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मंगलवार, 30 अगस्त 2016

उत्तर प्रदेश अलग नही है



जैसे फसलों का मौसम होता है.खरीफ, रबी। वैसे ही ट्रांसफरों का भी मौसम होता है। ट्रांसफरों के मौसम की विशेषता यह है कि इस मौसम में कुछ भी बोना नहीं पड़ता, सिर्फ काटना पड़ता है। उसी प्रकार जैसे अनेक प्रकार के उद्योग होते हैं जैसे कुटीर उद्योग, लघु उद्योग आदिए इसी तरह ट्रांसफर उद्योग है। अन्य उद्योगों की तरह ट्रांसफर उद्योग में किसी भी प्रकार की नगद पूंजी नहीं लगाना पड़ती।
कुछ वर्ष पहले तक ट्रांसफर के मौसम का समय तय था परंतु अब ऐसा नहीं है। अब ट्रांसफर का मौसम कभी भी हो सकता है। पहले साधारणतः ट्रांसफर का मौसम परीक्षाएं शुरू होने से प्रारंभ हो जाता था और नए शिक्षासत्र के प्रारंभ होने के पूर्व समाप्त हो जाता था। बताया जाता है कि अंग्रेज़ों के राज में संबंधित अधिकारी से पूछा जाता था कि वे किस स्थान पर नई पोस्टिंग चाहेंगे। उससे तीन.चार स्थानों की सूची मांगी जाती थी। इस समय मौसम का चक्र बदल रहा है वैसे ही ट्रांसफर का मौसम भी बदल रहा है। जैसे अभी हाल में हुए ट्रांसफरों को लें। इन ट्रांसफरों के आदेश ऐसे समय पर हुए जब पूरे प्रदेश में इतिहास की सबसे लंबी और भारी बरसात हो रही है। उस दरम्यान अनेक उच्चाधिकारियों के ट्रांसफर हुए। जिनके ट्रांसफर हुए हैं उनमें कलेक्टर रैंक के अधिकारी भी शामिल हैं।
कलेक्टरों को सर्वशक्तिमान माना जाता है। परंतु सर्वशक्तिमानों की भी समस्याएं होती हैं। जैसे उनके बच्चे होते हैं और बच्चे किसी न किसी स्कूल में पढ़ते होंगे। आजकल अच्छे स्कूलों में प्रवेश पाना मुश्किल होता है। हां कलेक्टरों को तो दिक्कत नहीं होती होगी। जिले में किसकी हिम्मत हो सकती है कि वह कलेक्टर को 'नो' कह सके। परंतु उनके बच्चों को किताबें तो मुफ्त नहीं मिलतीं। आजकल स्कूलों की किताबें भी हजारों रूपए में मिलती हैं। अब किसी जिले के कलेक्टर का ट्रांसफर दूसरे स्थान में होता है तो उसे अपने बच्चे को नए स्थान में प्रवेश दिलाना होगा। हो सकता है कि अधिकारी यह तय करे कि 'मैं अकेले जाकर ज्वाइन कर लेता हूं पत्नी,बच्चे उसी शहर में रहेंगे जहां अभी उनकी पोस्टिंग है।' यदि बच्चे बड़े हैं और कालेज में पढ़ते हैं तो मुसीबत दुगनी हो जाती है। हो सकता है उनके बच्चे ने ऐसा विषय लिया हो जो पदस्थापना के नए शहर में पढ़ाया ही न जाता हो। ऐसे हालात में उस बड़े बच्चे को होस्टल में रखना होगा या मां के साथ उसे पूर्व पदस्थापना के स्थान पर छोड़ना होगा।
ऐसी स्थिति में उसे दो घर बसाने होंगे। दो घर बसाने मे खर्च भी बढ़ जाएगा। इस मंहगाई के ज़माने में दो घर बसाना कितना कठिन है। फिर नए स्थान पर कलेक्टर को या अन्य विभाग के उच्च अधिकारी को अकेले रहना होगा। इस दरम्यान उसे घर का खाना भी नहीं मिलेगा। पदस्थापना की नई जगह में शायद उसे सरकारी आवास न भी न मिले। क्योंकि वहां के कलेक्टर के बंगले में पूर्व में रह रहे कलेक्टर का परिवार रह रहा होगा। फिर कलेक्टर की जि़म्मेदारी ऐसी होती है कि वह प्रायः तनाव की स्थिति में रहता है। इस तनाव की स्थिति से वह उस समय मुक्त हो जाता है जब वह अपने घर जाता हैए जहां परिवार के सदस्य उसे प्रसन्न करने और तनाव से मुक्त करने का हर संभव प्रयास करते हैं। अपने बच्चे की मुस्कुराहट से जो राहत मिलती है वह अद्भुत होती है। परिवार से अलग हो जाने के कारण उसे इस तरह की मुस्कुराहट से वंचित रहना पड़ता है।
वैसे ट्रांसफरांे से सभी प्रकार के सरकारी सेवक प्रभावित होते हैं परंतु यहां मैं बार.बार कलेक्टर का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि जिलों का और अप्रत्यक्ष रूप से पूरे देश का प्रशासन उसके ऊपर निर्भर करता है। इसलिए उसे तनाव मुक्त रखना आवश्यक है।
वैसे आदर्श स्थिति यह होगी कि एक निश्चित अवधि के लिएए उच्च अधिकारी जिनमें कलेक्टर और 
पुलिस अधीक्षक शामिल हैं,को एक ही स्थान पर रखा जाए। यह अवधि तीन साल की हो सकती है। यदि ट्रांसफरकी तलवार उसके ऊपर लटकी रहेगी तो वह कैसे प्रतिबद्धता और सुकून से अपना कर्तव्य निर्वहन कर सकेगा। परंतु विभिन्न कारणों से आजकल ट्रांसफर फटाफट होते हैं।
ट्रांसफरों का एक बड़ा आधार सत्ताधारी दल के नेताओं की शिकायत होती है। मुझे स्मरण है कुछ वर्ष पहले आधी रात को एक जिले के कलेक्टर के ट्रांसफर के आदेश हुए थे, क्योंकि किसी मुद्दे को लेकर उसी क्षेत्र के एक प्रभावशाली राजनेता उनसे नाराज़ हो गए थे।
आज़ादी के बाद अनेक वर्षों तक राजनेताओं की सनक के कारण ट्रांसफर नहीं हुए। उस दौरान कलेक्टरों की पोस्टिंग का आधार किसी जिले के संभालने में उसकी क्षमता के आधार पर होता था और इस बारे में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री का ही होता था। पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र,श्री पी.सी. सेठी, श्री वीरेन्द्र कुमार सकलेचा और श्री सुंदरलाल पटवा ऐसे मुख्यमंत्रियों में से थे जो उच्चाधिकारियों की पदस्थापना प्रशासन के हित को देखकर ही करते थे। मुझे याद है कि एक जिले के कांग्रेसी नेता पंडित मिश्र से एक अधिकारी का ट्रांसफर करवाने के लिए मिले। मिश्र जी ने नेता जी से पूछा कि आप उसका ट्रांसफर क्यों करवाना चाहते हैं? इस पर नेता जी ने कहा कि इस अधिकारी के रहते मैं चुनाव नहीं जीत पाउंगा। चुनाव नज़दीक थे। नेता जी की बात सुनने के बाद पंडित मिश्र ने कहा कि उस स्थिति में आपके क्षेत्र की टिकट किसी और को दे दूंगा। मिश्र जी की राय थी कि जो अफसरों के सहारे चुनाव जीतने की सोचता है उसे चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।
परंतु अब परिस्थितियां बदल गई हैं। अब तो चुनाव की रणनीति बनाते समय इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि किस अधिकारी को पदस्थ करने से चुनाव जीतने की संभावना बढ़ेगी।
इस तरह एक प्रकार से नेताओं का वर्गीकरण कर लिया गया है। अब बहुसंख्यक अधिकारियों का परिचय उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता से होता है। अब प्रायः किसी अधिकारी का परिचय यह कहते हुए दिया जाता है कि वह कांग्रेसी अधिकारी है या वह भाजपाई अधिकारी है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारे संविधान निर्माताओं ने एक तटस्थ ब्यूरोक्रेसी की कल्पना की थी न कि राजनीतिक दलों से प्रतिबद्धता दिखाने वाली। राजनीतिक प्रतिबद्धता के साथ.साथ पैसे के लेनदेन की भी ट्रांसफरों में विशेष भूमिका हो गई है। अब राजनीतिक महफिलों में खुलेआम यह सुनने को मिलता है कि उस अधिकारी ने इतनी रकम देकर विशेष स्थान पर अपनी पदस्थापना करवाई है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे हमारी संसदीय लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को गंभीर खतरा है।

-एल.एस. हरदेनिया

शुक्रवार, 24 जून 2016

पुलिस महानिदेशक फेल

बाराबंकी जनपद में एबीपी न्यूज़ के जिला संवाददाता सतीश कश्यप की पिटाई कोतवाली नगर में पुलिस वालों ने कर दी. पत्रकार सतीश कश्यप ने कथित अपराधी की लिखित शिकायत जिला प्रशासन से की थी जिसपर कोतवाली पुलिस ने उन्हें बुलाकर पिटाई कर दी. विभिन्न पत्रकार संगठनो के लोग कोतवाली गए, जिला प्रशासन के अधिकारीयों से मिलकर प्रत्यावेदन दिए. जिला पंचायत बाराबंकी के सभागार में एक विशाल एकता बैठक भी की. जिला प्रशासन से फिर मिले. जिला प्रशासन कोई कार्यवाई नहीं करना चाहता है. यह रहस्य और राज है जिसकी परते खुलनी बाकी हैं. पत्रकार दुनिया को न्याय दिलाने का दम भरते हैं लेकिन खुद के मामले में बेदम नजर आ रहे हैं. पुलिस कह रही है कि जांच के बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखी जाएगी जबकि कानून कहता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट तुरंत दर्ज करो फिर उसके बाद विवेचना करने का अधिकार पुलिस को होता है. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक सैयद जावीद अहमद का दावा था कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रथम सूचना रिपोर्ट अवश्य दर्ज की जाएगी.
                      एबीपी न्यूज़ के जिला संवाददाता सतीश कश्यप की पिटाई के मामले में पुलिस महानिदेशक फेल हैं और पत्रकारों को अखिलेश सरकार शायद यह सन्देश देना चाहती है कि हैसियत में रहो हमारे विज्ञापनों से तुम्हारा अखबार चलता है. अगर कोई दरोगा पुलिस हंसी-हंसी में पिटाई कर दे तो उसका बुरा मत मानो और आंसू पोंछ कर फिर समाचार संकलन शुरू कर दो. 
उत्तर प्रदेश की बिगडती हुई कानून व्यवस्था का मुख्य कारण प्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पुलिस व्यवस्था के ऊपर कोई नियंत्रण न होना. अगर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार वापस नहीं आती है तो उसकी साड़ी जिम्मेदारी वर्तमान पुलिस तंत्र की है. कानून और न्याय का राज समाप्त हो गया है जिसकी चाहो प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखो जिसकी चाहो न लिखो. यह बात आये दिन दिखाई देती है किसी का उत्पीडन करना हो तो पुलिस को मिलाकर आप सब कुछ कर सकते हैं. 

