सोमवार, 17 मार्च 2014

अंधलोकवाद का प्रेत और लोकतंत्र

सन् 2014 का लोकसभा चुनाव पापुलिज्म यानी अंधलोकवाद के आधार पर लड़ा जाएगा। पापुलिज्म के आधार पर पहले कांग्रेस वोट जुगाड़ करती रही है। लंबे समय के बाद पहली बार यह दृश्य नजर आ रहा है कि पापुलिज्म की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस से आम आदमी पार्टी और भाजपा ने बाजी मार ली है।
    सन् 1971 के लोकसभा चुनाव को श्रीमती इंदिरा गांधी ने पापुलिज्म के आधार पर लड़ा। उन्होंने नारा दिया ‘समाजवाद लाओ, गरीबी हटाओ।’ इसके बाद आपात्काल आया और 1977 का चुनाव ‘लोकतंत्र लाओ देश बचाओ’ के नारे पर लड़ा गया ।
    पापुलिज्म के रूप विभिन्न रूपों में क्षेत्रीय स्तर पर अभिव्यक्त होते रहे हैं लेकिन परंपरागत पार्टी व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए अन्ना आंदोलन का होना बाद में उस आंदोलन से निकले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी का गठन करना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है। यह परिघटना सन् 1974 के जे.पी. आंदोलन से पूरी तरह भिन्न है। जे.पी. आंदोलन के लोगों ने जनता पार्टी का उन्हीं कायदे-कानूनों और सिद्धांतों के आधार पर गठन किया जो पहले से प्रचलन में थे, इसके कारण उसमें शामिल विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं और उनके अनुयायियों में वैचारिक एकीकरण नहीं हो पाया । लेकिन आम आदमी पार्टी ने एकदम भिन्न पैराडाइम से काम आरंभ किया है और अपने साथ आने का उन तमाम लोगों से आह्वान किया है जो उसके नजरिए और एक्शन से सहमत हैं।
    आम आदमी पार्टी भारत के संविधान के पैराडाइम में काम करने के वायदे के साथ मैदान में उतरी है। वे लोग संविधान में कल्पित सपने को साकार करना चाहते हैं और यह इस दल की सबसे महत्वपूर्ण बात है। हमारे देश में सक्रिय अधिकतर राजनैतिक दलों में प्राथमिकताएँ बदलती रही हैं और कभी न कभी संविधान के दायरे के परे जाकर काम करते रहे हैं। मसलन् साम्प्रदायिक, आतंकवादी या पृथकतावादी संगठनों की मदद लेना या उनके साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध बनाए रखने का काम अधिकांश प्रमुख दल करते रहे हैं। इसके अलावा लोकतांत्रिक व्यवस्था की चरमराती व्यवस्था को भी आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनैतिक गतिविधियों में निशाने पर रखा है।
    लोकतंत्र की चरमराती स्थितियों ने अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में विकसित होने का जनप्रिय आधार प्रदान किया और इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने बार-बार परंपरागत दलों की अप्रासंगिकता और असमर्थताओं की ओर ध्यान खींचकर नए दल की संभावनाओं के लिए आम जनता में भावभूमि निर्मित की।  आम आदमी पार्टी के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि आमलोगों की प्रचलित दलों के नेताओं के प्रति कोई आस्था नहीं है और आम जनता में इन दलों की कोई साख नहीं है।
    आम आदमी फिनोमिना के पापुलिज्म को समझने के लिए हमें परंपरागत सोच की प्रक्रिया के बाहर निकलना पड़ेगा। परंपरागत सोच यह है कि पहले दल का बडा नेता या उच्च कमेटी जो कुछ कहती थी वही प्रामाणिक राजनैतिक कम्युनिकेशन माना जाता था, लेकिन इस कम्युनिकेशन से साधारण आदमी अपने को विच्छिन्न महसूस करता था और यहीं पर अन्ना आंदोलन में सड़क पर चलता फिरता आम आदमी बहुत बड़े कम्युनिकेटर के तौर पर दाखिल होता है। भ्रष्टाचार के सवाल पर
साधारण नागरिकों के बीच में खड़े होकर अन्ना आंदोलन के नेताओं का बोलना, साधारण आदमी का भ्रष्टाचार के सवाल पर मुखर होकर टीवी के सामने बोलना, यह नया फिनोमिना था। इस प्रक्रिया में आम आदमी को राजनैतिक कम्युनिकेटर के रूप में अभिव्यक्ति का अवसर मिला और एक नए किस्म का राजनैतिक कम्युनिकेटर मीडिया और राजनीति में दाखिल होता है जो कल तक हमारे प्रचलित राजनैतिक कम्युनिकेशन के बाहर था। प्रचलित राजनैतिक कम्युनिकेशन में दल विशेष का नेता दाखिल होता था और वह अपने को प्रामाणिक राजनैतिक कम्युनिकेटर के रूप में पेश करता था। अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने आम आदमी को राजनैतिक अभिव्यंजना में समायोजित करके नए किस्म के राजनैतिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक संवाद को जन्म दिया।
    पहले राजनैतिक दल बहुत बड़े राजनैतिक लक्ष्यों को केन्द्र में रखकर बातें करते थे, संगठन निर्माण करते थे। लोकतंत्र में कल तक नेता प्रवक्ता होते थे लेकिन आम आदमी पार्टी ने साधारण जन को राजनैतिक प्रवक्ता बनाकर लोकतंत्र की अंतर्वस्तु को ही बदल दिया ।
    नेता हमेशा से किसी न किसी रूप में लोकतंत्र में समस्यामूलक रहे हैं लेकिन साधारणजन को लोकतंत्र के लिए कभी खतरा नहीं माना गया । लेकिन यह जनता के प्रति या आम आदमी के प्रति अंधश्रद्धा से पैदा हुई धारणा है।
    लोकतंत्र में जनता को गैर समस्या मूलक मानने के कारण अंधलोकवाद का खतरा हमेशा बना रहता है। जो नेता जनता की अंधी भक्ति करके जन-जागरण के नाम पर जनोन्माद पैदा करते हैं वे अंततः लोकतंत्र विरोधी दिशा में गए हैं। आम आदमी कहें या साधारणजन या जनता कहें, हमें जनता को अनालोचनात्मक ढंग से नहीं देखना चाहिए। अनालोचनात्मकता लोकतंत्र की मौत है। लोकतंत्र में शिरकत बढ़ाने के लिए जनता के प्रति आलोचनात्मक नजरिया जरूरी है।
           जनशिरकत के नाम पर, जन समाधान के नाम पर हमेशा पापुलिज्म ने कॉमनसेंस समाधानों की सिफारिश की है। कॉमनसेंस  समाधानों के बजाए संस्थानगत, नियम-कानून बनाकर समाधान खोजे जाने चाहिए।
    यह सच है कि भ्रष्टाचार समस्या है, महँगाई समस्या है, लेकिन इसके समाधान कॉमनसेंस के आधार पर नहीं खोजे जाएँ। इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर दिया जाए। संरचनात्मक परिवर्तनों को करते समय पहले से उपलब्ध अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनमें इजाफा करने वाले समाधान सुझाने की जरूरत है। मसलन, सोवियत संघ और अनेक समाजवादी यूरोपीय देशों में समाजवाद के खिलाफ भयानक जनोन्माद देखने में आया। समाजवाद विरोधी पापुलिज्म को लोकतंत्र की आँधी या तूफान या उभार आदि नामों से पुकारा गया। लेकिन इस समूचे उभार में यह भूल ही गए कि समाजवाद में जो जन अधिकार और जन सुरक्षा प्राप्त थीं कहीं वे ही कम न हो जाएँ। वास्तव में यही हुआ। यूरोप का तथाकथित जन उभार समाजवाद को धराशायी करने में सफल रहा। आम जनता खुश थी कि समाजवादी व्यवस्था खत्म हो गई, लेकिन इस समूची प्रक्रिया में वे भूल ही गए कि समाजवाद के दौरान जो अधिकार और सामाजिक सुरक्षाएँ प्राप्त थीं वे भी आम जनता के पास से चली र्गइं। इसे कहते हैं अंधलोकवाद।
