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शनिवार, 7 जून 2014

क्या कर सकते हो --------------------

       बूकसूर मुसलमानों को आतंकवाद के मामलों में फर्जी तरीके से फंसाए जाने के आरोप बार बार लगते रहे हैं। नागरिक एंव मानावाधिकार संगठनों ने अपनी जांच रिपोर्टों में कई बार इस तरह के आरोप को पुष्ट करते हुए रिपोर्टों की शकल में अपने दावे भी पेश किए हैं। ऐसे दर्जनों मामले हैं जब अदालतों से इस तरह के संगीन आरोप में पकड़े गए बेगुनाह वर्षों बाद बरी हुए हैं। कई बार अदालत ने पुलिस को ऐसे ही फर्जी मुकदमों में बेगुनाहों को फंसाने के लिए फटकार भी लगाई है। लेकिन शायद पहली बार एक ऐसी घटना जिसमें ३३ लोगों की मौत हुई और ८० से अधिक लोग घायल हुए,के मुकदमें के आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने न केवल बरी किया बल्कि जांच एजेंसियों को फटकार लगाते हुए आरोपियों को स्पष्ट शब्दों में बेगुनाह कहा है। १६ मई, २०१४ को जब १६वीं लोकसभा के मतदान की गिनती चल रही थी और देश की सत्ता में एक बड़े बदलाव के संकेत आने लगे थे तो ठीक उसी समय उच्चतम न्यायालय में जस्टिस एपी पटनायक और जस्टिस वेंकट गोपाल गौड़ा २४ सितम्बर २००२ को अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले पर अपना फैसला सुना रहे थे। यह संयोग ही है कि देश में बदलाव के पीछे जहां गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका थी तो गांधीनगर, गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हमला भी उन्हीं के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था और शासन की सहमति से जांच एजेंसियों द्वारा बेगुनाहों को फंसाने का आरोप भी लगे थे।
  सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले में कहा ʺराष्ट्र की सुरक्षा और अखण्डता से जुड़े इस संगीन मामले में जांच एजेंसियों ने जिस अक्षमता से जांच की है उस पर हम अपनी वेदना प्रकट करते हैं। इतने बहुमूल्य जीवन छीन लेने के ज़िम्मेदार वास्तविक अपराधियों को पकड़ने के बजाए पुलिस ने बेगुनाह लोगों को पकड़ा और उन पर गम्भीर आरोप लगाए जिसके फलस्वरूप उन्हें कैद में रखा गया और फिर सज़ा दी गईʺ। इस फैसले से एक ओर जहां फांसी और अजीवन कारावास की सज़ा पाने वाले चार अभियुक्तों का ११ साल से भी अधिक समय तक जेल में रहने के बाद रिहाई का रास्ता साफ होगया वहीं वह सवाल भी एक बार फिर ताज़ा हो गए जो इन बेकसूरों की गिरफतारी के बाद उठाए गए थे। पलिस एंव जांच एजेंसियों की भूमिका और उनकी राजनीतिक सरपरसती के साथ साथ यह सवाल भी उठना स्वभाविक है कि विशेष पोटा अदालत से लेकर गुजरात हाईकोर्ट तक उन चीज़ों को देखने और महसूस करने में नाकाम क्यों रही जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना यह फैसला सुनाया है।
   घटना यह थी कि २४ सितम्बर २००२ को शाम ४ बजकर ४५ मिनट पर दो आतंकवादियों ने अक्षरधाम परिसर में स्वचालित हथियारों और बमों से हमला कर दिया। हालात को काबू करने के लिए रात साढ़े ग्यारह बजे राषट्रीय सुरक्षा गार्ड के जवानों को लगाया गया। सुबह पौने सात बजे यह आपरेशन समाप्त हुआ जिसे ष्वज्र शक्तिष् का नाम दिया गया था। दोनो आतंकवादियों समेत कुल ३३ लोग मारे गए जिसमें एनएसजी का एक कमांडो और दो पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। दो साल तक कोमा में रहने के बाद कमांडो सुजान सिंह की भी मृत्यु हो गई। कथित तौर पर मारे गए दोनों आतंकवादियों का सम्बन्ध लशकरे तोयबा और जैश मोहम्मद से था। उनमें से एक मुर्तज़ा हफिज़ यासीन पाकिस्तान के लाहौर और दूसरा अशरफ अली फारूक शेख रावलपिंडी के रहवासी थे। अगस्त २००३ में अहमदाबाद के दरियापुर और शाहपुर से आदम भई अजमेरीए अब्दुल कय्यूम मुफ्ती साहबए मुहम्मद सलीम शेखए अब्दुल मियां कादरी और अलताफ हुसैन को  गिरफतार दिखाया गया। बरैली उत्तर प्रदेश निवासी शान मियां उर्फ चांद खां की गिरफतारी सितम्बर २००३ में दिखाई गई। इसके अलावा २८ अन्य फरार आरोपियों में से शौकतुल्लाह ग़ौरी को जूलाई २०१० में गिरफतार किया गया।
   सभी आरोपियों के खिलाफ पोटा की विशेष अदालत में मुकदमा चला और जूलाई २००६ में पोटा अदालत ने आदम अजमेरीए शान मियां उर्फ चांद खां और अब्दुल कय्यूम मुफ्ती को मृत्यु दण्डए मुहम्मद सलीम को अजीवन कारावास और अब्दुल मियां कादरी एंव अलताफ हुसैन को क्रमशः १० और ५ वर्ष कैद की सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने गुजरात हाई कोर्ट के अपील दायर की। गुजरात हाईकोर्ट ने भी मई २०१० में अपने फैसले में पोटा अदालत द्वारा दी गई सजाओं को बरकरार रखा। अन्त में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और देश की शीर्ष अदालत ने पोटा अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को उलट दिया और सभी आरोपियों को स्पष्ट शब्दों में बेकसूर मानते हुए बाइज़्ज़त बरी कर दिया।
