मंगलवार, 18 मार्च 2014

सरदार जाफ़री और काव्य-आलोचना

सरदार के आलोचनात्मक निबन्ध उनकी शायरी से कम महत्व पूर्ण नहीं हैं इसलिए कि वह ऐतिहासिक अध्ययन और समझ की एक नई दिशा व मार्गदर्शन का सीमाकरण करते हैं जिसका मूल पाठ्य-काल की संस्कृति और काव्य का सर्जनात्मक सौन्दर्य है। ऐसा नहीं है कि उस समय तक मीर, ग़ालिब या कबीर के बारे में कुछ नहीं लिखा गया था लेकिन यह जरूर है कि सरदार जाफ़री ने काव्य-आलोचना के लिए जिस पद्धति को अपनाया है वह पेशेवर आलोचकों से भिन्न थी और मेरे विचार में उस समय तक हमारे साहित्य में इस तरह का कलात्मक और सांस्कृतिक अध्ययन आम नहीं था।
    सरदार जाफ़री के इन अध्ययनों में सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने उनमें किसी विचार धारा के आग्रह से काम नहीं लिया है। उन्होंने उस सारे काम में सर्जनात्मक सौन्दर्य और भाषा, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक तŸवों को सामने रखा है। इसीलिए यह अध्ययन सिर्फ कबीर, मीर, ग़ालिब और इक़बाल को समझने में ही मदद नहीं करते बल्कि मूलतः काव्य के समझने और व्याख्यायित करने की सीमा निर्धारित करने में भी उपादेय हैं।
    हमारी आलोचना में सामान्यतया इतिहास की कसौटी की मदद से शायरों को परखने की कोशिश की गई। प्रगतिवादियों से भी यह गलती हुई कि उन्होंने ऐतिहासिक परिस्थितियों पर अनावश्यक जोर दिया, उन्होंने इतिहास को केवल घटनाक्रम समझ लिया और विचार व चेतना के सफर को नजरअंदाज कर दिया। इसीलिए अधिकांश निबन्ध मीर व ग़ालिब की शायरी के बजाय उस काल की ऐतिहासिक परिस्थितियों की खतौनी बन गए और कुछ घटना-भरी पंक्तियों को छोड़कर कवि बीच से गायब हो गया। सरदार जाफ़री इतिहास को केवल घटनाक्रम का बयान नहीं समझते। उन्होंने लिखा है कि-यह बात शायद पुराने इतिहासकारों को मालूम नहीं थी कि इतिहास सिर्फ घटनाक्रम नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक सम्बन्धों के बदलाव की कहानी भी है और चिन्तन व चेतना का सफर भी।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 14)
    इसलिए वे कबीर का जिक्र करें या मीर व ग़ालिब का, वह सोच व चेतना के उस सफर पर जोर देते हैं जो ऐतिहासिक घटनाओं से सम्बन्ध के बावजूद उससे ज्यादा शाक्तिशाली है। ऐतिहासिक घटनाएँ तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर घटित होती हैं और समाप्त हो जाती हैं लेकिन उनसे अस्तित्व पाने वाली फि़क्र तत्कालीन बन्धनों को तोड़कर बाहर निकल जाती है और शताब्दियों बाद भी उसके प्रभाव बने रहते हैं। जबकि इतिहास के चिह्न काल के साथ विलीन हो जाते हैं। इसीलिए कबीर के काव्य पर लिखते हुए वे कहते हैं:-
    यही वजह है कि परिस्थितियों व घटनाओं का कबीर, सन् व तारीख़ का कबीर जिन्दा नहीं है लेकिन चिन्तन व चेतना का कबीर, भाव व अहसास का कबीर, शेर और गीत का कबीर जिन्दा है। हर दोहा उसकी हस्ती है, हर पद (नज़्म) उसकी जात और हर कल्पना उसकी भाषा और जब हम उसके बोले हुए शब्दों को दोहराते हैं तो कबीर का साज बजने लगता है। शाही फरमान और डंके की आवाजें गूँगी हो जाती हैं और कबीर के दिल से निकलने वाली ‘सोते सरमदी’ आत्म सरशार हो जाती है। पंडित का मन्त्र और मुल्ला की अज़ान आसमानों के सन्नाटे में गुम हो जाती है और कबीर के प्यार का हर्फे मुहब्बत धरती के सीने में धड़कने लगता है।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 14)
