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शनिवार, 29 अगस्त 2015

मजदूरों के खून से चेहरे की चमक

                                                        धर्म के नाम पर मानव का शोषण करने का यह मामला सदियों
से चल रहा है. हद तो तब हो गयी जब गीता प्रेस के प्रबंधक गण  कहते हैं कि पैसे की कमी नहीं है तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक गीता प्रेस को बचाने के लिए अभियान चलाया जा रहा है . धर्म भीरु और धर्म परायण कोई भी आगे आकर यह कहने के लिए तैयार नहीं है की गीता प्रेस में श्रम कानूनों को लागू करो. मजदूरों को सम्मानजनक वेतन दो जिससे धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन में कोई बाधा न आये. पूँजीवाद मजदूरों के श्रम के शोषण के ऊपर फलता फूलता है उसी तरह से धार्मिक ट्रस्ट ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए मजदूरों को सम्मानजनक जीवन जीने ही नहीं देना चाहते हैं. उसी की चरम प्रणिति गीता प्रेस की ताला बंदी है.
                 हमारे छात्र जीवन में मोतीलाल-श्यामसुंदर लखनऊ की थ्री फेदर्स की अच्छी कापियां बिकती थी जिनके बारे में यह कहा जाता था की भारत सरकार द्वारा गीता प्रेस को किताबें छपने के लिए जो सस्ता कागज मिलता है, उसी को बचाकर यह कापियां तैयार करके बेचा जाता है, अब आगे का अंक गणित स्वयं लगा सकते हैं. 
 गीता प्रेस में काम करने वाले लोगों की संख्या लगभग 500 हैं। जिनमें 185 नियमित स्थाई  हैं और लगभग 315 ठेका और कैजुअल पर काम करते हैं।  शासनादेश दिनांक 24-12-06 जारी होने के बाद न्यूनतम मज़दूरी से अधिक पाने वाले मज़दूरों के मूल वेतन का निर्धारण शासनादेश के पैरा-6 के अन्तर्गत किया जाये। प्रदेश सरकार द्वारा स्पष्ट रूप से आदेश किया गया है कि शासनादेश जारी होने के पूर्व यदि किसी कर्मचारी का वेतन न्यूनतम पुनरीक्षित वेतन से अधिक है, तो इसे जारी रखा जायेगा तथा इसे उक्त न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के अन्तर्गत न्यूनतम मज़दूरी माना जायेगा।
 गीता प्रेस के प्रबन्धन द्वारा सभी कर्मचारियों के मूल वेतन को दो भागों में बाँटकर – एक भाग सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मूल वेतन तथा दूसरे भाग में न्यूनतम से अधिक वेतन को एडहाक वेतन के अन्तर्गत रखा गया और इस एडहाक मूल वेतन पर कोई महँगाई भत्ता नहीं दिया जाता। किसी भी न्यूनतम पुनरीक्षित वेतन शासनादेश में एडहाक वेतन निर्धारण नहीं है। गीता प्रेस द्वारा मूल वेतन पर महँगाई भत्ता न देना पड़े इससे बचने के लिए मूल वेतन के हिस्से में कटौती करके कुछ भाग एडहाक में शामिल कर दिया गया। गीता प्रेस का प्रबन्धन शासनादेश का सीधा उल्लंघन कर रहा है।
  गीता प्रेस में  सभी कर्मचारियों को समान सवेतन 30 अवकाश दिया जाये, क्योंकि साल में किसी को 21 तो किसी को 27 सवेतन अवकाश दिया जाता है जो अनुचित है।  हाथ मशीनों में दबने, कटने और डस्ट आदि से बचने के लिए ज़रूरी उपकरण हो ।
 गीता प्रेस में लगभग 315 मज़दूर ठेके और कैजुअल पर काम करते हैं। इनकी कोई ईएसआई की कटौती नहीं की जाती। इनको  धर्म के नाम पर मज़दूरों की लूट का --- 4500 रुपये वेतन देकर 8000 रुपये पर हस्ताक्षर कराया जाता है। 'सेवा भाव' के नाम पर इनसे एक घण्टे बिना मज़दूरी दिये काम लिया जाता है। उक्त ठेके का काम गीता प्रेस परिसर में तथा प्रेस से बाहर सामने रामायण भवन तथा भागवत भवन नाम के बिल्डिंग में कराया जाता है। वेतन की पर्ची या रसीद तक नहीं दी जाती। ठेके व कैजुअल पर काम करने वाले सभी मज़दूरों को स्थाई करे । परमानेण्ट होने की अवधि से पहले ठेका कानून 1971 के मुताबिक उनको समान काम के लिए समान वेतन, डबल रेट से ओवरटाइम, पीएफ़, ईएसआई, ग्रेच्युटी आदि सभी सुविधाएँ दे  ।
  आसाराम, रामपाल, राधे माँ, रामदेव सहित तमाम सारे धार्मिक ट्रस्ट जनता की आस्था और विश्वास का लाभ उठा कर अपना-अपना व्यापार कर रहे हैं इस व्यापार में कोई कानून नियम, संविधान लागू नहीं हो सकता है क्यूंकि उनके समर्थकों के आस्था और विशवास का मामला होता है. कोई आयुर्वेदिक दवाओं का व्यापारी है तो कोई धार्मिक किताबों का व्यापारी है. यह व्यापार व्यापारिक नियमो से अलग हटकर होता है. मजदूरों का हक़ मारकर इनका व्यापार चलता है. मजदूरों के खून से ही इनके चेहरों के ऊपर सफेदी आती है और जितनी अधिक सफेदी आती है. भक्तगणों की भक्ति और अधिक बढ़ जाती है. यह खेल सदियों से खेला जा रहा है और धर्म का वास्तविक स्वरूप सिर्फ मछली को फ़साने के लिए यह शिकारी चारे के लिए इस्तेमाल करते हैं. धर्म अगर अपने मानने वालों को एक सन्देश यह सिखा दे की इमानदारी जीवन की सबसे अच्छी नीति है तो धर्म का स्वरूप उज्जवलमयी होगा समाज को लाभ भी होगा. 
              धर्म के नाम पर बहुत सारे धन्ना सेठो  से  बड़ी मात्रा में दान और चढ़ावा मिलता है । दैनन्दिनी, पंचांग पोस्टर ,किताबे  देश  और विदेशों में लाखों की संख्या में बिक्री करके  करोड़़ों रुपये की आय अर्जित करते है ।
 धर्म के नाम पर गीता प्रेस को टैक्स में भारी छूट लेता है। जिस तरह से भेड़िया खरगोश को खाने के लिए पाठ पढ़ता है की मेरे नजदीक आओ क्यूंकि  

अयं निज परोवेति गणना लघु चेतसाम .
उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम्..

है. वास्वतिक मंशा यह है की खरगोश उसके नजदीक आये और वह उसका भक्षण कर अपनी क्षुधा को शांत कर सके लेकिन धर्म का स्वरूप यह नहीं है. 