   अक्षरधाम आतंकी हमले की जांच की कहानी जासूसी उपन्यास की तरह चलती हुई दिखाई देती है। दो हथियार बंद आतंकी अचानक अक्षरधाम मंदिर परिसर के बाहर बमों और स्वचालित हथियारों से हमला करते हैं। मंदिर के सभी गेट बंद कर दिए जाते हैं। आतंकी पिछले गेट से मंदिर परिसर में प्रवेश करने में सफल हो जाते हैं। स्थानीय पुलिस उनसे निपटने में नाकाम  रहती है। एनएसजी के ब्लैक कैट कमांडो मोर्चा संभालते हैं और अन्त में दोनों आतंकी उनकी गोलियों से छलनी हो जाते हैं। फिर खून में डूबे हुए दोनो आतंकियों की पैन्ट की जेब से एक एक पत्र बरामद होता है जो बिल्कुल बेदाग़ है और उन पत्रों में उनके नाम पते व अन्य जानकारियों के अलावा उनके शरणदाताओं के नाम और पते भी मौजूद हैं। तफतीश की कहानी का एक सिरा इन्हीं पत्रों से शुरू होता है। तफतीश में एक दूसरी चीज़ जो निकल कर आती है वो यह कि एक तीसरा पाकिस्तनी आतंकी लाहौर का निवासी अय्यूब भी उक्त दोनों आतंकियों के साथ हमले से एक सप्ताह पूर्व भारत आया था। तीनों को आदम अजमेरी ने अपने भाई के घर में शरण दी थी और अन्य आरोपियों से मिलवाया था। मंदिर पर हमला मुर्तज़ा और फारूक ने किया था किन्तु हमले से पहले ही आदम अजमेरी के साथ अय्यूब मंदिर के पास बच्चों के पार्क में पहुंच गया था। हमले के बाद भागती हुई भीड़ के साथ आदम अजमेरी और अय्यूब वापस अहमदाबाद आगए और वहां से जैश मोहम्मद के आकाओं को हमले की कामयाबी की फोन द्वारा सूचना भी दी और उन्हीं की सलाह पर अय्यूब को बड़ोदरा पहुंचाया गया जहां से वह पाकिस्तान चला गया। अगर इस कहानी को सच मान लिया जाए तो यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब २४ सितम्बर को हमले के दिन ही पत्र बरामद हो गया था और यह भी पता चल गया था कि हमले की सफलता की सूचना पाक में बैठे आकाओं को फोन द्वारा अहमदाबाद से दी गई है तो आरोपियों तक पहंचने में ११ महीने का समय क्यों लगा बावजूद इसके कि आरोपी अहमदाबाद में ही मौजूद थेॽ उससे बड़ा सवाल यह कि दोनों मृत आतंकियों की गोलियों से छलनी और खून से लतपत लाश से बरामद की गई चिट्ठियों पर खून का धब्बा तक नहीं था और न ही मुड़े होने का कोई निशान थाए ऐसा कैसे हुआॽ कहानी के इस हिस्से के चार बड़े किरदार थे डीसीपी वंजाराए एसीपी सिंघलए पीआई वानर और पीआई पटेल।
   कहानी का दूसरा पक्ष वह है जो आरोपियों ने बयान किए हैं। ९ अक्तूबर २००३ को पोटा अदालत के जज को लिखे गए एक पत्र में पेशे से रिक्शा चालक आदम अजमेरी ने बताया कि ९ अगस्त २००३ को दोपहर में क्राइम ब्रांच अहमदाबाद के ५दृ६ अहलकार उसके घर पहुंचे और कहा कि जो रिक्शा तुम चलाते हो वह चोरी का है। इस तरह उसे क्राइम ब्रांच आफिस ले जाया गया। वहां उसे यातना देकर अक्षरधाम मंदिर हमले का आरोप स्वीकार करने पर मजबूर किया गया। अपराध स्वीकार करने सम्बन्धी तहरीर रटवाई गई और कैमरे के सामने बुलवाकर उसे रिकार्ड किया गया। २९ सितम्बर को उसकी पत्नी को उसके पास लाया गया और सरकारी काग़ज़ात पर उसके और उसकी पत्नी के हस्ताक्षर लेने के बाद ३० सितम्बर को उसे अक्षरधाम मंदिर घटना के आरोपी के तौर पर अदालत में पेश करके रिमांड हासिल की गई। ४ सितम्बर को सिंघल साहब के कहने पर अपनी राइटिंग में उससे कुछ लिखवाया गया। ५ सितम्बर को उसे श्रीनगरए कश्मीर लेजाया गया और एक व्यक्ति का फोटो दिखाकर पहचान करने के लिए कहा गया परन्तु उसने उसे कभी देखा नहीं था इसलिए क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के आदेश के विरुद्ध सच्ची बात कह दी जिसके लिए बाद में उसे बुरी तरह पीटा गया। ९ सितम्बर को उसे अहमदाबाद लाया गया जहां २६ सितम्बर को पोटा अदालत में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि आदम अजमेरी १९९८ आज़ाद उम्मीदवार के तौर पर में चुनाव लड़ चुका था। उसके बाद वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया। गोधरा कांड के बाद कांग्रेस पार्टी द्वारा भेजी गई रिलीफ उसने कांग्रेसी नेताओं के कहने मुसलमान दंगा पीड़ितों के बीच पर बांटी थी। दूसरी बात यह कि उसने वहां विजयी भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हाईकोर्ट में मुकदमा किया था जो सुप्रीमकोर्ट तक गया था।
    इसी प्रकार मुफ्ती अब्दुल कय्यूम का कहना है कि १७ अगस्त २००३ को दरियापुर हाजी सखी मस्जिद से मग़रिब की नमाज़ ;सूर्यास्त के समय की नमाज़द्ध से ठीक पहले क्राइम ब्रांच के ३दृ४ अहलकार उसके पास आए। उन्होंने कहा कि साहब ने एक जांच सिलसिले में अभी बुलाया है तीन चार दिन बाद आप वापस घर आ जाएंगे। वह लोग क्राइम ब्रांच गायकवाड़ हवेली ले गए। आंखों पर पट्टी बांध कर सिंघल साहब ;एसीपीद्ध के सामने पेश किया गया। उन्होनें अचानक पिटाई करना शुरू कर दिया। दूसरे दिन वंजारा साहब ;डीसीपीद्ध के सामने लाया गया तो उन्होंने ५दृ६ डंडे वालों ;पुलिसद्ध से पिटवाया और अक्षरधाम घटना में लिप्त होना स्वीकार करने के लिए कहा। उंगलियों में किलिप लगाकर करेंट लगाया गया और पैर के नाखूनों में पिन चुभाई गई। २९ अगस्त तक यातनाए दी जाती रहीं। फिर उसी दिन उनके पिता को बुलवाया गया और दोनों के कुछ कागज़ात पर हस्ताक्षर लिए गए और उसके बाद ३० अगस्त को अदालत में पेश करके रिमांड पर ले लिया गया। उससे यह भी स्वीकार करने को कहा गया कि आतंकियों की जेब से बरामद चिट्ठी उसी ने लिखी थी। फिर उससे उन चिट्ठियों को पढ़कर अपने हस्तलेख में लिखने के लिए कहा गया और ४०दृ५० चिट्ठियां लिखवाई गयीं। उसके बाद ५ सितम्बर को श्रीनगरए कश्मीर लेजाया गया जहां एक व्यक्ति का फोटो दिखाया गया जिसे उसने पहचानने से इनकार किया तो बाद में उसकी फिर पिटाई की गई। ९ सितम्बर को उसे वापस अहमदाबाद लाया गया और २६ सितम्बर को पोटा अदालत में पेश करके जेल भेज दिया गया।
