन्हें बताया था कि आतंकवाद विरोधी कानून को मजबूत करने के लिए ही संसद और 26/11 के मुंबई आतंकवादी हमलों की साजिश रची गई थी।मणि के मुताबिक वर्मा ने कहा, "13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमला हुआ और उसके बाद पोटा लागू किया गया। फिर 26 नवंबर 2008 के हमला हुआ और उसके बाद UAPA कानून में संशोधन हुआ।"

इस बारे में जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने सतीश वर्मा से बात की तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। गुजरात काडर के आईपीएस अफसर वर्मा ने कहा, "मुझे नहीं पता क्या शिकायत है, किसने की, कब की। न ही मेरी जानने में कोई दिलचस्पी है। ऐसे मामलों में मैं मीडिया से बात भी नहीं कर सकता। आप सीबीआई से पूछिए।" वर्मा इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ की जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम का हिस्सा थे। हाल ही में उनका तबादला हुआ है और वह जूनागढ़ पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल बनाए गए हैं।

मणि फिलहाल शहरी विकास मंत्रालय में भूमि और विकास उप अधिकारी हैं। उन्होंने अपने सीनियर अफसरों को लिखा है कि सतीश वर्मा की बात का जवाब उन्होंने यह कहते हुए दिया कि वर्मा वही कह रहे हैं जो पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी आईएसआई कहती है। मणि के मुताबिक वर्मा ने सरकार की साजिश की बात 22 जून को गांधीनगर में कही थी, जब वह सरकारी हलफनामों के बारे में मणि से पूछताछ कर रहे थे।

मणि ने शहरी विकास मंत्रालय के जॉइंट सेक्रटरी को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि वर्मा ने उन पर एक बयान पर दस्तखत करने के लिए दबाव डाला था। मणि के मुताबिक वर्मा चाहते थे कि मैं बयान दूं कि इशरत जहां मामले में दाखिल किया गया पहला हलफनामा इंटेलिजेंस ब्यूरो के दो अफसरों ने तैयार किया था। मणि ने कहा, "मैं यह अच्छी तरह जानता था कि ऐसा बयान मेरे तत्कालीन सीनियर्स पर झूठे आरोप लगाने जैसा होगा, इसलिए मैंने इस बयान पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया।"

इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले में देश की दो प्रमुख एजेंसियां सीबीआई और आईबी के बीच ठनी हुई है।

 http://navbharattimes.indiatimes.com/india/national-india/govt-behind-parliament-attack-26/11-ishrat-probe-officer/articleshow/21065571.cms

