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सोमवार, 27 जनवरी 2014

सच्चाई को दबाने का संघी आतंक


सितम्बर 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश (मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत) के दंगे को संघियों ने भड़काया और मजदूर वर्ग के एक समुदाय को घर से बेघर कर दिया। दिन की उजाले की तरह साफ है कि दंगे राजनीतिक फायदे के लिये कराये गये थे, जिसमें सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने फायदे के लिए अपने-अपने तरीकों से दंगें में अपनी-अपनी भूमिका को निभाया। मुख्य भूमिका भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम का था जिसने एक घटना को साम्प्रदायिक रंग देने और लोगों के अन्दर जहर घोलने के लिये, पकिस्तान के सियालकोट में दो युवकों  की हत्या का बर्बर विडियो फेसबुक पर अपलोड किया। इस विडियो को जब फेसबुक से हटा दिया गया तो यह मोबाईल पर भेजा गया और लोगों के अन्दर झूठा प्रचार कर एक समुदाय के खिलाफ भड़काने का काम किया गया ।
लोगों की समस्या रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व रोजगार के मुद्दों से भटकाने के लिए ‘बहु-बेटी बचाओ’ महापंचायत का आयोजन किया गया। इसमें एक सम्प्रदाय विशेष के खिलाफ जहर उगला गया तो दूसरी तरफ यह अफवाह फैला दी गई कि लोग हमले करने के लिए आ रहे हैं। इसी तरह टीकरी गांव, जिला बागपत में एक हिन्दू लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर लटका दिया गया। सवाल उठता है कि कोई मुस्लिम लड़के को मार कर मस्जिद गेट पर क्यों लटकायेगा?
दंगे के मुख्य आरोपी संगीत सिंह, जिन्होंने फेसबुक पर फर्जी विडियो अपलोड किया था, को मोदी के मंच से आगरा में पुरस्कृत किया गया। विश्व हिन्दू परिषद के नेता अशोक सिंघल खुलेआम बयान देकर कहते हैं कि ‘‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बंधुओं ने इस बार ‘लव जेहादियों’ को ऐसा करारा जबाब दिया है जैसा कि गुजरात में रामभक्तों को जलाने वालों को दिया गया’’।
7 सितम्बर के नांगला-मंदौड़ पंचायत में ‘बहू बेटी बचाओ’ महापंचायत को धारा 144 के बावजूद होने दिया गया, जबकि उससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी देवराज नागर ने दौरा भी किया था। डीजीपी देवराज नागर भाजपा सांसद व दंगा भड़काने के आरोपी हुकूम सिंह के रिश्तेदार भी हैं। दंगे के दौरान जब एक समुदाय के लोग पुलिस को फोन कर रहे थे तो पुलिस फोन रिसिभ नहीं कर रही थी या कर रही थी तो बस यही पुछ रही थी कि कोई मरा तो नहीं। मुस्लिम समुदाय के घरों की तलाशी ली गई, और बीच में पड़ने वाले हिन्दू घरों को छोड़ दिया गया। शिनाना गांव के मीर हसन व दीन मुहम्मद के घरों के जेवर पुलिस तलाशी के दौरान चुरा लिये गये और उनको झूठे केसों में फंसा कर जेल भेज दिया गया। क्या इसे हिन्दू फासिज्म नहीं बोला जायेगा? 1987 में मेरठ में पीएसी जवानों द्वारा किये गये जनसंहार में अभी तक पीडि़त परिवार को न्याय नहीं मिल पाया है। बर्खास्त पीएसी जवानों को कर्तव्यनिष्ठ व अनुशासित मानते हुए वापस नौकरी पर ले लिया गया।
मुजफ्फरनगर दंगे के पीडि़त परिवार अभी भी शिविरों में रह रहे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार उन शिविरों को हटाने के लिए लगातार दबाव बना रही है। पीडि़त परिवार अपने गांव जाने को तैयार नहीं हैं। कुछ पीडि़तों को मुआवजा दिया गया और उनसे शपथ पत्र लिया गया कि वे अपने गांव नहीं जायेंगे-अगर वापस गये तो उनको मुआवजा वापस करना पड़ेगा।
डेमोक्रेटिक स्टूडेन्ट्स यूनियन ने दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैम्पस में 22 जनवरी, 2014 को मुजफ्फरनगर दंगे में हिन्दुत्वा फासिज्म (संघ परिवार) की भूमिका पर एक सेमिनार रखी थी। इसमें संघ परिवार से जुडे़ ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ के गुंडों ने बाधा डाला। सेमिनार रूम के बाहर पुलिस की मौजदूगी में वे नारे लगाते रहे व सेमिनार रूम में बैठ कर वक्ताओं की बातों पर टोका-टोकी करते रहे। ‘संघी, गाय’ आदि का नाम नहीं लेने की बात कह रहे थे। आयोजकों के पूछने पर कि ‘‘संघी को संघी और गाय को गाय नहीं कहा जाये तो क्या कहा जाये’’ तो उनका जबाब था कि जानवर कहो। इस पर सभी लोग हंस पड़े। सच कहा जाये तो ये जानवर ही हैं जिनको यह ज्ञान नहीं है कि इंसानियत क्या होती है। संघीय गुंडों ने ‘न्यू सोशलिस्ट इनिसिएटिभ (छैप्)’ के साथी बनोजीत के कपड़े फाड़ दिये। इन संघी गुंडों का जबाब कौन , छैप् व अध्यापकों ने मिलकर दिया जिससे वे अपने मनसुबे में कमयाब नहीं हो पाये। दिल्ली पुलिस का भी वही रवैय्या था जो कि यूपी पुलिस का था। वह मूक दर्शक बनी देख रही थी। दिल्ली पुलिस डिर्पाटमेंट के एचओडी से ही सवाल पूछ रही थी कि सेमिनार के आयोजन का परमीशन क्यों दिया गया? दबाव में आकर डिर्पटमेंट ने जल्द से जल्द सेमिनार खत्म करने के लिए आयोजकों पर दबाव डालना शुरू कर दिया। दिल्ली के अन्दर किसी भी डेमोक्रेटिक सम्मेलन, सभा, धरना में आकर यह संघी परिवार बाधा उत्पन्न कर रहा है और दिल्ली पुलिस उनका पूरा साथ दे रही है।
संघी और सभी संसदीय राजनीतिक पार्टिया साम्राज्यवाद के नई आर्थिक नीतियों को जोर-शोर से लागू करवाने के लिए वही नीति अपना रहे हैं जो 1991-1992 में नरसिम्हा राव-मनोमहन औ संघी ने अपनाया था। आर्थिक नीति लागू करवाने के लिए अडवाणी ने रथ यात्रा निकालकर हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ा कर मुद्दे को भटकाया था। वही नीति अभी संघी अपना रहे हैं जब भूमंडलीकरण के नीतियों को जोर-शोर से लागू करने में शासक वर्ग लगा हुआ है तो देश में अचानक दंगों में तेजी आ गयी है। सभी शांतिप्रिय, जनवादपसंद संगठनों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को यह सोचने की जरूरत है कि भगवाधारियों व पुलिस गठजोड़ को कैसे चुनौती दी जाये। भगवाधारियों की झूठी देशभक्ति को चुनौती देते हुए आत्मनिर्भर, जनवादी भारत का निर्माण कैसे किया जाये।

