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रविवार, 28 जून 2015

अमरीका, लोकतंत्र, आतंकवाद व धार्मिक अतिवाद


  बहुत से पाठकों को यह शीर्षक ही बड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह इस निबन्ध की एक पड़ताल का विश्लेषण करने का प्रयास है। जो अमरीका के आतंकवाद, लोकतंत्र व धार्मिक अतिवाद के गठजोड़ पर आधारित है। वर्षों के बड़े प्रोपेगंडा के कारण बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि अमरीका संसार में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी व प्रोत्साहक है और संसार में हर दशा में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चाहता है धार्मिक अतिवाद व आतंकवाद के विरोध में लड़ी जा रही लड़ाई का पड़ताल करें और यह भी देखने का प्रयास करें कि भारत में उसकी क्या भूमिका रही है।
    वर्षों की अंदेखी, उदासीनता व हाशिए पर रहने के बाद दक्षिण एशिया का क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी के साथ उभरा है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल व मालदीप आते हैं। तेल के बड़े भण्डारों व सामरिक महत्व के कारण खाड़ी के देश अधिक महत्वपूर्ण माने जाते रहे। तत्पश्चात अमरीका, योरोपीय यूनियन, चीन व जापान जैसे महत्वपूर्ण देशों ने दक्षिण एशिया की ओर देखना शुरू किया और 9/11 की घटना के बाद तो अमरीका का ध्यान पूरे तौर पर इस ओर हुआ। ‘‘आतंकवाद’’ से अमरीका ने सहयोगी देशों की सहायता से इस पूरे क्षेत्र को शक्ति संरचना कर अपने काबू में करना शुरू किया और पाकिस्तान व अफगानिस्तान में यह काफी हद तक सफल भी रहा। साथ ही उसने भारत के अपने रिश्तों को भी मजबूत करने का पूरा प्रयास किया जिससे कि चीन के प्रभाव को भी रोका जा सके।
    चोम्सकी, जो वर्तमान संसार में सबसे सम्मानित बुद्धिजीवी माने जाते हैं, 2013 के अपने लेख में कहते हैं कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आतंकी शक्ति का संचालन कर रहा है। चोम्सकी अमरीकी नागरिक हैं तथा प्रख्यात एम0आई0टी0 मेसोच्यूसेट इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में वर्षों से प्रोफेसर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीकी व्यवस्था हमेशा कुछ विरोधी व भिन्न मतावलंबितयों को भी बरदाश्त करती रही है जिससे कि संसार को दिखाया जा सके कि अमरीका में असहमति को कितना सम्मान दिया जाता है। इससे मुझे अपने अमरीकी प्रवास में 2006-07 की एक घटना याद आती है हाऊज (अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यालय/ आवास) के सामने टेंट लगाये थे या प्लेकार्ड लिए बैठे थे। सबसे अगली कतार में एक अमरीकी महिला एक बड़ा सा पोस्टर लिए बैठी जिस को उस समय मेकअप में दिखाया था और बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नीचे लिखा था ‘‘विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी’’। अमरीकी स्वार्थो पर हमला नहीं करती। चोक्सी व हरमेन का यह भी मानना है कि तीसरी दुनिया में जो भी क्षेत्र अमरीका के प्रभाव में हैं वहाँ वहाँ आतंक का जमावड़ा है। इन विद्वानों ने दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि किस प्रकार लातेनी अमरीका के गरीब देशों में कठपुतली शासक अमरीका के समर्थन से आतंक के द्वारा अवामी इच्छाओं का दमन करते रहे हैं। वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आज भूमंडलीय स्तर पर जितना भी आतंकवाद है। अमरीकी विदेशी नीति का परिणाम है। मेकार्ड व स्टाई बर जैसे विशेषज्ञों का यह मानना है कि 9/11 घटना से पहले भी व बाद में भी अमरीका अल कायदा को धन व हथियारों से सीरिया, लीबिया, बोसनिया, चेचेनिया, इरान जैसे अनेकों देशों में अपनी कार्यवाही के लिए सहायता देता रहा हैं ध्यान देने की बात यह है कि ये सभी देश अमरीका के समर्थक नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि विश्व में 74 प्रतिशत देशों में जहाँ आतंकी तरीकों को प्रशासनिक सहमति हासिल है, अमरीका की कठपुतली सरकारें हैं। क्या यह मजाक नहीं लगता कि जो महाशक्ति दुनिया में सुबह से शाम तक शांति की बात करती हो, गले-गले तक आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
    अमरीका के द्वारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के दावों की कलई कई बार खुल चुकी है। एक बार फिर इस की पड़ताल कर ली जाये। यदि हम दुनिया का नक्शा उठा कर देखें तो पाते हैं कि लातीनी अमरीका के देशों से लेकर,
मध्यपूर्व, दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिणी एशिया के देशों तक अमरीका की सहायता से लोकतंात्रिक सरकारों का तख्ता पलट कर तानाशाही सत्ता को कभी सफलता पूर्वक और कभी असफल प्रयासों का सहारा लिया गया है। यहाँ पर कुछ विशिष्ट उदाहरणों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया जा रहा है।
    अमरीका का हमेशा कहना रहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकारों को कभी नहीं हटाने का प्रयास करेगा चाहे वह कोई वामपंथी सरकार क्यों न हो। 1970 में दक्षिणी अमरीका के देश चिली में डाॅ. एलेन्डे की वामपंथी सरकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण में होने वाले चुनाव के द्वारा बनाई गई लेकिन उस को बहुत दिन चलने नहीं दिया गया और सी आईए के द्वारा उस का तख्ता पलट कर फौजी शासन स्थापित कर दिया गया जिस ने इस के विरोध में होने वाले जन आन्दोलन को कुचल दिया। ऐसा ही कुछ निकारागुआ में भी किया गया। 1984 में पारदर्शी चुनाव के द्वारा वहाँ पर एक प्रगतिशील वामपंथ की ओर झुकाव वाली सरकार का गठन किया गया लेकिन अमरीका को निकारागुआ की क्यूबा व सोवियत यूनियन से दोस्ती अच्छी नहीं लगी। अमरीका को इस बात का डर भी खाये जा रहा था कि कहीं निकारागुआ का उदाहरण दूसरे शोषित लातीनी अमरीका के देशों को वामपंथ की ओर न मोड़ दे। अमरीका ने निकारागुआ के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि उसे अपना ध्यान व संसाधन अपनी सुरक्षा में लगाना पड़ गया और इस प्रकार आर्थिक संकटों से जूझती हुई सरकार को गिरा दिया गया। क्यूबा पर तो लगातार अमरीकी प्रयास जारी रहा। फोडेल कास्त्रो को मारने का कई बार प्रयास भी किया गया। लेकिन क्यूबा की वामपंथी सरकार को गिराया नहीं जा सका।
    यह सूची इतनी लम्बी है कि दर्जनों पन्ने सियाह हो जाएँगे इस लिए निम्न संक्षिप्त सारणी के द्वारा यह बात आगे बढ़ाई जा रही है  जिस से पाठकों को यह अन्दाजा भली भाँति हो जाएगा कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाहों को किस प्रकार मजबूत किया गया और उनकी सत्ता को कैसे जायज़ ठहराया गया
1    लातीनी अमरीका:
    पिनोशेट (चिली), नोरेगा (पनामा),
    डुवेलियर (हैती), बेनजे़र (बोलेविया)
2    ऐशिया:
    ओमान, कतर, बहरैन के शेख
    सऊदी अरब के बादशाह
    सुहारतों (इण्डोनेशिया)
    जि़याउलहक़ व मुशर्रफ़ (पाकिस्तान)
    बादशाह रज़ाशाह पहेलवीं (ईरान)
3    अफ्रीका:
    बादशाह हसन (मोराक्को)
    गफ्फार नुमैरी (सुडान)
    होसनी मुबारक (मिश्र)
    द0 अफ्रीका के नस्लवादी शासक
4    योरोप:
    फ्रानको (स्पेन)
    सालाज़ार (पुर्तगाल)    

    तुर्की व यूनान की फ़ौजी सत्ता इन तथा इन जैसे अनेक दूसरे उदाहरणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अमरीकी लोकतंत्र का मुखौटा कितना महीन है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के इस के दावे कितने खोखले हैं वरना फौजी शासकों, बादशाहों तथा नस्लवादी शासकों को सभी प्रकार के समर्थन देकर उन की सत्ता को बचाना क्या अर्थ रख सकता है। जाहिर है अपने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक हितों के सामने लोकतंत्र की कोई कीमत नहीं है। सऊदी अरब व ईरान के निर्मम व जालिम बादशाहों को वर्षों तक अमरीका ने बचाया क्योंकि वे उस की कठपुतली थे। ईरान के अवाम ने बादशाह के विरोध में बगावत किया, कुरबानी दी और उसे खदेड़ दिया। यह अलग बात है कि ईरान में चुनाव वो करवाती है लेकिन लोकतंत्र पर लगाम है। सऊदी अरब में बादशाहत अब भी बनी हुई है, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है तथा धार्मिक कट्टरता ने अवाम, विशेष कर अल्पसंख्यकों को पैरों के नीचे दबा रखा है लेकिन अमरीका के आर्थिक व सामरिक हित सर्वाेपरि हैं।
    अजीब विडंबना है कि संसार भर में आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अमरीका का हाथ देखा जा सकता है और इस्लाम के नाम पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में तो सीधे अमरीका की भूमिका देखी जा सकती है। चूँकि अमरीका के आर्थिक व सामरिक हितों को सब से अधिक खतरा इस्लामी चरमपंथियों से था इस लिए उस ने विश्व मीडिया शक्ति को इस्लामी आतंकवाद का डर दिखाने को लगा दिया। बहुतों को इस बात पर विश्वास भी हो गया कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व शांति के लिए सब से बड़ा खतरा है। जब हकीकत यह है कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व आतंकवाद का केवल एक छोटा सा अंशमात्र है। अमरीका के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर चाल्र्स कुर्ज़मैन ने अपने अध्ययन ष्ज्ीम उपेेपदह डंतजलते रू ॅील जीमतम ंतम ेव मिू उनेसपउ ज्मततवतपेजेघ्ष् के द्वारा यह स्थापित किया है कि मुस्लिम आतंकवाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया। उन्होंने यह सवाल भी किया कि हमने इस बात पर क्यों विश्वास किया कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है और हम इतना क्यों डरे हुए थे। पिछले पाँच वर्षों की घटनाओं ने प्रोफेसर कुर्जमैन की बात को सही साबित कर दिया। आज पूरे योरोप व अमरीका में प्ेसंउवचीवइपं अर्थात इस्लाम का डर जीवन की एक हकीकत बन चुका है और समाज के दिन प्रतिदिन जीवन में देखा जा सकता है।
    तथाकथित मुस्लिम या इस्लामी आतंकवाद की ताकत व फैलाव चाहे जितना हो लेकिन आज यह स्थापित हो चुका है कि इसके पीछे काफी हद तक इस्लाम की वह चरमपंथी व्याख्या है जो साम्राजी के नाम से जानी जाती है और जिसका प्रमुख स्रोत सऊदी अरब है जो साम्राजी विचारधारा को ही सच्चा इस्लाम मान कर उसके प्रचार व प्रसार पर अरबों डालर खर्च करता रहा है। अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर नाइजीरिया के अलशबाब व बोकोहरम व इराक-सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आई0एस0) तक सभी विचारधारा से प्रोत्साहित होते हैं। योरोप व अमरीका सहित समूचे विश्व में सऊदी पेट्रोडालर की सहायता से मस्जिदों व मदरसों पर कब्जा किया जा रहा है और वहीं से साम्राजी विचारधारा को ही सही इस्लाम के रूप में प्रसारित व प्रचारित किया जा रहा है। कैसा मज़ाक है, कि वह अमरीका जो सुबह से शाम तक इस्लामी आतंकवाद की रट लगाए रहता है, मुस्लिम संसार में अपने को ही गले से लगाये हुए हैं। बादशाहत, धार्मिक अतिवाद व पूँजीवाद के इस अजीबों गरीब मिश्रण को अमरीका ही
साध सकता है। संतोष की बात यह है कि अपने सभी प्रयासों के बावजूद समूचे विश्व की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा ही इस विचारधारा के प्रभाव में है लेकिन जिस तेजी के साथ यह फैल रहा है शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता हैं।
        यह हम कैसे भूल जाएँ कि अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरोध में अमरीका ने ही तालीबान को प्रोत्साहन व समर्थन दिया था और पाकिस्तान के फौजी शासकों के द्वारा उन के मदरसों को बढ़ावा मिला था। भारत में हिन्दुत्व व चरमपंथी हिन्दु शक्तियों के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका को देखा जा सकता है। भारत के मजदूर-किसान-दलित-आदिवासी की एकता आदि को तोड़ने के लिए जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उस के अनुषंगी संगठन लगे हुए हैं उसे कोई भी देख सकता है। स्वदेशी व भारतीयता का गला फाड़ फाड़ कर नारा लगाने वालों की जब केन्द्र में सत्ता स्थापित हुई तो कारपोरेट सेक्टर के हित ही देशहित हो गये और सांप्रदायिक तनाव के धुएँ में असली मुद्दों को छुपाने का प्रयास हो रहा है। पूँजीवादी फासीवाद हमारे देश में दस्तक दे रहा है। हमें इतिहास से सबक लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद लोकतांत्रिक चुनावों के कंधों पर चढ़ कर ही आता रहा है। हिटलर व मुसोलनी इस के उदाहरण हैं। लोकतंत्रीकरण व लोकतंात्रिक मुकाबला कर सकती है। एक व्यक्ति ही सब कुछ कर देगा, यह सोच ही  फासीवाद व तानाशाही की ओर उठा पहला कदम है जिसके लिए हमें सचेत रहना है।        
 -प्रो0 नदीम हसनैन
        मोबाइल: 09721533337
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