       अंधलोकवाद हमारे सामने अनेक बार जिन समाधानों को लेकर आता है हम उसकी दूरगामी परिणतियों को नहीं देख पाते, वह हमारे सामने तात्कालिक समाधान पेश करता है और तात्कालिक समाधानों से हमें एक हद तक राहत भी मिलती है। मसलन समाजवाद में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी, निजी स्वतंत्रता नहीं थी। समाजवादी व्यवस्था के पतन के साथ ही नागरिकों को निजी अभिव्यक्ति की आजादी मिली, निजी स्वतंत्रताएँ भी मिलीं। लेकिन इस प्रक्रिया में पहले से उपलब्ध सुरक्षाएँ और अधिकार चले गए। समाजवाद में स्त्रियाँ सुरक्षित थी, सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी थी, लेकिन समाजवाद के पतन के साथ ही सामाजिक सुरक्षाएँ खतरे में पड़ गईं और औरतों के सामने अनेक किस्म की असुरक्षाएँ आ खड़ी हुईं। इसके कारण लाखों औरतें जिस्म की तिजारत करने के लिए मजबूर हुईं। हठात् संचित धन मुद्रा के अवमूल्यन के कारण कौडि़यों में तब्दील हो गया और रातों-रात राज्य की संपदा की लूट करके अरबपतियों का लुटेरा जगत पैदा हो गया।
    जो लोग समाजवाद में मानवाधिकारों के हनन को लेकर परेशान थे और आलोचनाएँ कर रहे थे, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही यह शिकायत कर रहे थे, उनकी इस संदर्भ में शिकायतें जायज थीं, इसके लिए जरूरी था कि समाजवादी संरचनाओं में मानवाधिकार के संरचनात्मक सुधार ईमानदारी से लागू किए जाते। लेकिन यह काम न करके समूचे समाजवाद को ही ध्वस्त करके लोकतंत्र के निर्माण का जो मार्ग चुना गया वह आत्मघाती और जन-उत्पीड़क मार्ग था। यह अंधलोकवाद से पैदा हुआ मार्ग था।
    लोकतंत्र के लिए संघर्ष करें या समाजवाद के लिए संघर्ष करें या फिर किसी यूनियन की माँगों के लिए संघर्ष करें, बुनियादी तौर पर यह ध्यान रखें कि नई माँग के मानने से कहीं पहले से प्राप्त अधिकार कम तो नहीं हो जाएँगे। आंदोलन का अर्थ उपलब्ध जनाधिकार और सुविधाएँ खोना नहीं बल्कि उनको बचाए रखकर नए अधिकार पाना है। जनांदोलन खोने के लिए नहीं किए जाते। जो जनांदोलन पहले से उपलब्ध हकों को कम कर दे वह आत्मघाती आंदोलन है। वह जनघाती आंदोलन है। समाजवाद के खिलाफ पूर्वी यूरोपीय देशों और समाजवादी देशों में चले सभी जनांदोलन इसी अर्थ में आत्मघाती साबित हुए हैं उनसे सोवियत संघ और कमजोर हुआ, सोवियत संघ का विभाजन हो गया। तमाम समाजवादी यूरोपीय देश पहले की तुलना में कमजोर हो गए,विभाजित हो गए।  जो आंदोलन देश को तोडे़, विभाजित करे, वह आत्मघाती जनांदोलन है। इस विवेचन में जाने का मकसद यह है कि बार-बार जनांदोलनों के नाम पर तमाम अकादमिक और राजनैतिक विमर्श में पापुलिज्म के बारे में जितना लिखा गया है उसमें समाजवादी देशों में चले समाजवाद विरोधी पापुलर आंदोलनों को प्रमुख संदर्भ सूत्र बनाया गया है।
    ‘पापुलिज्म’ क्या है? यह जन असंतोष है। जब व्यवस्था या नेता समस्या के समाधान में असफल होते हैं और आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं होता तो हमेशा जन-असंतोष की शक्ल में पापुलिज्म अपने को अभिव्यक्त करता है। जन-असंतोष का अवरुद्ध विकास से गहरा संबंध है। पापुलिज्म की अभिव्यक्ति कई बार सांस्कृतिक रूपों में होती है, लेकिन वहाँ पर वह जनशिरकत, जनता के आनंद और धार्मिक, सांस्कृतिक जलसों के रूपों में व्यक्त होता है।
    भ्रष्टाचार का मौजूदा नियमों के तहत व्यवस्था समाधान नहीं दे पा रही थी तो पापुलर अभिव्यक्ति के रूप में कई बार इसकी अभिव्यक्ति हो चुकी है लेकिन हमेशा इसकी अभिव्यक्ति सरकार हटाओ आंदोलन में तब्दील होती रही है। मसलन संपूर्ण क्रांति आंदोलन, नवनिर्माण आंदोलन या वी.पी. सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, इन सबकी समस्या थी भ्रष्टाचार, लेकिन माँग थी सरकार बदलो। इससे भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना रहा, सरकारें गिर गईं और बदल गईं। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन इस अर्थ में भिन्न था कि इसका लक्ष्य सरकार गिराना नहीं था बल्कि भ्रष्टाचार
