हिमांशु कुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिमांशु कुमार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 जून 2013

सीता हारेगी तो कौन जीतेगा ? नक्सली या सरकार ?

Who will win when SITA will lose? Maoists or the government?सीता की उम्र लगभग सत्रह साल. शाम को अपने घर में बर्तन साफ़ कर रही थी. तभी सलवा जुडूम और सुरक्षा बलों ने गाँव पर हमला बोल दिया. गाँव के लोग जान बचाने के लिये जंगल की तरफ भागने लगे. सीता के माँ बाप भी घर पर ही थे. तभी चार एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) ने सीता के घर पर धावा बोल दिया.
एक पुलिस अधिकारी ने सीता की चोटी पकड़ी और घर के भीतर ले कर जाने के लिये घसीटने लगा. सीता के माता पिता ने बेटी को बचाने की कोशिश की. दो पुलिस अधिकारियों ने सीता के माँ बाप को बन्दूक के कुंदे से मार कर गिरा दिया. एक पुलिस अधिकारी ने सीता को पशु की तरह कंधे पर उठा कर घर के भीतर ले जाकर पटक दिया. चारों पुलिस अधिकारियों ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. बूढ़े माँ बाप दरवाजा पीट-पीट कर अपनी बेटी को छोड़ देने की प्रार्थना करते रहे.
चारों पुलिस अधिकारियों ने सीता से बलात्कार करने के बाद… सीता के कान और नाक में पहने नथ और कुंडल खींच लिये. सीता के पिता ने बैल खरीदने के लिये दस हज़ार रूपये भी घर में पेटी में रखे थे. पुलिस अधिकारियों ने वो रूपये भी लूट लिये. इसके बाद सीता को ज़मीन पर पड़ा छोड़ कर चारों पुलिस अधिकारी अपने अन्य साथियों के साथ दूसरे आदिवासियों के घरों में लूटपाट करने चल दिये.
सीता हिम्मती लड़की थी. उसने अगले दिन अपने पिता से कहा कि मैं इस घटना की शिकायत थाने में कराऊंगी और इन चारों को सजा दिलवाऊंगी. सीता थाने पहुँची. सीता से बलात्कार करने वाले बलात्कारी थाने में ही थे. वे चारों बलात्कारी पुलिस अधिकारी सीता को देखकर थानेदार के पास कुर्सियों पर आ कर बैठ गये. सीता ने अपने साथ घटी बलात्कार की घटना के बारे में थानेदार को बताया. थानेदार हँसने लगा उसके साथ चारों बलात्कारी भी हँसने लगे. थानेदार ने कहा जल्दी यहाँ से भाग जा नहीं तो दुबारा बलात्कार हो जाएगा.
सीता और उसके पिता वापिस आ गये. सीता नी हार नहीं मानी. उसे कहीं से हमारे बारे में पता चला. सीता हमारे आश्रम आयी. हमने सीता की शिकायत पुलिस अधीक्षक को भेजी. पुलिस अधीक्षक ने कार्यवाही तो दूर महीने भर तक कोई जवाब भी नहीं दिया. फिर हम कोर्ट में गये.
कोर्ट ने चारों आरोपी विशेष पुलिस अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिये समन भेजा. ये चारों आरोपी नहीं आये. कोर्ट ने इन चारों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया. इन चारों के नाम हैं- किच्चे नंदा जो पुलिस अधीक्षक का बाडी गार्ड है. दूसरा है विजय जो कोंटा ब्लॉक कांग्रेस का अध्यक्ष है. मंगल और राजू पुलिस अधिकारी हैं और वे भी थाने की भीतर ही रहते हैं.
सरकार ने कोर्ट में कहा कि ये चारों विशेष पुलिस अधिकारी फ़रार हैं और निकट भविष्य में इनके मिलने की कोई आशा भी नहीं है. अदालत ने केस को अभिलेखागार में बंद करके रखने का आदेश दे दिया.
इधर मैं दिल्ली आकर गृह मंत्री श्री चिदम्बरम से मिला और उन्हें दंतेवाड़ा आकर आदिवासियों की शिकायतें सुनने का सुझाव दिया. चिदम्बरम को मैंने एक सीडी भी सौंपी जिसमे इस बलात्कार कांड का भी ज़िक्र था.