सुमन 

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

धर्म, राजनीति और समाज

धर्म का राजनीति से क्या लेनादेना है? धर्म और हिंसा का क्या संबंध है? वर्तमान समय में, विभिन्न राजनैतिक एजेण्डे कौनसा रूप धर कर हमारे सामने आ रहे हैं?
ऐसा लगता है कि राजनीति ने धर्म का चोला ओड़ लिया है और यह प्रवृत्ति दक्षिण व पष्चिमएशिया में अधिक नजर आती है। अगर हम पिछले कुछ दशकों की बात करें तो धर्म की राजनीति में घुसपैठ की शुरूआत हुई ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के साथ। इसके पहले, मुसादिक की सरकार का तख्ता पलट दिया गया था। मुसादिक, सन् 1953 में प्रजातांत्रिक रास्ते से ईरान के प्रधानमंत्री चुने गए थे। उन्होंने देश  के कच्चे तेल के भंडार का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो, पष्चिम विशेष कर अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों को पसंद नहीं आया क्योंकि इससे उनका मुनाफा प्रभावित हो रहा था। मुसादिक सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद, अमरीका के पिट्ठू शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी गई। इसके बाद हुई एक क्रांति के जरिये अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। खुमैनी और उनके साथी कट्टरवादी इस्लाम के झंडाबरदार थे। उनके सत्ता में आने से पष्चिमी मीडिया में हलचल मच गई और इस्लाम को ‘आने वाले समय का सबसे बड़ा खतरा’ बताया जाने लगा। जहां तक दक्षिण एशिया का सवाल है, पिछले कुछ दशकों में भारत में हिंदू धर्म की पहचान की राजनीति परवान चढ़ी और पाकिस्तान में जिया-उल-हक ने राजनीति का इस्लामीकरण किया। इस्लाम की मौलाना मौदूदी की व्याख्या का इस्तेमाल, जिया-उल-हक ने अपनी सत्ता को मजबूती देने के लिए किया। इसके कुछ समय बाद, म्यंामार में अशिन विरथू जैसे लोगों का उदय हुआ, जिसे बर्मा का बिन लादेन कहा जाने लगा। श्रीलंका में बौद्ध पुरोहित वर्ग ने धर्म के नाम पर राजनीति में घुसपैठ शुरू कर दी। इसी दौर में अमरीका में ईसाई कट्टरवाद का बोलबाला बढ़ा।
न्यूयार्क के डब्ल्यूटीसी टाॅवर पर 9/11 के हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इसके जरिये इस्लाम को आतंकवादी हिंसा के कीचड़ में घसीट लिया गया। तब से लेकर आज तक यह आम धारणा बनी हुई है-बल्कि मजबूत हुई है-कि इस्लाम और मुसलमान, आतंकवादी हिंसा की जड़ में हैं। इस्लाम का राजनीति मे उपयोग और कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करने के कारण इस धारणा को मजबूती मिली और पूरी दुनिया में मुसलमानों की छवि खराब हुई।
लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दर्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित वर्ग उनकी पहचान बन गए और अब भी बने हुए हैं।
सामंती, प्राक्-औद्योगिक समाज में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारियों के बीच गठजोड़ हुआ करता था। पुरोहित वर्ग ने ही इस अवधारणा को प्रस्तुत किया कि राजाओं को शासन करने का दैवीय अधिकार है। यूरोप में राजा और पोप हमराही हो गए, इस्लामिक दुनिया के बड़े हिस्से में नवाब और शाही इमाम में दोस्ती हो गई और हिंदू धर्म के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजा और राजगुरू एक साथ खड़े दिखने लगे। इस गठजोड़ का लाभ यह हुआ कि शासक अब अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में  केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर सकते थे। आश्चर्य  नहीं कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया। अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’ बताता था। इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा  जिहाद करते थे। हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी।
जिन देशों में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई और समाज पर सामंती-पुरोहित वर्ग का शिकंजा ढीला हो गया, वहां धर्म को उसके दायरे में सीमित कर दिया गया। धर्म, हर व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है, यह मान्यता पुष्ट हुई। राज्य सभी नागरिकों को समान दर्जा देने लगा, चाहे उनकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इसके विपरीत, दक्षिण एशिया  में या तो  धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई और या फिर अधूरी रह गई। जमींदारों और पुरोहितों के अस्त होते वर्गों ने जोरशोर से धर्म के नाम पर राजनीति शुरू कर दी। भारत में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक धाराएं उभरीं, जिनको बढ़ावा दिया राजाओं, नवाबों और जमींदारों के एक तबके ने। बाद में शिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इन धाराओं का हिस्सा बन गए। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादी उभरे, जिनका नेतृत्व जिन्ना, सावरकर व गोलवलकर जैसे उच्च शिक्षित श्रेष्ठी वर्ग के सदस्यों के हाथों में था। इन सांप्रदायिक धाराओं ने हमारे औपनिवेषिक षासकों को उनकी ‘‘फूट डालो और राज करो’’ की नीति को लागू करने में मदद की। औपनिवेशिक ताकतें, जो शनैः शनैः साम्राज्यवादी ताकतें बनती जा रही थीं, का आर्थिक प्रभुत्व बनाए रखने में सांप्रदायिक ताकतों ने उनकी मदद की। इसके विपरीत, मौलाना अबुल कलाम आजाद और मोहनदास करमचंद गांधी जैसे नेता, धार्मिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष राज्य और समाज के हामी थे। सांप्रदायिक धाराएं जहां दूसरे समुदायों के विरूद्ध विष वमन करती थीं वहीं ये नेता सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की नीति में विष्वास रखते थे और उस पर अमल भी करते थे।
समय के साथ दक्षिण एषिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है। भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का। श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है। इस हिंसा का राजनैतिक लक्ष्य और एजेंडा है प्राक्-आधुनिक सामंतवादी मूल्यों को आधुनिक कलेवर में समाज पर लादना। जाति और लैंगिक पदानुक्रम के सामंती मूल्यों को मजबूती देने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जो आधुनिक मालूम होती है। कई बार समकालीन संदर्भों के अनुरूप इन मूल्यों में थोड़े-बहुत परिवर्तन भी कर लिए जाते हैं।
धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है। जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा। समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पष्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था। बोको हरम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है। यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से। अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही हैं।
अलकायदा के उभार के पीछे कई कारक थे। इनमें से एक था जिया-उल-हक द्वारा पाकिस्तान का इस्लामीकरण। जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की स्थापना की, जिनका इस्तेमाल युवाओं के दिमाग में जहर भरने के लिए किया जाने लगा। सउदी अरब से इस्लाम के वहाबी संस्करण का आयात कर लिया गया। वहाबियों की यह मान्यता है कि शासक, ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। इस्लाम के इस संस्करण के अनुसार, जो उनसे सहमत नहीं है, वह काफिर है और काफिर की जान लेना पवित्र जिहाद है। जो लोग इस जिहाद में मारे जाते हैं उन्हें जन्नत नसीब होती है। अलकायदा के खूनी अभियान को सबसे
अधिक मदद अमरीका से मिली, जिसने लगभग 800 करोड़ डाॅलर और 7000 टन असला अलकायदा को उपलब्ध करवाया। कैंसर की तरह अलकायदा धीरे-धीरे पूरे दक्षिण एशिया में फैल गया और उसे उखाड़ फेंकना मुष्किल होता गया।
तो अब हमारे सामने आगे की राह क्या है? अलग-अलग काल में धर्म की अलग-अलग भूमिका रही है। हमें धर्मों की संत परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। हमें लोगों को यह बताना होगा कि धर्म एक नैतिक षक्ति है और धर्म के नाम पर हिंसा किसी भी स्थिति में जायज़ नहीं है। और यह भी कि धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा का असली उद्देष्य पुरातनपंथी मूल्यों को समाज पर लादना है। धार्मिक विद्वानों और अध्येताओं को धर्मों के नैतिक पक्ष पर जोर देना चाहिए और लोगों को पहचान से जुड़े मुद्दों और बाहरी आडंबर से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए।
-राम पुनियानी

शनिवार, 27 सितंबर 2014

आईसीएचआर के अध्यक्ष का ‘इतिहास बोध’