-सुनील कुमार

सोमवार, 13 जनवरी 2014

छद्म समाजवाद का मौजवाद

Kamran Alvi
आजकल उत्तर प्रदेश सरकार दो कारणों से चर्चा का केन्द्र बिन्दु बनी हुई है पहला मुजफ्फरनगर दंगे के कारण, जिससे हजारों परिवार 4 माह बाद भी शिविरों में रहने को विवश हैं और दूसरा इन मजलूमों को छोड़कर यूपी सरकार मौजमस्ती (सैफई में 14 दिन के नाचगाने) तो दूसरी तरफ मंत्री और विधायकों का विदेश भ्रमण में लगी हुई है।
मुजफ्फरनगर दंगे में कितने लोगों की मौत हुई, कितने घरों को जलाया गया, कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ व कितनी सम्पित्त की नुकसान हुआ आज तक उसकी कोई सच्चाई समाने नहीं आ पाई है और न ही आयेगी। दंगों के बाद मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली व गाजियाबाद में 50 हजार के करीब परिवार शिविरों में रहे। अभी अकेले शामली जिले में 19 शिविर चल रहे हैं जिसमें करीब 3000 परिवार रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह की नजरों में शिविरों में दंगा पीड़ित नहीं, कांग्रेस, बीजेपी के समर्थक व षड़यंत्रकारी रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने माना है कि शिविरों में 34 बच्चों की मृत्यु हुई है जबकि यह संख्या उससे कहीं अधिक है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में शिविरों में रहने वालों की संख्या 5024 बताई गई है जबकि केवल शामली जिले में 3 जनवरी 2014 तक करीब 15000 लोग शिविरों में रह रहे हैं।
सैफई का आयोजन
मुलायम सिंह अपने मृतक भतीजे रणबीर यादव की याद में सैफई में 14 दिनों (26 दिसम्बर से 8 जनवरी) का समारोह आयोजन कर करीब 300 करोड़ रु. (मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार) लुटाये। खेड़ी खुर्द की राहत शिविर में रहने वाली रूकसाना अपने दो बच्चों की मौतों की किस तरह याद करेगी जो कि अपनी और बच्चों की जान को बचाने के लिए गांव तिगड़ी से दो कमरों वाला घर को छोड़कर आई थी। ठंड ने रूकसाना के बच्चों को निगल लिया। उसे अब जिन्दगी चलाने के साथसाथ डॉक्टर के 20002500 रु. दावा के दाम चुकाने की चिंता मारे जा रही है। सैफई के 50 लाख के शानदार टेंटों में गर्म कपड़े पहने मुलायम सिंह व उनके एक लाख सेवकों को ठंड से बचाने के लिए हीटर जलाये गये थे। लेकिन इन प्लास्टिक के टेंटों में रहने वालों के लिए ठंड से बचने के लिए अंगीठी तक नहीं है। टेंट के अन्दर पानी टपकता है और जब वो आग जलाते हैं वो भी बारबार बुझ जाती है। अखिलेश यादव व उनके कुनबे के लिए गदे्दार सोफे हैं जिस पर सफेद कवर भी है और उनके पैरों के नीचे मुजफ्फरनगर दंगे को संभाल रहे आईजी अशुतोष बैठे बातें कर रहे थे। उसी मुजफ्फरनगर दंगे की पीड़िता अकबरी अपने बच्चे सादीन को दफनाने के लिए सफेद कपड़े खोज रही थी। अकबरी के पास बच्चे को सुलाने के लिए तख्त तक नहीं था। वह नीचे सोई थी और उसके सर पर सांप बैठा था जो कि सादीन को मौत की नीन्द सुला दिया। सैफई समारोह में शिरकत कर रहे मेहमानों को पहुंचाने के लिए 9 चार्टड प्लेन लगाए गये थे। वहीं इन दंगा पीड़ितों के शिविरों में अस्पताल पहुंचाने के लिए एक एम्बुलेंस तक नहीं है। इस समारोह की सुरक्षा के लिए 2000 पुलिसकर्मी लगाये गये थे। यही पुलिसकर्मी दंगा पीड़ित दीन मुहम्मद के घरों की तलाशी लेते हैं और उनके जेवर और मोबाईल लेकर चले जाते हैं। जेवर और मोबाईल लेने के बाद भी एसडीएम साहब दीन मुहम्मद को फर्जी केस में जेल भेज देते हैं। दीन मुहम्मद दो माह बाद 35 हजार रु. लगाकर जमानत पर छुटकर आता है। अब उसे और उसके परिवार को कर्ज चुकाने और बेटी की शादी की चिंता सता रही है। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव माधुरी व सैफ अली खान की फिल्म ड़े ईश्किया और बुलेट राजा के लिए एकएक करोड़ देने का वादा करते हैं। 1800 दंगा पीड़ित परिवारों को अब तक 55 लाख रु. दिये गये हैं वो भी इस शर्त पर की वे दुबारा अपने जमीन पर नहीं जायेंगे, अगर गये तो उनको पैसा वापस करना पड़ेगा।
सपा सांसद धर्मेन्द्र यादव ने लोगों से वादा किया कि अगले वर्ष और बड़े लेवल पर समारोह का आयोजन किया जायेगा। पिछले वर्ष भी सैफई समारोह विवादों में रहा, जब बॉर डांसरों व विदेशी डांसरों पर लोगों ने छिंटाकस्सी की थी। अखिलेश यादव प्रेस कान्फ्रेस कर मीडिया पर ही तोहमत जड़ रहे हैं कि मीडिया से वो नहीं मिले इसलिए वो झूठा प्रचार कर रही है। समारोह में 300 करोड़ रू. नहीं, 78 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। समारोह का इतना व्यापक आयोजन पर्यटन को ब़ावा देने के लिये किया गया था। फिल्म ऐक्टरों पर सवाल उठते ही वे चैरिटी में दान देने की बात कर रहे हैं, तो महेश भट्ट अपनी पुत्री आलिया भट्ट के लिये माफी मांग रहे हैं। कह रहे हैं कि वो तो 20 वर्ष की है, उसे नहीं मालूम था कि अक्टूबर के दंगे का घाव अभी तक भरा नहीं गया है। यही बात अखिलेश यादव कह रहे हैं कि मुजफफ्रनगर की बात उन सितारों से नहीं पूछा जाये जो मुजफ्फरनगर की घटना को जानते ही नहीं हैं। मुजफ्फरनगर के पीड़ितों की इतनी सहायता की गई है जितना अभी तक देश में सहायता नहीं दिया गया होगा। अखिलेश भूल रहे हैं कि उनके राज्य में दंगा पीड़ित इतने खौफजादा हैं कि पुलिस के डर से रात में पहरा देना पड़ रहा है। 3 जनवरी की रात को 3.50 बजे भोर में पुलिस की गाड़ियां देखते ही शिविर के लोग बाहर निकल कर गाड़ियों की तरफ दौड़ पड़े। बरवानी कैम्प में 100 परिवारों पर 30 कम्बल पटवारी ने जाकर दिया। शायद अखिलेश सरकार के लिए यही बड़ी राहत होगी।
भ्रमण पर मंत्री, विधायक
संसदीय प्रणाली के अध्ययन के नाम पर शहरी विकास मंत्री आजम खान के नेतृत्व में 17 सदस्यीय (8 मंत्री और 9 विधायक) दल पांच देशों (तुर्की, हालैंड, ब्रिटेन, ग्रीस व संयुक्त अरब अमीरात) की 18 दिन की यात्रा पर निकला हुआ है। इस दल में सपा, कांग्रेस, भाजपा, लोकदल के मंत्री व विधायक शामिल हैं। इस भ्रमण पर कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर भी जाने वाले थे, लेकिन नहीं गये। प्रदीप माथुर का कहना है कि 'इसमें कुछ नया नहीं है। बहुजन समाज पार्टी के शासन काल को छोड़कर लगभग हर वर्ष विधायकों का एक दल ऐसे भ्रमण पर जाता रहा है। मैंने खुद ऐसे दौरों से संसदीय प्रणाली के बारे में बहत कुछ सीखा है।’’ समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी इसे सामान्य प्रक्रिया मानते हैं। वे कहते हैं कि 'इन दौरों में दूसरे देशों की संसदीय प्रणाली को समझने का मौका मिलता है और कई अन्य राज्यों से भी ऐसे संसदीय दल जाते रहे हैं।’’ सभी जानते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात में कोई संसदीय प्रणाली नहीं है। क्या यह भ्रमण जनता के पैसे से मौजमस्ती करने के लिए है? इस भ्रमण में राजा भैया और मनोज कुमार पारस जैसे लोग भी शामिल हैं। राजा भैया को तो सभी जानते हैं कि वे किस तरह के भैया हैं। मनोज कुमार पारस, नगिना (बिजनौर) से सपा के विधायक हैं, अभी स्टाम्प और रजिस्ट्रेशन मंत्री हैं। मनोज कुमार पारस पर एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म करने का केस वर्ष 2007 से चल रहा है। उत्तर प्रदेश की उत्तम सरकार ने उन पर से केस वापस ले लिया है जिस की 17 जनवरी को कोर्ट में तारीख है।
निर्ममता व समाजवाद
निर्भया/दामिनी की घटना पर बड़े बड़े वक्तव्य देने वाला वालीवुड क्या इतना निर्मम हो गया है कि उसे मुजफ्फरनगर की इतनी बड़ी घटना दिखाई नहीं दे रही है? क्या वालीवुड प्रसिद्धि पाने वाली वक्तव्य देता है, लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने के लिए?
मुजफ्फरनगर दंगे में एक नहीं सैकड़ों/हजारों, निर्भया/दामिनी मिल जायेंगी, जो कि सिसकियां ले रही हैं, अपना मुंह नहीं खोल रही हैं। जिसने थोड़ खोला भी उनको भी न्याय नहीं मिला। क्या सपा का समाजवाद यही है? यही लोहिया का सपना था? जहां एक तरफ 4 माह से लोग घर छोड़कर शिविरों में रहने को मजबूर हैं, बच्चे मर रहे हैं, उनको सपा सरकार जमीन हड़पने वाले और षड़यंत्रकारी के रूप में चिन्हित कर रही है। जनता के पैसे पर बलात्कारी मंत्री सैरसपाटे के लिए जाते हैं। मुलायम सिंह यादव के दिलों में प्रधानमंत्री बनने की आग जल रही हैं। वहीं घर से बेघर हुए लोगों के दिलों में अपने से बिछुड़ने और सिर पर छत न होने की आह निकल रही है। मुलायम सिंह यादव एक भतीजे की याद में सैकड़ों करोड़ खर्च कर रहे हैं, वही दंगा पीड़ित कैम्पों में मातापिता अपने आंखों के सामने बच्चों को तड़पते हुए देख रहे हैं। आज शिविर में मांबहनें, बच्चेबू़े पूछ रहे हैं कि उनको न्याय कब मिलेगा? क्या इस व्यवस्था में इस मेहनतकश जनता के लिए न्याय है? यह मेहनतकश जनता जनती है कि उसके पास हारने के लिए अब कुछ नहीं बचा है। इस छद्म समाजवाद का अंत यही जनता करेगी। जब रोम जल रहा था तो वहां का शासक
नीरो बंशी बजा रहा था। यही हाल सपा सरकार की हो गई है।
सुनील कुमार

