बुधवार, 4 दिसंबर 2013

मुज़़फ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा - भाग 1



तथ्य सर्वेक्षण   
पृष्ठभूमि 

    पश्चिमी उ0प्र0 के जाट लैण्ड का दिल कहे जाने वाले मुज़फ़्फ़रनगर-शामली  गंगा जमुना के दोआब में बसे उपजाऊ भूमि वाले इस क्षेत्र में 70 प्रतिशत किसान एक हेक्टेयर  से कम जोत के हैं। मुज़फ़्फ़रनगर से किसी तरफ़ निकलिए हरियाली ही हरियाली दिखाई देगी। गन्ना यहाँ की लाइफ़ लाइन है। इस क्षेत्र में जहाँ पगड़ी और मूँछ को प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है वहीं अच्छी फ़सल और तंदुरुस्त पशु भी स्टेटस सिम्बल माने जाते हैं।
      यह वही इलाका है जहाँ हिन्दू और मुस्लिम  हर छोटे और बड़े फ़ैसले में साथ बैठ कर दुःख-दर्द साथ बाँटते थे। चैधरी चरण सिहं ने जाट-मुस्लिम के इस समीकरण को राजनैतिक प्रयोगशाला में मज़बूत बनाया। जाट और मुस्लिम एकता का यह एकमात्र उदाहरण है। वर्ष 2001 की आबादी के मुताबिक मुज़फ़्फ़रनगर-शामली में मुस्लिमों की आबादी 38.1 प्रतिषत, 60.1 प्रतिशत हिन्दू और बाक़ी सभी अन्य धर्म के लोगों की थीं। मुज़फ़्फ़रनगर में 540 और शामली में 218 ग्राम पंचायतें हैं। मुख्य रूप से जाट और मुसलमानों का दबदबा है और अब तक इसकी एकता की मिसाल दी जाती थी। यहाँ का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पिछले साठ सालों में मुसलमानों और जाटों के बीच ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिससे उनके बीच नफ़रत की दीवार खड़ी हो जाए। यहाँ तक कि अयोध्या विवाद के दौरान या पश्चिमी उ0प्र0 में हुए अन्य दंगों के दौरान भी। शायद इसी कारण चौधरी चरण सिंह ‘किसान मुसलमान’ का नारा देते थे। किसान यूनियन के झण्डे तले यहाँ के लोगों ने देशव्यापी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। भारतीय किसान यूनियन के जनक चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुआई में होने वाले हर आन्दोलन जिसमें ’नईमा आन्दोलन’ ’मेरठ आन्दोलन’ आदि में ’एकता’ का सन्देश देने के लिए ’हर-हर महादेव’ और ’नारा-ए-तकबीर अल्लाहु अकबर’ की सदा गूँजती रही। वे कभी यह नहीं देखते थे कि ज़ुल्म सहने वाला हिन्दू है या मुालमान। वे सिर्फ़ हक़ के लिए लड़ते थे। इन सभी आन्दोलनों की अध्यक्षता ग़ुलाम मोहम्मद जौला ने की थी। उनके चले जाने के बाद यह सिलसिला कमज़ोर पड़ गया। साम्प्रदायिक ताक़तों को जाटों और मुसलमानों का यह मेल-जोल खटक रहा था। इसलिए उन्होंने धीरे-धीरे इस मेल-जोल को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया।

-डा0 मोहम्मद आरिफ

क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

कोई टिप्पणी नहीं: