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शुक्रवार, 20 मार्च 2015

धर्म, राजनीति और समाज

धर्म का राजनीति से क्या लेनादेना है? धर्म और हिंसा का क्या संबंध है? वर्तमान समय में, विभिन्न राजनैतिक एजेण्डे कौनसा रूप धर कर हमारे सामने आ रहे हैं?
ऐसा लगता है कि राजनीति ने धर्म का चोला ओड़ लिया है और यह प्रवृत्ति दक्षिण व पष्चिमएशिया में अधिक नजर आती है। अगर हम पिछले कुछ दशकों की बात करें तो धर्म की राजनीति में घुसपैठ की शुरूआत हुई ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के साथ। इसके पहले, मुसादिक की सरकार का तख्ता पलट दिया गया था। मुसादिक, सन् 1953 में प्रजातांत्रिक रास्ते से ईरान के प्रधानमंत्री चुने गए थे। उन्होंने देश  के कच्चे तेल के भंडार का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो, पष्चिम विशेष कर अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों को पसंद नहीं आया क्योंकि इससे उनका मुनाफा प्रभावित हो रहा था। मुसादिक सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद, अमरीका के पिट्ठू शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी गई। इसके बाद हुई एक क्रांति के जरिये अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। खुमैनी और उनके साथी कट्टरवादी इस्लाम के झंडाबरदार थे। उनके सत्ता में आने से पष्चिमी मीडिया में हलचल मच गई और इस्लाम को ‘आने वाले समय का सबसे बड़ा खतरा’ बताया जाने लगा। जहां तक दक्षिण एशिया का सवाल है, पिछले कुछ दशकों में भारत में हिंदू धर्म की पहचान की राजनीति परवान चढ़ी और पाकिस्तान में जिया-उल-हक ने राजनीति का इस्लामीकरण किया। इस्लाम की मौलाना मौदूदी की व्याख्या का इस्तेमाल, जिया-उल-हक ने अपनी सत्ता को मजबूती देने के लिए किया। इसके कुछ समय बाद, म्यंामार में अशिन विरथू जैसे लोगों का उदय हुआ, जिसे बर्मा का बिन लादेन कहा जाने लगा। श्रीलंका में बौद्ध पुरोहित वर्ग ने धर्म के नाम पर राजनीति में घुसपैठ शुरू कर दी। इसी दौर में अमरीका में ईसाई कट्टरवाद का बोलबाला बढ़ा।
न्यूयार्क के डब्ल्यूटीसी टाॅवर पर 9/11 के हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इसके जरिये इस्लाम को आतंकवादी हिंसा के कीचड़ में घसीट लिया गया। तब से लेकर आज तक यह आम धारणा बनी हुई है-बल्कि मजबूत हुई है-कि इस्लाम और मुसलमान, आतंकवादी हिंसा की जड़ में हैं। इस्लाम का राजनीति मे उपयोग और कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करने के कारण इस धारणा को मजबूती मिली और पूरी दुनिया में मुसलमानों की छवि खराब हुई।
लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दर्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित वर्ग उनकी पहचान बन गए और अब भी बने हुए हैं।
सामंती, प्राक्-औद्योगिक समाज में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारियों के बीच गठजोड़ हुआ करता था। पुरोहित वर्ग ने ही इस अवधारणा को प्रस्तुत किया कि राजाओं को शासन करने का दैवीय अधिकार है। यूरोप में राजा और पोप हमराही हो गए, इस्लामिक दुनिया के बड़े हिस्से में नवाब और शाही इमाम में दोस्ती हो गई और हिंदू धर्म के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजा और राजगुरू एक साथ खड़े दिखने लगे। इस गठजोड़ का लाभ यह हुआ कि शासक अब अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में  केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर सकते थे। आश्चर्य  नहीं कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया। अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’ बताता था। इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा  जिहाद करते थे। हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी।
जिन देशों में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई और समाज पर सामंती-पुरोहित वर्ग का शिकंजा ढीला हो गया, वहां धर्म को उसके दायरे में सीमित कर दिया गया। धर्म, हर व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है, यह मान्यता पुष्ट हुई। राज्य सभी नागरिकों को समान दर्जा देने लगा, चाहे उनकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इसके विपरीत, दक्षिण एशिया  में या तो  धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई और या फिर अधूरी रह गई। जमींदारों और पुरोहितों के अस्त होते वर्गों ने जोरशोर से धर्म के नाम पर राजनीति शुरू कर दी। भारत में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक धाराएं उभरीं, जिनको बढ़ावा दिया राजाओं, नवाबों और जमींदारों के एक तबके ने। बाद में शिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इन धाराओं का हिस्सा बन गए। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादी उभरे, जिनका नेतृत्व जिन्ना, सावरकर व गोलवलकर जैसे उच्च शिक्षित श्रेष्ठी वर्ग के सदस्यों के हाथों में था। इन सांप्रदायिक धाराओं ने हमारे औपनिवेषिक षासकों को उनकी ‘‘फूट डालो और राज करो’’ की नीति को लागू करने में मदद की। औपनिवेशिक ताकतें, जो शनैः शनैः साम्राज्यवादी ताकतें बनती जा रही थीं, का आर्थिक प्रभुत्व बनाए रखने में सांप्रदायिक ताकतों ने उनकी मदद की। इसके विपरीत, मौलाना अबुल कलाम आजाद और मोहनदास करमचंद गांधी जैसे नेता, धार्मिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष राज्य और समाज के हामी थे। सांप्रदायिक धाराएं जहां दूसरे समुदायों के विरूद्ध विष वमन करती थीं वहीं ये नेता सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की नीति में विष्वास रखते थे और उस पर अमल भी करते थे।
समय के साथ दक्षिण एषिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है। भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का। श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है। इस हिंसा का राजनैतिक लक्ष्य और एजेंडा है प्राक्-आधुनिक सामंतवादी मूल्यों को आधुनिक कलेवर में समाज पर लादना। जाति और लैंगिक पदानुक्रम के सामंती मूल्यों को मजबूती देने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जो आधुनिक मालूम होती है। कई बार समकालीन संदर्भों के अनुरूप इन मूल्यों में थोड़े-बहुत परिवर्तन भी कर लिए जाते हैं।
धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है। जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा। समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पष्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था। बोको हरम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है। यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से। अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही हैं।
अलकायदा के उभार के पीछे कई कारक थे। इनमें से एक था जिया-उल-हक द्वारा पाकिस्तान का इस्लामीकरण। जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की स्थापना की, जिनका इस्तेमाल युवाओं के दिमाग में जहर भरने के लिए किया जाने लगा। सउदी अरब से इस्लाम के वहाबी संस्करण का आयात कर लिया गया। वहाबियों की यह मान्यता है कि शासक, ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। इस्लाम के इस संस्करण के अनुसार, जो उनसे सहमत नहीं है, वह काफिर है और काफिर की जान लेना पवित्र जिहाद है। जो लोग इस जिहाद में मारे जाते हैं उन्हें जन्नत नसीब होती है। अलकायदा के खूनी अभियान को सबसे
अधिक मदद अमरीका से मिली, जिसने लगभग 800 करोड़ डाॅलर और 7000 टन असला अलकायदा को उपलब्ध करवाया। कैंसर की तरह अलकायदा धीरे-धीरे पूरे दक्षिण एशिया में फैल गया और उसे उखाड़ फेंकना मुष्किल होता गया।
तो अब हमारे सामने आगे की राह क्या है? अलग-अलग काल में धर्म की अलग-अलग भूमिका रही है। हमें धर्मों की संत परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। हमें लोगों को यह बताना होगा कि धर्म एक नैतिक षक्ति है और धर्म के नाम पर हिंसा किसी भी स्थिति में जायज़ नहीं है। और यह भी कि धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा का असली उद्देष्य पुरातनपंथी मूल्यों को समाज पर लादना है। धार्मिक विद्वानों और अध्येताओं को धर्मों के नैतिक पक्ष पर जोर देना चाहिए और लोगों को पहचान से जुड़े मुद्दों और बाहरी आडंबर से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए।
-राम पुनियानी