        सरदार जाफ़री एक इंसानियत-दोस्त आन्दोलन के समर्थक रहे हैं और सारी जिन्दगी अपने लेखों और अपनी शायरी के द्वारा उसी इंसान-दोस्ती का प्रचार करते रहे हैं। उनके लिए इंसान-दोस्ती हर तरह के भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक भेदभाव से बुलन्द है। वह भाषा की सीमाओं व बन्धनों को तोड़कर मौसमे-बहार के फूलों की खुशबू की तरह फैल जाती है। वह अŸाार, रूमी, हाफि़ज, कबीर, मीरा, मीर, ग़ालिब और इक़बाल के देश-भेद और भाषा-भेद को नहीं मानती। वह नस्लों और रंगों के भेद से भी परिचित नहीं है। वह तो केवल दर्द को पहचानती है और सम्बन्धित मूल्यों के बीच पुल बनाती चली जाती है।
    सरदार जाफ़री कबीर, मीर और ग़ालिब में एक भाषाई और फि़क्री रिश्ता तलाश कर लेते हैं। उन्हें यह रिश्ता तलाश करने में इसलिए कठिनाई नहीं होती कि स्वयं उनका भी रिश्ता उसी भाषाई और सांस्कृतिक चिन्तन से है। पन्द्रहवीं शताब्दी ईस्वी में हिन्दू भक्ति और मुस्लिम तसव्वुफ़ के मिश्रण से एक नया चिन्तन भारत में अंकुरित हो रहा था और इसका कारण वह सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने इन्सानों के बीच जात-पाँत की ऊँची दीवारें उठा रखी थीं। साधारण गरीब इंसान के जीने का कोई सहारा नहीं था। सरकार हिन्दू राजाओं की हो या मुसलमान हुक्मरानों की, उनके अपने वैयक्तिक और सामुदायिक हित थे और कोई निचले समुदाय के लोगों के साथ बराबरी का सुलूक करने के लिए तैयार नहीं था। जो मुसलमान हो गए उनके लिए भी नाम के परिवर्तन से अधिक कुछ नहीं हुआ और महमूद व अयाज के बीच सामुदायिक भेद उसी तरह कायम रहा। सरदार जाफ़री ने इन परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि -
    तुर्क हुक्मरानों ने-इस्लाम पर ईमान ले आने वाले गुलामों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया। वह अब भी कोरी जुलाहे हो जाने के बाद कमीने ही समझे जाते थे। इसलिए उनका अन्तिम शरण-स्थान भक्ति और तसव्वुफ की प्रेम नगरियाँ बन गईं और दोनों ख़ुदापरस्त और इंसान-दोस्त आन्दोलनों का सुन्दर मिश्रण कबीरदास और उनकी शायरी में जाहिर हुआ।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 18-19)
    कबीर के लिए धार्मिक सीमा व बन्धन कोई महत्व नहीं रखते। इसीलिए वह इंसानों के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए ख़ुदा और जगदीश में कोई अन्तर नहीं है। वह ब्रह्म की बात करें या अल्लाह की, उनका उद्देश्य एक ही होता है। वह ब्राह्मणों पर भी व्यंग्य करते हैं और मुल्लाओं पर भी और यह कहकर -
सर्गुन की सेवा करो निर्गुन का करो ज्ञान।
निर्गुन सर्गुन के परे नहीं हमारा ध्यान।।