निरोधक संरचनाओं और कानूनों का निर्माण करना था।
    अन्ना आंदोलन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसके दबाव में सरकार थी और संसद थी। सरकार और संसद दोनों ने माना कि भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का निर्माण किया जाए। जनलोकपाल कानून और उससे जुड़े तमाम कानून बनाए जाएँ। इस आंदोलन ने सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया लेकिन सरकार को गिराया नहीं, सरकार को मजबूर किया कि वह जनता की सुने और संरचनात्मक समाधान खोजे।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ के कई रूप रहे हैं जैसे मातृभाषा आंदोलन, अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, गो-रक्षा आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, आरक्षण विरोधी आंदोलन, विभिन्न राज्यों में पृथकतावाद और अंध क्षेत्रीयतावाद के आंदोलन, आपात्काल विरोधी आंदोलन, भाषावार राज्य निर्माण आंदोलन, नए राज्य बनाने के आंदोलन और जन समस्याओं पर केन्द्रित युवा आंदोलन जैसे संपूर्ण क्रांति, नवनिर्माण आंदोलन, अन्ना आंदोलन आदि।  कहने का तात्पर्य है कि पापुलर आंदोलन हमेशा सही नहीं होते। पापुलर आंदोलन में जनता की बेशुमार शिरकत देखकर उन्मादित होकर निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए।  पापुलर आंदोलन में चूँकि जनता शामिल है इसलिए उसका समर्थन करो इस विचार से बचने की जरुरत है।
    पापुलर आंदोलन को देखने का
आधार है उस आंदोलन का नजरिया और कार्यक्रम। नजरिए और कार्यक्रम के आधार पर ही तय किया जा सकता है कि संबंधित आंदोलन जनहित और समाजहित में है या सामाजिक विभाजनकारी है ।
    समस्या विशेष पर जनसमूह की लामबंदी पापुलर जनांदोलन बनाती है लेकिन यह परिभाषा काफी अमूर्त है। समस्या, एकजुट जनसमूह और निरंतर आंदोलन मात्र से पापुलिज्म को परिभाषित करने में दिक्कतें हैं।
    ‘पापुलिज्म’ स्वयं में अमूर्त वैचारिक पदबंध है। किसी भी पदबंध की अमूर्तता को तोड़ने के लिए उसकी विचारधारात्मक पड़ताल की जानी चाहिए। इसी तरह पापुलिज्म की पड़ताल के लिए भी प्रत्येक पापुलर आंदोलन का विचारधारात्मक विश्लेषण किया जाना चाहिए। विचारधारा विश्लेषण के दौरान ही पता चलेगा कि संबंधित आंदोलन की माँगें क्या हैं? जनाधार किन वर्गों में है? राजनैतिक मंशा क्या है और नजरिया क्या है? और सामाजिक-राजनैतिक परिणतियाँ क्या हो सकती हैं? आदि।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ के फ्रेमवर्क में जन्मे अधिकांश आंदोलन सरकार बदलने या सरकार पाने के आंदोलन रहे हैं। सिर्फ दो आंदोलन इसके अपवाद हैं, आपात्काल विरोधी आंदोलन और अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। इन दोनों आंदोलनों के कारण
संविधान में संशोधन हुए। आपात्काल विरोधी आंदोलन के कारण 42वाँ संविधान संशोधन नए 43वें संविधान संशोधन के जरिए निरस्त किया गया और नए संविधान संशोधन के जरिए आंतरिक आपात्काल लगाना मुश्किल बना दिया गया। वहीं पर अन्ना आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानूनी परिवर्तन आए हैं और अनेक भविष्य में आएँगे।
    भारत में ‘पापुलिज्म’ का एक साइड इफेक्ट यह है कि इसने हमेशा प्रकारान्तर से लोकतांत्रिक चेतना में इजाफा किया है और