नयी सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रीत हमला इतिहास पर हुआ है क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद(आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गये एक लेख- ‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अ रीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने
लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक-सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
इतिहास लेखन की वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत होती है। इस लेख में आउटलुक को दिये साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-
‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात् विद्वानों द्वारा किया गया है। जोकि भ्रामक है।
वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सके। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री
प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनायी है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किये उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नयी नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डा0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमें जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।
इतिहास का पुर्नलेखन-
इतिहास के पुर्नलेखन पर पूछे गये एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जायेगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आयेगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है।
वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंश का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है
कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पूर्नलेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायको को परिभाषित किया जायेगा।
ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’-
प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जायेगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जायेगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वही दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं।
वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ वह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गोरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया।
यह सत्य कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दूत्व की महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टी’ के नाम फांसी की सजा सुनाया जा रहा है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जायेगी।
प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’-
सुदर्शन राव जी ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नाम एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है-
पहला इनकी महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावो का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे  महाकाव्य समाज को समझने का एक स्रोत हो सकता है। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था।
‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के आधारपर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानो और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दूओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या-
अयोध्या पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव जी ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जायेगें ओर भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
  प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी-
  प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाये तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे- यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी रहते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अंगूठा कैसे और क्यों मांगा गया।
गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिये होगें। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मतुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है,
जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिये यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमांस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करेगें?
इतिहास बनाम धर्म-
  इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वही धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब ने सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी है। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरो को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरो का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण।
खैर 1972 में  स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा  के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य का ‘इतिहासबोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल
समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलायेगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।
-अनिल यादव
मो0 09454292339
लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाश्य

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

हर बदनाम की हिमायत में बीजेपी

 बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी केशवन नंबूदिरी को एक गर्भवती महिला के साथ छेड़छाड़ के आरोप में दिल्ली में गिरफ्तार किया गया। महिला और उसका परिवार मुख्य पुजारी का भक्त था। महिला के पिता का कहना है ,हम जिसे भगवान मानते थे, वह शैतान निकला। मुख्य पुजारी पर इस परिवार को इतना भरोसा था कि उसने रात में महिला को होटल में मिलने के बुलाया तो परिवार को भेजने में संकोच नहीं हुआ।
    महिला की शिकायत पर कानून तो अपना काम करने ही लगा है, मंदिर समिति ने नंबूदिरी को रावल के पद से हटा दिया है। इसे यूँ कहा जा सकता है कि समिति ने महिला की शिकायत को प्रथम दृष्टया कार्रवाई  लायक माना। या मुख्य पुजारी को निर्दोष नहीं मान रही। इस बीच यमुनोत्री धाम के तीर्थ पुरोहितों ने नंबूदिरी की निंदा की है।  बदरीनाथ से आ रही खबरों के मुताबिक कई अवसरों पर नंबूदिरी का व्यवहार मर्यादा विरुद्ध पाया गया था।
    अदालती कार्यवाही शुरू होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के रूप में नंबूदिरी को एक वकील मिल गया है। उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने बयान जारी कर कहा कि रावल का पद पूरे विश्व में आस्था और सम्मान का केंद्र है। रावल के निलंबन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि किसी बड़े षड्यंत्र से इंकार नहीं किया जा सकता। तीरथ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किस आधार पर उन्होंने षड्यंत्र देखा।
    एक और घटना को याद करें। आसाराम बापू अपनी पुत्री तुल्य एक महिला के साथ अनाचार के आरोप में कई महीने से जेल में पड़े हैं। उनकी जमानत की नौबत नहीं आ रही। ठीक यही आरोप उनके पुत्र नारायण साईं पर लगा। कई महीने वह गिरफ्तारी से बचने के लिए भागते रहे। अब वह भी जेल में हैं। चार्जशीट दायर होने से पहले ही भाजपा के नेता उनके बचाव में उतर आए।
    आसाराम, नारायण साईं और नंबूदिरी निर्दोष हैं या नहीं, यह अदालत को तय करना है। लेकिन भाजपा ने इन सभी केसों में न्यायिक प्रक्रिया को अवरुद्ध करने की कोशिश की है। इन कोशिशों का अर्थ यह है कि अगर कोई महिला अपनी आबरू बचाने के लिए कानून का सहारा ले तो उसे यह सहारा नहीं मिलना चाहिए। हर मामले में भाजपा को हिंदू विरोधी साजिश नजर आने लगती है। ऐसा क्यों होता है?
    ऐसा इसलिए होता है कि हिंदू धर्म और दर्शन के उच्च, महान सिद्धांतों और मूल्यों से संघ परिवारियों का वास्तव में कोई संबंध नहीं है। संघ परिवारी हिंदू धर्म का नाम सिर्फ राजनैतिक लाभ के लिए लेते हैं। इसीलिए वे कालांतर में आई बुराइयों और कुरीतियों का विरोध कभी नहीं करते। इसीलिए वह सती प्रथा के समर्थकों की कतार में शामिल होने के लिए मजबूर होते हैं।  इसीलिए जब अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की बात होती है, तो वे विरोध में सड़कों पर उतर आते हैं। धर्म के उदाŸा महान मूल्यों पर चलने से वोट नहीं मिलते। वोट तो मिलते हैं कर्मकांड, अंधविश्वास और कुरीतियों के पोषण और धर्म के ठेकेदारों का समर्थन जुटाने से। भाजपा-जनसंघ ने जन्म के समय से ही
धर्म के दुकानदारों के यहाँ जुटने वाली भीड़ को अपने वोट बैंक के रूप में देखा है। हे राम!
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