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

भाजपा का दलित प्रेम अर्थात दलितों का ब्राह्मणीकरण



    पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कई दलित नेताओं जैसे राम विलास पासवान और रामदास अठावले के साथ गठजोड़ किया था। उस ने उदित राज को अपनी पार्टी में शामिल करके दलितों में अपनी घुस पैठ बढ़ाई थी। चुनाव परिणाम से सिद्ध हुआ कि इसमें उसे आशातीत सफलता मिली थी। उत्तर प्रदेश में तो वह सभी 18 आरक्षित सीटें जीत गई थी। इससे प्रोत्साहित होकर और वर्तमान उपचुनावों के मद्देनजर उस ने दलितों को आकर्षित करने का अभियान तेज कर दिया है। इस हेतु उसने कई रणनीतियाँ अपनाई हैं। पहली रणनीति उनकी हिन्दू पहचान को उभारने की है और उन्हें बड़े हिन्दू समूह का हिस्सा बनाने की है। इसके लिए उसने राजनीति के संप्रदायीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत दलितों को मुसलमानों से लड़ाने की नीति अपनाई है। उसने दलितों के मुसलमानों के साथ सामान्य विवादों को हिन्दू-मुस्लिम झगड़े का रंग देने का काम किया है। उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद हिन्दू-मुस्लिम टकराव की घटनाओं में से लगभग 70 घटनाएँ दलित मुस्लिम टकराव की थीं। इन में मुख्य मुरादाबाद जिले के कांठ गाँव की लाउड स्पीकर वाली घटना, सहारनपुर में सिख- मुस्लिम फसाद की घटना थी, जिस में हिन्दुओं की तरफ से सब से अधिक दलित ही गिरफ्तार हुए थे तथा अन्य दलित लड़की और मुस्लिम लड़का या मुस्लिम लड़की और दलित लड़का वाली घटनाएँ शामिल हैं। इस प्रकार कम से कम उत्तर प्रदेश में तो भाजपा ने हिन्दू मुस्लिम फसाद के मामलों में दलितों को हिन्दू पक्ष का एक प्रमुख हिस्सा बना लिया है। इससे पहले भी भाजपा बाल्मीकियों, खटिकों और जाटवों का हिन्दू-मुस्लिम फसाद में इस्तेमाल करती रही है।
    भाजपा ने दलितों को आकर्षित करने के लिए दूसरा हथियार उनके ब्राह्मणीकरण का अपनाया है। इसके द्वारा उस ने उन दलित उपजातियों में अपनी घुसपैठ बढ़ाई है जो अभी भी कट्टर हिन्दू हैं और दलितों की बड़ी उपजातियों के विरोध में रहती हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में चमार/जाटव दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और पासी, बाल्मीकि, धोबी और खटिक छोटी उपजातियाँ हंै। परम्परा से यह छोटी उपजातियाँ चमार/जाटव उपजाति से प्रतिस्पर्धा और प्रतिरोध में रही हैं। इसीलिए ये उपजातियाँ राजनैतिक तौर पर भी इस बड़ी उपजाति से प्रतिस्पर्धा में रही हैं। बसपा का सब से बड़ा आधार चमार/जाटव उपजाति रही है और यह छोटी उपजातियाँ बसपा के साथ थोड़ी हद तक ही जुडी थीं। यह उपजातियाँ बसपा से प्रतिक्रिया में भाजपा अथवा समाजवादी पार्टी के साथ रही हैं। दलितों के सामाजिक विभाजन का असर उन के राजनैतिक जुड़ाव पर भी दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में पिछले विधान सभा चुनाव में यह उप जातियाँ सपा की तरफ गई थीं और मायावती से रुष्ट हो कर चमार/जाटव वोटर भी सपा की तरफ गए थे। पूर्व में कांग्रेस और भाजपा भी इन जातियों को सीमित सीमा में अपनी पार्टी में समाहित करने में सफल रही हैं। मायावती की गलत नीतियों के कारण इन उपजातियों में यह धारणा पनप गई थी कि बसपा केवल चमारों/जाटवों की पार्टी है और इस का लाभ केवल उन्हीं तक सीमित है। इस आरोप में काफी सच्चाई भी है। अतः ये उप जातियाँ बसपा की जगह दूसरी पार्टियों में अपना स्थान ढूँढ़ती रही हैं और इधर बसपा से लगभग अलगाव में चली गई हैं, जिस का खामियाजा मायावती को 2012 और 2014 के चुनाव में भुगतना पड़ा। यही स्थिति रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के समय में थी। देश के दूसरे राज्यों में भी इसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। महाराष्ट्र में महार दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और चम्भार और ढेड छोटी उपजातियाँ हैं। वहाँ पर उसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। आन्ध्र प्रदेश में भी माला और मादिगा में सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। कर्नाटक में भी ऐसा ही उपजाति बँटवारा है। भाजपा की इन उपजातियों में काफी समय से पैठ रही है।
दलितों के इस राजनैतिक और सामाजिक बँटवारे का कारण राजनैतिक आरक्षण भी है। वर्तमान संयुक्त मताधिकार प्रणाली के अंतर्गत आरक्षित सीटों पर वही दलित जीत पाता है जो सवर्ण जातियों का वोट प्राप्त कर सकता है। चूँकि सवर्ण वोट सवर्ण राजनैतिक पार्टियों के पास रहता है अतः वे जिस को चाहते हैं वह ही जीत पाता  है। यह व्यवस्था दलित पार्टियों की सब से बड़ी कमजोरी है। अतः यह देखा गया है कि अधिकतर आरक्षित सीटें सवर्ण पार्टियों द्वारा ही जीत ली जाती हैं। इसीलिए सवर्ण पार्टियाँ अपने स्वामीभक्त और हलके फुल्के दलितों को खड़ा करके आरक्षित सीटें जीत लेती हैं और दलित पार्टियों के अच्छे से अच्छे उम्मीदवार हार जाते हैं। इसी कुचक्र में डॉ. अंबेदकर को दो  बार हार का मुँह देखना पड़ा था। दरअसल अलग मताधिकार के अंतर्गत दलितों को राजनैतिक  स्वतंत्रता का जो अधिकार मिला था उसे
गांधी जी ने अनुचित दबाव में पूना पैक्ट के अंतर्गत छीन लिया जिस का खामियाजा आज तक दलित भुगत रहे हैं। अब दलित राजनैतिक तौर पर बड़ी सवर्ण पार्टियों के गुलाम हैं और इस ने दलितों के अन्दर एक स्वार्थी और लम्पट तबके को पैदा कर दिया है जो चुनाव तो दलितों के नाम पर जीतता है परन्तु वफादारी सवर्ण आकाओं की निभाता है। भाजपा ने भी इस चुनाव में इसी व्यवस्था का लाभ फायदा उठाया है और सब से अधिक आरक्षित सीटें जीती हैं और आगे भी काफी आशान्वित है।
    दरअसल दलितों में शुरू से ही दो प्रकार की सांस्कृतिक विचारधारा पनपती रही हैं। एक हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ और दूसरी उसकी पक्षधर/पुराने समय में भक्ति आन्दोलन और वर्तमान में अम्बेडकरवाद के प्रभाव में कुछ उपजातियाँ भक्ति आन्दोलन के प्रभाव में ब्राह्मणवाद के विरोध में खड़ी हुई थीं और कुछ उपजातियाँ हिन्दू धर्म के दायरे में ही रहीं। पंजाब में आदि-धर्म आन्दोलनउत्तर प्रदेश में आदि-हिन्दू आन्दोलन, आंध्र में आदि-आंध्र, तमिलनाडु में आदि-द्रविड़ आन्दोलन और बंगाल में नमोशूद्र आन्दोलन इसके प्रमुख आन्दोलन रहे हैं। बीसवीं सदी में डॉ. अंबेदकर के प्रभाव में हिन्दू धर्म के खिलाफ एक देश व्यापी आन्दोलन चला जिस की परिणति 1956 में हिन्दू धर्म का त्याग और बौद्ध धम्म का स्वीकार है। एक तरफ हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धम्म ग्रहण करने वालों की संख्या में बहुत बड़ी वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर दलितों की छोटी उपजातियों का ब्राह्मणीकरण हो रहा है।
    हाल में आर.एस.एस. ने दलितों की छोटी हिन्दू उप-जातियों को पटाने के लिए तीन पुस्तकों का विमोचन किया है जिस में कहा गया है कि खटिक, बाल्मीकि और चमार पूर्व में क्षत्रिय जातियाँ थीं परन्तु मुसलमानों ने उन्हें अपना गुलाम बनाकर प्रताडि़त किया और नीच बना दिया और भाजपा उन्हें फिर से क्षत्रिय बनाकर सम्मान दे रही है। इस से कुछ दलित उपजातियों के भाजपा के जाल में फँसने की पूरी सम्भावना है क्योंकि एक तो वे अभी तक हिन्दू बनी हुई हैं और दूसरे वे बड़ी उपजातियों से प्रतिक्रिया में रहती हैं। इसके अलावा वर्तमान चुनाव प्रक्रिया से भाजपा उन्हें आरक्षित सीटें जितवाकर राजनैतिक लाभ भी पहुँचाने की स्थिति में है। इस हालत के लिए दलितों की राजनैतिक पार्टियाँ भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं जिन्होंने इन उपजातियों को उचित प्रतिनिधित्व न देकर भाजपा को उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने का अवसर दिया है, जिस से हिंदुत्व मजबूत हुआ है। एक तरीके से जातिवादी राजनीति भी हिंदुत्व को ही मजबूत करती है क्योंकि
धर्म की राजनीति जाति को माध्यम  बनाकर वोटों का ध्रुवीकरण करती है।
    अतः दलितों को जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा जो जाति को तोड़कर दलितों और गैर दलितों को एकजुट कर सकती है। हिंदुत्व दलितों के लिए सब से बड़ा खतरा है क्योंकि हिंदुत्व वर्ण व्यवस्था का पक्षधर है जो जाति व्यवस्था को मजबूत करता है। जाति व्यवस्था शोषण की व्यवस्था है जिस का सबसे बड़े शिकार दलित ही हैं। अतः दलितों को आर.एस.एस. द्वारा जाति उच्चीकरण के नाम पर फेंके जा रहे हिंदुत्व के जाल में फँसने से बचना होगा। उन्हें जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा। उन्हें अपने फायदे के लिए हिंदुत्ववादी ताकतों के साथ जाति के नाम पर सौदा करने वाले दलित नेताओं से भी बचना होगा। उनकी मुक्ति तो डॉ. अंबेदकर के जाति विनाश के आन्दोलन को मजबूत करने से ही संभव है न कि जाति को सुदृढ़ करने से। धर्म आधारित हिंदुत्व की जातिवादी राजनीति उन्हें गुलामी की ओर ही ले जाएगी, मुक्ति की ओर नहीं। उन्हें डॉ. अंबेदकर के भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को पूरा करने में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।
- एस.आर.दारापुरी
 मोबाइल: 09415164845

शनिवार, 26 जुलाई 2014

भारत: समुदायों का संघ

गत 25 जून को महाराष्ट्र की मंत्रिपरिषद ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का निर्णय लिया। मराठा,राज्य की आबादी के लगभग 32 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण, कुनबी मराठाओं को ओबीसी की हैसियत से पहले से ही मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। मंत्रिमंडल ने यह निर्णय भी लिया कि 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी 5 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। मुसलमान, राज्य की आबादी का 10.6 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण ओबीसी की सूची में शामिल मुस्लिम जातियों को मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। वर्तमान में जुलाहा, मोमिनए अंसारी, रंगरेज, तेली, नक्कासी, मुस्लिम काकर, पिंजारी और फकीर जातियों के मुसलमानों को ओबीसी की हैसियत से आरक्षण मिल रहा है। इस नए 21 प्रतिशत आरक्षण के साथ, राज्य में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 73 हो गया है। बंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर, मराठाओं को दिए गए 16 प्रतिशत आरक्षण को कई आधारों पर चुनौती दी गई है, जिनमें से प्रमुख यह है कि मराठा, शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं। महाराष्ट्र के 17 मुख्यमंत्रियों में से 10 मराठा थे। वर्तमान में राज्य विधानसभा के 288 सदस्यों में से 152 मराठा हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मराठा,राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली हैं। वे बड़ी संख्या में सहकारी शक्कर मिलों,सहकारी बैंकों और व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों का संचालन कर रहे हैं। यहां तक कि यह मराठी राज्य, मराठा राज्य बन गया है।
संविधान के अनुच्छेद 16 ;4 के अनुसार राज्य ,नागरिकों के उन पिछड़े वर्गों के सदस्यों को नियुक्तियों या पदों में आरक्षण दे सकता हैए जिन्हें सरकारी सेवाओं में उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।
यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या मराठा और 50 मुस्लिम जातियां, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं? मंत्रिमंडल ने मराठा समुदाय के बारे में निर्णय, नारायण राणे समिति की रपट के आधार पर लिया जबकि मुस्लिम समुदायों को आरक्षण देने का आधार बनी डाक्टर एम. रहमान की अध्यक्षता में नियुक्त अध्ययनदल की रपट। दरअसल, मराठाओं में इतनी उपजातियां हैं कि उन्हें एक समुदाय कहना ही गलत है। मराठा समुदाय के दो मुख्य हिस्से हैं.किसान उपजातियां व योद्धा उपजातियां। पहले, कुनबी कहलाते हैं और दूसरे शायनावकुली। योद्धा उपजातियों का प्रभुत्व अधिक है। दोनों अपनी अलग पहचान कायम रखे हुए हैं और उनके आपस में वैवाहिक संबंध नहीं होते। अतः उपजातियों के इन दोनों समूहों को एक समुदाय मानकर, उसे पिछड़ेपन की कसौटी पर कसना ही गलत है।
यह दिलचस्प है कि अध्ययन दल ने जिन 50 मुस्लिम जातियों को पिछड़ा बताया या माना है, उनके नाम न तो अध्ययन दल ने सार्वजनिक किए और ना ही सरकार ने। ये वे समुदाय हैं जिन्हें नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध होगा। जहां मराठा समुदाय के सभी सदस्यों को आरक्षण का लाभ मिलेगा वहीं 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों के उन सदस्यों को यह लाभ नहीं मिलेगा, जो कि क्रीमिलेयर में आते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं बल्कि पिछड़ेपन को बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पिछड़ेपन को नापने के लिए किन मानकों का इस्तेमाल किया गया है। जहां तक अध्ययन समूह का सवाल है, उसकी रपट सन् 2001 की जनगणना,सन् 2006 की सच्चर समिति रपट और सन् 2009 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज के प्रोफेसर अब्दुल शब्बन द्वारा किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का संकलन मात्र है। तीनों रपटों में न तो पिछड़े मुस्लिम समुदायों के नाम बताए गए हैं और ना ही उनका अलग से अध्ययन किया गया है। उदाहरणार्थ, इनमें से किसी रपट में नक्षबंदी, बेग, मीर,ए हकीम, मुल्ला, हैदरी, नूरी, उस्मानी इत्यादि समूहों के शैक्षणिक स्तर, साक्षरता, जीवनयापन का जरिया, रोजगार, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, आमदनी का स्तरए लैंगिक अनुपात, बैंक ऋण व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आदि के संबंध में अलग से कोई आंकड़े नहीं दिए गए हैं। सारे आंकड़े सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय के हैं। जो चित्र इन रपटों से उभरता है वह निश्चय ही निराशाजनक है। बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर रहे हैं और इसका कारण गरीबी व बाल मजदूरी है। यद्यपि मुसलमानों की साक्षरता दर 78.1 है तथापि उनमें से केवल 2.2 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। मुस्लिम महिलाओं में ग्रेजुएशन करने वालों का प्रतिशत मात्र 1.4 है। शहरों और गांवों में रहने वाले मुसलमानों में से लगभग 60 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। मुसलमानों की कार्य सहभागिता दर ;आबादी का वह हिस्सा जो या तो कोई काम कर रहा है अथवा ढूंढ रहा हैद्ध केवल 32.4 प्रतिशत है और महिलाओं के मामले तो यह 12.7 प्रतिशत मात्र है। महाराष्ट्र काडर में कोई आईएएस अधिकारी मुसलमान नहीं है और पुलिस बल में केवल 4.4 प्रतिशत मुसलमान हैं। इस परिस्थिति में यह समझना मुश्किल है कि मंत्रिमंडल इस निर्णय पर कैसे पहुंचा कि पूरे मुस्लिम समुदाय नहीं वरन् केवल 50 मुस्लिम जातियों को आरक्षण की जरूरत है।
आरक्षण की राजनीति
आरक्षण के जरिए, राज्यए शनैः शनैः समाज में व्याप्त गैर.बराबरी को दूर करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करता है। आरक्षण के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि समाज के उस वर्ग के नागरिकों, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से आगे बढ़ने के उपयुक्त व पर्याप्त अवसर नहीं मिले,को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए जाएं ताकि जो क्षति उन्हें हुई है उसकी पूर्ति हो सके। परंतु महाराष्ट्र सरकार के आरक्षण संबंधी हालिया फैसले का इस संवैधानिक दायित्व की पूर्ति से कोई लेना.देना नहीं है। आरक्षण,दरअसल, सत्ताधारी पार्टी द्वारा किसी जाति या समुदाय के वोट कबाड़ने के लिए उसे आकर्षित करने का जरिया बन गया है। शरद पवार ने तो मीडिया से यह तक कह दिया कि अगर सत्ताधारी दल चुनाव में लाभ उठाने के लिए भी आरक्षण देता है तो इसमे गलत क्या है। मुसलमान लगभग पिछले 30 सालों से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अपने लिए आरक्षण की मांग करते आ रहे हैं। परंतु उनकी मांग की अब तक अनसुनी होती आई है। 16वें आम चुनाव में भाजपा.शिवसेना.आरपीआई गठबंधन द्वारा महाराष्ट्र की 48 में से 42 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर लेने के बाद कांग्रेस को यह समझ में आया कि जनता उसके साथ नहीं है। और इसलिए उसकी सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने का फैसला किया। मुसलमानों की कुछ जातियों को आरक्षण देने का उद्देश्य भी उनके पिछड़ेपन को समाप्त करना नहीं है बल्कि मराठा समुदाय को दिए गए आरक्षण को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना है। दरअसल, शक्तिशाली मराठा समुदाय को खुश करने के सरकारी प्रयास में मुसलमान अनायास ही लाभांवित हो गए हैं। वरना, क्या कारण है कि अगर सरकार मुसलमानों के एक तबके को आरक्षण देना चाहती थी तो इस तबके की पहचान के लिए आवश्यक प्रयास क्यों नहीं किए गए।