    ख़ुदा और बन्दे के सिलसिले में हिन्दू भक्तों और मुसलमान सूफि़यों को एक पंक्ति में खड़ा कर देते हैं।
    सरदार जाफ़री ने कबीर की शायरी में रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद और हिन्दू वेदान्त के प्रभावों को भी तलाश किया है और मंसूर के अनलहक़ और रूमी का प्रभाव भी तलाश किया है उनका कहना है कि-
    कबीर की शिक्षाओं पर रूमी की कल्पनाओं का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। जिसे उन्होंने हिन्दू भक्ति के अन्दाज में प्रस्तुत किया है। वही गरिमा, वही बेताबी और बेचैनी जो रूमी की ग़ज़लों की विशेषता है, कबीर की शायरी का महान् भाव है। हिन्दू भक्ति को मक़ामे-फ़ना की सैर कराती है जहाँ नम्रता आज्ञाकारिता है और मुस्लिम तसव्वुफ़ अस्तित्व के स्थान पर पहुँचाता है जहाँ शक्ति व महानता, सौन्दर्य व विभूति, साहस और ऊँचे सुर के डंके बज रहे हैं। अगर कबीर के यहाँ कल्पना मौजूद है जो भक्ति और तसव्वुफ़ दोनों जगह जुड़ी हुई है कि बूँद या बुलबुला सागर में लीन हो जाता है। जीव, व्यक्ति, आत्मा, सम्पूर्ण अस्तित्व (ब्रहमन) में मिल जाता है तो दूसरी ओर यह कल्पना मौजूद है जो रूमी की देन है कि बूँद सागर को पी लेती है और आत्मन ब्रहमन को अवशोषित कर लेती है।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 29-30)
    कबीर ने धार्मिक संकीर्णता और बाह्य पूजा-पाठ के मुकाबले एक विस्तृत राह निकाली। एक ऐसी राह जिस पर चलने वाले मुसलमान हों या हिन्दू, काले हों या गोरे, बड़े हों या छोटे सब बराबर हों और इसलिए सरदार जाफ़री कबीर को समय का बन्दी या इतिहास में सीमित नहीं मानते। कबीर की शिक्षाएँ सदियों के ज्ञानात्मक और वैज्ञानिक विकास के बावजूद आज भी उतनी ही प्रबुद्ध और प्रतिभाशाली हैं और इंसानियत को आज भी उनकी उतनी ही आवश्यकता है। कबीर ने पाँच सौ साल पहले कहा था-
    दुनिया के दो मालिक (जगदीश) कहाँ से आए? तुझे इस भ्रम में किसने मुब्तिला कर दिया है। अल्लाह, राम और रहीम अलग-अलग कैसे हो सकते हैं। एक सोने से सब जेवर बनाए गए है-वही महादेव है, वही मुहम्मद। जो ब्रह्मा है उसी को आदम कहना चाहिए। कोई हिन्दू कहलाता है कोई मुसलमान। लेकिन रहते एक ही जमीन पर हैं। एक वेद की किताबें पढ़ता है और एक ख़ुतबा। एक मौलाना कहलाता है और एक पंडित, नाम अलग-अलग रख लिए हैं वैसे बर्तन सब एक ही मिट्टी के हैं।
(कबीर बानी, पृ. 26)
    कबीर के चिन्तन को अगर एक दोहे से समझने की कोशिश की जाए तो वह यही होगा कि -
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़ै तो पंडित होय।।

    कबीर सरदार जाफ़री के आदर्श हैं, मीर उनके महबूब, ग़ालिब एक भविष्यदर्शी और नए चिन्तन का मूल और इक़बाल एशियाई जागरूकता के प्रतीक। यही कारण है कि उन्होंने उन शायरों को समझने और उनकी व्याख्या की ओर विशेष ध्यान दिया। कबीर के बाद मीर से उनके प्रभावित होने के कई कारण हो सकते हैं। मीर की भाषा को लें तो मीर को वह खड़ी बोली की तमाम सम्भावनाओं का सबसे बड़ा कवि मानते हैं; या मीर का इश्क जिसके लिए उनका खयाल है कि मीर के यहाँ इश्क एक असीम सागर है जिसकी बहुत-सी मौजें हैं। या फिर मीर का दर्द, उनका सोजोगुदाज या उनके चिन्तन का वह सूफि़याना पहलू जिसमें उनका इश्क भी इंसान-दोस्ती से मिल जाता है और इस तरह कबीर से एक सम्बन्ध बना लेता है। मीर के काल का अन्वेषण करते हुए वह लिखते हैं कि -
