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सोमवार, 6 अगस्त 2012

क्रान्तिकारियो महापुरुषों को जातीय आधार में बाटना खतरनाक है ......

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की सीढिया चढ़ रहे बच्चो के प्रति उनके अभिभावकों और शुभचिंतको का खुश होना एक दम स्वाभाविक है | सफलता की खुशियों में घर परिवार से लेकर मित्रो परिचितों आदि की किसी न किसी रूप में भागीदारी भी जरुर होती है | यह सब स्वाभाविक रूप से पहले भी चलता रहा है और अब भी चल रहा है | हां इन खुशियों का आज जैसा प्रचार माधय्मी प्रदर्शन पहले एक दम नही था |क्योंकि आज से 20 -- 25 साल पहले तक न ही ऐसे प्रचार माध्यम थे और न ही उन सफलताओं का श्रेय अपने कोंचिंग सेंटर या संस्थान को दिलाने लोग थे | बताने की जरूरत नही की ये लोग घर परिवार या मित्र मण्डली से अलग होते हुए भी ऐसे प्रदर्शनों में सबसे आगे रहते है ताकि प्रतिभागियों की सफलता का इस्तेमाल अपने कोचिंग विजनेस के विकास विस्तार में कर सके | इसके अलावा अब सफलता की खुशियों के आयोजनों में एक नए चलन की भी शुरुआत हो गयी है | विभिन्न जातीय संगठनों और उनके पदाधिकारियों द्वारा अपनी जाति के सफल युवको \ युवतियों को सामाजिक रूप से सम्मानित करने की नयी परम्परा चलने लग गयी है परिवारजनों के साथ कोंचिंग सेंटर के टीचर आदि का ऐसे अवसरों पर शामिल होना तो फिर भी किसी बच्चे की सफलता में उनके योगदान का एक परिलक्षण होता है | इसे सफलता प्राप्त किए बच्चे अक्सर अपने माता -- पिता व टीचरों के योगदान के रूप में कबूलते है | पर विभिन्न जातियों के जातीय संगठनों द्वारा अपनी जाति के सफल प्रतिभागियों के सम्मानित किए जाने वाले आयोजनों का कोई औचित्य नही है | अगर कोई औचित्य है तो , शुद्ध रूप से इस्तेमाली है | वह जातीय संगठनों को बढावा देने के लिए इन प्रतिभागियों और उनकी सफलताओं का इस्तेमाल मात्र है | सच्चाई यह है की किसी सफल प्रतिभागी को सफलता की उंचाइयो पर पहुचाने में केवल उसी के धर्म या जाति के लोगो का उसी जाति के टीचरों का या फिर प्रतिभागियों को विभिन्न रूप में मिले अन्य सेवाओं में उसी धर्म जाति के लोगो का हाथ नही होता है | वर्तमान दौर में तो ऐसा कदापि संभव नही है | किसी को सफलता दिलाने में बहुतेरे ज्ञात , अज्ञात लोगो का नीचे से उपर तक के लोगो का हाथ होता है | इसका सम्बन्ध उसके धर्म व जाति या आगे बढकर कहे तो उसके क्षेत्र व राष्ट्र के लोगो तक सीमित नही रहता | उदाहरण आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का लगभग समूचा ज्ञान मुख्यत: यूरोपीय वैज्ञानिकों , विद्वानों खोजकर्ताओं की देन है | इसे हम नकार नही सकते है | इसी तरह से प्रत्यक्ष रूप में परिवार के लोगो , शुभचिंतको टीचरों के योगदान को भी नही नकार सकते लेकिन किसी धर्म जाति विशेष के धार्मिक या जातीयता संगठन के योगदान को जरुर नकारा जा सकता है क्योंकि वह कोई ऐसा योगदान है ही नही | अगर किसी जाति विशेष के साथ उदाहरण दलित जातियों के साथ किसी हद तक ऐसा कुछ रहा भी है तो अब वह उस रूप में बहुत कम है और वह लगातार घटता जा रहा है | इसके वावजूद सफल प्रतिभागियों को लेकर अपने जातीय गौरव , जातीय कल्याण उथान का प्रदर्शन करने में मंचो पर विभिन्न जातियों के अनपढ़ या कम शिक्षित लोग मौजूद रहते है | ऐसे में लोग स्वंय भी जातीय संगठनों द्वारा बन्दन, अभिनन्दन हासिल किए रहते है | यही काम अब जातीय संगठनों के मंचो से स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीदों , क्रान्तिकारियो के साथ किया जाने लगा है | जाति के नाम पर उनकी स्मृतिया मनाने का काम किया जा रहा है | इसके जरिये उन्हें अपनी जाति के ( न की समूचे राष्ट्र व समाज के ) क्रांतिकारी नेता के रूप में परिलक्षित करने का काम किया जा रहा है | यह क्रान्तिकारियो को याद करना तथा उनका अभिनन्दन करना नही है | उनके कद को बढाना भी नही है | बल्कि उन्हें जातीयता के खांचे में डालकर उनके राष्ट्रीय कद को छोटा या संकुचित कर देना है | आखिरकार उनके त्याग , बलिदान विशिष्ट जातीय हितो के दायरे में कदापि सीमित नही होते | वे व्यापक होते है | राष्ट्र व व्यापक समाज के हित में होते है |
सफल प्रतिभागियों के बारे में भी यह बात इस रूप में कही जा सकती है की वे किसी जाति या धर्म के सदस्य के रूप में सफलताए नही अर्जित करते | बल्कि समाज की व्यापक उपलब्धियों के आधार पर तथा विभिन्न धर्म व जाति के लोगो के शाह्ता सहयोग से सफलता पाते रहते है | अत: उन्हें अपने धर्म जाति के रूप में गौरवान्वित करने की चल रही यह परम्परा कत्तई ठीक नही है | बल्कि सफल प्रतिभागियों के या किन्ही क्षेत्र में सफलता अर्जित किए व्यक्तियों के स्वस्थ व जनतांत्रिक विकास की विरोधी है और उसे ग्रसित करने वाली भी है |
-सुनील दत्ता ...........

