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रविवार, 8 मई 2016

किसान देश का वास्तविक मालिक है

                                                                                                                                                                            बाराबंकी। किसान देश का वास्तविक मालिक है और सच्चा राष्ट्रवादी उसी को कहा जाना चाहिए। जो हुकुमते किसानों की हित की बात करे वहीं देश भक्त कहलाने के लायक है और जो उनके लिए कुचक रचे वो देश द्रोही है।
अखिल भारतीय किसान सभा द्वारा रविवार को गांधी भवन के सभागार में ‘किसान और राष्ट्रवाद’ विषयक गोष्ठी पर अपने सम्बोधन में उक्त विचार सुप्रसिद्ध मजदूर नेता रामकृष्ण ने रखे। उन्होने कहा कि इस देश की विडम्बना यह है कि अल्पसख्यक पंूजीपति बहुसंख्यक जनमानस का शोषण दोहन करके राज कर रहे है। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की हो नीतियां उद्योगपतियों को लाभान्वित करने तथा किसानों का दर्द बढाने के लिए बनायी जाती है। उन्होंने कहा कि कम्पनी एक्ट व इन्कम टैक्स एक्ट में बदलाव की जरूरत है क्योंकि इनमें दोहरी कानूनी व्यवस्था है। मजदूर लीडर ने कहा कि एक लाख चैदह हजार रूपये केन्द्र की मौजूदा सरकार अपने मित्र उद्योगपतियों के कर्जों को माफ कर उन्हें तोहफा देने में जरा भी शर्म नहीं करती है जबकि किसान व मेहनतकश लोगों को लोन देने में तरह तरह की बाधायें उत्पन्न करती है और ब्याज भी अधिक लेती है इसके साथ साथ वसूली में भी कोई रियायत भी सरकार नहीं करती है।
    उन्होंने कहा कि आज राज्य व राष्ट्र के बीच में केन्द्र सरकार जो भ्रम फैला रही है वो मक्कारी का कार्य है। आज उन लोगों को राष्ट्रवाद की जरूरत है। जिन्होंने राष्ट्रपिता व सिद्धान्तों की हत्या की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र एक अवधारणा है अमूर्त और जन संघर्ष ने इसे मूर्त रूप प्रदान किया है और इस जनसंघर्ष का प्रारम्भ 1857 में मौलवी अहमद उल्ला शाह द्वारा प्रतिपादित एजण्डे से हुआ। इस जनसंघर्ष में लगभग एक करोड लोग हताहत हुये। जिसमें 20 लाख मौलवी मुल्ला थे। राष्ट्रवाद के नाम पर देश में दूसरी बार एकजुटता 1942 में गांधी जी के नेतृत्व में देशवासियों को पुनः उत्पन्न हुई।
    उ0प्र0 अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व एमएलसी गयासुद्दीन किदवई ने कहा कि आज देश में दो तरह के किसान पाये जाते है एक वह जो खेतोें में अपना पसीना बहाकर दो वक्त की रोटी अपने परिवार के लिए जुटाते है, दूसरे वो सरमाएदार जो अपने काले धन को सफेद करने के उद्देश्य से काश्तकार बन रहे है। ऐसे लोगों के विरूद्ध जनता को जनआन्दोलन चलाना चाहिए। उन्होंने देश की वर्तमान राजनीति परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुये कहा कि चतुर राजनेता जनता को धर्मजाति के मुद््दों पर ले जाकर उनके अंदर राजनीतिक परिपक्वता पनपने नहीं देते।
    रिहाई मंच के अध्या मो0 शुऐब एडवोकेट ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आज देश में राष्ट्रवाद शब्द का दुप्र्रयोग किया जा रहा है। देश में बसने वाले अल्पसंख्यकों जिनके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई में कुरबानियां दी उनसे राष्ट्रवादिता की सनद वो लोग मांग रहे है जिनकी स्वतन्त्रता संग्राम में कोई भी भूमिका होने की दूर की बात बल्कि अंग्रेज शासकों के साथ सहानुभूति में रहीं।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष बृजेश कुमार दीक्षित ने कहा कि आर0एस0एस0 ने बड़ी होशियारी से पूरे देश में नफरत का माहौल तैयार कर दिया है और तथाकथित देश भक्ति व राष्ट्र प्रेम के नाम पर ऐसे-ऐसे मुद्दे उठाये जा रहे है जो देश की परम्परागत  सामाजिक व धार्मिक समरसता व उसकी अखण्डता के वजूद के लिए खतरा है।
    गोष्ठी को उपभोक्ता फोरम के पूर्व सदस्य हुमायू नईम खां, बृजमोहन वर्मा, रणधीर सिंह सुमन, मौलाना व डा0 तस्खीर उल हसन, ने सम्बोधित किया तथा संचालन पत्रकार तारिक खान ने किया।
    कार्यक्रम में पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, नीरज वर्मा, विनय कुमार सिंह, राम नरेश, गिरीश चन्द्र, मो0 कदीर, इमतियाज अली, अमर सिंह आदि उपस्थित थे।



शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

देश, लोकतंत्र एवं गंगा जमुनी सभ्यता पर संकट


    16वीं लोकसभा का चुनाव कोई सामान्य चुनाव नहीं है। देश के दुश्मनों ने बड़ी चतुराई के साथ देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा गंगा जमुनी तहजीब की ईंट से ईंट बजाने की योजना दबे पाँव बना ली हैं। उनका निशाना कुल मतदाताओं का एक तिहाई वह नवजवान है जो भारतीय संस्कृति से अनभिज्ञ है तथा भौतिकवाद की दुनिया में पला बढ़ा है।
    देश के प्रमुख दलों में से एक भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर जिस आक्रमक तेवर के साथ कारपोरेट जगत व मीडिया के सहारे अपने चुनाव प्रचार के गुब्बारे में हवा भरी है क्या उसका उत्तर देश की जनता देगी? इसका बेचैनी से इन्तजार न केवल देश के शत्रुराष्ट्रों को है बल्कि मित्र राष्ट्र भी उत्सुकता के साथ 16 मई के दिन का इन्तजार कर रहे हैं।
    वर्ष 2002 में गुजरात प्रान्त में हुए साम्प्रदायिक दंगे और उसके चलते गोधरा में हुए मुस्लिम नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी, जिस प्रकार विगत एक वर्ष से झूठ व अर्द्धसत्य का सहारा लेकर अपनी ही पार्टी के अनुभवी व पार्टी के संस्थापक दिग्गजों को हाशिए पर ढकेल कर स्वयं को प्रधानमंत्री मानकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं वह कोई मामूली बात नहीं है।
    भाजपा की पैतृक संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, उसकी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था हिन्दू सेवा संघ (एच.एस.एस.) और देश की आर्थिक उन्नति एवं औद्योगिक विकास से फिक्रमंद शत्रु राष्ट्रों ने मिलकर इस बार देश के युवा मतदाताओं की राजनीतिज्ञ अपरिपक्वता व उनकी अनुभवहीनता का लाभ उठाने का एक मंसूबा बनाया है और देश के वर्तमान लोकतांत्रिक स्वरूप व इसके ताने बाने को नष्ट कर फासीवादी व्यवस्था की ओर ले जाने का एक षड्यंत्र रचा है।
    नरेन्द्र मोदी का स्वयं के अनुकूल पोषण उस आर.एस.एस. ने किया है जहाँ महिलाओं के अधिकार का कोई प्रश्न नहीं, अल्पसंख्यकों के जीने के हक का कोई सवाल नहीं। लोकतंत्र व प्रजातंत्र का कोई मतलब नहीं,  जो संघ संचालक का आदेश वही कानून, हिटलर व मुसोलिनी की विचारधारा से प्रभावित इस संस्था ने बहुत दिन पर्दे के पीछे रहकर,  अटल बिहारी और जसवन्त सिंह जैसे मृदुभाषी एवं सभ्य राजनेताओं के मुखौटे लगाकर पहले जनसंघ व बाद में भाजपा जैसा राजनैतिक दल बनाकर सत्ता हासिल करने के प्रयोग किए परन्तु नाकामी हाथ लगी।
    अब खुलकर दो-दो हाथ करने के मूड में आ चुके संघ ने इस चुनाव में काफी पहले से ही तैयारी करके मैदान पकड़ा है। पहले तो समाजसेवी अन्ना हजारे को महाराष्ट्र से उठाकर दिल्ली लाया गया, साथ में साधु संतों, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट व सेवानिवृत्त फौजी अफसरों को जमाकर अपने संघी सिपाहियों की सेना उतारकर देश में अराजकता फैलाने का प्रयास किया गया। भ्रष्टाचार व महँगाई को मुद्दा बनाया गया जबकि इस हमाम में भाजपा स्वयं भी नंगी थी। बावजूद इसके काफी दिन यह माहौल गर्म रहा, परन्तु जब केन्द्र सरकार ने बरसों से लम्बित पड़े लोकपाल बिल को लोकसभा से पारित कराकर राज्यसभा में भेजा तो भाजपा के गले गुड़ भरे हँसिया के समान वह लटक गया। अंत में राज्यसभा में बिल न पास होने से भाजपा का किरदार नंगा होकर सामने आ गया।
    यहाँ से अन्ना की टीम बिखर गई और आप पार्टी का वजूद अमल में आ गया जो भाजपा के लिए स्वयं जी का जंजाल बनकर खड़ी हो गई और दिल्ली विधानसभा सत्ता प्राप्ति के सफर को उसने ब्रेक डाउन कर भाजपा को करारा झटका दे दिया लेकिन कांग्रेस का दिल्ली से एक दम सफाया कर भाजपा के दिल को खुश करने का एक काम वह जरूर कर गई।
    जहाँ तक भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर, तानाशाही के अंदाज में जो प्रचार प्रारम्भ किया गया है वह भारतीय राजनीति में एक तरह का प्रयोग है और यह प्रयोग पूँजीवादी राष्ट्रों के सरगना अमरीका की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नकल है, जहाँ दो पार्टी सिस्टम है और चुनावी प्रचार व्यक्तित्व पर केन्द्रित रहता है। यहीं से भाजपा, आर.एस.एस., एच.एस.एस. व सी.आई.ए. के तालमेल का इशारा मिलता है।
    पूँजीवादी राष्ट्र भले ही अपने यहाँ लोकतंत्र व प्रजातंत्र की सुदृढ़ता को बल देते रहे हांे, परन्तु उनकी मंशा कभी भी विकासशील व अविकसित राष्ट्रों में लोकतंत्र की मजबूती व राजनैतिक स्थिरता की नहीं रही। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान इसका स्पष्ट उदाहरण है, जो स्वतंत्रता के बाद से आज तक पूँजीवादी राष्ट्र अमरीका के चंगुल से आजाद न हो सका, परिणाम स्वरूप वहाँ के नागरिक सदैव लोकतंत्र के खुले माहौल को तरसते रहे। राजनैतिक अस्थिरता के चलते वहाँ की अर्थव्यवस्था कराह रही है, आतंकवाद का दानव फनफना कर मानवता को डँसता जा रहा है।
        नरेन्द्र मोदी अपनी कट्टरपंथी विचारधारा व हिटलर शाही रवैये के लिए अपनी पार्टी में पहचाने जाते हैं, उन्होंने गुजरात में चार-चार मुख्यमंत्रियों को गर्त में ढकेल कर सत्ता पर कब्जा कर रखा है। अल्पसंख्यक क्या, किसी की मजाल नहीं कि कोई उनकी मर्जी के विरुद्ध एक शब्द बोल सके। मायावती, जयललिता और ममता सभी उनके हिटलरशाही मिजाज के मामले में पीछे हैं।
    नरेन्द्र मोदी ने इस बार भी अपनी ही पार्टी में गदर पैदा कर दिया है। भाजपा के आन्तरिक लोकतंत्र को वह नष्ट कर चुके हैं। आडवाणी, शिवराज सिंह, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, यशवन्त सिंह, शत्रुहन सिन्हा, विनय कटियार, मुख्तार अब्बास नकवी, लालजी टण्डन पार्टी में दुबक से गए हैं। अपनी ही पार्टी में वे बेगाने हो चुके हैं। नेता विरोधी दल की हैसियत रखने वाली नेत्री सुषमा स्वराज व शोला बयान नेत्री उमा भारती की भी बोलती बंद कर दी गई है।