    मध्यकाल में इंसान-दोस्ती का सबसे बड़ा आन्दोलन तसव्वुफ़ की शक्ल में उभरा। भक्ति और तसव्वुफ़ इसकी गै़र इस्लामी शक्लें हैं। इन आन्दोलनों का रिश्ता दस्तकारों और किसानों के विद्रोह से भी रहा है लेकिन मीर के काल तक पहुँचते-पहुँचते केवल एक फिक्री निजाम बाकी रह गया था जो जागीरदारी निजाम के महत्व से भिन्न महत्व रखता था और उनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इंसानी एकता की कल्पना थी जो मजहब, जात-पाँत और व्यवसायों की बुनियादों पर बँट जाने वाले इंसानों को एक ही रिश्ते में पिरो लेती है।
    इश्क और दिल, दो शब्द हैं जो इस कल्पना को समेट लेते हैं। इश्क सबसे बड़ी भावना है और दिल सबसे बड़ी चीज। काबा हो या मन्दिर और मस्जिद, ये अगर टूट जाएँ तो फिर बन सकते हैं लेकिन ‘दिल वह नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके।’ हज, नमाज, रोजे से कोई आदमी नहीं बनता। यह जाहिरी इबादतें हैं। आदमी दिल से बनता है और दिल पीर व मुर्शिद है। इश्क का केन्द्र है ख़ुदा, इश्क इस ब्रह्मांड का सृष्टिकर्ता है, इसका रंग-रूप है, इश्क ही जिलाता है, इश्क ही मारता है-इस तरह खुदा और इंसान का प्रत्यक्ष रिश्ता क़ायम हो जाता है-सिर्फ इंसान से मुहब्बत करके ख़ुदा तक पहुँचा जा सकता है। इसके लिए आँखें बन्द करके अन्तध्र्यान करना बन्दे के दर व दिल को भूलकर ख़ुदा तक पहुँचने वाला बनना बेकार है।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 97-98)
    इस जगह इस लम्बे खंड को देने की जरूरत इसलिए पड़ी कि कबीर, मीर, ग़ालिब और इक़बाल हर एक की फि़क्र और शायरी में यह ज़्ाज़्बा किसी-न-किसी रूप में साझेदार है और यह कई शताब्दियों तक फैली हुई साझेदारी आश्चर्यजनक नहीं है। इसलिए कि जिन्दगी की कड़ुवाहटों और निराशाओं में इंसान का सहारा इश्क ही रहा है। इसी से उसने बूँद से रत्न बनने का फ़न सीखा है और इसी से एक विस्तृत हक़ीक़त में मिलकर शाश्वत सच्चाई को पहचाना है। मीर के यहाँ यह इश्क आम इंसान का इश्क है और इश्के-हक़ीक़ी भी। लेकिन मीर इन सबसे भिन्न इसलिए हैं कि उनकी शायरी में जिन्दगी का हर रंग चाहे वह उदासी हो या सन्ताप, भक्ति हो या तसव्वुफ, मसर्रत हो या खुशी, आनन्द हो या कड़ुवाहट, इस तरह मिल गया कि वह रंगों का एक दिलकश संकलन बन गया है। हमारे काल के एक और मीर के आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने कलामे-मीर पर विचार करते हुए लिखा है कि -