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मूर्तियों के अनावरण की राजनीति

मूर्ति पूजा भारत में कोई नई बात नहीं है, यहां पर कई करोड़ देवी-देवताओं को मूर्ति बनाकर पूजा जाता है। इन्सानों को भगवान बना दिया जाता है यहां तक कि मूर्ति विरोधी लोगों को मूर्ती बनाकर पूजा जाने लगता है। जैसा कि बुद्ध को भगवान बना दिया गया उनकी पूजा होने लगी यहां तक झारखंड की कुछ जगहों पर तो बुद्ध की मूर्ति पर महिलाएं सिन्दुर तक लगा देती हंै।
आजकल भारत में मूर्ति निर्माण का कार्यक्रम चला हुआ है, देश को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की जरूरत नहीं है मूर्ति की जरूरत है। गुजरात में ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ 182 मीटर (597 फीट) ऊंची प्रतिमा (दुनिया के सबसे बड़ी प्रतिमा), बिहार के चम्पारण जिले के जानकी नगर में राम की 405 फीट ऊंची मूर्ति (दुनिया का सबसे ऊंचा हिन्दु मन्दिर), उ.प्र. के कुशीनगर में 268 एकड़ जमीन पर 220 फीट ऊंची कांस्य की बुद्ध प्रतिमा बनायी जा रही है। यानि आजकल भारत में सब कुछ ‘ऊंचा’ करने का संकल्प ले लिया है। जैसा कि मोदी ने 31 अक्टूबर, 2013 को नर्मदा तट पर ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ (सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा) का शिलान्यास करते हुए कहा था कि भारत को श्रेष्ठ बनाने के लिए एकता की शक्ति से जोड़ने का यह अभियान एक नई ऐतिहासिक घटना है। वे अपने भाषणों में कहते रहे हैं कि दुनिया के सबसे ऊंची ‘स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी’ 93 मीटर (जो कि ऐतिहासिक गलती भी है स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी से ऊंची दो प्रतिमा हैं- 1. स्प्रिंग टेम्पल बुद्धा 153 मीटर, 2. जापान में बुद्ध की प्रतिमा 120 मीटर) से ऊंची लौह पुरुष की ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को पूरी दुनिया की ऊंची प्रतिमा होगी।  क्या हम  ‘स्टैचू आॅफ यूनिटी’ बनाकर अमेरिका (स्टैच्यू आॅफ लिबर्टी 93 मीटर) से दोगुना ताकतवर हो जाने वाले हैं (जो कि मंत्रियों के कपड़े तक खुलवा कर चेकिंग करता है); बेल्जीयम स्थित 39.6 मीटर उंची ‘क्राइस्ट द रीडीमर’ से हम पांच गुना (बेल्जियम की जनसंख्या करोड़ में है और भारत को कर्ज/सहायता देता है) या रूस के ‘द मदरलैंड काल्स’ जो कि 85 मीटर ऊंचा है उससे हम दोगुना ताकतवर होने वाले हैं (जिस के ऊपर भारत रक्षा के लिए निर्भर रहता है)?
इन मूर्तियों को लेकर कहीं भी ऐसा शोर सुनाई नहीं दे रहा है जैसा कि मायावती के समय सुनाई दे रहा था कि देश की जनता को पाॅर्क, मूर्तियों की जगह शिक्षा, स्वास्थ्य व रोटी की जरूरत है। इस बार शोर इस बात को लेकर हो रहा है कि पटेल की वारिस कांग्रेस है या भाजपा? भाजपा का दावा है कि ‘लौह पुरुष’ पटेल ने 565 राजवारों को भारत में मिलाया था जो कि भाजपा के वृहद भारत के सपनों से मिलता है; दूसरी तरफ कांग्रेस का कहना है कि ‘लौह पुरुष’ कांग्रेस में थे और भाजपा के पितामह संगठन आरएसएस को सांप्रदायिक बता कर प्रतिबंधित किया था। केन्द्रीय मंत्री वेनी प्रसाद वर्मा ने तो यहां तक कह दिया कि ‘‘लोहा मंत्री हंै वेनी प्रसाद वर्मा और लोहा बन रहे हैं मोदी। सरदार पटेल के वशंज हैं वेनी प्रसाद वर्मा और सरदार पटेल की मूर्ति बनवा रहे हैं मोदी। यह वोट के लिए नहीं चलेगा।’’ प्रतिमा की पूरी लड़ाई वारिस बनने की लड़ाई में बदल गई है।
इन मूर्तियों के बहाने लोगों से सच्चाईयों को छुपाया जा रहा है, जमीनें हड़पी जा रही है व टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। गुजरात सरकार के दस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी महत्वाकांक्षी योजना ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ की घोषणा की थी। ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ के तहत सरदार बल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर उंची मूर्ती नर्मदा जिले मंे नर्मदा नदी के अंदर टापू क्षेत्र में स्थापित की जायेगी। इसके लिए अलग से एक कोष निर्धारित किया गया है जो दुनिया भर में मीडिया के जरिए इस प्रतिमा का प्रचार करेगी।  इस प्रतिमा पर सरकार 2500 करोड़ रु. खर्च करने वाली है। यहां पहले से ही नर्मदा बांध (122 मीटर ऊंचा) द्वारा लाखों लोगों का विस्थापन हो चुका है जो आज तक विस्थापन की लड़ाई लड़ रहे हैं। मेधा पाटेकर ने इसे बांध की ऊंचाई बढ़ाने की साजिश बताया है उनका कहना है कि लगातार बढ़ती बिजली के भूख ने इस बांध को बंटवारे का बांध बना दिया है। ऊंची प्रतिमा के बहाने बांध की ऊंचाई भी 122 मीटर से बढ़ाकर 138 मीटर ले जाने की है जिससे कि पानी की सप्लाई बढ़ायी जाये और बिजली का उत्पादन भी। इसके कारण एक बार फिर बड़ी संख्या में आदिवासी अपने घरों से उजाड़े जायेंगे।
‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को बनाने का ठेका अमेरिकी कम्पनी ‘टर्नर कन्स्ट्रकशन’ को दिया गया है। यह कम्पनी आस्ट्रेलिया के मीनहाटर््ज और अमेरिका के माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स के साथ मिलकर पटेल की आकृतिवाली 60 मंजिला इमारत बनायेगी। अमेरिका के टर्नर कन्स्ट्रकशन व माइकल ग्रेव्स एण्ड एसोसिएट्स भवन निर्माण की कम्पनी है जो पूरी दुनिया में बड़े-बड़े भवनों का ठेका लेती है। एफिल टाॅवर के तर्ज पर इस मूर्ति के भीतर 500 फुट पर एक डेक का निर्माण किया जायेगा जिस पर 200 लोग एक साथ चढ़कर 12 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले सरदार सरोवर जलाशय को देख कर आंखों को ठंडक पहुंचा सकते हैं जिसने लाखों लोगों को उजड़ने पर मजबूर किया है। तीन वर्ष के अंदर यहां होटल, पार्क, रेस्टोरेण्ट, अंडरवाटर अम्यूजमेन्ट पार्क, थीम, पब बनाये जायेंगे जिससे कि पर्यटकों को लुभाया जा सके। मोदी की इस ड्रीम योजना की और स्पष्टता उनके 15 दिसम्बर, 2013 को उत्तराखण्ड में दिये गए भाषण से होती है वे कहते हैं कि ‘‘प्रदेश की आर्थिक हालत को सुधारने के लिए टूरिज्म को बढ़ावा देना होगा। पूरे विश्व में टूरिज्म उद्योग सबसे तेज गति से बढ़ने वाला उद्योग में शामिल है। टूरिज्म में 3 खरब डाॅलर व्यापार की संभावना छिपी है। ईश्वर के नाम पर उत्तराखंड लाखों लोगों को आकर्षित कर सकता है, ‘टेरिज्म डिवाइड्स, टूरिज्म युनाइट्स’।’’ मोदी टूरिज्म उद्योग को बढ़ावा देकर देश को आगे ले जाना चाहते हैं। गोवा के लोगों की दुर्दशा किसी से छिपी बात नहीं है जो कि एक टूरिज्म स्थल के रूप में मशहूर है, यहां पर लाखों विदेशी सैलानी प्रति वर्ष आते हैं। वहां की स्थानीय जनता को अपनी पेट की आग को बुझाने के लिए महिलाओं, लड़कियों को नंगा होकर नाचना पड़ता है, शैलानियों के नंगे बदन को मसाज करना होता है। उत्तराखण्ड की केदार घाटी में ईश्वर के नाम पर जून, 2013 में मानव निर्मित तबाही छिपी हुई बात नहीं है जिसमें बीसियों हजार लोग मारे गये। एक साथ गांव अनाथ/विधवा हो गये। उस समय मोदी जी भी उत्तराखण्ड गये थे। क्या वह ऐसा ही विकास चाहते हैं जहां पेट की आग बुझाने के लिए महिलाओं और बच्चियों को नंगा नाचना पड़े, गांव के गांव, परिवार के परिवार एक साथ मारे जायें लाशें सड़ती रहें बच्चे अनाथ हो जाएं। ऐसा ही टूरिज्म और ऐसा ही विकास उनको चाहिए?
‘रन फाॅर यूनिटी’
सरदार बल्लब भाई पटेल की 63 वीं पुण्यतिथि पर 15 दिसम्बर को ‘रन फाॅर यूनिटी’ का अयोजन 565 जगहों पर किया गया। ‘रन फाॅर यूनिटी’ का अयोजन 565 जगह पर इसलिए किया गया कि पटेल ने 565 रियासतों को भारत में मिलाया था। इस आयोजन को बड़ोदरा जिले में हरी झंडी दिखाते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ‘‘सरदार पटेल ने राष्ट्र को एकजुट करने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से आम लोगों को जोड़ा देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया। देश को बांटने की मानसिकता को बदला और देश को एकजुट किया।’’ हम मोदी जी से पूछना चाहते हैं कि मोदी जी इसमें से किन पद्चिनहों को अपनाया है? आप तो औपनिवेशिक मानसिकता को अपना रहे हैं और उसे बढ़ावा दे रहे हैं। आप ‘स्टैच्यू आॅफ यूनिटी’ को बनाने के लिए जिस ‘टर्नर कन्सट्रक्शन’ कम्पनी को ठेका दिया है जो दुनिया के जालिम देश अमेरिका की कम्पनी है जिस देश का नकल करके आप स्टैच्यू बनाकर ‘श्रेष्ठ’ होना चाहते हंै। आप पटेल के आम लोगों की जोड़ने की बात कर रहे हैं, ‘साहब’ आप ध्यान दीजिये आप तो अपने ही लोगों को उजाड़ रहे हैं, उनको अपनी जमीन, अपनी संस्कृति से बेदखल कर रहे हैं। आप के ‘सिरमौर’ बनने के डर से एक वर्ग, एक विशेष समुदाय भयभीत है। आप जिस उद्योग को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं उस उद्योग में आप की संस्कृति का क्या होगा, अपने देश की मां-बहनों के साथ क्या होगा वो आपने कभी सोचा है?
भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने दिल्ली में ‘रन फाॅर यूनिटी’ के समय कहा कि अगर जनता ने मोदी को 10 वर्ष के लिए प्रधानमंत्री बनाया तो भारत महाशक्ति बन जायेगा। सिंह जी क्या मोदी के 10 वर्ष के शासन काल में गुजरात भारत का अग्रणी राज्य बन गया है? अगर गुजरात अग्रणी राज्य बन गया होता तो पश्चिम गुजरात की रहने वाली सोनल को दो बार पैसे के लिए सरोगेसी (किराये का कोख) से बच्चा पैदा नहीं करने पड़ते (बीबीसी हिन्दी.काॅम, 29 जुलाई 2011)। अग्रणी राज्य होता तो गुजरात के जिस नर्मदा जिले में जनता का 2500 करोड़ रु. खर्च करके स्टैच्यू बनाया जा रहा है उसी जिले की 5,90,297 जनसंख्या पर हायर सेकेंड्री स्कूल केवल 27 हंै अस्पताल तो केवल दो ही हंै अगर इन पैसों को उस जिला के लोगों पर ही खर्च कर दिया जाता तो सचमुच शिक्षा, स्वास्थ्य के मामले में दुनिया के बेहतरीन जगहों में गिना जा सकता था। लेकिन सिंह जी आप लोगों को तो नाम चाहिये, इससे मुझे 1969 में आई फिल्म ‘एक फूल दो माली’ के गाने याद आते हैं- ‘‘तूझे सूरज कहूं या चंदा, दीप कहूं या तारा मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा’’। 2500 करोड़ रु. से भारत में 100-100 करोड़ रु. लगाकर 25 अस्पताल बना दिये जाते तो हर साल लाखों लोगों की जिन्दगी बचाई जा सकती थी या इतने पैसे लगाकर स्कूल, काॅलेज खोले जाते तो शिक्षा के स्तर में सुधार होता, कई डाक्टर, इंजीनियर पैदा किये जा सकते थे। इसमें  वो गाने सटीक बैठते हैं कि ‘‘कोठियों से मुल्क की मय्यार को मत आंकिये, असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है....।’’
भारत में मूर्तियों को लेकर एक खास तरह की राजनीति हो रही है। मूर्तियों में जनता को उलझा कर और झूठी श्रेष्ठता दिखाकर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। अब हम तो सब कुछ ॅज्व् की शत्र्तों पर अपने देश को लूटने की इजाजत देकर बाहर से मंगा सकते हैं। अब उद्योगों की जगह मूर्तियों की स्थापना की जा रही है और उसके आस पास रेस्टोरेन्ट, होटल, पब, डिस्को इत्यादि का निर्माण किया जा रहा है। टूरिज्म से विदेशी मुद्रा आयेगी उससेे उपभोक्तावादी-साम्राजयवादी, संस्कृति को और बढ़ावा मिलेगा। देश में बलात्कार जैसी घटनाएं बढ़ेंगी जिस पर हम रोज हाय-तौबा मचा रहे हैं। इससे आम लोगों की हालत और बदतर होगी, स्थानीय लोगों की जमीनी छीनी जायेगी, उनकी रोजी-रोटी खत्म कर दिये जायेगा, उनके छोटे व्यापारियों के जगह धानाढ्य लोगों का व्यापार आ जायेगा और हम-आप उनके पास काम करने को मजबूर होंगे। महिलाओं-लड़कियों को वेश्यावृति के धंधे में धकेला जायेगा। ‘बड़ा, ऊंचा, श्रेष्ठ’ ये सब सुना कर लोगों को ये एहसास कराया जा रहा है कि कोई बात नहीं घर में खाने को भी नहीं है लेकिन हम ‘श्रेष्ठ’ हैं, ‘ताकतवर’ हैं। हमें जितनी ऊंचाई दिखाई जा रही है हम उतनी ही हमें नीचे की तरफ जा रहे हैं। हमें इन झूठे श्रेष्ठ, स्वाभिमान और ऊंचाई की मूर्तियों के खिलाफ एक होकर बोलना होगा, लोगांे की रोटी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान की राजनीति दिलाने वाली नीतियों के लिए लड़ना होगा। मूर्तियों में जो पैसा खर्च किया जा रहा है वो पैसा भारत की आम जनता के लिए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य पर खर्च किये जाने की जरूरत है।
-सुनील कुमार