    यदि यूँ कहा जाए तो गलत न होगा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदलने का संकल्प लेकर उतरने वाली भाजपा व उसके प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने शुरूआत अपने घर से ही प्रारम्भ कर दी है। शायद इसीलिए भाजपा से निष्कासित वयोवृद्ध भाजपा नेता जसवन्त सिंह को यह कहना पड़ा कि हम लोगों की भाजपा पुरानी भाजपा थी और अब यह नई भाजपा है।
    भाजपा के इस रूप परिवर्तन का पहला प्रभाव एन.डी.ए. के गठबंधन पर पड़ा और उसका प्रमुख सहयोगी दल जनता दल (यू0) की उससे तलाक हो गई। नीतीश कुमार व शरद यादव से डेढ़ दशक पुरानी दोस्ती का अंत हो गया, बदले में दलित नेता रामविलास पासवान का साथ पकड़ कर भाजपा ने अपने कुछ आँसू अवश्य धो डाले।
    भाजपा ने लोकसभा चुनाव की घोषणा से बहुत पहले ही मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का न केवल उम्मीदवार घोषित कर दिया बल्कि अपने प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी दल कांग्रेस को भी इसी तर्ज पर चुनाव लड़ने की दावत दी। भाजपा के इस प्लान में मदद कांग्रेस के उन नेताओं ने करनी शुरू कर दी जो राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते रहे हैं। इससे पूर्व कांग्रेस ने कभी भी न तो अपना मुख्यमंत्री चुनाव से पूर्व घोषित किया और न प्रधानमंत्री। कांग्रेस नेतृत्व भले ही किसी को मुख्यमंत्री नामजद कर देता था परन्तु अन्तिम निर्णय प्रदेश के विधान मण्डल द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के द्वारा किया जाता रहा। यही प्रक्रिया प्रधानमंत्री के चयन में भी की जाती रही है। कांग्रेस हाईकमान ने भाजपा की चाल का पूर्वानुमान करते हुए राहुल गांधी के नाम का एलान बतौर प्रधानमंत्री करने से परहेज कर लिया और कांग्रेस ने पूर्व की परम्परा की भाँति एक नेता के नेतृत्व में चुनावी अभियान चलाने का निर्णय लेकर कुछ हद तक भाजपा के गेम प्लान को आघात पहुँचाया।
    भारतीय लोकतंत्र पर भाजपा व आर.एस.एस. का यह आक्रमण कोई नया नहीं है इससे पूर्व गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि समय आ गया है कि देश की जनता का विचार इस मुद्दे पर लिया जाए कि देश में प्रधानमंत्री फार्म आॅफ गवर्नेन्स की लोकतांत्रिक व्यवस्था रहना उचित रहेगा। जैसा कि अभी तक चल रहा है या फिर अमरीकी स्टाइल की राष्ट्रपति फार्म आॅफ गवर्नेन्स अधिक प्रभावशाली व उपयोगी रहेगा इसका जब विरोध सभी दलों की ओर से सामने आया तो आडवाणी को अपने कदम वापस खींचने पड़े।
    भारतीय संविधान में संघीय स्वरूप को बल दिया गया है, प्रान्तों की राजनैतिक स्वतंत्रता व अधिकार को महत्व दिया गया है। केन्द्र को प्रान्तों की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता व स्वायत्तता पर अंकुश लगाने का अधिकार संविधान में केवल आपातकाल में दिया गया है जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के द्वारा 1975 में आन्तरिक सुरक्षा के नाम पर किया गया था और जिसके दुष्परिणाम सामने आए थे और नतीजे में जो राजनैतिक अस्थिरता देश में उत्पन्न हुई उससे आज भी देश उबर नहीं सका है।
    मोदी को आगे रखकर, नवजवानों के ऊपर अपना सारा प्रचार केन्द्रित करके आर.एस.एस. तथा देश व विदेशों में बैठे अपने पूँजीपति मित्रों के निर्देशों पर भाजपा ने जिस राजनैतिक प्रयोग का प्रारम्भ भारतीय राजनीति में किया है वह देश के लोकतंत्र, प्रजातंत्र,
धार्मिक सद्भाव, कौमीयकजहती के लिए तो खतरा है ही, साथ ही मानव अधिकारों के ऊपर भी जबरदस्त संकट सिद्ध होगा।
    अब प्रश्न उठता है कि देश के शत्रु राष्ट्रों ने यह प्रयोग मोदी के द्वारा क्यों देश में प्रारम्भ किया तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र की सरकार से जितना काम इन शक्तियों को लेना था वह ले लिया गया। एफ.डी.आई. से लेकर परमाणु समझौते पर कांग्रेस सरकार इन विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करती रही, लेकिन कहीं न कहीं कांग्रेस की अपनी मजबूरियाँ हैं जो इन विदेशी पूँजीपतियों के साथ तालमेल आड़े आ रही थीं, इसीलिए इन सरमाएदारों ने एक बार फिर अपने पुराने मित्र भाजपा पर दाँव लगाने को मन बनाया है और उसकी सफलता के लिए प्रचारतंत्र का भरपूर प्रयोग किया जा रहा हैै। आर.एस.एस. जिसकी विदेशी यूनिट हिन्द सेवा संघ (एच.एस.एस.) है, को भी पूरी तरह से खुलकर इस बार मैदान में उतार दिया गया है। हिन्दुत्व की बयार के स्थान पर इस बार अनेक झूठे वायदों व सुन्दर सुहाने भविष्य के सपने दिखाने का काम इलेक्ट्रानिक व प्रिन्ट मीडिया से कराया जा रहा है। मोदी सरकार के गुणों का गान माडर्न संगीत से लेकर हर-हर मोदी के धार्मिक नारों का प्रयोग करके किया जा रहा है।
    यह समय भारतीय नागरिकों की राजनैतिक परिपक्वता व दक्षता की परीक्षा का है। अभी तक यदि पूँजीवादी व साम्प्रदायिक शक्तियों को देश का नेतृत्व करने में पूर्णतया सफलता नहीं मिल सकी है तो उसका सारा श्रेय भारतीय जनता को जाता है जिनका आम मिजाज शान्तिप्रिय व सामाजिक समरसता का रहा है। उसे प्रदूषित कर दिमागों में ज़हर भरने का काम स्वतंत्रता संग्राम के समय से देश के दुश्मनों द्वारा किया जाता रहा है, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
             कांग्रेस, सपा, बसपा व अन्य प्रान्तीय दलों के भीतर भ्रष्ट साम्प्रदायिक व आपराधिक तत्वों की मौजूदगी को नकारा नहीं जा सकता परन्तु इन दलों की विचार धारा को देश के लिए घातक कदापि नहीं कहा जा सकता। भाजपा देश की एकमात्र, एक ऐसी राजनैतिक जमात है जो संकीर्ण धार्मिक विचार धारा, सामन्ती प्रबंध तंत्र एवं पूँजीवाद की पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्देश पर काम करती है। इस प्रकार की विचारधारा इस देश की बहुरंगी सभ्यता तथा गरीब परवर मुल्क के लिए कदापि उचित नहीं ठहरायी जा सकती।  
    -  मो. तारिक  खान   
मो0 09455804309

सोमवार, 7 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-3

किन्तु  नक्सलवाद के प्रभावों का आकलन देश  के कुल गाँवों की संख्या के आधार पर किया जाएगा तो उसका प्रभाव महज दो-तीन प्रतिशत गाँवों तक ही दिखेगा। किसी समस्या का प्रचार-प्रसार या यूँ कहें कि प्रचार की भाषा अपनी योजनाओं व रणनीतियों के अनुसार ही तय किया जाता है। सरकार यहाँ भी आँकड़ों की बाजीगिरी दिखा देश  के लोगों को ठगने का काम करती है। देश के लोगों के सामने जब इस तरह की तस्वीर पेश की जाएगी कि करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा इलाकों में नक्सलवाद पसर चुका है तो उसका संदेशभी अलग जाएगा। सरकार चाहे एन.डी.ए. की हो या यू.पी.ए. दोनों जिस तरह से नक्सलवाद के प्रभाव के विस्तार का वर्णन करती हंैे इसके पीछे उनके इरादे कुछ और होते हैं। इसलिए वह इसे समस्या के रूप में प्रचारित करती रही है, आंदोलन के रूप में नहीं। समस्या बताते हुए इसके समाधान और इसे कुचलने के लिए हथियारों का प्रयोग भी जमकर होता है। इसके नाम पर करोड़ों रुपये लूटने के साथ हजारों बेगुनाह लोग गोली का शकार भी बनते हैं। रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद समस्या को आंदोलन कहा जा सकता है लेकिन नक्सलवाद को आंदोलन का नाम देने में राजनैतिक परेशनी खड़ी हो जाती है। सरकार का यह दोहरा चरित्र-व्यवहार देश  के लिए घातक हो सकता है।
    देश  कीे अधिसंख्य कृषि योग्य भूमि को एस.इ.जेड. यानी औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार किसानों को मुआवजे के नाम पर केवल खानापूर्ति कर रही है। जिन इलाकों में नई नीतियों के तहत नए उद्योग विकसित किए जा रहे हैं वहाँ से भुखमरी और आत्महत्या की खबरें सर्वाधिक आ रही हैं। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जो देश  के विकसित राज्यों की श्रेणी में आते हैं वहाँ सेे किसानों के आत्महत्या के मामले ज्यादातर आते हैं। एक आँकड़े के अनुसार केवल महाराष्ट्र में पिछले 20 वर्षों में 10000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले 10 वर्षों में झारखंड, छतीसगढ़ और ओडि़सा नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं क्योंकि वहाँ की सरकार की नीतियाँ किसानों के विरुद्ध रही हैं। केवल झारखंड को ही लें तो पिछले 11 वर्षों में यहाँ के शासक चाहे वे एन.डी.ए. हो या यू.पी.ए., ने यहाँ की खनिज संपदा को निर्दयता पूर्वक लूटने और दोहन करने का ही काम किया है। वहाँ की 70 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन यह जान बेहद आष्चर्य होगा कि अविभाजित बिहार से लेकर अलग राज्य बनने के बाद से लेकर आज तक कोई कृषि नीति नहीं बनाई गई। नतीजा है कि झारखंड के कुल क्षेत्रफल की मात्र 25 फीसदी जमीन ही कृषि योग्य है और इसमें से सिर्फ 8 प्रतिशत भूमि ही सिंचित है। गरीबी, बेरोजगारी, भूख और लगातार उत्पीड़न और अवहेलना से नाराज झारखंडी युवा आसानी से माओवादी बन रहे हैं। राज्य मषीनरी व लोकतंत्र की विफलता और भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों, ठेकेदारों और पूँजीपतियों की करतूतों ने पूरे सूबे में माओवादियों के प्रभाव बढ़ाने में खाद-पानी का काम किया। यह कहना तो सरासर गलत है कि झारखंड के आदिवासियों-गरीबों ने राजव्यवस्था के खिलाफ हथियार उठा लिया है लेकिन यह भी एक स्याह सच है कि स्टेट पावर तेजी से उन गरीबों का विष्वास खोती जा रही है और यह स्थिति करीब सभी नक्सल प्रभावित राज्यों की है।
    हालाँकि इस तरह के आंदोलनों का अंत कहाँ होगा और उनको न्याय कैसे मिलेगा? इस पर भी माओवादियों के नेताओं की राय में काफी भिन्नता है? पूर्व माओवादी नेता और पलामू, झारखंड से लोकसभा सांसद कामेष्वर बैठा कहते हैं कि ‘‘मैं खुद पिछले 29 वर्षों से परचे-पोस्टर चिपकाता रहा, चुनाव का बहिष्कार करता रहा लेकिन उसका कोई फायदा न तो पहले मिला था और न अब। बहिष्कार या विरोध का यह नारा सिर्फ कागजों पर, दीवारों पर और पोस्टरों तक सिमट कर रह जाता है।’’ बकौल कामेष्वर बैठा भारतीय लोकतंत्र में सशस्त्र संघर्ष की कोई गुंजाइश नहीं है। भारत की स्थिति रूस, चीन और नेपाल से भिन्न है। यहाँ लोकतांत्रिक तरीके से ही अपनी बातों को रखा जा सकता है, चर्चाएँ हो सकती हैं। लेकिन वहीं पूर्व एम.सी.सी. जोनल कमांडर रामाधार सिंह जो विधायक भी रहे हैं फिलहाल राजनैतिक बंदी रिहाई समिति के बिहार संयोजक हैं इसका जोरदार खंडन करते हुए कहते हैं ‘‘जिसे माओवाद के सिद्धांत की अच्छी जानकारी होगी वह विधानसभा या लोकसभा में टिक ही नहीं सकेगा।’’ बकौल रामाधार सिंह आज एक किस्म का भ्रम फैलाया जा रहा है कि बिहार-झारखंड में माओवादी तेजी से लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाने के लिए बेचैन दिख रहे हैं। पंचायतों से लेकर संसदीय चुनावों में अपना भाग्य आजमा कर सत्ता में साझीदार बन रहे हैं। लेकिन यह बात सच नहीं है, दो-चार लोगों के आधार पर यह बात नहीं कही जा सकती। विधायक बनकर मैंने यह सारा नाटक देख लिया है। यह चुनाव विधायी व्यवस्था, संवाद ड्रामा है, बदलाव हथियारों के बल पर ही होगा, बशर्ते हथियार जनता उठाए, माओवादी सिर्फ नेतृत्व करंे।