संवैधानिक चेतना बढ़ाई है। मसलन पंजाब का खालसा आंदोलन हो या दार्जिलिंग का गोरखालैंड या मिजोरम का पृथकतावादी आंदोलन हो या असम गण संग्राम परिषद और आसू का असम छात्र आंदोलन हो, इन सभी आंदोलनों के जरिए सारे देश में लोकतांत्रिक विमर्श का विस्तार हुआ है और लोकतंत्र के पाठ को, संविधान के प्रावधानों को बार-बार सिरे से व्याख्यायित किया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोकतंत्र में पापुलिज्म प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षतौर पर लोकतंत्र को समृद्ध करता रहा है ,जहाँ पर वह यह काम नहीं कर पाया है वहाँ पर पापुलिज्म पिटा है और हाशिए पर चला गया है। पंजाब, दार्जिलिंग, मिजो आंदोलन, नागा आंदोलन, आसू का आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
    भारत का लोकतंत्र बहुत समृद्ध है और इसकी संरचनाएँ बेहद सक्रिय हैं। इसमें शासन करने वाले नेताओं के कान भी हैं। इसका सुफल यह है कि भारत में पापुलिज्म कभी पश्चिमी देशों की तरह अंधड़ नहीं बन सकता। पश्चिमी देशों में पापुलिज्म को आँधी के रूप में चलते देखा गया है लेकिन भारत में पापुलिज्म कभी आँधी के रूप में नहीं आया। पापुलिज्म हमेशा धीमी गति से आया, चरम पर जाकर
आँधी बना और उसके बाद लुढ़कता चला गया। हमारे संविधान में पापुलिज्म के समाधान हैं और जिन सवालों पर समाधान नहीं मिलते उन पर नेताओं और दलों ने मिलकर समाधान खोजे हैं, जब यह दोनों विफल रहे हैं तो न्यायपालिका ने समाधान पेश किए हैं। अनेक समस्याएँ हैं जिनके प्रभावशाली समाधान, कानून में नहीं हैं, संविधान में नहीं है। दलों में एकमत के अभाव के कारण समाधान बन नहीं पा रहा है तो अदालत के हस्तक्षेप से समाधान निकलता रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ध्यान से देखें जिसमें दो साल या उससे ज्यादा सजा पाए नेता को संसद-विधानसभा  का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह मसला राजनैतिक दलों में हल नहीं हो पा रहा था, संसद और चुनाव आयोग भी तय नहीं कर पा रहे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर चुनाव आयोग को व्यवस्था करने का आदेश दे दिया। ऐसे अनेक विवाद हैं जिनका समाधान संसद में नहीं निकलता लेकिन सुप्रीम कोर्ट में निकल आता है। कहने का तात्पर्य है कि भारत में लोकतंत्र को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने में न्यायालयों की बड़ी भूमिका रही है। कम से कम पश्चिमी देशों में लोकतंत्र के हित में न्यायालय दखल नहीं देते।
    ‘पापुलिज्म’ के हथियार का आमतौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन राम मंदिर आंदोलन, आंदोलन के नाम पर पूरे देश में बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के लिए पूरी शक्ति के साथ आंदोलन संघ परिवार-भाजपा आदि ने आरंभ किया। लेकिन इन्हीं संगठनों ने सर्वधर्मसमभाव के लिए आंदोलन नहीं किया। बाबरी मस्जिद गिराने के लिए मुहिम चलाई गई लेकिन देश के सभी मंदिर,  मस्जिद, गुरुद्वारों, गिरजाघरों की रक्षा के लिए आंदोलन नहीं चलाया गया। इन दिनों नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की बातें की जा रही हैं लेकिन विकास के किसी भी ठोस प्रस्ताव के बिना। विकास को अमूर्त बनाकर पेश किया जा रहा है। समानता की बातें की जा रही हैं लेकिन छोटे-बड़े, ऊँच-नीच के भेदों को खत्म करने की बातें नहीं हो रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि समानता तो होगी लेकिन छोटे-बड़े का भेद बनाए रखकर। विकास तो होगा लेकिन गरीब-अमीर का भेद बनाए रखकर। विकास की बातें करते समय अमीर-गरीब के भेद की अनदेखी करने का अर्थ है एकायामी विकास करना। विकास के मॉडल में अमीर-गरीब का भेद केन्द्र में रखे बिना बातें नहीं हो सकतीं। सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बातें तब तक बेमानी हैं जब तक शक्तिशाली और शक्तिहीन के भेद को सम्बोधित न करें।