पहचान की राजनीति व कांग्रेस और भाजपा की धर्मनिरपेक्षता
जब भारत के संविधान का निर्माण हुआ था तब उसकी उद्देशिका में'धर्मनिरपेक्षता' शब्द नहीं था। परंतु धर्मनिरपेक्षता, संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा थी। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 16 में प्रत्येक नागरिक को समानता की गारंटी दी गई है,भले ही उसका धर्म या जाति कोई भी हो। इसी तरह, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत दी गई स्वतंत्रताएं भी समस्त नागरिकों को हासिल हैं। अनुच्छेद 25 देश के सभी रहवासियों को अंतर्रात्मा की स्वतंत्रता व अपनी पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। जो एकमात्र अधिकार धार्मिक समुदायों को है वह यह है कि वे धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन कर सकते हैं और धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाओं की स्थापना व उनका प्रबंधन कर सकते हैं। अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष या धार्मिक संस्था को प्रोत्साहन देने के लिए टैक्स देने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 28ए राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है।
यह स्पष्ट है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार व स्वतंत्रताएंए व्यक्तियों को उपलब्ध हैं न कि समुदायों या जातियों को। हां, संवैधानिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं से लैस नागरिक, अपनी सामाजिकए सांस्कृतिक या धार्मिक आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिए एकसाथ मिलकर किसी संस्था का गठन कर सकते हैं। परंतु किसी भी स्थिति में, व्यक्तियों को उपलब्ध अधिकार व स्वतंत्रताएंए उनके समूह को स्थानांतरित नहीं हो सकतीं, चाहे वह समूह धार्मिक हो, नस्लीय, जातिगत या भाषायी। संविधान की यह मान्यता है कि ये समूह स्थायी नहीं है और इनकी दीवारें इतनी ऊँची नहीं होतीं कि कोई इन्हें लांघ न सके। सरल शब्दों में हम कहें तो एक धर्म का व्यक्ति जब चाहे किसी दूसरे धर्म को अपना सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई धार्मिक समूह,स्थायी संस्था नहीं है। उसके पुराने सदस्य उसे छोड़कर जा सकते हैं और नए सदस्य उसमें शामिल हो सकते हैं। हां, इस स्थिति के कुछ अपवाद भी हैं जैसे महिलाएं, बच्चे, अनुसूचित जाति व जनजातियों के सदस्य या शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग या ऐसे लोग जिन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय से वंचित रखा गया हो। ऐसे सभी नागरिक, सामूहिक रूप से कुछ अधिकारों के तब तक पात्र हैं जब तक कि वे कमजोर, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े व भेदभाव के शिकार बने रहते हैं। इस तरह के वर्गों को आरक्षण व अन्य कल्याण कार्यक्रमों से लाभांवित होने का अधिकार है।
परंतु राजनैतिक दल अपने संकीर्ण लाभ के लिए इस संवैधानिक सिद्धांत की अवहेलना करते हैं। यह सुनिश्चित करने की बजाय कि हर व्यक्ति को वे स्वतंत्रता,मिलें, जिनका वह पात्र है और किसी को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय से वंचित न किया जाए, राजनैतिक दल जाति, समुदाय या नस्ल पर आधारित समूहों के हितों को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। इससे इन समूहों को अपनी अलग पहचान को मजबूती देने में लाभ नजर आने लगता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है। श्रेष्ठी वर्ग को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या नस्ल के आधार पर अलग पहचान को मजबूती देने में मदद करने के लिए राजनैतिक दल, सरकारी संसाधनों व सत्ता का दुरूपयोग करते हैं और जाति या समुदाय के आधार पर लोगों को उपकृत कर अपना हितसाधन करते हैं। कांग्रेसए समाजवादी पार्टी व बसपा जैसे राजनैतिक दलए जो कि स्वयं को 'सेक्युलर'बताते हैं,आर्थिक व राजनैतिक लाभों का वितरण मुख्यतः जाति के आधार पर करना चाहते हैं,जिसमें उनकी पंसदीदा जाति को उसकी पात्रता से अधिक हिस्सा मिले। दूसरी ओर, भाजपा, लाभों, पदों व अवसरों के वितरण का आधार धर्म को बनाना चाहती है।
इस प्रक्रिया में ये पार्टियां भारत को धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा व नस्ल पर आधारित समुदायों के महासंघ में परिवर्तित कर रही हैं.एक ऐसे महासंघ में, जिसमें विभिन्न समुदायों को अलग.अलग विशेषाधिकार प्राप्त हों। कुछ लोग यह मांग करते हैं कि मराठाओं को अधिक अधिकार व लाभ मिलने चाहिए,य कुछ अन्य चिल्ला.चिल्लाकर कहेंगे कि मुसलमानों को अन्य समुदायों की तुलना में अधिक सुविधाएं मिलनी चाहिए तो कुछ अन्य का दावा होगा कि हिन्दुओं का देश के संसाधनों पर अधिक अधिकार है। तथ्य यह है कि ये सभी वर्ग मिलकर हमारे संविधान का मखौल बना रहे हैं और कानून के राज को कमजोर कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे वातावरण में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली संस्कृति का बोलबाला हो जाता है। उस समुदाय या जाति को अधिक तवज्जो मिलती है जिसकी आबादी अधिक है या जिसके सदस्यों का राजनीति में ज्यादा दखल है। विभिन्न समुदायों के बीच अधिक से अधिक लाभ पाने की प्रतियोगिता भी चलती रहती है जिसके कारण विवाद और हिंसा होते हैं। क्या ही अच्छा हो कि हमारे राजनेता लोगों को समुदायों के तौर पर देखने की बजाए यह सुनिश्चितत करने का प्रयास करें कि हर व्यक्ति को समानता व समान अवसर का अधिकार मिले। और अगर राजनेता ऐसा नहीं करते तो क्या प्रजातंत्र की अन्य संस्थाएं सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए आगे आयेंगी?
 -इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 2 मई 2014