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं






यू.पी.ए-2 अब अल्पमत में है और एसपी, बीएसपी व आरजेडी द्वारा बाहर से दिए जा रहे समर्थन पर उसकी सरकार जिन्दा है। अब से लगभग एक साल बाद, उसे आमचुनाव का सामना करना है। अपने आखिरी साल में सरकार को अपने गठबंधन के साथियों और मित्र दलों के भारी दबाव और खींचातानी का सामना करना पड़ रहा है। यू.पी.ए-2 का सबसे बड़ा दल कांग्रेस, आर्थिक सुधारों के अपने एजेन्डे को लागू करने के लिए बेचैन है। इन सुधारों से मूलतः उच्च आर्थिक वर्ग और कारपोरेट जगत को लाभ मिलेगा, जो कि अपनी संपत्ति व आमदनी में दिन-दूनी, रात-चैगुनी वृद्धि करना चाहता है। इसे ही अर्थशास्त्री व राजनीतिज्ञ आर्थिक प्रगति बता रहे हैं।
क्षेत्रीय क्षत्रप, यू.पी.ए सरकार को जीवनदान देने और मध्यावधि चुनाव टालने के बदले लूट में अपना हिस्सा मांग रहे हैं। नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वह पिछड़े राज्य की परिभाषा पर पुनर्विचार करे, ताकि इन राज्यों की सूची में बिहार शामिल हो सके और वे अपने राज्य के विकास के लिए केंद्र से विशेष पैकेज प्राप्त कर सकें। मुलायम सिंह यादव भी अपने राज्य के लिए अधिक केंद्रीय सहायता प्राप्त करने के लिए रूठने-मनाने का खेल खेल रहे हैं।
यू.पी.ए-2 का गठन, सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबला करने और उन्हें सत्ता से दूर रखने के लिए किया गया था। यू.पी.ए-2 सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और उसे विदेशी निवेशकों के लिए खोलने की दिशा में आक्रामक प्रयास किये। भारतीय बाजार के उदारीकरण और उसमें  कॉर्पोरेट जगत का दबदबा बढ़ने से आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे देशों की कंपनियों को, भारत में निवेश कर, यहाँ की श्रमशक्ति का शोषण करने और यहाँ के बाजार से मुनाफा कमाने का मौका मिला। यह भी सही है कि यू.पी.ए ने सरकार की जवाबदेही बढ़ाने के लिए कुछ कानून भी बनाये यद्यपि अब वह सूचना के अधिकार को सीमित करने का प्रयास कर रही है। कुछ और कल्याणकारी विधिनिर्माण भी हुआ, जिसमें शामिल है खाद्य सुरक्षा अधिनियम। परन्तु इन नए कानूनों को उतने अच्छे ढंग से लागू नहीं किया गया जितना कि किया जा सकता था। विभिन्न घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने यू.पी.ए की छवि को गहरी चोट पहुंचाई।
यद्यपि यू.पी.ए का गठन फिरकापरस्ती से लड़ने के लिए किया गया था तथापि उसने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। फर्जी मुठभेड़ों में मुसलमानों को मारने का सिलसिला जारी रहा। कांग्रेस-शासित राज्यों में भी, हर बम धमाके के बाद, बिना किसी सुबूत के, बड़ी संख्या में मुसलमान  युवकों को गिरतार किया जाता रहा। जांच खत्म होने तक इंतजार करना तो दूर की बात रही, जांच शुरू होने से पहले ही आतंकी हमलों के लिए मुसलमानों को दोषी करार दे देना आम बात बनी रही। अफजल गुरु को चोरी-छुपे फांसी दे दी गयी ताकि वह फांसी में विलम्ब के आधार पर, अपनी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की अपील न कर सके। उसे उसके कानूनी अधिकारों से वंचित किया गया। अफजल गुरु को जल्दी से जल्दी फांसी देने की मांग सांप्रदायिक ताकतें कर रहीं थीं। धुले में दंगों के दौरान, पुलिस ने निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया। असम में हिंसा में 70 से अधिक लोग मारे गए और 4 लाख को अपने घरबार छोड़ कर भागना पड़ा। अभी भी बोडोलैंड में मुसलमान स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं।
यूपीए शासनकाल में मुसलमानों और ईसाईयों के साथ भेदभाव जारी रहा और वे दूसरे दर्जे के नागरिकों का जीवन बिताने पर मजबूर रहे। सच्चर समिति की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया और केवल प्रधानमंत्री के 15-सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत, बहुत मामूली राशि, अल्पसंख्यकों के अत्यंत गरीब तबके को उपलब्ध करवाई गई। यह वह तबका है जिसे अपने ही समुदाय में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है। अल्पसंख्यक-बहुल जिलों के विकास के लिए धनराशि तो आवंटित की गई परंतु इससे अल्पसंख्यकों को कोई खास लाभ नहीं पहुंचा क्योंकि गलत नीतियों और पर्यवेक्षण की कमी के कारण, इस धनराशि को उन जिलों में अन्य विकास कार्यों पर खर्च कर दिया गया। मुस्लिम-बहुल इलाकों में शैक्षणिक संस्थाओं की कमी और गरीबी के चलते मुसलमान, शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े बने रहे। यूपीए ने साम्प्रदायिक दंगे और चिन्हित हिंसा रोकने के लिए कानून बनाने के अपने चुनावी वायदे को इस तथ्य के बावजूद पूरा नहीं किया कि राष्ट्रीय सलाहकार  परिषद ने इस कानून का एक मसविदा तैयार कर दिया था।