मंगलवार, 12 जून 2012

संसद की हीरक जयंती में आखिर आम जनता कहा है ?




क्या अपने जीवन की बुनियादी व व्यापक समस्याओं को लेकर संसद , विधानसभा पर देश के आम जनगण का आशा - विश्वास बढ़ता -- चडता रहा है या फिर वह दर हकीकत घटता गिरता जा रहा है ?


13 मई 2012 को भारतीय संसद ने 60 साल पूरा किया | संसद के दोनों सदनों ने अपनी हीरक जयंती मनाई | अलग -- अलग रूप में भी और फिर संयुक्त रूप में भी |विभिन्न देशो के राजदूत भी इस संसदीय समारोह में शामिल हुए | संसद से लेकर प्रचार माध्यमो तक में भारतीय संसदीय जनतंत्र के 60 साल स्थायित्व के गीत गाये जाते रहे | लेकिन इस अहम सवाल पर कोई चर्चा नजर नही आई की क्या देश का 60 साल का संसदीय जनतंत्र समाज में खासकर जनसाधारण समाज में जनतंत्र को निरंतर बढाने में अर्थात आम समाज में एकता , समानता व भाईचारगी को बढाने में सफल रहा ? फिर इस सवाल पर कही कोई चर्चा दिखाई नही पड़ी की क्या ६० सालो में देश की आम जनता में संसद व संसदीय जनतंत्र के प्रति विश्वास व आस्था में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है ? क्या अपने जीवन की बुनियादी व व्यापकसमस्याओं को लेकर संसद , विधानसभा पर देश के आम जनगण का आशा -- विश्वास बढ़ता -- चडता रहा है या फिर वह दर हकीकत घटता गिरता रहा है ?

प्रचार माध्यमो में 15 मई 1952 से कार्यरत पहली संसद से लेकर वर्तमान समय के 15 व़ी संसद के बारे में उनके कार्यो के बारे , तब से अब तक के सांसदों के बदलते परिवेश तथा चारित्रिक विशेषताओं आदि के बारे में चर्चाये प्रकाशित होती रही | उदाहरण .यह की पहले संसद में राष्ट्र व जनता के गंभीर समस्याओं मुद्दों पर सारगर्भित बहसे चला करती थी | संसद की बैठके भी नियमित रूप में चला करती थी | उनमे सांसदों की उपस्थिति भी आम तौर पर ठीक ठाक रहती थी | पहले के विपक्षी पार्टियों के नेतागण न केवल उस समय के जाने माने अनुभवी राजनीतिज्ञ थे , अपितु सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के नेताओं की तरह स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिकाये निभाते रहे थे | प्रमुखत:इसी कारण उस समय के सांसदों की आम जनता में गहरी पैठ थी | फिर तब के सांसदों के खासे हिस्से में शिक्षा -- दीक्षा में भारी कमी के वावजूद उनके अनुभव व ज्ञान में खासकर जनसाधारण के प्रति जन संघर्षो , जन समस्याओं के प्रति आज जैसी कमी तो एकदम नही थी | उस दौर के संसद में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ नही थी | जबकि खबरों के अनुसार वर्तमान संसद में 150 सांसद तो घोषित तौर पर अपराधिक मामलो से जुड़े हुए है | बताने की जरूरत नही की ये सांसद किसी एक पार्टी से नही बल्कि वामपंथी पार्टियों को छोडकर एवं विपक्ष की लगभग सभी पार्टियों से जुड़े हुए है | इसलिए ये मामला केवल चन्द दागी सांसदों का नही रह गया है , बल्कि उन दागी व्यक्तियों को माननीय बनाने वाले सभी राजनैतिक पार्टियों का हो गया है |