सुमन 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पुलिस है या गणवेशधारी

दिल्ली में आरएसएस मुख्यालय के सामने छात्र-छात्रों के प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस ने चापलूसी में जमकर लाठी चार्ज किया इस लाठी चार्ज में पुलिस के साथ-साथ संघी व अराजक तत्व भी छात्र-छात्रों को पीटने में आगे थे.
इस सम्बन्ध में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर मिस्टर बी.एस. बस्सी ने कहा कि छात्र-छात्रों के प्रदर्शन में उकसावेपूर्ण  कार्यवाई के कारण बल प्रयोग करना पड़ा. लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कार्यों के ऊपर लाठी चार्ज या बल प्रयोग करना कानून और संविधान का स्पष्ट उल्लंघन है. छात्र अगर उकसावे पूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे तो क्या बस्सी साहब और उनकी पुलिस लाठी चार्ज व बल प्रयोग संघी गुंडों के साथ करके भारतीय संविधान व कानून व्यवस्था को गंगा स्नान कराकर पवित्र गाय बना रहे थे.  लोकतंत्र में और वर्तमान सरकार में जिम्मेदारीपूर्ण पदों पर बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों का संविधान व कानून के हिसाब से पालन नहीं कर रहे हैं. चापलूसी कर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को खुश करने की जो प्रक्रिया है वह लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक है. उकसावे में आकर क्या पुलिस बल जनता को मार डालेगा. उकसावे में आकर क्या वह संविधान और कानून को छोड़ कर गुंडागर्दी की स्तिथि में आ जायेगा. बस्सी साहब का यह बयान निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. रिटायरमेंट के बाद और कुछ पाने की इच्छा और आकांक्षा इस तरह के कार्यों को करने के लिए प्रेरित करती है.   

संघी गुण्डों और संघी पुलिस की एकता का अदभुत नजारा और झूठ के दोनों कारखाने इस एकता को नकार रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने पिछले वर्ष 2015 में 10 निरीक्षकों समेत करीब 490  कर्मियों को निलंबित किया गया और इसके साथ ही भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई, सतर्कता जांच की संख्या में 55 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार निलंबित किए गए अधिकारियों में 90 उप-निरीक्षक, 46 सहायक उप-निरीक्षक, 97 हेड कांस्टेबल और 247 कांस्टेबल शामिल हैं। अगर सावधानीपूर्वक दिल्ली पुलिस के सम्पूर्ण क्रियाकलापों की जांच की जाए तो उसका और भयानक चेहरा सामने आएगा. उकसावेपूर्ण कार्यवाई की बात कहकर बचाव करना कहीं से उचित नहीं है.
संघी अपने को पुलिस के साथ होने पर बहुत बहादुर समझते है. पहले यह ब्रिटिश पुलिस के साथ यही काम करते थे और अब दिल्ली पुलिस के साथ. मुखबिरी इनका मुख्य पेशा रहा है. बटेश्वर इनका मुख्य चेहरा है मुख्य पहचान है.  
 
सुमन 

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

गुजरात पुलिस - देश का गौरव

मोदी ने कहा था कि गुजरात की पुलिस- देश का गौरव है किन्तु उच्चतम न्यायलय द्वारा आतंकी मामलों ने आ रहे निर्णयों से यह साबित हो रहा है कि गुजरात पुलिस पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों को विभिन्न आतंकी घटनाओ में फंसा दिया था . जिसमें कथित आतंकियों को दस दस साल से अधिक समय से कारागार में बिताने पड़े और उनकी छवि खराब हुई , जीवन नष्ट हुआ . 
17 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में, 'दोहरे बम विस्फोटों' सूरत बम विस्फोट में कथित संलिप्तता के लिए अक्टूबर 2008 में एक टाडा अदालत ने दोषी करार दिया और सजा सुनाई थी, उन सभी ग्यारह व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है 1993 के विस्फोटों में सभी अभियुक्त जेल गए थे  उन सभी लोगों को उच्चतम न्यायलय ने बरी कर दिया है.
 कांग्रेस के पूर्व मंत्री मोहम्मद सुरती सहित ग्यारह व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष पाया और बरी कर दिया यहां तक ​​कि  हथियारों की बरामदगी संतोषजनक ढंग से व ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किया . इस तरह की स्थिति में सजा नहीं दी जा सकती है.
 सुप्रीम कोर्ट ने 2002 अक्षरधाम आतंकी मामले में गुजरात पुलिस निर्णय पारित किया है. अक्षरधाम में जांच डीजी वंजारा और जीएल सिंघल के (नकली) मुठभेड़ विशेषज्ञ टीम द्वारा आयोजित किया गया. बरी करते हुए 16 मई 2014, पर सभी छह अक्षरधाम मामले में मौत की सजा सुनाई थी, जो तीन सहित आरोपी, सुप्रीम कोर्ट ने यह अक्षरधाम मामले की जांच का आयोजन किया जिसके साथ अक्षमता के लिए गुजरात पुलिस की खिंचाई की. न्यायमूर्ति ए.के. की बेंच पटनायक और जस्टिस वी गोपाल गौड़ा ने कहा कि 
सही जांच स्तर से पोटा, विशेष न्यायालय (पोटा) और पुष्टि द्वारा आरोपियों को सजा और सजा देने के तहत आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा मंजूरी देने के लिए, विभिन्न चरणों में इस मामले के विचारण में प्रतिकूलता उच्च न्यायालय द्वारा एक ही की.  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबका मौलिक अधिकार है और इस देश के नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों के ऐसे घोर उल्लंघन हमारे सामने प्रस्तुत किया गया. हम हाथ जोड़कर बैठने के लिए पैसा नहीं दे सकते.
राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से जुड़े इस तरह के एक गंभीर प्रकृति के मामले की इसके बजाय इतने सारे कीमती जान लेने के लिए जिम्मेदार वास्तविक अपराधियों को जेल भेजने की जगह पुलिस ने  निर्दोष लोगों को पकड़ लिया और उनको गंभीर आरोपों में निरुद्ध किया और बाद में सजा कराई .
सूरत में बरी किए जाने के मामले विस्फोटों और अक्षरधाम मामलों गुजरात पुलिस वर्षों में फंसाने के लिए निर्दोष लोगों को टाडा और पोटा जैसे तथाकथित 'आतंक कानूनों' के साथ दुर्व्यवहार किया गया है कि कैसे दिखा. कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के 2002 में पोटा के लागू होने का विरोध किया था और भाजपा राजग सरकार पारित कानून लाने के लिए संसद के संयुक्त सत्र आयोजित करने के लिए मजबूर किया गया था का नेतृत्व किया. यह इसके पहले पोटा के रूप में बुरा था, जो टाडा, अधिनियमित किया था यह भी याद रहे कि कांग्रेस टाडा का विरोध किया था, हालांकि सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने इन काले कानून और अलोकतांत्रिक कानून को लागू होने से रोकने के लिए कांग्रेस के प्रयासों की सराहना की थी. "आतंकवाद" "कानून" से नहीं रोका जा सकता है क्योंकि टाडा और पोटा जैसे कठोर कानून भी दुरुपयोग किया जा सकता है! टाडा के दुरुपयोग से हजारों निर्दोष व्यक्तियों, श्रमिकों के हजारों किसानों को जेल जाना पड़ा था और 1989 में भाजपा ने भी टाडा को समाप्त करने के अभियान का नेतृत्व किया था. 
लेकिन सत्ता में आने के बाद,  भाजपा राजग पोटा अधिनियमित और गुजरात में निर्दोष सैकड़ों मुसलमानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया और दो ​​समुदायों विभाजित किया.  झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गरीब आदिवासियों की तरह अन्य राज्यों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया यहाँ तक उनको भी गिरफ्तार किया गया जो सत्तारूढ़ दल का हिस्सा थे जैसे वाइको ,यह इसलिए पोटा का विरोध और लोकतंत्र का लबादा पहनने के लिए कांग्रेस ने अपना रुख बदला 
यह कि टाडा और पोटा दोनों  निरस्त कर दिया गया है  यह की कई निर्दोष लोगों को अभी भी देश भर की जेलों में सड़ना पड़ रहा है. क्यों है.

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

नोट  http://www.truthofgujarat.com/supreme-court-exposes-gujarat-polices-blatant-abuse-terror-laws-like-pota-tada/#more-4848 
का संक्षिप्त अनुवाद गूगल की मदद से किया गया है .