   श्रीनगर में आदम अजमेरी और मुफ्ती कय्यूम को जिस व्यक्ति की फोटो दिखा कर पहचान करवाई जा रही थी वह कोई और नहीं बल्कि ष्चांद मोटर्सष् के नाम से गैरेज चलाने वाले मिकेनिक शान मियां उर्फ चांद खां थे। बरैलीए उत्तर प्रदेश के मूल निवासी चांद खां को कारगो पुलिस श्रीनगर ने ९ अगस्त २००३ को उसी दिन पकड़ा था जिस दिन अहमदाबाद में आदम अजमेरी को काइम ब्रांच के अहलकार चोरी के रिक्शे के बहाने से पकड़ कर ले गए थे। उसकी गिरफतारी भी कारगो पुलिस श्रीनगर ने ३० अगस्त को एक ऐसी गाड़ी के ड्राइवर के रूप में दिखाई थी जिसमें से कारगो पुलिस के अनुसार कथित तौर पर हथगोलेए बारूद और स्वचालित हथियार बरामद हुए थे। ९ अगस्त को आदम अजमेरी को अहमदाबाद में और चांद खां को श्रीनगर में पकड़ा जानाए २१ दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखे जाने के बाद दोनों की गिरफतारी ३० अगस्त को दिखाया जाना ;यद्यपि कि यह सब दो अलग राज्यों में हो रहा थाद्ध और दोनों को अक्षरधाम घटना में आरोपी बनाया जाना क्या मात्र एक संयोग थाॽ अगर हम पिछली कुछ घटनाओं को देखें तो शायद इसका जवाब होगा ष्नहीष्। आदम अजमेरी और अहमदाबाद से गिरफतार किए जाने अन्य आरोपियों को कथित रूप से यातनाएं देकर अक्षरधाम घटना के आरोप का स्वीकार करवाने वाले अधिकारियों में जिस वंजारा और सिंघल की सबसे बड़ी भूमिका सामने आई है उन पर फर्जी कहानियां गढ़ने और बकसूरों को फंसाने के आरोप पहले भी लग चुके हैं। उक्त दानों ही अधिकारी इस समय इशरत जहां और सोहराबुद्दीन फर्जी इनकाउन्टर मामले में जेल में हैं। वंजारा एन्ड कम्पनी के गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री समेत वरिष्ठ मंत्रियों के इशारे पर काम करने का प्रमाण स्वंय वंजारा द्वारा लिखे गए पत्र से मिलता है जो उसने जेल से लिखा था। इशरत जहां फर्जी इनकाउन्टर मामले में सीबीआई ने आईबी अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट तक दाखिल कर दी है जिनका वंजारा और सिंघल जैसे अधिकारियों के साथ बेगुनाहों के इनकाउन्टर ;हत्याद्ध में भर पूर सहयोग था। इस मामले में भी जहां दो अलग अलग राज्यों में पकड़े गए बेगुनाहों को फर्जी तरीके से फंसाने की बात सामने आई है वह गुजरात सरकार की सहमति और आईबी के सहयोग के बिना सम्भव नहीं हो सकती थी। सुप्रीमकोर्ट ने अपने इसी फैसले में आरोपियों पर पोटा लगाए जाने के औचित्य पर भी सवाल उठाते हुए जो टिप्पणी की है वह अपने आप में इस पूर आपरेशन में गुजरात सरकार के समर्थन का सबूत है। फैसले में कहा गया है ʺक्या इस मामले में २१⁄११⁄२००३ को राज्य सरकार द्वारा दी गई संस्तुति पोटा की धारा ५० के अनुसार थी। वर्तमान केस में ऐसा ज़ाहिर नहीं होता कि अनुमति प्रदान करने वाली अथारिटी ने अपने विवेक का प्रयोग इस मामले में अनुमति देने की आवश्यक्ता से सन्तुष्ट हो कर किया। ३ण् साफ है कि गृहमंत्री द्वारा अनुमति प्रदान करना अनुचित था इसलिए इसे अवैध करार दिया जाता हैʺ। पोटा के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति गृहमंत्रालय से लेनी पड़ती है और उसके लिए पोटा कानून में ही दिशा निर्देश मौजूद है। लेकिन गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री ने नियमों की अनदेखी करते हुए इसकी अनुमति प्रदान की। उस समय गुजरात सरकार के गृहमंत्रालय का कार्यभार स्वंय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में था। हालांकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इस मामले में होने वाली किसी तरह की अग्रिम जांच और उसके नतीजे में साज़िश की सच्चार्इ के सामने आने की कोई सम्भावना बनती दिखाई नहीं देती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में केन्द्र की नई सरकार सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का आदर करते हुए इस प्रकार के मामलों की पुनरावृत्ति न हो उसके लिए कोई कदम उठाती है या नहीं।
  - मसीहुद्दीन मस्सू



सोमवार, 7 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-3

किन्तु  नक्सलवाद के प्रभावों का आकलन देश  के कुल गाँवों की संख्या के आधार पर किया जाएगा तो उसका प्रभाव महज दो-तीन प्रतिशत गाँवों तक ही दिखेगा। किसी समस्या का प्रचार-प्रसार या यूँ कहें कि प्रचार की भाषा अपनी योजनाओं व रणनीतियों के अनुसार ही तय किया जाता है। सरकार यहाँ भी आँकड़ों की बाजीगिरी दिखा देश  के लोगों को ठगने का काम करती है। देश के लोगों के सामने जब इस तरह की तस्वीर पेश की जाएगी कि करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा इलाकों में नक्सलवाद पसर चुका है तो उसका संदेशभी अलग जाएगा। सरकार चाहे एन.डी.ए. की हो या यू.पी.ए. दोनों जिस तरह से नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार का वर्णन करती हंैे इसके पीछे उनके इरादे कुछ और होते हैं। इसलिए वह इसे समस्या के रूप में प्रचारित करती रही है, आंदोलन के रूप में नहीं। समस्या बताते हुए इसके समाधान और इसे कुचलने के लिए हथियारों का प्रयोग भी जमकर होता है। इसके नाम पर करोड़ों रुपये लूटने के साथ हजारों बेगुनाह लोग गोली का शकार भी बनते हैं। रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद समस्या को आंदोलन कहा जा सकता है लेकिन नक्सलवाद को आंदोलन का नाम देने में राजनैतिक परेशनी खड़ी हो जाती है। सरकार का यह दोहरा चरित्र-व्यवहार देश  के लिए घातक हो सकता है।
    देश  कीे अधिसंख्य कृषि योग्य भूमि को एस.इ.जेड. यानी औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार किसानों को मुआवजे के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रही है। जिन इलाकों में नई नीतियों के तहत नए उद्योग विकसित किए जा रहे हैं वहाँ से भुखमरी और आत्महत्या की खबरें सर्वाधिक आ रही हैं। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जो देश  के विकसित राज्यों की श्रेणी में आते हैं वहाँ सेे किसानों के आत्महत्या के मामले ज्यादातर आते हैं। एक आँकड़े के अनुसार केवल महाराष्ट्र में पिछले 20 वर्षों में 10000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले 10 वर्षों में झारखंड, छतीसगढ़ और ओडि़सा नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं क्योंकि वहाँ की सरकार की नीतियाँ किसानों के विरुद्ध रही हैं। केवल झारखंड को ही लें तो पिछले 11 वर्षों में यहाँ के शासक चाहे वे एन.डी.ए. हो या यू.पी.ए., ने यहाँ की खनिज संपदा को निर्दयता पूर्वक लूटने और दोहन करने का ही काम किया है। वहाँ की 70 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन यह जान बेहद आष्चर्य होगा कि अविभाजित बिहार से लेकर अलग राज्य बनने के बाद से लेकर आज तक कोई कृषि नीति नहीं बनाई गई। नतीजा है कि झारखंड के कुल क्षेत्रफल की मात्र 25 फीसदी जमीन ही कृषि योग्य है और इसमें से सिर्फ 8 प्रतिशत भूमि ही सिंचित है। गरीबी, बेरोजगारी, भूख और लगातार उत्पीड़न और अवहेलना से नाराज झारखंडी युवा आसानी से माओवादी बन रहे हैं। राज्य मषीनरी व लोकतंत्र की विफलता और भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों और पूँजीपतियों की करतूतों ने पूरे सूबे में माओवादियों के प्रभाव बढ़ाने में खाद-पानी का काम किया। यह कहना तो सरासर गलत है कि झारखंड के आदिवासियों-गरीबों ने राजव्यवस्था के खिलाफ हथियार उठा लिया है लेकिन यह भी एक स्याह सच है कि स्टेट पावर तेजी से उन गरीबों का विष्वास खोती जा रही है और यह स्थिति करीब सभी नक्सल प्रभावित राज्यों की है।
    हालाँकि इस तरह के आंदोलनों का अंत कहाँ होगा और उनको न्याय कैसे मिलेगा? इस पर भी माओवादियों के नेताओं की राय में काफी भिन्नता है? पूर्व माओवादी नेता और पलामू, झारखंड से लोकसभा सांसद कामेष्वर बैठा कहते हैं कि ‘‘मैं खुद पिछले 29 वर्षों से परचे-पोस्टर चिपकाता रहा, चुनाव का बहिष्कार करता रहा लेकिन उसका कोई फायदा न तो पहले मिला था और न अब। बहिष्कार या विरोध का यह नारा सिर्फ कागजों पर, दीवारों पर और पोस्टरों तक सिमट कर रह जाता है।’’ बकौल कामेष्वर बैठा भारतीय लोकतंत्र में सशस्त्र संघर्ष की कोई गुंजाइश नहीं है। भारत की स्थिति रूस, चीन और नेपाल से भिन्न है। यहाँ लोकतांत्रिक तरीके से ही अपनी बातों को रखा जा सकता है, चर्चाएँ हो सकती हैं। लेकिन वहीं पूर्व एम.सी.सी. जोनल कमांडर रामाधार सिंह जो विधायक भी रहे हैं फिलहाल राजनैतिक बंदी रिहाई समिति के बिहार संयोजक हैं इसका जोरदार खंडन करते हुए कहते हैं ‘‘जिसे माओवाद के सिद्धांत की अच्छी जानकारी होगी वह विधानसभा या लोकसभा में टिक ही नहीं सकेगा।’’ बकौल रामाधार सिंह आज एक किस्म का भ्रम फैलाया जा रहा है कि बिहार-झारखंड में माओवादी तेजी से लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने के लिए बेचैन दिख रहे हैं। पंचायतों से लेकर संसदीय चुनावों में अपना भाग्य आजमा कर सत्ता में साझीदार बन रहे हैं। लेकिन यह बात सच नहीं है, दो-चार लोगों के आधार पर यह बात नहीं कही जा सकती। विधायक बनकर मैंने यह सारा नाटक देख लिया है। यह चुनाव विधायी व्यवस्था, संवाद ड्रामा है, बदलाव हथियारों के बल पर ही होगा, बशर्ते हथियार जनता उठाए, माओवादी सिर्फ नेतृत्व करंे।
    हालाँकि बिहार में माओवादियों की सोच में कुछ परिवर्तन होता दिख रहा है। यह सिर्फ सरकारी घोषणा नहीं बल्कि कई जिलों में पिछले सात वर्षों में नक्सली हमलों या नक्सल प्रभावित जिलों की सामाजिक शांति और ताने-बाने को देख कर कहा जा रहा है। 2010 के विधानसभा चुनाव और 2011 के पंचायत चुनावों में यहाँ की सरकार ने माओवादियों को उनके समक्ष अपनी बातें रखने और मुख्यधारा में शामिल होने के कई अवसर उपलब्ध कराए। चूँकि पिछले कुछ चुनावों में अपने बहिष्कारों का हश्र भी देख चुके हैं यहाँ के माओवादी। हालाँकि इस स्तर पर बिहार सरकार अन्य सरकारों से बेहतर काम करती नजर आ रही है। 2004 में पी.डब्लू.जी. और एम.सी.सी. के एकीकरण और विलय से इनकी मजबूती दायरे के विस्तार को लेकर तो दिखती है लेकिन संगठन के अंदरूनी हालात ठीक नहीं हैं। स्थानीय नियंत्रण और प्रषासन पर पकड़ इनकी लगातार कमजोर होती जा रही है। कई ऐसी घटनाएँ हुईं जब केंद्रीय नेतृत्व ने घटनाओं का ठीकरा लोकल कमेटी के मत्थे मढ़ दिया। लुकस टेटे और फ्रांसिस इंदवार की हत्या में यही हुआ था, इससे साफ पता चलता है कि तमाम एकीकरण के बावजूद माओवादियों के केंद्रीय और स्थानीय नेतृत्व में तारतम्यता स्थापित नहीं हो पा रही है। शायद इसलिए पिछले कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों में माओवादियों का क्षेत्र विस्तार तो जरूर हुआ लेकिन उनका प्रभाव कम होता जा रहा है। वजहें चाहे जो भी रही हों लेकिन उनके सिद्धांतों को मानने वालों, उनके कदम से कदम मिलाकर चलने वालों की बहुसंख्य आबादी माओवादियों के हिंसात्मक कार्यों या सषस्त्र बल प्रयोग को अब उचित नहीं मानती, माओवादी नेता चाहे जो कहंे लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके समर्थकों की आस्था बढ़ी है। अब वे भी बेवजह हिंसा, मारकाट पसंद नहीं कर रहे हैं।
    इन सबके बीच सबसे अहम सवाल यह पैदा होता है कि भारत जैसे विविधता वाले विषाल देश में नक्सलवाद और माओवाद का सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समाधान है या नहीं या फिर संघर्ष ही अंतिम विकल्प है। आँकड़े या दावे चाहे जो किए जाएँ लेकिन यह एक कटु सत्य है कि माओवाद का खात्मा सैनिक कार्रवाई से तो बिल्कुल ही संभव नहीं है। सैन्य या पुलिसिया कार्रवाई से कुछ भी सधनेवाला नहीं है। हिंसा-प्रतिहिंसा सनक्सलवाद का समाधान तो हो ही नहीं सकता यह बात कई शीर्ष स्तर के अधिकारी भी स्वीकार करते हैं और शायद इसीलिए बिहार के कई नक्सल प्रभावित जिलों में स्थानीय पुलिस पब्लिक-पुलिस मैत्री कार्यक्रम और कम्युनिटी पुलिसिंग कार्यक्रमों को चला रही है। जिसका कुछ सकारात्मक नतीजा भी दिख रहा है। लेकिन यह प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा के समान है। नक्सली समस्या के समाधान के लिए इसे एक आर्थिक-सामाजिक प्रष्न समझ इससे निबटने और हल निकालने का प्रयास होगा तभी इस देश में इसे और पनपने से रोका जा सकता है। यदि छतीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकार संपोषित ‘‘सलवा जुडूम’’ कार्यक्रमों को संरक्षण दिया जाता रहेगा तो माओवाद को कैसे रोका जा सकता है। सलवा जुडूम अर्थात शांति मार्च। 21वीं सदी के वर्तमान इतिहास की कई मामलों में यह सबसे बड़ी त्रासदी है, विषेषकर माओवादियों के लिए। यह संभवतः पहली बार हुआ है कि सरकारी तौर पर जनता की कील जनता की छाती में ठोकी जा रही है। यह इस देष तोे क्या विष्व में कभी नहीं हुआ कि जनता-पुलिस एकसाथ मिलकर शांति मार्च निकाले और अपने कारवाँ में शरीक करने या उसे हिस्सा बनाने के लिए सरकारी दबिशका प्रयोग करके गाँव के गाँव खाली कराए जाएँ। मजबूर होकर हजारों आदिवासी मिलकर नक्सलवादियों के मुकाबले फिदायीन दस्ते में तबदील हो जाएँ, समस्या सुलझने की बजाए और बिगड़ती चली जाए। छतीसगढ़ में यही पिछले वर्षों में हो रहा है।  जहाँ सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद नक्सली अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं और आए दिन वहाँ बेगुनाह फौजी चाहे वे सी.आर.पी.एफ. के हों या सी.आइ.एस.एफ. के जवान मारे जाते हैं। मानवीय पहलू को देखते हुए सरकार को इस पर ठोस निर्णय लेना चाहिए. जिसमें नक्सलियों से वार्ता या बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं-माँगों का निराकरण होना चाहिए।
     जब तक छतीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसी पहेली उलझी रहेगी तब तक इस देष से माओवाद का सफाया नहीं हो सकता। केवल दिल्ली-मुंबई का विकास करने से पूरे देश का विकास नहीं हो सकता। देश के संसाधनों पर उनका उतना ही हक है जो दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज हैं और जो एक वक्त के नाष्ते के लिए लाखों खर्च कर रहे हैं। आर्थिक असमानता को दूर करके ही माओवाद का सफाया संभव है। बाकी सभी प्रयास तभी सफल होंगे जब नक्सलियों को अन्य लोगों की तरह जीने-खाने-कमाने का अवसर वास्तविक धरातल पर मिल सके। केवल कागजों पर नहीं। जितना जल्दी हो सके सामाजिक समरसता बहाल हो।  नक्सलियों को उनके मानवीय अधिकार मिल सकंे तो नक्सलवाद को पनपने या और बढ़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है। असमानता और अन्याय को कम करके ही माओवाद का खात्मा संभव है। 
    माओवाद को एक समस्या नहीं बल्कि एक मुक्त विचार मान कर ही इस गंभीर समस्या का निदान संभव है। जहाँ सभी पक्षों के लोग इसे सहानुभूति नहीं बल्कि इसे आवष्यक आवष्यकता मानें और एकमत से समाज के दलित, पिछड़ों और दशकों से हाषिए पर खड़े लोगों के जीवन का प्रष्न मानंे और उसी प्रकार निर्णय लंे तभी कुछ संभव है अन्यथा सरकार चाहे जितना गोली-बंदूक का भय दिखाए या हिंसा की बात करे नक्सलियों का कुछ खास नहीं कर पाई है और न निकट भविष्य में कुछ कर पाने की स्थिति में हैं।     
- राणा अवधूत कुमार

मो0-09708077877

शनिवार, 5 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-2

ही नकारात्मकता कभी उन दलों की कार्यशौली और उनके संघर्ष के रूप में प्रकट होने लगती है। माओवाद पार्टी से जुड़े संगठनों में यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से कई बार परिलक्षित हुई है। बिहार में लालूराबड़ी शासन में हुए कई जनसंहार इसी प्रक्रिया के हिस्सा रहे हैं।
आपसी सुरक्षा के नाम पर किसानों के निजी तथा जातीय झगड़ों में उलझ जाना, सजा या प्रतिवाद के नाम पर विरोधियों की हत्या करना, महिलाओं के प्रति रूग्रिस्त और अमानवीय मानसिकता का व्यवहार करना और दलेलचक, बघौरा, बाथे और सेनारी जैसे सैकड़ों जातीय नरसंहारों को अंजाम देना इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्तियाँ थीं।
देश का एक बहुसंख्यक समृद्ध वर्ग यह मानता है कि पूँजी निर्माण की राह में नक्सलवाद सबसे गंभीर चुनौती है। उनका तर्क यह भी है कि इससे मुक्त होकर ही चीन दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बना है। समृद्ध और शक्तिशाली बना है। यह तर्क देने वाले देंग सियाओ पेंग के उस महत्वपूर्ण और काफी मशहूर कथन का हवाला देते हैं ॔॔क्या फर्क पड़ता है बिल्ली काली हो या सफेद? चूहे बखूबी पकड़ती हो, चूहों को मारने का दम रखती है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है?’’ देंग ने यह बात 1978 में कही थी, जब वे चीन को माओवाद से मुक्त कराकर ॔मार्केट इकॉनामी’ यानी बाजारी अर्थव्यस्था की राह पर ले जा रहे थे। यहाँ बिल्ली से उनका आशय ॔वाद’ या ॔सिद्घांत’ से था। वे सांकेतिक भाषा में कह रहे थे कि पूँजीवाद हो या साम्यवाद। क्या फर्क पड़ता है? असल बात है कि चीन का विकास हो, समृद्धि आए, लोग आर्थिक रूप से संपन्न हों। चीन में यह
धारणा आज भी यथावत बनी हुई है। भारत जैसे देश के माओवादियों में यह सिद्घांत न पहले रहा है और न भविष्य में आने की उम्मीद।
माओवाद के आलोचक अक्सर इस बात का हवाला भी देते हैं कि नक्सलवाद को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी या अन्य विध्वसंक संगठनों का समर्थन है। उनका मानना है कि आज भी चीन इस तरह के आंदोलनों का सबसे बड़ा मददगार देश है। वह भारत को तबाह करने की मंशा रखता है। नेपाल के माओवादियों को चीन का समर्थन मिलने के कुछ प्रमाण भी मिले हैं। नेपाल से लेकर बिहार, बंगाल, झारखंड, आंध्र प्रदेश, छतीसग़ और कर्नाटक तक के जो नक्सली प्रभाव वाले इलाके हैं ॔रेड कॉरीडोर’ के नाम से जाने जाते हैं। जिनको चीन का परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन देने की बात होती है लेकिन ये बात कितनी सच है? देश के अधिसंख्य माओवाद प्रभावित इलाकों में चीन के बारे में या माओवाद के सिद्घांतों की जानकारी नक्सलियों को है ही नहीं। क्योंकि नक्सल समस्या असल में तो देश की असमान नागरिक सुविधा और लगातार आर्थिक विषमता के कारण ब़ रही है जिसकी तरफ ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है यहाँ की सरकारों को। हाँ खानापूर्ति के लिए कुछ स्थानीय स्तर पर कर्तव्यनिष्ठ जिलाधीशों या पुलिस अधीक्षकों द्वारा प्रयास जरूर हो रहे हैं लेकिन केंद्र या राज्य सरकार की जहाँ से पहल होनी चाहिए वहाँ अभी भी निष्क्रियता बनी हुई है। माओवाद के पसरने का यह भी मुख्य कारण है।
एक और अहम सवाल आज के दौर में उठ रहा है कि किसी भी आंदोलन को आप किस नजरिए से देख रहे हैं? उदाहरण के लिए नक्सलवाद को ही ले लीजिए। केंद्र सरकार इसके समाधान के लिए कभी हथियार उठाने की बात करती है तो कई राज्य सरकारें लचीला रुख अपनाने की दलील देती हुई पूरा सहयोग नहीं करती हैं। देश की राजनीति में अक्सर यह देखा गया है कि जो लोग या दल सत्ता से बाहर होते हैं या विरोध के जो मुद्दे होते हैं सत्ता में आते ही इन मुद्दों को वे भूल जाते हैं। अब वे भी सत्ताधारी लोगों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह तक यह बात साफ तौर पर स्वीकार करते रहे हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण के युग में भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने पर विपक्षी पार्टिंयाँ चाहे जितना शोर मचा लें लेकिन सत्ता में आने के बाद चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर सकतीं और यह बात कितनी हद तक सच है इसका स्पष्ट उदाहरण आंध्र प्रदेश में एन.टी. रामाराव, चंद्रबाबू नायडू, वाई.एस. रेड्डी और अब किरण रेड्डी के विपक्ष से लेकर सत्ता तक की यात्रा के दौरान नक्सलवाद के प्रति बदलते रुख के रूप में देखासमझा जा सकता है। समय के साथ नक्सलियों के विरोध में सरकारें दमनात्मक कार्रवाई करती रहीं और नक्सली सरकारी फरमानों का विरोध भी करते रहे। जिसको जहाँ मौका मिला एकदूसरे को पछाड़ने का, कमजोर करने का कार्य करते रहे। लेकिन क्या इससे देश से माओवाद का खात्मा संभव है या फिर पुलिसिया कार्रवाई से माओवादियों को डरायाधमकाया जा सकता है। नक्सलवाद के जन्म की कहानी को समझ कर ही स्थाई समाधान निकाला जा सकता है।