पहले के और अब के संसदीय कार्य प्रणाली का तीसरा महत्वपूर्ण अन्तर यह है की पहले की संसदीय पार्टिया , महगाई , बेकारी व रोजी रोजगार की समस्याओं के साथ शिक्षा , स्वास्थ्य जैसे जनहित की समस्याओं को संसद से सडक तक उठाया करती थी | आम जनता को इसके लिए आंदोलित करती रहती थी | हड़ताल , धरना , प्रदर्शन आदि के जरिये सत्ता सरकारों पर दबाव डालती रहती थी | आज संसदीय पार्टिया ऐसा कुछ करती नजर नही आ रही है | अब इसकी जगह कभी -- कभी संसदीय शगुफेबाजी , एकदिनी सांकेतिक हड़ताल और वैसे ही शोबाजी वाले धरना -- प्रदर्शन , बाजार बंद व चक्का जाम आदि का चलन बढ़ता जा रहा है | आम जनता के बीच सांसदों विधायको के बारम्बार आने -- जाने मिलने -- जुलने औरउनके दुःख -- दर्द सुनने का पहले का सिलसिला तक ही सीमित होता गया है | इसी का परीलक्षण है की सरकारी बसों आदि में शायद विधायक सीटों पर अब कोई माननीय बैठने नही आता |
पहले की संसद में जमीदारी उन्मूलन कानून से लेकर देश के आधुनिक , औद्योगिक विकास पर खेती -- किसानी के आधुनिक विकास पर लघु एवं कुटीर उद्योग के सुरक्षा व विकास पर , आम जनता के लिए स्थाई कामधंधे आदि के विकास पर बिना दाम के या कम से कम दाम में शिक्षा , स्वास्थ्य आदि की सेवाओं के विकास -- विस्तार पर चर्चा बहस चला करती थी | इसके लिए नीतिया कानून व प्रोग्राम बनाये जाते रहे थे | इसके लिए देश और दुनिया के धनाढ्य वर्गो को सर्वाधिक छूट देने के साथ -- साथ उनकी पूंजियो परीसम्पत्तियों से लेकर उनके औद्योगिक व्यापारिक क्रिया -- कलापों पर " एम् .आर .टी .पी ." व फेरा जैसे नियंत्रणवादी नीतिया व कानून लागू किए जाते रहे थे |
आज की संसद व संसदीय पार्टियों द्वारा खासकर पिछले 15 --20 सालो में देश के तीव्र आधुनिक विकास के नाम पर तथा '' इंस्पेक्टर -- राज '' खत्म करने के नाम पर धनाढ्य वर्गो पर लगे पहले के थोड़े से नियंत्रणकारी नीतियों , कानूनों को बदला व खत्म किया जाता रहा है |इसके लिए हर क्षेत्र में लाभ की गारंटियो केसाथ छूटो अधिकारों के बढाने वाली नीतियों कानूनों को चरणबद्ध रूप से बढाया जाता है |
। यह काम पिछले 20 सालो से देश की संसद द्वारा अनुमोदित उदारीकरणवादी वैश्वीकरणवादी , तथा निजीकरणवादी कही जाने वाली विदेशी या अन्तराष्ट्रीय नीतियों के जरिये किया जाता रहा है | फिर इन्ही नीतियों के तहत पहले से लागू जनसाधारण के थोड़े बहुत हितो को काटा -- घटाया जाता रहा है | तब से अब तक की सभी प्रमुख संसदीय पार्टिया केन्द्रीय व प्रांतीय सभी सरकारों में भागीदार बनकर इस काम में सहयोग करती रही है | इन विदेशी या अन्तराष्ट्रीय आर्थिक नीतियों पर किन्ही पार्टियों का विरोध अगर रहा भी है तो वह चंद क्षेत्रो तक सीमित रहा है या फिर नीतियों के जबानी विरोध व् व्यवहारिक समर्थन के रूप में प्रदर्शित होता रहा है | इसलिए अब संसद में नीतियों कानूनों पर 50 ,60 , 70 के दशक जैसी चर्चाये तथा उन पर संसदीय विरोध प्रदर्शित होने की कोई गुंजाइश नही है | महिला आरक्षण बिल जैसे चन्द उपरी मामलो को छोडकर देश की आर्थिक नीतियों पर उनमे बड़ा विरोध खड़ा होने वाला नही है | इसी का सबूत है की पिछले 15 सालो से देश का केन्द्रीय बजट भी सांसदों द्वारा लगभग बिना चर्चा - बहस के ही पास कर दिया जाता है | देश के जनसाधारण में आज की संसदीय पार्टियों नेताओं में आपसी दूरियों -- रंजिशो -- नोक झोक गाली -- गलौज