श्री चिदम्बरम के दंतेवाड़ा आकर सीता से मिलने के दो सप्ताह पहले बलात्कारी पुलिस अधिकारी पूरे पुलिस दल बल के साथ सीता के गाँव में आये और सीता और उसकी तीन और बलात्कार पीड़ित सहेलियों समेत उठा कर थाने ले आये. थाने में फिर से वही बलात्कारों का दौर शुरू हुआ जो पांच दिन चलता रहा. इस बार थाने में इन्हें पीटा भी गया और पांच दिन तक खाना नहीं दिया गया.
सीता के गाँव से मुझे फोन आया. मैंने श्री चिदम्बरम को , देश के गृह सचिव को , छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को , छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक को , दंतेवाड़ा के कलेक्टर को और पुलिस अधीक्षक को फोन पर सूचना दी. मैंने प्रार्थना की कि इन लड़कियों को बचा लीजिए. लेकिन किसी ने इन लड़कियों को नहीं बचाया.
पांच दिन बाद सीता और उसकी तीन सहेलियों को पुलिस ने वापिस लाकर गाँव के चौराहे पर फेंक दिया और गांव वालों को चेतावनी दी कि अब अगर किसी ने हिमांशु से बात की तो पूरे गाँव को आग लगा देंगे.
इसके बाद मैं सीता और उसकी सहेलियों से मिलने उनके गाँव पहुंचा. पुलिस विभाग ने मेरे पीछे एक जीप भर कर पुलिस वाले लगा दिये. गाँव वालों ने रोते हुए हाथ जोड़ कर कहा मैं वापिस चला जाऊं, उन्हें अब मेरी और मदद नहीं चाहिये.
ये बलात्कारी अभी भी खुलेआम नए गावों पर हमले कर रहे हैं. नई लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं. पिछले साल इन लोगों ने फिर से तीन गावों को जला दिया. जब स्वामी अग्निवेश इन जले हुए गाँव वालों के लिये राहत सामग्री लेकर दंतेवाड़ा पहुँचे तो इसी विजय के नेतृत्व में विशेष पुलिस अधिकारियों के दल ने स्वामी अग्निवेश के दल पर हमला किया. बाकी के बलात्कारी भी थाने में ही रहते हैं और नियमित सरकारी वेतन लेते हैं. लेकिन सरकार इन्हें कोर्ट में फरार बताती है.
मैं नहीं जानता सीता और उसकी तीनो सहेलियां अब किस हाल में हैं. पर इस लड़ाई में सीता नहीं हारी बल्कि इस देश के लोकतंत्र ने सीता के सामने दम तोड़ दिया है
- हिमांशु  कुमार 


सोमवार, 18 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-3

लेकिन फिर कल एक फोन ने मेरे सारे विश्वास को डगमगा दिया। दंतेवाड़ा से फिर उसी आदिवासी लडकी ने मुझे बताया की सर, दंतेवाडा के एस0एस0पी0 कल्लूरी नें दो नई नक्सली वारदातों में फिर से उसका नाम जोड़ दिया है और अदालत में उसके खिलाफ चालान भी पेश  कर दिया है। वो लड़की रो रही थी कि सर मैं तो रोज अपने स्कूल में पढ़ाती हूँ, वहाँ मेरी हाजिरी लगी हुई है, मैं जेल में अपने पति से मिलने भी जाती हूँ और जेल के रजिस्टर में दस्तखत भी करती हूँ। लेकिन फिर भी एस0एस0पी0 कल्लूरी ने मुझे फरार घोषित कर दिया है और मुझे मारने की फिराक में है। फोन के उस तरफ वो लड़की रोती जा रही थी और फोन के इस तरफ मैं गुस्से, बेबसी, और असमंजस की हालत में उसका रोना सुनता जा रहा था।
    लाखों लोग इस देश  की आजादी के लिए लड़े थे मेरे पिता भी लड़े थे। क्या यही दिन देखने के लिए उन सारे लोगों ने कुर्बानी दी थी? क्या भगत सिंह इस तरह के देश के लिए शहीद हुए थे? कम से कम मुझे कोई ये तो बता दे की मुझे क्या करना चाहिए? आदिवासी होता तो बन्दूक उठा सकता था। पर सबने गांधीवादी कह कह कर मुझे इतना इज्जतदार बना दिया है कि अब मैं हर अन्याय पर बस इन्टरनेट पर एक लेख लिखता हूँ और सोच लेता हूँ की काफी देश  सेवा हो गई। अब तो मीडिया वालों ने मेरे फोन भी उठाने बंद कर दिए हैं।
    क्या कोई मेरी बात सुन रहा है? हेल्लो? मीडिया, सरकार, न्याय पालिका? है कोई गरीब जनता, आदिवासियों की बात सुनने वाला? क्या कोई बचा है? कम से कम इस लोकतंत्र को बचाने की आखिरी कोषिष तो कर लो, कोई है जो इस बेबस आदिवासी लड़की को बचा सकता है?
    इस बार जब लिंगा दिल्ली से दंतेवाडा जाने लगा तो मैंने उसे जोर से भींच कर गले से लगा लिया। मैंने कहा लिंगा मेरा दिल कह रहा है कि हम अंतिम बार मिल रहे हैं। वो हँसने लगा। और बोला सर मैं अपने दिल से पुलिस का डर निकालना चाहता हूँ। मैंने कोई गलती नहीं की। सारे अपराध पुलिस ने किए। और मैं ही डरूँ? क्यों। इसलिए कि मैं आदिवासी हूँ। और आदिवासियों को पुलिस से डरना चाहिए?
    लिंगा वही लड़का है जिसे दंतेवाडा के तत्कालीन डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने जबरन एस0पी0ओ0 बनाने के लिए चालीस दिन तक दंतेवाडा थाने के शौचालय में भूखा रखा था और जिसे हम लोगों की मदद से उसकी बुआ सोनी सोरी ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से मुक्त कराया था। उसके बाद इन दोनों अधिकारियों ने लिंगा की हत्या की कई असफल कोषिषें की। अंत में हमने उसे दिल्ली भेज दिया। वहाँ उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की। उसी दौरान डी0आई0जी0 कल्लूरी और एस0पी0 अमरेश  मिश्रा ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी थी कि लिंगा कोडोपी कांग्रेसी नेता अवधेश गौतम के घर पर हुए हमले का मास्टर माइंड है। लेकिन जब दिल्ली में शोर मचा कि ये लड़का दिल्ली में है तो दंतेवाडा में कैसे हमला करेगा? तो परम ज्ञानी श्री विश्वरंजन जी ने कहा कि ये विज्ञप्ति गलती से जारी हो गई थी। खैर गलती तो इंसानों से हो ही जाती है। और अच्छे अच्छे पट कथाकार कई बार फ्लाप कहानी भी लिख देते हैं। तो इस बार ये कहानी पिट गई।
    मैंने उसे समझाने की बहुत कोषिष की और उससे कहा कि देखो दंतेवाडा में आदिवासियों का जो नरसंहार सरकार कर रही है उस को रोकने के लिए हम सब को काम करना है। तुम वहाँ जाओगे तो या तो सरकार कोई भी फर्जी मामला बना कर तुम्हे जेल में डाल देगी या फर्जी एन्काउन्टर दिखा कर तुम्हे नक्सली सिद्ध कर के मार देगी। वो बोला ऐसे कैसे मुझे नक्सली सिद्ध कर देंगे? मैंने कहा जो लोग नारायण देसाई जैसे प्रख्यात गांधीवादी और प्रोफेसर यशपाल जैसे अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को माओवादी समर्थक कह कर छत्तीसगढ़ में उनका जलूस निकलवा सकते हैं। उनके लिए तुम्हे माओवादी सिद्ध करना क्या मुष्किल है? छत्तीसगढ़ सरकार तो गुंडागर्दी पर उतरी हुई है।
    लिंगा मुझसे कहने लगा कि मेरे गाँव के लोग चाहते हैं कि मैं वहाँ का बन्द स्कूल और अस्पताल शुरू करवा दूँ। मैं ये काम करवा लूँ फिर आगे का सोचूँगा। आखिरकार हमारी इस बात पर सहमति बनी कि लिंगा तीन महीने दंतेवाडा के अपने गाँव में रहने के बाद दिल्ली आकर पत्रकारिता शुरू करेगा।
    लिंगा बीच बीच में मुझे फोन करता रहता था। उसने मुझे बताया कि वो बस्तर के कमिष्नर श्रीनिवासलू से और दंतेवाडा के कलेक्टर ओम प्रकाश  चैधरी से मिला है और उनको अपने साथ हुई पुरानी पुलिस ज्यादतियों और गाँव में लोगो की तकलीफों के बारे में बताया है। और ये कि इन दोनों ने उसे सहयोग का आष्वासन दिया है। इसके कुछ दिन बाद उसका फिर फोन आया कि सर मुझे नक्सलियों ने बुला कर डांटा है कि मैं इन सरकारी अधिकारियों से क्यों मिला? और ये भी कि नक्सली मुझसे कह रहे थे कि ज्यादा नेतागीरी मत करो! वो मुझसे पूछने लगा कि सर क्या मैं अपने लोगो के भले के लिए काम नहीं कर सकता?