शनिवार, 7 जून 2014

क्या कर सकते हो --------------------

       बूकसूर मुसलमानों को आतंकवाद के मामलों में फर्जी तरीके से फंसाए जाने के आरोप बार बार लगते रहे हैं। नागरिक एंव मानावाधिकार संगठनों ने अपनी जांच रिपोर्टों में कई बार इस तरह के आरोप को पुष्ट करते हुए रिपोर्टों की शकल में अपने दावे भी पेश किए हैं। ऐसे दर्जनों मामले हैं जब अदालतों से इस तरह के संगीन आरोप में पकड़े गए बेगुनाह वर्षों बाद बरी हुए हैं। कई बार अदालत ने पुलिस को ऐसे ही फर्जी मुकदमों में बेगुनाहों को फंसाने के लिए फटकार भी लगाई है। लेकिन शायद पहली बार एक ऐसी घटना जिसमें ३३ लोगों की मौत हुई और ८० से अधिक लोग घायल हुए,के मुकदमें के आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने न केवल बरी किया बल्कि जांच एजेंसियों को फटकार लगाते हुए आरोपियों को स्पष्ट शब्दों में बेगुनाह कहा है। १६ मई, २०१४ को जब १६वीं लोकसभा के मतदान की गिनती चल रही थी और देश की सत्ता में एक बड़े बदलाव के संकेत आने लगे थे तो ठीक उसी समय उच्चतम न्यायालय में जस्टिस एपी पटनायक और जस्टिस वेंकट गोपाल गौड़ा २४ सितम्बर २००२ को अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले पर अपना फैसला सुना रहे थे। यह संयोग ही है कि देश में बदलाव के पीछे जहां गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका थी तो गांधीनगर, गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हमला भी उन्हीं के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था और शासन की सहमति से जांच एजेंसियों द्वारा बेगुनाहों को फंसाने का आरोप भी लगे थे।
  सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले में कहा ʺराष्ट्र की सुरक्षा और अखण्डता से जुड़े इस संगीन मामले में जांच एजेंसियों ने जिस अक्षमता से जांच की है उस पर हम अपनी वेदना प्रकट करते हैं। इतने बहुमूल्य जीवन छीन लेने के ज़िम्मेदार वास्तविक अपराधियों को पकड़ने के बजाए पुलिस ने बेगुनाह लोगों को पकड़ा और उन पर गम्भीर आरोप लगाए जिसके फलस्वरूप उन्हें कैद में रखा गया और फिर सज़ा दी गईʺ। इस फैसले से एक ओर जहां फांसी और अजीवन कारावास की सज़ा पाने वाले चार अभियुक्तों का ११ साल से भी अधिक समय तक जेल में रहने के बाद रिहाई का रास्ता साफ होगया वहीं वह सवाल भी एक बार फिर ताज़ा हो गए जो इन बेकसूरों की गिरफतारी के बाद उठाए गए थे। पलिस एंव जांच एजेंसियों की भूमिका और उनकी राजनीतिक सरपरसती के साथ साथ यह सवाल भी उठना स्वभाविक है कि विशेष पोटा अदालत से लेकर गुजरात हाईकोर्ट तक उन चीज़ों को देखने और महसूस करने में नाकाम क्यों रही जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना यह फैसला सुनाया है।
   घटना यह थी कि २४ सितम्बर २००२ को शाम ४ बजकर ४५ मिनट पर दो आतंकवादियों ने अक्षरधाम परिसर में स्वचालित हथियारों और बमों से हमला कर दिया। हालात को काबू करने के लिए रात साढ़े ग्यारह बजे राषट्रीय सुरक्षा गार्ड के जवानों को लगाया गया। सुबह पौने सात बजे यह आपरेशन समाप्त हुआ जिसे ष्वज्र शक्तिष् का नाम दिया गया था। दोनो आतंकवादियों समेत कुल ३३ लोग मारे गए जिसमें एनएसजी का एक कमांडो और दो पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। दो साल तक कोमा में रहने के बाद कमांडो सुजान सिंह की भी मृत्यु हो गई। कथित तौर पर मारे गए दोनों आतंकवादियों का सम्बन्ध लशकरे तोयबा और जैश मोहम्मद से था। उनमें से एक मुर्तज़ा हफिज़ यासीन पाकिस्तान के लाहौर और दूसरा अशरफ अली फारूक शेख रावलपिंडी के रहवासी थे। अगस्त २००३ में अहमदाबाद के दरियापुर और शाहपुर से आदम भई अजमेरीए अब्दुल कय्यूम मुफ्ती साहबए मुहम्मद सलीम शेखए अब्दुल मियां कादरी और अलताफ हुसैन को  गिरफतार दिखाया गया। बरैली उत्तर प्रदेश निवासी शान मियां उर्फ चांद खां की गिरफतारी सितम्बर २००३ में दिखाई गई। इसके अलावा २८ अन्य फरार आरोपियों में से शौकतुल्लाह ग़ौरी को जूलाई २०१० में गिरफतार किया गया।
   सभी आरोपियों के खिलाफ पोटा की विशेष अदालत में मुकदमा चला और जूलाई २००६ में पोटा अदालत ने आदम अजमेरीए शान मियां उर्फ चांद खां और अब्दुल कय्यूम मुफ्ती को मृत्यु दण्डए मुहम्मद सलीम को अजीवन कारावास और अब्दुल मियां कादरी एंव अलताफ हुसैन को क्रमशः १० और ५ वर्ष कैद की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने गुजरात हाई कोर्ट के अपील दायर की। गुजरात हाईकोर्ट ने भी मई २०१० में अपने फैसले में पोटा अदालत द्वारा दी गई सजाओं को बरकरार रखा। अन्त में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और देश की शीर्ष अदालत ने पोटा अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया और सभी आरोपियों को स्पष्ट शब्दों में बेकसूर मानते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया।
   अक्षरधाम आतंकी हमले की जांच की कहानी जासूसी उपन्यास की तरह चलती हुई दिखाई देती है। दो हथियार बंद आतंकी अचानक अक्षरधाम मंदिर परिसर के बाहर बमों और स्वचालित हथियारों से हमला करते हैं। मंदिर के सभी गेट बंद कर दिए जाते हैं। आतंकी पिछले गेट से मंदिर परिसर में प्रवेश करने में सफल हो जाते हैं। स्थानीय पुलिस उनसे निपटने में नाकाम  रहती है। एनएसजी के ब्लैक कैट कमांडो मोर्चा संभालते हैं और अन्त में दोनों आतंकी उनकी गोलियों से छलनी हो जाते हैं। फिर खून में डूबे हुए दोनो आतंकियों की पैन्ट की जेब से एक एक पत्र बरामद होता है जो बिल्कुल बेदाग़ है और उन पत्रों में उनके नाम पते व अन्य जानकारियों के अलावा उनके शरणदाताओं के नाम और पते भी मौजूद हैं। तफतीश की कहानी का एक सिरा इन्हीं पत्रों से शुरू होता है। तफतीश में एक दूसरी चीज़ जो निकल कर आती है वो यह कि एक तीसरा पाकिस्तनी आतंकी लाहौर का निवासी अय्यूब भी उक्त दोनों आतंकियों के साथ हमले से एक सप्ताह पूर्व भारत आया था। तीनों को आदम अजमेरी ने अपने भाई के घर में शरण दी थी और अन्य आरोपियों से मिलवाया था। मंदिर पर हमला मुर्तज़ा और फारूक ने किया था किन्तु हमले से पहले ही आदम अजमेरी के साथ अय्यूब मंदिर के पास बच्चों के पार्क में पहुंच गया था। हमले के बाद भागती हुई भीड़ के साथ आदम अजमेरी और अय्यूब वापस अहमदाबाद आगए और वहां से जैश मोहम्मद के आकाओं को हमले की कामयाबी की फोन द्वारा सूचना भी दी और उन्हीं की सलाह पर अय्यूब को बड़ोदरा पहुंचाया गया जहां से वह पाकिस्तान चला गया। अगर इस कहानी को सच मान लिया जाए तो यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब २४ सितम्बर को हमले के दिन ही पत्र बरामद हो गया था और यह भी पता चल गया था कि हमले की सफलता की सूचना पाक में बैठे आकाओं को फोन द्वारा अहमदाबाद से दी गई है तो आरोपियों तक पहंचने में ११ महीने का समय क्यों लगा बावजूद इसके कि आरोपी अहमदाबाद में ही मौजूद थेॽ उससे बड़ा सवाल यह कि दोनों मृत आतंकियों की गोलियों से छलनी और खून से लतपत लाश से बरामद की गई चिट्ठियों पर खून का धब्बा तक नहीं था और न ही मुड़े होने का कोई निशान थाए ऐसा कैसे हुआॽ कहानी के इस हिस्से के चार बड़े किरदार थे डीसीपी वंजाराए एसीपी सिंघलए पीआई वानर और पीआई पटेल।
   कहानी का दूसरा पक्ष वह है जो आरोपियों ने बयान किए हैं। ९ अक्तूबर २००३ को पोटा अदालत के जज को लिखे गए एक पत्र में पेशे से रिक्शा चालक आदम अजमेरी ने बताया कि ९ अगस्त २००३ को दोपहर में क्राइम ब्रांच अहमदाबाद के ५दृ६ अहलकार उसके घर पहुंचे और कहा कि जो रिक्शा तुम चलाते हो वह चोरी का है। इस तरह उसे क्राइम ब्रांच आफिस ले जाया गया। वहां उसे यातना देकर अक्षरधाम मंदिर हमले का आरोप स्वीकार करने पर मजबूर किया गया। अपराध स्वीकार करने सम्बन्धी तहरीर रटवाई गई और कैमरे के सामने बुलवाकर उसे रिकार्ड किया गया। २९ सितम्बर को उसकी पत्नी को उसके पास लाया गया और सरकारी काग़ज़ात पर उसके और उसकी पत्नी के हस्ताक्षर लेने के बाद ३० सितम्बर को उसे अक्षरधाम मंदिर घटना के आरोपी के तौर पर अदालत में पेश करके रिमांड हासिल की गई। ४ सितम्बर को सिंघल साहब के कहने पर अपनी राइटिंग में उससे कुछ लिखवाया गया। ५ सितम्बर को उसे श्रीनगरए कश्मीर लेजाया गया और एक व्यक्ति का फोटो दिखाकर पहचान करने के लिए कहा गया परन्तु उसने उसे कभी देखा नहीं था इसलिए क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के आदेश के विरुद्ध सच्ची बात कह दी जिसके लिए बाद में उसे बुरी तरह पीटा गया। ९ सितम्बर को उसे अहमदाबाद लाया गया जहां २६ सितम्बर को पोटा अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि आदम अजमेरी १९९८ आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर में चुनाव लड़ चुका था। उसके बाद वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया। गोधरा कांड के बाद कांग्रेस पार्टी द्वारा भेजी गई रिलीफ उसने कांग्रेसी नेताओं के कहने मुसलमान दंगा पीड़ितों के बीच पर बांटी थी। दूसरी बात यह कि उसने वहां विजयी भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हाईकोर्ट में मुकदमा किया था जो सुप्रीमकोर्ट तक गया था।
    इसी प्रकार मुफ्ती अब्दुल कय्यूम का कहना है कि १७ अगस्त २००३ को दरियापुर हाजी सखी मस्जिद से मग़रिब की नमाज़ ;सूर्यास्त के समय की नमाज़द्ध से ठीक पहले क्राइम ब्रांच के ३दृ४ अहलकार उसके पास आए। उन्होंने कहा कि साहब ने एक जांच सिलसिले में अभी बुलाया है तीन चार दिन बाद आप वापस घर आ जाएंगे। वह लोग क्राइम ब्रांच गायकवाड़ हवेली ले गए। आंखों पर पट्टी बांध कर सिंघल साहब ;एसीपीद्ध के सामने पेश किया गया। उन्होनें अचानक पिटाई करना शुरू कर दिया। दूसरे दिन वंजारा साहब ;डीसीपीद्ध के सामने लाया गया तो उन्होंने ५दृ६ डंडे वालों ;पुलिसद्ध से पिटवाया और अक्षरधाम घटना में लिप्त होना स्वीकार करने के लिए कहा। उंगलियों में किलिप लगाकर करेंट लगाया गया और पैर के नाखूनों में पिन चुभाई गई। २९ अगस्त तक यातनाए दी जाती रहीं। फिर उसी दिन उनके पिता को बुलवाया गया और दोनों के कुछ कागज़ात पर हस्ताक्षर लिए गए और उसके बाद ३० अगस्त को अदालत में पेश करके रिमांड पर ले लिया गया। उससे यह भी स्वीकार करने को कहा गया कि आतंकियों की जेब से बरामद चिट्ठी उसी ने लिखी थी। फिर उससे उन चिट्ठियों को पढ़कर अपने हस्तलेख में लिखने के लिए कहा गया और ४०दृ५० चिट्ठियां लिखवाई गयीं। उसके बाद ५ सितम्बर को श्रीनगरए कश्मीर लेजाया गया जहां एक व्यक्ति का फोटो दिखाया गया जिसे उसने पहचानने से इनकार किया तो बाद में उसकी फिर पिटाई की गई। ९ सितम्बर को उसे वापस अहमदाबाद लाया गया और २६ सितम्बर को पोटा अदालत में पेश करके जेल भेज दिया गया।
   श्रीनगर में आदम अजमेरी और मुफ्ती कय्यूम को जिस व्यक्ति की फोटो दिखा कर पहचान करवाई जा रही थी वह कोई और नहीं बल्कि ष्चांद मोटर्सष् के नाम से गैरेज चलाने वाले मिकेनिक शान मियां उर्फ चांद खां थे। बरैलीए उत्तर प्रदेश के मूल निवासी चांद खां को कारगो पुलिस श्रीनगर ने ९ अगस्त २००३ को उसी दिन पकड़ा था जिस दिन अहमदाबाद में आदम अजमेरी को काइम ब्रांच के अहलकार चोरी के रिक्शे के बहाने से पकड़ कर ले गए थे। उसकी गिरफतारी भी कारगो पुलिस श्रीनगर ने ३० अगस्त को एक ऐसी गाड़ी के ड्राइवर के रूप में दिखाई थी जिसमें से कारगो पुलिस के अनुसार कथित तौर पर हथगोलेए बारूद और स्वचालित हथियार बरामद हुए थे। ९ अगस्त को आदम अजमेरी को अहमदाबाद में और चांद खां को श्रीनगर में पकड़ा जानाए २१ दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखे जाने के बाद दोनों की गिरफतारी ३० अगस्त को दिखाया जाना ;यद्यपि कि यह सब दो अलग राज्यों में हो रहा थाद्ध और दोनों को अक्षरधाम घटना में आरोपी बनाया जाना क्या मात्र एक संयोग थाॽ अगर हम पिछली कुछ घटनाओं को देखें तो शायद इसका जवाब होगा ष्नहीष्। आदम अजमेरी और अहमदाबाद से गिरफतार किए जाने अन्य आरोपियों को कथित रूप से यातनाएं देकर अक्षरधाम घटना के आरोप का स्वीकार करवाने वाले अधिकारियों में जिस वंजारा और सिंघल की सबसे बड़ी भूमिका सामने आई है उन पर फर्जी कहानियां गढ़ने और बकसूरों को फंसाने के आरोप पहले भी लग चुके हैं। उक्त दानों ही अधिकारी इस समय इशरत जहां और सोहराबुद्दीन फर्जी इनकाउन्टर मामले में जेल में हैं। वंजारा एन्ड कम्पनी के गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री समेत वरिष्ठ मंत्रियों के इशारे पर काम करने का प्रमाण स्वंय वंजारा द्वारा लिखे गए पत्र से मिलता है जो उसने जेल से लिखा था। इशरत जहां फर्जी इनकाउन्टर मामले में सीबीआई ने आईबी अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल कर दी है जिनका वंजारा और सिंघल जैसे अधिकारियों के साथ बेगुनाहों के इनकाउन्टर ;हत्याद्ध में भर पूर सहयोग था। इस मामले में भी जहां दो अलग अलग राज्यों में पकड़े गए बेगुनाहों को फर्जी तरीके से फंसाने की बात सामने आई है वह गुजरात सरकार की सहमति और आईबी के सहयोग के बिना सम्भव नहीं हो सकती थी। सुप्रीमकोर्ट ने अपने इसी फैसले में आरोपियों पर पोटा लगाए जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाते हुए जो टिप्पणी की है वह अपने आप में इस पूर आपरेशन में गुजरात सरकार के समर्थन का सबूत है। फैसले में कहा गया है ʺक्या इस मामले में २१⁄११⁄२००३ को राज्य सरकार द्वारा दी गई संस्तुति पोटा की धारा ५० के अनुसार थी। वर्तमान केस में ऐसा ज़ाहिर नहीं होता कि अनुमति प्रदान करने वाली अथारिटी ने अपने विवेक का प्रयोग इस मामले में अनुमति देने की आवश्यक्ता से सन्तुष्ट हो कर किया। ३ण् साफ है कि गृहमंत्री द्वारा अनुमति प्रदान करना अनुचित था इसलिए इसे अवैध करार दिया जाता हैʺ। पोटा के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति गृहमंत्रालय से लेनी पड़ती है और उसके लिए पोटा कानून में ही दिशा निर्देश मौजूद है। लेकिन गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री ने नियमों की अनदेखी करते हुए इसकी अनुमति प्रदान की। उस समय गुजरात सरकार के गृहमंत्रालय का कार्यभार स्वंय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में था। हालांकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इस मामले में होने वाली किसी तरह की अग्रिम जांच और उसके नतीजे में साज़िश की सच्चार्इ के सामने आने की कोई सम्भावना बनती दिखाई नहीं देती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में केन्द्र की नई सरकार सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का आदर करते हुए इस प्रकार के मामलों की पुनरावृत्ति न हो उसके लिए कोई कदम उठाती है या नहीं।
  - मसीहुद्दीन मस्सू



गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

सांप्रदायिक हिंसा में पुलिस की भूमिका -भाग2


 सन 2002 के कत्लआम में अल्पसंख्यक समुदाय को, हथियारों से लैस, विशाल हिंसक भीड़ के हमलों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, पुलिस की गोलियों का शिकार बनने वालों में भी उनकी ही बहुसंख्या थी। अहमदाबाद में 28 फरवरी को 40 लोग पुलिस की गोलियों से मारे गए। वे सभी मुसलमान थे। ये आंकड़े गुजरात पुलिस के है। उसी वर्ष की 3 मई को द हिन्दुस्तान टाईम्स में प्रकाशित विनय मोहन की रपट के अनुसार, हिंसा की शुरूआत से लेकर 2 मई तक, पुलिस द्वारा गोलीचालन में कुल 184 व्यक्ति मारे गए, जिनमे से 104 मुसलमान थे। सच तो यह है कि गुजरात पुलिस, दंगाईयों की पूरी मदद कर रही थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आम हिन्दुओं की तरह, पुलिसकर्मियों में भी मुसलमानों के विरूद्ध पूर्वाग्रह हैं। वे भी यह मानते हैं कि मुसलमान स्वभाव से ही क्रुर और हिंसक होते हैं। वे यह भी मानते हैं कि दंगों को तब ही नियंत्रित किया जा सकता है जब दंगों की शुरूआत करने वाले मुसलमानों को सबक सिखाया जाए। जब भी सरकार पुलिस को दंगों पर प्रभावी ंग से नियंत्रण करने का निर्देश देती है तो इस निर्देश का यही अर्थ निकाला जाता है कि मुसलमानों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। वी.एन. राय, भागलपुर और बंबई में पुलिसकर्मियों से अपनी चर्चा का हवाला देते हुए लिखते हैं कि उनमें से अधिकांश यह मानते थे कि हिन्दू, अहिंसक और धर्मभीरू होते हैं। जब उन्हें यह बताया गया कि दंगों में हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों को अधिक नुकसान हुआ है तब भी वे इसी बात पर अड़े रहे।
सन 1984 में भिवण्डी में हुए दंगों की अपनी जांच में डॉ. असगर अली इंजीनियर ने पाया कि वहां तैनात स्टेट रिजर्व पुलिस के जवान, बिना किसी अपवाद के, शिवसेना शाखाओं के परिसर में ही आराम करते थे। वे मुस्लिम घरों के नजदीक के किसी स्थान पर कभी नहीं रूकते थे क्योंकि वे वहां असुरक्षित महसूस करते थे। उन्हें लगता था कि ॔॔क्रुर मुसलमान’’ उन पर हमला कर देगें।
मुंबई के फारूख मापकर ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई कि जनवरी 1993 में मुंबई में हुए दंगों के दौरान, वडाला में स्थित हरी मस्जिद में पुलिसकर्मी घुस गए और अकारण अंधाधुंध गोलियां चलाईं। जिन लोगों पर गोलियां चलाई गईं, उनके पास कोई हथियार नहीं थे। सात लोग मारे गए और कई अन्य घायल हुए। फारूख, जो कि एक बैंक में काम करते थे, उन 54 लोगों में से एक थे जिन्हें पुलिस ने मस्जिद के परिसर से गिरफ्तार कर लिया। उन सभी पर दंगा करने और हत्या का प्रयास करने के मुकदमे कायम कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। सोलह साल चली कानूनी लड़ाई के बाद, मापकर को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया।
मुंबई दंगों के दौरान ही मुंबई पुलिस के संयुक्त कमिश्नर आर.डी. त्यागी, पुलिसकर्मियों के एक दल के साथ सुलेमान बेकरी पहुंचे और बिना किसी कारण के वहां उपस्थित नौ निर्दोष लोगों को गोलियों से भून डाला। मेरठ में 1987 में हुए दंगों के दौरान, पीएसी की एक टुकड़ी ने हाशिमपुरा नामक एक मोहल्ले से 22 मई को दो दर्जन से अधिक मुस्लिम युवकों को पकड़ा। उन्हें ट्रक में ले जाकर गाजियाबाद में दो अलगअलग स्थानों पर गोली मार दी गई। उस समय व्ही.एन. राय, गाजियाबाद के एस.पी. थे और उन्होंने पीएसी के जवानों के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज करवाए। पीएसी के सिपाहियों ने मुस्लिम युवकों को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि जब तक मुसलमानों को सबक नहीं सिखाया जाएगा तब तक दंगे नहीं रूकेंगे। उन्हें यह भी डर था कि मेरठ को मुसलमान "मिनी पाकिस्तान’’ बना देंगे।
सन 2002 के गुजरात दंगों के दौरान, अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा फोन पर की गई सहायता की गुहारों को पुलिस ने नजरअंदाज किया और उन्हें पुलिस थानों में शरण नहीं लेने दी गई। कुछ इलाकों में पुलिस ने दंगाईयों को अपने सरकारी वाहनों से डीजल निकालकर दिया ताकि वे मुसलमानों के घरों को लूटकर उनमें आग लगा सकें।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के एक अध्ययन दल ने पाया कि तलवारों और त्रिशूलों से लैस लोगों से भरे हुए ट्रक, पुलिस की गश्ती वैनों के सामने से निकल जाते थे और उन्हें रोकने के लिए कुछ नहीं किया जाता था। कई मौकों पर पुलिसकर्मियों ने ट्रक में सवार लोगों को सलाह दी कि वे अपना काम एक घंटे के अंदर पूरा कर लें और कहा कि पुलिस उसके बाद ही वहां पहुंचेगी। गुजरात पुलिस ने तो मुस्लिम नाम वाले एक हाईकोर्ट जज, आई.पी.एस. अधिकारी और सेना के कर्नल तक को सुरक्षा नहीं दी। जिन अधिकारियों ने दंगों को रोकने की कोशिश की, उनका तबादला प्रशासनिक पदों पर कर दिया गया। पुलिसबल के मुस्लिम सदस्यों को या तो छुट्टी पर जाने के लिए कह दिया गया या फिर उनकी ड्यूटी दफ्तरों में लगा दी गई। राजनेताओं ने पुलिस कंट्रोल रूम में बैठकर दंगों का निर्देशन किया।
यद्यपि गुजरात दंगों में मुसलमान हमले के शिकार थे और विहिप व बजरंग दल जैसे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन हमलावर, फिर भी पुलिस की नाकाबंदी और तलाशी अभियान मुस्लिम इलाकों तक सीमित रहे। इन तलाशी अभियानों के दौरान रहवासियों की जमकर पिटाई की गई : यहां तक कि उनमें से कई की हड्डियां चूरचूर हो गईं। उनके घरों में घुसकर तोड़फोड़ की गई। बेजा गिरफ्तारियां हुईं और उन्हें आई.पी.सी. की धारा 307 (हत्या का प्रयास) का आरोप लगाकर जेलो में डाल दिया गया। पी.यू.सी.एल. बड़ौदा व शांति अभियान के अनुसार, बड़ौदा में मई के मध्य तक हुई 1300 हिंसक घटनाओं में से 814 के दौरान पुलिस घटनास्थल पर ही नहीं पहुंची। 397 मामलों में पुलिस को सूचना दी गई परंतु वह फिर भी निष्क्रिय बनी रही। 60 मामलो में पुलिस घटनास्थल पर पहुंची परंतु उसने कोई कार्यवाही नहीं की। 25 मामलों में पुलिस ने दंगाईयों का साथ दिया। कुल 1300 हिंसक घटनाओं में से केवल 27 में पुलिस ने प्रभावी कार्यवाही की और हमलावरों को बल प्रयोग कर तितरबितर किया।
राय के अनुसार, जांच एजेन्सियां, मुसलमानों के प्रति गहरे तक पूर्वाग्रहग्रस्त हैं। मेरठ के हाशिमपुरा में दंगों के दौरान पीएसी की बर्बर कार्यवाही की जांच करने में उत्तरप्रदेश सी.आई.डी. ने आठ साल लगा दिए। मुसलमानों पर हमलों के मामले में एफ.आई.आर या तो दर्ज ही नहीं की जातीं और या फिर बहुत प्रयासों के बाद दर्ज की जाती हैं।
अधिकांश मामलों में पुलिस जानबूझकर उन हमलावरों के नाम नहीं लिखती जिनकी निशानदेही फरियादी करते हैं। कई बार एफ.आई.आर. को इस तरह से लिखा जाता है कि अपराधियों को सजा दिलवाना कठिन हो जाता है। बिहार के भागलपुर में 24 अक्टूबर 1989 को दंगे शुरू हुए। लोगायन नामक गांव में 27 अक्टूबर को 116 मुसलमानों को मारकर खेतों में दफना दिया गया और वहां फूलगोभी उगा दी गई। इस घटना में जीवित बचे 65 व्यक्तियों को एफ.आई.आर. दर्ज कराने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। यह इस तथ्य के बावजूद कि घटना की विस्तृत रपट स्थानीय व राष्ट्रीय दैनिकों में छपी थी। पुलिस इस घटना से इंकार करती रही। अंततः, रपट तब लिखी गई जब डी.आई.जी. अजीत दत्ता के आदेश पर खेतों को खोदा गया और वहां लाश्ों पाई गईं। आरोपियों पर मुकदमे चले और उनमें से कुछ को सजा भी हुई।
अधिकांश मामलों में जांच ठीक से नहीं की जाती और मामलों पर खात्मा लगा दिया जाता है। खात्मे के दो कारण बताए जाते हैं : अघटना सही पाई गई परंतु सुबूत और गवाह न होने के कारण आगे जांच करना संभव नहीं है या बऐसी कोई घटना हुई ही नहीं।