    हालाँकि बिहार में माओवादियों की सोच में कुछ परिवर्तन होता दिख रहा है। यह सिर्फ सरकारी घोषणा नहीं बल्कि कई जिलों में पिछले सात वर्षों में नक्सली हमलों या नक्सल प्रभावित जिलों की सामाजिक शांति और ताने-बाने को देख कर कहा जा रहा है। 2010 के विधानसभा चुनाव और 2011 के पंचायत चुनावों में यहाँ की सरकार ने माओवादियों को उनके समक्ष अपनी बातें रखने और मुख्यधारा में शामिल होने के कई अवसर उपलब्ध कराए। चूँकि पिछले कुछ चुनावों में अपने बहिष्कारों का हश्र भी देख चुके हैं यहाँ के माओवादी। हालाँकि इस स्तर पर बिहार सरकार अन्य सरकारों से बेहतर काम करती नजर आ रही है। 2004 में पी.डब्लू.जी. और एम.सी.सी. के एकीकरण और विलय से इनकी मजबूती दायरे के विस्तार को लेकर तो दिखती है लेकिन संगठन के अंदरूनी हालात ठीक नहीं हैं। स्थानीय नियंत्रण और प्रषासन पर पकड़ इनकी लगातार कमजोर होती जा रही है। कई ऐसी घटनाएँ हुईं जब केंद्रीय नेतृत्व ने घटनाओं का ठीकरा लोकल कमेटी के मत्थे मढ़ दिया। लुकस टेटे और फ्रांसिस इंदवार की हत्या में यही हुआ था, इससे साफ पता चलता है कि तमाम एकीकरण के बावजूद माओवादियों के केंद्रीय और स्थानीय नेतृत्व में तारतम्यता स्थापित नहीं हो पा रही है। शायद इसलिए पिछले कुछ वर्षों में देश के कई हिस्सों में माओवादियों का क्षेत्र विस्तार तो जरूर हुआ लेकिन उनका प्रभाव कम होता जा रहा है। वजहें चाहे जो भी रही हों लेकिन उनके सिद्धांतों को मानने वालों, उनके कदम से कदम मिलाकर चलने वालों की बहुसंख्य आबादी माओवादियों के हिंसात्मक कार्यों या सषस्त्र बल प्रयोग को अब उचित नहीं मानती, माओवादी नेता चाहे जो कहंे लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके समर्थकों की आस्था बढ़ी है। अब वे भी बेवजह हिंसा, मारकाट पसंद नहीं कर रहे हैं।
    इन सबके बीच सबसे अहम सवाल यह पैदा होता है कि भारत जैसे विविधता वाले विषाल देश में नक्सलवाद और माओवाद का सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समाधान है या नहीं या फिर संघर्ष ही अंतिम विकल्प है। आँकड़े या दावे चाहे जो किए जाएँ लेकिन यह एक कटु सत्य है कि माओवाद का खात्मा सैनिक कार्रवाई से तो बिल्कुल ही संभव नहीं है। सैन्य या पुलिसिया कार्रवाई से कुछ भी सधनेवाला नहीं है। हिंसा-प्रतिहिंसा सनक्सलवाद का समाधान तो हो ही नहीं सकता यह बात कई शीर्ष स्तर के अधिकारी भी स्वीकार करते हैं और शायद इसीलिए बिहार के कई नक्सल प्रभावित जिलों में स्थानीय पुलिस पब्लिक-पुलिस मैत्री कार्यक्रम और कम्युनिटी पुलिसिंग कार्यक्रमों को चला रही है। जिसका कुछ सकारात्मक नतीजा भी दिख रहा है। लेकिन यह प्रयास ऊँट के मुँह में जीरा के समान है। नक्सली समस्या के समाधान के लिए इसे एक आर्थिक-सामाजिक प्रष्न समझ इससे निबटने और हल निकालने का प्रयास होगा तभी इस देश में इसे और पनपने से रोका जा सकता है। यदि छतीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकार संपोषित ‘‘सलवा जुडूम’’ कार्यक्रमों को संरक्षण दिया जाता रहेगा तो माओवाद को कैसे रोका जा सकता है। सलवा जुडूम अर्थात शांति मार्च। 21वीं सदी के वर्तमान इतिहास की कई मामलों में यह सबसे बड़ी त्रासदी है, विषेषकर माओवादियों के लिए। यह संभवतः पहली बार हुआ है कि सरकारी तौर पर जनता की कील जनता की छाती में ठोकी जा रही है। यह इस देष तोे क्या विष्व में कभी नहीं हुआ कि जनता-पुलिस एकसाथ मिलकर शांति मार्च निकाले और अपने कारवाँ में शरीक करने या उसे हिस्सा बनाने के लिए सरकारी दबिशका प्रयोग करके गाँव के गाँव खाली कराए जाएँ। मजबूर होकर हजारों आदिवासी मिलकर नक्सलवादियों के मुकाबले फिदायीन दस्ते में तबदील हो जाएँ, समस्या सुलझने की बजाए और बिगड़ती चली जाए। छतीसगढ़ में यही पिछले वर्षों में हो रहा है।  जहाँ सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद नक्सली अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं और आए दिन वहाँ बेगुनाह फौजी चाहे वे सी.आर.पी.एफ. के हों या सी.आइ.एस.एफ. के जवान मारे जाते हैं। मानवीय पहलू को देखते हुए सरकार को इस पर ठोस निर्णय लेना चाहिए. जिसमें नक्सलियों से वार्ता या बातचीत के जरिए उनकी समस्याओं-माँगों का निराकरण होना चाहिए।
     जब तक छतीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसी पहेली उलझी रहेगी तब तक इस देष से माओवाद का सफाया नहीं हो सकता। केवल दिल्ली-मुंबई का विकास करने से पूरे देश का विकास नहीं हो सकता। देश के संसाधनों पर उनका उतना ही हक है जो दो जून की रोटी के लिए भी मोहताज हैं और जो एक वक्त के नाष्ते के लिए लाखों खर्च कर रहे हैं। आर्थिक असमानता को दूर करके ही माओवाद का सफाया संभव है। बाकी सभी प्रयास तभी सफल होंगे जब नक्सलियों को अन्य लोगों की तरह जीने-खाने-कमाने का अवसर वास्तविक धरातल पर मिल सके। केवल कागजों पर नहीं। जितना जल्दी हो सके सामाजिक समरसता बहाल हो।  नक्सलियों को उनके मानवीय अधिकार मिल सकंे तो नक्सलवाद को पनपने या और बढ़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है। असमानता और अन्याय को कम करके ही माओवाद का खात्मा संभव है। 
    माओवाद को एक समस्या नहीं बल्कि एक मुक्त विचार मान कर ही इस गंभीर समस्या का निदान संभव है। जहाँ सभी पक्षों के लोग इसे सहानुभूति नहीं बल्कि इसे आवष्यक आवष्यकता मानें और एकमत से समाज के दलित, पिछड़ों और दशकों से हाषिए पर खड़े लोगों के जीवन का प्रष्न मानंे और उसी प्रकार निर्णय लंे तभी कुछ संभव है अन्यथा सरकार चाहे जितना गोली-बंदूक का भय दिखाए या हिंसा की बात करे नक्सलियों का कुछ खास नहीं कर पाई है और न निकट भविष्य में कुछ कर पाने की स्थिति में हैं।     
- राणा अवधूत कुमार