    एक दिन उसका फोन आया और वो मुझे बताने लगा कि सर मैं आदिवासी विकास विभाग के एक अधिकारी से मिला और मैंने उनसे कहा कि आपने गाँव में कोई बिल्डिंग नहीं बनाई है पर कलेक्टर को बता दिया है कि बिल्डिंग बनाई गई है। मैं कलेक्टर को इसके बारे में बताऊँगा। इस पर वो अधिकारी महोदय गिड़गिड़ाने लगे और बोले कि आप को हम नई बिल्डिंगे बनाने का ठेका दे देंगे पर आप हमारी शिकायत मत करो। लिंगा ने बताया सर मैंने उन्हें बोला कि मैं यहाँ ठेकेदारी करने नहीं आया हूँ। बल्कि मैं चाहता हूँ आप गाँव में ईमानदारी से काम करें।
    इस बीच मई जून में मुझे अमरीका जाना पड़ा। एक दिन उसका फोन आया कि सर हम लोग बहुत मुसीबत में हैंै नक्सलियों ने मेरी बुआ सोनी सोरी के पिता अर्थात मेरे दादा का पूरा घर लूट लिया है और उनके पैर में गोली मार दी है। मैंने कहा ठीक हैैै। मैं तुरंत इस समाचार को सब को भेजता हूँ। तो उसने कहा कि नहीं मैं खुद दिल्ली आ रहा हूँ और मैं खुद इसके बारे में प्रेस को बताऊँगा।
    फिर उसका फोन आया कि सर मैं अपना एक मिट्टी का घर बना रहा हूँ। इस बीच उसने बताया कि वो थानेदार से मिला और अपनी मोटरसाइकिल वापिस माँगी तो थानेदार ने लिंगा से कहा कि अगर फिर से मोटर साइकिल माँगने आया तो तुझे किसी भी केस में फँसा कर अन्दर कर देंगे।
-हिमांशु  कुमार

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-2

इस बीच एस0एस0पी0 अमरेश  मिश्रा और डी0आई0जी0 कल्लूरी से लिंगा की बुआ सोनी और उसके पति अनिल मिले। दोनों से पुलिस अधिकारियों ने साफ-साफ कहा कि लिंगा ने कोर्ट में पुलिस की इज्जत खराब की है, उनके पास उसे मारने की ऊपर से छूट है, और उसे तो वे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।
    लिंगा मेरे दंतेवाडा वाले आश्रम में छिपा हुआ था। उसने पूछा, सर, मुझे क्या करना चाहिए?वह बार-बार कहता था, मैं बन्दूक उठा लूँगा। अगर मरना ही है, तो लड़ते हुए मरूँगा। मैंने कुछ सामाजिक संस्थाओं से बातचीत की और लिंगा को गोपनीय तौर पर दिल्ली भिजवा दिया। मेरे कुछ पत्रकार मित्रों ने सलाह दी कि बस्तर में कोई आदिवासी पत्रकार नहीं है। इसलिए लिंगा को पत्रकार बनने में मदद की जानी चाहिए। लिंगा का प्रवेदिल्ली के एक प्रख्यात पत्रकारिता संस्थान में हो गया।
    उधर छत्तीसगढ़ पुलिस को जब लिंगा के पत्रकार बनने की संभावना का पता चला, तो वह घबरा गई, क्योंकि लिंगा छत्तीसगढ़ पुलिस के अत्याचारों का गवाह था और पत्रकार बनने के बाद वह दंतेवाडा में पुलिस की करतूतों का पोल खोल सकता था। आनन-फानन में विश्वरंजन और कल्लूरी ने एक वक्तव्य मीडिया के लिए जारी किया कि लिंगा कोड़ोपी एक बड़ा नक्सली नेता है और माओवादी पार्टी ने अपने प्रवक्ता आजाद के मरने के बाद लिंगा को उनकी जगह नियुक्त किया है, और लिंगा को नक्सलवाद की ट्रेनिंग के लिए अमरीका भेजा गया था (जबकि लिंगा के पास कोई पासपोर्ट नहीं है) और उसका सम्बन्ध अरुंधती रॉय, मेधा पाटकर, हिमांशु  कुमार  और नंदिनी सुन्दर से है।