    मीर का कुल्लियात मुझे चाल्र्स डिकिंस की याद दिलाता है, वही अफरा-तफरी, वही अनोखे और मामूली और रोजमर्रा और आश्चर्यजनक का इम्तिजाज, वही कमी, वही ज्यादती, वही स्वतः, मगर आश्चर्यजनक परिहास, वही भीड़-भाड़; मालूम होता है सारी जि़न्दगी इस कुल्लियात में मौजज़न है। जि़न्दगी का कोई ऐसा विश्लेषण नहीं, आरिफाना ‘‘वजदान’’ और मज्जूबाना वज्द से लेकर रिन्दाना बरहनगी तक कोई ऐसा आनन्द नहीं, जिल्लत, नाकामी, नफरत, फरेब शिकस्तगी, फ़रेब खुरदगी, फक्कड़पन, प्रचंड हँसी, सीनाज़नी से लेकर कहकहा, जिंसी लज्जत, इश्क का समर्पण और लीनता तक कोई ऐसा जज़्बा और क्रिया नहीं जिससे मीर ने अपने को वंचित रखा है।
(शेर शौर अंगेज, प्रथम खंड, पृ. 52)
    इस गद्य खंड से जाहिर होता है कि कलामे-मीर के विश्लेषण और उसके समझने और व्याख्या करने में सरदार जाफ़री और शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जिस नतीजे पर पहुँचते हैं वह एक-दूसरे से मुख़्तलिफ़ नहीं है। यहाँ कुल्लियाते-मीर की अव्यवस्था के कुछ शेर भी देख लीजिए-
जलवा है उसी का सब गुलशन में जमाने के
गुल फूल को है उनने पर्दा सा बना रखा।

गह गुल है गाह रंग गाहे बाग की है बू,
आता नहीं नजर वह तरहदार इक तरह।

किया सैर इस खराबे का बहुत, अब चलके सो रहिए
किसू दीवार के साए में, मुँह पर ले के दामाँ को।

रात मजलिस में तिरी हम भी खड़े थे चुपके
जैसे तस्वीर लगा दे कोई दीवार के साथ।

भरी आँखें किसू की पोंछते ग़र आस्तीं रखते
हुई शर्मिन्दगी क्या-क्या हमें इस दस्ते-ख़ाली से।

जम गया खूँ क़फे कातिल पे तिरा मीर जि़बस
उनने रो-रो दिया कल हाथ को धोते-धोते।

होगा सितम व जोर से तेरे ही कनाया
दो शख्स जहाँ शिकव-ए-अय्याम करेंगे।

    मुझे नहीं मालूम कि इन चन्द अशआर में से कितने मीर के बहŸार नशतर में शामिल हैं लेकिन इस तरह के न जाने कितने बहŸार नशतर मीर के कलाम में पोशीदा हैं। सरदार जाफ़री ने मीर की शायरी को इसी कलात्मक, भाषाई संस्कृतियों और सामाजिक प्रसंगों में देखने की कोशिश की है और उन कारणों पर इन शब्दों में रोशनी डाली है जिन्होंने मीर के वक्त के फासलों को विलुप्त कर दिया है और मीर को नए काल के अहसास और जज़्बे का शायर बना दिया है। उनका कहना है कि -
    फूल चेहरों में बदल जाते हैं, चेहरे फूलों में, खाक से आदमी बनता है और आदमी ख़ाक हो जाता है। इसी तरह मौत और जिन्दगी एक सिलसिले की कडि़याँ बन जाती हैं और सारी क़ायनात एक वहदत में तब्दील हो जाती है और मीर की शायरी के बिखरे हुए जलवे एक सद रंग गुलिस्ताँ की शक्ल इख्तियार कर लेते हैं। उसमें फूल भी हैं और काँटे भी। बुलबुल भी और सय्याद भी, नशेमन भी और बिजली भी, जि़्ान्दा रहने की उमंग भी और मर जाने का हौसला भी और यही वजह है कि यह शायरी आज भी महान है और ज़माने के बदल जाने के बाद भी दो सौ बरस पुरानी जुबान में हमारे जज़्बात और अहसासात का साथ दे रही है।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 122)