हिन्दुत्व और अल्पसंख्यक


गत २५ फरवरी, २०१४ को मुसलमानों की एक सभा को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुसलमानों और उनकी पार्टी के बीच आपसी विश्वास की कमी को पाटने के प्रयास में कहा कि वे भाजपा द्वारा पूर्व में की गई गलतियों के लिए माफी मांगने को तैयार हैं और मुस्लिम समुदाय से यह अनुरोध किया कि वह भाजपा को कम से कम एक मौका दे। बाद में, सिंह के राजनैतिक सचिव सुधांशु त्रिवेदी ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि ‘‘भाजपा अध्यक्ष ने जो कहा उसका अर्थ यह है कि अगर मुसलमानों को लगता है कि जाने-अनजाने हमारी ओर से कोई भूल हुई है तो हम उसे सुधारने का उपक्रम करने को तैयार हैं।‘‘
दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी की रैलियों में बुर्के और गोल टोपियां बांटी गईं। इसका उद्धेश्य यह बताना था कि रैली में मुस्लिम भी मौजूद हैं और वे भाजपा को वोट देंगे। क्या मुसलमान इस तरह की कपटपूर्ण चालों से प्रभावित होंगे?
यह स्पष्ट है कि भाजपा नेताओं को मुसलमानों की याद तभी आती है जब चुनाव नजदीक होते हैं। वे मुसलमानों की किसी जरूरत को पूरा करने की बात कभी नहीं करते। यहां तक कि वे मुसलमानों की जरूरतों को समझने का प्रयास भी नहीं करते। वे केवल भाजपा के असली इरादों के बारे में मुसलमानों को भ्रमित करना चाहते हैं। उनका उद्धेश्य यह रहता है कि संभव हो तो उन्हें मुसलमानों के कुछ वोट मिल जाएं या कम से कम इतना तो हो जाए कि मुसलमान एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ मतदान न करें।
हिन्दुत्व की विचारधारा में मुसलमानों और ईसाईयों को हमेशा से विदेशी और बाहरी माना जाता रहा है क्योंकि उनके पवित्र धर्मस्थल ‘‘अखण्ड भारत‘‘ की भौगोलिक सीमाओं के बाहर स्थित हैं। भगवा पार्टी का मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति क्या दृष्टिकोण है, यह उनके नारे ‘‘पहले कसाई फिर ईसाई‘‘ से समझा जा सकता है। अर्थात, दंगों में वे पहले मुसलमानों से निपटेंगे और फिर ईसाईयों से। इस तरह के नारे भाजपा के कार्यकर्ता सड़कों पर भी लगाते हैं।
इसके अलावा मुसलमानों को आतंकवादी, हिंसक और आक्रामक बताया जाता है। यह कहा जाता है कि मुसलमानों की एक से अधिक पत्नियां होती हैं और उनकी प्रजनन दर (यह शब्द सामान्यतः जानवरों के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है)  इतनी अधिक है कि उनकी आबादी जल्दी ही हिन्दुओं से ज्यादा हो जाएगी। मुसलमानों के विरूद्ध इस तरह के बेतुके व बेसिरपैर के आरोप लगाते जाने से देश में समय-समय पर मुसलमानों के विरूद्ध साम्प्रदायिक हिंसा भड़कती रही है और इससे वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक, ४०,००० से ज्यादा निर्दोश लोग साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार बन चुके हैं। मुसलमानों पर आतंकवादी होने का दोष मढ़ने के लिए गुजरात में सुरक्षा एजेन्सियों ने निर्दोश मुस्लिम युवकों को झूठी मुठभेड़ों में मारने और उसके बाद उन्हें आतंकवादी घोषित कर देने का तरीका निकाला। सोहराबुद्धीन और इशरत जहां इसके कुछ उदारहण हैं। मुसलमानों के खिलाफ जो नारे गढ़े गए हैं उनकी भाषा इतनी अश्लील व अशालीन है कि उन्हें यहां दोहराया भी नहीं जा सकता। इसके बाद भी राजनाथ सिंह खुलकर यह स्वीकार करने को भी तैयार नहीं हैं कि भाजपा ने हिन्दुत्व की विचारधारा का वरण कर कोई ‘‘भूल‘‘ की है।
राजनैतिक स्तर पर भाजपा, सरकार के हर उस कदम का विरोध करती आ रही है जिसका उद्धेश्य हाशिए पर पड़े समूहों, विशेषकर अल्पसंख्यकों, की भलाई हो और जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें भी आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें। मोदी का दावा है कि उनकी धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है ‘‘इंडिया फर्स्ट‘‘ (भारत पहले)। भारत में केवल समाज के कुछ वर्ग इस स्थिति में हैं कि वे अवसरों का दोहन कर सकें। इसलिए इंडिया फर्स्ट की नीति से केवल श्रेष्ठि वर्ग (अर्थात बहुसंख्यक समुदाय की उच्च जातियां और पुरूष) लाभान्वित होंगे। भारत में सबसे ज्यादा विशेषाधिकार कारपोरेट सेक्टर को हासिल हैं जो देश के संसाधनों पर बेजा कब्जा कर रहा है। २जी स्पेक्ट्रम, कोयला व खनन घोटालों से यह जाहिर है कि किस तरह बड़े उद्योगपति, गलत तरीकों से अरबपति बन रहे हैं जबकि दलित, आदिवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यक जैसे हाशिये पर पड़े वर्गों को अवसरों में उनका न्यायोचित हिस्सा नहीं मिल रहा है और ना ही देश के संसाधनों में। संविधान के नीति निदेशक तत्वों का पालन हमारे देश में नहीं हो रहा है।
भाजपा नेता हमेशा से ऐसे उपायों का विरोध करते आ रहे हैं जिनसे अल्पसंख्यकों को उनकी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने का अधिकार और मौका मिले। उदाहरणार्थ, वे अलग पारिवारिक (या पर्सनल) कानूनों के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि इससे अल्पसंख्यकों में अलगाव का भाव पैदा होता है। वे उर्दू भाषा को प्रोत्साहन दिए जाने के भी खिलाफ हैं। भाजपा का राजनैतिक एजेन्डा है सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करना और उच्च जातियों की संस्कृति को देश पर लादकर, राज्य को उसका संरक्षक नियुक्त करना। वे इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहते हैं। सरस्वती वंदना, भगवत गीता, योग आदि की शिक्षा को भाजपा-शासित राज्यों में स्कूली विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य बनाना, इसी एजेन्डे को लागू करने का हिस्सा है। इसी के तहत, बहुत कड़े गौवध निषेध कानून बनाए गए हैं और अंतर्धार्मिक विवाहों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है, विशेषकर हिन्दू महिलाओं द्वारा मुस्लिम पुरूषों के साथ विवाह के।