चुनाव-आतंकवाद की राजनीति

   लोकतंत्र में आम चुनाव एक ऐसा अवसर होता है जब यह अपेक्षा की जाती है कि सत्ता पक्ष द्वारा उसके कार्यकाल में किए गए कार्यों का विश्लेषण किया जाएगा। स्वयं सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियाँ गिनवाएगा। विपक्षी दल उसकी नाकामियों और नीतियों पर सवाल उठाएँगे। सभी दल देश और जनता की भलाई के लिए अपनी योजनाओं कार्यक्रमों की घोषणा करेंगे। जनहित के मुद्दों पर सकारात्मक बहस होगी। समाज के वंचित, पीडि़त और शोषित वर्गों को अपनी आवाज (आम तौर पर) गूँगे, बहरे और अंधे कानों और आँखों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी, क्योंकि अक्सर सत्ता के नशे पूँजीतियों और कारपोरेट घरानों की चकाचैंध में राजनैतिक दलों के नेता न सुन पाते हैं और न देख पाते हैं। लेकिन यह एक कड़ुवी सच्चाई जिसका अनुभव हम इससे पहले के आम चुनावों में भी कर चुके हैं कि चुनावी सरगरमियाँ जैसे-जैसे तेज होती जाती हैं इन जनहित के मुद्दों को बड़ी धूर्तबाजी से हमारे राजनेता हाशिए पर पहुँचा देते हैं। फिर वही वंशवाद, व्यक्तिवाद आस्था, को भय और लालच के हथियार का प्रयोग करते हुए पूँजीपतियों और कारपोट घरानों के हजारो हजार करोड़ रूपयों के चुनावी निवेश से भोली भाली जनता को परोसा जाता रहा है। वही वातावरण इस चुनाव में निर्मित किया जाता हुआ महसूस हो रहा है। पहले वंशवाद और व्यक्तिवाद के साथ आस्था को ज्यादा महत्व दिया जाता था। भय का हथियार आमतौर पर सेकुलर माने जाने वाले दल मुसलमानों, ईसाइयों और दलितों को अपने पक्ष में रहने को मजबूर करने के लिए करते थे। लेकिन शायद 16वीं लोकसभा के लिए होने वाला यह चुनाव इस लिहाज से सबसे अलग होगा कि इसमें ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना की (अगर इसकी धार को कुंद करने के लिए समय रहते सकारात्मक और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो) सबसे बड़ी भूमिका होगी। यह भावना केवल मुसलमानों या ईसाइयों में ही नहीं होगी, जो लगातार पिछले कुछ वर्षो में होने वाले दंगों के कारण विकसित हो चुकी है, बल्कि इस बार उसका सबसे बड़ा शिकार बहुसंख्यक समाज को बनाने की तैयारी है। उसे मुद्दा बनाने के लिए माहौल बनाया जा रहा है। रोटी, कपड़ा, मकान, किसान, मजदूर, बुनकर, दलित, आदिवासी, जल, जंगल, जमीन जैसे बुनियादी सवालों की बात का शायद नेताओं के भाषणों और स्तम्भकारों के लेखों को श्रृंगारित करने के लिए ही किया जाएगा। निश्चित रूप से बहुसंख्यकों में ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना को परवान चढ़ाने और इसे सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करने का सबसे प्रभावी हथियार होगा ‘आतंकवाद’। लगता है कि संघ और भाजपा ने इसके लिए मन बना लिया है और विभिन्न एजेंसियों का उन्हें अपने पक्ष में माहौल बनाने में पूरा सहयोग भी मिल रहा है।
    जिस तरीके से और जिस अंदाज में ‘आतंकवाद’ के मुद्दे को उछाला जा रहा है उससे साफ है कि मकसद किसी सकारात्मक बहस शुरू करने का नहीं है बल्कि बहुसंख्यक समाज में ‘भय’ और ‘असुरक्षा’ की भावना उत्पन्न करके चुनावी लाभ उठाने का है। अगर यह कहा जाए कि आतंकवाद के नाम पर पिछले दिनों गिरफ्तारियों में जो तेजी आई है उसका इससे सीधा सम्बन्ध है तो गलत न होगा। हो सकता है कि पहली नजर में यह निष्कर्ष किसी आशंका या पूर्वागह का नतीजा मालूम हो लेकिन आतंकवाद के मामले में कई संस्थाओं, प्रतिष्ठानों और राजनैतिक दलों के दृष्टिकोण और व्यवहार इस निष्कर्ष के लिए ठोस आधार उपलब्ध कराते हैं। जाहिर सी बात है जब हम आतंकवाद के नाम पर होने वाली गिरफ्तारियों पर उँगली उठाते हैं तो इसका मतलब होता है खुफिया एवं जाँच एजेसियों को कटघरे में खड़ा करना। आखिर वह किसी राजनैतिक दल या गठबंधन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए ऐसा क्यों करेंगे, आतंकवाद एक वास्तविक समस्या है। धमाके हो रहे हैं, बेगुनाह मारे जा रहे हैं फिर तो निश्चित है कि इस अपराध को अंजाम देने वाले भी होंगे। यदि कुछ लोग इस आरोप में पकड़े जा रहे हैं तो इसमें हैरत की क्या बात है, अगर कोई निर्दोष है तो उसके लिए अदालत का दरवाजा खुला हुआ है फिर इसमें किसी आशंका की गुंजाइश कहाँ है, लेकिन पिछले अनुभवों और वर्तमान कार्रवाइयों को जोड़ कर देखें तो हम यकीनी तौर पर इससे अलग सोचने को मजबूर हो जाते हैं।
    सबसे पहले संदेह के लिए पूरी गुंजाइश वहीं पैदा हो जाती है जब आतंकवाद को किसी धर्म या समुदाय से जोड़ कर देखने की कोशिश की जाती है। भारत में इसे इस्लाम और मुसलमानों से जोड़ने की शुरूआत संघ और भाजपा ने की और खुफिया एवं जाँच एजेंसियों तथा मुख्य धारा की मीडिया का उनको पूरा सहयोग मिला। आडवाणी का वह वाक्य सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते लेकिन जितने आतंकवादी हैं सब मुसलमान हैं, कौन भूल सकता है। देश का मुसलमान शुरू से ही यह कहता आ रहा था कि आतंकी घटनाएँ एक साजिश हैं जिसको संचालित  कोई और करता है और खुफिया एवं जाँच एजेंसियाँ फँसाती मुसलमानों को हैं। महाराष्ट्र ए.टी.एस. प्रमुख स्व० हेमन्त करकरे ने 2008 में आतंक के उस चेहरे को बेनकाब किया जिसकी आशंका मुसलमान वर्षों पहले से जताता आ रहा था। यह रहस्य खुला तो एक के बाद कई बड़ी आतंकी वारदातों में आतंक के इस नए चेहरे का नाम जुड़ता गया। मालेगाँव 2006 और 2008 के धमाकों में वही हाथ पाए गए जो समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद बम धमाकों के अपराध में शामिल थे। मगर करकरे की 26/11 के मुम्बई आतंकी हमलों में हत्या के बाद उनके द्वारा की गई जाँच मालेगाँव 2006 के धमाकों से आगे उस दिशा में न बढ़ने देने के लिए आई.बी. और महाराष्ट्र ए.टी.एस. ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और वह उस प्रयास में काफी हद तक सफल भी रहे। उस धमाके में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित समेत अभिनव भारत तथा सनातन संस्थान से जुड़े कई आरोपियों की गिरफ्तारी और चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी मालेगाँव के बेगुनाह फँसाए गए, मुस्लिम युवकों को जमानत तक पाने में हर रुकावट खड़ी की गई। इसी आरोप में संघ के आदिवासियों में काम करने के जिम्मेदार और गुजरात के डांग जिले में शबरी आश्रम के संस्थापक असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के तहत पहले दिल्ली में और उसके एक महीना बाद राजस्थान की अदालत में अपना अपराध स्वीकार करते हुए मक्का मस्जिद, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस, और मालेगाँव 2006 और 2008 के दोनों
धमाकों में अपने साथियों की भूमिका का खुलासा कर दिया। तब यह भी पता चला कि उन धमाकों में संघ से जुड़े कई लोग शामिल थे। सुनील जोशी जिसकी 2007 में उसके ही साथियों ने हत्या कर दी थी, संघ का प्रचारक था। सुनील की तरह मध्यप्रदेश के ही रहने वाले लोकेश शर्मा और संदीप डांगे, रामजी कालसांगर भी संघ के प्रचारक थे और इन सभी ने बम बनाने और उसे प्लांट करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। असीमानंद के इकबालिया बयान के अनुसार संघ के बड़े नेता और राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार स्वयं षड्यंत्र रचने और धमाकों की योजना बनाने में प्रत्यक्ष शामिल थे। उन्होंने पैसे और कुछ बम प्लान्टर भी उपलब्ध करवाए थे। इतना ही नहीं संघ के वर्तमान सर संघ चालक को भी न केवल इन गतिविधियों की जानकारी थी बल्कि उनका आर्शीवाद भी प्राप्त था। लेकिन किसी एजेंसी ने इस सिलसिले में किसी बड़े नेता को गिरफ्तार नहीं किया। हद तो यह है कि सूत्रों द्वारा मीडिया में उनको क्लीन चिट दी जाने लगी। कई नेताओं से पूछताछ की भी औपचारिकता एजेंसियों ने पूरी नहीं की। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आरोपियों की गिरफ्तारी और उनसे पूछताछ में जाँच एजेंसियाँ इतने बड़े-बड़े मामलों में उनकी संलिप्तता का राज क्यों नहीं उगलवा पाई थीं, बेगुनाह मुसलमानों के गिरफ्तारी के बाद ही कबूलनामें हासिल कर लेने में माहिर जाँचकर्ता अचानक इन आरोपियों के मामले में इतने अक्षम क्यों नजर आने लगे, या फिर यह मान लेना चाहिए कि नीयत का फर्क था,        चूँकि इन तमाम धमाकों में मुसलमानों को गिरफ्तार करके केस को पहले ही हल करने का दावा किया जा चुका था और इससे पहले तक होने वाले हर धमाके को इस्लामी आतंकवाद या जिहादी आतंकवाद की संज्ञा दी जाती रही थी इसलिए आतंक के इस चेहरे के सामने आने के बाद इसे ‘भगवा’ आतंकवाद कहा गया। हालाँकि यह उतना ही गलत है जितना कि आतंकवाद को ‘इस्लामी या जेहादी’ आतंकवाद का नाम देना। आतंकवादी धमाकों में इस नए चेहरे के काले कारनामों की सूची लम्बी होने लगी और 2003 तक की कई घटनाओं में इन्हीं के हाथ होने का खुलासा हुआ। इसमें जालना, पूरना, परभनी, मोडासा और जम्मू की पीर मट्ठा मस्जिद के धमाके भी शामिल थे। यह भी पता चला कि सुनील जोशी ने कई मंदिरों में पाइप बम धमाके की योजना बनाई थी ताकि हिन्दुओं को भड़काया जा सके। इसके लिए उसने अपने एक दोस्त के कारखाने में लोहे के कुछ विशेष पाइप भी बनवाए थे। सुनील की 2007 में हत्या हो जाने के कारण इस दिशा में जाँच आगे नहीं बढ़ सकी थी। या यह कहा जाए कि खुफिया और जाँच एजेंसियों को, जो जाँच को इस दिशा में आगे बढ़ाना नहीं चाहती थीं इसका बहाना मिल गया और बात वहीं खत्म हो गई। 