मंगलवार, 17 जून 2014

आक्रामक मीडिया की भूमिका

   सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया है। केन्द्र में पहली बार ऐसा हुआ है कि कांग्रेस से इतर किसी एक दल को बहुमत मिला है। इसबार के चुनाव में अधिकांश राजनैतिक पार्टियाँ राष्ट्रीय स्तर पर परंपरागत ढ़ंग से चुनाव लड़ रही थीं। सिर्फ भाजपा, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने प्रचार के नए हथकण्डे अपनाए।
      भाजपा की जीत का मूलाधार है दक्षिणपंथी पापुलिज्म। ऐसा नहीं है कि दक्षिणपंथी पापुलिज्म पहली बार हमारे बीच में आया है। विभिन्न रूपों में यह क्षेत्र विशेष में सक्रिय रहा है। हमारे समाज में पहले भी पापुलिज्म या लहर देखी गई है। इनमें कई लहरें उदारतावाद केन्द्रित थीं, लेकिन इस बार के पापुलिज्म की धुरी है अनुदारवाद। मसलन् सन् 1971 और 1977 के पापुलिज्म की धुरी उदारवादी कार्यक्रम था। यहाँ तक कि राष्ट्रीय मोर्चे की सरकारों के गठन में उदारतावादी पापुलिज्म की बड़ी भूमिका थी।
            जिसे मीडिया ने मोदी लहर कहा वह वस्तुतःसंघ का पापुलिज्म है। इस पापुलिज्म को वस्तुगत ढंग से खोलकर पढ़ा जाना चाहिए। पापुलिज्म या लहर को हमेशा विचारधारात्मक तौर पर विश्लेषित किया जाना चाहिए। इसे सिरों की गिनती तक रखकर न देखें।
   पापुलिज्म या लहर हमेशा संदर्भ केन्द्रित होती है। मोदी लहर के दो छोर हैं एक छोर पर मनमोहन सरकार की असफलताएँ हैं तो दूसरे छोर पर संघ की विचारधारा है। इन दोनों छोरों के सम्मिश्रण से मोदी लहर बनाने में आक्रामक मीडिया रणनीति की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस लहर की अंतर्वस्तु है अनुदार लोकतंत्र और नव्य-उदार आर्थिक नीतियाँ। मोदी की सफलताओं का जो भी आख्यान पेश किया गया वह वस्तुतःनव्य उदार आर्थिक नीतियों की सफलता का आख्यान है।
    मोदी लहर के बहाने नव्य आर्थिक नीतियों की सफलताओं को जनता के गले उतार दिया गया। जो काम मनमोहन सिंह सरकार न कर पायी वह काम मोदी ने कर दिखाया। गुजरात मॉडल के नाम पर पक्ष विपक्ष की बहस अंततः मनमोहन सरकार की नीतियों पर ही केन्द्रित रही है। मोदी यदि एक ओर गुजरात की सफलता का गान कर रहे थे तो दूसरी ओर जिन सफल राज्यों को पेश किया गया वे भी मनमोहनी नीतियों का ही प्रकारान्तर से बखान कर रहे थे।
    इस नजरिए से देखें तो 16वीं लोकसभा के चुनाव मूलतः मनमोहन सिंह द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों के कार्यान्वयन की समीक्षा पर लड़े गए। इसमें गुजरात मॉडल की जमकर चर्चा हुई और मीडिया चर्चा होने और भाजपा के जीतने को यह मान लिया गया कि गुजरात मॉडल सफल है। यानी चुनावी जीत को सफलता का पैमाना मान लिया गया। जबकि चुनावी जीत को किसी भी किस्म के विकास की सफलता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता है।
    मजेदार बात यह है कि केन्द्र सरकार द्वारा संचालित योजनाओं को कार्यान्वित करके गुजरात मॉडल बना है। लेकिन इसका यश मनमोहन सिंह सरकार को नहीं मिला। यश मिला है नरेन्द्र मोदी को। मनमोहन सिंह सरकार पर आरोप है कि वह भ्रष्ट और निकम्मी सरकार है। यानी यह चुनाव नीतियों के परिवर्तन के लिए नहीं लड़ा गया अपितु नव्य उदार आर्थिक नीतियों को लागू करने में कौन बेहतर भूमिका निभा सकता है उस पहलू पर लड़ा गया। उल्लेखनीय है आम आदमी पार्टी का भी नव्य आर्थिक नीतियों से कोई मतभेद नहीं था। वामदलों का मतभेद था, वे वैकल्पिक नीतियों की बातें करते रहे हैं इसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ा और उनको करारी हार का सामना करना पड़ा। कहने का आशय यह है कि 16वीं लोकसभा का चुनाव जिन तीन प्रमुख मोर्चों के बीच लड़ा गया उनमें नव्य उदार आर्थिक नीतियाँ साझा तत्व हैं।   
      इस बार के चुनाव की विशेषता थी कि यह चुनाव बहुकोणीय होते हुए भी विचारधारात्मक तौर पर दो दलों के बीच में ही था। कांग्रेस बनाम भाजपा के बीच में ही चुनाव था। देश के संचालन में इन दोनों दलों में से किसी एक दल की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इस वास्तविकता को मोदी ने प्रसारित किया। मोदी के हमले के केन्द्र में मूलतः कांग्रेस का नेतृत्व था।
    मोदी ने कांग्रेस पर हमला करने के साथ क्षेत्रीय दलों के भ्रष्ट शासन पर भी हमला बोला। क्षेत्रीय समस्याओं को उठाया। 
    मोदी ने अपने प्रचार में केन्द्र सरकार  के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को मूलतः निशाना बनाया। भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को निशाना बनाते हुए समूचे कम्युनिकेशन को विस्तार दिया। अपने को कांग्रेस के विकल्प के रूप में ही नहीं बल्कि समूची राजनैतिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में पेश किया। राजनैतिक जीवन में मूल्यों में आई गिरावट को निशाना बनाया। उन आख्यानों और संदर्भों का इस्तेमाल किया जो राजनैतिक मूल्यों में आई गिरावट को व्यक्त करते थे। साथ ही उसने सख्त नेता की इमेज को पेश किया। इसके लिए जनता को गोलबंद करने का काम प्रच्छन्न बहुसंख्यक वाद के जरिए किया गया।
    उल्लेखनीय है भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार खुलेआम हिन्दू राष्ट्र की हिमायत का काम बड़े ही स्थूल ढंग से करते रहे हैं। लेकिन इस बार उनकी प्रचार टीम ने बहुसंख्यकवाद को मीडिया के प्रचार अभियान से निकालकर परंपरागत निजी प्रचार में इस्तेमाल किया। मीडिया में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन और क्षेत्रीय दलों के भ्रष्टाचार और निकम्मेपन को निशाना बनाया। विकास के सपने को उछाला।
    मीडिया में विकास के आख्यान और विकास की समस्याओं पर जोर दिया जबकि निजी परंपरागत प्रचार अभियान में बहुसंख्यक वाद का सघन प्रचार अभियान चलाया गया। मसलन्, संघ के लोगों ने घर-घर जाकर हिन्दुत्व के नाम पर वोट माँगे, पर्चे बाँटे और हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट होने की अपील की। इसका उनको लाभ मिला। बहुसंख्यक वाद को गोलबंद करने की प्रक्रिया मीडिया से तकरीबन गायब रही। इक्का-दुक्का टीवी रिपोर्ट के अलावा कहीं पर यह मीडिया में नजर नहीं आई। यहाँ तक कि राजनैतिक दलों को भी बहुसंख्यकवाद की आड़ में चल रहा साम्प्रदायिक प्रचार अभियान नजर नहीं आया। सब यही कहते रहे कि संघ सक्रिय है,लेकिन क्या प्रचार कर रहा है इस ओर मीडिया और राजनैतिकदलों का एकसिरे से
ध्यान ही नहीं गया।  
     बहुसंख्यकवाद का ही परिणाम है कि अनेक राज्यों से मुसलमान सांसद चुनकर ही नहीं आए। खासकर उत्तर भारत से मुस्लिम सांसदों का न चुना जाना अपने आप में समस्या है। तकरीबन 27राज्य हैं जहाँ से कोई मुस्लिम सांसद नहीं चुना गया। बहुसंख्यकवाद का पापुलिज्म में बदलना स्वयं में बड़ी परिघटना है। इससे नए किस्म के सामाजिक-सांस्कृतिक धु्रवीकरण की संभावनाएँ जन्म लेंगी। नए किस्म की समस्याएँ भी आएँगी जिनकी हमने कल्पना नहीं की है। 16वीं लोकसभा में मात्र 24 मुस्लिम सांसद चुने गए हैं, जबकि विगत लोकसभा में 30 सांसद थे। 
    इस चुनाव के पहले आरएसएस हमेशा राजनैतिक प्रचार में हिन्दुत्व का जमकर मीडिया में इस्तेमाल करता था। लेकिन इस बार सचेत रूप से किसी भी संघी नेता ने हिन्दुत्व की बात नहीं की। विश्व हिन्दू परिषद और भाजपा के इक्का-दुक्का नेताओं को छोड़कर किसी ने मीडिया में सीधे हिन्दुत्व की बात नहीं की। जबकि जमीनी स्तर पर संघ ने बहुसंख्यकवाद का वोट देने की अपील के बहाने जमकर प्रचार किया। एकजुट होकर वोट देने की अपील की। म.प्र. में तो एकमुश्त वोट देने की अपील करते हुए पर्चे भी बाँटे गए।
    विकास के पापुलिज्म के अंदर पतली बारीक तह में लिपटा बहुसंख्यक वाद इसलिए हजम हो गया क्योंकि वह पापुलिज्म के अंग के रूप में आया था। पापुलिज्म के फ्रेम में यदि बहुसंख्यकवाद पेश करेंगे तो यह वैसे ही लगेगा जैसे समाजवाद या लोकतंत्र स्वीकार्य विचारधारा लगती है। पापुलिज्म के कारण बहुसंख्यकवाद जनप्रिय होकर आम लोगों के कॉमनसेंस का हिस्सा बन गया। संघ ने इस बार हिन्दुत्व को एक विचारधारा के रूप में नहीं पापुलिज्म के कॉमनसेंस के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया।
    भारत में पापुलिज्म को कभी लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं माना गया बल्कि लोकतंत्र की अभिव्यंजना का महत्वपूर्ण रूप माना गया। हमारे यहाँ पापुलिज्म के कई अतिवादी-हिंसक रूप प्रचलन में रहे हैं जिनको हम माओवाद प्रभावित इलाकों या आतंकवाद-पृथकतावाद प्रभावित इलाकों में देख सकते हैं लेकिन ये सभी हिंसक रूप आज तक अपनी सामाजिक स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाए हैं।
    भारत में आपातकाल वह मूलाधार है जहाँ से राजनीति करवट लेती है। खासकर कांग्रेस और संघ की राजनीति करवट लेती है। आपातकाल के बाद तेजी से कांग्रेस और संघ में तनाव किसी न किसी रूप में बना रहा है। इस क्रम में कांग्रेस का निरंतर क्षय हुआ है और संघ की शक्ति में निरंतर इजाफा हुआ है।
    राम मंदिर आंदोलन हो या आरक्षण विरोधी आंदोलन हो, सब में संघ की शक्ति बढ़ी है। यहाँ तक कि हाल के वर्षों में हुए अन्ना आंदोलन में भी संघ की शक्ति में इजाफा हुआ। कहने का तात्पर्य है कि आपातकाल के बाद भारत में उठे सभी किस्म के पापुलर आंदोलनों के साथ संघ ने अपना संबंध किसी न किसी रूप में बनाए रखा इससे संघ के व्यापक जनाधार का निर्माण हुआ।
    शिक्षा से लेकर स्वयंसेवी आंदोलनों तक संघ के बहुआयामी नेटवर्क काम कर रहे हैं और वे यथाशक्ति अपने को स्थानीय लोगों से जोड़े रखते हैं। यह जुड़ाव दंगे से लेकर शादी-ब्याह तक साफ देख सकते हैं।
    संघ में परंपरागत लिबरल हैं तो अनुदार कट्टरपंथी भी हैं और संघ इन दोनों में संतुलन बनाकर चलता है। जहाँ जिनको प्रभावशाली देखता है वहाँ उनका इस्तेमाल करता है। संघ के अंदर हिंदुत्व के अंदर उदार-अनुदार की कशमकश को आए दिन साफ देख सकते हैं। यह कशमकश इन दिनों विकास के नव्य-उदार मॉडल और स्वदेशी आंदोलन के अंतर्विरोध के रूप में देख सकते हैं।
    जो लोग स्वदेशी आंदोलन को पसंद करते हैं वे विकास के नव्य उदार मॉडल का विरोध करते हैं। वे खुलेआम मोदी के खिलाफ भी बोलते रहे हैं। इस अंतर्विरोध को ध्यान में रखें तो सही ढ़ंग से देख पाएँगे कि संघ में किस तरह लिबरल और अनुदार के बीच छद्म टकराहट है। असल में ये दो मार्ग हैं हिन्दुत्व रूपी बहुसंख्यक वाद को आम जनता में ले जाने के लिए।
    संघ उदार-अनुदार दोनों ही मार्गों का एक साथ इस्तेमाल करता रहा है और आगे भी करेगा। इससे वह अपने सांगठनिक तनावों को कम करने में सफल हो जाता है। मसलन् यदि आप लिबरल हिन्दुत्व को मानते हैं तो संघ में रह सकते हैं अनुदार या कट्टरपंथी हैं तब भी रह सकते हैं। इनमें से किसी एक वजह से संघ के दायरे से बाहर जाने की जरूरत नहीं है, अथवा संघ के दायरे के बाहर सोचने की जरूरत नहीं है। इस अर्थ में संघ ने अपने यहाँ उदार-अनुदार का व्यापक रूप में समावेश कर लिया है और सांगठनिक विभाजन की संभावनाओं को ही खत्म कर दिया है। यही वजह है  संघ को छोड़ने वालों की संख्या बहुत कम रही है। जितनी बड़ी तादाद में लोगों ने कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टियों को छोड़ा है उतनी बड़ी तादाद में भाजपा को छोड़ने वाले नहीं मिलेंगे। इसका एक कारण और भी है संघ की विचार धारा के असर में आने के बाद व्यक्ति का विवेकवादी राजनैतिक सोच व्यवहारवादी हो जाता है। वह रेशनल नजरिए की बजाए व्यवहारवादी नजरिए के आधार पर सोचने लगता है। इसी व्यवहारवाद को नरेन्द्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान में इस्तेमाल किया और सबके साथ चुनावी समझौता करने का फैसला किया, इस क्रम में 25 दलों के साथ राजनैतिक समझौता किया।
    समूचे मीडिया प्रचार में व्यवहारवाद को ही मूलाधार बनाया गया। “अच्छे दिन आने वाले हैं” यह नारा सर्वजन स्वीकृति पा गया, क्योंकि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है कि जो भविष्य में अच्छे दिन देखना न चाहता हो।
    पापुलिज्म के नजरिए से मोदी ने समूचे देश की जनता को अपने सम्बोधन के निशाने पर रखा। “भ्रष्ट सरकार”, “निकम्मी सरकार” से लेकर “माँ-बेटे की सरकार” तक का जो आख्यान है वह कांग्रेस के अंदर जो आभिजात्य है उसे उद्घाटित करता है। कांग्रेस के अभिजनों की तीखी आलोचना करते हुए मोदी ने अपने को किसी दल का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम का विकल्प बनाकर पेश किया। साथ ही राजनीति को सभी किस्म की गंदगी से मुक्त करने की बात कही। “देश को कांग्रेस से मुक्त करो” का नारा दिया। राजनीति को सारवान बनाने का संकल्प व्यक्त किया।
    पापुलिज्म के आधार पर जब कोई प्रचार रणनीति अपनाई जाती है तो उसमें किसी न किसी व्यक्ति को निशाने पर रखा जाता है उसके बारे में नकारात्मक प्रचार पर जोर दिया जाता है। इस  बार निशाने पर नव्य आर्थिक नीतियाँ नहीं थीं, बल्कि मनमोहन सरकार और गांधी परिवार था। मनमोहन सिंह को सोनिया गांधी के इशारे पर नाचने वाले प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया गया।
    मोदी ने जनता के सभी तबकों को सम्बोधित करने की कोशिश की। “भ्रष्टाचार” और “निकम्मेपन” के आधार पर कांग्रेस का विरोध किया। अपने को विकल्प के रूप में पेश किया। मोदी के प्रचार की दूसरी बड़ी विशेषता है कि उसने उदारतावादी नजरिए का “सबका विकास” के नारे के तहत विरोध किया। अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के सवालों को हाशिए के बाहर खदेड़ दिया।
     हमारे उदार लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण के सवाल
    जब भी अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों के सवाल उठाए गए तुरंत विरोध किया गया और कहा गया हम तो धर्म, जाति आदि से ऊपर उठकर सबका विकास चाहते हैं। संविधान के अनुसार काम करेंगे, संतुष्टीकरण नहीं करेंगे। मुसलमानों के हितों के संरक्षण को राजनैतिक तुष्टीकरण कहकर नकारात्मक बनाकर पेश किया।
    मोदी और संघ परिवार का इस प्रसंग में कहना यही है कि इस देश में जो कुछ भी करना है उसके लिए बहुसंख्यक जनता ( हिन्दू जनता) की स्वीकृति जरुरी है। मुसलमानों के लिए जो कुछ किया गया है वह तुष्टीकरण है यानी उसे बहुसंख्यक हिन्दू जनता की स्वीकृति हासिल नहीं है। फलश्रुति यह कि जो कुछ करना चाहते हो हिन्दुओं की स्वीकृति लेकर करो। यही वह बिन्दु है जहाँ से बहुसंख्यकवाद की विचारधारा आम जनता के जेहन में उतारी गई। मुसलमानों के तुष्टीकरण की बातें उठाकर मोदीपंथी लोग लोकतंत्र में मुसलमानों के प्रति बनी आम सहमति पर भी सवाल उठा रहे हैं। यानी बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र में बनी उदार आम सहमति को निशाना बनाता है। उसके प्रति घृणा पैदा करता है। 
    मोदी के प्रचार अभियान में वे मुद्दे खूब उठाए गए जिनको अमूमन लोकसभा चुनाव में नहीं उठाया जाता। मसलन् उसने राज्यों के विकास, खासकर विरोधी सरकारों के विकास संबंधी कार्यों को निशाना बनाया। इसके समानान्तर अपने विकास मॉडल को मध्यवर्गीय आकांक्षाओं से जोड़कर पेश किया।     हमेशा से प्रमुख रहे हैं, लेकिन “सबका विकास” का नारा ऊपर से देखने में अच्छा लगता है लेकिन इसका मूल वैचारिक लक्ष्य है उदार लोकतंत्र का विरोध करना। वे इसके जरिए यह भी कहना चाहते हैं कि बहुसंख्यक समाज को सीमित दायरे में रहकर भूमिका अदा करनी चाहिए और इसके लिए संविधान की आड़ ली गयी।
  -जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0- 09331762360