कांग्रेस पर यह आरोप भी है कि उसने राज्यों की शक्तियों और अधिकारों पर अतिक्रमण किया और देश के संघीय ढांचे को कमजोर किया। एनआईए व एनसीटीसी का गठन इसी दिशा में उठाया गया कदम था। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में लिए गए निर्णय भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण थे। यूपीए के कुछ गठबंधन साथियों ने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि वह उनके हितों को नुकसान पहुंचा रही है।
दोनांे बड़े राजनैतिक गुट-यूपीए 2 और एनडीए-परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान यूपीए का हुआ है। छोटे दल अपने मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए ऐसी मांगें कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना असंभव है। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के छोटे दलों की विरोधाभासी मांगों के बीच संतुलन स्थापित करने की हर संभव कोशिश के बाद भी, असंतुष्ट दलों और व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। परंतु इस संदर्भ में हमें यह भी याद रखना होगा कि एनडीए जब शासन में आई थी तब वह 23 पार्टियों का गठबंधन थी परंतु जब वह सत्ताच्युत हुई, तब उसमें मात्र 6 पार्टियां बचीं थीं।
यूपीए-2 से टीआरएस ने स्वयं को इसलिए अलग कर लिया क्योंकि उसका मानना था कि कांग्रेस, तेलंगाना राज्य की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। तमिलनाडू में चुनाव के ठीक पहले, एमडीएमके ने गठबंधन को इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि उसकी शिकायत थी कि डीएमके उसे पर्याप्त सीटें नहीं दे रही है। पीडीपी ने कांगे्रस का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन कर लिया। मुस्लिम इत्तेहादुल मुसलमीन इसलिए अलग हो गई क्योंकि उसके विचार में कांग्रेस, साम्प्रदायिक हो गई थी। टीएमसी और झारखण्ड विकास मोर्चा ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि के मुद्दों पर यूपीए से नाता तोड़ लिया। और अभी हाल में, डीएमके ने यूपीए से अलग होने की घोषणा कर दी क्योंकि वह श्रीलंका सरकार के एलटीटीई के विरूद्ध चलाए गए सैन्य अभियान के दौरान किए गए युद्ध अपराधों के विरोध में, संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग में प्रस्तुत प्रस्ताव पर भारत सरकार के रूख से प्रसन्न नहीं थी।
एनडीए भ्रष्टाचार, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण, देश की सुरक्षा से समझौता और अकुशल शासन के मुद्दों को लेकर यूपीए पर लगातार हमले कर रही है। वह आक्रामक राष्ट्रीयता की हामी है, जिसका उद्धेश्य है आर्थिक और सामाजिक श्रेष्ठिवर्ग, अर्थात उत्तर भारतीय उच्च जाति के पुरूषों, का प्रभुत्व बनाए रखना। एनडीए चाहती है कि दलित, महिलाएं, आदिवासी, श्रमिक व अल्पसंख्यक जो कि शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, वंचित और दमित बने रहें। नितिन गडकरी और येदियुरप्पा के बारे में मीडिया द्वारा किए गए खुलासों से भाजपा का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान कुछ कमजोर पड़ा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं भाजपा को अयोध्या का राम मंदिर फिर से याद आने लगा है। हाल में विहिप ने अहमदाबाद में एक बैठक आयोजित कर राम मंदिर के जिन्न को बोतल से निकालने का भरपूर प्रयास किया।
यद्यपि एनडीए ने प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है तथापि यह साफ है कि चूंकि भाजपा इस गठबंधन का सबसे बड़ा दल है इसलिए उसी का कोई नेता प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होगा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा, नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने की दिशा में बढ़ रही है। परंतु अंततः ऐसा होगा या नहीं, यह केवल समय ही बताएगा। नरेन्द्र मोदी के रास्ते में कई भाजपा नेता और एनडीए के अनेक सदस्य दल रोड़ा बने हुए हैं। नरेन्द्र मोदी ने और अधिक आक्रामक निजीकरण-उदारीकरण नीतियां अपनाने का वायदा किया है, जिनसे विकास के नाम पर मुख्यतः कारपोरेट जगत को लाभ पहुुंचेगा।