बुद्ध मूर्ति पूजा विरोधी थे लेकिन आज के समय बुद्ध खुद मर्ति के रूप में विरजमान हैं, इसी तरह भगत सिंह जो कि खुद को नास्तिक मानते थे उसको भी हिन्दुत्वा बिग्रेड व शासक वर्ग अपनाने की कोशिश कर रहा है। भगत सिंह ने जिस तरह के शोषणकारी पार्लियामेंट का विरोध किया था उसी तरह के शोषणकारी पार्लियामेंट में उनकी मूर्ति स्थापित कर दी गई। जिस अयोध्या में कई मन्दिर व मूर्तियों की पूजा करने वाला कोई नहीं है उसी अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए दो सम्प्रदायों के अन्दर इतना विद्वेष भर दिया गया कि कितने लोगों का खून बहा है, बह रहा और बहेगा; कहा नहीं जा सकता।

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

लोक’ को गायब कर तंत्र की ही रक्षा


छत्तीसगढ़ के 18 सीटों पर करीब 67 प्रतिशत मतदान होने की खबर  है। जिसे भारत की मुख्य मीडिया, छत्तीसगढ़ सरकार व भारत का शासक वर्ग एक जीत के रूप में देख रहा है। सभी अखबारों में बुलेट पर भारी बैलट नामक शीर्षक से खबरें बनाई गई हैं। इसे लोकतंत्र की जीत माना जा रहा है और लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत के रूप में देखा जा रहा है। 27 सितम्बर, 2013 के सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद पहली बार देश में नोटा (उम्मीदवारों को नकारने का) बटन का प्रयोग किया गया है। क्या सचमुच यह लोकतंत्र में लोगों की जीत है या नोटा का प्रभाव है या सरकारी आंकड़ों का खेल है?
नोटा का प्रयोग
27 सितम्बर, 2013 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सभी ईवीएम मशीन में गुलाबी रंग का नोटा बटन लगाया जाये और लोगों को इसके लिए जागरूक किया जाये। लेकिन सरकार ने इस काम को पूरा नहीं किया गया। दंतेवाड़ा के कट्टेकल्यान के मतदान अधिकारी मुन्ना रमयणम से जब बीबीसी संवादाता ने नोटा बटन में विषय बात की तो वे नोटा बटन को लेकर अनभिज्ञ थे। उन्होंने बताया कि जब इलेक्शन ड्यूटी की ट्रेनिंग दी जा रही थी उस समय भी नोटा को लेकर कुछ नहीं बताया गया।  मुन्ना रमायणम स्थानीय निवासी हैं और वो गोंडी भाषा के जानकार भी हैं वो अच्छे से बस्तर के आदिवासियों को गांेडी में समझा सकते थे जो कि बाहरी लोगों के लिए समझाना आसान काम नहीं है। लेकिन जब उनको ही नोटा के विषय में मालूम नहीं है तो वो कैसे बतायेंगे लोगों को? क्या यह सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लंघन नहीं है? क्या शासन-प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मजाक नहीं उड़ा रहे हंै? क्या उन पर कोर्ट की अवमानना का केस हो सकता है?
माओवादी चुनाव बहिष्कार के साथ-साथ, गांव-गांव जाकर ईवीएम मशीन के द्वारा नोटा के बारे में बता रहे थे। इवीएम मशीन कम होने के कारण वे गत्ते का प्रयोग कर लोगों को नोटा के लिए जागरूक कर रहे थे। हो सकता है कि माओवादियों के इस रणनीति के तहत भी वोट का प्रतिशत बढ़ा हो।
लोकतंत्र में लोगों को अपने मन से चुनाव डालना होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के चुनाव में देखा गया कि किस तरह भारी फोर्स लगा कर चुनाव कराया गया आलम यह रहा कि अबूझमाड़ में बारह हजार मतदताओं के लिए बीस हजार जवानों को लगाया गया है। बस्तर व राजनन्दगांव में चुनाव के लिए सीआरपीएफ और राज्य सशस्त्र पुलिस की 560 कम्पनियां तैनात की जा रही है जबकि पहले से 33 सुरक्षा बलों का बटालियन तैनात है। 18 सीटों के ‘लोकतंत्र’ का महापंर्व सम्पन्न कराने के लिए लगभग 56 हजार हथियारंबद जवानों को उतारा गया है। इसके अलावा 19 हेलिकाप्टर को लगाया गया है। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और 10 राज्यों की आम्र्ड फोर्सेज के आला अधिकरियांे का ज्वांइट ग्रुप बनाया गया है, जो हर दो घंटे पर समीक्षा कर कर रहा है। क्या यह तैयारी किसी ‘लोकतंत्र’ के चुनाव जैसा है या लड़ाई जैसा?
इन जवानों को स्कूलों, हास्टलों व आश्रमों में ठहराया गया है। इन इलाकों में चुनाव होने तक स्कूल बंद रखने की घोषणा की गई है। यह सुप्रीम कोर्ट के 18 जनवरी, 2011 के आदेश के खिलाफ हैं जिसमें छत्तीसगढ़ सरकार से सुरक्षा बलों को स्कूलों, हाॅस्टलों और आश्रमों से हटाने को कहा गया था। पुलिस महानिदेशक रामनिवास के अनुसार ‘‘सुरक्षा बलों को स्कूलों में ठहराने का निर्णय हमने चुनाव आयोग की सहमति के बाद लिया है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हमने केन्द्रिय चुनाव आयोग से इसके लिए अनुमति मांगी थी और उनकी सहमति के बाद ही हमने सुरक्षा बलों को स्कूलों में ठहराया है।’’ कानून के जानकारों के अनुसार यह सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है।
बीजापुर के 243 मतदान केन्द्रों में से 104 मतदान केन्द्रों को अतिसंवेदनशील तथा 139 मतदान केन्द्रों को संवेदनशील माना गया है। 167 मतदान केन्द्रों को भीतरी इलाके से यह कह कर हटा दिया गया कि वहां मतदानकर्मियों का पुहंचना मुश्किल है। अगर यहां के मतदाताओं को वोट डालना है तो उनको  40 से 60 किलोमीटर का सफर तय करके वोट डालना पड़ेगा। सवाल यह है कि जिस सरकार को जनता टैक्स देती है उसी जनता तक पहुंचने के लिए सरकार के पास संसाधन नहीं है। तो क्या वह गरीब मतदाता जो अपने जीविका के लिए जूझ रहा है इतनी दूर पहुंच कर अपने मतों का इस्तेमाल कर सकेगा? क्या लोगों को इस ‘लोकतंत्र’ में कोई जगह है? लोगों को इस तंत्र से दूर भगाने में सरकार की सभी मशीनरी शामिल है।
जनता हाशिये पर
संगीनों के साए में प्रचार हुआ और संगीनों के साए में मतदान भी हो गया। सड़कों पर चलना दूभर है जगह-जगह नाकाबंदी व चेकिंग की जा रही है। सड़कों से छोटे और बड़े वाहन भी गायब हैं सभी वाहनों को जब्त कर चुनाव कार्यों में लगा दिया गया है। जो भी गाडि़यां जब्त है उनके ड्राइवर एक तरह से बंधक बने हुए हैं। वे अपने वाहन मालिकों, घरों पर फोन से सम्पर्क नहीं कर सकते उनके पास खाने, रहने को कुछ नहीं है वे अपने गाडि़यों में ही बीस दिनों से सो रहे हैं। ड्राइवरों का कहना है कि उन्हें सीधे सड़क से पकड़ लिया गया। मालिक से मिलने का मौका ही नहीं मिला। यहां न एटीएम है न ही मोबईल का नेटवर्क और न ही यहां आया जा सकता है। प्रशासनिक अधिकारियों से खर्च मांगने पर कहते हैं कि वाहन मालिक से पैसा मांगों। मालिक भी पैसा भिजवाए तो कैसे, इस बिहड़ में पैसे लेकर कौन आएगा? ये ड्राइवर अपनी घडि़यांे तथा स्टेपनी (एक्सट्रा टायर) को बेच कर अपने खाने का जुगाड़ कर रहे हैं। इस बात को छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त ट्रांसपोर्ट कमिश्नर डी रविशंकर भी मान रहे हैं कि उनके विभाग के पास इस तरह की शिकायतें मिल रही है। उन्होंने कहा कि ‘‘हमने यह साफ निर्देश दिए हैं कि जिले के स्तर पर कलक्टर और एसपी इन ड्राइवरों के खाने-रहने और सुरक्षा की व्यवस्था करें। मगर इसके बावजूद हमें शिकायतें मिल रही है। हमने फिर प्रशासनिक अधिकारियों को लिखा है।’’
चुनावी मुद्दे
किसी भी संसदीय राजनीतिक पार्टियों के पास जनता का कोई मुद्दा नहीं रह गया है। जनता के जीविका के संसाधन जल-जंगल-जमीन की लूट, आपरेशन ग्रिन हंट, माओवादी बताकर फर्जी इनकांउटर व जेलों में बंद हजारों आदिवासियों को बंद रखना, महिलाओं के साथ जवानों द्वारा बलात्कार किसी भी पार्टी का चुनावी मुद्दा नहीं रहा है। खासकर दो राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां जो लोगों को बरगलाने के सिवा और कुछ नहीं कर रही हैं। जहां छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने दर्भा घटना में मारे गये कांग्रेसी नेताओं को भुनाने की कोशिश की वहीं भाजपा के पास केन्द्र में कांग्रेस सरकार को कोसने के अलावा और कुछ नहीं बचा है। जिस सलवा जुडूम में दोनों पार्टियों की सहभागिता रही है और करीब 650 गांवों के करीब दो लाख आदिवासियों को उजाड़ दिया गया वह किसी भी पार्टी के लिए चुनावी मुद्दा ही नही बन पाया। वह आदिवासी कहां गये किस हालत में है उस पर आज तक न तो छत्तीसगढ़ सरकार, केन्द्र सरकार और न ही किसी संसदीय राजनीतिक पार्टियों द्वारा खबर ली गई।
आंध्र प्रदेश के खम्म जिले में छत्तीसगढ़ से पलायन कर के आए मुरिया और माडि़या आदिवासियों की दो सौ से ज्यादा बस्तियां हैं। उनके प्रधान पदम पेंटा कहते हैं कि जब वे लोग सुकमा के सुदूर इलाकों में रहा करते थे तो वहां कभी कोई सरकारी अधिकारी या नेता उनका हाल-चाल पूछने उनके गांव नहीं आया और न ही यहां कभी कोई अधिकारी, मंत्री या नेता आये। वे कहते हैं कि वहां भी हमारा कोई नहीं था यहां भी हमारा कोई नहीं है। वह बताते हैं कि इस इलाके में पलायन करके आये लोगों की संख्या एक लाख से ज्यादा हो सकता है क्योंकि कोई सर्वे अभी तक नहीं हुआ है। गांव के बुर्जुगों का कहना है कि उनके बच्चों की शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने बच्चों को पढ़ाने के लिए पहल की तो आंध्र प्रदेश सरकार के फरमान से वह काम बंद  हो गया।

क्या इस तरह के  संगीनों के साये में ‘लोकतंत्र’ के महापर्व को मना कर हम लोगों को जोड़ पायेंगे या ‘लोक’ को गायब कर तंत्र की ही रक्षा करते रहेंगे? मतदान के प्रतिशत बढ़ने का कारण कुछ भी हो उससे क्या आम लोगों को लाभ मिलेगा? क्या स्कूल से वंचित बच्चों के शिक्षा पूरी हो पायेगी? क्या उन ट्रक चालकों को न्याय मिल पायेगा जो बीस दिन से भूखे-प्यासे सरकार की ड्यूटी बजा रहे हैं, क्या कोई न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग इनकी खोज-खबर करेगी?
 -सुनील कुमार

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

चमचमाती दिल्ली का सच



गांवों की लगातार उपेक्षा के कारण रोजगार के जो भी अवसर थे खत्म होते जा रहे हैं। खेती  की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। किसानों की जमीन विभिन्न योजनाओं की तहत छीना जा रहा है। शासक वर्गों
द्वारा यह सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा है जिससे शहरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। पी चिदम्बरम जैसे लोग चाहते हैं कि भारत क जनसंख्या का 80 प्रतिशत हिस्सा शहरों में आ जाये (गांव
की उपजाऊ जमीन पूंजीपतियों के हो जायें)। जब गांव का किसान उजड़कर बेहतर जिन्दगी की तलाश में
शहर को आता है तो शहर में आकर वह अपने को ठगा सा पाता है और उसके जीवन में कोई बदलाव नहीं आता है। अगर उसके जीवन में कुछ बदलाव आता है तो यह कि जहां वो गांव के खुली स्वच्छ चमचमाती        दिल्ली की असलियत हवा में सांस लेते थे शहरों में आकर कबूतरखाने जैसे दरबे में
बदहाल जिन्दगी जीने को मजबूर होते हैं। गांव वापस टीबी, जोंडीस (पीलिया), चर्मरोग जैसी बीमारियों को लेकर जाते हैं और असमय काल के मुंह में समा जाते हैं। शहरों में इनका निवास स्थान झुग्गी-झोपड़ी या
फूट-पाथ होता है। इन स्थानों पर रहने वाले लोगों को अपमानजनक जिन्दगी जीने को मजबूर होते हैं उनको चोर, पाॅकेटमार, बलात्कारी, मूर्ख इत्यादि की उपाधि दी जाती है।                                                        2011 की जनगणना के अनुसार दिल्ली की जनसंख्या 16,753,235 है। दिल्ली की 25 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गियों में रहती है जो कि दिल्ली के क्षेत्रफल का मात्र आधे प्रतिशत ():) में स्थित हैं। दिल्ली शहर 1,48,400 हेक्टेअर क्षेत्र में फैला हुआ है। दिल्ली शहरी विकास बोर्ड के अनुसार दिल्ली में 700 हेक्टेअर जमीन पर 685 बस्तियां बनी हुई हैं। इन 685 बस्तियों में 4,18,282 झुग्गियां
हैं। सरकारी आंकड़े के अनुसार भारत में झुग्गी-झोपडि़यों में रहने वालों की ज न स ं ख् य ा 4,25,78,150 है
जिसमें दिल्ली में झुग्गी-बस्तियों की जनसंख्या 20,29,755 (सही आंकड़े 40 लाख से अधिक है) है।
यूएनडीपी के ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2009 में कहा गया है कि मुम्बई में 54.1 प्रतिशत लोग 6 प्रतिशत जमीन पर रहते हैं। दिल्ली में 18.9 प्रतिशत, कोलकता में 11.72 प्रतिशत तथा चेन्नई में 25.6 प्रतिशत लोग झुग्गियों में रहते हैं।
                                                            अम्बेडकर बस्ती डाॅ. अम्बेडकर कैम्प झिलमिल इंडस्ट्रीयल दिल्ली के अम्बेडकर बस्ती जैसी अन्य बस्तियां; इन बस्तियों मे रहने वालों ने शहर को बनाया है और उन्हीं के बदौलत ये साफ-सफाई के काम, कल-कारखानें, मोटर-गाडि़यां चलते हैं। जब इनके द्वारा एक हिस्से का विकास हो जाता है तो इनको उठा कर नरेला, बावना और भलस्वा जैसे कुड़ेदान में फेंक दिया जाता है कि अब
वहां का कूड़ा साफ करो। मानो इनकी नियति ही यही है कि कूड़े की जगह को साफ-सुथरा करो फिर दूसरी जगह जाओ, जैसा कि भलस्वा में पुर्नवास बस्तियों को मात्र 10 साल का ही पट्टा दिया गया है और बी ब्लाॅक के बीच में बसा हुआ है। सरकारी आंकड़ों में इस बस्ती में 850 झुग्गियां हैं और यह 8175 वर्ग मीटर में बसा हुआ है, यानी एक झुग्गी 10 वर्ग मीटर से भी कम जगह में। यह कैम्प सन् 1975 में बसा था लेकिन इस बस्ती का व पटना के रहने वाले सहाजानन्द यादव (55 वर्ष) काॅपर की फैक्टीª में काम करते हैं। उनकी 6 ग् 6 फीट की झुग्गी है जिसकी उंचाई 7-8 फीट है। उनके कमरे में के एक कोने में 5 लीटर गैस का चुल्हा और दो-चार बर्तन है। गर्मी से राहत पाने के लिए एक छोटा सा पंखा है और मनोरंजन का कोई साधन नहीं। उनके घर में 3 ग् 6 फीट की एक तख्त (चैकी) रखा हुआ है जो कई जगह जला हुआ है। तख्त जलने के कारण पूछने पर बताये कि पहले यहां गड्ढा होता था और बारिश होने पर पानी झुग्गियों के अन्दर आ जाता था तो लोग तख्त पर रख कर खाना बनाते थे खाना बनाते समय उनकी तख्त जल गई है।
उन्होंने बताया कि शुरू में चटाई से घेर कर झुग्गियां बनाये थे।
 