    इसी तरह पंचायतें होने का अर्थ आम आदमी तक लोकतंत्र का पहुँचना नहीं है आम आदमी तक लोकतंत्र तब पहुँचता है जब फैसला लेते समय पंचायतें लिंग, जाति, सामाजिक हैसियत आदि को सम्बोधित करते हुए फैसले लें, फैसले में सभी वर्ग के लोगों की शिरकत हो। अभी हमारे यहाँ लोकतांत्रिक संरचनाएँ सामाजिक हैसियत का अंग हैं। यह स्थिति जब तक रहेगी निचले स्तर पर सामाजिक भेद, ऊँच-नीच का भेद, स्त्री-पुरुष का भेद बना रहेगा।
    ‘पापुलिज्म’ जब आंदोलन करता है तो राजनैतिक दलों को चुनोती देता है, उनकी विचारधारा को चुनौती देता है। इसके अलावा वह दैनंदिन जीवन शैली और उपभोग को भी चुनौती देता है। सामाजिक संबंधों और सामाजिक विश्वासों को भी चुनौती देता है। इससे भी बड़ी बात यह है कि वह हमेशा औरतों के अधिकारों, अस्तित्व को खतरे में डालता है।
    भारत में पृथकतावादी आंदोलनों से  लेकर राममंदिर आंदोलन तक ,सभी पापुलर आंदोलनों का यह साझा अनुभव है कि औरतों के लिए इस तरह के आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आते हैं। हिन्दुत्व के नए उभार ने युवा लड़के-लड़कियों के उदार सामाजिक
संबंधों और उदार जीवन शैली पर सबसे पहले हमला किया। अंतर्जातीय ,अंतर्धामिक विवाह करने से बढ़-चढ़कर रोका गया। जगह-जगह प्रेमी युगलों पर वेलेंटाइन डे के मौके पर हमले किए गए, उनके लिए ड्रेस कोड, फोन कोड, आवागमन कोड आदि के नाम पर नित नई संहिताएँ और आदेश जारी किए गए। कहने का तात्पर्य है कि ‘पापुलिज्म’ सिर्फ राजनैतिक दलों को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि पूरे समाज को और खासकर औरतों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। हिदुत्व के नए उभार ने शादी-ब्याह में दहेज की माँग, सुंदर-सलोनी दहेज युक्त घरेलू स्त्री की माँग को जनप्रिय बनाया है। वैचारिकतौर पर ‘पापुलिज्म’ हमेशा पितृ सत्ता की विचारधारा को पुख्ता बनाता है। इस अर्थ में वह वैचारिक तौर पर प्रतिक्रियावादी होता है। उल्लेखनीय है अन्ना के इलाके में पितृ सत्ता का वर्चस्व है।
    ‘पापुलिज्म’ हमेशा वैचारिक शार्टकट मारता है और हमेशा प्रतिस्पर्धी भाव में सक्रिय रहता है। यह दीर्घकालिक फिनोमिना नहीं है। ‘पापुलिज्म’ के रूप में समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, विकेन्द्रीकरण या स्वस्थ लोकतांत्रिक जीवन मूल्य आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त होते हैं तो इससे लोकतंत्र समृद्ध होता है। क्योंकि ये सारे तत्व लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन प्रतिक्रियावादी पापुलिज्म हमेशा लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करता है। कहने के लिए राष्ट्रवाद, संकीर्णतावाद, क्षेत्रीयतावाद को लोकतंत्र का अंग माना जाता है लेकिन यह लोकतंत्र को पंगु बनाने वाले तत्व हैं।
    आम आदमी पार्टी का फिनोमिना सकारात्मक लोकतांत्रिक फिनोमिना है और लोकतांत्रिक ‘पापुलिज्म’ का हिस्सा है। उसी तरह यू.पी.ए.-2 के द्वारा उठाए गए अनेक संवैधानिक-संरचनात्मक सुधार और पापुलर कार्यक्रम जैसे सूचना प्राप्ति का अधिकार, सबके लिए भोजन, सबके लिए शिक्षा, मनरेगा, जन लोकपाल, आदि ‘लोकतांत्रिक पापुलिज्म’ का हिस्सा हैं।
 -जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0- 09331762360
 
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के मार्च २०१४ में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…


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