गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

सांप्रदायिक हिंसा में पुलिस की भूमिका -भाग2


 सन 2002 के कत्लआम में अल्पसंख्यक समुदाय को, हथियारों से लैस, विशाल हिंसक भीड़ के हमलों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, पुलिस की गोलियों का शिकार बनने वालों में भी उनकी ही बहुसंख्या थी। अहमदाबाद में 28 फरवरी को 40 लोग पुलिस की गोलियों से मारे गए। वे सभी मुसलमान थे। ये आंकड़े गुजरात पुलिस के है। उसी वर्ष की 3 मई को द हिन्दुस्तान टाईम्स में प्रकाशित विनय मोहन की रपट के अनुसार, हिंसा की शुरूआत से लेकर 2 मई तक, पुलिस द्वारा गोलीचालन में कुल 184 व्यक्ति मारे गए, जिनमे से 104 मुसलमान थे। सच तो यह है कि गुजरात पुलिस, दंगाईयों की पूरी मदद कर रही थी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि आम हिन्दुओं की तरह, पुलिसकर्मियों में भी मुसलमानों के विरूद्ध पूर्वाग्रह हैं। वे भी यह मानते हैं कि मुसलमान स्वभाव से ही क्रुर और हिंसक होते हैं। वे यह भी मानते हैं कि दंगों को तब ही नियंत्रित किया जा सकता है जब दंगों की शुरूआत करने वाले मुसलमानों को सबक सिखाया जाए। जब भी सरकार पुलिस को दंगों पर प्रभावी ंग से नियंत्रण करने का निर्देश देती है तो इस निर्देश का यही अर्थ निकाला जाता है कि मुसलमानों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। वी.एन. राय, भागलपुर और बंबई में पुलिसकर्मियों से अपनी चर्चा का हवाला देते हुए लिखते हैं कि उनमें से अधिकांश यह मानते थे कि हिन्दू, अहिंसक और धर्मभीरू होते हैं। जब उन्हें यह बताया गया कि दंगों में हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों को अधिक नुकसान हुआ है तब भी वे इसी बात पर अड़े रहे।
सन 1984 में भिवण्डी में हुए दंगों की अपनी जांच में डॉ. असगर अली इंजीनियर ने पाया कि वहां तैनात स्टेट रिजर्व पुलिस के जवान, बिना किसी अपवाद के, शिवसेना शाखाओं के परिसर में ही आराम करते थे। वे मुस्लिम घरों के नजदीक के किसी स्थान पर कभी नहीं रूकते थे क्योंकि वे वहां असुरक्षित महसूस करते थे। उन्हें लगता था कि ॔॔क्रुर मुसलमान’’ उन पर हमला कर देगें।
मुंबई के फारूख मापकर ने पुलिस में एक शिकायत दर्ज कराई कि जनवरी 1993 में मुंबई में हुए दंगों के दौरान, वडाला में स्थित हरी मस्जिद में पुलिसकर्मी घुस गए और अकारण अंधाधुंध गोलियां चलाईं। जिन लोगों पर गोलियां चलाई गईं, उनके पास कोई हथियार नहीं थे। सात लोग मारे गए और कई अन्य घायल हुए। फारूख, जो कि एक बैंक में काम करते थे, उन 54 लोगों में से एक थे जिन्हें पुलिस ने मस्जिद के परिसर से गिरफ्तार कर लिया। उन सभी पर दंगा करने और हत्या का प्रयास करने के मुकदमे कायम कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। सोलह साल चली कानूनी लड़ाई के बाद, मापकर को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया।
मुंबई दंगों के दौरान ही मुंबई पुलिस के संयुक्त कमिश्नर आर.डी. त्यागी, पुलिसकर्मियों के एक दल के साथ सुलेमान बेकरी पहुंचे और बिना किसी कारण के वहां उपस्थित नौ निर्दोष लोगों को गोलियों से भून डाला। मेरठ में 1987 में हुए दंगों के दौरान, पीएसी की एक टुकड़ी ने हाशिमपुरा नामक एक मोहल्ले से 22 मई को दो दर्जन से अधिक मुस्लिम युवकों को पकड़ा। उन्हें ट्रक में ले जाकर गाजियाबाद में दो अलगअलग स्थानों पर गोली मार दी गई। उस समय व्ही.एन. राय, गाजियाबाद के एस.पी. थे और उन्होंने पीएसी के जवानों के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज करवाए। पीएसी के सिपाहियों ने मुस्लिम युवकों को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि उन्हें यह विश्वास था कि जब तक मुसलमानों को सबक नहीं सिखाया जाएगा तब तक दंगे नहीं रूकेंगे। उन्हें यह भी डर था कि मेरठ को मुसलमान "मिनी पाकिस्तान’’ बना देंगे।