जब वो ईंट की झुग्गी बनाने लगे तो एक सिपाही आकर पैसा मांगने लगा। सिपाही को पैसे का झूठाआश्वासन देकर उन्होंने अपनी झुग्गी बना ली। धीरे-धीरे मिट्टी भर कर जगह को ऊंचा किया और अब पानी नहीं लगता है। उन्होंने बताया कि 1975 में नेपाली मूल के लोगों द्वारा सबसे पहले झुग्गी डाला गया और उनकी
झुग्गी 1990 से वहां पर है। संजित कुमार (32 वर्ष) बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले हैं। वे दस वर्ष से अम्बेडकर बस्ती में रहते हैं। पहले वे काॅपर की फैक्ट्री में काम करते थे, अब वे बस्ती में ही दुकान चलाते हैं।
दुकान तो उनकी अपनी झुग्गी में है और रहने के लिए दूसरी झुग्गी किराये पर ले रखी है। 10 वर्ष में
कई बार राशन काॅर्ड बनवाने की कोशिश की लेकिन दिल्ली सरकार ने आज तक उनका राशन काॅर्ड नहीं बनाया। जबकि उनके पास मतदान पहचान पत्र हैं और वे वोट भी डालते हैं।
                                                            शौचालय के लिए ज्यादातर लोग बाहर रेलवे पटरी पर जाते हैं।
बस्ती में एक शौचालय है जिसमें 2 रु. देकर शौच के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
भोला प्रसाद (42 वर्ष) बिहार के जहानाबाद के रहने वाले हैं। 1992 में इन्होंने झुग्गी खरीदी थी। इनकी भी झुग्गी 6 ग् 7 फीट की है। अभी इन्होंने अपनी झुग्गी के उपर एक और झुग्गी बना ली है जिसमें दोनों भाई रहते
हैं। इनका परिवार गांव पर रहकर मजदूरी करता है। भोला काॅपर फैक्ट्री में काम करते हैं जहां पर इनकी मजदूरी 6000 रु. मासिक है। शौचालय के लिए बाहर रेलवे लाईन पर जाते हैं। घर में कोई मनोरंजन के साधन नहीं है। पानी के लिए दो बाल्टी हैं जिन्हें कि सुबह ही भर कर रख देते हैं ताकि रात में आने के बाद खाना बना
सकें और पानी पी सकें। अधिकांश झुग्यिां 6 ग् 6 फीट की हैं लेकिन कुछ बड़ी झुग्गियां 8 ग् 6 फीट की हो सकती है। ज्यादातर घरों में परिवार है। ज्यादातर घरों में ब्लैक एंड ह्वाइट टीवी है और किसी-किसी घर
में कलर टीवी भी होती है। महिलाएं सुबह जल्दी उठ कर शाचै क े लिए बाहर जाती हंै दिन के समय वे शौचालय का इस्तेमाल करती हैं। बाहर शौच की हालत है कि तेज बारिश होने से ही उसकी सफाई होती
है, नहीं तो शौच के ऊपर बैठ कर ही शौच करना पड़ता है।
                                                                बस्तियों में रोजमर्रा के कामों में शौचालय जाना और पानी भरना
एक बड़ी समस्या है। महिलाओं को अंधेरे में इसलिए जागना पड़ता है कि वो पुरुषों के जागने से पहले शौचालय से लौट कर आ जायें। उसके बाद पानी की समस्या आती है। अगर किसी दिन पानी नहीं आये तो नहाना नहीं हो पाता है। ज्यादातर पुरुष काॅपर की फैक्ट्रियों में काम करते हैं। वहीं कुछ महिलाएं फैक्ट्रियों
में जाती हैं। ज्यादातर महिलाएं घर पर ही पीन लगाने, स्टीकर लगाने जैसे काम करती हैं जो पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी 40-50 रु. ही कमा पाती हैं।
बस्ती से कुछ लड़कियां स्कूल-काॅलेज जाती हैं तो कुछ परिवार के कामों में हांथ बंटाती हैं। बस्ती की जिन्दगी सुबह 4-5 शुरू होती है और रात के 12-1 बजे तक चलती रहती है।
दिल्ली के बस्तियों (झुग्गियों)में आधे प्रतिशत जमीन पर 25प्रतिशत जनसंख्या निवास करती हैं। अगर अनाधिकृत कालोनियों (कच्ची कालोनियो) को मिला दिया जाये तो जनसंख्या करीब 65 प्रतिशत
पहुंचती है। दिल्ली नगर निगम द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिये गये हलफनामे के अनुसार 49 प्रतिशत लोग अनाधिकृत कालोनियों व बस्तियों में रहते हैं जबकि 25 प्रतिशत लोग ही योजनाबद्ध तरीके से बसाये
कालोनियों में रहते हैं।
                                      मुम्बई का धारावी हो, कोलकता का नोनाडांगा या दिल्ली के अम्बेडकर बस्ती जैसी
अन्य बस्तियां; इन बस्तियों मे रहने वालों ने शहर को बनाया है और उन्हीं के बदौलत ये साफ-सफाई के काम,
कल-कारखानें, मोटर-गाडि़यां चलते हैं। जब इनके द्वारा एक हिस्से का विकास हो जाता है तो इनको उठा कर नरेला, बावना और भलस्वा जैसे कुड़ेदान में फेंक दिया जाता है कि अब वहां का कूड़ा साफ करो। मानो इनकी नियति ही यही है कि कूड़े की जगह को साफ-सुथरा करो फिर दूसरी जगह जाओ, जैसा कि भलस्वा में पुर्नवास
बस्तियों को मात्र 10 साल का ही पट्टा दिया गया है। इन इलाकों में इनको पीने के लिए पानी, बच्चों के लिए स्कूल तथा कोई रोजगार तक नहीं है। इनको रोजगार के लिए अपने पुराने क्षेत्र में ही जाना पड़ता है जहां
पर इनको आने-जाने में ही 4 घंटे का समय लगता है और इनकी मजदूरी का आधा पैसा किराये में चला जाता है। जब ये घर में ताला लगाकर चले जाते हैं तो इनके घरों के बर्तन तक ‘चोर’ उठा ले जाते हैं।
बाल श्रम मुक्त दिल्ली का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार बाल श्रम करने के लिए मजबूर कर रही है। पुनर्वास बस्तियों के बच्चे कबाड़ चुनने, मंडी, चाय की दुकान, फैक्ट्रियों में काम करते हुए मिल जायेंगे- आप चाहें तो
आजादपुर, जहांगीरपुरी जैसे क्षेत्रों में जाकर देख सकते हैं। इनकी बस्तियों के ऊपर कभी भी बुलडोजर चला दिया जाता है। चाहे बच्चों की परीक्षा हो, बारिश हो या कड़कड़ाती ठंड, इनको उठा कर फेंक दिया जाता
है जैसे कि इनके शरीर में हाड़-मांस न हो। इन बस्तियों को तोड़कर अक्षरधाम मंदिर, शापिंग काम्प्लेक्स बनाये जा रहे हैं। जिन लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाया जाता है उनसे बहुत कम लोगों (शासक वर्ग
की जरूरत के हिसाब से) को ही पुनर्वास की सुविधा मुहैय्या कराई जाती है। जिन लोगों को पुनर्वासित किया भी जाता है तो कम जमीन का रोना रो कर 12 गज का प्लाट (इससे बड़ा तो ‘लोकतंत्र के चलाने वालों का
बाथरूम होता है) दिया जाता है, जबकि मास्टर प्लान 2021 में कहा गया है कि 40-45 प्रतिशत जमीन पर रिहाईशी आवास होंगे। अगर इन 25 प्रतिशत अबादी को 2 प्रतिशत भी जमीन दे दिया जाये तो ये कबूतरखाने से बाहर आकर थोड़ा खुश हो सकते हैं।
                                                                         इतनी बड़ी आबादी को आधे  प्रतिशत जमीन पर रहना भी
शासक वर्ग को नागवार गुजरता है। उनकी अनुचित कार्रवाई का जनपक्षीय संगठनों द्वारा जब विरोध किया जाता है तो दिल्ली हाईकोर्ट अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहता है- ‘‘इनको प्लाॅट देना जेबकतरों को ईनाम देना जैसा है।’’ कुछ तथाकथित सभ्य समाज के लोग कहते हैं कि इन बस्ती वालों के पास फ्रीज, कूलर, टीवी, अलमारियां हैं- जैसा की बस्ती में रहने वाले इन्सान नहीं हैं; उनको इन सब वस्तुओं की जरूरत नहीं
है। बस्ती में इस्तेमाल की जाने वाली ज्यादातर वस्तुएं सेकेण्ड हैंड (पुरानी) होती हैं। पुरानी वस्तुओं का इस्तेमाल कर ये लोग पर्यावरण को ही बचाते हैं। अगर आधे प्रतिशत जमीन का इस्तेमाल करने वाले पाॅकेटमार है तो कई एकड़ में फैले फार्म हाउस के मालिक क्या हैं? क्या दिल्ली हाई कोर्ट को उनके लिए भी कोई उपनाम है? जिस बस्ती में दो पीढि़यां समय गुजार चुकीं बस्ती में ही बच्चे पैदा हुए, पले-बढ़े और
उनकी शादी तक हो रही है तो क्या हम उनको वहां का निवासी नहीं मानते? कागज के टुकड़े (नोट) जिसके पास हैं चाहे वे विदेशी भी हों तो उनके लिए यह देश है! जिस विकास को लेकर रात-दिन सरकार
चिल्लाती है, जिसे सरकारी भाषा में जीडीपी कहते हैं वह मुख्यतः इन्हीं मेहनतकश जनता के बल पर होता है। इनके परिवार का एक सदस्य गांव में खेती-मजदूरी करता है तो दूसरा शहर में आकर मजदूरी का काम करता है। जब देश की आधी आबादी दो जून की रोटी की मोहताज है तो यह कैसा विकास है? मेहनतकश जनता, जो हमें रोटी से लेकर हर सुविधायें देती है, को हम इन्सान कब समझेंगे? क्या उनको सम्मानपूर्वक, इन्सान की
जिन्दगी जीने को कोई अधिकार नहीं है?
-सुनील कुमार