आज देश के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि प्रधानमंत्री व गृहमंत्री द्वारा नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताने के बावजूद उसका प्रभाव क्षेत्र कैसे ब़ता चला गया है। तमाम तरह की दमनात्मक और सैनिक कार्रवाई और हजारों निरपराध कार्यकर्ताओं को फर्जी मुठभेड़ के नाम पर मारने के बाद भी उसके प्रभावविस्तार को रोका नहीं जा सका है। नक्सलवाद के प्रभाव को रोकने के लिए सरकार पहले इसे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्या के रूप में देखती थी। ऐसा मानते हुए जिन इलाकों में पिछड़ापन है और समाज का जो हिस्सा बेहद पिछड़ा है उनके बीच में उनका प्रभाव होता है। तब सरकार इनके लिए कई तरह की योजनाएँ और विकास के कार्यक्रम चलाती थी। लेकिन देश के कई हिस्सो में यह प्रयोग असफल साबित हुआ है। कई क्षेत्रों में तमाम दावे के बावजूद नक्सलवाद के प्रभाव को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। कहींकहीं तो ये सरकारी मशीनरी पर भारी पड़ते हैं। जहाँ सरकार नक्सलियों के सामने बेबस नजर आती है।
नक्सलवादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टियों के नाम जरूर बदलते रहे हैं। 1990 के पूर्व तक तो सरकार भूमि सुधार कानून को लागू करने पर भी जोर देती थी, कुछ राज्यों में इसे लागू भी किया गया। लेकिन जबसे अमेरिकापरस्त भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू किया गया तब से भूमि सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने की औपचारिकताएँ भी नहीं हो रही हैं। स्थिति कितनी खराब है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश की करीब 74 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजारा करती है। करीब 30 फीसदी दो जून का भोजन नहीं करते हैं। अब तो सरकार कहती भी है कि गाँव के 28 रुपये और शहरी लोग 34 रुपये से अधिक कमाने वाले गरीब नहीं माने जाएँगे। यह उस देश की स्थिति है जहाँ कृषि आज भी 70 फीसदी लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। योजना आयोग के दो टॉयलेट के निर्माण, सौंदर्यींकरण में 35 लाख खर्च होता है, लेकिन किसानोंमजदूरों के लिए 1500 रूपये भी ज्यादा लगता है।
यहाँ एक अहम सवाल और है कि सरकारें देश में नक्सलवाद के ब़ते क्षेत्र का गलत आँकड़ा जनता के सामने पेश करती है। सरकार में बैठे लोग देश के कुल जिलों की तादाद बताकर नक्सलवाद के प्रभाव के जिलों की संख्या बताते हैं। लेकिन देश के कुल जिलों में नक्सलवाद के प्रभाव वाले जिलों की संख्या दिखाई जाएगी तो वह भारत के नक्श्ो पर काफी बड़ा दिखेगा। उससे ज्यादा नक्सलवाद के ब़ते प्रभाव को राज्यवार दिखाया जाएगा तो वह और भयावह दिखेगा।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-1



     नक्सलवाद एक ऐसा शब्द है, जिसे लेकर सरकार के साथ आम देश वासी भी अब चिंतित रहने लगे हैं। बंगाल के एक गाँव से शुरू होने वाला किसान आंदोलन आज देश के करीब 200 से ज्यादा जिलों में फैल गया है। जिसे लेकर अपनी चिंता गाहे-बगाहे सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री, राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन तक जताते रहते हैं। अहम सवाल यह है कि माओवाद के सिद्धांतों को सरकार या जनता किस नजरिए से देखती है? आर्थिक विषमता, सबको समान अवसर और न्याय के साथ विकास जैसे कई महत्वपूर्ण प्रष्न हैं, जिनका जवाब देना, समझना या विचार करना सरकार जरूरी नहीं समझती है। शायद यही वजह है कि तमाम बंदिषों-सख्तियों के बावजूद माओवाद का दायरा बढ़ता जा रहा है।
    माओवाद को विदा कर चीन दुनिया का महाषक्ति बन गया। 01 अक्टूबर 2009 को चीनी क्रांति के 60 वर्ष पूरे होने पर चीन ने दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया। आज वह अविष्वसनीय और स्तब्धकारी ताकत बन चुका है। चीन से चला माओवाद मौजूदा भारत के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बन गया है। देष के नीति-नियंताओं की गलत नीतियों का नतीजा है कि विकास में यह रोड़ा बन गया है। यह जानना भी दिलचस्प है कि क्या नक्सलवाद इतनी बड़ी समस्या है? इसके भाष्यकार कौन थे? कैसे और क्यों उस दौर में प्रतिभाशाली-योग्य युवकों की पीढ़ी इसमें कूदी? क्यों अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार हुए? देष के सर्वश्रेष्ठ काॅलेजों की अनेक प्रतिभाएँ कैसे उन दिनों शरीक हुई? नक्सलबाड़ी गाँव से निकला आंदोलन 250 से ज्यादा जिलों में पसर गया? व्यापक फैलाव के बावजूद इसमें बिखराव-खलन क्यों आए? विचारों और सिद्धांतों में भटकाव कैसे आए? कहाँ से किस रुप में आंदोलन को ताकत मिली?