सन 2002 के गुजरात दंगों के दौरान, अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों द्वारा फोन पर की गई सहायता की गुहारों को पुलिस ने नजरअंदाज किया और उन्हें पुलिस थानों में शरण नहीं लेने दी गई। कुछ इलाकों में पुलिस ने दंगाईयों को अपने सरकारी वाहनों से डीजल निकालकर दिया ताकि वे मुसलमानों के घरों को लूटकर उनमें आग लगा सकें।
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के एक अध्ययन दल ने पाया कि तलवारों और त्रिशूलों से लैस लोगों से भरे हुए ट्रक, पुलिस की गश्ती वैनों के सामने से निकल जाते थे और उन्हें रोकने के लिए कुछ नहीं किया जाता था। कई मौकों पर पुलिसकर्मियों ने ट्रक में सवार लोगों को सलाह दी कि वे अपना काम एक घंटे के अंदर पूरा कर लें और कहा कि पुलिस उसके बाद ही वहां पहुंचेगी। गुजरात पुलिस ने तो मुस्लिम नाम वाले एक हाईकोर्ट जज, आई.पी.एस. अधिकारी और सेना के कर्नल तक को सुरक्षा नहीं दी। जिन अधिकारियों ने दंगों को रोकने की कोशिश की, उनका तबादला प्रशासनिक पदों पर कर दिया गया। पुलिसबल के मुस्लिम सदस्यों को या तो छुट्टी पर जाने के लिए कह दिया गया या फिर उनकी ड्यूटी दफ्तरों में लगा दी गई। राजनेताओं ने पुलिस कंट्रोल रूम में बैठकर दंगों का निर्देशन किया।
यद्यपि गुजरात दंगों में मुसलमान हमले के शिकार थे और विहिप व बजरंग दल जैसे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन हमलावर, फिर भी पुलिस की नाकाबंदी और तलाशी अभियान मुस्लिम इलाकों तक सीमित रहे। इन तलाशी अभियानों के दौरान रहवासियों की जमकर पिटाई की गई : यहां तक कि उनमें से कई की हड्डियां चूरचूर हो गईं। उनके घरों में घुसकर तोड़फोड़ की गई। बेजा गिरफ्तारियां हुईं और उन्हें आई.पी.सी. की धारा 307 (हत्या का प्रयास) का आरोप लगाकर जेलो में डाल दिया गया। पी.यू.सी.एल. बड़ौदा व शांति अभियान के अनुसार, बड़ौदा में मई के मध्य तक हुई 1300 हिंसक घटनाओं में से 814 के दौरान पुलिस घटनास्थल पर ही नहीं पहुंची। 397 मामलों में पुलिस को सूचना दी गई परंतु वह फिर भी निष्क्रिय बनी रही। 60 मामलो में पुलिस घटनास्थल पर पहुंची परंतु उसने कोई कार्यवाही नहीं की। 25 मामलों में पुलिस ने दंगाईयों का साथ दिया। कुल 1300 हिंसक घटनाओं में से केवल 27 में पुलिस ने प्रभावी कार्यवाही की और हमलावरों को बल प्रयोग कर तितरबितर किया।
राय के अनुसार, जांच एजेन्सियां, मुसलमानों के प्रति गहरे तक पूर्वाग्रहग्रस्त हैं। मेरठ के हाशिमपुरा में दंगों के दौरान पीएसी की बर्बर कार्यवाही की जांच करने में उत्तरप्रदेश सी.आई.डी. ने आठ साल लगा दिए। मुसलमानों पर हमलों के मामले में एफ.आई.आर या तो दर्ज ही नहीं की जातीं और या फिर बहुत प्रयासों के बाद दर्ज की जाती हैं।
अधिकांश मामलों में पुलिस जानबूझकर उन हमलावरों के नाम नहीं लिखती जिनकी निशानदेही फरियादी करते हैं। कई बार एफ.आई.आर. को इस तरह से लिखा जाता है कि अपराधियों को सजा दिलवाना कठिन हो जाता है। बिहार के भागलपुर में 24 अक्टूबर 1989 को दंगे शुरू हुए। लोगायन नामक गांव में 27 अक्टूबर को 116 मुसलमानों को मारकर खेतों में दफना दिया गया और वहां फूलगोभी उगा दी गई। इस घटना में जीवित बचे 65 व्यक्तियों को एफ.आई.आर. दर्ज कराने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। यह इस तथ्य के बावजूद कि घटना की विस्तृत रपट स्थानीय व राष्ट्रीय दैनिकों में छपी थी। पुलिस इस घटना से इंकार करती रही। अंततः, रपट तब लिखी गई जब डी.आई.जी. अजीत दत्ता के आदेश पर खेतों को खोदा गया और वहां लाश्ों पाई गईं। आरोपियों पर मुकदमे चले और उनमें से कुछ को सजा भी हुई।
अधिकांश मामलों में जांच ठीक से नहीं की जाती और मामलों पर खात्मा लगा दिया जाता है। खात्मे के दो कारण बताए जाते हैं : अघटना सही पाई गई परंतु सुबूत और गवाह न होने के कारण आगे जांच करना संभव नहीं है या बऐसी कोई घटना हुई ही नहीं।
मुंबई में हुए दंगो की जांच करने वाले न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग की रपट में पुलिस कंट्रोल रूम और शहर में घूम रहे पुलिस गश्ती दलों के बीच वायरलेस पर हुई बातचीत को उद्धत किया गया है। शहर में तैनात एक पुलिसकर्मी ने पुलिस कंट्रोल रूम से एक विशष्ट स्थान पर फायर बिग्रेड भेजने के लिए कहा। इस अनुरोध पर त्वरित कार्यवाही करने की बजाए, कंट्रोल रूम से यह पूछा गया कि जिस इमारत में आग लगी है वह हिन्दू की है या मुसलमान की। हमने गुजरात में देखा कि किस प्रकार ॔दंगों के उत्पादन’ की ॔संस्थागत व्यवस्था’, मात्र 72 घंटों में कितना कहर बरपा सकती है। यही कुछ सन 2008 और 2009 में कंधमाल में भी देखा गया।
पुलिस के साम्प्रदायिक चरित्र के कारण दोनों समुदायों के लोगों की पुलिस के बारे में सोच में भारी अंतर है। राय द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से यह सामने आया कि मुस्लिम समुदाय के 97 फीसदी दंगापीड़ित, पुलिस को अपना दुश्मन मानते थे और 73.5 फीसदी का कहना था कि दंगों के दौरान वे पुलिस से सहायता नहीं मागेंगे। इसके विपरीत, बहुसंख्यक समुदाय के मात्र 6.5 प्रतिशत पीड़ित, पुलिस को अपना शत्रु मानते थे और उनमें से 93 प्रतिशत ने कहा कि अगर दंगों के दौरान उन पर हमला होता है तो वे पुलिस से मदद मागेंगे।
यह दिलचस्प है कि यद्यपि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना में भी विभिन्न समुदायों के कर्मियों का अनुपात लगभग उतना ही है जितना कि राज्य पुलिस बलों में, परंतु दंगों के दौरान वे पुलिस की तुलना में कहीं अधिक निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार करते हैं। राय के सर्वेक्षण के अनुसार, 91 प्रतिशत मुसलमानों ने कहा कि वे पुलिस की अपेक्षा सी.आर.पी.एफ. की तैनाती को अधिक पसंद करेंगे जबकि 37 प्रतिशत का कहना था कि वे दंगों पर नियंत्रण के लिए सेना की मौजूदगी चाहेंगे। पी.ए.सी. और राज्य पुलिस की तैनाती चाहने वाले मुसलमानों का प्रतिशत क्रमशः 6 और 18 था। इसके विपरीत, बहुसंख्यक समुदाय के अधिकांश सदस्यों (51.5 प्रतिशत) ने पीएसी व 35 प्रतिशत ने राज्य पुलिस पर भरोसा जतलाया। केवल 10 प्रतिशत सी.आर.पी.एफ की तैनाती के हामी थे और 8.5 प्रतिशत सेना की। दंगों की मेरे द्वारा की गई जांच से भी यह सामने आया है कि सेना और सी.आर.पी.एफ., दंगों पर शीघ्रता से और प्रभावी नियंत्रण कर लेते हैं और यह भी कि वे इस पर कोई ध्यान नहीं देते कि दंगाइयों और पीड़ितों का धर्म क्या है। केन्द्रीय अर्द्वसैनिक बल और सेना, स्थानीय प्रशासन और राजनेताओं के दबाव में भी नहीं आते क्योंकि उनका इन बलों के सदस्यों की नियुक्तियों, पदोन्नतियों आदि में कोई दखल नहीं होता। वे दंगों पर जल्दी से जल्दी नियंत्रण पाना चाहते हैं ताकि वे अपने मुख्यालय वापस जा सकें।