भाजपा सांस्कृतिक विविधता के विरूद्ध है और अल्पसंख्यकों को उनकी संस्कृति की रक्षा करने का अधिकार नहीं देना चाहती। उसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की कोई फिक्र नहीं है। उसने कभी नौकरियों, शिक्षा, सरकारी ठेकों, बैंकों से मिलने वाले कर्जों इत्यादि में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव के विरूद्ध आवाज नहीं उठाई। यही भेदभाव मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी है। सच्चर कमेटी की रपट व अन्य अध्ययनों ने इस भेदभाव को रेखांकित किया  है।
भाजपा कई बार यह मांग कर चुकी है कि चर्च और इस्लाम का ‘‘भारतीयकरण‘‘ होना चाहिए। भारतीयकरण का क्या अर्थ है? भारत के मुसलमानों में उतनी ही विविधता है जितनी किसी अन्य धर्म के अनुयायियों में। अन्य भारतीयों की तरह, मुसलमान भी तमिल, मलयालम, कन्नड़, मराठी, कोंकणी, गुजराती, हिन्दी की विभिन्न बोलियां, मारवाड़ी, कश्मीरी, उर्दू आदि बोलते हैं। जिस क्षेत्र में वे रहते हैं, उनका खानपान और पहनावा उस क्षेत्र में रहने वाले अन्य धर्मावंलबियों जैसा ही है। वे उन्हीं प्रथाओं व परंपराओं का पालन करते हैं और सभी धर्मों के त्यौहारों में हिस्सेदारी करते हैं। स्थान की कमी के कारण हम यहां इसका विस्तृत विवरण नहीं दे रहे हैं। भारत की सांझा संस्कृति, प्रथाओं और परंपराओं पर मोटे-मोटे ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं। प्रसिद्ध कवि इकबाल ने भगवान राम को ‘‘इमाम-ए-हिन्द‘‘ कहा था, सूफी संत मजहर जानेजानां राम और कृष्ण को अल्लाह का पैगंबर बताते थे और संत निजामुद्दीन औलिया के दिन की शुरूआत राम और कृष्ण के भजनों से होती थी। एक बार जब जब निजामुद्दीन औलिया ने एक हिन्दू महिला को सूर्य नमस्कार करते देखा तो उन्होंने अपने अनुयायी अमीर खुसरो से कहा कि वह महिला भी अल्लाह की इबादत कर रही है। बाबा फरीद गंज-ए-शक्कर ने अपने सभी भक्ति गीत पंजाबी में लिखे और उनमें से कई गुरूग्रन्थ साहिब का हिस्सा हैं। चर्च ने भी भारत के लोगों की संस्कृति और उनके कर्मकाण्डों को अपनाया है। इससे ज्यादा आखिर आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं? भारत के मुसलमानों और ईसाईयों का इस हद तक भारतीयकरण हो गया है कि वे जातिप्रथा को भी मानने लगे हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए!
इस्लाम और ईसाई चर्च के भारतीयकरण की आरएसएस व भाजपा की मांग का असली अर्थ यह है किः
१.            चर्च और इस्लामिक मदरसे अपने आपको बाहरी दुनिया से पूरी तरह से काट लें। वे इस वैश्विक युग में ‘बाहर‘ से आने वाले किसी भी धार्मिक विचार या सिद्धांत से पूरी तरह अपना नाता तोड़ लें। इसके विपरीत, हिन्दुत्व वैश्विक बना रहेगा और उसे अमेरिका व यूरोप के नागरिक बन चुके हिन्दुओं का समर्थन और उनसे धन हासिल करने का अधिकार रहेगा।
२.            मुसलमानों व ईसाईयो को हिन्दुओं का प्रभुत्व स्वीकार करना चाहिए। ये ‘‘विदेशी‘‘ धर्म, समानता और सार्वभौमिकता पर आधारित हैं और मीराबाई, कबीर, रविदास, तुकाराम व सिद्ध, नाथ, तंत्र आदि परंपराओं को मानने वाले अनेक संतों ने सार्वभौमिकता और समानता की वकालत की है। दूसरी ओर, हिन्दुत्व धर्म और राष्ट्रवाद पर आधारित है जो पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को और विशेषाधिकार देना चाहता है। आरएसएस व भाजपा चाहते हैं कि मुसलमान और ईसाई भी नस्ल और राष्ट्रवाद पर आधारित ऊंचनीच को स्वीकार करें।    
तत्कालीन संरसंघचालक के. एस. सुदर्शन ने आरएसएस द्वारा प्रायोजित मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की बैठक को संबोधित करते हुए २४ दिसम्बर २००२ को इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया कि ‘‘भारत के मुसलमानों ने अल्पसंख्यक का दर्जा क्यों स्वीकार किया, जबकि वे जन्म से इस धरती पर रह रहे हैं और उनकी संस्कृति, नस्ल व पुरखे वही हैं जो कि हिन्दुओं के हैं?‘‘ नस्ल व पुरखों की अवधारणा ना तो संविधान स्वीकार करता है और ना ही इसका कबीर के हिन्दू धर्म, इस्लाम व ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्षक इन्द्रेश कुमार का कहना है कि मुसलमानों और ईसाईयों को हिन्दू राष्ट्रवाद को स्वीकार कर लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें हिन्दुओं का प्रभुत्व स्वीकार कर लेना चाहिए। इन्द्रेश कुमार चाहते हैं कि मुसलमान, हिन्दू राष्ट्रवाद को भारत की आत्मा के रूप में स्वीकार कर लें और उनका यह वायदा है कि अगर वे ऐसा करेंगे, तो सारे अवरोध अपने आप समाप्त हो जाएंगे, सारी विभाजन रेखाएं अदृश्य हो जाएंगी।
यह साफ है कि इस्लाम और ईसाई धर्म को अपना भारतीयकरण करने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल आरएसएस और हिन्दुत्व की विचारधारा का भारतीयकरण होना चाहिए और उन्हें नस्ल पर आधारित हिन्दू श्रेष्ठतावाद को त्यागना चाहिए। उन्हें चाहिए कि वे संविधान की समानता की अवधारणा को स्वीकार करें, जिसमें जाति, लिंग, नस्ल, धर्म, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों में किसी भी प्रकार का भेदभाव करना निषिद्ध है।
भाजपा के बारे में ये सभी तथ्य सर्वज्ञात हैं परंतु इसके बाद भी मुसलमानों का एक हिस्सा (लगभग १० प्रतिशत) भाजपा को वोट देगा। इसके कारणों की हम अगले लेख में विवेचना करेंगे।