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं हैं, यह बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है। परंतु यह भी साफ है कि दोनों दलों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। दोनों उदारीकरण के हामी हैं यद्यपि कांग्रेस ‘मानवीय चेहरे‘ के साथ उदारीकरण की बात करती रही है जिसमें सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा अधिनियम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व दलितों और आदिवासियों के हितार्थ कई अन्य कदम शामिल हैं। कांग्रेस की नीति यह है कि इन योजनाओं के जरिए दलित और आदिवासी नेतृत्व के एक हिस्से को ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा‘ में शामिल कर लिया जाए।
भाजपा ने ‘शाईनिंग इंडिया‘ का अपना नारा त्याग दिया है परंतु उसकी रीति-नीति वही पुरानी है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों का विकास करो, कारपोरेट जगत के हितों को पर्याप्त तरजीह दो और सावरकर की ‘भारत का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण‘ की नीति के अनुरूप, भारतीय समाज को एकसार और संस्कृतनिष्ठ बनाने का प्रयास करो।
दोनों के साम्प्रदायिक एजेन्डा हैं। दोनों साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को बढावा दे रही हैं और दोनों बहुसंख्यक समुदाय का विशेष ध्यान रखती हैं। परंतु इनमें कुछ अंतर भी हैं। भाजपा ने अब तक अपने विस्तारवादी राष्ट्रवाद (अखंड भारत) को त्यागा नहीं है। इस अखंड भारत की सीमाएं, संपूर्ण दक्षिण एशिया और उसके भी आगे तक फैली हुई हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके विस्तारवादी राष्ट्रीय एजेन्डा में अधिक से अधिक पाक-अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल करना है।
कांग्रेस के एकसार राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों को ‘‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’’ में शामिल करने के नारों का ही यह परिणाम है कि अल्पसंख्यक, समाज के हाशिए पर पटक दिये गये हैं। राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल करने का असली अर्थ है विभिन्नताओं को हतोत्साहित करना और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तरह जीने के लिए प्रेरित करना। अधिकारों का केन्द्रीयकरण और देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने की कोशिश भी समाज को एकसार बनाने की नीति के अनुरूप है। विभिन्नता के संरक्षण के लिये बहुवादी और संघीय ढांचा आवश्यक है।
भाजपा, सŸाा के केन्द्रीयकरण, समाज को एकसार बनाने और हिन्दू धर्म के सैन्यीकरण के लिए बल के इस्तेमाल से विभिन्नता को कुचलना चाहती है। इसके लिए वह ‘‘अलगाववादी अल्पसंख्यको’’ और ‘‘राष्ट्रविरोधी अल्पसंख्यकों’’ पर निशाना साध रही है। अल्पसंख्यकों के मुंह पर कालिख पोतने के लिए उन्हें आतंकवादी, कई पत्नियां रखने वाले, राष्ट्रविरोधी और बर्बर बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उनके अस्तित्व मात्र से अन्यों के हितों को खतरा है। ऐसा आरोप लगाया जाता है कि जिस दौर में देश की सŸाा अल्पसंख्यकों के हाथों में थी, उन्होंने हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने की हर संभव कोशिश की। यह भी प्रचारित किया जाता है कि हिन्दुओं और अल्पसंख्यकों के बीच अनवरत् युद्ध जारी है और इस युद्ध का अन्त तभी होगा जब दोनों में से केवल एक समुदाय ही बचेगा। यह भी आरोपित है कि अल्पसंख्यक इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दोनों ही सरकारों के शासनकाल में साम्प्रदायिक दंगे हुए और दोनों ने ही दंगा करने वालों और भड़काने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने में हिचकिचाहट दिखायी। अगर अल्पसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य नफरत फैलाने वाले भाषण देता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाती है। परन्तु यही काम जब बहुसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य करता है तो उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया जाता है। और कई मामलों में तो उसे समर्थन भी मिलता है। कांग्रेस नेतृत्व ने भी कभी इस परिभाषा को साफ शब्दों में खारिज नहीं किया कि हिन्दू-भारतीय वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि, सिन्धु नदी से लेकर हिन्द महासागर के बीच फैली पवित्र भूमि में है।
भाजपा, इससे भी एक कदम आगे बढ़कर अल्पसंख्यक समुदायों के धर्मों को विदेशी धर्म बताती है जो देश के बाहर से आये हैं और इसलिए ‘‘राष्ट्रीय’’ हितों के खिलाफ हैं। कुल मिलाकर, भाजपा और हिन्दुत्ववादी ताकतें, अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मानती हैं। भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति उदारता की सीमा है मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संस्थाओं और चर्च का भारतीयकरण करने की शर्त। राज्यों की भाजपा सरकारें इस तरह के कानून बना रही हैं जिनसे उच्च जातियों की खानपान संबंधित आदतों को पूरे समाज पर थोपा जा सके। शैक्षणिक संस्थाओं में एक धर्म विशेष को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और सभी धर्मों के विद्यार्थियों को इस धर्म  के कर्मकाण्डों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बहाना यह है कि ये कर्मकाण्ड धार्मिक नहीं वरन् सांस्कृतिक और सार्वभौमिक हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में भगवत् गीता की पढ़ाई को इस आधार पर अनिवार्य बना दिया है कि गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है।
हिन्दुत्व, जिसका झंडा भाजपा उठाये हुये है, विचारधारा और नीतियों के स्तर पर प्रजातंत्र, विभिन्नता, बहुवाद और बहुसंस्कृतिवाद के विरूद्ध है। ये सभी मूल्य हमारे संविधान का हिस्सा हैं। भाजपा के लिए आस्था, कानून से बड़ी है। अगर हिन्दुत्ववादियों की चले तो वे आस्था को कानून का आधार बना दें। भाजपा ने यह मांग की थी कि भारतीय संसद एक कानून के जरिए हिन्दुओं की इस आस्था कि भगवान राम ठीक उसी स्थान पर जन्में थे जहां बाद में बाबरी मस्जिद बनायी गई, के आधार पर जमीन के उस टुकड़े को राम मंदिर के निर्माण के लिए हिन्दुओं को सौंपे।
यदि हमें भारत में प्रजातंत्र को जीवित रखना है तो हमें सभी प्रकार की सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों को शिकस्त देनी होगी। सांप्रदायिकता और कट्टरवाद को हराने के बाद ही हम प्रजातंत्र को मजबूती देने और ऐसी संस्थाओं का निर्माण करने में सफल हो सकंेगे जो विभिन्नता और बहुवाद का पोषण करें और जनता के प्रति जवाबदेह हों।
 -इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 12 जून 2012