2006 में नांदेड़ में बम बनाते हुए बजरंग दल के लोग मारे गए थे और वहाँ से नकली दाढ़ी, टोपी, और कुर्ता पाजमा बरामद हुआ था जो इसका साफ प्रमाण था कि बम धमाके करके मुसलमानों को फँसाने का काम किया जा रहा है। लेकिन उसकी जाँच सही तरीके से नहीं की गई और मामला रफा-दफा हो गया। कानपुर में बन बनाते समय होने वाली घटना की कहानी भी बिल्कुल नांदेड़ जैसी ही थी। इसमें भी मारे जाने वाले बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के लोग थे। लेकिन यहाँ तो विस्फोटकों की मात्रा इतनी अधिक पकड़ी गई थी कि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को कहना पड़ा था कि पूरे कानपुर शहर को उड़ाने के लिए पर्याप्त थी। लेकिन इस मामले की जाँच भी आगे नहीं बढ़ी और फाइनल रिपोर्ट लगा कर मामला समाप्त कर दिया गया। गोवा में सनातन संस्थान के सदस्यों द्वारा स्कूटर पर ले जाया जाने वाला बम रास्ते में ही फट गया, मामला थोड़े समय के लिए मीडिया में आया और उसका अंजाम नांदेड़ और कानपुर जैसा ही हुआ। कितने ही स्थानों पर बम बनाते या ले जाते हुए होने वाले धमाकों को पटाखों की आड़ में छुपाया गया। यह सब सम्भव नहीं था यदि खुफिया और जाँच एजेंसियाँ ईमानदारी से काम करतीं और कोई कारण नही था कि इतने सघन अभियान के बाद अब तक भारत से आतंकवाद की जड़ें उखड़ न गई होतीं चाहे उसका नाम और रंग कुछ भी होता। जहाँ एक तरफ खुफिया और जाँच एजेंसियाँ इन आतंकवादियों को संरक्षण दे रही थी वहीं बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को उन्हीं धमाकों के आरोप में पकड़ रही थी और उनके खिलाफ सबूत गढ़ कर उनका जीवन नष्ट कर रही थीं और यातनाएँ देकर अपराध स्वीकार करवा रही थीं। इन सभी मामलों में फर्जी फँसाए गए मुस्लिम आरोपियों के मामले में पुलिस के पास (उसके  अनुसार) सबूत भी थे, बरामद किए गए बम और नक्शे भी थे और सरकारी गवाह भी थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सबूत कैसे बनाए जाते हैं और कहानी कैसे गढ़ी जाती है। खुफिया और जाँच एजेंसियों के अहलकार किस तरह से मुसलमानों को आतंकवादी बना कर पूरे समुदाय को बदनाम करने का काम करते थे और उसके समर्थन में झूठे सबूत गढ़ते थे उसका और ठोस सबूत मिलता है गुजरात के इनकाउंटरों से। विस्तार में जाए बिना इतना काफी होगा कि इशरत जहाँ, सोहराबुद्दीन, सादिक जमाल मेहतर और तुलसी प्रजापति फर्जी मुडभेड़ मामलों में कई बड़े पुलिस अधिकारी जेल में हैं। इशरत जहाँ केस में आई.बी. के स्पेशल डायरेक्टर राजेन्द्र कुमार और तीन अन्य आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल कर दी है। यह तो मात्र वह मामले हैं जो संयोग से खुल गए हैं। देश में इतने संवेदनशील मुद्दे पर इतना बड़ा फर्जीवाड़ा होता रहा, मुसलमान फँसाए जाते रहे जब उसका खुलासा हो गया तो अन्य वारदातों की पुनर्विवेचना के लिए सरकार और एजेंसियों को खुद पहल करनी चाहिए थी लेकिन इसकी बार बार माँग के बावजूद कोई कदम न उठाया जाना यह साबित करता है कि सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती जिससे उन चेहरों को फिर किसी आतंकवादी घटना से जुड़ा हुआ पाए जाने का रहस्य खुल जाने की सम्भावना मात्र भी हो। इन खुलासों के बाद से जितनी भी आतंकवादी वारदातें हुई हैं उनमें जब भी कभी ऐसी सम्भावना पैदा हुई है उसे तुरन्त खारिज किया गया है और जल्दबाजी में मुसलमान नौजवानों की गिरफ्तारियाँ हई हैं। पुणे जर्मन बेकरी धमाकें के मामले में हिमाचल बेग की गिरफ्तारी की बात हो या जंगली महाराज रोड धमाकों के दयानंद पाटिल में थैले में फटने वाले बम के बाद उसे मामूली चोट बता कर क्लीन चिट देने की बात, सब एक ही रणनीति की कड़ी मालूम होती हैं।
धीरे-धीरे फिर वही वातावरण बनाने का प्रयास लगातार महसूस होता है जो आतंकवाद के इस नए चेहरे के बेनकाब होने से पहले था। खुफिया और जाँच एजेंसियाँ मुख्य धारा की मीडिया के सहारे इसके लिए आधार
उपलब्ध करवाती हैं उसके बाद में सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर माहौल बनाने का बेड़ा संघ और भाजपा तथा कुछ और संगठनों और दलों का होता है। लेकिन बीच-बीच में अदालतों के फैसले इस लय को तोड़ देते हैं। हिमायत बेग को जर्मन बेकरी का मुख्य अभियुक्त बनाया गया था और जिसको निचली अदालत से गढ़े हुए सबूतों के आधार पर फाँसी की सजा भी हो गई थी अब बेगुनाह साबित हो गया। भाजपा और संघ को आतंकवाद के नाम पर राजनैतिक लाभ उठाने में अदालती फैसलों के कारण सबसे बड़ा धक्का अभी हाल ही में उत्तर-प्रदेश में लगा। जब कानपूर के वासिफ हैदर को अदालत ने उन सभी 9 आरोपों से बरी कर दिया जो एस.टी.एफ. ने गढ़े थे। बिजनौर के नासिर को भी अदालत ने बरी किया जिसे ऋषीकेश से एस.टी.एफ. ने उठाया था और लखनऊ से आर.डी.एक्स. के साथ गिरफ्तार दिखाया था। सबसे बड़ी बात यह कि उसकी बेगुनाही की गवाही ऋषीकेश के उस हिन्दू स्वामी ने अपने खर्च से अदालत में हाजिर हो कर दी थी जो उसके वहाँ से उठाए जाने का प्रत्यक्षदर्शी था। अदालत ने भी स्वामी के उस कदम की सराहना अपने फैसले में की है। यह घटनाएँ अप्रत्याशित थीं और उत्तर-प्रदेश जैसे राज्य में जहाँ लोकसभा की 80 सीटें हों वहाँ मजबूत प्रदर्शन के बिना दिल्ली दूर ही रह जाएगी। इसका आभास भाजपा को पहले से है, शायद मोदी को बनारस से चुनाव लड़ाने के पीछे संघ की मंशा भी यही है। लेकिन मोदी के विकास (हालाँकि जब गुजरात के विकास की बात होती है उसका एक मतलब 2002 का दंगा भी होता है) का महल गिर चुका है और उसको लेकर किए जाने वाले दावों की हर दिन पोल खुल रही है। ऐसे में उत्तर-प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में आतंकवाद का भय दिखा कर यह यकीन दिलाने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा ही इस दानव से निजात दिला सकती है। 23 मार्च को राजस्थान में अलग अलग स्थानों से चार मुसलमानों की गिरफ्तारी (उनमें से दो को जामिआ नगर दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था) दिखाई गई और बताया गया कि उनका सम्बन्ध इंडियन मुजाहिदीन से है। इसी तरह जिस तहसीन अखतर को बौद्धगया और पटना
धमाकों के आरोप में साल भर से ज्यादा समय से पुलिस तलाश कर रही थी जोधपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। हैदराबाद के मौलाना अब्दुल कवी जो देवबंद जाने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे थे उन्हें गुजरात पुलिस ने वहीं से गिरफ्तार कर लिया। अगले ही दिन गोरखपुर से दो पाकिस्तानियों की गिरफ्तारी दिखाई गई। इससे पहले राजस्थान से गिरफ्तार चार आईएम आतंकियों में भी वकास पाकिस्तानी है जो यहाँ छात्र के तौर पर रह रहा था। इन गिरफ्तारियों में किसका मामला लियाकत अली शाह, हिमायत बेग और मुखतार राजू बंगाली जैसा होगा यह तो बाद में देखा जाएगा लेकिन जो माहौल अभी बनाना है उसके लिए तो आधार मिल ही गया है। लेकिन उत्साह में पाक नागरिकों को भी इंडियन मुजाहिदीन का आतंकी बताना हास्यास्पद और संदेहास्पद नहीं लगता।            मगर माहौल तो इंडियन मुजाहिदीन ही से बनेगा इस लिए यह मजबूरी भी थी कि इनको लश्कर या जैश के साथ जोड़ने के बजाए आई.एम. का आतंकी बताया जए। 
    चूँकि मोदी चुनाव वाराणसी से लड़ रहे हैं इस लिए गिरफ्तारियों का कनेक्शन वहाँ तक न पहुँचे तो बात अधूरी रह जाती है। पुलिस और खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के हवाले से जो खबरें अखबारों में छपी हैं उनमें आजमगढ़ के डाक्टर शहनवाज और मिर्जा शादाब के बारे में कहा गया है कि उत्तर भारत में आई.एम. ने आतंकी हमले की कमान इन दोनों को सौंपी है। यह बात पकड़े गए कथित आतंकवादियों ने पूछताछ में बताई है। उन्होंने यह भी खुलासा किया है कि उत्तर-प्रदेश में आई.एम. के 150 स्लीपिंग माड्यूल्स हैं जिनका इस्तेमाल हमलों के लिए किया जा सकता है। शायद यह बताने की जरूरत नहीं कि पूछताछ में यह भी पता चला कि हमले मोदी और उनकी रैलियों पर किए जाएँगे। आजमगढ़ से वाराणसी की दूरी मुश्किल से 50-60 किलोमीटर है। इस लिजाज से आजमगढ़ माड्यूल ही इस पटकथा में सबसे फिट बैठता है और पिछले कुछ समय से मीडिया में इसी हवाले से चर्चा में रहने के कारण सबसे ज्यादा प्रभावी भी साबित हो सकता है। इसी तरह का माहौल जदयू से भाजपा के रिश्ते टूटने के बाद बिहार में भी बनाया गया था।
    यहाँ यह प्रश्न दिमाग में उठना स्वाभाविक है कि खुफिया और जाँच एजेंसियों को ऐसा करने की जरूरत ही क्यों है और उसके लिए भाजपा के ही हक में माहौल बनाने का क्या औचित्य है, तो इस सवाल का जवाब अगर सवाल ही से दिया जाए तो यह पूछा जा सकता है कि जिन बम धमाकों में असीमानंद और प्रज्ञा एंड कंपनी का हाथ था उसमें बेकसूर मुसलमानों को फँसाने के पीछे क्या राज हो सकता है, या इशरत जहाँ को पकड़ कर हत्या कर दी जाती है और उसे लशकर का आतंकी बताने के लिए ए.के. 47 दिखाई जाती है तो इसके पीछे क्या रहस्य हो सकता है, क्या यह एक व्यक्ति के दिमाग की खराबी कह कर टालने योग्य बात है। नहीं यह मामला कुछ और है। खुफिया एजेंसियों को असीमित अधिकार चाहिए और साथ ही किसी प्रकार की जवाबदेही भी नहीं रहे उसके लिए लोगों में भय और असुरक्षा का भाव उत्पन्न होना आवश्यक है। भाजपा को देश की सत्ता चाहिए ऐेसे में भय और असुरक्षा का हथियार बहुत प्रभावी हो सकता है मगर इसके लिए उसे मुसलमानों से जोड़ना जरूरी है। इसलिए यदि कोई वास्तविक शत्रु न हो तो काल्पनिक शत्रु पैदा करना उसके लिए राजनैतिक मजबूरी है। धमाकों के लिए माहौल बनाने से लेकर जरूरत पड़ने पर उसे अंजाम देने तक का इंतेजाम संघ के पास है, और उसका आरोप उस काल्पनिक शत्रु के सिर थोपने की कुंजी खुफिया और जाँच एजेंसियों के पास। यदि दोनों अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह सही तरीके से करते हैं तो लक्ष्य को आसान बना सकते हैं। जब जनता इसको स्वीकार कर लेगी तो फासीवाद में उसे अपने लिए रक्षक दिखाई देने लगेगा और शायद यह मान लिया जाएगा कि वह ‘सामूहिक चेतना’ अब जनता में भी वास्तव में पैदा हो गई है जिसको संतुष्ट करने के लिए अफजल गुरू को फाँसी पर चढ़ाया गया था।    
 -मसीहुद्दीन संजरी
मो0-09455571488     लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मूर्तियों के अनावरण की राजनीति