मो0-09708077877

शनिवार, 5 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-2

ही नकारात्मकता कभी उन दलों की कार्यशौली और उनके संघर्ष के रूप में प्रकट होने लगती है। माओवाद पार्टी से जुड़े संगठनों में यह प्रक्रिया स्पष्ट रूप से कई बार परिलक्षित हुई है। बिहार में लालूराबड़ी शासन में हुए कई जनसंहार इसी प्रक्रिया के हिस्सा रहे हैं।
आपसी सुरक्षा के नाम पर किसानों के निजी तथा जातीय झगड़ों में उलझ जाना, सजा या प्रतिवाद के नाम पर विरोधियों की हत्या करना, महिलाओं के प्रति रूग्रिस्त और अमानवीय मानसिकता का व्यवहार करना और दलेलचक, बघौरा, बाथे और सेनारी जैसे सैकड़ों जातीय नरसंहारों को अंजाम देना इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्तियाँ थीं।
देश का एक बहुसंख्यक समृद्ध वर्ग यह मानता है कि पूँजी निर्माण की राह में नक्सलवाद सबसे गंभीर चुनौती है। उनका तर्क यह भी है कि इससे मुक्त होकर ही चीन दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बना है। समृद्ध और शक्तिशाली बना है। यह तर्क देने वाले देंग सियाओ पेंग के उस महत्वपूर्ण और काफी मशहूर कथन का हवाला देते हैं ॔॔क्या फर्क पड़ता है बिल्ली काली हो या सफेद? चूहे बखूबी पकड़ती हो, चूहों को मारने का दम रखती है या नहीं, यह महत्वपूर्ण है?’’ देंग ने यह बात 1978 में कही थी, जब वे चीन को माओवाद से मुक्त कराकर ॔मार्केट इकॉनामी’ यानी बाजारी अर्थव्यस्था की राह पर ले जा रहे थे। यहाँ बिल्ली से उनका आशय ॔वाद’ या ॔सिद्घांत’ से था। वे सांकेतिक भाषा में कह रहे थे कि पूँजीवाद हो या साम्यवाद। क्या फर्क पड़ता है? असल बात है कि चीन का विकास हो, समृद्धि आए, लोग आर्थिक रूप से संपन्न हों। चीन में यह
धारणा आज भी यथावत बनी हुई है। भारत जैसे देश के माओवादियों में यह सिद्घांत न पहले रहा है और न भविष्य में आने की उम्मीद।
माओवाद के आलोचक अक्सर इस बात का हवाला भी देते हैं कि नक्सलवाद को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी या अन्य विध्वसंक संगठनों का समर्थन है। उनका मानना है कि आज भी चीन इस तरह के आंदोलनों का सबसे बड़ा मददगार देश है। वह भारत को तबाह करने की मंशा रखता है। नेपाल के माओवादियों को चीन का समर्थन मिलने के कुछ प्रमाण भी मिले हैं। नेपाल से लेकर बिहार, बंगाल, झारखंड, आंध्र प्रदेश, छतीसग़ और कर्नाटक तक के जो नक्सली प्रभाव वाले इलाके हैं ॔रेड कॉरीडोर’ के नाम से जाने जाते हैं। जिनको चीन का परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन देने की बात होती है लेकिन ये बात कितनी सच है? देश के अधिसंख्य माओवाद प्रभावित इलाकों में चीन के बारे में या माओवाद के सिद्घांतों की जानकारी नक्सलियों को है ही नहीं। क्योंकि नक्सल समस्या असल में तो देश की असमान नागरिक सुविधा और लगातार आर्थिक विषमता के कारण ब़ रही है जिसकी तरफ ध्यान देने की फुरसत ही नहीं है यहाँ की सरकारों को। हाँ खानापूर्ति के लिए कुछ स्थानीय स्तर पर कर्तव्यनिष्ठ जिलाधीशों या पुलिस अधीक्षकों द्वारा प्रयास जरूर हो रहे हैं लेकिन केंद्र या राज्य सरकार की जहाँ से पहल होनी चाहिए वहाँ अभी भी निष्क्रियता बनी हुई है। माओवाद के पसरने का यह भी मुख्य कारण है।
एक और अहम सवाल आज के दौर में उठ रहा है कि किसी भी आंदोलन को आप किस नजरिए से देख रहे हैं? उदाहरण के लिए नक्सलवाद को ही ले लीजिए। केंद्र सरकार इसके समाधान के लिए कभी हथियार उठाने की बात करती है तो कई राज्य सरकारें लचीला रुख अपनाने की दलील देती हुई पूरा सहयोग नहीं करती हैं। देश की राजनीति में अक्सर यह देखा गया है कि जो लोग या दल सत्ता से बाहर होते हैं या विरोध के जो मुद्दे होते हैं सत्ता में आते ही इन मुद्दों को वे भूल जाते हैं। अब वे भी सत्ताधारी लोगों की तरह व्यवहार करने लगते हैं। नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह तक यह बात साफ तौर पर स्वीकार करते रहे हैं कि आर्थिक वैश्वीकरण के युग में भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करने पर विपक्षी पार्टिंयाँ चाहे जितना शोर मचा लें लेकिन सत्ता में आने के बाद चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर सकतीं और यह बात कितनी हद तक सच है इसका स्पष्ट उदाहरण आंध्र प्रदेश में एन.टी. रामाराव, चंद्रबाबू नायडू, वाई.एस. रेड्डी और अब किरण रेड्डी के विपक्ष से लेकर सत्ता तक की यात्रा के दौरान नक्सलवाद के प्रति बदलते रुख के रूप में देखासमझा जा सकता है। समय के साथ नक्सलियों के विरोध में सरकारें दमनात्मक कार्रवाई करती रहीं और नक्सली सरकारी फरमानों का विरोध भी करते रहे। जिसको जहाँ मौका मिला एकदूसरे को पछाड़ने का, कमजोर करने का कार्य करते रहे। लेकिन क्या इससे देश से माओवाद का खात्मा संभव है या फिर पुलिसिया कार्रवाई से माओवादियों को डरायाधमकाया जा सकता है। नक्सलवाद के जन्म की कहानी को समझ कर ही स्थाई समाधान निकाला जा सकता है।
आज देश के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि प्रधानमंत्री व गृहमंत्री द्वारा नक्सलवाद को देश का सबसे बड़ा खतरा बताने के बावजूद उसका प्रभाव क्षेत्र कैसे ब़ता चला गया है। तमाम तरह की दमनात्मक और सैनिक कार्रवाई और हजारों निरपराध कार्यकर्ताओं को फर्जी मुठभेड़ के नाम पर मारने के बाद भी उसके प्रभावविस्तार को रोका नहीं जा सका है। नक्सलवाद के प्रभाव को रोकने के लिए सरकार पहले इसे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्या के रूप में देखती थी। ऐसा मानते हुए जिन इलाकों में पिछड़ापन है और समाज का जो हिस्सा बेहद पिछड़ा है उनके बीच में उनका प्रभाव होता है। तब सरकार इनके लिए कई तरह की योजनाएँ और विकास के कार्यक्रम चलाती थी। लेकिन देश के कई हिस्सो में यह प्रयोग असफल साबित हुआ है। कई क्षेत्रों में तमाम दावे के बावजूद नक्सलवाद के प्रभाव को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। कहींकहीं तो ये सरकारी मशीनरी पर भारी पड़ते हैं। जहाँ सरकार नक्सलियों के सामने बेबस नजर आती है।
नक्सलवादी आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टियों के नाम जरूर बदलते रहे हैं। 1990 के पूर्व तक तो सरकार भूमि सुधार कानून को लागू करने पर भी जोर देती थी, कुछ राज्यों में इसे लागू भी किया गया। लेकिन जबसे अमेरिकापरस्त भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों को लागू किया गया तब से भूमि सुधार के कार्यक्रमों को लागू करने की औपचारिकताएँ भी नहीं हो रही हैं। स्थिति कितनी खराब है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि देश की करीब 74 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजारा करती है। करीब 30 फीसदी दो जून का भोजन नहीं करते हैं। अब तो सरकार कहती भी है कि गाँव के 28 रुपये और शहरी लोग 34 रुपये से अधिक कमाने वाले गरीब नहीं माने जाएँगे। यह उस देश की स्थिति है जहाँ कृषि आज भी 70 फीसदी लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है। योजना आयोग के दो टॉयलेट के निर्माण, सौंदर्यींकरण में 35 लाख खर्च होता है, लेकिन किसानोंमजदूरों के लिए 1500 रूपये भी ज्यादा लगता है।
यहाँ एक अहम सवाल और है कि सरकारें देश में नक्सलवाद के ब़ते क्षेत्र का गलत आँकड़ा जनता के सामने पेश करती है। सरकार में बैठे लोग देश के कुल जिलों की तादाद बताकर नक्सलवाद के प्रभाव के जिलों की संख्या बताते हैं। लेकिन देश के कुल जिलों में नक्सलवाद के प्रभाव वाले जिलों की संख्या दिखाई जाएगी तो वह भारत के नक्श्ो पर काफी बड़ा दिखेगा। उससे ज्यादा नक्सलवाद के ब़ते प्रभाव को राज्यवार दिखाया जाएगा तो वह और भयावह दिखेगा।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