संसद की हीरक जयंती में आखिर आम जनता कहा है ?




क्या अपने जीवन की बुनियादी व व्यापक समस्याओं को लेकर संसद , विधानसभा पर देश के आम जनगण का आशा - विश्वास बढ़ता -- चडता रहा है या फिर वह दर हकीकत घटता गिरता जा रहा है ?


13 मई 2012 को भारतीय संसद ने 60 साल पूरा किया | संसद के दोनों सदनों ने अपनी हीरक जयंती मनाई | अलग -- अलग रूप में भी और फिर संयुक्त रूप में भी |विभिन्न देशो के राजदूत भी इस संसदीय समारोह में शामिल हुए | संसद से लेकर प्रचार माध्यमो तक में भारतीय संसदीय जनतंत्र के 60 साल स्थायित्व के गीत गाये जाते रहे | लेकिन इस अहम सवाल पर कोई चर्चा नजर नही आई की क्या देश का 60 साल का संसदीय जनतंत्र समाज में खासकर जनसाधारण समाज में जनतंत्र को निरंतर बढाने में अर्थात आम समाज में एकता , समानता व भाईचारगी को बढाने में सफल रहा ? फिर इस सवाल पर कही कोई चर्चा दिखाई नही पड़ी की क्या ६० सालो में देश की आम जनता में संसद व संसदीय जनतंत्र के प्रति विश्वास व आस्था में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है ? क्या अपने जीवन की बुनियादी व व्यापकसमस्याओं को लेकर संसद , विधानसभा पर देश के आम जनगण का आशा -- विश्वास बढ़ता -- चडता रहा है या फिर वह दर हकीकत घटता गिरता रहा है ?

प्रचार माध्यमो में 15 मई 1952 से कार्यरत पहली संसद से लेकर वर्तमान समय के 15 व़ी संसद के बारे में उनके कार्यो के बारे , तब से अब तक के सांसदों के बदलते परिवेश तथा चारित्रिक विशेषताओं आदि के बारे में चर्चाये प्रकाशित होती रही | उदाहरण .यह की पहले संसद में राष्ट्र व जनता के गंभीर समस्याओं मुद्दों पर सारगर्भित बहसे चला करती थी | संसद की बैठके भी नियमित रूप में चला करती थी | उनमे सांसदों की उपस्थिति भी आम तौर पर ठीक ठाक रहती थी | पहले के विपक्षी पार्टियों के नेतागण न केवल उस समय के जाने माने अनुभवी राजनीतिज्ञ थे , अपितु सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के नेताओं की तरह स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिकाये निभाते रहे थे | प्रमुखत:इसी कारण उस समय के सांसदों की आम जनता में गहरी पैठ थी | फिर तब के सांसदों के खासे हिस्से में शिक्षा -- दीक्षा में भारी कमी के वावजूद उनके अनुभव व ज्ञान में खासकर जनसाधारण के प्रति जन संघर्षो , जन समस्याओं के प्रति आज जैसी कमी तो एकदम नही थी | उस दौर के संसद में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ नही थी | जबकि खबरों के अनुसार वर्तमान संसद में 150 सांसद तो घोषित तौर पर अपराधिक मामलो से जुड़े हुए है | बताने की जरूरत नही की ये सांसद किसी एक पार्टी से नही बल्कि वामपंथी पार्टियों को छोडकर एवं विपक्ष की लगभग सभी पार्टियों से जुड़े हुए है | इसलिए ये मामला केवल चन्द दागी सांसदों का नही रह गया है , बल्कि उन दागी व्यक्तियों को माननीय बनाने वाले सभी राजनैतिक पार्टियों का हो गया है |