    इस प्रेस वक्तव्य के बाद स्वामी अग्निवे ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की तथा चुनौती दी की लिंगा यहाँ है और एक सीधा सादा आदिवासी युवक है जो पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा है और अगर पुलिस के पास कोई सबूत है तो सामने आए। इसके बाद पुलिस ने माफीनामा जारी किया और छत्तीसगढ़ के डी0जी0पी0 विश्वरंजन ने वक्तव्य दिया कि लिंगा के विषय में पिछला वक्तव्य गलती से जारी हो गया था। परन्तु पुलिस भीतर ही भीतर लिंगा को दबोचने का षड्यंत्र रचने में लगी रही, और उसने लिंगा की बुआ सोनी और उसके पति अनिल के विरुद्ध फर्जी रिपोर्ट लिखकर अनिल को तीन महीने से जेल में डाला हुआ है, और सोनी के विरुद्ध वारंट जारी कर दिया है। सोनी वारंट के बावजूद एस0एस0पी0 कल्लूरी से कई बार मिली। हर बार उसने सोनी से एक ही शर्त रखी-कि लिंगा को दिल्ली से वापस लाकर पुलिस को सौंप दिया जाए, तभी वे उसे और उसके पति को छोड़ देंगे, और लिंगा को गोली से उड़ा देंगे।
    सोनी सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल है। रोज स्कूल जाती है, हाजिरी दर्ज करती है और इसे फरार घोषित कर दिया गया है, ताकि इस आदिवासी महिला को कभी भी गोली मार दी जा सके।
    क्या कोई इस निर्दोष लड़की की जान बचाएगा? कहाँ हैं इस देश  के महान मीडिया के दिग्गज? कहाँ है देषभक्ति की ठेकेदार भाजपा? और कहाँ हैं आदिवासियों के सिपाही राहुल गाँधी? मैं रोज इस आशका से जागता हूँ कि सोनी सोरी के मौत की या उसके जेल में डाल देने की खबर आएगी। वह रोज मुझे फोन कर के उसे बचाने का निवेदन करती है। क्या कोई है जो इस महान लोकतंत्र में, इस महाशक्ति बनने जा रहे भारत में, जो इस असहाय, अकेली आदिवासी लड़की को सत्ता और व्यापार के क्रूर पंजों से बचा सके?
    अपने निर्माण के दस साल बाद छत्तीसगढ़ लोकतंत्र के नाम पर एक धब्बा बना हुआ है। लेकिन क्योंकि वहाँ से खनिज पदार्थ लूटना है, जिसमें मनमोहन सिंह, चिदंबरम, कांग्रेस और भाजपा सबकी हिस्सेदारी है, इसलिए छत्तीसगढ़ में इस आतंकवादी शासन पर सब खामोशहैं. लेकिन ये सब लोग फासीवादी खेल खेल रहे हैं जिसका फायदा नक्सलियों को हो रहा है।
    पिछले दिनों मैंने दंतेवाडा जिले की एक आदिवासी लड़की सोनी सोरी के मुष्किल हालात पर एक लेख लिखा था।
जिसमें उसके भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से वापिस बुला कर पुलिस के हाथों में सौंप देने के लिए वहाँ का एस0एस0पी0 कल्लूरी इस लडकी से सौदेबाजी कर रहा है। पहले तो उसने धमकी दी कि अगर इस लड़की सोनी सोरी ने अपने भांजे लिंगा कोडोपी को दिल्ली से लाकर पुलिस को नहीं सौंपा तो पुलिस इस लड़की की जिंदगी बर्बाद कर देगी। इसके बाद कल्लूरी नें अपनी धमकी पर अमल करते हुए इस लड़की के पति को जेल में डाल दिया तथा इनकी जीप को जप्त कर लिया और इस लड़की को भी नक्सलियों के साथ मिल कर थाने पर और एक कांग्रेसी नेता के घर पर हमला करने के दो मामलों में फंसा दिया और इसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। इसके बाद इस लड़की ने मुझसे मदद करने की गुहार की। लेकिन आखिर इस दे में दंतेवाडा के एस0एस0पी0 कल्लूरी से ऊपर तो कोई है नहीं। इसलिए मैं इस लड़की की कोई मदद नहीं नहीं कर पाया। हालाँकि मैं मीडिया, एक्टिविस्टों और नेताओं से इस लड़की की मदद के लिए मिला, मदद के नाम पर सबने हाथ खड़े कर दिए। इसलिए मैं इस लड़की की कोई मदद नहीं कर पाया। अंत में मैंने इस उम्मीद में एक लेख लिखा की शायद इस लड़की की जिंदगी को बर्बाद होने से कोई तो बचाएगा। मुझे उम्मीद थी कि आखिर इस विशाल और महान देश में कोई न कोई तो उसकी मदद करेगा।