मूर्ति पूजा भारत में कोई नई बात नहीं है, यहां पर कई करोड़ देवी-देवताओं को मूर्ति बनाकर पूजा जाता है। इन्सानों को भगवान बना दिया जाता है यहां तक कि मूर्ति विरोधी लोगों को मूर्ती बनाकर पूजा जाने लगता है। जैसा कि बुद्ध को भगवान बना दिया गया उनकी पूजा होने लगी यहां तक झारखंड की कुछ जगहों पर तो बुद्ध की मूर्ति पर महिलाएं सिन्दुर तक लगा देती हंै।
आजकल भारत में मूर्ति निर्माण का कार्यक्रम चला हुआ है, देश को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की जरूरत नहीं है मूर्ति की जरूरत है। गुजरात में ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ 182 मीटर (597 फीट) ऊंची प्रतिमा (दुनिया के सबसे बड़ी प्रतिमा), बिहार के चम्पारण जिले के जानकी नगर में राम की 405 फीट ऊंची मूर्ति (दुनिया का सबसे ऊंचा हिन्दु मन्दिर), उ.प्र. के कुशीनगर में 268 एकड़ जमीन पर 220 फीट ऊंची कांस्य की बुद्ध प्रतिमा बनायी जा रही है। यानि आजकल भारत में सब कुछ ‘ऊंचा’ करने का संकल्प ले लिया है। जैसा कि मोदी ने 31 अक्टूबर, 2013 को नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ (सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा) का शिलान्यास करते हुए कहा था कि भारत को श्रेष्ठ बनाने के लिए एकता की शक्ति से जोड़ने का यह अभियान एक नई ऐतिहासिक घटना है। वे अपने भाषणों में कहते रहे हैं कि दुनिया के सबसे ऊंची ‘स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी’ 93 मीटर (जो कि ऐतिहासिक गलती भी है स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी से ऊंची दो प्रतिमा हैं- 1. स्प्रिंग टेम्पल बुद्धा 153 मीटर, 2. जापान में बुद्ध की प्रतिमा 120 मीटर) से ऊंची लौह पुरुष की ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को पूरी दुनिया की ऊंची प्रतिमा होगी।  क्या हम  ‘स्टैचू आॅफ यूनिटी’ बनाकर अमेरिका (स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी 93 मीटर) से दोगुना ताकतवर हो जाने वाले हैं (जो कि मंत्रियों के कपड़े तक खुलवा कर चेकिंग करता है); बेल्जीयम स्थित 39.6 मीटर उंची ‘क्राइस्ट द रीडीमर’ से हम पांच गुना (बेल्जियम की जनसंख्या करोड़ में है और भारत को कर्ज/सहायता देता है) या रूस के ‘द मदरलैंड काल्स’ जो कि 85 मीटर ऊंचा है उससे हम दोगुना ताकतवर होने वाले हैं (जिस के ऊपर भारत रक्षा के लिए निर्भर रहता है)?
इन मूर्तियों को लेकर कहीं भी ऐसा शोर सुनाई नहीं दे रहा है जैसा कि मायावती के समय सुनाई दे रहा था कि देश की जनता को पाॅर्क, मूर्तियों की जगह शिक्षा, स्वास्थ्य व रोटी की जरूरत है। इस बार शोर इस बात को लेकर हो रहा है कि पटेल की वारिस कांग्रेस है या भाजपा? भाजपा का दावा है कि ‘लौह पुरुष’ पटेल ने 565 राजवारों को भारत में मिलाया था जो कि भाजपा के वृहद भारत के सपनों से मिलता है; दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि ‘लौह पुरुष’ कांग्रेस में थे और भाजपा के पितामह संगठन आरएसएस को सांप्रदायिक बता कर प्रतिबंधित किया था। केन्द्रीय मंत्री वेनी प्रसाद वर्मा ने तो यहां तक कह दिया कि ‘‘लोहा मंत्री हंै वेनी प्रसाद वर्मा और लोहा बन रहे हैं मोदी। सरदार पटेल के वशंज हैं वेनी प्रसाद वर्मा और सरदार पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं मोदी। यह वोट के लिए नहीं चलेगा।’’ प्रतिमा की पूरी लड़ाई वारिस बनने की लड़ाई में बदल गई है।
इन मूर्तियों के बहाने लोगों से सच्चाईयों को छुपाया जा रहा है, जमीनें हड़पी जा रही है व टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। गुजरात सरकार के दस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ की घोषणा की थी। ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ के तहत सरदार बल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर उंची मूर्ती नर्मदा जिले मंे नर्मदा नदी के अंदर टापू क्षेत्र में स्थापित की जायेगी। इसके लिए अलग से एक कोष निर्धारित किया गया है जो दुनिया भर में मीडिया के जरिए इस प्रतिमा का प्रचार करेगी।  इस प्रतिमा पर सरकार 2500 करोड़ रु. खर्च करने वाली है। यहां पहले से ही नर्मदा बांध (122 मीटर ऊंचा) द्वारा लाखों लोगों का विस्थापन हो चुका है जो आज तक विस्थापन की लड़ाई लड़ रहे हैं। मेधा पाटेकर ने इसे बांध की ऊंचाई बढ़ाने की साजिश बताया है उनका कहना है कि लगातार बढ़ती बिजली के भूख ने इस बांध को बंटवारे का बांध बना दिया है। ऊंची प्रतिमा के बहाने बांध की ऊंचाई भी 122 मीटर से बढ़ाकर 138 मीटर ले जाने की है जिससे कि पानी की सप्लाई बढ़ायी जाये और बिजली का उत्पादन भी। इसके कारण एक बार फिर बड़ी संख्या में आदिवासी अपने घरों से उजाड़े जायेंगे।
‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को बनाने का ठेका अमेरिकी कम्पनी ‘टर्नर कन्स्ट्रकशन’ को दिया गया है। यह कम्पनी आस्ट्रेलिया के मीनहाटर््ज और अमेरिका के माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स के साथ मिलकर पटेल की आकृतिवाली 60 मंजिला इमारत बनायेगी। अमेरिका के टर्नर कन्स्ट्रकशन व माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स भवन निर्माण की कम्पनी है जो पूरी दुनिया में बड़े-बड़े भवनों का ठेका लेती है। एफिल टाॅवर के तर्ज पर इस मूर्ति के भीतर 500 फुट पर एक डेक का निर्माण किया जायेगा जिस पर 200 लोग एक साथ चढ़कर 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सरदार सरोवर जलाशय को देख कर आंखों को ठंडक पहुंचा सकते हैं जिसने लाखों लोगों को उजड़ने पर मजबूर किया है। तीन वर्ष के अंदर यहां होटल, पार्क, रेस्टोरेण्ट, अंडरवाटर अम्यूजमेन्ट पार्क, थीम, पब बनाये जायेंगे जिससे कि पर्यटकों को लुभाया जा सके। मोदी की इस ड्रीम योजना की और स्पष्टता उनके 15 दिसम्बर, 2013 को उत्तराखण्ड में दिये गए भाषण से होती है वे कहते हैं कि ‘‘प्रदेश की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए टूरिज्म को बढ़ावा देना होगा। पूरे विश्व में टूरिज्म उद्योग सबसे तेज गति से बढ़ने वाला उद्योग में शामिल है। टूरिज्म में 3 खरब डाॅलर व्यापार की संभावना छिपी है। ईश्वर के नाम पर उत्तराखंड लाखों लोगों को आकर्षित कर सकता है, ‘टेरिज्म डिवाइड्स, टूरिज्म युनाइट्स’।’’ मोदी टूरिज्म उद्योग को बढ़ावा देकर देश को आगे ले जाना चाहते हैं। गोवा के लोगों की दुर्दशा किसी से छिपी बात नहीं है जो कि एक टूरिज्म स्थल के रूप में मशहूर है, यहां पर लाखों विदेशी सैलानी प्रति वर्ष आते हैं। वहां की स्थानीय जनता को अपनी पेट की आग को बुझाने के लिए महिलाओं, लड़कियों को नंगा होकर नाचना पड़ता है, शैलानियों के नंगे बदन को मसाज करना होता है। उत्तराखण्ड की केदार घाटी में ईश्वर के नाम पर जून, 2013 में मानव निर्मित तबाही छिपी हुई बात नहीं है जिसमें बीसियों हजार लोग मारे गये। एक साथ गांव अनाथ/विधवा हो गये। उस समय मोदी जी भी उत्तराखण्ड गये थे। क्या वह ऐसा ही विकास चाहते हैं जहां पेट की आग बुझाने के लिए महिलाओं और बच्चियों को नंगा नाचना पड़े, गांव के गांव, परिवार के परिवार एक साथ मारे जायें लाशें सड़ती रहें बच्चे अनाथ हो जाएं। ऐसा ही टूरिज्म और ऐसा ही विकास उनको चाहिए?
‘रन फाॅर यूनिटी’
सरदार बल्लब भाई पटेल की 63 वीं पुण्यतिथि पर 15 दिसम्बर को ‘रन फाॅर यूनिटी’ का अयोजन 565 जगहों पर किया गया। ‘रन फाॅर यूनिटी’ का अयोजन 565 जगह पर इसलिए किया गया कि पटेल ने 565 रियासतों को भारत में मिलाया था। इस आयोजन को बड़ोदरा जिले में हरी झंडी दिखाते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘‘सरदार पटेल ने राष्ट्र को एकजुट करने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से आम लोगों को जोड़ा देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया। देश को बांटने की मानसिकता को बदला और देश को एकजुट किया।’’ हम मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि मोदी जी इसमें से किन पद्चिनहों को अपनाया है? आप तो औपनिवेशिक मानसिकता को अपना रहे हैं और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। आप ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को बनाने के लिए जिस ‘टर्नर कन्सट्रक्शन’ कम्पनी को ठेका दिया है जो दुनिया के जालिम देश अमेरिका की कम्पनी है जिस देश का नकल करके आप स्टैच्यू बनाकर ‘श्रेष्ठ’ होना चाहते हंै। आप पटेल के आम लोगों की जोड़ने की बात कर रहे हैं, ‘साहब’ आप ध्यान दीजिये आप तो अपने ही लोगों को उजाड़ रहे हैं, उनको अपनी जमीन, अपनी संस्कृति से बेदखल कर रहे हैं। आप के ‘सिरमौर’ बनने के डर से एक वर्ग, एक विशेष समुदाय भयभीत है। आप जिस उद्योग को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं उस उद्योग में आप की संस्कृति का क्या होगा, अपने देश की मां-बहनों के साथ क्या होगा वो आपने कभी सोचा है?
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दिल्ली में ‘रन फाॅर यूनिटी’ के समय कहा कि अगर जनता ने मोदी को 10 वर्ष के लिए प्रधानमंत्री बनाया तो भारत महाशक्ति बन जायेगा। सिंह जी क्या मोदी के 10 वर्ष के शासन काल में गुजरात भारत का अग्रणी राज्य बन गया है? अगर गुजरात अग्रणी राज्य बन गया होता तो पश्चिम गुजरात की रहने वाली सोनल को दो बार पैसे के लिए सरोगेसी (किराये का कोख) से बच्चा पैदा नहीं करने पड़ते (बीबीसी हिन्दी.काॅम, 29 जुलाई 2011)। अग्रणी राज्य होता तो गुजरात के जिस नर्मदा जिले में जनता का 2500 करोड़ रु. खर्च करके स्टैच्यू बनाया जा रहा है उसी जिले की 5,90,297 जनसंख्या पर हायर सेकेंड्री स्कूल केवल 27 हंै अस्पताल तो केवल दो ही हंै अगर इन पैसों को उस जिला के लोगों पर ही खर्च कर दिया जाता तो सचमुच शिक्षा, स्वास्थ्य के मामले में दुनिया के बेहतरीन जगहों में गिना जा सकता था। लेकिन सिंह जी आप लोगों को तो नाम चाहिये, इससे मुझे 1969 में आई फिल्म ‘एक फूल दो माली’ के गाने याद आते हैं- ‘‘तूझे सूरज कहूं या चंदा, दीप कहूं या तारा मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा’’। 2500 करोड़ रु. से भारत में 100-100 करोड़ रु. लगाकर 25 अस्पताल बना दिये जाते तो हर साल लाखों लोगों की जिन्दगी बचाई जा सकती थी या इतने पैसे लगाकर स्कूल, काॅलेज खोले जाते तो शिक्षा के स्तर में सुधार होता, कई डाक्टर, इंजीनियर पैदा किये जा सकते थे। इसमें  वो गाने सटीक बैठते हैं कि ‘‘कोठियों से मुल्क की मय्यार को मत आंकिये, असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है....।’’
भारत में मूर्तियों को लेकर एक खास तरह की राजनीति हो रही है। मूर्तियों में जनता को उलझा कर और झूठी श्रेष्ठता दिखाकर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। अब हम तो सब कुछ ॅज्व् की शत्र्तों पर अपने देश को लूटने की इजाजत देकर बाहर से मंगा सकते हैं। अब उद्योगों की जगह मूर्तियों की स्थापना की जा रही है और उसके आस पास रेस्टोरेन्ट, होटल, पब, डिस्को इत्यादि का निर्माण किया जा रहा है। टूरिज्म से विदेशी मुद्रा आयेगी उससेे उपभोक्तावादी-साम्राजयवादी, संस्कृति को और बढ़ावा मिलेगा। देश में बलात्कार जैसी घटनाएं बढ़ेंगी जिस पर हम रोज हाय-तौबा मचा रहे हैं। इससे आम लोगों की हालत और बदतर होगी, स्थानीय लोगों की जमीनी छीनी जायेगी, उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दिये जायेगा, उनके छोटे व्यापारियों के जगह धानाढ्य लोगों का व्यापार आ जायेगा और हम-आप उनके पास काम करने को मजबूर होंगे। महिलाओं-लड़कियों को वेश्यावृति के धंधे में धकेला जायेगा। ‘बड़ा, ऊंचा, श्रेष्ठ’ ये सब सुना कर लोगों को ये एहसास कराया जा रहा है कि कोई बात नहीं घर में खाने को भी नहीं है लेकिन हम ‘श्रेष्ठ’ हैं, ‘ताकतवर’ हैं। हमें जितनी ऊंचाई दिखाई जा रही है हम उतनी ही हमें नीचे की तरफ जा रहे हैं। हमें इन झूठे श्रेष्ठ, स्वाभिमान और ऊंचाई की मूर्तियों के खिलाफ एक होकर बोलना होगा, लोगांे की रोटी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान की राजनीति दिलाने वाली नीतियों के लिए लड़ना होगा। मूर्तियों में जो पैसा खर्च किया जा रहा है वो पैसा भारत की आम जनता के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च किये जाने की जरूरत है।
-सुनील कुमार