सोमवार, 5 मई 2014

इस बार भी हारेगा लोकतंत्र?

  भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला ऐसा अवसर है जब जनता द्वारा अपनी सरकार चुनने की महान प्रक्रिया को अब तक के सबसे गंभीर खतरों का सामना है। अपने पक्ष में अपने हित के लिए इस्तेमाल करने की आकांक्षी शक्तियाँ उसे हड़प कर जाने के लिए इस निर्लजता और उग्रता से कभी सक्रिय नहीं हुईं। नरभक्षी कारपोरेट सेक्टर की मुनाफाखोर लूटवादी शक्तियाँ, भूपति व धन्नासेठों के देश के साधनों व सम्पत्ति की निर्मम लूट के लिए आकुल सियासी दलों के बीच ऐसी लामबंदी पहले कभी नहीं देखी गई, यही कारण है कि आगामी चुनावों में जो निश्चय ही पूरी अनुशासनात्मक प्रक्रिया के तहत भारतीय लोकतंत्र के पहले की अपेक्षा विकरालता से पराजित होने की आशंकाएँ प्रबल होती दिख रही हैं। 
                                लोकतंत्र के हारने का मतलब कई-कई तरह से छली जा रही देश की शोषित, दलित, दमित, गरीब जनता का परास्त होना है। आकांक्षाओं स्वप्नों के क्रूर ध्वंस का मारकदंश झेलने को एक बार फिर वह विवश होगी। कठिन परिश्रम भी संचित पूँजी से जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने में उसकी असमर्थता अधिक नुकीला त्रास बनने जा रही है। जिन्दगी की बुनियादी जरूरतों तक की पहुँच दुरूह होगी ही। चमकीली वस्तुओं पर उनकी खुरदरी उँगलियाँ बार-बार फिसलेंगी या कर्जदार व्यक्ति के हाथों का कम्पन्न बनेंगी, लुटेरे कारपोरेट सेक्टर तथा देशी रईसजादों की मंशा पूरी करते हुए पूँजीवादी लूट परस्त राजनैतिक पार्टियों ने समूचे चुनाव को मुद्दाविहीन बनाने में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। इस विडम्बनात्मकता की भी अपनी तकलीफ है कि चुनने के जनविवेक को ही कुंठित करने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। 2002 में गुजरात में नरसंहार था, देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले सालों में दलितों, ईसाइयों की जघन्य हत्याएँ खास समुदायों पर ही नहीं, उनके जनविवेक पर भी संगठित आक्रमण था। इन आक्रमणों से उत्पन्न हुई घृणा ने तथा असुरक्षित होने के मनोविज्ञान ने फैसले देने की क्षमता को ही छितरा दिया।
                                               त्रासद यह है कि इन आक्रमणों के बाद विनाश के उठते धुएँ के उच्च नफरत का विस्तार भी व्यापक होता गया, साम्प्रदायिक संगठनों, व्यक्तियों, कारपोरेट सेक्टर तथा मुनाफाखोरों ने नफरत के इस धुएँ को ही अपने लिए भविष्य का च्यवनप्राश समझा। एक ही समय में मुजफ्फरनगर में वीभत्स दंगों को संगठित करने वालों का समर्थन और संरक्षण, इसी समय चुनाव सभाओं में सबको साथ ले चलने, सबको समान समझने का लाॅलीपाॅप, ऐसे में वोटर का सही या तटस्थ भाव से फैसला लेना लगातार कठिन होता ही जाएगा। यू.पी.ए.-2 की भयानक नाकामी, सामान्य नागरिकों के निरन्तर जीवन कठिन होते जाने तथा संकट की बेला में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की शर्मनाक निष्क्रियता याद कीजिए और याद कीजिए समाजवादी, बसपा तथा ऐसे दूसरे दलों कमी हो, कभी पर्दे के पीछे हो, पर्दे के बाहर न की अदा भी, अपने ही आप फैसला लेने की सामथ्र्य कैसे झीना बना देते हैं, यह स्थिति उसी का दर्दनाक उदाहरण है। यही कारण है कि जनता के सबसे भयानक संकट भ्रष्टाचार केन्द्रीय मुद्दा होने की अकड़ दिखाते हुए पाले से बाहर होने की अवस्था में है। बीमारी के मूल कारणों की चिकित्सा के बिना उसके लक्षणों के जड़ से उखाड़ फेंकने की बुलन्द बाग घोषणाएँ इस चुनाव की भी विशिष्टता हैं। इस महादेश का भाग्य बदल देने का स्वप्न दिखाने वाले लौहपुरूष इस मामले में सबसे आगे हैं। बिजली, पानी, भोजन, आवास, चिकित्सा और अच्छी शिक्षा महँगी होती जाए, बेरोजगारी बढ़ती जाए, किसान भूमिहीन होते जाएँ, खेती लगातार कठिन होती जाए, शिक्षित नौजवान विदेशी व निजी कम्पनियों का बंधुआ मजदूर होने जैसी स्थिति के लिए मजबूर हों तो इन हालात में जीवन को बदल देने का आश्वासन कितना छल व कपटपूर्ण है, अनुमान लगापाना कठिन नहीं है। 
                                          ये छल वंचित वर्ग में जिस पैमाने की कुण्ठा व निराशा पैदा करता है, चुनाव के प्रति उतनी ही गहरी आशंका भी निर्मित करता है। जो निश्चय ही लोकतंत्र के लिए आघातकारी है। जनता के साथ छल का ऐसा महाताण्डव पहले कभी नहीं हुआ! कारणवश किसी एक व्यक्ति के लिए ऐसा विराट अविवेकपूर्ण, चेतना शून्य, आत्म प्रवंचन से युक्त सम्मोहन पहले कभी नहीं देखा गया, राजनैतिक मर्यादा, शालीनता, अनुभव व वरिष्ठता का ऐसा निर्मम उपहास भी पहले कभी नहीं देखा गया। संगठन शक्ति व्यक्ति केन्द्रित होती गई है। 
                                             लोकतंत्र का बुनियादी सिद्धांत मृत्यु शय्या पर है, प्रश्न यह भी है कि लोटा, थाली, लालीपाप, धोती का वितरण और लोक लुभावन घोषणाएँ निष्पक्ष चुनाव की कौन सी धारा में आते हैं। विवेक को क्या इस प्रकार रही प्रभावित या कुन्द करने की कोशिशें नहीं हो लोकतांत्रिक मूल्य क्या इससे आहत नहीं होते? न किए गए गए कामों का ऐसा महिमा मंडन और उन्हें सच मान लेने का अपूर्व उन्माद इस चुनाव की प्रमुख नकारात्मक प्रवृत्ति के रूप में सामने आया है। 
                                   यकीनन वोट प्रतिशत में काफी वृद्धि हो सकती है, परन्तु इससे क्या लोकतंत्र भी मजबूत होगा, यंत्रणा की कैसी भयानक छीलन है कि देश को सच बताने का दावा करने वाला मीडिया इस अकल्पीनय लूट के महाभियान का सक्रिय हिस्सेदार है। अवश्य ही मीडिया कई पापों पर से पर्दा उठाने का उत्साह भी दिखा रहा है, साथ ही चुनने के विवेक को गुमराह भी कर रहा हैं। धार्मिक नारों एवं भावनात्मक मुद्दों के अप्रासंगिक होते जाने के समय में वाराणसी के माध्यम से धार्मिक आस्था के पुनरुत्थान और शोषणकी नई बयार बहाई जा रही है। अपने लम्बे अनुभव से क्या देश की जनता ने यह नहीं सीखा है कि उसे ठगने वाले ही धर्म का सर्वाधिक इस्तेमाल करते रहे हैं। धार्मिकता, कर्मकाण्ड और रूढ़िवाद को बढ़ावा देने के अभियान में मीडिया तथा कार्पोरेट व देशी औद्योगिक घरानों की दिलचस्पी तथा उनका संरक्षण क्या उनके अदृश्य इरादों का संकेत नहीं देता। पिछले चुनावों में ‘‘निर्णायक भूमिका’’ का सम्मान अर्जित करने वाले उलेमा के हाशिए पर चले जाना जहाँ नई आशा जगाता है, वहीं नए-नए जाति आधारित संगठनों के स्वनामधन्य नेता इस भूमिका को हथियाने की होड़ में हैं गरीब अवाम का अनिवार्य हिस्सा, हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, दलितों के मुद्दे एक बार फिर प्रमुखता प्राप्त करने से वंचित रह गए हैं। मुस्लिम, ईसाई व दलितों के आरक्षण के प्रश्न को कांग्रेस व भाजपा दोनों दरकिनार करने में सफल रही है। 
                                             जेलों में बंद बेकूसर नवजवानों की रिहाई तथा आरक्षण, दो ऐसे संवेदशनील मुद्दे हैं, जिन्हें समय रहते यदि अपेक्षित महत्व नहीं मिला तो यह स्थिति अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति कांग्रेस के विश्वासघात के रूप में याद की जाएगी। साथ ही इस का यह त्रासद यथार्थ दोनों समुदायों के लिए घातक साबित होगा, भारतीय लोकतंत्र को इस कठिन परीक्षा से गुजरना ही होगा कि वह कैसे सभी नागरिकों के लिए समान अवसर व अधिकार सुनिश्चित बनाता है। लैंगिक समानता के इस संकल्प में, समानता व स्त्री सुरक्षा के लिए जरूरी जगह होनी ही चाहिए। तेजी से आगे बढ़ते समय में समाज को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में शिक्षा वैज्ञानिक चेतना का प्रसार भी इसी लोकतंत्र से आस लगाए हुए हैं।
                                                              यह चुनाव एक बार उसे फिर निराश करेगा, चुनाव को वर्चस्व होड़ में बदल देने वाली शक्तियाँ, सरकारें, विज्ञान और वैज्ञानिकता को भी अपने लाभ तक ही सीमित रखना चाहती हैं। वह नहीं चाहतीं कि जनता वैज्ञानिक सोच से सम्पन्न हो, वह उसे बौद्धिक सामाजिक रूप से पिछड़ा रखने ही की आकांक्षी हैं, वैज्ञानिक चेतना का पर्याय नहीं है। वरना ऐसा कैसे संभव था सामाजिक अवदान के मामले में शून्य राजनैतिक दल तथा उसके शिखर पुरूष के प्रति शिक्षित युवा इस तरह उत्साह प्रकट करते, देखा जाए तो वह सामाजिक विकास पथ का रोड़ा ही साबित हुए हैं। देश की संभावना युवा पीढ़ी यह क्यों नहीं समझ पा रही है कि अति उत्साह में वह जाने-अनजाने उन्हीं लोगों के पक्ष में खड़ी है, जो कृषि, पेयजल से लेकर औद्योगिक उत्पादन या शिक्षा से लेकर संस्कृति तक के खिलाफ लगातार सक्रिय रहे हैं। अधिनायक व वर्चस्ववादी प्रवृत्तियों से मुठभेड़ करते हुए हमारा लोकतंत्र कुछ नकारात्मकताओं के बावजूद आगे बढ़ा है,                             
                                          लोकतंत्र का मतलब ही है, सामूहिक आकांक्षा व निर्णयों के सम्मान का संस्कार, संगठन की शक्ति, व्यक्ति में केन्द्रित होने के अपने निश्चित। यों व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों का विकास तीव्रता से व्यापक प्रदेश या देश की समूची तरक्की या गतिविधि किसी एक (मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री) से प्रचारित होती है। कुछ-कुछ हिन्दी फिल्मों के नायको जैसी स्थिति बनती दिखाई दे रही है। भाषा लोकतंत्र की विशिष्ट शक्ति है, स्वस्थ प्रतिस्पद्र्धा में महत्वपूर्ण लक्षण है। 
                                             भाषा का अपमान तथा प्रतिस्पद्र्धा अमर्यादित  तुक्षता का प्रवेश उसके लिए गहरा आघात साबित हो सकता है। इससे आने वाले दिनों में रुग्ण साधनों से निर्मित स्थिति अधिक खराब होते जाने की आशंकाएँ भी हुई हैं। निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यकता का लोप जिस वितृष्णा को जन्म दे रहा है, उसे जनतांत्रिक संस्कार के शत्रुओं के अलावा किसी सधने वाला नहीं। ये वितृष्णा सबके लिए हानिकारक है। परन्तु....फिर वही सवाल, दिन प्रतिदिन मनमानी लूट का सुलभ साधन मानने की होती जाती सोच क्या ऐसा होने देगी।                      
 -शकील सिद्दीकी
मो.09839123527

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

देश, लोकतंत्र एवं गंगा जमुनी सभ्यता पर संकट


    16वीं लोकसभा का चुनाव कोई सामान्य चुनाव नहीं है। देश के दुश्मनों ने बड़ी चतुराई के साथ देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा गंगा जमुनी तहजीब की ईंट से ईंट बजाने की योजना दबे पाँव बना ली हैं। उनका निशाना कुल मतदाताओं का एक तिहाई वह नवजवान है जो भारतीय संस्कृति से अनभिज्ञ है तथा भौतिकवाद की दुनिया में पला बढ़ा है।
    देश के प्रमुख दलों में से एक भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर जिस आक्रमक तेवर के साथ कारपोरेट जगत व मीडिया के सहारे अपने चुनाव प्रचार के गुब्बारे में हवा भरी है क्या उसका उत्तर देश की जनता देगी? इसका बेचैनी से इन्तजार न केवल देश के शत्रुराष्ट्रों को है बल्कि मित्र राष्ट्र भी उत्सुकता के साथ 16 मई के दिन का इन्तजार कर रहे हैं।
    वर्ष 2002 में गुजरात प्रान्त में हुए साम्प्रदायिक दंगे और उसके चलते गोधरा में हुए मुस्लिम नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी, जिस प्रकार विगत एक वर्ष से झूठ व अर्द्धसत्य का सहारा लेकर अपनी ही पार्टी के अनुभवी व पार्टी के संस्थापक दिग्गजों को हाशिए पर ढकेल कर स्वयं को प्रधानमंत्री मानकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं वह कोई मामूली बात नहीं है।
    भाजपा की पैतृक संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, उसकी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था हिन्दू सेवा संघ (एच.एस.एस.) और देश की आर्थिक उन्नति एवं औद्योगिक विकास से फिक्रमंद शत्रु राष्ट्रों ने मिलकर इस बार देश के युवा मतदाताओं की राजनीतिज्ञ अपरिपक्वता व उनकी अनुभवहीनता का लाभ उठाने का एक मंसूबा बनाया है और देश के वर्तमान लोकतांत्रिक स्वरूप व इसके ताने बाने को नष्ट कर फासीवादी व्यवस्था की ओर ले जाने का एक षड्यंत्र रचा है।
    नरेन्द्र मोदी का स्वयं के अनुकूल पोषण उस आर.एस.एस. ने किया है जहाँ महिलाओं के अधिकार का कोई प्रश्न नहीं, अल्पसंख्यकों के जीने के हक का कोई सवाल नहीं। लोकतंत्र व प्रजातंत्र का कोई मतलब नहीं,  जो संघ संचालक का आदेश वही कानून, हिटलर व मुसोलिनी की विचारधारा से प्रभावित इस संस्था ने बहुत दिन पर्दे के पीछे रहकर,  अटल बिहारी और जसवन्त सिंह जैसे मृदुभाषी एवं सभ्य राजनेताओं के मुखौटे लगाकर पहले जनसंघ व बाद में भाजपा जैसा राजनैतिक दल बनाकर सत्ता हासिल करने के प्रयोग किए परन्तु नाकामी हाथ लगी।
    अब खुलकर दो-दो हाथ करने के मूड में आ चुके संघ ने इस चुनाव में काफी पहले से ही तैयारी करके मैदान पकड़ा है। पहले तो समाजसेवी अन्ना हजारे को महाराष्ट्र से उठाकर दिल्ली लाया गया, साथ में साधु संतों, रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट व सेवानिवृत्त फौजी अफसरों को जमाकर अपने संघी सिपाहियों की सेना उतारकर देश में अराजकता फैलाने का प्रयास किया गया। भ्रष्टाचार व महँगाई को मुद्दा बनाया गया जबकि इस हमाम में भाजपा स्वयं भी नंगी थी। बावजूद इसके काफी दिन यह माहौल गर्म रहा, परन्तु जब केन्द्र सरकार ने बरसों से लम्बित पड़े लोकपाल बिल को लोकसभा से पारित कराकर राज्यसभा में भेजा तो भाजपा के गले गुड़ भरे हँसिया के समान वह लटक गया। अंत में राज्यसभा में बिल न पास होने से भाजपा का किरदार नंगा होकर सामने आ गया।
    यहाँ से अन्ना की टीम बिखर गई और आप पार्टी का वजूद अमल में आ गया जो भाजपा के लिए स्वयं जी का जंजाल बनकर खड़ी हो गई और दिल्ली विधानसभा सत्ता प्राप्ति के सफर को उसने ब्रेक डाउन कर भाजपा को करारा झटका दे दिया लेकिन कांग्रेस का दिल्ली से एक दम सफाया कर भाजपा के दिल को खुश करने का एक काम वह जरूर कर गई।
    जहाँ तक भाजपा द्वारा नरेन्द्र मोदी को सामने रखकर, तानाशाही के अंदाज में जो प्रचार प्रारम्भ किया गया है वह भारतीय राजनीति में एक तरह का प्रयोग है और यह प्रयोग पूँजीवादी राष्ट्रों के सरगना अमरीका की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नकल है, जहाँ दो पार्टी सिस्टम है और चुनावी प्रचार व्यक्तित्व पर केन्द्रित रहता है। यहीं से भाजपा, आर.एस.एस., एच.एस.एस. व सी.आई.ए. के तालमेल का इशारा मिलता है।
    पूँजीवादी राष्ट्र भले ही अपने यहाँ लोकतंत्र व प्रजातंत्र की सुदृढ़ता को बल देते रहे हांे, परन्तु उनकी मंशा कभी भी विकासशील व अविकसित राष्ट्रों में लोकतंत्र की मजबूती व राजनैतिक स्थिरता की नहीं रही। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान इसका स्पष्ट उदाहरण है, जो स्वतंत्रता के बाद से आज तक पूँजीवादी राष्ट्र अमरीका के चंगुल से आजाद न हो सका, परिणाम स्वरूप वहाँ के नागरिक सदैव लोकतंत्र के खुले माहौल को तरसते रहे। राजनैतिक अस्थिरता के चलते वहाँ की अर्थव्यवस्था कराह रही है, आतंकवाद का दानव फनफना कर मानवता को डँसता जा रहा है।
        नरेन्द्र मोदी अपनी कट्टरपंथी विचारधारा व हिटलर शाही रवैये के लिए अपनी पार्टी में पहचाने जाते हैं, उन्होंने गुजरात में चार-चार मुख्यमंत्रियों को गर्त में ढकेल कर सत्ता पर कब्जा कर रखा है। अल्पसंख्यक क्या, किसी की मजाल नहीं कि कोई उनकी मर्जी के विरुद्ध एक शब्द बोल सके। मायावती, जयललिता और ममता सभी उनके हिटलरशाही मिजाज के मामले में पीछे हैं।
    नरेन्द्र मोदी ने इस बार भी अपनी ही पार्टी में गदर पैदा कर दिया है। भाजपा के आन्तरिक लोकतंत्र को वह नष्ट कर चुके हैं। आडवाणी, शिवराज सिंह, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, यशवन्त सिंह, शत्रुहन सिन्हा, विनय कटियार, मुख्तार अब्बास नकवी, लालजी टण्डन पार्टी में दुबक से गए हैं। अपनी ही पार्टी में वे बेगाने हो चुके हैं। नेता विरोधी दल की हैसियत रखने वाली नेत्री सुषमा स्वराज व शोला बयान नेत्री उमा भारती की भी बोलती बंद कर दी गई है।
    यदि यूँ कहा जाए तो गलत न होगा कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदलने का संकल्प लेकर उतरने वाली भाजपा व उसके प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने शुरूआत अपने घर से ही प्रारम्भ कर दी है। शायद इसीलिए भाजपा से निष्कासित वयोवृद्ध भाजपा नेता जसवन्त सिंह को यह कहना पड़ा कि हम लोगों की भाजपा पुरानी भाजपा थी और अब यह नई भाजपा है।
    भाजपा के इस रूप परिवर्तन का पहला प्रभाव एन.डी.ए. के गठबंधन पर पड़ा और उसका प्रमुख सहयोगी दल जनता दल (यू0) की उससे तलाक हो गई। नीतीश कुमार व शरद यादव से डेढ़ दशक पुरानी दोस्ती का अंत हो गया, बदले में दलित नेता रामविलास पासवान का साथ पकड़ कर भाजपा ने अपने कुछ आँसू अवश्य धो डाले।
    भाजपा ने लोकसभा चुनाव की घोषणा से बहुत पहले ही मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का न केवल उम्मीदवार घोषित कर दिया बल्कि अपने प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी दल कांग्रेस को भी इसी तर्ज पर चुनाव लड़ने की दावत दी। भाजपा के इस प्लान में मदद कांग्रेस के उन नेताओं ने करनी शुरू कर दी जो राहुल को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते रहे हैं। इससे पूर्व कांग्रेस ने कभी भी न तो अपना मुख्यमंत्री चुनाव से पूर्व घोषित किया और न प्रधानमंत्री। कांग्रेस नेतृत्व भले ही किसी को मुख्यमंत्री नामजद कर देता था परन्तु अन्तिम निर्णय प्रदेश के विधान मण्डल द्वारा लोकतांत्रिक व्यवस्था के द्वारा किया जाता रहा। यही प्रक्रिया प्रधानमंत्री के चयन में भी की जाती रही है। कांग्रेस हाईकमान ने भाजपा की चाल का पूर्वानुमान करते हुए राहुल गांधी के नाम का एलान बतौर प्रधानमंत्री करने से परहेज कर लिया और कांग्रेस ने पूर्व की परम्परा की भाँति एक नेता के नेतृत्व में चुनावी अभियान चलाने का निर्णय लेकर कुछ हद तक भाजपा के गेम प्लान को आघात पहुँचाया।
    भारतीय लोकतंत्र पर भाजपा व आर.एस.एस. का यह आक्रमण कोई नया नहीं है इससे पूर्व गृहमंत्री व उपप्रधानमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि समय आ गया है कि देश की जनता का विचार इस मुद्दे पर लिया जाए कि देश में प्रधानमंत्री फार्म आॅफ गवर्नेन्स की लोकतांत्रिक व्यवस्था रहना उचित रहेगा। जैसा कि अभी तक चल रहा है या फिर अमरीकी स्टाइल की राष्ट्रपति फार्म आॅफ गवर्नेन्स अधिक प्रभावशाली व उपयोगी रहेगा इसका जब विरोध सभी दलों की ओर से सामने आया तो आडवाणी को अपने कदम वापस खींचने पड़े।
    भारतीय संविधान में संघीय स्वरूप को बल दिया गया है, प्रान्तों की राजनैतिक स्वतंत्रता व अधिकार को महत्व दिया गया है। केन्द्र को प्रान्तों की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता व स्वायत्तता पर अंकुश लगाने का अधिकार संविधान में केवल आपातकाल में दिया गया है जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के द्वारा 1975 में आन्तरिक सुरक्षा के नाम पर किया गया था और जिसके दुष्परिणाम सामने आए थे और नतीजे में जो राजनैतिक अस्थिरता देश में उत्पन्न हुई उससे आज भी देश उबर नहीं सका है।
    मोदी को आगे रखकर, नवजवानों के ऊपर अपना सारा प्रचार केन्द्रित करके आर.एस.एस. तथा देश व विदेशों में बैठे अपने पूँजीपति मित्रों के निर्देशों पर भाजपा ने जिस राजनैतिक प्रयोग का प्रारम्भ भारतीय राजनीति में किया है वह देश के लोकतंत्र, प्रजातंत्र,
धार्मिक सद्भाव, कौमीयकजहती के लिए तो खतरा है ही, साथ ही मानव अधिकारों के ऊपर भी जबरदस्त संकट सिद्ध होगा।
    अब प्रश्न उठता है कि देश के शत्रु राष्ट्रों ने यह प्रयोग मोदी के द्वारा क्यों देश में प्रारम्भ किया तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केन्द्र की सरकार से जितना काम इन शक्तियों को लेना था वह ले लिया गया। एफ.डी.आई. से लेकर परमाणु समझौते पर कांग्रेस सरकार इन विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करती रही, लेकिन कहीं न कहीं कांग्रेस की अपनी मजबूरियाँ हैं जो इन विदेशी पूँजीपतियों के साथ तालमेल आड़े आ रही थीं, इसीलिए इन सरमाएदारों ने एक बार फिर अपने पुराने मित्र भाजपा पर दाँव लगाने को मन बनाया है और उसकी सफलता के लिए प्रचारतंत्र का भरपूर प्रयोग किया जा रहा हैै। आर.एस.एस. जिसकी विदेशी यूनिट हिन्द सेवा संघ (एच.एस.एस.) है, को भी पूरी तरह से खुलकर इस बार मैदान में उतार दिया गया है। हिन्दुत्व की बयार के स्थान पर इस बार अनेक झूठे वायदों व सुन्दर सुहाने भविष्य के सपने दिखाने का काम इलेक्ट्रानिक व प्रिन्ट मीडिया से कराया जा रहा है। मोदी सरकार के गुणों का गान माडर्न संगीत से लेकर हर-हर मोदी के धार्मिक नारों का प्रयोग करके किया जा रहा है।
    यह समय भारतीय नागरिकों की राजनैतिक परिपक्वता व दक्षता की परीक्षा का है। अभी तक यदि पूँजीवादी व साम्प्रदायिक शक्तियों को देश का नेतृत्व करने में पूर्णतया सफलता नहीं मिल सकी है तो उसका सारा श्रेय भारतीय जनता को जाता है जिनका आम मिजाज शान्तिप्रिय व सामाजिक समरसता का रहा है। उसे प्रदूषित कर दिमागों में ज़हर भरने का काम स्वतंत्रता संग्राम के समय से देश के दुश्मनों द्वारा किया जाता रहा है, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी।
             कांग्रेस, सपा, बसपा व अन्य प्रान्तीय दलों के भीतर भ्रष्ट साम्प्रदायिक व आपराधिक तत्वों की मौजूदगी को नकारा नहीं जा सकता परन्तु इन दलों की विचार धारा को देश के लिए घातक कदापि नहीं कहा जा सकता। भाजपा देश की एकमात्र, एक ऐसी राजनैतिक जमात है जो संकीर्ण धार्मिक विचार धारा, सामन्ती प्रबंध तंत्र एवं पूँजीवाद की पैरोकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्देश पर काम करती है। इस प्रकार की विचारधारा इस देश की बहुरंगी सभ्यता तथा गरीब परवर मुल्क के लिए कदापि उचित नहीं ठहरायी जा सकती।  
    -  मो. तारिक  खान   
मो0 09455804309

सोमवार, 17 मार्च 2014

अंधलोकवाद का प्रेत और लोकतंत्र

सन् 2014 का लोकसभा चुनाव पापुलिज्म यानी अंधलोकवाद के आधार पर लड़ा जाएगा। पापुलिज्म के आधार पर पहले कांग्रेस वोट जुगाड़ करती रही है। लंबे समय के बाद पहली बार यह दृश्य नजर आ रहा है कि पापुलिज्म की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस से आम आदमी पार्टी और भाजपा ने बाजी मार ली है।
    सन् 1971 के लोकसभा चुनाव को श्रीमती इंदिरा गांधी ने पापुलिज्म के आधार पर लड़ा। उन्होंने नारा दिया ‘समाजवाद लाओ, गरीबी हटाओ।’ इसके बाद आपात्काल आया और 1977 का चुनाव ‘लोकतंत्र लाओ देश बचाओ’ के नारे पर लड़ा गया ।
    पापुलिज्म के रूप विभिन्न रूपों में क्षेत्रीय स्तर पर अभिव्यक्त होते रहे हैं लेकिन परंपरागत पार्टी व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए अन्ना आंदोलन का होना बाद में उस आंदोलन से निकले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी का गठन करना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है। यह परिघटना सन् 1974 के जे.पी. आंदोलन से पूरी तरह भिन्न है। जे.पी. आंदोलन के लोगों ने जनता पार्टी का उन्हीं कायदे-कानूनों और सिद्धांतों के आधार पर गठन किया जो पहले से प्रचलन में थे, इसके कारण उसमें शामिल विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं और उनके अनुयायियों में वैचारिक एकीकरण नहीं हो पाया । लेकिन आम आदमी पार्टी ने एकदम भिन्न पैराडाइम से काम आरंभ किया है और अपने साथ आने का उन तमाम लोगों से आह्वान किया है जो उसके नजरिए और एक्शन से सहमत हैं।
    आम आदमी पार्टी भारत के संविधान के पैराडाइम में काम करने के वायदे के साथ मैदान में उतरी है। वे लोग संविधान में कल्पित सपने को साकार करना चाहते हैं और यह इस दल की सबसे महत्वपूर्ण बात है। हमारे देश में सक्रिय अधिकतर राजनैतिक दलों में प्राथमिकताएँ बदलती रही हैं और कभी न कभी संविधान के दायरे के परे जाकर काम करते रहे हैं। मसलन् साम्प्रदायिक, आतंकवादी या पृथकतावादी संगठनों की मदद लेना या उनके साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध बनाए रखने का काम अधिकांश प्रमुख दल करते रहे हैं। इसके अलावा लोकतांत्रिक व्यवस्था की चरमराती व्यवस्था को भी आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनैतिक गतिविधियों में निशाने पर रखा है।
    लोकतंत्र की चरमराती स्थितियों ने अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में विकसित होने का जनप्रिय आधार प्रदान किया और इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने बार-बार परंपरागत दलों की अप्रासंगिकता और असमर्थताओं की ओर ध्यान खींचकर नए दल की संभावनाओं के लिए आम जनता में भावभूमि निर्मित की।  आम आदमी पार्टी के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि आमलोगों की प्रचलित दलों के नेताओं के प्रति कोई आस्था नहीं है और आम जनता में इन दलों की कोई साख नहीं है।
    आम आदमी फिनोमिना के पापुलिज्म को समझने के लिए हमें परंपरागत सोच की प्रक्रिया के बाहर निकलना पड़ेगा। परंपरागत सोच यह है कि पहले दल का बडा नेता या उच्च कमेटी जो कुछ कहती थी वही प्रामाणिक राजनैतिक कम्युनिकेशन माना जाता था, लेकिन इस कम्युनिकेशन से साधारण आदमी अपने को विच्छिन्न महसूस करता था और यहीं पर अन्ना आंदोलन में सड़क पर चलता फिरता आम आदमी बहुत बड़े कम्युनिकेटर के तौर पर दाखिल होता है। भ्रष्टाचार के सवाल पर
साधारण नागरिकों के बीच में खड़े होकर अन्ना आंदोलन के नेताओं का बोलना, साधारण आदमी का भ्रष्टाचार के सवाल पर मुखर होकर टीवी के सामने बोलना, यह नया फिनोमिना था। इस प्रक्रिया में आम आदमी को राजनैतिक कम्युनिकेटर के रूप में अभिव्यक्ति का अवसर मिला और एक नए किस्म का राजनैतिक कम्युनिकेटर मीडिया और राजनीति में दाखिल होता है जो कल तक हमारे प्रचलित राजनैतिक कम्युनिकेशन के बाहर था। प्रचलित राजनैतिक कम्युनिकेशन में दल विशेष का नेता दाखिल होता था और वह अपने को प्रामाणिक राजनैतिक कम्युनिकेटर के रूप में पेश करता था। अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने आम आदमी को राजनैतिक अभिव्यंजना में समायोजित करके नए किस्म के राजनैतिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक संवाद को जन्म दिया।
    पहले राजनैतिक दल बहुत बड़े राजनैतिक लक्ष्यों को केन्द्र में रखकर बातें करते थे, संगठन निर्माण करते थे। लोकतंत्र में कल तक नेता प्रवक्ता होते थे लेकिन आम आदमी पार्टी ने साधारण जन को राजनैतिक प्रवक्ता बनाकर लोकतंत्र की अंतर्वस्तु को ही बदल दिया ।
    नेता हमेशा से किसी न किसी रूप में लोकतंत्र में समस्यामूलक रहे हैं लेकिन साधारणजन को लोकतंत्र के लिए कभी खतरा नहीं माना गया । लेकिन यह जनता के प्रति या आम आदमी के प्रति अंधश्रद्धा से पैदा हुई धारणा है।
    लोकतंत्र में जनता को गैर समस्या मूलक मानने के कारण अंधलोकवाद का खतरा हमेशा बना रहता है। जो नेता जनता की अंधी भक्ति करके जन-जागरण के नाम पर जनोन्माद पैदा करते हैं वे अंततः लोकतंत्र विरोधी दिशा में गए हैं। आम आदमी कहें या साधारणजन या जनता कहें, हमें जनता को अनालोचनात्मक ढंग से नहीं देखना चाहिए। अनालोचनात्मकता लोकतंत्र की मौत है। लोकतंत्र में शिरकत बढ़ाने के लिए जनता के प्रति आलोचनात्मक नजरिया जरूरी है।
           जनशिरकत के नाम पर, जन समाधान के नाम पर हमेशा पापुलिज्म ने कॉमनसेंस समाधानों की सिफारिश की है। कॉमनसेंस  समाधानों के बजाए संस्थानगत, नियम-कानून बनाकर समाधान खोजे जाने चाहिए।
    यह सच है कि भ्रष्टाचार समस्या है, महँगाई समस्या है, लेकिन इसके समाधान कॉमनसेंस के आधार पर नहीं खोजे जाएँ। इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर दिया जाए। संरचनात्मक परिवर्तनों को करते समय पहले से उपलब्ध अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनमें इजाफा करने वाले समाधान सुझाने की जरूरत है। मसलन, सोवियत संघ और अनेक समाजवादी यूरोपीय देशों में समाजवाद के खिलाफ भयानक जनोन्माद देखने में आया। समाजवाद विरोधी पापुलिज्म को लोकतंत्र की आँधी या तूफान या उभार आदि नामों से पुकारा गया। लेकिन इस समूचे उभार में यह भूल ही गए कि समाजवाद में जो जन अधिकार और जन सुरक्षा प्राप्त थीं कहीं वे ही कम न हो जाएँ। वास्तव में यही हुआ। यूरोप का तथाकथित जन उभार समाजवाद को धराशायी करने में सफल रहा। आम जनता खुश थी कि समाजवादी व्यवस्था खत्म हो गई, लेकिन इस समूची प्रक्रिया में वे भूल ही गए कि समाजवाद के दौरान जो अधिकार और सामाजिक सुरक्षाएँ प्राप्त थीं वे भी आम जनता के पास से चली र्गइं। इसे कहते हैं अंधलोकवाद।
       अंधलोकवाद हमारे सामने अनेक बार जिन समाधानों को लेकर आता है हम उसकी दूरगामी परिणतियों को नहीं देख पाते, वह हमारे सामने तात्कालिक समाधान पेश करता है और तात्कालिक समाधानों से हमें एक हद तक राहत भी मिलती है। मसलन समाजवाद में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी, निजी स्वतंत्रता नहीं थी। समाजवादी व्यवस्था के पतन के साथ ही नागरिकों को निजी अभिव्यक्ति की आजादी मिली, निजी स्वतंत्रताएँ भी मिलीं। लेकिन इस प्रक्रिया में पहले से उपलब्ध सुरक्षाएँ और अधिकार चले गए। समाजवाद में स्त्रियाँ सुरक्षित थी, सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी थी, लेकिन समाजवाद के पतन के साथ ही सामाजिक सुरक्षाएँ खतरे में पड़ गईं और औरतों के सामने अनेक किस्म की असुरक्षाएँ आ खड़ी हुईं। इसके कारण लाखों औरतें जिस्म की तिजारत करने के लिए मजबूर हुईं। हठात् संचित धन मुद्रा के अवमूल्यन के कारण कौडि़यों में तब्दील हो गया और रातों-रात राज्य की संपदा की लूट करके अरबपतियों का लुटेरा जगत पैदा हो गया।
    जो लोग समाजवाद में मानवाधिकारों के हनन को लेकर परेशान थे और आलोचनाएँ कर रहे थे, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही यह शिकायत कर रहे थे, उनकी इस संदर्भ में शिकायतें जायज थीं, इसके लिए जरूरी था कि समाजवादी संरचनाओं में मानवाधिकार के संरचनात्मक सुधार ईमानदारी से लागू किए जाते। लेकिन यह काम न करके समूचे समाजवाद को ही ध्वस्त करके लोकतंत्र के निर्माण का जो मार्ग चुना गया वह आत्मघाती और जन-उत्पीड़क मार्ग था। यह अंधलोकवाद से पैदा हुआ मार्ग था।
    लोकतंत्र के लिए संघर्ष करें या समाजवाद के लिए संघर्ष करें या फिर किसी यूनियन की माँगों के लिए संघर्ष करें, बुनियादी तौर पर यह ध्यान रखें कि नई माँग के मानने से कहीं पहले से प्राप्त अधिकार कम तो नहीं हो जाएँगे। आंदोलन का अर्थ उपलब्ध जनाधिकार और सुविधाएँ खोना नहीं बल्कि उनको बचाए रखकर नए अधिकार पाना है। जनांदोलन खोने के लिए नहीं किए जाते। जो जनांदोलन पहले से उपलब्ध हकों को कम कर दे वह आत्मघाती आंदोलन है। वह जनघाती आंदोलन है। समाजवाद के खिलाफ पूर्वी यूरोपीय देशों और समाजवादी देशों में चले सभी जनांदोलन इसी अर्थ में आत्मघाती साबित हुए हैं उनसे सोवियत संघ और कमजोर हुआ, सोवियत संघ का विभाजन हो गया। तमाम समाजवादी यूरोपीय देश पहले की तुलना में कमजोर हो गए,विभाजित हो गए।  जो आंदोलन देश को तोडे़, विभाजित करे, वह आत्मघाती जनांदोलन है। इस विवेचन में जाने का मकसद यह है कि बार-बार जनांदोलनों के नाम पर तमाम अकादमिक और राजनैतिक विमर्श में पापुलिज्म के बारे में जितना लिखा गया है उसमें समाजवादी देशों में चले समाजवाद विरोधी पापुलर आंदोलनों को प्रमुख संदर्भ सूत्र बनाया गया है।
    ‘पापुलिज्म’ क्या है? यह जन असंतोष है। जब व्यवस्था या नेता समस्या के समाधान में असफल होते हैं और आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं होता तो हमेशा जन-असंतोष की शक्ल में पापुलिज्म अपने को अभिव्यक्त करता है। जन-असंतोष का अवरुद्ध विकास से गहरा संबंध है। पापुलिज्म की अभिव्यक्ति कई बार सांस्कृतिक रूपों में होती है, लेकिन वहाँ पर वह जनशिरकत, जनता के आनंद और धार्मिक, सांस्कृतिक जलसों के रूपों में व्यक्त होता है।
    भ्रष्टाचार का मौजूदा नियमों के तहत व्यवस्था समाधान नहीं दे पा रही थी तो पापुलर अभिव्यक्ति के रूप में कई बार इसकी अभिव्यक्ति हो चुकी है लेकिन हमेशा इसकी अभिव्यक्ति सरकार हटाओ आंदोलन में तब्दील होती रही है। मसलन संपूर्ण क्रांति आंदोलन, नवनिर्माण आंदोलन या वी.पी. सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, इन सबकी समस्या थी भ्रष्टाचार, लेकिन माँग थी सरकार बदलो। इससे भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना रहा, सरकारें गिर गईं और बदल गईं। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन इस अर्थ में भिन्न था कि इसका लक्ष्य सरकार गिराना नहीं था बल्कि भ्रष्टाचार