-इरफान इंजीनियर

रविवार, 11 अगस्त 2013

धर्म, नास्तिकता और धर्मनिरपेक्षता


पिछले कोई तीन दशकों से सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में धर्म, काफी दबंगता से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। कहीं आतंकवादी हमलों तो कहीं साम्प्रदायिक हिंसा और कहीं धार्मिक दक्षिणपंथियों की बढ़ती ताकत ने आम आदमी के लिए अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे सामाजिक असमानता और  गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को नेपथ्य में धकेल दिया है।
इस सिलसिले में हालिया प्रकाशित एक पुस्तक कुछ दिलचस्प भविष्यवाणियां करती है। पुस्तक के अनुसार, सन् 2040 के दशक तक दुनिया में धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक हो जाएंगे और धर्म के प्रति उदासीन लोगों की संख्या में कई गुना वृद्धि होगी। पुस्तक के लेखक हैं नाईजल बार्बर और उसका शीर्षक है ‘वाय एथियेज्म विल रिप्लेस रिलीजनः द ट्राइम्फ आॅफ अर्थली प्लेजर्स ओवर पाय इन द स्काय‘ (क्यों लेगी नास्तिकता धर्म का स्थान: इस दुनिया की उस दुनिया पर जीत)। पुस्तक, धर्म के उदय और पतन को आर्थिक विकास से जोड़ती है और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि विकसित देशों में नास्तिकों की संख्या अधिक होती है।
यह पुस्तक लेखक द्वारा 137 राष्ट्रों के अध्ययन पर आधारित है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि जिस देश में जितनी अधिक और व्यापक जनकल्याण योजनाएं लागू हैं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था जितनी बेहतर है, वहां नास्तिकों की संख्या उतनी ही अधिक है। दूसरे शब्दों में, पुस्तक मूलतः यह कहती है कि जिन देशों में आय का वितरण जितना समान है, वहां धार्मिक लोगों की संख्या उतनी ही कम है। लेखक जानेमाने मनोविज्ञानी हैं। लेखक की भविष्यवाणी यह है कि अगर फानी दुनिया उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगेगी, तो लोगों को पराभौतिक शक्तियों पर विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। ज्ञातव्य है कि अमेरिका में हाल में कराए गए एक सर्वेक्षण में 20 प्रतिशत लोगों ने स्वयं को नास्तिक बताया।
यद्यपि यह अध्ययन अत्यंत तार्किक है तथापि शब्दों के अर्थ को लेकर कुछ भ्रमित भी प्रतीत होता है। जैसे, हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि नास्तिकता, कुछ धर्मों के ढांचे का हिस्सा है। इनमें शामिल हैं हिन्दू धर्म के कुछ पंथ जैसे चार्वाक-लोकायत परंपरा। जैन और बौद्ध धर्म भी किसी दैवीय शक्ति के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते। यह अलग बात है कि बौद्ध और जैन धर्मों के अनुयायियों ने इन धर्मों के पैगम्बरों को ही ईश्वर का दर्जा दे दिया है और उनकी पूजा करने लगे हैं। हिन्दू धर्म में कई धाराएं हैं जिनमें शामिल हैं ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, भक्ति, सिद्ध आदि। हिन्दू धर्म में ईश्वर की अवधारणा में भी बहुत विविधता है। कुछ धाराएं बहुईश्वरवादी हैं, जो सैकड़ों देवी-देवताओं में आस्था रखती हैं तो कुछ धाराओं के आराध्य त्रिदेव (ब्रहा, विष्णु, महेश) हैं। कुछ धाराएं केवल एक ईश्वर में विश्वास करती हैं तो कुछ निराकार ब्रम्ह में। और ये सभी अवधारणाएं, एकसाथ हिन्दू धर्म में जीवित हैं।
भारत में चार्वाक को नास्तिकता का पितामह कहा जा सकता है। इस परंपरा को आधुनिक युग में साम्यवादियों ने आगे बढ़ाया। इस सिलसिले में भगतसिंह का प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?‘ महत्वपूर्ण है। कई क्रांतिकारी समाजसुधारक जैसे पेरियार रामास्वमी नायकर भी नास्तिकता के जबरदस्त पक्षधर थे। रेशनलिस्ट्स (तार्किकतावादियों) की संस्थाएं भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
अन्य धर्म, जो एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, वहां भी ईश्वर की अवधारणा निराकार और साकार के बीच झूलती रही है। कुछ दशकों पहले तक ऐसी पुस्तकें और लेख आम थे जिनमें ईश्वर के अस्तित्व को ही चुनौती दी जाती थी। परंतु पिछले तीन दशकों में, यथास्थितिवादी राजनैतिक ताकतों द्वारा धार्मिक पहचान का दुरूपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके पहले, बीसवीं सदी की शुरूआत में, विशेषकर सन् 1920 के दशक में, औद्योगिकरण व शिक्षा के प्रसार के कारण, अफ्रीकी-अमेरिकनों व महिलाओं ने सामाजिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू की। इससे समाज का कुलीन वर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा और नतीजे में ईसाई धर्म में एक कट्टरपंथी धारा उभरी। इस्लामिक कट्टरवाद के राजनैतिक अवतार को सबसे पहले आकार मिला ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के शासन में आने के बाद। शनैः-शनैः इस्लामिक कट्टरवाद के कई स्वरूप उभरकर समाने आने लगे, जिनमें से सबसे बदतर था तालिबान। इसी दौर में आमजनों में प्रजातांत्रिक आकांक्षाओं के उदय से भयभीत कुछ शासकों ने इस्लाम के कट्टरवादी संस्करणों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सऊदी अरब में आम जनता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को कुचलने के लिए इस्लाम के सलाफी संस्करण का इस्तेमाल किया गया, ताकि अमेरिका और इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों के टैंकरों में सऊदी तेल का प्रवाह अबाध रूप से जारी रह सके।
इस्लाम के सलाफी संस्करण का अमेरिका ने मध्यपूर्व के तेल भंडारों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए भी इस्तेमाल किया। अमेरिका के निर्देशन में उसके द्वारा पोषित मदरसे पाकिस्तान में स्थापित किए गए, जिनमें अंकल सैम द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम को पढ़कर, मुजाहिदीन, तालिबान और अल्कायदा लड़ाके उभरे। इन लड़ाकों ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के अमेरिकी लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत में दलितों और महिलाओं के सशक्तिकरण ने मध्यम वर्ग के एक हिस्से के मन में यह आशंका पैदा कर दी कि समाज पर उसका दबदबा कम हो जाएगा। इससे उपजे असुरक्षा के भाव को भाजपा ने राम मंदिर जैसे मुद्दे उछालकर जमकर भुनाया। जहां इस पुस्तक के लेखक का कहना यह है कि बढ़ती समृद्धि के साथ लोगों के दिलोदिमाग से ईश्वर और धार्मिकता का रंग उतरने लगता है वहीं दक्षिण एशिया में हालात बिल्कुल उलट दिखलाई पड़ते हैं। पाकिस्तान में सामाजिक मसलों में मुल्लाओं का हस्तक्षेप वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने में सबसे बड़ी बाधा है। श्रीलंका,  जहां लिट्टे का सफाया करने के नाम पर हजारों तमिलों को मौत के घाट उतार दिया गया, में पिछले कुछ समय से ईसाईयों और मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। म्यांनमार में बौद्ध धर्म के नाम पर प्रतिगामी राजनैतिक ताकतें गरीब रोंहिग्या मुसलमानों पर हमले कर रही हैं।
यहां हम यह साफ करना चाहेंगे कि धर्म और धर्मनिरपेक्षता में कोई विरोधाभास नहीं है। पुस्तक के लेखक को यह बात स्पष्ट करनी चाहिए थी। समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया से पुरोहित वर्ग की भूमिका लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक सीमित हो गई परंतु इससे न तो धर्म समाप्त हुआ और ना ही ईश्वर। अब समाज में समृद्धि बढ़ने के साथ अधिकाधिक लोगों की सुरक्षित जीवन पानेे के लिए ईश्वर का सहारा लेने की आवश्यकता कम होती जा रही है। दक्षिण एशियाई देश इस दौरान एक जटिल प्रक्रिया से गुजरे। जहां एक ओर अत्यंत धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाले महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोगों ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की वकालत की वहीं जिन्ना-जो न नमाज पढ़ते थे और न रोजे रखते थे-ने इस्लाम के नाम पर अलग देश बनाने के आंदोलन का नेतृत्व किया और नास्तिक सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को आकार दिया।  हिन्दूवादी राजनीति के कई बड़े नेता अपने निजी जीवन में धार्मिक नहीं हैं परंतु राजनीति के क्षेत्र में वे धर्म और ईश्वर के नाम पर जुनून पैदा करने में सिद्धहस्त हैं।
हमारी तो इच्छा यही है कि लेखक की भविष्यवाणी सही सिद्ध हो और हम आशा करते हैं कि यह प्रक्रिया केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहेगी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि धार्मिकता का तेजी से बढ़ता प्रभाव, दरअसल, सामाजिक असुरक्षा का प्रकटीकरण है जिसका उपयोग यथास्थितिवादी राजनैतिक नेता यह सुनिश्चित करने के लिए कर रहे हैं कि सामाजिक संसाधनों के समाज के कमजोर वर्गों में समान वितरण की प्रक्रिया को बाधित किया जा सके। आज के भारत में हम दो राजनैतिक ताकतों के बीच चल रहे संघर्ष को स्पष्ट देख सकते हैं। एक ओर वे ताकतें हैं जो पूरे समाज के कल्याण की हामी हैं तो दूसरी ओर वे हैं जो धार्मिक आधार पर पूरे समाज का धु्रवीकरण करना चाहती हैं। दूसरी श्रेणी की राजनैतिक ताकतों का   आधार असुरक्षा के भाव से ग्रस्त मध्यम वर्ग में है और उन्हें बड़े औद्योगिक घरानों का समर्थन प्राप्त है। इस संघर्ष को देखकर कबजब मन में अत्यंत निराशा का भाव उत्पन्न होता है और ऐसा लगता है कि क्या कभी वह दिन आएगा जब दक्षिण एशिया में राजनीति के क्षेत्र को ईश्वर व धर्म से मुक्ति मिल सकेगी और फोकस संसाधनों के समान वितरण पर हो सकेगा। मोदी- भाजपा और उनकी जैसी अन्य शक्तियां जिस आर्थिक प्रगति की बात कर रही हैं उसमें समाज के  सभी वर्गों की उन्नति शामिल नहीं है। प्रगति की असली परिभाषा यही है कि वह समाज के सभी वर्गों के जीवन को बेहतर बनाए। साम्प्रदायिक ताकतों के विकास के खोखले दावों का पर्दाफाश करना आवश्यक है और उतना ही आवश्यक है ऐसी प्रगति पर जोर देना जिसमें समानता हो और जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों की भलाई के लिए सकारात्मक कार्यक्रमों का समावेश हो। इसके साथ ही, यह भी आवश्यक है कि अंधधार्मिकता और धर्म के नाम पर राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोला जाए।
पश्चिमी राष्ट्रों में भी समृद्धि और  प्रगति के फल समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंुच रहे हैं परंतु कम से कम ये देश धार्मिक पहचान की राजनीति से मुक्त हैं, जिसने दक्षिण और पश्चिम एशिया को अपने खूनी पंजे में जकड़ रखा है। यह पुस्तक हमें आशा का संदेश देती है। हम उम्मीद करते हैं कि इस पुस्तक की भविष्यवाणी उन देशों के मामले मंे भी सही सिद्ध होगी जिनमें धार्मिक पहचान की राजनीति, मानवाधिकारों की अवधारणा को कुचल रही है और समाज के दमित और वंचित तबकों के समक्ष अस्त्तिव का संकट खड़ा कर रही है। 


-राम पुनियानी

सोमवार, 6 अगस्त 2012

क्रान्तिकारियो महापुरुषों को जातीय आधार में बाटना खतरनाक है ......