पहले के और अब के संसदीय कार्य प्रणाली का तीसरा महत्वपूर्ण अन्तर यह है की पहले की संसदीय पार्टिया , महगाई , बेकारी व रोजी रोजगार की समस्याओं के साथ शिक्षा , स्वास्थ्य जैसे जनहित की समस्याओं को संसद से सडक तक उठाया करती थी | आम जनता को इसके लिए आंदोलित करती रहती थी | हड़ताल , धरना , प्रदर्शन आदि के जरिये सत्ता सरकारों पर दबाव डालती रहती थी | आज संसदीय पार्टिया ऐसा कुछ करती नजर नही आ रही है | अब इसकी जगह कभी -- कभी संसदीय शगुफेबाजी , एकदिनी सांकेतिक हड़ताल और वैसे ही शोबाजी वाले धरना -- प्रदर्शन , बाजार बंद व चक्का जाम आदि का चलन बढ़ता जा रहा है | आम जनता के बीच सांसदों विधायको के बारम्बार आने -- जाने मिलने -- जुलने औरउनके दुःख -- दर्द सुनने का पहले का सिलसिला तक ही सीमित होता गया है | इसी का परीलक्षण है की सरकारी बसों आदि में शायद विधायक सीटों पर अब कोई माननीय बैठने नही आता |
पहले की संसद में जमीदारी उन्मूलन कानून से लेकर देश के आधुनिक , औद्योगिक विकास पर खेती -- किसानी के आधुनिक विकास पर लघु एवं कुटीर उद्योग के सुरक्षा व विकास पर , आम जनता के लिए स्थाई कामधंधे आदि के विकास पर बिना दाम के या कम से कम दाम में शिक्षा , स्वास्थ्य आदि की सेवाओं के विकास -- विस्तार पर चर्चा बहस चला करती थी | इसके लिए नीतिया कानून व प्रोग्राम बनाये जाते रहे थे | इसके लिए देश और दुनिया के धनाढ्य वर्गो को सर्वाधिक छूट देने के साथ -- साथ उनकी पूंजियो परीसम्पत्तियों से लेकर उनके औद्योगिक व्यापारिक क्रिया -- कलापों पर " एम् .आर .टी .पी ." व फेरा जैसे नियंत्रणवादी नीतिया व कानून लागू किए जाते रहे थे |
आज की संसद व संसदीय पार्टियों द्वारा खासकर पिछले 15 --20 सालो में देश के तीव्र आधुनिक विकास के नाम पर तथा '' इंस्पेक्टर -- राज '' खत्म करने के नाम पर धनाढ्य वर्गो पर लगे पहले के थोड़े से नियंत्रणकारी नीतियों , कानूनों को बदला व खत्म किया जाता रहा है |इसके लिए हर क्षेत्र में लाभ की गारंटियो केसाथ छूटो अधिकारों के बढाने वाली नीतियों कानूनों को चरणबद्ध रूप से बढाया जाता है |
यह काम पिछले 20 सालो से देश की संसद द्वारा अनुमोदित उदारीकरणवादी वैश्वीकरणवादी , तथा निजीकरणवादी कही जाने वाली विदेशी या अन्तराष्ट्रीय नीतियों के जरिये किया जाता रहा है | फिर इन्ही नीतियों के तहत पहले से लागू जनसाधारण के थोड़े बहुत हितो को काटा -- घटाया जाता रहा है | तब से अब तक की सभी प्रमुख संसदीय पार्टिया केन्द्रीय व प्रांतीय सभी सरकारों में भागीदार बनकर इस काम में सहयोग करती रही है | इन विदेशी या अन्तराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों पर किन्ही पार्टियों का विरोध अगर रहा भी है तो वह चंद क्षेत्रो तक सीमित रहा है या फिर नीतियों के जबानी विरोध व् व्यवहारिक समर्थन के रूप में प्रदर्शित होता रहा है | इसलिए अब संसद में नीतियों कानूनों पर 50 ,60 , 70 के दशक जैसी चर्चाये तथा उन पर संसदीय विरोध प्रदर्शित होने की कोई गुंजाइश नही है | महिला आरक्षण बिल जैसे चन्द उपरी मामलो को छोडकर देश की आर्थिक नीतियों पर उनमे बड़ा विरोध खड़ा होने वाला नही है | इसी का सबूत है की पिछले 15 सालो से देश का केन्द्रीय बजट भी सांसदों द्वारा लगभग बिना चर्चा - बहस के ही पास कर दिया जाता है | देश के जनसाधारण में आज की संसदीय पार्टियों नेताओं में आपसी दूरियों -- रंजिशो -- नोक झोक गाली -- गलौज को इस तरह प्रचारित -- प्रसारित किया जाता रहा है मानो आज की संसदीय पार्टियों में तथा संसद में पहले जैसी एकजुटता नही है | उनमे विरोध ही विरोध है | लेकिन इन प्रचारों के विपरीत सच्चाई यह है की पहले के सांसदों की चर्चाओं बहसों में गंभीर सैद्धांतिक व् व्यवहारिक विरोध प्रकट होते रहते थे | उनमे खासकर कांग्रेस पार्टी , सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों और नेताओं के बीच तथा उनके कार्यकर्ताओं के बीच भी बहसों विरोधो को कही भी देखा -- सुना जा सकता था | उनमे राष्ट्र व राष्ट्र की आम जनता की समस्याओं पर उसके सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं पर तीखी चर्चाये बहस हमेशा ही चलते रहते थे | इसके विपरीत पिछले 20 सालो की संसद में खासकर 1996 के बाद की संसद में बिभिन्न पार्टियों के सांसदों में आपसी सत्ता , स्वार्थी कटुताओं के वावजूद सत्ता स्वार्थी अवसरवादी सहयोग कही ज्यादा बढ़ गया है | आपसी सहयोग से विभिन्न सत्ता स्वार्थी मोर्चा को बनाने के रूप में और फिर विरोधी पार्टियों द्वारा नीतिगत मामलो पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सहयोग समर्थन देने के रूप में यह प्रक्रिया लगातार बढती रही है |
सांसदों के बारे में किन्ही तथ्यगत रूपों से सही टिप्पणीयो के विरुद्ध भी सभी पार्टियों के सांसद एकजुट हो जाते है | वे इसे संसद की अवमानना व अपमान कहकर टिप्पणी देने वाले की ही ऐसी तैसी करने लग जाते है | योग गुरु रामदेव से लेकर अन्य कई लोगो की सांसदों के बारे में टिप्पणीयो पर सभी पार्टियों का यह रुख -- रवैया इस बात का सबूत है की सभी पार्टियों के सांसदों में इल्मी - फ़िल्मी से लेकर अपराधिक रिकार्डधारी तथा गैररिकार्डधारी सांसदों में आपसी सहयोग तथा एकजुटता बढती रही है |परस्पर सहयोग के प्रमुख आधार में निसंदेह: वर्तमान दौर का धनाढ्य वर्गीय वैश्विक सम्बन्ध और उसे बढाने वाली जनविरोधी वैश्वीकरणवादी नीतिया ही है | जिन्हें पिछले बीस सालो से लागू करने का काम सभी संसदीय पार्टियों ने खुले आम किया है | इस आधार पर बनी संसदीय एकता के पीछे देश व दुनिया के धनाढ्य वर्गो के धनाढ्य कम्पनियों के तथा गैर राजनितिक तबको के साथ उच्च वर्गीय राजनीतिको के स्वार्थ हित मौजूद है | क्योंकि इन नीतियों को लागू किए जाने के फलस्वरूप धनाढ्य वर्गो की पूंजियो -- परीसम्पत्तियों में भारी वृद्धि के साथ -- साथ मंत्रियों , सांसदों विधायको के वेतन भत्तो सुविधाओं निधियो आदि में बेतहाशा वृद्धि होती रही है | दूसरी तरफ आम जनता की महगाई बेकारी जैसी समस्याओं संकटों में बेतहाशा वृद्धि होती रही |
देश के संसद की 60 साल हीरक जयंती पर सांसदों से लेकर देश -- दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों द्वारा खुशिया मनाना आपसी एकजुटता दिखाना एकदम स्वाभाविक है | पर उसी संसद द्वारा अनुमोदित जन विरोधी नीतियों के फलस्वरूप तेजी से बढती रही समस्याओं संकटों में घिरते जा रहे जन साधारण को ऐसे संसदीय उत्सव को जले पे नमक जैसा महसूस करना भी एकदम स्वाभाविक है | सांसदों पर तथा संसद पर जनसाधारण के पहले के विश्वासों का टूटना भी स्वाभाविक है |
मुझे नागर्जुन जी की यह कविता याद आ गयी |
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल बाँका कर सकी शासन की बंदूक
-सुनील दत्ता
पत्रकार