निरोधक संरचनाओं और कानूनों का निर्माण करना था।
    अन्ना आंदोलन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसके दबाव में सरकार थी और संसद थी। सरकार और संसद दोनों ने माना कि भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का निर्माण किया जाए। जनलोकपाल कानून और उससे जुड़े तमाम कानून बनाए जाएँ। इस आंदोलन ने सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया लेकिन सरकार को गिराया नहीं, सरकार को मजबूर किया कि वह जनता की सुने और संरचनात्मक समाधान खोजे।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ के कई रूप रहे हैं जैसे मातृभाषा आंदोलन, अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, गो-रक्षा आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, आरक्षण विरोधी आंदोलन, विभिन्न राज्यों में पृथकतावाद और अंध क्षेत्रीयतावाद के आंदोलन, आपात्काल विरोधी आंदोलन, भाषावार राज्य निर्माण आंदोलन, नए राज्य बनाने के आंदोलन और जन समस्याओं पर केन्द्रित युवा आंदोलन जैसे संपूर्ण क्रांति, नवनिर्माण आंदोलन, अन्ना आंदोलन आदि।  कहने का तात्पर्य है कि पापुलर आंदोलन हमेशा सही नहीं होते। पापुलर आंदोलन में जनता की बेशुमार शिरकत देखकर उन्मादित होकर निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।  पापुलर आंदोलन में चूँकि जनता शामिल है इसलिए उसका समर्थन करो इस विचार से बचने की जरुरत है।
    पापुलर आंदोलन को देखने का
आधार है उस आंदोलन का नजरिया और कार्यक्रम। नजरिए और कार्यक्रम के आधार पर ही तय किया जा सकता है कि संबंधित आंदोलन जनहित और समाजहित में है या सामाजिक विभाजनकारी है ।
    समस्या विशेष पर जनसमूह की लामबंदी पापुलर जनांदोलन बनाती है लेकिन यह परिभाषा काफी अमूर्त है। समस्या, एकजुट जनसमूह और निरंतर आंदोलन मात्र से पापुलिज्म को परिभाषित करने में दिक्कतें हैं।
    ‘पापुलिज्म’ स्वयं में अमूर्त वैचारिक पदबंध है। किसी भी पदबंध की अमूर्तता को तोड़ने के लिए उसकी विचारधारात्मक पड़ताल की जानी चाहिए। इसी तरह पापुलिज्म की पड़ताल के लिए भी प्रत्येक पापुलर आंदोलन का विचारधारात्मक विश्लेषण किया जाना चाहिए। विचारधारा विश्लेषण के दौरान ही पता चलेगा कि संबंधित आंदोलन की माँगें क्या हैं? जनाधार किन वर्गों में है? राजनैतिक मंशा क्या है और नजरिया क्या है? और सामाजिक-राजनैतिक परिणतियाँ क्या हो सकती हैं? आदि।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ के फ्रेमवर्क में जन्मे अधिकांश आंदोलन सरकार बदलने या सरकार पाने के आंदोलन रहे हैं। सिर्फ दो आंदोलन इसके अपवाद हैं, आपात्काल विरोधी आंदोलन और अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। इन दोनों आंदोलनों के कारण
संविधान में संशोधन हुए। आपात्काल विरोधी आंदोलन के कारण 42वाँ संविधान संशोधन नए 43वें संविधान संशोधन के जरिए निरस्त किया गया और नए संविधान संशोधन के जरिए आंतरिक आपात्काल लगाना मुश्किल बना दिया गया। वहीं पर अन्ना आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानूनी परिवर्तन आए हैं और अनेक भविष्य में आएँगे।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ का एक साइड इफेक्ट यह है कि इसने हमेशा प्रकारान्तर से लोकतांत्रिक चेतना में इजाफा किया है और
संवैधानिक चेतना बढ़ाई है। मसलन पंजाब का खालसा आंदोलन हो या दार्जिलिंग का गोरखालैंड या मिजोरम का पृथकतावादी आंदोलन हो या असम गण संग्राम परिषद और आसू का असम छात्र आंदोलन हो, इन सभी आंदोलनों के जरिए सारे देश में लोकतांत्रिक विमर्श का विस्तार हुआ है और लोकतंत्र के पाठ को, संविधान के प्रावधानों को बार-बार सिरे से व्याख्यायित किया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोकतंत्र में पापुलिज्म प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षतौर पर लोकतंत्र को समृद्ध करता रहा है ,जहाँ पर वह यह काम नहीं कर पाया है वहाँ पर पापुलिज्म पिटा है और हाशिए पर चला गया है। पंजाब, दार्जिलिंग, मिजो आंदोलन, नागा आंदोलन, आसू का आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
    भारत का लोकतंत्र बहुत समृद्ध है और इसकी संरचनाएँ बेहद सक्रिय हैं। इसमें शासन करने वाले नेताओं के कान भी हैं। इसका सुफल यह है कि भारत में पापुलिज्म कभी पश्चिमी देशों की तरह अंधड़ नहीं बन सकता। पश्चिमी देशों में पापुलिज्म को आँधी के रूप में चलते देखा गया है लेकिन भारत में पापुलिज्म कभी आँधी के रूप में नहीं आया। पापुलिज्म हमेशा धीमी गति से आया, चरम पर जाकर
आँधी बना और उसके बाद लुढ़कता चला गया। हमारे संविधान में पापुलिज्म के समाधान हैं और जिन सवालों पर समाधान नहीं मिलते उन पर नेताओं और दलों ने मिलकर समाधान खोजे हैं, जब यह दोनों विफल रहे हैं तो न्यायपालिका ने समाधान पेश किए हैं। अनेक समस्याएँ हैं जिनके प्रभावशाली समाधान, कानून में नहीं हैं, संविधान में नहीं है। दलों में एकमत के अभाव के कारण समाधान बन नहीं पा रहा है तो अदालत के हस्तक्षेप से समाधान निकलता रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ध्यान से देखें जिसमें दो साल या उससे ज्यादा सजा पाए नेता को संसद-विधानसभा  का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह मसला राजनैतिक दलों में हल नहीं हो पा रहा था, संसद और चुनाव आयोग भी तय नहीं कर पा रहे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर चुनाव आयोग को व्यवस्था करने का आदेश दे दिया। ऐसे अनेक विवाद हैं जिनका समाधान संसद में नहीं निकलता लेकिन सुप्रीम कोर्ट में निकल आता है। कहने का तात्पर्य है कि भारत में लोकतंत्र को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने में न्यायालयों की बड़ी भूमिका रही है। कम से कम पश्चिमी देशों में लोकतंत्र के हित में न्यायालय दखल नहीं देते।
    ‘पापुलिज्म’ के हथियार का आमतौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन राम मंदिर आंदोलन, आंदोलन के नाम पर पूरे देश में बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के लिए पूरी शक्ति के साथ आंदोलन संघ परिवार-भाजपा आदि ने आरंभ किया। लेकिन इन्हीं संगठनों ने सर्वधर्मसमभाव के लिए आंदोलन नहीं किया। बाबरी मस्जिद गिराने के लिए मुहिम चलाई गई लेकिन देश के सभी मंदिर,  मस्जिद, गुरुद्वारों, गिरजाघरों की रक्षा के लिए आंदोलन नहीं चलाया गया। इन दिनों नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की बातें की जा रही हैं लेकिन विकास के किसी भी ठोस प्रस्ताव के बिना। विकास को अमूर्त बनाकर पेश किया जा रहा है। समानता की बातें की जा रही हैं लेकिन छोटे-बड़े, ऊँच-नीच के भेदों को खत्म करने की बातें नहीं हो रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि समानता तो होगी लेकिन छोटे-बड़े का भेद बनाए रखकर। विकास तो होगा लेकिन गरीब-अमीर का भेद बनाए रखकर। विकास की बातें करते समय अमीर-गरीब के भेद की अनदेखी करने का अर्थ है एकायामी विकास करना। विकास के मॉडल में अमीर-गरीब का भेद केन्द्र में रखे बिना बातें नहीं हो सकतीं। सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बातें तब तक बेमानी हैं जब तक शक्तिशाली और शक्तिहीन के भेद को सम्बोधित न करें।
    इसी तरह पंचायतें होने का अर्थ आम आदमी तक लोकतंत्र का पहुँचना नहीं है आम आदमी तक लोकतंत्र तब पहुँचता है जब फैसला लेते समय पंचायतें लिंग, जाति, सामाजिक हैसियत आदि को सम्बोधित करते हुए फैसले लें, फैसले में सभी वर्ग के लोगों की शिरकत हो। अभी हमारे यहाँ लोकतांत्रिक संरचनाएँ सामाजिक हैसियत का अंग हैं। यह स्थिति जब तक रहेगी निचले स्तर पर सामाजिक भेद, ऊँच-नीच का भेद, स्त्री-पुरुष का भेद बना रहेगा।
    ‘पापुलिज्म’ जब आंदोलन करता है तो राजनैतिक दलों को चुनोती देता है, उनकी विचारधारा को चुनौती देता है। इसके अलावा वह दैनंदिन जीवन शैली और उपभोग को भी चुनौती देता है। सामाजिक संबंधों और सामाजिक विश्वासों को भी चुनौती देता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि वह हमेशा औरतों के अधिकारों, अस्तित्व को खतरे में डालता है।
    भारत में पृथकतावादी आंदोलनों से  लेकर राममंदिर आंदोलन तक ,सभी पापुलर आंदोलनों का यह साझा अनुभव है कि औरतों के लिए इस तरह के आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आते हैं। हिन्दुत्व के नए उभार ने युवा लड़के-लड़कियों के उदार सामाजिक
संबंधों और उदार जीवन शैली पर सबसे पहले हमला किया। अंतर्जातीय ,अंतर्धामिक विवाह करने से बढ़-चढ़कर रोका गया। जगह-जगह प्रेमी युगलों पर वेलेंटाइन डे के मौके पर हमले किए गए, उनके लिए ड्रेस कोड, फोन कोड, आवागमन कोड आदि के नाम पर नित नई संहिताएँ और आदेश जारी किए गए। कहने का तात्पर्य है कि ‘पापुलिज्म’ सिर्फ राजनैतिक दलों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि पूरे समाज को और खासकर औरतों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हिदुत्व के नए उभार ने शादी-ब्याह में दहेज की माँग, सुंदर-सलोनी दहेज युक्त घरेलू स्त्री की माँग को जनप्रिय बनाया है। वैचारिकतौर पर ‘पापुलिज्म’ हमेशा पितृ सत्ता की विचारधारा को पुख्ता बनाता है। इस अर्थ में वह वैचारिक तौर पर प्रतिक्रियावादी होता है। उल्लेखनीय है अन्ना के इलाके में पितृ सत्ता का वर्चस्व है।
    ‘पापुलिज्म’ हमेशा वैचारिक शार्टकट मारता है और हमेशा प्रतिस्पर्धी भाव में सक्रिय रहता है। यह दीर्घकालिक फिनोमिना नहीं है। ‘पापुलिज्म’ के रूप में समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, विकेन्द्रीकरण या स्वस्थ लोकतांत्रिक जीवन मूल्य आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त होते हैं तो इससे लोकतंत्र समृद्ध होता है। क्योंकि ये सारे तत्व लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन प्रतिक्रियावादी पापुलिज्म हमेशा लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करता है। कहने के लिए राष्ट्रवाद, संकीर्णतावाद, क्षेत्रीयतावाद को लोकतंत्र का अंग माना जाता है लेकिन यह लोकतंत्र को पंगु बनाने वाले तत्व हैं।
    आम आदमी पार्टी का फिनोमिना सकारात्मक लोकतांत्रिक फिनोमिना है और लोकतांत्रिक ‘पापुलिज्म’ का हिस्सा है। उसी तरह यू.पी.ए.-2 के द्वारा उठाए गए अनेक संवैधानिक-संरचनात्मक सुधार और पापुलर कार्यक्रम जैसे सूचना प्राप्ति का अधिकार, सबके लिए भोजन, सबके लिए शिक्षा, मनरेगा, जन लोकपाल, आदि ‘लोकतांत्रिक पापुलिज्म’ का हिस्सा हैं।
 -जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0- 09331762360
 