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की सीढिया चढ़ रहे बच्चो के प्रति उनके अभिभावकों और शुभचिंतको का खुश होना एक दम स्वाभाविक है | सफलता की खुशियों में घर परिवार से लेकर मित्रो परिचितों आदि की किसी न किसी रूप में भागीदारी भी जरुर होती है | यह सब स्वाभाविक रूप से पहले भी चलता रहा है और अब भी चल रहा है | हां इन खुशियों का आज जैसा प्रचार माधय्मी प्रदर्शन पहले एक दम नही था |क्योंकि आज से 20 -- 25 साल पहले तक न ही ऐसे प्रचार माध्यम थे और न ही उन सफलताओं का श्रेय अपने कोंचिंग सेंटर या संस्थान को दिलाने लोग थे | बताने की जरूरत नही की ये लोग घर परिवार या मित्र मण्डली से अलग होते हुए भी ऐसे प्रदर्शनों में सबसे आगे रहते है ताकि प्रतिभागियों की सफलता का इस्तेमाल अपने कोचिंग विजनेस के विकास विस्तार में कर सके | इसके अलावा अब सफलता की खुशियों के आयोजनों में एक नए चलन की भी शुरुआत हो गयी है | विभिन्न जातीय संगठनों और उनके पदाधिकारियों द्वारा अपनी जाति के सफल युवको \ युवतियों को सामाजिक रूप से सम्मानित करने की नयी परम्परा चलने लग गयी है परिवारजनों के साथ कोंचिंग सेंटर के टीचर आदि का ऐसे अवसरों पर शामिल होना तो फिर भी किसी बच्चे की सफलता में उनके योगदान का एक परिलक्षण होता है | इसे सफलता प्राप्त किए बच्चे अक्सर अपने माता -- पिता व टीचरों के योगदान के रूप में कबूलते है | पर विभिन्न जातियों के जातीय संगठनों द्वारा अपनी जाति के सफल प्रतिभागियों के सम्मानित किए जाने वाले आयोजनों का कोई औचित्य नही है | अगर कोई औचित्य है तो , शुद्ध रूप से इस्तेमाली है | वह जातीय संगठनों को बढावा देने के लिए इन प्रतिभागियों और उनकी सफलताओं का इस्तेमाल मात्र है | सच्चाई यह है की किसी सफल प्रतिभागी को सफलता की उंचाइयो पर पहुचाने में केवल उसी के धर्म या जाति के लोगो का उसी जाति के टीचरों का या फिर प्रतिभागियों को विभिन्न रूप में मिले अन्य सेवाओं में उसी धर्म जाति के लोगो का हाथ नही होता है | वर्तमान दौर में तो ऐसा कदापि संभव नही है | किसी को सफलता दिलाने में बहुतेरे ज्ञात , अज्ञात लोगो का नीचे से उपर तक के लोगो का हाथ होता है | इसका सम्बन्ध उसके धर्म व जाति या आगे बढकर कहे तो उसके क्षेत्र व राष्ट्र के लोगो तक सीमित नही रहता | उदाहरण आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का लगभग समूचा ज्ञान मुख्यत: यूरोपीय वैज्ञानिकों , विद्वानों खोजकर्ताओं की देन है | इसे हम नकार नही सकते है | इसी तरह से प्रत्यक्ष रूप में परिवार के लोगो , शुभचिंतको टीचरों के योगदान को भी नही नकार सकते लेकिन किसी धर्म जाति विशेष के धार्मिक या जातीयता संगठन के योगदान को जरुर नकारा जा सकता है क्योंकि वह कोई ऐसा योगदान है ही नही | अगर किसी जाति विशेष के साथ उदाहरण दलित जातियों के साथ किसी हद तक ऐसा कुछ रहा भी है तो अब वह उस रूप में बहुत कम है और वह लगातार घटता जा रहा है | इसके वावजूद सफल प्रतिभागियों को लेकर अपने जातीय गौरव , जातीय कल्याण उथान का प्रदर्शन करने में मंचो पर विभिन्न जातियों के अनपढ़ या कम शिक्षित लोग मौजूद रहते है | ऐसे में लोग स्वंय भी जातीय संगठनों द्वारा बन्दन, अभिनन्दन हासिल किए रहते है | यही काम अब जातीय संगठनों के मंचो से स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीदों , क्रान्तिकारियो के साथ किया जाने लगा है | जाति के नाम पर उनकी स्मृतिया मनाने का काम किया जा रहा है | इसके जरिये उन्हें अपनी जाति के ( न की समूचे राष्ट्र व समाज के ) क्रांतिकारी नेता के रूप में परिलक्षित करने का काम किया जा रहा है | यह क्रान्तिकारियो को याद करना तथा उनका अभिनन्दन करना नही है | उनके कद को बढाना भी नही है | बल्कि उन्हें जातीयता के खांचे में डालकर उनके राष्ट्रीय कद को छोटा या संकुचित कर देना है | आखिरकार उनके त्याग , बलिदान विशिष्ट जातीय हितो के दायरे में कदापि सीमित नही होते | वे व्यापक होते है | राष्ट्र व व्यापक समाज के हित में होते है |
सफल प्रतिभागियों के बारे में भी यह बात इस रूप में कही जा सकती है की वे किसी जाति या धर्म के सदस्य के रूप में सफलताए नही अर्जित करते | बल्कि समाज की व्यापक उपलब्धियों के आधार पर तथा विभिन्न धर्म व जाति के लोगो के शाह्ता सहयोग से सफलता पाते रहते है | अत: उन्हें अपने धर्म जाति के रूप में गौरवान्वित करने की चल रही यह परम्परा कत्तई ठीक नही है | बल्कि सफल प्रतिभागियों के या किन्ही क्षेत्र में सफलता अर्जित किए व्यक्तियों के स्वस्थ व जनतांत्रिक विकास की विरोधी है और उसे ग्रसित करने वाली भी है |
-सुनील दत्ता ...........

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-2

भारत में अंग्रेज शासकों की ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति व इतिहास को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहले से ही आपसी शंका व घृणा का भाव था, इस्लाम के बारे में पश्चिमी दुष्प्रचार ने भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा किया। सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने हिन्दू धर्म के नाम पर जो तर्क दिए हैं वे अत्यंत बेहूदा और आधारहीन हैं। भारत में किए गए अधिकतर आतंकी हमले किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर नहीं किए गए थे। इसके कुछ अपवाद हैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और असीमानंद द्वारा मस्जिदों या ऐसे स्थानों पर किए गए बम विस्फोट, जहाँ मुसलमान बड़ी संख्या में इकट्ठा थे। दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला 11.9.2001 को न्यूयार्क में हुआ था और इसमें सभी धर्मों और देशों के नागरिक मारे गए थे। पाकिस्तान में अल्कायदा द्वारा मारे गए लोगों की संख्या हजारों नहीं तो कम से कम सैकड़ों में जरूर होगी। यह मान्यता मूखर्तापूर्ण है कि मुस्लिम शासकों ने भारत में इस्लाम का प्रचार करने के लिए देश पर कब्जा किया था। भारत में सम्राट अशोक को छोड़कर किसी राजा ने धर्मप्रचार नहीं किया। केवल अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया और वह भी शांतिपूर्ण तरीकों से। भारत में इस्लाम को फैलाया सूफी संतों ने और हिन्दू धर्म की निष्ठुर जाति प्रथा के चंगुल से निकलने के लिए दलितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम को गले लगाया। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि हिन्दुओं को मारकर और ढेर सारे बच्चे पैदा कर मुसलमान, भारत को दारुल इस्लाम बनाना चाहते हैं। पिछले साठ सालों में भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के प्रतिशत में मात्र 0.8 की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में आदिवासियों का प्रतिशत 7.5 से बढ़कर 8.5 हो गया है। इन दोनों समुदायों की आबादी की अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि दर के पीछे गरीबी और अशिक्षा है न कि अपने समुदाय की आबादी बढ़ाने का कोई सोचा-समझा षड्यंत्र।
“सभ्यताओं के टकराव“ के सिद्धांत से ही जन्मी है यह मान्यता कि सभी आतंकी मुसलमान होते हैं। यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं हो सकता कि अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में मुस्लिम युवकों को निर्दयता से निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मारने के लिए प्रायोजित किया गया था परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में हुए आतंकी हमलों के बाद पकड़े गए अधिकांश मुस्लिम युवक, अंततः निर्दोष साबित हुए।
यह सोचना भी गलत है कि भारत में आतंकी हमलों में केवल हिन्दू मारे जाते हैं। 26.11.2008 के आतंकी हमले में मारे गए मुसलमानों का प्रतिशत, आबादी में उनके प्रतिशत से कहीं अधिक था। हालिया (13.7.11) हमले में भी दोनों समुदायों के लोग मारे गए। यह कहना कि आतंकवाद की समस्या का हल हिन्दुओं में एकता स्थापित करना और हिन्दू पार्टी को समर्थन देना है, राजनैतिक प्रचार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। भारत ने अपनी इच्छा से धर्मनिरपेक्ष राज्य बने रहना स्वीकार किया था। हमारे
संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर इस्लामिक या हिन्दू राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज किया था।
हम यह नहीं भूल सकते कि हेमन्त करकरे की सूक्ष्म जाँच के फलस्वरूप प्रज्ञा सिंह ठाकुर से लेकर असीमानंद तक तथा आर0एस0एस0 के एक प्रमुख नेता इन्द्रेश कुमार के आतंकवादी हमलों में शामिल होने के अकाट्य सुबूत सामने आए हैं। इस्लाम के नाम पर लोगों के दिमागों में ज़हर भरने का काम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महाशक्ति कर रही है, जिसका लक्ष्य अपने राजनैतिक उदेश्यों की पूर्ति है। हमारे देश में हिन्दुत्व की विचारधारा की पोषक वे शक्तियाँ हैं जो हमारे देश के बहुवादी एवं प्रजातांत्रिक चरित्र का गला घोंटना चाहती हैं। बहुवाद व प्रजातंत्र हमारे स्वतंत्रता संग्राम की थाती हैं। आतंकवादी हमलों का बदला लेने या पाकिस्तान पर हमला करने की बातें शुद्ध पागलपन हैं और ऐसा कोई भी कदम, भारतीय उपमहाद्वीप को बर्बादी के रास्ते पर ले जाएगा।
किसी एक समुदाय पर आतंकवाद का पोषक होने का आरोप लगाना गलत है। कुछ असीमानंदों या दयानंदों के कारण पूरा हिन्दू समुदाय आतंकवादी नहीं हो जाता।