मुंबई में हुए दंगो की जांच करने वाले न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग की रपट में पुलिस कंट्रोल रूम और शहर में घूम रहे पुलिस गश्ती दलों के बीच वायरलेस पर हुई बातचीत को उद्धत किया गया है। शहर में तैनात एक पुलिसकर्मी ने पुलिस कंट्रोल रूम से एक विशष्ट स्थान पर फायर बिग्रेड भेजने के लिए कहा। इस अनुरोध पर त्वरित कार्यवाही करने की बजाए, कंट्रोल रूम से यह पूछा गया कि जिस इमारत में आग लगी है वह हिन्दू की है या मुसलमान की। हमने गुजरात में देखा कि किस प्रकार ॔दंगों के उत्पादन’ की ॔संस्थागत व्यवस्था’, मात्र 72 घंटों में कितना कहर बरपा सकती है। यही कुछ सन 2008 और 2009 में कंधमाल में भी देखा गया।
पुलिस के साम्प्रदायिक चरित्र के कारण दोनों समुदायों के लोगों की पुलिस के बारे में सोच में भारी अंतर है। राय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से यह सामने आया कि मुस्लिम समुदाय के 97 फीसदी दंगापीड़ित, पुलिस को अपना दुश्मन मानते थे और 73.5 फीसदी का कहना था कि दंगों के दौरान वे पुलिस से सहायता नहीं मागेंगे। इसके विपरीत, बहुसंख्यक समुदाय के मात्र 6.5 प्रतिशत पीड़ित, पुलिस को अपना शत्रु मानते थे और उनमें से 93 प्रतिशत ने कहा कि अगर दंगों के दौरान उन पर हमला होता है तो वे पुलिस से मदद मागेंगे।
यह दिलचस्प है कि यद्यपि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना में भी विभिन्न समुदायों के कर्मियों का अनुपात लगभग उतना ही है जितना कि राज्य पुलिस बलों में, परंतु दंगों के दौरान वे पुलिस की तुलना में कहीं अधिक निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार करते हैं। राय के सर्वेक्षण के अनुसार, 91 प्रतिशत मुसलमानों ने कहा कि वे पुलिस की अपेक्षा सी.आर.पी.एफ. की तैनाती को अधिक पसंद करेंगे जबकि 37 प्रतिशत का कहना था कि वे दंगों पर नियंत्रण के लिए सेना की मौजूदगी चाहेंगे। पी.ए.सी. और राज्य पुलिस की तैनाती चाहने वाले मुसलमानों का प्रतिशत क्रमशः 6 और 18 था। इसके विपरीत, बहुसंख्यक समुदाय के अधिकांश सदस्यों (51.5 प्रतिशत) ने पीएसी व 35 प्रतिशत ने राज्य पुलिस पर भरोसा जतलाया। केवल 10 प्रतिशत सी.आर.पी.एफ की तैनाती के हामी थे और 8.5 प्रतिशत सेना की। दंगों की मेरे द्वारा की गई जांच से भी यह सामने आया है कि सेना और सी.आर.पी.एफ., दंगों पर शीघ्रता से और प्रभावी नियंत्रण कर लेते हैं और यह भी कि वे इस पर कोई ध्यान नहीं देते कि दंगाइयों और पीड़ितों का धर्म क्या है। केन्द्रीय अर्द्वसैनिक बल और सेना, स्थानीय प्रशासन और राजनेताओं के दबाव में भी नहीं आते क्योंकि उनका इन बलों के सदस्यों की नियुक्तियों, पदोन्नतियों आदि में कोई दखल नहीं होता। वे दंगों पर जल्दी से जल्दी नियंत्रण पाना चाहते हैं ताकि वे अपने मुख्यालय वापस जा सकें।
परंतु यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि राज्य पुलिस बलों के सभी सदस्य पक्षपातपूर्ण व साम्प्रदायिक व्यवहार करते हैं। ऐसे कई पुलिसकर्मी हैं जिन्होंने दंगों में लोगों की जानें बचाईं और निष्पक्षता से काम किया। परंतु उनकी संख्या कम है और अक्सर उन्हें हाशिए पर पटक दिया जाता है। गुजरात पुलिस के आर.डी. श्रीकुमार ने अपने हितों और कैरियर को दांव पर लगा कर सन 2002 के दंगों में अनेक मुसलमानों की जानें बचाईं।
निष्कर्ष
आम पुलिसकर्मी के साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह, दंगों के दौरान ही नहीं बल्कि उनकी रोजमर्रा की कार्यवाही के दौरान भी झलकते हैं। इससे मुसलमानों की छवि एक फिरकापरस्त कौम की बन जाती है। झूठी मुठभेड़ों के शिकार होने वालों में बड़ी संख्या मुसलमानों की होती है। हर बम विस्फोट के बाद मुस्लिम युवकों को धर लिया जाता है। महाराष्ट्र में मुसलमान कुल आबादी का 10 प्रतिशत हैं परंतु जिन लोगों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उनमें से 28 फीसदी मुसलमान हैं। परंतु मुसलमानों की दोषसिद्धी की दर 17 प्रतिशत है कि जबकि अन्य लोगों के मामले में यह 22 प्रतिशत है। जाहिर है कि उन पर झूठे मुकदमे लादे जाते हैं। पुलिसकर्मियों की भर्ती के बाद और उनके कार्यकाल के बीच, उन्हें सघन प्रिशक्षण देकर उनके साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह दूर किए जा सकते हैं। इस समस्या से निपटने का एक तरीका यह भी है कि पुलिसबलों में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की भर्ती की जाए।
इससे भी जरूरी यह है कि पुलिसबलों के सदस्यों को यह पता रहे कि अगर उन्होंने अपने कर्तव्य पालन में कोताही बरती और कानून के खिलाफ काम किया तो उन्हें सजा भोगनी पड़ेगी। अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की गलतियों और कमियों के लिए उच्च अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
इंग्लैण्ड और वेल्स में एक ॔इंडिपेंडेंट पुलिस कम्पलेंट्स कमीशन’ (स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग) है जो पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच करता है। इस आयोग के सदस्य प्रतिष्ठित नागरिक होते हैं और उन्हें यह अधिकार होता है कि वे पुलिस द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन या मनमानी कार्यवाही की शिकायतों की जांच करें।
साम्प्रदायिक व लक्षित हिंसा विधेयक भी एक ऐसा प्रस्तावित कानून है जिससे इस समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है और पुलिसकर्मियों को गलत कार्यवाही करने या उचित कार्यवाही न करने पर सजा दी जा सकती है। बिल के मसौदे में यह प्रावधान है कि पीड़ित पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

वेदान्ता को भगाना है देश को बचाना है

उड़ीसा,  राजिस्थान, छत्तीसगढ़  और  तमिलनाडु 
जाम्बिया, लीब्रिया, आष्ट्रेलिया ,या फिर  नाम्बिया 

वेदान्ता ने सब जगह अपना जाल बिछाया 
वेदान्ता फैक्ट्री के नाम पर सारे जहाँ पर कब्ज़ा जमाया  
अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

कुदरत ने लोहा, जिंक, कापर, तेल सबके लिए बनाया 
वेदान्ता ने इस पर अपना कब्ज़ा जमाया 

पहाड़  जंगल पेड़ और हवा - पानी 
वेदान्ता करता सबपे अपनी मन  मानी  
अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

आदिवासियों ने दिन रात मेहनत कर जंगल बसाए
किसानो ने कड़ी धूप में हल चलाकर खेत सजाये

महिलाओं ने तिनका तिनका बिन बिन कर घर बनाए
वेदान्ता इन सब पर अपना अधिकार जताए
अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

छोटे छोटे बच्चे भूखो मरे
कापी -किताब की जगह कूड़ा करकट बिने

कुपोषण और भुखमरी का शिकार बने
वेदान्ता इनके अधिकार अपने नाम करे
अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

अनपढ़ मजदूरों को रोजगार के नाम पर गुलामी मिले
कम वेतन पर कमर तोड़  काम  मिले

न कोई पेंशन न कोई सुरक्षा और न कोई इनाम मिले
वेदान्ता इनकी मेहनत पर अपना गुण गान करे
अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

जहरीली गैसे, दूषित पानी और रासायनिक कचरे का अम्बार लगाया
प्रदूषण,  बीमारी , लाचारी और न जाने क्या क्या फैलाया  

बाल्को हो या फिर माल्को सबने न जाने कितनो को मौत की नींद सुलाया
वेदान्ता ने वेदों की  पावन धरती पर मौत का कारखाना लगाया 

अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !

वेदान्ता  है  जुल्मी ,  अपराधी  और भ्रस्टाचारी
वेदान्ता  है  शोषक,  अत्याचारी और विनाशकारी   

पुलिस, सरकार,  नेता और अधिकारी सब इसके दासी 
वेदान्ता करता सबकी मेहमान नवाजी 

अरे भईया गरीबो की मेहनत पर वेदान्ता अय्यासी करे !    