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के मार्च २०१४ में प्रकाशित

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण

पष्चिम ,बंगाल   चुनाव आयोग, हाईकोर्ट और 70 हजार पुलिसबलों की सक्रियता के बावजूद पंचायत चुनावों में हिंसा अबाध गति से जारी रही। राजनीति का इस प्रक्रिया में रूपान्तरण हो गया है। दलीय विचारधारा के बजाय बम की विचारधारा के आधार पर चीजें नियंत्रित की जा रही हैं।  लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ असहाय और मूकदर्षक बनी हुई हैं। मानवाधिकार आयोग के आदेषों की राज्य सरकार सीधे अवहेलना कर रही है। 
       भारत के विभिन्न राज्य लोकतंत्र के अपराधीकरण और कारपोरेट लूट से परेश।न हैं लेकिन पष्चिम बंगाल में तो लोकतंत्र ही हिंसक हो उठा है, लोकतांत्रिक राजनैतिक दल हिंसक हो उठे हैं। लोकतंत्र में पहले यदा-कदा हिंसा होती थी लेकिन इन दिनों हिंसा का ताण्डव रोजमर्रा की बात है। 
     लोकतंत्र को हिंसक लोकतंत्र में तब्दील करने में वामदलों की अग्रणी भूमिका रही है। वामदलों ने अपने विरोधियों से निबटने और वाम विरोधियों ने भी वाम दलों से निबटने का पष्चिम बंगाल में जो रास्ता चुना है उसमें हिंसा और हिंसक गिरोह महत्वपूर्ण कारक तत्व हैं। इसके कारण प्रतिस्पर्धी हिंसा का दैनंदिन ताण्डव चल रहा है। आमतौर पर भारत के विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग बंगाली समाज को शांत-सुसभ्य समाज के रूप में जानते हैं लेकिन हिंसक लोकतंत्र का जो रूप यहाँ निर्मित हो रहा है वह समूचे देष के लिए अपषकुन है। यह बंगासी समाज की प्रचलित धारणाओं का विलोम रच रहा है। असल में हिंसक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य को समझे बिना हाल ही में संपन्न पंचायतों के चुनाव और उसके परिणाम समझ में नहीं आ सकते।
    सामान्यतौर पर भारत के किसी भी राज्य में हिंसा व्यापक फिनोमिना कभी नहीं रही। लेकिन पष्चिम बंगाल में हिंसा फिलहाल जिस गति और शक्ति के साथ पैर जमा चुकी है उसके किसी तरह थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। हाल में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनावों में चुनाव आयोग और कलकत्ता उच्चन्यायालय को निष्प्रभावी देखा गया। शासकदल तृणमूल कांग्रेस ने इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं के आदेषों का निचले स्तर पर सचेत ढंग से उल्लंघन किया। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने शासकदल की मोटरसाइकिल रैलियों को अवैध घोषित कर दिया था लेकिन इसके बाबजूद ये रैलियाँ हर कस्बे और गाँव में निकाली गईं, इन रैलियों में इलाके के गुंडे-बदमाष हथियारबंद होकर शामिल हुए और स्थानीय लोगों में दहषत फैलाने का काम किया। कालांतर में चुनाव आयोग ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में षिकायत की थी, उस पर अदालत ने भी आदेष दिया लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने नहीं माना। अपराधियों का तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में इस तरह का खुला प्रदर्षन प0बंगाल के लिए नई घटना थी। पहले यह लोग पर्दे के पीछे रहकर समर्थन करते थे लेकिन ममता सरकार आने के बाद से उनकी सार्वजनिक मंचों, जलसों, ऑफिसों, रैलियों आदि में मौजूदगी बढ़ गई है। मोटरसाइकिल ब्रिगेड के नाम इन बदमाषों ने बाइकवाहिनी बनाई थी जिसका मुख्य काम था राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंक पैदा करके रखना। इन बदमाषों पर नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग ने इनकी बाइक रैलियों पर पाबंदी लगाई, लेकिन उसका तृणमूल कांग्रेस ने पालन ही नहीं किया।
      इसी तरह अदालत ने राज्य सरकार को आदेष दिया कि चुनाव आयोग जितना पुलिसबल माँग रहा है उतना पुलिसबल दिया जाए और जिस दिन से तैनाती के लिए कह रहा है पुलिसबलों को तैनात कर दिया जाए लेकिन निचले स्तर पर अधिकांष इलाकों में नामांकन के समय पुलिसबल तैनात ही नहीं हो पाए क्योंकि चुनाव आयोग और राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट में विवाद चल रहा था। फलतः  तृणमूल कांग्रेस ने विरोधी उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। इसका परिणाम यह निकला कि साढ़े छह हजार से ज्यादा तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बिना किसी प्रतिद्वंद्विता के ही पंचायतों के लिए चुन लिए गए। अदालत के आदेष के बावजूद निचले स्तर पर नामांकन पत्र दाखिल करने की तिथि तक उम्मीदवारों को सुरक्षा का माहौल प्रदान करने में चुनाव आयोग असफल रहा। चुनाव आयोग को राज्य सरकार ने मुकदमेबाजी में इस कदर उलझा दिया कि चुनाव प्रबंधन का काम गौण होकर रह गया।
      इस बार चुनाव आयोग के समस्त आदेषों की सत्तारूढ़ दल ने सचेत ढंग से अवहेलना की। तृणमूल कांग्रेस के विरोध में जो उम्मीदवार किसी तरह नामांकन पत्र दाखिल करने में सफल रहे उनमें से अधिकांष को डराने-धमकाने का अनवरत सिलसिला चलता रहा। तृणमूल कांग्रेस के अनेक स्थानीय नेताओं और मंत्रियों ने
विरोधी उम्मीदवारों के घर तक जलाए जाने का पब्लिक मीटिंग में आह्वान कर डाला और इसके बाद तो विरोधी उम्मीदवारों के घरों पर हमले तेज हो गए। तृणमूल कांग्रेस के हमलों में 50 से ज्यादा लोग चुनाव अभियान के दौरान मारे गए हैं इनमें से
अधिकांष वाम कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा सैकड़ों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हिंसा का आलम यह था कि चुनाव प्रचार के दौरान तकरीबन हर इलाके में हिंसा की घटना हुई।
       चुनाव से पहले आधे से ज्यादा पंचायत बूथों को चुनाव आयोग ने अतिसंवेदनषील घोषित कर दिया था इसके बावजूद चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने में चुनाव आयोग असफल रहा। तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने बूथ कैप्चरिंग में नया रिकॉर्ड बनाया, पहले बूथ लूटे गए और सैकड़ों मतदान केन्द्रों से वामदलों और कांग्रेस के प्रतिनिधियों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया। बाद में मतगणना के समय दोबारा  हिंसा और लूट हुई और मतगणना के लिए नियत वाम प्रतिनिधियों को बड़ी संख्या में गणनाकेन्द्रों के बाहर कर दिया गया और चुनाव आयोग के लोग असहाय देखते रहे। चुनाव आयोग के लोगों ने इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई सख्त कदम तक नहीं उठाए।
    पष्चिम बंगाल के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में उन इलाकों में तृणमूल कांग्रेस बड़ी संख्या में सीटें जीतने में सफल रही है जहाँ पर आतंक ज्यादा फैलाया गया और हिंसा ज्यादा हुई। उन इलाकों में उसका प्रदर्षन खराब या कम अच्छा रहा है जहाँ हिंसा कम हुई थी या नहीं हुई थी। मतगणना के समय गणनाकेन्द्रों पर मतपत्र छीनने और वाम प्रतिनिधियों को गणना केन्द्रों से खदेड़कर बाहर करने की अधिकांष घटनाएँ हावडा, वर्धमान, हुगली और उत्तर 24 परगना में हुईं।
    तृणमूल कांग्रेस को 13 जिला परिषदों में जीत हासिल हुई। वाममोर्चे को जलपाईगुड़ी जिला परिषद में जीत हासिल हुई, वहाँ पर उसने 37 में से 23 सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में वाम ने 26 में से 13 सीट जीतीं, कांग्रेस ने 6 और तृणमूल कांग्रेस ने 5 सीट जीतीं। इस जिला परिषद को पहले कांग्रेस संचालित करती थी। मालदा में वाम ने 16, कांग्रेस ने 16 और तृणमूल कांग्रेस ने 6 सीट जीतीं। मुर्षिदाबाद जिला परिषद पर कांग्रेस का कब्जा हुआ, उसने 70 में से 42 सीटों पर जीत दर्ज की। नदिया में वाम ने 21 और तृणमूल कांग्रेस ने 25 सीटें हासिल कीं। पंचायत समितियों के चुनाव में वाममोर्चा ने जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्षिदाबाद और नदिया की अधिकांष समितियों में जीत दर्ज की। राज्य के कुल 330 ब्लॉक में वाममोर्चा को 68, तृणमूल कांग्रेस को 219, कांग्रेस को 20 ब्लॉक में सफलता मिली। जबकि 20 ब्लॉक अनिष्चित नेतृत्व की अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस ने ब्लॉकस्तर पर 870 सीटें बिना किसी मुकाबले के ही जीत ली थीं, इन सीटों पर उसने विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। मुर्षिदाबाद में वाममोर्चा ने 15 ब्लॉक समितियों में से अधिकांष पर जीत हासिल की। नदिया में 9 पंचायत समितियों में जीत हासिल की। उत्तर 24 परगना में सन् 2008 में वाम मोर्चा ने 4 पंचायत समितियों में चुनाव जीता था लेकिन इस बार के चुनाव में उसे 7 पंचायत समितियों में विजय मिली है। यह सब व्यापक आतंक के बावजूद हुआ है।
    ग्राम पंचायत स्तर के चुनावों में 3215 ग्राम पंचायत समितियों में वाममोर्चे को 749 ग्राम पंचायतों में विजय हासिल हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने 1812, कांग्रेस ने 240 और 393 ग्राम पंचायतें हंग यानी अर्निणीत अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत समिति के चुनावों में सत्तारूढ दल ने बड़े पैमाने पर नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं होने दिए इसके कारण तृणमूल कांग्रेस ने बिना चुनाव लड़े ही 5336 सीटें जीत लीं। असल संख्या इससे ज्यादा हो सकती है क्योंकि अनेक स्थानों पर उसने डमी या बोगस उम्मीदवार खड़े किए थे।
    मुर्षिदाबाद में  वाममोर्चे ने 102 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की, तृणमूल कांग्रेस ने 8, उत्तर 24 परगना में वाम ने 47 ग्राम पंचायतें 2008 में जीती थीं इस बार यह संख्या बढ़कर 60 हो गई है। दक्षिण 24 परगना में 94 और जलपाईगुड़ी में 58 ग्राम पंचायत समितियों में वाम विजयी रहा है। यहाँ तक कि पूर्वी मिदनापुर में, जो तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, वहाँ पर वाम मोर्चे ने 43 ग्राम पंचायतों में जीत दर्ज की है। नदिया में वाम ने 51 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की है और 48 में नेतृत्व अनिष्चित है, यानी हंग की अवस्था है। सत्तारूढ़ दल के नियोजित आतंक के बावजूद कुल मिलाकर 9000  वाम उम्मीदवार त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में विजयी रहे हैं और यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इस प्रसंग में वामदलों और खासकर मा.क.पा. के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक दुर्बलताओं और भूलों को जल्दी से दुरुस्त करे। मा.क.पा. जितनी जल्दी अपनी कमियों को दूर करेगी उतनी ही जल्दी आम जनता का विष्वास अर्जित करने में मदद मिलेगी।
       बंगाल में लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण हो चुका है। यह लोकतंत्र के अपराधीकरण से आगे की अवस्था है। पंचायतों के चुनाव परिणाम आ गए हैं। विभिन्न इलाकों में पंचायतों का गठन भी हो चुका है, लेकिन गाँवों और कस्बों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। चुनाव से पहले हिंसा और चुनाव के बाद हिंसा यह इस राज्य के लोकतंत्र का सामान्य चरित्र है। हिंसा के बिना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चुनावों की परिकल्पना एकदम असंभव है।
 -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी          
मोबाइल: 09331762360

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

लोकतंत्र

क्या यही हमारा लोकतंत्र ?
क्या यही हमारी सत्ता है ?
वे सोच रहे, क्या-क्या खाएं,
हमको न जूठा पत्ता है ।।1।।

हैं चोर-लुटेरे महलों में,
हमको न टूटी छानी है।
देखो-देखो दुनिया वालों,
भारत की अजब कहानी है ।।2।।

धर्म-अधर्म के बीच खिंची,
अब नहीं रह गयी रेखा है।
गिरगिट जैसा रंग बदलते,
नेताओं को देखा है ।।3।।

नाम, दान, स्नान तुम्हारा ,
लटका, झटका, टटका है।
मंजिल कैसे मिल पायेगी 
जब 'पथिक' ही पथ का भटका है ।।4।।

-गुरु प्रसाद सिंह मृगेश


बी .एल . यादव "पथिक"
ग्राम व पोस्ट- बडेल 
जिला- बाराबंकी 
मो- 9795180883

सोमवार, 20 अगस्त 2012

आर्थिक सुधार के अश्वमेध


बाजार के सिवाय अर्थ व्यवस्था में बचता क्या है?कुछ कसर बाकी है तो कानून और संविधान में संशोधन करके , लोकतंत्र को पलीता लगाकर आर्थिक सुधार के अश्वमेध में हासिल कर लेंगे!

भारतीय अर्थ व्यवस्था का पर्याय बना सेनसेक्स की सेहत वित्तीय प्रबंधन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस हिसाब से भाजपा के इस ​​आरोप में कोई दम नहीं है कि पिछले आठ साल के मनमोहन राज में कोई प्रगति नहीं हुई। दुनिया के तमाम बाजारों को पछाड़ नेशनल स्टॉक एक्सचेंज [एनएसई] ने नया मुकाम हासिल किया है। सूचकांकों के टर्नओवर और शेयरों के वायदा कारोबार के मामले में एनएसई दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है। ताजा आकड़ों से इसका पता चलता है।तो क्या यह उपलब्ध भाजपा की मान लेनी चाहिए। वित्तमंत्री अर्थ व्यवस्था की बुनियादी समस्याओं से बेपरवाह उपभोक्ता बाजार के विस्तार के जरिये सारी समस्याओं के समाधान ​​का दावा करते हैं, तो अकारण नहीं।उपभोक्ता संस्कृति के जरिये ही भारत में बाजार का अकल्पनीय विस्तार हुआ है। हर हाथ में मोबाइल हर घर में टेलीविजन और हर कोई बायोमैट्रिक नागरिक नेटजेन, ये मंजिलें तय करने के बाद बाजार के सिवाय अर्थ व्यवस्था में बचता क्या है? न कृषि बची और न उत्पादन प्रणाली। उपभोक्ता बाजार के अलावा बाकी कुछ है तो वे हैं, निजी क्षेत्र के आधिपात्य वाली गैर जरूरी और जरूरी सेवाएं। ऐसे में वित्त मंत्री को वित्तीय या मौद्रिक नीतियों को लेकर सर खपाना क्यों चाहिए।मनोमहनी अवतरण के बाद से अब तक भारतीय बाजार का कायाकल्प ही तो​ ​ होता रहा है। कुछ कसर बाकी है तो कानून और संविधान में संशोधन करके, लोकतंत्र को पलीता लगाकर आर्थिक सुधार के अश्वमेध में हासिल कर लेंगे!

इस पर तुर्रा यह कि अगला लोकसभा चुनाव अभी दूर है। फिर भी 2014 में केंद्र में सरकार को लेकर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की भविष्यवाणी के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के ताजा बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में अनायास ही हलचल मचा दी है। मुलायम की तरफ से केंद्र में तीसरे मोर्चे की अगली सरकार की संभावना क्या व्यक्त की गई, भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल बेचैन हो गए। दोनों दलों ने मुलायम के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है।सत्ता की राजनीति में उलझे राजनेताओं को न आम जनता से कुछ लेना देना है और न अर्थ व्यवस्था से।नीति निर्धारण कारपोरेट लाबिइंग की क्षमता मुताबिक बाजार तय करता है। अर्थशास्त्री और अफसरान सरकार चलाते है। आम जनता अर्थ शास्त्र नहीं जानती तो क्या हमारे राजनेता ​जानते हैं? जानते होते तो बुनियादी आर्थिक मसलों पर खामोशी क्यों?इस बाजार में कारें सस्ती होती है, तेल मंहगा और अनाज भी मंहगा।घर हो या नहो, जल जंगल जमान से बेदखल होते रहें, पर क्रज लेकर बाजार की सेहत बढ़ाते रहे। उत्पादन और कृषि के बिना उपभोक्ता बाजार और सेवाओं के दम पर ही तो विकास की गाथा है, शाइनिंग इंडिया का फील​

​ गुड है। कालाधन है और स्विस बेंक खाते हैं, जिनके दम पर चलती है सत्ता की राजनीति और मारे जाने के लिए नियतिबद्ध होते रहते हैं असहाय आम जन!ल्ली कैग भले ही बगैर नीलामी प्रक्रिया से कोयला ब्लॉकों के आवंटन के कारण सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का चूना लगने की बात कह रहा है, लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं है। सरकार ने कैग के आकलन के तरीके को ही गलत करार दे दिया है। सरकार ने वर्ष 2004 में अपनाई गई स्क्रीनिंग कमेटी के मैकेनिज्म को भी उस समय की मांग को देखते हुए सबसे बेहतर और कारगर तरीका बताया है।पर आरोपों से घिरे प्रधानमंत्री की शानोशौकत भी तो देखिये!देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को राजनीति में एक साफ सुथरा नेता माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र दोनों पर उनकी तगड़ी पकड़ है। 1990 के दशक में उदारीकरण के दौरान उन्होंने देश को आर्थिक विकास की राह पर लाकर इस बात का सबूत भी दे दिया था। यूपीए 1 और यूपीए 2 में प्रधानमंत्री की गद्दी संभालने वाले सिंह एक करोड़पति नेता है।