गुरुवार, 17 मई 2012

मालिक ने गाली देते हुए भागने के लिए कहा

15 मई, 2012 को ओखला औद्योगिक क्षेत्र के फेस 1 की फैक्ट्री नं़ 274 (फैक्ट्री के गेट पर नं़ के अलावा फैक्ट्री के नाम तक नहीं लिखा है) में शाम लगभग 4 बजे आग लगी। मजदूरों ने बताया कि उस वक्त फैक्ट्री में लगभग 100 मजदर कार्यरत थे। इस फैक्ट्री में मेंहदी (हेयर डाई) बनाने का काम होता है जिसमें ज्वलनशील केमिकल का प्रयोग होता है। इस फैक्ट्री में दो बार पहले भी आग लग चुकी है। आग फैक्ट्री के तीसरे माले पर लगी जिस पर मशीनें लगी हुई हैं ज्वलनशील पदार्थ होने के कारण आग तुरंत ही फैक्ट्री के अन्य भागों में फैल गयी। करीब 1516 अग्निशमन गाड़ियों ने दोाई घंटे की मेहनत के बाद आग पर काबू पायी। आग बुझने के बाद तीन मजदूरों को जली हुई अवस्था में बाहर निकाला गया। पुलिस ने इनको पहले होली फेमली निजी हस्पताल में लेकर गई। लेकिन यह पुलिससिया मामला होने के कारण होली फेमली हस्पताल ने उन्हें इलाज (ाई से तीन घंटे तक उनको कोई भी प्राथमिक उपचार नहीं मिल पाया) करने से मना करा दिया। उसके बाद पुलिस उन्हें सफदरजंग हस्पताल में भर्ती कराया जहां पर उन्हें आईसीयू में रखा गया।
इलाज के दौरान मान सिंह पुत्र राम प्रकाश उम्र लगभग 22 वर्ष की मॢत्यु हो गयी जो कि इस कम्पनी में 6 वर्ष से कार्यरत थे लेकिन उनके पास कम्पनी का किसी तरह की परचिय पत्र, ईएसआई कॉर्ड तक नहीं थे। मान सिंह की मां जो कि नेत्रहीन हैं और उनके गांव के लोग मान सिंह के शव को ले जाने के लिए आये थे जो कि किराये के मकान में तेहखण्ड में रहते थे। दिपू कुमार पुत्र राम चन्द्र उम्र लगभग 19 वर्ष जो कि गोरखपुर से हैं और अपनी मां और भाई के साथ संगम बिहार में रहते हैं और इस कम्पनी में लगभग 5 वर्ष से कार्यरत थे उनकी हालत बहुत ही नाजुक बनी हुई है और सफदरजंग हस्पताल के आईसीयू वार्ड नं़ 22, कमरा नं़ 8 में जिन्दगी और मौत से जूझ रहे हैं। उनकी मां, बहन, भई, जीजा और आसपड़ोस के लोग वार्ड के बाहर जमे हुए हैं उनकी बहन जो कि अपने दो छोटे बच्चों जिनकी उम्र करीब 6 महीना और दो साल होगी उनको वार्ड के बाहर इस लू भरी गर्मी में नीचे जमीन पर ही लेटा रखी हैं। दिलीप कुमार पुत्र सहदेव महतो, उम्र 38 वर्ष जो कि अपने भाई के साथ जे़जे़ कैम्प संजय कॉलोनी ओखला में रहते हुए इस कम्पनी में लगभग 5 वर्ष से काम कर रहे हैं वो भी वार्ड नं 22 के कमरा नं़ 10 में अपनी जिन्दगी से जूझ रहे हैं।
अस्पताल में जब कोई भी इस परिवार से मिलने जा रहे हैं तो तुरंत ही मालिक के करिन्दे और मैनेजमेंट चौकना होकर एक दूसरे को फोन करते हुए इकट्ठा हो जाते हैं और इन परिवारों को झूठी दिलसा दे रहे हैं कि सब ठीक हो जायेगा और वे लोग किसी के बहकावे में नहीं आयें। यह तो एक दुर्घटना थी जिसमें मालिक का कोई दोष नहीं हैं। ये मैनेजमेंट के लोग बाहर से घटना की जानकारी के लिये गये लोगों से उलझ पड़ते हैं और धमकी देते हैं कि जो करना होगा जाओ कर लेना। ब्लड देने के लिए ये मजदूरों को बुला रखे हैं जो खुद ही बहुत कमजोर हैं। मैनेजमेंट द्वारा मॢतक मान सिंह के मां को बहलाफुसला कर मामले को रफादफा कर लिया गया लेकिन किसी भी बात का खुलासा नहीं किया गया कि मॢतक की मां के साथ फैक्ट्री मालिक की क्या बात हुई जब कि मान सिंह कि माता जी दृष्टिहिन हैं। इसी तरह घायल दीपू व दिलीप के परिवार वालों पर दबाव मामले को सुलझाने का दबाव बनाया जा रहा है।
पुलिस अभी तक इस मामले में किसी को भी गिरफ्तार नहीं की है और न ही मॢतक या घायल मजूदरों के परिवार वालों के बताया है कि क्या कानूनी कार्रवाई हो रही है। इसमें से सभी परिवार वाले निरक्षर हैं जिनको किसी भी प्रकार की हक अधिकारों की कोई जानकारी नहीं है। अपुष्ट खबरों के अनुसार ये भी बताया जा रहा है कि अभी तीनचार मजदूर लापाता हैं जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं है। मिडिया के लिये भी यह खबर कोई खबर नहीं रही। यह खबर किसी भी इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मिडीय द्वारा आम जनता तक नहीं पहुंचाया गया और न ही इन परिवारों की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई।
इसमें से किसी भी मजदूर के पास जो कि लगभग 56 वर्ष से काम कर रहे हैं कोई भी पहचान पत्र व ईएसआई कार्ड तक नहीं दिया गया है। पीएफ और बाकी श्रम कानूनों को लागू करना तो दूर की बात है। इतने बड़े हादसे के बाद भी कोई श्रम अधिकारी इन परिवार वालों से नहीं मिला। इतने लम्बे समय से काम करने के बावजदू इन मजदूरों को चार से पांच हजार रुपये प्रतिमाह ही मिलता था जो कि दिल्ली सरकार के न्यूनतम वेतन से बहूत ही कम है। इस फैक्ट्री में दो बार पहले आग लग चुकने के बाद भी किसी आग लगने पर किसी तरह के बचाव के उपाय नहीं किये गये थे।
फैक्ट्री नं़ 278 के मजदूर ने बताया कि जब वह टी लंच में बाहर निकला था तो फैक्ट्री नं़ 274 से धुंआ निकलते देखा वह तुरंत 274 के पास दौर कर गया और फैक्ट्री के शिशे को तोड़ने के लिए बोला जिससे कि धुआं निकलता रहे लेकिन फैक्ट्री नं़ 274 के मालिक ने गाली देते हुए भागने के लिए कहा।
-सुनील कुमार
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