आदिवासी हमारे है वेदान्ता बेगाना है 
नियमगिरि ने जाना है बेदंता को भगाना है 

 वेदान्ता को भगाना है देश को बचाना है .…………….……  
 वेदान्ता को भगाना है देश को बचाना है .……………………  

 
के एम् भाई 
mo. - 8756011826

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

समाजवादी परिवारवाद की पुलिस

उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार में पुलिस की दरिन्दिगी व वसूली अपनी पराकाष्ठा पर है। मुज़फ्फरनगर जिले में नौजवानों को लाकर रात भर पीटा गया, करंट लगाया गया. पुलिस की बेरहमी यहीं पर खत्म नहीं हुई पुलिस ने जानवरों जैसा व्यवहार करते हुए युवकों के गुप्तांगों पर बिजली का करंट दिया। रात भर टॉर्चर करने के बाद अगले दिन उन्हें गंभीर हालत में छोड़ दिया गया। लेकिन पुलिस की क्रूरता के निशान उनके शरीर पर ही रह गई। जिसे देखकर लोगों के रौंगटे खड़े हो गए। पुलिस की क्रूरता के शिकार संदीप सैनी, बिट्टू सैनी, संजू सैनी, रितेश और सचिन सैनी के शरीर को देखकर लोगों के रौंगटे खड़े हो गए।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करते हुए थाना अध्यक्ष समेत पांच पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करते हुए जेल भेजने की बात कही।
उत्तर प्रदेश में वसूली करने के लिए और जनता में भय पैदा करने के लिए थानों में बेलन, करंट लगाने के औजार रखे हुए हैं और आये दिन लोगों को पकड़ पकड़ कर बुरी तरह यातनाएं दी जाती हैं जिसकी जानकारी जिले के वरिष्ठ अधिकारीयों व न्याय विभाग के भी अधिकारीयों को होती है। इस काम के लिए उनकी भी मौन स्वीकृति होती है। 
              मिशन 2014 पुलिस विभाग की हरकतों के कारण बुरी तरह से फ्लॉप होगा और समाजवादी परिवारवाद को जबरदस्त धक्का लगेगा। 

सुमन 
लो क सं घ र्ष ! 

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अखिलेश सरकार की नंगई

 होलिका दहन के समय उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जनपद के राजघाट इलाके से धर्मेन्द्र मंझवार को पुलिस पकड़ ले गयी और कई दिन थाने  में रखने के बाद कचेहरी खुलने पर सिटी मजिस्ट्रेट के यहाँ धर्मेन्द्र मंझवार को नंगा कर पीटते हुए घुमाने के बाद पेश किया गया। माननीय उच्चतम न्यायलय से लेकर   अखिलेश सरकार  मूकदर्शक है। मानवाधिकार आयोग सिर्फ कागजी हैं। पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर ही कार्य करते हैं। उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार में पुलिस निरंकुश है। कानून नाम से पुलिस को अपने लिए चिढती है और वसूली करने के लिए दूसरे को कानून बताने का कम करती है। पुलिस के इन कार्यों का खामियाजा अखिलेश सरकार को भुगतना पड़ेगा।

सुमन
लो क सं घ र्ष ! 

 

बुधवार, 20 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-5

   
 सुप्रीम कोर्ट न्यायालय के वकील सर के नाम पे खत
    शनिवार दिनांक 8.10.2011 को रात में दंतेवाड़ा का पुराना थाना के ही बगल में नया थाना बना है उसी नया थाना भवन में प्रताड़ना किया गया है। रात में मैं सोई थी दो लेडीज पुलिसकर्मी मुझे उठाए है। मैंने पूछा क्यों जगा रहे हो, कहने लगे एस0पी0 अंकित गर्ग साहब आए हैं। मुझे दूसरे रूम में ले गए। उस रूम में एस0पी0 अंकित गर्ग और किरन्दूल थाने का एस0डी0पी0ओ0 भी बैठा हुआ था मुझे उस रूम में बिठाया गया साथ में कुछ समय तक लेडीज पुलिसकर्मी थे कुछ देर बाद उन दोनों लेडीज को रूम से बाहर आने को कहा और कहा कि यहाँ पर जो कुछ भी हो रहा है, इस बात को किसी से नहीं कहोगे यदि ऐसा हुआ तो तुम लोग के साथ क्या कर सकता हूँ। तुम लोग अच्छी तरह जानते हो वो दोनों ने कहा जी सर हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे ठीक है जाओ ऐसा कहा है। फिर मानकर आरक्षक और वसंत को बुलाया, कहने लगा मानकर तुम डरना मत मैं हूँ ना ये मदर सौद तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी। मादर सौद तुम जानना चाहोगी ये प्लान हमने बनाया था जो कामयाब होते नजर आ रहा है। मानकर को कहने लगे बेटा तुम बहुत ही बहादुरी का काम किया तुमसे मैं बहुत खुष हूँ। मदर सौद मैं कौन हूँ एस0पी0 अंकित गर्ग हूँ। जो पहले बीजापुर में था अब बहुत जल्द एस0पी0 से बड़ा रेंज का अधिकारी बनने वाला हूँ। टेबल बजाकर कहने लगा सब कुछ यह से होता है। हम जो कहेंगे वही होगा शासन प्रषासन सरकार यह है। समझी मादर सौद मानकर को तुम क्या बदनाम करोगे उसे तो अब प्रमोषन मिलेगा। काफी देर तक गन्दी-गन्दी गाली देकर मानसिक रूप से प्रताडि़त किया। कई गालियों को मैंने पहले खत में जिक्र किया है। शायद आपको वो खत प्राप्त हुई होगी पूरी बातें खत पर बयान नहीं कर सकती कुछ कागजों में साइन करने को कहा कुछ बातों को लिखकर देने को कहा जब मैंने मना करने लगी तो कड़क बातों से दबाव डाला फिर भी मैंने इंकार करने लगी। तब करेंट सार्ट पैर कपड़ा में देने लगे कुछ देर के लिए रोक दिया और कहने लगा हम जो कह रहे हैं। वो करो इसी में आपकी भलाई है। तुम बच जाओगी समझी। हिमाँशु , स्वामी अग्निवेश , प्रशांत भूषण, कोलिन, लिंगाराम, कविता श्रीवास्तव, मेधा पाटेकर, अरुंधती राय, नंदनी सुन्दर, मनीष कुंजम, रामा सोडी, एस्सार कंपनी का मालिक ये सब के नाम से लेटर लिखकर दो ये सब नक्सली समर्थक है। मैं और लिंगा दिल्ली तक यहाँ की हर खबर देते थे जो मैं जानती हूँ ये लोग बुलाने पर मैं दिल्ली गई थी एस्सार कंपनी के अध्किारी नक्सली तक रूपये पहुचानें के लिए हमेशा  मनीष कुंजम, रामा सोडी और मुझे देते थे इस तरह से हमलोग नक्सली का मदद करते थे बहुत सारी बातें हैं। इस तरह का खत लिखने को कहा। जो मैं लिखकर नहीं दी ना ही उनके लिखा कागज पर साइन भी नहीं किया। मदर सौद हमारे लिखित कागज में साइन कर बहुत ही दबाव डाले मैंने कहा आप जान ले लो पर मैं जो गुनाह की नहीं और जिन लोगों के बारे में कह रहे हो। हो भी नहीं करूँगा। मैंने कहा इससे अच्छा मार दो कहने लगा ये भी कर लेते पर नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हें दिल्ली से अरेस्ट किया गया है। अब तुम मेरी बात नहीं मान रही हो तो सजा देकर ही जेल में भेजेंगे ताकि शर्म से जेल की दीवारों में अपना सर पटककर मर जाओगी शिक्षित महिला हो इतनी शर्म को तो लेकर जी तो नहीं पाओगी। इस तरह की बातें कहा और फिर करंट सार्ट देने को कहा करंट सार्ट दे देकर मेरे कपड़े को उतराया गया नंगा करके खड़ा रखा। एस0पी0 अंकित गर्ग कुर्सी में बैठकर हमे देख रहा था। शरीर को देख देखकर गन्दी-गन्दी गालियाँ देकर बेइज्जत किया कुछ देर बाद बाहर निकला और कुछ समय बाद फिर तीन लड़के को भेजा वो लड़के उल्टी सीधी हरकतें करने लगे और धक्का देने पर गिर गई फिर मेरे शरीर में बेदर्दी के साथ डाला गया सह नहीं पाई बेहोषी की हालात में थी काफी देर बाद होश  आया तो मैंने अपने आप को जिस रूम में सोई थी वहाँ पाई। तब तक सुबह हो चुका था रविवार दिनांक 9.10.2011 उस दिन भर दर्द को अंदर ही अंदर सहती रही किससे कहती वहाँ पर मेरा अपना कोई था ही नहीं। सोमवार दिनांक 10.10.2011 को सुबह लेडीज पुलिस हमें कहने लगी फ्रेश  हो जाओ तुमको कोर्ट ले जाना है। तब मैंने कहा मैडम मुझे चक्कर आ रहा है। मेरी हिम्मत नहीं हो रही है। कुछ देर रुक जाओ कहने लगी तुम्हें जल्दी तैयार होने को बोले हैं नहीं तो हमे गाली पड़ेगा। तब मैंने कहा एक कप चाय पीला दीजिए जिससे मैं हिम्मत कर सकूँ चाय पीया और धीरे-धीरे बाथ रूम तक गई कुछ देर बाद चक्कर आया तो गिर गई। मैं पहले से ही बाथरूम तक जाने लायक नहीं थी फिर भी दबाव डालकर बाथरूम में प्रवेश  होने के लिये भेजा गया। शायद ये लोग अच्छी हालात बनाकर मुझे कोर्ट न्यायालय में ले जाना चाहते थे। पर ऐसा नहीं हुआ बाथरूम में गिरते ही बेहोश  हो गई फिर दंतेवाड़ा थाना से निकालकर दंतेवाडा अस्पताल में ले गए काफी देर बाद मुझे होश आया। होश आने के बाद दर्द और ज्यादा बढ़ा गया ना सो सकी ना बिस्तर से उठ सकी पूरी तरह घायल हालात में थी प्रताड़ना का जिक्र किसी से उस वक्त नहीं किया मुझे धमकी दिया गया था फिर भी कोषिश  करती रही कि मौका देखकर मेरे ऊपर किया गया प्रताड़ना के बारे में बताऊँ पुलिसकर्मी तो हर पल मेरे साथ थे। फिर मुझे दंतेवाडा अस्पताल से करीब दो बजे गाड़ी के बीच सीट में सुला कर कोर्ट में लाया गया बहुत देर तक कोर्ट न्यायालय के बाहर ही रखे। न्यायालय के अंदर नहीं ले गए और एस0डी0पी0ओ0 न्यायालय के अंदर से कागजात लेकर आया और कहने लगा इसमें साइन करो मैंने कहा सर मैं कुछ जज के सामने बयान देना चाहती हूँ। तब कहने लगा ये सब बाद में होगा। ये सब कागजात तुम्हें जेल भेजने के लिए है। साइन करो क्या करती इससे अच्छा तो जेल जाना ही ठीक है। सोचकर साइन कर दिया। जज मेडम बगैर देखे सुने हमे जेल भेज दिया बहुत देर बाद कोर्ट से फिर दंतेवाडा थाना में लाए दो व्यक्ति पहले से ही थाने में मौजूद थे इतनी परेशानी होने के बाद भी वो दोनों व्यक्ति हमे पूछताछ कर रहे थे कविता श्रीवास्तव के बारे में मैंने कहा मेरी हालात ठीक नहीं है। इस वक्त मैं बात करने योग्य नहीं हूँ। मुझे जबरदस्ती ना करे। तब तक रामदेव मेरा भाई परिवार के साथ थाना आया और कहने लगा मेरी दीदी को इधर क्यों लाए हो कोर्ट ने तो जेल ले जाने की परमिशन दिया है। तब तुरंत जगदलपुर के लिए रवाना किए। जगदलपुर सेन्ट्रल जेल में शाम को करीब 7-8 बजे पहुँचे मेरी हालात देखकर जेल वाले ने दाखिला नहीं दिया। फिर दंतेवाडा का ही गार्ड हमें जगदलपुर अस्पताल में भर्ती किया। इलाज होता रहा मंगलवार दिनांक 11.10.2011 को जगदलपुर का डॉक्टर रायपुर के लिए रिफर किया। शाम को जगदलपुर अस्पताल से करीब 10-11 बजे रायपुर के लिए निकले रायपुर में बुधवार दिनांक 12.10.2011 सुबह पहुचे रायपुर अस्पताल में भर्ती किया गया इलाज होता रहा। रायपुर का गार्ड जबरदस्ती डॉक्टर से कहकर हमें उसी दिन शाम को करीब 8-9 बजे सेन्ट्रल जेल रायपुर में ले आए, हमने बहुत कोषिश  किया कि सर हमें तकलीफ है, इलाज होने दो फिर भी जबरन ले आए और कहने लगे लाल गेट को दिखते ही अपने आप ठीक हो जाओगे ऐसे कहे है। चलने योग्य भी नहीं थी बड़ी तकलीफों का सामना करते हुए जेल की गेट को प्रवेश किया।                 
स्व हस्ताक्षरित
प्रार्थी
श्रीमती सोनी सोरी (सोढ़ी)