बुद्ध मूर्ति पूजा विरोधी थे लेकिन आज के समय बुद्ध खुद मर्ति के रूप में विरजमान हैं, इसी तरह भगत सिंह जो कि खुद को नास्तिक मानते थे उसको भी हिन्दुत्वा बिग्रेड व शासक वर्ग अपनाने की कोशिश कर रहा है। भगत सिंह ने जिस तरह के शोषणकारी पार्लियामेंट का विरोध किया था उसी तरह के शोषणकारी पार्लियामेंट में उनकी मूर्ति स्थापित कर दी गई। जिस अयोध्या में कई मन्दिर व मूर्तियों की पूजा करने वाला कोई नहीं है उसी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दो सम्प्रदायों के अन्दर इतना विद्वेष भर दिया गया कि कितने लोगों का खून बहा है, बह रहा और बहेगा; कहा नहीं जा सकता।

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से, किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।

आम आदमी अपने को वोट की भागीदारी या इससे ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या विरोध की चर्चा तक ही अपने आप को सीमित रखता है | आम आदमी स्वंय राजनीति करने व्यवस्था में शासक -- संचालक बनने के लिए आगे नही आ रहा है | ऐसा करने में अक्षम समझता है आम आदमी समाज राष्ट्र व समाज का बहुसंख्यक हिस्सा है | इनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य शारीरिक एवं मानसिक मेहनत के जरिये अपने परिवार का भरण -- पोषण ही उसका लक्ष्य होता है | इसको वह अपना कर्तव्य समझता है और जीवन पर्यन्त इसी में संघर्षरत रहता है | आम समाज अपने में एक जैसा यू कह सकते है कि एक रूपता का समाज नही है बल्कि वह विभिन्न धर्म , सम्प्रदाय जाति इलाके व नस्ल भाषा की पहचान के साथ -- साथ भिन्न -- भिन्न आर्थिक , सामाजिक स्तरों पर विभाजित समाज है | इस समाज में सीमान्त लघु एवं मध्यम जोत वाले किसानो , तिहाड़ी मजदूर , बुनकरों दस्तकारो के साथ ही छोटे ठेले - गुमटी वालो के साथ साधारण शिक्षा पाए कामगारों से लेकर चिकित्सा , शिक्षा न्याय से जुड़े बहुत से पेशो में बहुसंख्यक लोग जुड़े हुए है | इनके दरम्यान अंतर -- भेदों के वावजूद ये लोग आम समाज के हिस्से है | आम समाज के सभी हिस्से आमतौर पर अपने जीवन में नैतिक मूल्यों का वहन करने में लगे रहते है | इनमे से एक बहुत छोटा हिस्सा ही उच्च मध्यम उच्च हिस्सा बन पाने में सफल रहता है | उसके बाद वह इस समाज का हिस्सा नही रह जाता है | धनाढ्य वर्गो व कम्पनियों की तरह ये न तो देश के संसाधनों के बड़े मालिक है और न ही देश की अर्थव्यवस्था -- अर्थात उत्पादन व्यापार और उपभोग को प्रभावित करने या उसे बदल देने की क्षमता ही रखते है | अगर हम देखे तो पायेगे सैकड़ो की संख्या में अरबपति व खरबपति ही इस देश के संसाधनों के 75 % हिस्से पर प्रत्यक्षय -- परोक्ष रूप से मालिकाना हक़ रखते है और संचालन करते है | 75 % आबादी वाले देश के बाकी के 25 % संसाधनों की अत्यंत छोटे व मझोले मालिक है | अपने इस छोटे -- मझोले मालिकाने के या कमाई के अवसरों के संचालक नियंत्रक भी नही है | खासकर पिछले 25 वर्षो में व्यापक जनसाधारण के इन छोटे -- मोटे संसाधनों को जमीन , काम धंधो व रोजगार के भिन्न -- भिन्न साधनों के अवसरों को उनसे लगातार छिना जा रहा है | जिसके चलते आम समाज के हिस्से महगाई , बेरोजगारी की गंम्भीर समस्या सामने खड़ी होती जा रही है | आम समाज इस माने में भी एक जैसा है कि वह राष्ट्र -- समाज का शासक नियंत्रक हिस्सा नही है अपितु वह राष्ट्र का शासित संचालित हिस्सा है | सत्ता सरकारों की योजनाए नीतियों कानूनों को बनाने व लागू करने में आम समाज की कोई भूमिका नही होती है -- जब कि इन नीतियों कानूनों के सभी प्रकार के दुष्परिणाम समाज के इसी तबके पर असर डालते है | इसके सभी सुपरिणाम --- समाज के धनाढ्य व उच्च वर्ग को ही मिलते है | इसका प्रत्यक्ष लाभ सामने देखने को मिल रहा है | पिछले 25 सालो से अमलीजामा पहनाकर लागू की गयी आर्थिक , कुटनीतिक , सांस्कृतिक नीतियों के दुष्परिणाम -- बढ़ते सामाजिक सांस्कृतिक समस्याओं संकटों के रूप में आम जनसाधारण के व्यापक हिस्सों पर पड़ते जा रहे है | बल्कि इसका एक छोटा पार्ट इन्ही नीतियों कानूनों योजनाओं के चलते उच्च माध्यम से उच्च वर्ग बनता जा रहा है | शासन -- प्रशासन व राजनितिक पार्टियों के नेतृत्व में पहुचकर सत्ता सरकार में भागीदारी निभा रहा है और शासक वर्ग बनता जा रहा है | आम समाज अपने चुनावी मताधिकार के जरिये शासक पार्टियों को शासन का अधिकार प्रदान करते रहने का ही एक माध्यम बना हुआ है ठीक उसी तरह से जैसे वह अपने श्रम - शक्ति से अपनी रोजी रोटी कमाने के साथ धनाढ्य मालिको के उत्पादन बाजार को उनके लाभ -- मुनाफे को बढाते जाने का साधन मात्र बना हुआ है | भिन्न -- भिन्न समुदाओ व विभिन्न आर्थिक , सामाजिक स्तरों में रह रहे शिक्षित -- अशिक्षित आम आदमी में इन बातो में भी एक रूपता है कि वह जनसाधारण के हित में समाज का शासक संचालक बनने की इच्छा तक नही रखता है | उनके बारे में चिंतन नही करता | उसकी अपनी सोच -- विचार व क्रिया कलाप आम तौर पर अपने व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है | वह मात्र जीविकोपार्जन के बेहतर साधनों के अवसरों को पाने के बारे में सोचता है | उसके लिए वह धन -- सत्ता के मालिको का सेवक बनने तक ही वह अपने विचारों व्यवहारों को सीमित रखना चाहता है | निजी जीवन की मजबूरियों और अपने स्वार्थ में भी सत्ता सरकारों के प्रति उसमे गुलामो की भावना रहती है | वह सत्ता सरकार तथा शासन -- प्रशासन के विरोध में अपना स्वर तभी निकालता है जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति व पार्टी उसे अपने साथ जोड़ लेती है | अपने स्वार्थी सत्ता राजनीति को आगे बढाने की खातिर आम जनसाधारण या उसके किसी हिस्से को आंदोलित करने के लिए लग जाती है | इसी का परिणाम कि जनसाधारण लोग अपने को वोट की भागीदारी तक या उससे ज्यादा से ज्यादा पार्टियों के नेताओं के समर्थन या उसके विरोध की चर्चा या बक -- बक तक ही सीमित रहते है | उसके आगे स्वंय राजनीति करने समाज का शासक संचालक बनने के लिए आगे नही बढ़ते है | वैसा करने में वह अपने को अक्षम मानते है | यही उनकी बुनियादी कमजोरी है जो वर्तमान युग में भी बनी हुई है | जबकि वह स्वंय वोट देते है और वोट के जरिये सरकार बनाने में सहयोग देते है | साठ वर्ष से उपर बीत चुका है सत्ता शासन के खेल को देखते हुए ये सत्ता और शासन मिलकर इनके हर हक़ और हिस्से को काट रहा है पर अब भी वो लोग खामोश है | वर्तमान दौर के राजनीतिक पार्टिया उसकी केन्द्रीय व प्रांतीय सत्ता सरकारे शासन प्रशासन के उच्च स्तरीय लोभी लोग उसके साथ प्रचार माध्यम विद्वान् व समाज के धनाढ्य के साथ उच्च हिस्से आम आदमी में बढती महगाई बेकारी रोजी रोजगार में आ रही टूटन तथा शिक्षा स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा आदि जैसी बढती जन समस्याओं के प्रति गंम्भीर नही है न ही इसको कोई महत्व दे रही है | उसे घटाने का कोई प्रयास भी नही कर रही है उल्टे उसे बढ़ाने में लगी है | देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो और कम्पनियों के साथ विभिन्न क्षेत्र के उच्च मध्यम तथा मध्यम वर्ग के एक सुविधा प्राप्त छोटे से हिस्से की सेवा में लगी हुई है | धनाढ्य वर्ग को समस्त छूटे प्रोत्साहन और अधिकार प्रदान किये जा रहे है | उसके लिए नई अन्तर्राष्ट्रीय नीतियों कानूनों को एक के बाद एक लागू करते जा रहे है उसे और भी आगे बढाते जा रहे है | आम आदमी के आधुनिक युग के कम व पेशो को पहचान को धुधला करके उसे धर्म , जाति इलाका भाषा के पहचानो पर बाटने तोड़ने में व एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है | उसके ट्रेड यूनियनों को या किसानो , मजदूरो आदि के जन संगठनों को भी धर्म जाति के नाम पर बाटते जा रहे | ताकि जनसाधारण अपनी समस्याओं व हितो के लिए कही एक जुट न हो जाए | कही एक जुट होकर विद्रोह की भाषा न बोलने लग जाए | यह सारी परस्थितिया आम आदमी को यह चेतावनी भी दे रहा है कि उसकी समस्याओं के लिए समाज का उपरी हिस्सा उनके व्यापक हितो के लिए संघर्ष नही करने वाला है | कारण कि वर्तमान में अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय परिस्थितियो में यह बात निश्चित हो चुकी है कि धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों की निरंतर विकास आम आदमी के समाज को संकटग्रस्त किये बिना उनका विकास और समृद्द होना मुमकिन नही है | देश की सता -- सरकारे देश की आम आदमी की साथ प्रतिशत जनसाधारण आबादी के सफाए की सुनिश्चित रणनीती अपनाई हुई है | उसे गरीबी , अभाव , टूटन व असुरक्षा आपदा आदि के संकटों में फंसकर मरने के लिए छोडती जा रही है | अब ऐसा वक्त है कि इस देश की आवाम जो आम आदमी के लिए आवश्यक हो गया है कि विभिन्न समुदायों जनसाधारण तथा विभिन्न आर्थिक जनसमुदाय के व्यापक हितो के लिए उसके रोजी रोजगार काम काज शिक्षा सुरक्षा जैसे आवश्यक जरुरतो के लिए स्वंय चिंतन करे और संगठित हो | इस देश में पिछले बीस सालो से लागू की जा रही जन विरोधी ही नही अपितु जनसंहारक नीतियों के विरोध में संगठित होकर विद्रोह के स्वर फुकने होंगे | अमेरिका ब्रिटेन जैसे विदेशी साम्राज्यी ताकतों व इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो को दी जा रही छुटो अधिकारों के खिलाफ संगठित होना है इसके लिए स्वंय ही आम आदमी को सता शासन में भागीदारी के लिए तैयार होना पड़ेगा | लेकिन एक बात को ध्यान में रखना होगा जनहित के लिए शासक वर्ग बनने के लिए आवश्यक है कि वह धर्म , जाति , क्षेत्र के आपसी अन्तरविरोध को कमतर करने का प्रयास करना होगा और यह कार्य हिन्दू , मुसलमान , सिक्ख , ईसाई व् बड़ी -- छोटी दलित जाति के पहचान को भुलाना होगा इन सबसे उपर उठाना होगा \ तभी हम ऐसे वक्त में इनसे मुकाबला कर सकते है | तुम्हें तो राज हमारे सरों से मिलता है,
हमारे वोट हमारे जरों से मिलता है।
किसान कहके हिकारत से देखने वाले,
तुम्हें अनाज हमारे घरों से मिलता है।। ------

तुम्हारे अज़्म में नफरत की बू आती है,
नज़्म व नसक से दूर वहशत की बू आती है।
हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से,
किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।



 -सुनील दत्ता
स्वतंत्र पत्रकार , समीक्षक

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

देवालय, शौचालय और संघ की राजनीति



एक लंबे अभियान के बाद, संघ परिवार, 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाने में सफल हुआ। यद्यपि इस अभियान का नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे परन्तु इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को अंजाम देने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इनमें से एक थे नरेन्द्र मोदी, जो कि अब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। मंदिर.मस्जिद के पहचान से जुड़े इस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया और आमजनों के दैनिक जीवन से जुड़ी मूल समस्याओं को दरकिनार कर दिया गया। उस समय कई पत्रिकाओं ने यह जानने के लिए सर्वेक्षण किए थे कि आमजन, बाबरी मस्जिद के स्थान पर क्या बना देखना चाहते हैं। कई लोगों का यह मत था कि उस स्थान पर या तो कोई शैक्षणिक संस्थान अथवा अस्पताल बनाया जाना चाहिए।
बहुजन समाज पार्टी के तत्कालीन नेता कांशीराम ने जोर देकर कहा था कि उस स्थान पर एक शौचालय बनना चाहिए। इसी तर्ज परए कुछ साल पहले, केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि देश के लिए मंदिरों से ज्यादा जरूरी शौचालय हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी हाल ;अक्टूबर 2013 में कहा कि पहले शौचालय, फिर देवालय जब जयराम रमेश ने शौचालयों को मंदिरों से अधिक महत्वपूर्ण बताया था तब संघ के कार्यकर्ताओं ने पंक्ति बनाकर उनके घर के सामने मूत्र विसर्जन किया था। उनके घर के दरवाजे पर मूत्र से भरी बोतलें भी रखी गईं थीं। भाजपा प्रवक्ताओं ने रमेश पर देशवासियों की आस्था और उनकी धार्मिक भावना को चोट पहुंचाने का आरोप लगाया था। परन्तु अब मोदी द्वारा वही बात कहने पर भाजपा के प्रवक्ताओं का मुंह नहीं खुल रहा है। हांए प्रवीण तोगडि़या ने जरूर मोदी की निंदा की है। कई समीक्षकों ने मोदी के वक्तव्य का समर्थन करते हुए कहा कि यह सॉफ्ट हिंदुत्व है और यही भाजपा को चुनाव में उसकी ताकत बढ़ाने में मदद करेगा। जयराम रमेश ने एक बार फिर यही दोहराया है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है।
जो समीक्षक यह कह रहे हैं कि यह हिंदुत्व का सॉफ्टअर्थात नरमपंथी या उदारवादी संस्करण है, उन्हें यह साफ.साफ समझ लेना चाहिए कि चुनाव कैसे और किन आधारों पर लड़े जाएं, यह भाजपा नहीं बल्कि आरएसएस तय करता है। आरएसएस और उसके परिवार के अन्य सदस्य, एकजुट होकर वह सब कुछ करते हैं, जिससे भाजपा को चुनावों में फायदा हो। बाबरी ध्वंस के 20 साल बादए मोदी यह कह रहे हैं कि उनके लिए शौचालय अधिक महत्वपूर्ण हैंए देवालय कम। यह निश्चित तौर पर एक कुटिल रणनीतिक चाल है। आरएसएस कई स्तरों पर काम करता है और उसके अनेक मुखौटे हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्यों को अलग.अलग कार्य सौंपे गये हैं। विहिपए राममंदिर मुद्दे को जिंदा रखे हुए है तो अन्य सदस्य साम्प्रदायिक दंगे भड़काकर समाज को ध्रुवीकृत करने के काम में हैं। इसी के समानांतर, कुछ संगठन गोएबेल्स के अंदाज में,मोदी की छवि एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ने में व्यस्त हैं जो विकास के प्रति प्रतिबद्ध है, कार्यकुशल है,बेहतरीन प्रशासक है और ना जाने क्या.क्या है।
अगले चुनाव में आरएसएस कई रणनीतियां अपनाएगा। एक ओर दंगे भड़का कर और राममंदिर मुद्दे को हवा देकर समाज का ध्रुवीकरण किया जायेगा। दूसरी ओरए मोदी का जबरदस्त महिमामंडन होगा। उनके विकास के गुजरात मॉडल की तारीफों के पुल बांधे जायेंगे। उन्हें सर्वगुण सम्पन्न नेता बताया जाएगा, एक ऐसा नेता जो निर्णय लेने और उन्हें लागू करने में तनिक भी देरी नहीं करता। इसी उद्देश्य से मोदी अब विकास और शौचालयों की बात कर रहे हैं। यह भी एक धूर्ततापूर्ण चाल है। मोदी के राजनैतिक कैरियर का आधार है गुजरात के समाज का ध्रुवीकरण, जिसे उन्होंने गोधरा के बाद हुए हत्याकांड के जरिए बनाया था। इतने सालों तक वे हिंदुत्व के झंडाबरदार बने रहे। उन्होंने अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर धकेलने की हर संभव कोशिश की। गुजरात में अल्पसंख्यकों की बदहाली सबके सामने है। समाज के ध्रुवीकरण का काम पूरा करने के बादए अब उन्होंने नया राग अलापना षुरू कर दिया है। वे अब विकास के प्रणेता बन गए हैं। उनके तथाकथित विकास के दावों की हवा, विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से समय.समय पर निकलती रही है। इस सिलसिले में सबसे ताजा आंकड़े यह हैं कि गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है। यह सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है। कई अन्य आंकड़ों ने भी गुजरात के विकास के उनके मिथक का सच दुनिया के सामने ला दिया है।
जयराम रमेश का यह कहना कि कांग्रेस को अगले चुनाव में भाजपा नहीं वरन् आरएसएस से मुकाबला करना है, बिल्कुल सही है। उनके अनुसार कांग्रेस का असली मुकाबला आरएसएस से इसलिए होगा क्योंकि आरएसएस ही भाजपा को नियंत्रित करती है। यह इससे स्पष्ट है कि संघ ने हाल में अपनी पसंद के व्यक्ति को भाजपा के अध्यक्ष और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में थोपा। परन्तु यह पूरी कहानी का एक हिस्सा मात्र है। अनुभवी और वरिष्ठ राजनेता होने के नाते, रमेष को यह पता होगा कि भाजपा का मूल नेतृत्व संघ के स्वयंसेवकों के हाथ में है। अमरीका के स्टेटैन आइलैण्ड में बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने ठीक ही कहा था कि वे पहले स्वयंसेवक हैं और उसके बाद कुछ और। आरएसएस की कार्यषैली यह है कि वह स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा का प्रशिक्षण देता है और उसके बाद, ये प्रशिक्षित स्वयंसेवक, हिन्दू राष्ट्र के संघ के एजेण्डे को पूरा करने के लिए अलग.अलग क्षेत्रों में अपना.अपना काम करते हैं। संघ से जुड़े जितने भी संगठन हैं, उन सब का असली नेतृत्व संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों के हाथ में रहता है। और इन स्वयंसेवकों के बीच समन्वय का काम आरएसएस करता है। इस प्रकार, मोदी शौचालय की बात कर सकते हैंए तोगडि़या मंदिर का राग अलाप सकते हैं। नीचे के स्तर का कोई कार्यकर्ता इंटरनेट पर वीडियो अपलोड कर दंगे भड़का सकता है। कोई पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण के काम में जुट सकता है तो कोई दूसरा जाणता राजा नामक शिवाजी पर आधारित नाटक का प्रदर्षन कर सकता है.एक ऐसे नाटक का, जो इतिहास का सांप्रदायिकीकरण करता है। हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में ओतप्रोत स्वयंसेवक, राज्यतंत्र में भी घुसपैठ कर रहे हैं। हम केवल आशा कर सकते हैं कि देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल, जिसे बहुवाद का परचम लहराना चाहिएए वह आरएसएस को अच्छी तरह से जानता और पहचानता है। इस दल को यह भी पता होना चाहिए कि आरएसएस, राजनीति पर नियंत्रण और समन्वय के लिए सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं करता। वह अन्य कई रास्तों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के उद्यम में लगा रहता है।
वनवासी कल्याण आश्रम या सामाजिक समरसता मंच, दूरदराज के इलाकों में सोशल इंजीनियरिंग के जरिए संघ के एजेण्डे की नींव तैयार करते हैं। बल्किए संघ ने हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन के हर पक्ष में इतनी जबरदस्त घुसपैठ बना ली है कि एक अर्थ में हम यह भी कह सकते हैं कि चुनावी राजनीति, उसके कार्याकलापों का एक छोटा हिस्सा भर रह गई है। आरएसएस का हिंदू राष्ट्र या हिन्दू पाकिस्तान का एजेण्डा, भारत की विविधवर्णी संस्कृति के विरूद्ध है। यह व्यवस्था ऐसे समाज के लिए उपयुक्त है, जहां एकाधिकारीवादी शासन व्यवस्था हो और समाज पर श्रेष्ठिवर्ग का दबदबा बना रहे। दरअसल, हिंदू हित की बात करने वाला संघ, हिंदुओं के एक तबके के प्रभुत्व के लिए काम कर रहा है।
आरएसएस की गतिविधियों में पिछले तीन दशकों में जबरदस्त तेजी आई है और राज्यों और केन्द्र में सत्ता में आने के बाद से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उसके स्वयंसेवकों की घुसपैठ में आशातीत बढ़ोत्तरी हुई है। जब भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए सन् 1998 से लेकर 2004 तक देष पर शासन कर रहा था तब यही हुआ था और यही भाजपा.शासित प्रदेशों में इस समय हो रहा है। अच्छा होगा कि जयराम रमेश और उनके जैसे अन्य इस कटु और डरावने सच से वाकिफ हों। जो लोग आरएसएस की राजनीति को नजदीक से देख रहे हैं वे इस परिद्रश्य को अच्छी तरह से समझते हैं। राजनीति में सक्रिय वे लोग जो प्रजातंत्र, बहुवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों की रक्षा करना चाहते हैंए उन्हें केवल चुनाव के वक्त धार्मिक राष्ट्रवाद से मुकाबला करने की बात नहीं सोचनी चाहिए। यह एक ऐसी लड़ाई है जिसे अनवरत और हर क्षेत्र में लड़ा जाना होगा.फिर चाहे वह राजनीति हो, संस्राम कृति हो, साहित्य हो या कला या कोई भी अन्य क्षेत्र।
-राम पुनियानी