-राम पुनियानी
समाप्त
मोबाइल: 09322254043

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-1

दिनांक 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए आतंकी बम विस्फोटों के बाद से हमारे देश में घृणा फैलाने व समाज को बाँटने वाली ताकतें एक बार फिर अपना सिर उठा रही हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद के पैरोकार अपना पुराना राग एक बार फिर अलापने लगे हैं। वे धर्म, विशेषकर इस्लाम और मुसलमानों, को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं और चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए हिन्दुओं को एक होना होगा, हिन्दू पार्टी को समर्थन देना होगा, मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करना होगा और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना होगा (सुब्रह्मण्यम् स्वामी, डीएनए, 16 जुलाई 2011)।
स्वामी का कहना है कि आतंकवाद, दरअसल, हिन्दू धर्म पर इस्लामिक हमला है और इस्लाम, भारत पर काबिज होना चाहता है। अतः यह जरूरी है कि आम हिन्दुओं की मानसिकता हिन्दूवादी बनाई जाए, अयोध्या व वाराणसी में भव्य मंदिरों का निर्माण हो, संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द किया जाए और हिन्दुओं द्वारा दूसरे धर्मों को अपनाने पर प्रतिबंध हो परंतु हिन्दू धर्म अपनाने के इच्छुक गैर-हिन्दुओं पर कोई रोक न हो। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाया जाना जरूरी है और उतना ही जरूरी है मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना। यह लेख मूलतः आर0एस0एस0 के एजेन्डे को ही प्रतिबिंबित करता है, इसकी भाषा अत्यंत कटु व आक्रामक है। अपने गठन से लेकर आज तक आर0एस0एस0 ने देश में केवल और केवल घृणा फैलाई है। लगभग पिछले एक सौ सालों से हिन्दू धर्म, संघ की राजनैतिक विचारधारा का मूलाधार रहा है। आर0एस0एस0 को अपने इस अभियान में अमरीकी दुष्प्रचार से भी मदद मिल रही है। 9/11 के बाद से अमरीका ने एक नए शब्द “इस्लामिक आतंकवाद“ को गढ़ा और पूरी दुनिया में मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम करने का जबरदस्त अभियान चलाया।
आतंकवाद सैकड़ों साल पुराना है परंतु अल्कायदा के अस्तित्व में आने के बाद से यह वैश्विक स्तर पर चर्चा और बहस का विषय बन गया है। अल्कायदा और तालिबान के लड़ाकों को अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में प्रशिक्षण मिला। पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों में, पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा, अमरीकी सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण अंग रहा है। अमरीकी सरकार ने पश्चिम एशिया के देशों’ पर हमले करने के लिए कई बहाने गढ़े। सच तो यह है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका ने इजराइल के निर्माण के बीज बोए ही इसलिए थे ताकि पश्चिम एशिया पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए उसे इस क्षेत्र में एक वफादार पिट्ठू उपलब्ध रहे। पश्चिम एशिया में मुसलमानों का बहुमत है। इन देशों में से कुछ के तानाशाहों और शेखों ने अमरीका से हाथ मिला लिया। कैसी विडंबना है कि दुनिया के “सबसे बड़े प्रजातंत्रों में से एक“ के दोस्त, पश्चिम एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों पर राज कर रहे निर्दयी तानाशाह हैं।
अमरीका हमेशा से ऐसे मौकों की तलाश में रहा जिनका इस्तेमाल वह दुनिया के विभिन्न देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए कर सके। तेल-उत्पादक क्षेत्र में अपनी पैठ जमाने के लिए ही अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक मोसाडिक सरकार का तख्ता पलटा। मोसाडिक सरकार, तेल के कुओं का राष्ट्रीयकरण करना चाह रही थी और इससे अमरीका और इंग्लैंड की तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता। इसके कुछ वर्षों बाद, सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। रूस के विरुद्ध युद्ध में झोंकने के लिए जुनूनी मुस्लिम युवकों की जरूरत थी और इसके लिए पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए गए। इन मदरसों में मुस्लिम युवकों के दिमाग में यह भरा गया कि हर गैर-मुस्लिम काफिर है और काफिरों को मारना जेहाद है। जबकि सच यह है कि इस्लाम में काफिर का अर्थ होता है सच को छिपाने वाला और अपनी पूरी ताकत से किसी लक्ष्य को पाने का यत्न, जेहाद कहलाता है।
इसके साथ-साथ सेम्युल हटिंगटन के “सभ्यताआंे के टकराव“ के सिद्धांत का जमकर प्रचार किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, सोवियत संघ के पतन के बाद, हमारी दुनिया में टकराव कम्युनिस्ट गुट व अमरीकी गुट के बीच नहीं वरन् पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यता और उन्नत पश्चिमी सभ्यता के बीच होगा।
इस सिद्धांत ने इस्लाम की छवि को गहरा आघात पहुँचाया। इस्लाम को एक पिछड़े हुए धर्म के रूप में देखा जाने लगा जिसके अनुयाई दकियानूस और हिंसक हैं। मदरसों से ऐसे नौजवानों की टोलियाँ तैयार होकर निकलने लगीं जो किसी की जान लेने में जरा भी संकोच नहीं करती थीं। अमरीका ने कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों को आर्थिक मदद दी और उन्हें असलहा भी उपलब्ध करवाया। ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के सत्ता सँभालने के बाद अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताना शुरू कर दिया। 9/11 के हमले के लिए ओसामा बिन लादेन व अल्कायदा को जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद से तो इस्लामिक आतंकवाद शब्द का प्रयोग जम कर होने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि न तो इस्लाम और न ही कोई अन्य धर्म निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करने की इजाजत देता है। आई0आर0ए0, लिट्टे, उल्फा और खालिस्तानियों ने अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निर्दोषों का खून बहाया परंतु उनकी गतिविधियों को कभी ईसाई, हिन्दू या सिक्ख धर्म स नहीं जोड़ा गया। इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण की प्रक्रिया का चरम था वह डेनिश कार्टून, जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छिपाकर ले जाते हुए दर्शाया गया था।

क्रमश:
-राम पुनियानी
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