 -हिमांशु कुमार

मंगलवार, 19 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-4

इस बीच लिंगा की बुआ सोनी सोरी का फोन आया कि सर पंद्रह अगस्त को मेरे सरकारी आश्रम जिसमे मैं पढ़ाती हूँ वहाँ नक्सली आए थे और कह रहे थे कि हम ये तिरंगा झंडा उतार कर यहाँ काला झंडा फहराएँगे। तो सर मैंने उनसे खूब बहस की और उनसे कहा कि इस झंडे के लिए भगत सिंह जैसे लोगो ने अपनी कुर्बानी दी है मैं इसे नहीं उतारने दूँगी। फिर वो मुझसे पूछने लगी सर मैंने ठीक किया ना। मैं उसकी बातें सुन रहा था और सोच रहा था मैं इस अकेली कमजोर सी आदिवासी लड़की को सेल्यूट करूँ जो अकेले राष्ट्रध्वज के सम्मान के लिए लड़ रही है या उन वर्दीधारी सुरक्षा बल के बड़े ओहदेदारों को जो रोज इस तिरंगे को बलात्कार और निर्दोषों का खून बहा कर अपमानित करते हैं?
    कल रात इसी लड़की का फोन आया था कि सर मुझे नक्सली घोषित कर दिया है। आज मुझे मारने पुलिस आई थी। मुझ पर गोलियाँ भी चलाईं। मैं बचने के लिए जंगल में भाग गई हूँ। और मैं सोच रहा था। तिरंगे झंडे की रक्षा के लिए अपनी जान पर खेलने वाली लड़की का ये अंत होगा? काश  इसने पुलिस की ज्यादतियों के खिलाफ कोर्ट में जाने का असंवैधानिक काम ना किया होता। का
कि ये आदिवासी ना होती। काष इसके जिले में खनिज सम्पदा ना होती। काष सत्ता पर धनपषु ना बैठे होते। तो इस लड़की को देभक्ति का पुरस्कार मिलता। लेकिन अब देभक्ति का ढोल पीट कर देष की संपत्तियों को विदेशी  कंपनियों को बेचने वाले सरकारी देद्रोही इस लड़की की हत्या करने पर उतारू हैं। सोनी सोरी ने मुझे ये भी बताया कि सर लिंगा ने एक स्कूल में नक्सलियों के काले झंडे को उतार कर फेंक दिया और नक्सलियों को डाँट कर भगा दिया है। मैंने कहा कि तुम लोग सबसे लड़ाई क्यों ले रहे हो? वहाँ जंगल में तुम्हे कौन बचाएगा? खैर।
    लिंगा का अंतिम फोन लगभग दो सप्ताह पहले आया कि सर मैं दिल्ली आ रहा हूँ और मैंने सोचा है कि गाँव में ही रह कर काम करूँगा। सर आप मेरे लिए कहीं से एक कैमरे और एक पुराने लेप टाप की व्यवस्था कर देंगे क्या? मैंने यह बात अपने दोस्तों से कही तो एक लेपटाप लिंगा के लिए मेरे एक दोस्त ने दे दिया है। ये लेख मैं उसी लेपटाप पर लिख रहा हूँ। ये लेपटाप अपने मालिक का इंतजार ही कर रहा है। देखते हैं इसका इंतजार कब खत्म होगा।
    इसी वर्ष मार्च में सरकार ने दंतेवाडा में तीन गाँव जला दिए। ताड्मेतला, तिम्मापुरम और मोरपल्ली। लिंगा तब दिल्ली में ही था। उसने कहा, सर मैं जाकर इन गाँवों के लोगों से मिल कर आता हूँ। लिंगा गया। वहाँ से फोटो और वीडियो लाया। उनकी कापी मेरे पास भी है। और मैंने अपने कुछ दोस्तों को भी दे दी है। क्योंकि इन गावों को जलाने की इस घटना की जाँच सर्वोच्च न्यायालय ने सी.बी.आई. को सौंपी है ! सरकार को पता है की लिंगा सी.बी.आई. को महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है इसलिए उसे जेल में डालने का षड्यंत्र रचा गया।
    फिर चार दिन पहले लिंगा की बुआ सोनी सोरी का अचानक फोन आया कि सर, कल लिंगा को, पुलिस हमारे दादा जी के घर पालनार से पकड कर ले गई। वो बताने लगी, कि सर पुलिस वाले एक दिन पहले लिंगा के पास आए, और बोले कि हम तुम्हारे ऊपर अवधे गौतम के घर पर हमले का केस खतम करा देंगे। तुम बस ये करना कि लाला नामक एक आदमी बाख्शर में एक बैग में पैसे लेकर आएगा। तुम वो पैसे का बैग लेकर पुलिस को लाकर दे देना। बस उसके बाद तुम्हारे सारे केस खत्म। लिंगा ने ऐसा करने से मना कर दिया, और अपने दादा जी के घर चला गया। कुछ देर बाद एक सेद सुमो में सादी वर्दी में पुलिस वाले आए और लिंगा को गाड़ी में डाल कर ले गए। अगले दिन फिर वही लोग सोनी को पकड़ने आए। सोनी जंगल में चली गई। मैंने कहा गिरफ्तार हो जाओ। नहीं तो तुम्हे यह लोग जान से मार देंगे। तो बोली सर मेरे तीन छोटे छोटे बच्चे हैं। मेरा पति भी जेल में है। लिंगा भी जेल गया। इन सब के लिए कौन लडे़गा? मैं दुनिया को सच्चाई बताना चाहती हूँ। उसके बाद जेल भी जाऊँगी। पता नहीं इस लड़कीका क्या होगा?
-हिमांशु कुमार

सोमवार, 18 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-3

लेकिन फिर कल एक फोन ने मेरे सारे विश्वास को डगमगा दिया। दंतेवाड़ा से फिर उसी आदिवासी लडकी ने मुझे बताया की सर, दंतेवाडा के एस0एस0पी0 कल्लूरी नें दो नई नक्सली वारदातों में फिर से उसका नाम जोड़ दिया है और अदालत में उसके खिलाफ चालान भी पेश  कर दिया है। वो लड़की रो रही थी कि सर मैं तो रोज अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ, वहाँ मेरी हाजिरी लगी हुई है, मैं जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूँ और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूँ। लेकिन फिर भी एस0एस0पी0 कल्लूरी ने मुझे फरार घोषित कर दिया है और मुझे मारने की फिराक में है। फोन के उस तरफ वो लड़की रोती जा रही थी और फोन के इस तरफ मैं गुस्से, बेबसी, और असमंजस की हालत में उसका रोना सुनता जा रहा था।
    लाखों लोग इस देश  की आजादी के लिए लड़े थे मेरे पिता भी लड़े थे। क्या यही दिन देखने के लिए उन सारे लोगों ने कुर्बानी दी थी? क्या भगत सिंह इस तरह के देश के लिए शहीद हुए थे? कम से कम मुझे कोई ये तो बता दे की मुझे क्या करना चाहिए? आदिवासी होता तो बन्दूक उठा सकता था। पर सबने गांधीवादी कह कह कर मुझे इतना इज्जतदार बना दिया है कि अब मैं हर अन्याय पर बस इन्टरनेट पर एक लेख लिखता हूँ और सोच लेता हूँ की काफी देश  सेवा हो गई। अब तो मीडिया वालों ने मेरे फोन भी उठाने बंद कर दिए हैं।
    क्या कोई मेरी बात सुन रहा है? हेल्लो? मीडिया, सरकार, न्याय पालिका? है कोई गरीब जनता, आदिवासियों की बात सुनने वाला? क्या कोई बचा है? कम से कम इस लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोषिष तो कर लो, कोई है जो इस बेबस आदिवासी लड़की को बचा सकता है?
    इस बार जब लिंगा दिल्ली से दंतेवाडा जाने लगा तो मैंने उसे जोर से भींच कर गले से लगा लिया। मैंने कहा लिंगा मेरा दिल कह रहा है कि हम अंतिम बार मिल रहे हैं। वो हँसने लगा। और बोला सर मैं अपने दिल से पुलिस का डर निकालना चाहता हूँ। मैंने कोई गलती नहीं की। सारे अपराध पुलिस ने किए। और मैं ही डरूँ? क्यों। इसलिए कि मैं आदिवासी हूँ। और आदिवासियों को पुलिस से डरना चाहिए?
    लिंगा वही लड़का है जिसे दंतेवाडा के तत्कालीन डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने जबरन एस0पी0ओ0 बनाने के लिए चालीस दिन तक दंतेवाडा थाने के शौचालय में भूखा रखा था और जिसे हम लोगों की मदद से उसकी बुआ सोनी सोरी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से मुक्त कराया था। उसके बाद इन दोनों अधिकारियों ने लिंगा की हत्या की कई असफल कोषिषें की। अंत में हमने उसे दिल्ली भेज दिया। वहाँ उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की। उसी दौरान डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी थी कि लिंगा कोडोपी कांग्रेसी नेता अवधेश गौतम के घर पर हुए हमले का मास्टर माइंड है। लेकिन जब दिल्ली में शोर मचा कि ये लड़का दिल्ली में है तो दंतेवाडा में कैसे हमला करेगा? तो परम ज्ञानी श्री विश्वरंजन जी ने कहा कि ये विज्ञप्ति गलती से जारी हो गई थी। खैर गलती तो इंसानों से हो ही जाती है। और अच्छे अच्छे पट कथाकार कई बार फ्लाप कहानी भी लिख देते हैं। तो इस बार ये कहानी पिट गई।
    मैंने उसे समझाने की बहुत कोषिष की और उससे कहा कि देखो दंतेवाडा में आदिवासियों का जो नरसंहार सरकार कर रही है उस को रोकने के लिए हम सब को काम करना है। तुम वहाँ जाओगे तो या तो सरकार कोई भी फर्जी मामला बना कर तुम्हे जेल में डाल देगी या फर्जी एन्काउन्टर दिखा कर तुम्हे नक्सली सिद्ध कर के मार देगी। वो बोला ऐसे कैसे मुझे नक्सली सिद्ध कर देंगे? मैंने कहा जो लोग नारायण देसाई जैसे प्रख्यात गांधीवादी और प्रोफेसर यशपाल जैसे अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को माओवादी समर्थक कह कर छत्तीसगढ़ में उनका जलूस निकलवा सकते हैं। उनके लिए तुम्हे माओवादी सिद्ध करना क्या मुष्किल है? छत्तीसगढ़ सरकार तो गुंडागर्दी पर उतरी हुई है।
    लिंगा मुझसे कहने लगा कि मेरे गाँव के लोग चाहते हैं कि मैं वहाँ का बन्द स्कूल और अस्पताल शुरू करवा दूँ। मैं ये काम करवा लूँ फिर आगे का सोचूँगा। आखिरकार हमारी इस बात पर सहमति बनी कि लिंगा तीन महीने दंतेवाडा के अपने गाँव में रहने के बाद दिल्ली आकर पत्रकारिता शुरू करेगा।
    लिंगा बीच बीच में मुझे फोन करता रहता था। उसने मुझे बताया कि वो बस्तर के कमिष्नर श्रीनिवासलू से और दंतेवाडा के कलेक्टर ओम प्रकाश  चैधरी से मिला है और उनको अपने साथ हुई पुरानी पुलिस ज्यादतियों और गाँव में लोगो की तकलीफों के बारे में बताया है। और ये कि इन दोनों ने उसे सहयोग का आष्वासन दिया है। इसके कुछ दिन बाद उसका फिर फोन आया कि सर मुझे नक्सलियों ने बुला कर डांटा है कि मैं इन सरकारी अधिकारियों से क्यों मिला? और ये भी कि नक्सली मुझसे कह रहे थे कि ज्यादा नेतागीरी मत करो! वो मुझसे पूछने लगा कि सर क्या मैं अपने लोगो के भले के लिए काम नहीं कर सकता?
    एक दिन उसका फोन आया और वो मुझे बताने लगा कि सर मैं आदिवासी विकास विभाग के एक अधिकारी से मिला और मैंने उनसे कहा कि आपने गाँव में कोई बिल्डिंग नहीं बनाई है पर कलेक्टर को बता दिया है कि बिल्डिंग बनाई गई है। मैं कलेक्टर को इसके बारे में बताऊँगा। इस पर वो अधिकारी महोदय गिड़गिड़ाने लगे और बोले कि आप को हम नई बिल्डिंगे बनाने का ठेका दे देंगे पर आप हमारी शिकायत मत करो। लिंगा ने बताया सर मैंने उन्हें बोला कि मैं यहाँ ठेकेदारी करने नहीं आया हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ आप गाँव में ईमानदारी से काम करें।
    इस बीच मई जून में मुझे अमरीका जाना पड़ा। एक दिन उसका फोन आया कि सर हम लोग बहुत मुसीबत में हैंै नक्सलियों ने मेरी बुआ सोनी सोरी के पिता अर्थात मेरे दादा का पूरा घर लूट लिया है और उनके पैर में गोली मार दी है। मैंने कहा ठीक हैैै। मैं तुरंत इस समाचार को सब को भेजता हूँ। तो उसने कहा कि नहीं मैं खुद दिल्ली आ रहा हूँ और मैं खुद इसके बारे में प्रेस को बताऊँगा।
    फिर उसका फोन आया कि सर मैं अपना एक मिट्टी का घर बना रहा हूँ। इस बीच उसने बताया कि वो थानेदार से मिला और अपनी मोटरसाइकिल वापिस माँगी तो थानेदार ने लिंगा से कहा कि अगर फिर से मोटर साइकिल माँगने आया तो तुझे किसी भी केस में फँसा कर अन्दर कर देंगे।
-हिमांशु  कुमार