को इस तरह प्रचारित -- प्रसारित किया जाता रहा है मानो आज की संसदीय पार्टियों में तथा संसद में पहले जैसी एकजुटता नही है | उनमे विरोध ही विरोध है | लेकिन इन प्रचारों के विपरीत सच्चाई यह है की पहले के सांसदों की चर्चाओं बहसों में गंभीर सैद्धांतिक व् व्यवहारिक विरोध प्रकट होते रहते थे | उनमे खासकर कांग्रेस पार्टी , सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के सांसदों और नेताओं के बीच तथा उनके कार्यकर्ताओं के बीच भी बहसों विरोधो को कही भी देखा -- सुना जा सकता था | उनमे राष्ट्र व राष्ट्र की आम जनता की समस्याओं पर उसके सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पहलुओं पर तीखी चर्चाये बहस हमेशा ही चलते रहते थे | इसके विपरीत पिछले 20 सालो की संसद में खासकर 1996 के बाद की संसद में बिभिन्न पार्टियों के सांसदों में आपसी सत्ता , स्वार्थी कटुताओं के वावजूद सत्ता स्वार्थी अवसरवादी सहयोग कही ज्यादा बढ़ गया है | आपसी सहयोग से विभिन्न सत्ता स्वार्थी मोर्चा को बनाने के रूप में और फिर विरोधी पार्टियों द्वारा नीतिगत मामलो पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सहयोग समर्थन देने के रूप में यह प्रक्रिया लगातार बढती रही है |
सांसदों के बारे में किन्ही तथ्यगत रूपों से सही टिप्पणीयो के विरुद्ध भी सभी पार्टियों के सांसद एकजुट हो जाते है | वे इसे संसद की अवमानना व अपमान कहकर टिप्पणी देने वाले की ही ऐसी तैसी करने लग जाते है | योग गुरु रामदेव से लेकर अन्य कई लोगो की सांसदों के बारे में टिप्पणीयो पर सभी पार्टियों का यह रुख -- रवैया इस बात का सबूत है की सभी पार्टियों के सांसदों में इल्मी - फ़िल्मी से लेकर अपराधिक रिकार्डधारी तथा गैररिकार्डधारी सांसदों में आपसी सहयोग तथा एकजुटता बढती रही है |परस्पर सहयोग के प्रमुख आधार में निसंदेह: वर्तमान दौर का धनाढ्य वर्गीय वैश्विक सम्बन्ध और उसे बढाने वाली जनविरोधी वैश्वीकरणवादी नीतिया ही है | जिन्हें पिछले बीस सालो से लागू करने का काम सभी संसदीय पार्टियों ने खुले आम किया है | इस आधार पर बनी संसदीय एकता के पीछे देश व दुनिया के धनाढ्य वर्गो के धनाढ्य कम्पनियों के तथा गैर राजनितिक तबको के साथ उच्च वर्गीय राजनीतिको के स्वार्थ हित मौजूद है | क्योंकि इन नीतियों को लागू किए जाने के फलस्वरूप धनाढ्य वर्गो की पूंजियो -- परीसम्पत्तियों में भारी वृद्धि के साथ -- साथ मंत्रियों , सांसदों विधायको के वेतन भत्तो सुविधाओं निधियो आदि में बेतहाशा वृद्धि होती रही है | दूसरी तरफ आम जनता की महगाई बेकारी जैसी समस्याओं संकटों में बेतहाशा वृद्धि होती रही |
देश के संसद की 60 साल हीरक जयंती पर सांसदों से लेकर देश -- दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों द्वारा खुशिया मनाना आपसी एकजुटता दिखाना एकदम स्वाभाविक है | पर उसी संसद द्वारा अनुमोदित जन विरोधी नीतियों के फलस्वरूप तेजी से बढती रही समस्याओं संकटों में घिरते जा रहे जन साधारण को ऐसे संसदीय उत्सव को जले पे नमक जैसा महसूस करना भी एकदम स्वाभाविक है | सांसदों पर तथा संसद पर जनसाधारण के पहले के विश्वासों का टूटना भी स्वाभाविक है |
मुझे नागर्जुन जी की यह कविता याद आ गयी |
खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक
-सुनील दत्ता
पत्रकार
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