परंतु यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि राज्य पुलिस बलों के सभी सदस्य पक्षपातपूर्ण व साम्प्रदायिक व्यवहार करते हैं। ऐसे कई पुलिसकर्मी हैं जिन्होंने दंगों में लोगों की जानें बचाईं और निष्पक्षता से काम किया। परंतु उनकी संख्या कम है और अक्सर उन्हें हाशिए पर पटक दिया जाता है। गुजरात पुलिस के आर.डी. श्रीकुमार ने अपने हितों और कैरियर को दांव पर लगा कर सन 2002 के दंगों में अनेक मुसलमानों की जानें बचाईं।
निष्कर्ष
आम पुलिसकर्मी के साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह, दंगों के दौरान ही नहीं बल्कि उनकी रोजमर्रा की कार्यवाही के दौरान भी झलकते हैं। इससे मुसलमानों की छवि एक फिरकापरस्त कौम की बन जाती है। झूठी मुठभेड़ों के शिकार होने वालों में बड़ी संख्या मुसलमानों की होती है। हर बम विस्फोट के बाद मुस्लिम युवकों को धर लिया जाता है। महाराष्ट्र में मुसलमान कुल आबादी का 10 प्रतिशत हैं परंतु जिन लोगों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उनमें से 28 फीसदी मुसलमान हैं। परंतु मुसलमानों की दोषसिद्धी की दर 17 प्रतिशत है कि जबकि अन्य लोगों के मामले में यह 22 प्रतिशत है। जाहिर है कि उन पर झूठे मुकदमे लादे जाते हैं। पुलिसकर्मियों की भर्ती के बाद और उनके कार्यकाल के बीच, उन्हें सघन प्रिशक्षण देकर उनके साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह दूर किए जा सकते हैं। इस समस्या से निपटने का एक तरीका यह भी है कि पुलिसबलों में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की भर्ती की जाए।
इससे भी जरूरी यह है कि पुलिसबलों के सदस्यों को यह पता रहे कि अगर उन्होंने अपने कर्तव्य पालन में कोताही बरती और कानून के खिलाफ काम किया तो उन्हें सजा भोगनी पड़ेगी। अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की गलतियों और कमियों के लिए उच्च अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
इंग्लैण्ड और वेल्स में एक ॔इंडिपेंडेंट पुलिस कम्पलेंट्स कमीशन’ (स्वतंत्र पुलिस शिकायत आयोग) है जो पुलिस के खिलाफ शिकायतों की जांच करता है। इस आयोग के सदस्य प्रतिष्ठित नागरिक होते हैं और उन्हें यह अधिकार होता है कि वे पुलिस द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन या मनमानी कार्यवाही की शिकायतों की जांच करें।
साम्प्रदायिक व लक्षित हिंसा विधेयक भी एक ऐसा प्रस्तावित कानून है जिससे इस समस्या पर कुछ हद तक काबू पाया जा सकता है और पुलिसकर्मियों को गलत कार्यवाही करने या उचित कार्यवाही न करने पर सजा दी जा सकती है। बिल के मसौदे में यह प्रावधान है कि पीड़ित पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

-इरफान इंजीनियर

1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

सही कहा,पुलिसबलों में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों व अन्य अल्पसंख्यकों की भर्ती की जाए।
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