नक्सलवाद: बढ़ता दायरा, सिमटता प्रभाव-1



     नक्सलवाद एक ऐसा शब्द है, जिसे लेकर सरकार के साथ आम देश वासी भी अब चिंतित रहने लगे हैं। बंगाल के एक गाँव से शुरू होने वाला किसान आंदोलन आज देश के करीब 200 से ज्यादा जिलों में फैल गया है। जिसे लेकर अपनी चिंता गाहे-बगाहे सार्वजनिक मंचों से प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री, राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन तक जताते रहते हैं। अहम सवाल यह है कि माओवाद के सिद्धांतों को सरकार या जनता किस नजरिए से देखती है? आर्थिक विषमता, सबको समान अवसर और न्याय के साथ विकास जैसे कई महत्वपूर्ण प्रष्न हैं, जिनका जवाब देना, समझना या विचार करना सरकार जरूरी नहीं समझती है। शायद यही वजह है कि तमाम बंदिषों-सख्तियों के बावजूद माओवाद का दायरा बढ़ता जा रहा है।
    माओवाद को विदा कर चीन दुनिया का महाषक्ति बन गया। 01 अक्टूबर 2009 को चीनी क्रांति के 60 वर्ष पूरे होने पर चीन ने दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया। आज वह अविष्वसनीय और स्तब्धकारी ताकत बन चुका है। चीन से चला माओवाद मौजूदा भारत के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बन गया है। देष के नीति-नियंताओं की गलत नीतियों का नतीजा है कि विकास में यह रोड़ा बन गया है। यह जानना भी दिलचस्प है कि क्या नक्सलवाद इतनी बड़ी समस्या है? इसके भाष्यकार कौन थे? कैसे और क्यों उस दौर में प्रतिभाशाली-योग्य युवकों की पीढ़ी इसमें कूदी? क्यों अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार हुए? देष के सर्वश्रेष्ठ काॅलेजों की अनेक प्रतिभाएँ कैसे उन दिनों शरीक हुई? नक्सलबाड़ी गाँव से निकला आंदोलन 250 से ज्यादा जिलों में पसर गया? व्यापक फैलाव के बावजूद इसमें बिखराव-खलन क्यों आए? विचारों और सिद्धांतों में भटकाव कैसे आए? कहाँ से किस रुप में आंदोलन को ताकत मिली?
थोड़ा अतीत में चलते हैं जब किसानों की समस्याओं को लेकर एक जनांदोलन पष्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव से शुरू हुआ। 08 मई 1967 की सुबह को दार्जिलिंग के खैरबाड़ी, फाँसी देवी, नक्सलवाड़ी व सिलीगुड़ी के इलाकों में जमीन जोतने वालों द्वारा जबरन कब्जा, फसल दखल और जोतदारों के घरों पर धावा बोल उनकी बंदूकें छीनने जैसी कार्रवाइयाँ शुरू हो गईं। इतिहास में यह नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के नाम से जाना गया। आंदोलन में भूमिगत हुए नेताओं को गिरफ्तार करने आई पुलिस पर हजारों किसानों ने तीर-धनुष जैसे परंपरागत शस्त्रों से जवाबी हमला किया। आर-पार की लड़ाई कई दिनों तक चलती रही। पुलिस ने बर्बरतापूर्वक महिलाओं-बच्चों के जुलूस पर छिपकर गोलियाँ चलाईं। इस जनसंहार में कई बच्चे और निर्दोष महिलाएँ मारी गई। इस जनसंहार के प्रतिवाद में देश  भर में किसानों-मजदूरों ने रैली व मषाल जुलूस निकाला। तब आंदोलन में षिक्षक, वकील से लेकर चाय बागान के दैनिक वेतन भोगी मजदूर हड़ताल कर सड़कों पर उतरे थे। आंदोलन से प्रेरित होकर देश भर में किसान आंदोलन भड़क उठे। जो कालांतर में माओवाद के रूप में देश  के कई हिस्सों में प्रतिस्फुटित हुआ। किसानों की समस्याओं से शरू हुआ आंदोलन आगे चलकर अपने सिद्धांतों से विमुख होकर कई नरसंहारों का वाहक भी बना। हजारों बेगुनाह लोग बेवजह मारे गए।
    वस्तुतः माओवाद एक ठहरे हुए समय की ठहरी हुई वैचारिक, राजनैतिक, सामाजिक प्रवृति है। करीब चार दषकों के ठहराव से यह अनेक प्रकार की विच्युतियों और विकृतियों का सबब बन गया है। माओवादियों के लिए समय का चक्र कम्युनिस्ट आंदोलन की संक्षिप्त कालावधि 1966-69 में ही रुक गया। उसी काल में उभरी एक खास वैचारिक, राजनैतिक विचारधारा का बंदीगृह यानी जेल ही उनका मुक्तिलोक है, जिसे इस लोक में साकार करने में हिंसक जद्दोजहद ही उनका मुक्तिसंग्राम और उनका परिचय माओवाद। तब माओवाद के सिद्धांतों ने समाज के पिछड़ों-दलितों को सहज रूप से आकर्षित किया। माओवादी पार्टी या कम्युनिस्ट पार्टी के अर्थों में एक पार्टी की शक्ल लेने में अब तक समर्थ नहीं हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण घटक एम.सी.सी. पिछले 43 वर्षों से पार्टी निर्माण के लिए अनुकूल परिस्थिति की प्रतीक्षा करता रहा।
    कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में एक नए संगठन से पार्टी बनने में इतना वक्त संभवतः किसी संगठन ने नहीं लिया होगा। 43 वर्षों तक जिस संगठन ने ढीले-ढाले केंद्र का जीवन जिया उसके लिए लेनिन या माओ की जनवादी केन्द्र आधारित पार्टी संगठन का स्वरूप लेना लगभग नामुमकिन है। उसकी सब-जोनल, जोनल या स्पेषल एरिया कमेटियाँ तथा सशस्त्र दस्ते स्वतंत्रता की अंतिम हद तक स्वायत्त थे। अपने प्रभाव वाले इलाकों में लेवी वसूलने और पुलिस से हथियार लूटने पर उनका एकाधिकार था। माओवाद के सिद्धांतो-विचारों से उनका सरोकार खत्म होता गया है। संयुक्त पार्टी बनने के बाद भी स्थानीय स्तरों पर हुई लूट, हत्याओं और अन्य कारनामों के केंद्र में यही धन और हथियारों पर अपने स्वामित्व या अधिकार का सवाल था। धन लिप्सा ने आधुनिक भारत में माओवादियों के विचारों को बदल दिया है। बावजूद इसके माओवादियों के संगठन का न तो विस्तार रुका और न हीं उनकी कार्यषैली में कोई बदलाव आया। समय के साथ उनके सिद्धांत जरूर बदलते गए। कल तक पुलिस को षिकार बना रहे नक्सलियों के लिए आम आदमी भी टारगेट बन रहे हैं। आम आदमी के टारगेट बनने से ही माओवादियों के प्रति सरकार या जनता की सहानुभूति लगातार कम हो रही है।
    यहीं से भारत में माओवाद के सिद्धांत या उनके कर्ता-धर्ता विचारों से भटक गए। हालाँकि सरकारी नीतियाँ भी उन्हें समय-समय पर तोड़ने में कामयाब रही हैं। एक विचार धारा आधारित राजनैतिक दल का ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच काम करना काफी मुष्किल भरा कार्य है। किसानों के आंदोलनों अथवा संघर्षों में उसकी भागीदारी का उद्देष्य किसानों को अपनी राजनीति से लैस करना और राजनैतिक रूप से प्रतिबद्ध एवं प्रबुद्ध जनाधार का निर्माण करना होता है। ऐसी स्थिति में आंदोलनों द्वारा राजनीति में उसकी भागीदारी की सफलता की कसौटी वे इस बात को बताते हैं कि पार्टी की सदस्य-संख्या में पहले की अपेक्षा कितनी बढ़ोतरी हुई। कितनी नई पार्टी यूनिटें तैयार हुई और पार्टी का राजनैतिक जनाधार कितना विस्तृत हुआ। जो इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें वे खास महत्व नहीं देते, यह एक प्रक्रिया है। दूसरी प्रक्रिया इन पार्टियों के किसानीकरण की है। किसान वर्ग के कई सकारात्मक पहलू हैं तो वहीं उसकी रूढि़याँ और नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और संकीर्णताएँ भी हैं जो इन दलों के राजनीतिकरण पर भारी पड़ जाती हैं।
 -राणा अवधूत कुमार



शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

बैंक के बढ़ते ब्याज दर का रोना




दिग्गज घरेलू कम्पनियों के पास अकूत नकदी के संदर्भ में



देश की वर्तमान आर्थिक सुस्ती या मंदी की चर्चाओं प्रचारों में विभिन्न क्षेत्रो में पूंजी निवेश की कमी का रोना रोया जा रहा है | वैश्विक मंदी खासकर यूरोपीय देशो में मंदी के चलते देश में विदेशी निवेश की कमी को और बैंको के ब्याज दर बढने से देशी कम्पनियों द्वारा निवेश में कमी को खासतौर प्रचारित किया जाता रहा है | फिलहाल अब विदेशी निवेशको को छोडकर देश की दिग्गज कम्पनियों के बारे में सूचनाये -सच्चाई जाने -
दिनाक 7 मई के एक हिन्दी दैनिक ने 'अकूत नकदी से भरी दिग्गज घरेलू कम्पनियों की तिजोरी '' शीर्षक के साथ यह सूचनाये दी है की घरेलू बाजार में 10 कम्पनियों के पास करीब 2 .34 लाख करोड़ की नकदी है | इसमें एक तिहाई ( करीब 70 .252 करोड़ रूपये की ) नकदी तो रिलायंस इण्डस्ट्रीज के पास है | कम्पनी की यह नकदी उसकी सालाना आय की 19 .5 % है | इसी तरह से 'इनफ़ोसिस " नाम की दूसरी दिग्गज कम्पनी के पास 20 .591 करोड़ रूपये की नगदी मौजुद है | यह कम्पनी के सालाना बिक्री की 61 % है | सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों के बहुप्रचारित घाटे के विपरीत तथ्यगत सच्चाई यह है की आयल इंडिया के पास हजारो करोड़ के लाभ के साथ सितम्बर 2011 में 72 .598 करोड़ रूपये की नकदी मौजूद थी | समाचार पत्रों की सूचनाओं के अनुसार सितम्बर 2011 तक कोल इंडिया के पास 54 हजार 980 करोड़ ओ . एक .जी . सी .के पास 17 हजार 914 करोड़ , सेल के पास 15 हजार 658 करोड़ और टाटा मोटर्स के पास 15 हजार 382 करोड़ रूपये की नकदी मौजूद है | स्वाभाविक है की अन्य दिग्गज कम्पनियों के पास नकदी भंडार जरुर होगा जिसकी सूचनाये अभी नही मिली | कई कम्पनियों व उच्च स्तरीय मैनेजिग डायरेक्टर ने यह स्वीकार किया है की बड़ी कम्पनियों के पास नकदी इसलिए है की वे बड़ी परियोजनायो की शुरुआत नही कर पा रही है | अगर मैनेजिग डायरेकटरो की यह बात मान ली जाए तो भी यह मुद्दा जरुर खड़ा रहेगा की देशी कम्पनियों के पास भारी नकदी जमा होने के वावजूद उसके द्वारा देश में निवेश के लिए बैंक के ब्याज दर वृद्धि का हल्ला क्यों मचाया जा रहा है ? क्या ऐसा करना इन कम्पनियों द्वारा देश की अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश को बढाने से अपने आप को बचाने का द्योतक नही है ?
असल मामला भी यही है | और वह इसलिए है की दिग्गज कम्पनिया अपने नकदी का इस्तेमाल विदेशो में विदेशी सम्पत्तियों , कम्पनियों आदि के अधिग्रहण में लगाने का सुअवसर तलाश रही है | समाचार पत्र में ओ । एन । जी. सी .के सी . एम् डी. सुधीर वासुदेव ने खुलकर कहा है की '' हमारे पास 11 .000 करोड़ की नगदी है | इसका इस्तेमाल कम्पनी विदेश में अधिग्रहण के लिए कर सकती है |" यह है देश की दिग्गज कम्पनियों का राष्ट्र प्रेम और आर्थिक सुस्ती या मंदी को हल करने के बारे में उनकी चिंताओं की असलियत | निवेश की कमी के लिए बैंक के बढ़ते ब्याज दर पर रोने- धोने या हल्ला मचाने की असलियत | ऐसा नही है की इन सच्चाइयो से देश के उच्च कोटि के अर्थशास्त्री एवं प्रचार माध्यमिगण अन्जान है| वे सब कुछ जानते है | जानने के बाद भी वे कम्पनियों द्वारा आर्थिक सुस्ती के लिए सरकार की नीतिगत सुधारों की सुस्ती के साथ -- साथ बैंको के बढ़ते रहे ब्याज दर से निवेश की कमी पर ही लिखते --- बोलते रहते है | उसे ही प्रचारित करने में लगे रहते है | फिर सब कुछ जानते हुए भी देश की सरकारे उनकी आलोचनाओं पर न केवल मौन साधे रहती है बल्कि उन आलोचनाओं के अनुसार ही जनविरोधी नीतियों आदि को आगे बढाती जा रही है | साथ ही बैंको द्वारा ब्याज दर को कम किए जाने का आश्वासन भी देती रहती है | जैसा की वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने अभी अपने हाल के बयानों में भी दिया भी है | जाहिर सी बात है की धनाढ्य कम्पनियों को राष्ट्रीय एवं अन्तराष्ट्रीय बैंको से यह धन देश की मंदी पड़ती अर्थव्यवस्था को ठीक करने और उसे गति देने के लिए नही बल्कि विदेशो में अपनी पूंजियो परिसम्पत्तियों के और ज्यादा फैलाव बढाव के लिए चाहिए | उसी के लिए वे अपने नकदी के भंडार को बचाए भी हुए है | यह है आर्थिक मंदी के बहुप्रचारित अभियान में बैंको के बढ़ते ब्याज दर से निवेश की कमी का हल्ला मचाने की असलियत.


-सुनील दत्ता
पत्रकार

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