    अभी बिनायक सेन को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद टेलीवीजन पर ऐसे बहुत से बहादुर लोग बोलते हुए दिखते हैं जो अदालत, सरकार, और लोकतंत्र की तारीफ में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। और सफलतापूर्वक ये सिद्ध कर रहे हैं कि हम जैसे लोगों को न्याय व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिए क्योंकि उससे देश कमजोर होता है। तो देष की मजबूती की रक्षा की खातिर मैंने सब बातों को स्वीकार कर लिया और उनकी बातें सुन कर मुझे भी खुद के विचारों पर शक और इस देश की व्यवस्था पर विष्वास सा होने लगा था।
-हिमांशु  कुमार

बुधवार, 13 मार्च 2013

पता नहीं इस लड़की का क्या होगा?-1

दंतेवाडा से मुझे तीन माह पहले एक आदिवासी महिला का फोन आया, सर, दंतेवाडा का एस.एस.पी. कल्लूरी मुझसे कह रहा है कि अगर तुम अपने भतीजे लिंगा को दिल्ली से वापिस बुलाकर हमें नहीं सौंपोगी, तो हम तुम्हारी जिन्दगी बर्बाद कर देंगे और आज तीन माह के बाद वह लड़की मुझे बताती है, सर, आपने कुछ नहीं किया, और इस बीच पुलिस ने मेरे पति को जेल में डाल दिया है और मेरे खिलाफ दो एफ.आई.आर. लिख दी हैं, जिसमें एक थाने पर हमला करने और दूसरी एक राजपूत कांग्रेसी नेता अवधेश  गौतम के घर में नक्सलियों के साथ मिलकर हमला करने का आरोप लगाती हैं।
    वह लड़की मुझसे रोकर कहती है, सर, मेरे तीन बच्चे हैं। मैं कैसे थाने पर और कांग्रेसी नेता पर हमला करने जाऊँगी?वह कहती है, मैं जाकर कल्लूरी से मिलकर रोई, गिड़-गिड़ाई। पर उसकी एक ही शर्त थी कि दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे लिंगा कोडोपी को लाकर पुलिस को सौंपा जाए, तभी उसे और मेरे पति को इस मामले से मुक्त किया जाएगा।
    इस आदिवासी लड़की को मैंने आज से बारह साल पहले पहली बार देखा था। तब वह बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। बस्तर में विनोबा भावे के शिष्य पद्मश्री  धर्मपाल सैनी शिक्षण संस्थाएँ चलाते हैं। मैं और मेरी पत्नी अक्सर इस शिक्षण संस्था में जाकर बच्चों से मिलते थे। वहीं पर सोनी नामक लड़की हमें मिली थी। तब इसके चाचा नंदा राम सोरी दंतेवाडा से सी.पी.आई. के एम.एल.ए. थे।
    बारह साल के अंतराल के बाद यह लड़की पिछले साल अक्टूबर में फिर मेरे पास आई और उसने बताया कि उसके भतीजे लिंगाराम कोडोपी को पुलिस घर से उठा कर ले गई है और उस पर एस0पी0ओ0 बनने का दबाव डाल रही है, और उसे दंतेवाडा थाने के शौचालय में छिपा कर रखा हुआ है। एस0एस0पी0 अमरेश  मिश्रा और डी0आई0जी0 कल्लूरी उसकी नित्य पिटाई करते हैं।