थोड़ा अतीत में चलते हैं जब किसानों की समस्याओं को लेकर एक जनांदोलन पष्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ। 08 मई 1967 की सुबह को दार्जिलिंग के खैरबाड़ी, फाँसी देवी, नक्सलवाड़ी व सिलीगुड़ी के इलाकों में जमीन जोतने वालों द्वारा जबरन कब्जा, फसल दखल और जोतदारों के घरों पर धावा बोल उनकी बंदूकें छीनने जैसी कार्रवाइयाँ शुरू हो गईं। इतिहास में यह नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के नाम से जाना गया। आंदोलन में भूमिगत हुए नेताओं को गिरफ्तार करने आई पुलिस पर हजारों किसानों ने तीर-धनुष जैसे परंपरागत शस्त्रों से जवाबी हमला किया। आर-पार की लड़ाई कई दिनों तक चलती रही। पुलिस ने बर्बरतापूर्वक महिलाओं-बच्चों के जुलूस पर छिपकर गोलियाँ चलाईं। इस जनसंहार में कई बच्चे और निर्दोष महिलाएँ मारी गई। इस जनसंहार के प्रतिवाद में देश  भर में किसानों-मजदूरों ने रैली व मषाल जुलूस निकाला। तब आंदोलन में षिक्षक, वकील से लेकर चाय बागान के दैनिक वेतन भोगी मजदूर हड़ताल कर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन से प्रेरित होकर देश भर में किसान आंदोलन भड़क उठे। जो कालांतर में माओवाद के रूप में देश  के कई हिस्सों में प्रतिस्फुटित हुआ। किसानों की समस्याओं से शरू हुआ आंदोलन आगे चलकर अपने सिद्धांतों से विमुख होकर कई नरसंहारों का वाहक भी बना। हजारों बेगुनाह लोग बेवजह मारे गए।
    वस्तुतः माओवाद एक ठहरे हुए समय की ठहरी हुई वैचारिक, राजनैतिक, सामाजिक प्रवृति है। करीब चार दषकों के ठहराव से यह अनेक प्रकार की विच्युतियों और विकृतियों का सबब बन गया है। माओवादियों के लिए समय का चक्र कम्युनिस्ट आंदोलन की संक्षिप्त कालावधि 1966-69 में ही रुक गया। उसी काल में उभरी एक खास वैचारिक, राजनैतिक विचारधारा का बंदीगृह यानी जेल ही उनका मुक्तिलोक है, जिसे इस लोक में साकार करने में हिंसक जद्दोजहद ही उनका मुक्तिसंग्राम और उनका परिचय माओवाद। तब माओवाद के सिद्धांतों ने समाज के पिछड़ों-दलितों को सहज रूप से आकर्षित किया। माओवादी पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टी के अर्थों में एक पार्टी की शक्ल लेने में अब तक समर्थ नहीं हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण घटक एम.सी.सी. पिछले 43 वर्षों से पार्टी निर्माण के लिए अनुकूल परिस्थिति की प्रतीक्षा करता रहा।
    कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में एक नए संगठन से पार्टी बनने में इतना वक्त संभवतः किसी संगठन ने नहीं लिया होगा। 43 वर्षों तक जिस संगठन ने ढीले-ढाले केंद्र का जीवन जिया उसके लिए लेनिन या माओ की जनवादी केन्द्र आधारित पार्टी संगठन का स्वरूप लेना लगभग नामुमकिन है। उसकी सब-जोनल, जोनल या स्पेषल एरिया कमेटियाँ तथा सशस्त्र दस्ते स्वतंत्रता की अंतिम हद तक स्वायत्त थे। अपने प्रभाव वाले इलाकों में लेवी वसूलने और पुलिस से हथियार लूटने पर उनका एकाधिकार था। माओवाद के सिद्धांतो-विचारों से उनका सरोकार खत्म होता गया है। संयुक्त पार्टी बनने के बाद भी स्थानीय स्तरों पर हुई लूट, हत्याओं और अन्य कारनामों के केंद्र में यही धन और हथियारों पर अपने स्वामित्व या अधिकार का सवाल था। धन लिप्सा ने आधुनिक भारत में माओवादियों के विचारों को बदल दिया है। बावजूद इसके माओवादियों के संगठन का न तो विस्तार रुका और न हीं उनकी कार्यषैली में कोई बदलाव आया। समय के साथ उनके सिद्धांत जरूर बदलते गए। कल तक पुलिस को षिकार बना रहे नक्सलियों के लिए आम आदमी भी टारगेट बन रहे हैं। आम आदमी के टारगेट बनने से ही माओवादियों के प्रति सरकार या जनता की सहानुभूति लगातार कम हो रही है।
    यहीं से भारत में माओवाद के सिद्धांत या उनके कर्ता-धर्ता विचारों से भटक गए। हालाँकि सरकारी नीतियाँ भी उन्हें समय-समय पर तोड़ने में कामयाब रही हैं। एक विचार धारा आधारित राजनैतिक दल का ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच काम करना काफी मुष्किल भरा कार्य है। किसानों के आंदोलनों अथवा संघर्षों में उसकी भागीदारी का उद्देष्य किसानों को अपनी राजनीति से लैस करना और राजनैतिक रूप से प्रतिबद्ध एवं प्रबुद्ध जनाधार का निर्माण करना होता है। ऐसी स्थिति में आंदोलनों द्वारा राजनीति में उसकी भागीदारी की सफलता की कसौटी वे इस बात को बताते हैं कि पार्टी की सदस्य-संख्या में पहले की अपेक्षा कितनी बढ़ोतरी हुई। कितनी नई पार्टी यूनिटें तैयार हुई और पार्टी का राजनैतिक जनाधार कितना विस्तृत हुआ। जो इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें वे खास महत्व नहीं देते, यह एक प्रक्रिया है। दूसरी प्रक्रिया इन पार्टियों के किसानीकरण की है। किसान वर्ग के कई सकारात्मक पहलू हैं तो वहीं उसकी रूढि़याँ और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और संकीर्णताएँ भी हैं जो इन दलों के राजनीतिकरण पर भारी पड़ जाती हैं।
 -राणा अवधूत कुमार



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