    मीर के क़लाम में ऐसी शक्ति और आकर्षण है कि वह पढ़ने वाले को अपने अन्दर जज़्ब कर लेती है। उनके कलाम को पढ़कर खुद उसके अन्दर की उŸोजित अवस्थाएँ एक सुकून-सा महसूस करने लगती हैं। मीर की उस शक्ति के कई धारों का संकेत दिया जा सकता है। एक खड़ी बोली के वह निखरे हुए रूप जो मीर की देन हैं और जिनमें उनका विशेष मुहावर-ए-जुबान शामिल है। अल्फ़ाज़, मुहावरों और रोजमर्रा का वह इस्तेमाल जिससे मीर शेर को उसकी आम सतह से मानी की उस तहदारी तक पहुँचा देते हैं जहाँ वह सबके जज़्बे और अहसास में ढल जाता है। दूसरे उसका अवामी लबो-लहजा हिन्दी की शायरी की इहलौकिक अवस्थाएँ जो उसमें नई दिलचस्पी भर देती हैं। चैथे जिन्दगी के दुख और दर्द का चित्रण जिसे वह अपने आस-पास से हासिल करते हैं और उसमें ऐसी समानता भर देते हैं कि वह ज़्ाात, वक़्त और ज़्ामाने की क़ैद से आज़ाद हो जाती है और वह उन्हें ऐसा दर्पण बनाकर प्रस्तुत करते हैं जिससे उनका काल अपनी सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक ताप के साथ पूरी तरह चमकता दिखाई देता है।
    कबीर और मीर के बाद ग़ालिब और इक़बाल सरदार जाफ़री के पसन्दीदा शायर हैं। ग़ालिब के यहाँ कोई सुसंगत जि़्ान्दगी का दर्शन या सुव्यवस्थित चिन्तन नहीं है लेकिन उनका मिजाज दार्शनिक है और फि़क्री तत्व उनके क़लाम में हर जगह मौजूद हैं। वह बेहद पारदर्शी और भविष्यज्ञाता शायर हैं। यही ख़ूबी है कि वह अपने तमाम समकालीन कवियों में भिन्न नजर आते हैं। उनके यहाँ सूफि़याना विचार भी हैं लेकिन उनकी हैसियत जायका बदलने की-सी है। उनमें भी कहीं-कहीं तबीयत की शोखी हावी होती है और गुनाह व सवाब और जन्नत व दोजख की कल्पना के साथ ख़ुदा से भी शोखियाँ करने लगते हैं। वह वहदते-वुजूद के कायल थे। उनके उलझावों में गिरफ्तार नहीं थे इसीलिए कभी घबराकर वह खुद खुदा से सवाल करने लगते हैं कि अगर तेरे अलावा कुछ नहीं है, यह चहार जानिब क्या हंगामा है। यह दरिया यह नदियाँ, यह सब्जा और रंग-बिरंग के फूल कहाँ से आए हैं। इसी भिन्नता को जाहिर करते हुए सरदार जाफ़री ने लिखा है -
    वहदत वजूद के डाँडे कहीं वेदान्त से जा मिलते हैं और कहीं नौअफलातूनियत से, यह दर्शन, अपनी हजारों उलझनों के साथ जात मुतलक, नफी सिफात और तर्के दुनिया से लेकर उपमा से सुसज्जित और गुणों से सजी हुई जात की कल्पना तक फैला हुआ है और जब इसमें ईरानी और तातारी पैगनिज्म (कुफ्र) की आमेजि़्ाश हो जाती है तो आनन्द की अभिलाषा का पहलू भी पैदा हो जाता है। अब यह अपनी हिम्मत पर निर्भर है कि आदमी उस मंजिल पर पहुँचकर दुनिया को तज दे (कबीरदास) या शौक का हाथ बढ़ाकर उस रंगो-नूर और सौत व आहंग से भरे हुए नाचते खिलौने को उठा ले।
(हाफि़ज़्ा और ग़ालिब) पैग़म्बराने सुखन, पृ. 145)
    ग़ालिब की लोकप्रियता का कारण वहदतुल-वुजूद पर उनका विश्वास या उनके कलाम में पाए जाने वाले सूफियाना खयालात नहीं हैं बल्कि कायनात की वास्तविकताओं और जिन्दगी के बारे में उनका नितान्त जवजंस ंचचतवंबी है जिसमें वह हमें बिल्कुल हमारी तरह के एक इंसान नजर आते हैं। जो कभी तशकीक का शिकार होता है कभी पुख्ता यकीन का इजहार करता है। जिसके यहाँ इश्क भी है, हसद भी, जो इश्क भी करना जानता है और नफरत भी, जो हक गो और बेबाक भी है और झूठ बोलने से भी नहीं कतराता। उसके साथ यह नहीं लगता कि हम किसी महफिले-गै़र में हैं। उसकी मुश्किलगोई उसकी फ़ारसीपसन्दी और फ़ारसीआमेजी भी रंगीनी-ए-खयाल से आकर्षक और मनमोहक बन जाती है।