भारतीय शेयर बाजार विदेशी संस्थागत निवेशकों [एफआइआइ] के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इस साल अब तक वे इनमें 11 अरब डॉलर [करीब 612 अरब रुपये] से ज्यादा की पूंजी झोंक चुके हैं। अकेले अगस्त में अब तक उन्होंने एक अरब डॉलर के शेयरों की खरीद की है। सरकार के जनरल एंटी-एवॉयडेंस रूल्स [गार] व अन्य कर संबंधी मामलों पर नरम रवैया अपनाने के संकेतों से एफआइआइ का निवेश बढ़ा है। वैसे, कमजोर मानसून और घटती आर्थिक विकास दर जैसे कारकों ने उनकी चिंता बढ़ाई भी है।देश को और क्या चाहिए क्योंकि हम लोगों को अर्थ व्यवस्था से खास परहेज है। कैग रपट में कोयला ब्लाकों के आबंटन में दस लाख करोड़ के घाटे की बात थी, संसद में पेश होते न होते घाटा घटकर दो लाख करोड़ से कम हो गयी। यह करिश्मा अगर समझ में नहीं आये तो रोजाना बत्तीस या सत्रह रुपये से गुजारा करने के फरमान के साथ उपभोक्ता बाजार में खप जाने की नियति किसी बागवत खता से कम क्या होगी!अब तो सरकार ने देश में मौसम आधारित स्मार्ट खेती को बढ़ावा देने की तैयारी कर ली है। इस साल सूखे और बाढ़ के असर से सबक लेते हुए किसानों को स्मार्ट खेती की ओर मोड़ा जाएगा। इसके लिए 100 जिलों में गांव समिति बनेंगी। ये समितियां मौसम के आधार पर खेती करने के नए तौर-तरीकों को बढ़ावा देंगी।ये समितियां संबंधित गांव में मौसम की स्थिति का आकलन करेंगी और किसानों को उसी हिसाब की खेती करने की सलाह देंगी। उदाहरण के तौर पर यदि किसी गांव में सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है तो किसानों को ऐसी फसलें पैदा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा जिनमें पानी की ज्यादा जरूरत न होती हो। मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] की अनुमति पर फैसला लंबित होने के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला का आधारभूत ढांचा खड़ा करने के लिए सरकार ने घरेलू संगठित क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया है। मनमोहन व प्रणब दोनों ने कहा रिटेल में एफडीआइ को अनुमति मिलने से पहले घरेलू निवेशकों को मजबूत बनाने की जरूरत है। तभी कृषि क्षेत्र का समुचित विकास होगा। मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआइ के आने पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो सकेगी। इससे कृषि क्षेत्र के साथ उपभोक्ताओं को लाभ मिल सकेगा। दोनों इस मुद्दे पर सहमत थे कि खेतों से उपभोक्ताओं तक पहुंचने में कृषि उत्पादों का मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। वित्त मंत्री पी। चिदंबरम ने बैंकों से कर्ज सस्ता करने और ईएमआई को मुनासिब रखने को कहा है तकि टिकाऊ उपभोक्ता सामान की मांग बढे और विनिर्माण उद्योग का पहिया फिर तेजी से घूमने लगे। वित्त मंत्री ने पब्लिक सेक्टर के बैंकों के प्रमुखों के साथ एक समीक्षा बैठक के बाद सूखा प्रभावित राज्यों में एग्रिकल्चर लोन के पुनर्गठन और शिक्षा के लिए बैंक लोन मंजूर करने की प्रक्रिया आसान बनाने की घोषणा की।रिटेल ग्राहकों को राहत देने के लिए बैंकों ने फेस्टिवल ऑफर की शुरूआत कर दी है। फेस्टिव ऑफर के तहत यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने होम लोन और ऑटो लोन की प्रोसेसिंग फीस नहीं लेने की घोषणा की है। यूनियन बैंक का ये ऑफर 15 अगस्त से 26 जनवरी के बीच चलेगा।यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ऑटो लोन के लिए लोन की रकम का 0.5 फीसदी प्रोसेसिंग चार्ज लेता है। साथ ही होम लोन के लिए भी बैंक, लोन की रकम का 0.5 फीसदी या अधिकतम 15,000 रुपये प्रोसेसिंग फीस लेता है।

बाजार की ज्यादा फिक्र है इसीलिए न आइपीओ में निवेश करने वाले छोटे खुदरा निवेशकों के धन की सुरक्षा पर अब सेबी अगले महीने विचार करेगा। निवेश बैंकरों और उद्योग के कुछ धड़ों द्वारा इसका विरोध किए जाने पर सेबी ने 16 अगस्त की बोर्ड बैठक में इस पर फैसला टाल दिया था।सेबी चेयरमैन यूके सिन्हा के मुताबिक इस मसले पर व्यापक विचार विमर्श की जरूरत है। पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड [सेबी] के निदेशक मंडल की अगली बैठक के एजेंडे में इसे शामिल किया जाएगा। इसके तहत प्राथमिक बाजार के निवेशकों के हितों की रक्षा की जाएगी। साथ ही इससे आइपीओ का सही कीमत दायरा तय किया जा सकेगा। फिलहाल आरंभिक सार्वजनिक निर्गम [आइपीओ] के जरिये पूंजी बाजार में उतरने वाली तमाम कंपनियां इश्यू की कीमत बढ़ा चढ़ाकर रखती हैं। सूचीबद्धता के बाद इनके शेयरों में गिरावट का खामियाजा छोटे निवेशकों को ज्यादा भुगतना पड़ता है।सेबी छोटे खुदरा निवेशकों के निवेश पर गारंटी का प्रावधान करना चाहता है। इसके तहत आइपीओ में निवेश के कुछ हिस्सों को कुछ निश्चित अवधि [छह महीने तक] तक सुरक्षा देने का प्रस्ताव है। इस दौरान अगर शेयर का भाव आइपीओ के आवंटन मूल्य से नीचे रहता है तो निवेशकों द्वारा शेयर बेचे जाने पर कंपनी के प्रमोटरों और इश्यू के तहत अपनी हिस्सेदारी बेचने वाली कंपनियों को अपनी ओर से इस अंतर की भरपाई करनी होगी। प्रस्ताव के मुताबिक कंपनियां चाहें तो इसका बोझ निवेश बैंकरों पर डाल सकती हैं। वे उनकी फीस में कटौती के जरिये इसकी भरपाई कर सकती हैं क्योंकि आइपीओ का कीमत दायरा तय करने में उन्हीं की भूमिका अहम होती है। इसी वजह से निवेश बैंकर इसका विरोध कर रहे हैं।

बाजार नियामक सेबी के जुलाई बुलेटिन में बताया गया कि शेयर बाजारों में शेयर या सूचकांक आधारित अनुबंध होते हैं। जून में एनएसई को सूचकांक आधारित वायदा कारोबार के टर्नओवर के मामले में दूसरा पायदान हासिल हुआ। इस दौरान पहले स्थान पर यूरोपीय बाजार यूरेक्स रहा। सेबी ने व‌र्ल्ड फेडरेशन ऑफ एक्सचेंज [डब्ल्यूईएफ] के हवाले से आंकड़े पेश किए हैं।

घरेलू बाजार का जून में टर्नओवर छह गुना से अधिक बढ़कर 351.65 अरब डॉलर रहा। यह मई में सिर्फ 47.36 अरब डॉलर था। सूची में 179.17 अरब डॉलर के साथ एनवाईएसई लाइफ यूरोप ने तीसरा स्थान हासिल किया। जबकि हागकाग एक्सचेंज [149.65 अरब डॉलर] चौथे व इजरायल का तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज [149.55 अरब डॉलर] पाचवें स्थान पर रहा।शेयरों के वायदा कारोबार के लिहाज से भी एनएसई ने जून में दूसरा स्थान हासिल किया। जून में शेयरों का वायदा कारोबार 54.58 अरब डॉलर रहा। मई में यह 53.95 अरब डॉलर था। शेयर वायदा श्रेणी में एनएसई यूरेक्स से भी आगे रहा। यूरेक्स में इस दौरान 48.78 अरब डॉलर का कारोबार हुआ, जबकि एनवाईएसई लाइफ यूरो 73.34 अरब डॉलर के साथ पहले पायदान पर रहा। शेयर कारोबार की यह रैंकिंग दुनिया के 12 प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों के आंकड़ों पर आधारित है।

गौरतलब है कि सरकार और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था से दुनिया का भरोसा डगमगा गया है। तभी तो रेटिंग आउटलुक निगेटिव होने के दो महीने के अंदर ही भारत का निवेश दर्जा घटने की नौबत आ गई है। अंतराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स [एसएंडपी] ने चेतावनी दी है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो वह देश की रेटिंग को निवेश ग्रेड से घटाकर जंक [कूड़ा] कर सकती है। इसके लिए एजेंसी ने राजनीतिक नेतृत्व के संकट की ओर अंगुली उठाई है।

बहरहाल सरकार और उद्योग जगत की बुनियादी चिंता इस बात की है कि दलाल स्ट्रीट में इस हफ्ते दबाव बना रह सकता है। कोयला आवंटन में अनियमितताओं को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [कैग] की रिपोर्ट के बाद निवेशक सहम गए हैं। फिलहाल, खुदरा महंगाई की दर में नरमी को देखते हुए सरकार की बैंकों से ब्याज दर घटाने की अपील बाजार को सहारा दे सकती है। बीते हफ्ते विदेशी पूंजी प्रवाह के चलते बाजार में तेजी रही। 17 अगस्त को समाप्त सप्ताह में बंबई शेयर बाजार [बीएसई] का सेंसेक्स 0.75 प्रतिशत सुधरकर 17691.08 अंक पर बंद हुआ। लगातार तीसरे सप्ताहांत बाजार ने बढ़त दर्ज की।

जमीन और कोयले की कमी ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। इसकी वजह से देश में सस्ती दरों पर बिजली मुहैया करवाने में दिक्कत हो रही है। टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने एक बार फिर उद्योग की इस दुखती रग पर हाथ रखा है। टाटा का यह बयान उस दिन आया, जब कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि निजी कंपनियों को बिना नीलामी के कोयला ब्लॉक दिए जाने से सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ। वहीं, इन कंपनियों ने जमकर मलाई काटी। रिपोर्ट में टाटा स्टील और टाटा पावर का नाम भी आया है।

रतन ने समूह की कंपनी टाटा पावर की सालाना आम बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि ऊर्जा पैदा करने के लिए सबसे जरूरी कच्चा माल कोयला है। लेकिन, कोयला नीलामी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगा हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे सस्ती दरों पर लोगों को बिजली उपलब्ध कराई जाए। साल के अंत में रिटायर हो रहे रतन ने कहा कि उनकी कंपनी टाटा पावर के सामने जमीन का अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी भी मुश्किल बने हुए हैं।

कंपनी को इन चुनौतियों से जल्द निपटना होगा। देश में जनसंख्या बढ़ रही है। लोगों का जीवन स्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में देश की ऊर्जा जरूरत वर्ष 2030 तक बढ़कर दोगुनी हो जाएगी। रतन टाटा ने गैस आधारित बिजली परियोजनाओं को गति देने के लिए नीतिगत सुधारों की मांग भी की।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटने के तमाम अनुमानों के बीच प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद [पीएमईएसी] ने भी चालू वित्त वर्ष 2012-13 के लिए आर्थिक विकास दर का अनुमान कम कर दिया है। अपने ताजा 'इकोनॉमिक आउटलुक' में पीएमईएसी ने 6.7 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर पाने की उम्मीद जताई है। पहले यह अनुमान 7.5-8 फीसद का था।

अलबत्ता परिषद ने स्पष्ट कर दिया है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ानी है तो खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश [एफडीआइ] जैसे आर्थिक सुधारों पर कदम आगे बढ़ाने होंगे। परिषद ने सरकार से सुधारों पर आम सहमति बनाने की कोशिशें तेज करने को भी कहा है।

इसके बावजूद पीएमईएसी ने इस रिपोर्ट में वित्त वर्ष के अंत तक महंगाई की दर के साढ़े छह से सात प्रतिशत के बीच ऊंची बने रहने की आशंका व्यक्त की है। परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन ने अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश करते हुए कहा कि कमजोर मानसून की वजह से न सिर्फ महंगाई की दर ऊंची बनी रहेगी, बल्कि कृषि विकास दर भी प्रभावित होगी। चालू वित्त वर्ष में कृषि क्षेत्र के लिए 0.5 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया गया है।

औद्योगिक विकास की दर 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। परिषद का मानना है कि सेवा क्षेत्र के विकास की रफ्तार 8.9 प्रतिशत रहेगी। अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर गहरी चिंता जताते हुए परिषद ने वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने, निवेश और घरेलू बचत की दरों को बढ़ाने के उपाय करने और मल्टी ब्रांड रिटेल व एविएशन क्षेत्र में विदेशी एयरलाइनों को एफडीआइ की इजाजत देने की पुरजोर सिफारिश की है। रंगराजन ने सोने के आयात को कम करने और म्यूचुअल फंड व बीमा क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के उपाय करने का सुझाव दिया है।

इससे पहले भारतीय रिजर्व बैंक भी आर्थिक विकास दर के अनुमान को घटा चुका है। रिजर्व बैंक ने इसे 7.3 से घटाकर 6.5 प्रतिशत कर दिया है। रंगराजन ने कहा कि बीते वित्त वर्ष की दूसरी छमाही से ही अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने लगी थी। अनुमान है कि अब दूसरी छमाही में ही यह रफ्तार पकड़ना शुरू करेगी।

अर्थव्यवस्था की रफ्तार [प्रतिशत में]

क्षेत्र 2011-12 2012-13*

कृषि 2.8 0.5

खनन -0.9 4.४

व्मैन्यूफैक्चरिंग 2.5 4.5

बिजली 7.9 8.0

कंस्ट्रक्शन 5.3 6.5

यापार, होटल 9.9 9.3

वित्तीय सेवाएं 9.6 9.5

सामुदायिक सेवा 5.8 7.0

जीडीपी 6.5 6.7

[नोट: 2012-13 की वृद्धि दर अनुमानित है]

-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


रविवार, 8 जुलाई 2012

आज ज्योति बसु का जन्मदिन है-




ज्योति बाबू ने अपने राजनीतिक कैरियर में त्याग, संघर्ष और कुर्बानी का जो जज्बा पैदा किया उसने हजारों युवाओं को शहरों से लेकर गांवों तक कम्युनिस्ट आंदोलन की कतारों में शामिल होने की प्रेरणा दी।इस तरह का प्रेरक संघर्षशील व्यक्तित्व विरल है। साम्प्रदायिक सदभाव और समानता की संवैधानिक समझ को उन्होंने राज्य प्रशासन के आम नजरिए में उतारकर नई मिसाल कायम की। वे साधारण मुख्यमंत्री नहीं थे,बल्कि क्षमता,विवेक और लोकतांत्रिक नजरिए के आदर्श प्रतीक थे वे लोकतंत्र के महान सपूत थे।लोकतंत्र में कोई कम्युनिस्ट जननायक हो सकता है यह चीज ईएमएस नम्बूदिरीपाद के बाद उन्होंने ही साबित की, इससे सारी दुनिया के मार्क्सवादियों को लोकतंत्र की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा मिली।


Jagadishwar Chaturvedi
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