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-2

इस बीच एस0एस0पी0 अमरेश  मिश्रा और डी0आई0जी0 कल्लूरी से लिंगा की बुआ सोनी और उसके पति अनिल मिले। दोनों से पुलिस अधिकारियों ने साफ-साफ कहा कि लिंगा ने कोर्ट में पुलिस की इज्जत खराब की है, उनके पास उसे मारने की ऊपर से छूट है, और उसे तो वे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।
    लिंगा मेरे दंतेवाडा वाले आश्रम में छिपा हुआ था। उसने पूछा, सर, मुझे क्या करना चाहिए?वह बार-बार कहता था, मैं बन्दूक उठा लूँगा। अगर मरना ही है, तो लड़ते हुए मरूँगा। मैंने कुछ सामाजिक संस्थाओं से बातचीत की और लिंगा को गोपनीय तौर पर दिल्ली भिजवा दिया। मेरे कुछ पत्रकार मित्रों ने सलाह दी कि बस्तर में कोई आदिवासी पत्रकार नहीं है। इसलिए लिंगा को पत्रकार बनने में मदद की जानी चाहिए। लिंगा का प्रवेदिल्ली के एक प्रख्यात पत्रकारिता संस्थान में हो गया।
    उधर छत्तीसगढ़ पुलिस को जब लिंगा के पत्रकार बनने की संभावना का पता चला, तो वह घबरा गई, क्योंकि लिंगा छत्तीसगढ़ पुलिस के अत्याचारों का गवाह था और पत्रकार बनने के बाद वह दंतेवाडा में पुलिस की करतूतों का पोल खोल सकता था। आनन-फानन में विश्वरंजन और कल्लूरी ने एक वक्तव्य मीडिया के लिए जारी किया कि लिंगा कोड़ोपी एक बड़ा नक्सली नेता है और माओवादी पार्टी ने अपने प्रवक्ता आजाद के मरने के बाद लिंगा को उनकी जगह नियुक्त किया है, और लिंगा को नक्सलवाद की ट्रेनिंग के लिए अमरीका भेजा गया था (जबकि लिंगा के पास कोई पासपोर्ट नहीं है) और उसका सम्बन्ध अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर, हिमांशु  कुमार  और नंदिनी सुन्दर से है।
    इस प्रेस वक्तव्य के बाद स्वामी अग्निवे ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की तथा चुनौती दी की लिंगा यहाँ है और एक सीधा सादा आदिवासी युवक है जो पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा है और अगर पुलिस के पास कोई सबूत है तो सामने आए। इसके बाद पुलिस ने माफीनामा जारी किया और छत्तीसगढ़ के डी0जी0पी0 विश्वरंजन ने वक्तव्य दिया कि लिंगा के विषय में पिछला वक्तव्य गलती से जारी हो गया था। परन्तु पुलिस भीतर ही भीतर लिंगा को दबोचने का षड्यंत्र रचने में लगी रही, और उसने लिंगा की बुआ सोनी और उसके पति अनिल के विरुद्ध फर्जी रिपोर्ट लिखकर अनिल को तीन महीने से जेल में डाला हुआ है, और सोनी के विरुद्ध वारंट जारी कर दिया है। सोनी वारंट के बावजूद एस0एस0पी0 कल्लूरी से कई बार मिली। हर बार उसने सोनी से एक ही शर्त रखी-कि लिंगा को दिल्ली से वापस लाकर पुलिस को सौंप दिया जाए, तभी वे उसे और उसके पति को छोड़ देंगे, और लिंगा को गोली से उड़ा देंगे।
    सोनी सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल है। रोज स्कूल जाती है, हाजिरी दर्ज करती है और इसे फरार घोषित कर दिया गया है, ताकि इस आदिवासी महिला को कभी भी गोली मार दी जा सके।
    क्या कोई इस निर्दोष लड़की की जान बचाएगा? कहाँ हैं इस देश  के महान मीडिया के दिग्गज? कहाँ है देषभक्ति की ठेकेदार भाजपा? और कहाँ हैं आदिवासियों के सिपाही राहुल गाँधी? मैं रोज इस आशका से जागता हूँ कि सोनी सोरी के मौत की या उसके जेल में डाल देने की खबर आएगी। वह रोज मुझे फोन कर के उसे बचाने का निवेदन करती है। क्या कोई है जो इस महान लोकतंत्र में, इस महाशक्ति बनने जा रहे भारत में, जो इस असहाय, अकेली आदिवासी लड़की को सत्ता और व्यापार के क्रूर पंजों से बचा सके?
    अपने निर्माण के दस साल बाद छत्तीसगढ़ लोकतंत्र के नाम पर एक धब्बा बना हुआ है। लेकिन क्योंकि वहाँ से खनिज पदार्थ लूटना है, जिसमें मनमोहन सिंह, चिदंबरम, कांग्रेस और भाजपा सबकी हिस्सेदारी है, इसलिए छत्तीसगढ़ में इस आतंकवादी शासन पर सब खामोशहैं. लेकिन ये सब लोग फासीवादी खेल खेल रहे हैं जिसका फायदा नक्सलियों को हो रहा है।
    पिछले दिनों मैंने दंतेवाडा जिले की एक आदिवासी लड़की सोनी सोरी के मुष्किल हालात पर एक लेख लिखा था।
जिसमें उसके भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से वापिस बुला कर पुलिस के हाथों में सौंप देने के लिए वहाँ का एस0एस0पी0 कल्लूरी इस लडकी से सौदेबाजी कर रहा है। पहले तो उसने धमकी दी कि अगर इस लड़की सोनी सोरी ने अपने भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से लाकर पुलिस को नहीं सौंपा तो पुलिस इस लड़की की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इसके बाद कल्लूरी नें अपनी धमकी पर अमल करते हुए इस लड़की के पति को जेल में डाल दिया तथा इनकी जीप को जप्त कर लिया और इस लड़की को भी नक्सलियों के साथ मिल कर थाने पर और एक कांग्रेसी नेता के घर पर हमला करने के दो मामलों में फंसा दिया और इसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। इसके बाद इस लड़की ने मुझसे मदद करने की गुहार की। लेकिन आखिर इस दे में दंतेवाडा के एस0एस0पी0 कल्लूरी से ऊपर तो कोई है नहीं। इसलिए मैं इस लड़की की कोई मदद नहीं नहीं कर पाया। हालाँकि मैं मीडिया, एक्टिविस्टों और नेताओं से इस लड़की की मदद के लिए मिला, मदद के नाम पर सबने हाथ खड़े कर दिए। इसलिए मैं इस लड़की की कोई मदद नहीं कर पाया। अंत में मैंने इस उम्मीद में एक लेख लिखा की शायद इस लड़की की जिंदगी को बर्बाद होने से कोई तो बचाएगा। मुझे उम्मीद थी कि आखिर इस विशाल और महान देश में कोई न कोई तो उसकी मदद करेगा।
    अभी बिनायक सेन को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद टेलीवीजन पर ऐसे बहुत से बहादुर लोग बोलते हुए दिखते हैं जो अदालत, सरकार, और लोकतंत्र की तारीफ में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। और सफलतापूर्वक ये सिद्ध कर रहे हैं कि हम जैसे लोगों को न्याय व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए क्योंकि उससे देश कमजोर होता है। तो देष की मजबूती की रक्षा की खातिर मैंने सब बातों को स्वीकार कर लिया और उनकी बातें सुन कर मुझे भी खुद के विचारों पर शक और इस देश की व्यवस्था पर विष्वास सा होने लगा था।
-हिमांशु  कुमार

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