सोमवार, 21 नवंबर 2011

संसदीय समितियों का सच



1993 में वैश्वीकरणवादी नीतियों के भारी विरोध के दौर में सांसद निधि तथा संसदीय समितियों के निर्माण आदि ने विरोधी पार्टियों को इन नीतियों का विरोध छोडकर उनका समर्थक बनाने का काम किया था | संसद समितियों के बनने का प्रमुख कारण भी यही है |
विभिन्न मुद्दों , विवादों को लेकर संसदीय समितियाँ बारम्बार चर्चा में आने लगी हैं | अभी हाल में जन लोकपाल विधेयक पर भी संसदीय समिति पुन: चर्चा में आई है | सरकार ने सिविल सोसायटी के सामने जन लोकपाल के सुझाव को संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव किया था |लेकिन अन्ना हजारे के नेतृत्त्व में सिविल सोसायटी के लोग इसे संसद की स्थायी समिति की जगह सीधे संसद में पेश करने की बात उठाते रहे थे | उस दौरान समाचार -पत्रों में ( दैनिक जागरण २८ अगस्त ) संसदीय समितियों के गठन और कार्य - प्रणाली की चर्चा के साथ यह बात भी कही गयी कि सरकार जिस बिल को लटकाना चाहती है , उसे उस मामले से सम्बन्धित समिति के पास भेज देती हैं और बहुतेरे विधेयको को संसदीय समिति में भेजे बगैर संसद से पास करवा लेती हैं | फिर संसदीय समिति के सुझाव को मानना सरकार व संसद के लिए बाध्यकारी भी नही हैं |
इस समय भी संसदीय समितियों के पास कई विधेयक काफी समय से लम्बित पड़े हुए हैं | फिर संसदीय समितियों के लिए किसी विधेयक पर अपना सुझाव व निर्णय देने कई कोई समय सीमा भी नही है | इन संसदीय समितियों के गठन का इतिहास महज 18 साल पुराना है | इसका गठन 1991 में अन्तराष्ट्रीय नयी आर्थिक नीतियों अर्थात उदारीकरणवादी , निजीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी नीतियों को लागू किए जाने के दो साल बाद 1993 में किया गया था |इस समय विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से सम्बन्धित 24 संसदीय समितिया मौजूद हैं |इन संसदीय समितियों में सभी दलो और पार्टियों का प्रतिनिधित्व है |कई संसदीय समितियों के अध्यक्ष , विरोधी पार्टियों के नेतागण है |संसदीय समितियों में ,संसद के विधेयको पर चर्चा सलाह के लिए चूकी सभी संसदीय पार्टियों का प्रतिनिधित्व रहता है , इसलिए इन समितियों को लघु - संसद भी कहा जाता जाता है | संसदीय समितियों का यह विशेषाधिकार है कि, ये जनता से , उसके विभिन्न हिस्सों से और सम्बन्धित विषय के जानकार विशेषज्ञों से किसी विचाराधीन मुद्दों पर राय ले सकती हैं | इस राय - मशविरे के बाद संसदीय समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट संसद के सामने पेश करती हैं | संसदीय समितियों की रचना और कार्य प्रणाली से उपरोक्त सच्चाई यह बात स्पष्ट रूप से साबित करती है कि न तो सरकार हर विधेयक को या किसी विधेयक को संसदीय समितियों के पास भेजने के लिए बाध्य हैं और न ही किसी विधेयक पर संसदीय समितियों की किसी राय को मानने के लिए ही बाध्य है |लेकिन तब तो संसदीय समितियों का कोई उल्लेखनीय महत्व ही नही बनता |यह सही भी है | संसदीय विधेयको को दुरुस्त करने , परिपूर्ण करने और फिर उसे लागू करने और फिर उसे लागू करने या नकार देने के रूप में संसदीय समितियों की कोई अग्रणी आवश्यक अथवा अपरिहार्य भूमिका नही है |लेकिन किसी काम या विधेयक को लटकाने में संसदीय समितिया एक कारगर हथियार जरुर हैं | सरकार ऐसे विधेयको को सम्बन्धित संसदीय समिति को भेज देती हैं और फिर राय मशविरे के साथ संसद में पेश की जाने वाली अपनी रिपोर्ट को लम्बे समय के लिए लटका देती हैं |तब क्या संसदीय समितियों के नाम की लघु - संसद का निर्माण मुख्यत: विभिन्न मुद्दों या विधेयको को लटकाने के लिए ही किया हैं ? यह बात आधी - अधूरी ही सच है | क्योंकि असली सच्चाई तो 1993 के दौर से जुडी है |यह वह दौर था , जब 1991 में नयी आर्थिक नीतियों के लागू किए जाने के बाद उसको राष्ट्र विरोधी , जन विरोधी बताकर उसका संसद से सडक तक विरोध हो रहा था | इसके चलते उन नीतियों के अंतर्गत नये - नये विधेयको , कानूनों को संसद में पास करने में भारी अडचने आने लगी थी | इन्ही अडचनों को दूर करने के लिए दो - तीन प्रमुख काम किए गये | एक तो 1993 में ही अपने - अपने क्षेत्र के विकास के नाम पर ( सांसदों , विधायको में कमीशनखोरी के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाली ) सांसद निधि दीये जाने कि घोषणा कर दी गयी | दूसरे , सांसदों के वेतन भत्तो आदि में वृद्धि कर दी गयी और की जाती रही है | तीसरे संसदीय समितिया बनाकर विरोधी पार्टियों के नेताओं को भी उसकी सदस्यता , अध्यक्षता दे दी गयी | इसके जरिये उनके संसदीय अधिकारों में वृद्धि कर दी गयी | इन व अन्य संसदीय बदलावों के फलस्वरूप भी जन विरोधी विदेशी आर्थिक नीतियों के प्रति 1991 से खड़ा हुआ संसदीय विरोध भी 1995 - 96 तक आते - आते दब गया | सभी संसदीय पार्टिया इन नीतियों को केंद्र से लेकर प्रान्तों तक लागू करने में जुट गयी | एक दूसरे के साथ केन्द्रीय शासन -सत्ता में मोर्चाबद्ध होकर नीतियों के अगले चरण से जुड़े विधेयको , कानूनों को पास कराती रही | ये थी संसदीय समितियों के बनने की परिस्थितिया और उसके कारण | इसलिए अब जबकि सभी संसदीय पार्टिया उन नीतियों और उससे जुड़े विधेयको कानूनों को आगे बढाने में जुट गयी है , तब संसदीय समितिया मुख्यत:किन्ही गैर जरूरी विधेयको को लटकाने के एक माध्यम के रूप में ही नजर आ रही है | लेकिन 1993 में गैर कांग्रेसी सांसदों को इन नीतियों का पक्षधर बनाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं , और वह आज भी जारी हैं|


-सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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