    मैंने तुरंत हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस दायर करने की सलाह दी। सोनी की सलाह पर लिंगा के बड़े भाई मासाराम कोडोपी ने बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपने भाई लिंगा को कोर्ट में पेश  करने का आवेदन दिया। पुलिस ने कोर्ट में कहा कि लिंगा अपनी मर्जी से एस0पी0ओ0 बना हुआ है। कोर्ट ने लिंगा को हाजिर करने का हुक्म दिया और कोर्ट में लिंगा ने कह दिया कि वह एस0पी0ओ0 नहीं बनना चाहता, बल्कि अपने घर जाना चाहता है। कोर्ट ने पुलिस से लिंगा को तुरंत छोड़ने और घर जाने देने का आदेश  किया।
    कोर्ट से घर वापिस आते समय लिंगा को अहसास था कि पुलिस उसे घर तक नहीं पहुँचने देगी क्योंकि थाने में कैद के दौरान एस0पी0 अमरेश मिश्रा और डी0आई0जी0 कल्लूरी ने उससे और उसके परिवार वालों से कहा था कि अगर इस लड़के लिंगा को वे अदालत के सहारे पुलिस से छुड़वा भी लेंगे, तो पुलिस उसे बाद में गोली से उड़ा देगी और एन्काउंटर बता देगी। इस धमकी को याद रखते हुए लिंगा रास्ते में अपनी गाड़ी से उतर गया और अपने एक मित्र के घर रुक गया। उधर जैसा कि आदेश था, पुलिस ने लिंगा को पकड़ने के लिए आगे नाकाबंदी की हुई थी। लिंगा के परिवार की गाड़ी रुकवाई गई। पर लिंगा को न पाकर एस0पी0 अमरेश मिश्रा और डी0आई0जी0 कल्लूरी की हवाइयाँ उड़ गईं। उन्होंने लिंगा के छिपने के ठिकाने के बारे में पूछताछ करने के लिए लिंगा के बड़े भाई मासा राम कोडोपी को रास्ते में पकड़ लिया।
    लिंगा को इस बात का पता चला, तो छिपते-छिपते मेरे पास आया। हमने तुरंत हाई कोर्ट को फैक्स द्वारा शिकायत भेजी कि हाई कोर्ट में शिकायत दर्ज करने वाले को ही पुलिस ने गायब कर दिया है। फैक्स मिलने पर अगले दिन हाई कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस से जब लिंगा के भाई के बारे में नोटिस जारी कर जवाब पूछा, तो पुलिस ने लिंगा के भाई को दो दिन के बाद छोड़ दिया।
    लेकिन एक हफ्ते के बाद फिर लिंगा को मारने के लिए रात को उसके गाँव पर हमला कर दिया गया। लिंगा को इस बात का अंदेशा  तो था ही। इसलिए वह अपने घर न सोकर गाँव के बाहर एक खँडहर में सोया था। पुलिस ने गाँव के हर घर में घुसकर लिंगा को तलाश  किया। लेकिन जब लिंगा नहीं मिला, तो पुलिस उसके बूढ़े बाप और गाँव के पाँच और लोगों को पकड़कर लिंगा के बारे में पूछताछ करने ले गई। लिंगा फिर मेरे पास आया, और इस समय वह बहुत गुस्से में था। वह बार-बार बड़बड़ा रहा था, ठीक है, अगर सरकार ऐसा करेगी, तो मैं भी नक्सलवादियों के साथ मिल जाता हूँ। मैंने उससे कहा, लिंगा, सरकार यही चाहती है कि आदिवासी लड़के बन्दूक उठाएँ, जिससे सरकार को उन्हें मार देने का बहाना मिल जाए। हम कानून की लड़ाई लड़ेंगे, गलती से भी बंदूक मत उठाना। हम लोगों ने फिर से एक शिकायत लिखकर राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट, प्रधान मंत्री, मानवाधिकार आयोग, डी0जी0पी0, एस0पी0 आदि को भेजी। पुलिसने एक हफ्ते बाद लिंगा के पिता को छोड़ दिया। बाकी के पाँच गाँव वालों को एक महीने के बाद छोड़ा गया। इस पूरे मामले में भी सोनी सोरी लगातार गाँव वालों को छुड़ाने में लगी रही इस बीच पुलिस की टीमें लिंगा को लगातार गाँव में जाकर मार डालने के लिए ढूँढती रहीं, हालाँकि उसका कोई अपराध नहीं था। कोर्ट से उसे संरक्षण प्राप्त था। लेकिन छत्तीसगढ़ में पुलिस और सरकार कोर्ट को पैरों की जूती समझती है।
-हिमांशु  कुमार
Share |