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

चुनाव : धनबल का चुनाव

उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण का मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गया है लेकिन इस चुनाव की मुख्य विशेषता यह है कि आयोग ने शांतिपूर्वक चुनाव तो करवा लिए लेकिन मतदाताओं की खरीद फरोख्त को रोक नहीं पाए। कुछ क्षेत्रों में सीधे-सीधे मतदाताओं को एक हजार रुपये की नोट देने के समाचार हैं। चुनाव में प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोगों ने मेज के नीचे से रुपया लेकर सपा-बसपा-भाजपा को मतदाताओं के सामने पेश किया अन्य पार्टियों जिनके उम्मीदवारों ने या पार्टी स्तर पर रुपये का भुगतान नहीं किया वह पार्टियाँ उनके एजेंडे से गायब ही रहीं। राजनितिक दलों के सिम्बल अख़बारों में प्रकाशित किये गए किन्तु उत्तर प्रदेश में दो राष्ट्रीय पार्टियों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी व मर्क्सस्वादी कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान प्रकाशित नहीं किये गए। इसका मुख्य कारण यह है कि इन पार्टियों ने न मेज के ऊपर से और न ही मेज के नीचे से पेमेंट किया।
धर्म गुरुओं ने भी अपनी अपनी निष्ठाएं विभिन्न दलों में व्यक्त की चुनाव में भी उनका भाव तेजी पर रहा लग्जरी गाड़ियाँ, प्रतिदिन का खर्चा तथा विभिन्न प्रकार की सुविधाओं का उपयोग भी इन लोगों ने किया।
चुनाव में मुद्दे गायब थे, चुनाव संपन्न होते ही किसानो की खाद, बीज की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हैं। महंगाई दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। वोट लेने वाले बहुरूपियों ने सरकार बनाने के लिये साम, दाम, दंड भेद से मत प्राप्त कर लिये हैं, बिजली पानी नदारद है। सरकार चाहे जिसकी बने महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी जैसे मुद्दे हल करने की दिशा में इन राजनीतिक दलों की कोई रूचि नहीं है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 25 दिसंबर 2011

हिन्दुत्व की राजनीति बाबरी से अन्ना तक

इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं आ रहा है। कई अलगअलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनीअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।
यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ॐचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्मआधारित ॐचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबेछिपे ंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा ब़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ़हाने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और ब़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के "खतरे" का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जडें़ जमा रही है। उसकी जडें़ और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भीविशेषकर आदिवासी इलाकों मेंसाम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द ग़ा। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ॐचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें "लोकपाल" नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और "अन्ना संसद के ऊपर हैं" जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचानआधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूहचाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिकराजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। "मैं अन्ना हूँ" "हम जनता हैं" जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल "शाईनिंग इंडिया" वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघहिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

राम पुनियानी

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

श्री श्री और आर्ट ऑफ पोलिटिक्स


जैसे-जैसे उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे बाबाओं और भगवानों का इस राज्य के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। उनके उप्र दौरों की संख्या में अचानक वृद्धि हो गई है। इनमें से अधिकतर गुरू, भ्रष्टाचार का जीजान से विरोध करने में अपनी आध्यत्मिक उर्जा व्यय कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं बाबा रामदेव एवं श्री श्री रविशंकर। श्री श्री इसके पहले अन्ना के साथ थे और अन्ना की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे अन्ना की जेल यात्रा के दौरान अन्ना और उनके साथियों के बीच संवाद सेतु थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ने अचानक आकाशवाणी के जरिए श्री श्री और बाबा रामदेव को देश में भ्रष्टाचार के फैलते मकड़जाल से अवगत कराया है और वे इसे जड़मूल से उखाड़ फेंकने में जुट गए हैं।
पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव के प्रवचनों में भ्रष्टाचार-विरोध का एक परिषिष्ट अनिवार्य रूप से शमिल रहता है। इसी तरह, आर्ट ऑफ लिविंग के अविष्कारक श्री श्री अपने शिष्यों को यह बताते नहीं थकते कि भ्रष्टाचार का विरोध कितना जरूरी है। इसी बीच, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया है कि रामदेव, अन्ना और श्री श्री, दरअसल, आरएसएस के मोहरे हैं और वे समाज और चुनावी राजनीति में आरएसएस के एजेन्डे को लागू कर रहे हैं। रामदेव की भाजपा से नजदीकियां जगजाहिर हैं और कुछ समय पूर्व उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी गठित करने का विचार भी बनाया था। अलबत्ता, श्री श्री ने कभी इस भाषा में बात नहीं की और वे लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि उनकी उत्तरप्रदेश यात्रा, उनके उस देशव्यापी कार्यक्रम का हिस्सा मात्र है जिसके अंतर्गत वे लोगों को यह शपथ दिलाते रहे हैं कि वे भ्रष्टाचार का विरोध करेंगे।

दिग्विजय सिंह गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि श्री श्री का राजनैतिक एजेन्डा है और वे आरएसएस की सी टीम हैं। क्या श्री श्री सचमुच राजनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं? क्या वे संघ परिवार का हिस्सा हैं? यह तो साफ है कि श्री श्री ने न तो कभी शाखाओं में भाग लिया है और न ही बौद्धिकों में हिस्सेदारी की है। उन्हें खाकी हाफ पेन्ट पहनकर नमस्ते सदा वत्सले का गायन करते हुए भी कभी नहीं पाया गया। परंतु साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि श्री श्री चुनावी राजनीति को प्रभावित करने के लिए बनाई गई एक वृहद योजना का हिस्सा हैं। हमें यह समझना होगा कि चुनावी राजनीति केवल राजनैतिक हथियारों और तरीकों से नहीं की जाती। सामाजिक आंदोलनों और जनजागृति के कार्यक्रमों के जरिए भी चुनावी राजनीति का खेल खेला जाता है।

कोई भी कानून न तो सड़कों पर पारित किया जा सकता है और न ही उसे किसी समूह के दबाव में बनाया जा सकता है। यूपीए सरकार ने अन्ना टीम की मांगें लगभग मंजूर कर ली हैं और उन्हें पूरा करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। परंतु इसके बावजूद, अन्ना टीम सुबह-शाम यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ आग उगल रही है और हिसार उपचुनाव में उसने खुलकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध किया। ऐसा लगता है कि अन्ना आंदोलन के एजेन्डे में जनलोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोध के अतिरिक्त कुछ और कार्यक्रम भी शामिल हैं। बाबाओं के इस समूह का कोई गहरा, छिपा हुआ एजेन्डा है और श्री श्री, इस समूह के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। यूपीए सरकार पहले ही सूचना का अधिकार और नरेगा जैसे आमजनों का सशक्तिकरण करने वाले कानून बना चुकी है और भ्रष्टाचार-विरोधी कानून बनाने पर सहमत है। इसके बावजूद, अन्ना टीम और उससे जुड़े हुए बाबाओं का सरकार पर दबाव बढ़ाते जाना आश्चर्यजनक है। स्पष्टतः इस आंदोलन के पीछे कोई न कोई ऐसा उद्देश्य है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।

इस आंदोलन का राजनैतिक एजेन्डा उतना सीधा नहीं है जितना कि दिखलाई दे रहा है। क्या जनता को यह पूछने का हक नहीं है कि आध्यत्मिकता की आड़ में किसी ब्रांड विशेष की राजनीति को जनता पर क्यों थोपा जा रहा है? श्री श्री पिछले तीन दशकों में तेजी से उभरे हैं। युवावर्ग को उसके कार्यस्थल से जु़ड़े तनावों से मुक्ति दिलाने के लिए श्री श्री ने “सुदर्शन क्रिया“ का अविष्कार किया जो कि पुरातन भारतीय परंपरा के श्वास आधारित व्यायामों का परिष्कृत रूप है। आज वे स्वर्गीय भगवान सत्यसांई, आसाराम बापू, बाबा रामदेव आदि के क्लब में शामिल हैं। एक ओर ये बाबा मन को भुलावा देने वाली, यथार्थ से दूर ले जाने वाली “स्वस्थ बनो“ तकनीकों का प्रसार कर रहे हैं तो दूसरी ओर वे एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे के पैरोकार बनकर भी उभरे हैं। धर्म के नाम पर की जा रही उनकी राजनीति में वंचितों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि वे नितिन गडकरी, नरेन्द्र मोदी, राम माधव और उनके जैसे अन्य लोगों के साथ खड़े दिख रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि इन सब का ध्यान इन दिनों उस राज्य पर केन्द्रित है जहां जल्दी ही चुनाव होने जा रहे हैं। उनकी राजनीति, एक तरह की हिन्दू राष्ट्र की राजनीति है जिसकी स्थापना के लक्ष्य को लेकर आरएसएस सन् 1925 से काम कर रहा है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन के नारे में कुछ भी गलत नहीं है। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि हजारे, रामदेव और श्री श्री को भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का विचार एक साथ कैसे आया? यह भी महत्वपूर्ण है कि संघ प्रमुख ने यह दावा किया है कि उन्होंने अन्ना हजारे से यह मुद्दा उठाने का अनुरोध किया था। संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में इनके आंदोलन को समर्थन और सहयोग दिया। क्या यह मात्र संयोग है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार का विरोध करना अच्छी बात है परंतु क्या कारण है कि ये लोग दलितों पर अत्याचार, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर कुछ नहीं कहते। क्या ये समस्याएं महत्वपूर्ण नहीं हैं? इन बाबाओं को भोजन के अधिकार से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कभी यह कामना प्रगट नहीं की कि भारत साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त देश बने। हम सबको यह जानने में गहरी दिलचस्पी है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, दलितों के लिए आरक्षण व अन्य कई मुद्दों पर श्री श्री और संघ-भाजपा के विचारों में इतनी समानता क्यों और कैसे है?


-राम पुनियानी
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