    सरदार जाफ़री काव्य-आलोचना में बुनियादी तौर पर मूल पाठ पर जोर देते हैं लेकिन मूल पाठ के कलात्मक, सांस्कृतिक और राजनैतिक प्रसंग को फ़रामोश नहीं करते। इसलिए कि कभी-कभी मूल उसके बगैर नामुकम्मल रह जाता है, शब्द, रूपक और प्रतीक चित्रण पूरा इजहार नहीं कर पाते। सरदार जाफ़री उसके पूरे प्रसंग में शायर और उसके क़लाम को देख लेते हैं, इसीलिए ग़ालिब के बारे में वह लिखते हैं-
        यह निशातअंगेजी और लज़्ज़तअन्दोजी और ग़मनौशी और आरजूमन्दी जो सिमटकर जुंबिश व हरकत के तसव्वुर व कल्पना के छलावों में तब्दील हो गई है, इŸिाफ़ाक़ी चीज़्ा नहीं है। इसमें ग़ालिब की रुचि व प्रवृŸिा और सूफि़याना शायरी की उन परम्पराओं का बड़ा दखल है जो सेहतमन्द हैं लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है। ग़ालिब का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह भी तकाजा करता है कि माहौल के असरात को नजरअंदाज न किया जाए। दुनिया को ‘आईना आगही’ कहने वाला और इसके तमाशे पर जोर देने वाला, शायरी को तुकबंदी के बजाय मानी आफ्रीनी का दर्जा देने वाला और कलम की जुंबिश पर अक्ल की पाबन्दियाँ आयद करने वाला शायर अपने गिर्दोपेश से बेख़बर रहकर सिर्फ अपना ख़ूने-दिल उछालने पर सन्तोष नहीं कर सकता-
चाक मत कर जेब बे अय्यामेग़्ाुल
कुछ उधर का भी इशारा चाहिए।
(पैग़म्बराने सुखन, पृ. 157)
    ग़ालिब बहुत अजीब शायर हैं। मैंने कहीं लिखा था कि आलोचनात्मक पैमानों का कोई बना-बनाया लिबास उनकें जिस्म पर पूरा नहीं उतरता। इसलिए कि उनकी फि़क्र किसी एक रुख में सीमित नहीं है। वह कभी कहते हैं-
घर में क्या था कि तिरा गम उसे गारत करता
वह जो रखते थे हम इक हसरते-तामीर सो है।

और वह कभी कहते हैं-
हूँ गर्मिए-निशाते-तसव्वुर से नगमासंज
मैं अन्दलीबे-गुलशने-ना-आफरीदा हूँ।
    दरअसल यही ‘गर्मिए निशाते तसव्वुर’ है जो ग़ालिब के यहाँ कलीदी (मूल सिद्धान्त) हैसियत रखती है। इसके करिश्मे इसके यहाँ
अँधेरी रात के सितारों की तरह चमकते नजर आते हैं। सरदार जाफ़री ने इसीलिए ग़ालिब के अध्ययन में एक विस्तीर्ण दृष्टिकोण अपनाया है।
    ‘दीवाने ग़ालिब’ के मुक़दमे के अलावा ग़ालिब पर उनका एक बहुत अहम काम ‘गालिब़ का सोमनाते-खयाल’ यानी उनकी मशहूर फारसी मसनवी ‘चिरागे-दैर’ का अनुवाद और प्राक्कथन है जो उनकी आलोचनात्मक पद्धति समझने के लिए बहुत अहम है। ग़ालिब का एक फ़ारसी शेर है-
बसोमनाते ख़यालम दर आई ताकीबी
ख़न फ़रोज़ बिरो दूरा हाए जुन्नारी।
    अर्थात् मेरे सोमनाते-खयाल में आओ और देखो कि कैसे दिलावेज और अफरोज पैकर यहाँ आरस्ता हैं जिनके दोश जनेऊ से सजे हुए हैं।
(तर्जुमा सरदार जाफ़री, सोमनाते-खयाल, पृ. 21)
सरदार जाफ़री का खयाल है कि -
    ग़ालिब ने इस इबादतगाह को अपनी शायरी का सोमनाते-खयाल कहकर उसको सूफि़याना फिक्र के दायरे से भी बाहर निकाल लिया और एक नया वकार अता किया जिसमें विश्वास का दखल नहीं है बल्कि एक गैर-मजहबी फिक्र की कारफरमाई है-यह बात बहुत दिलचस्प है और फिक्र-अंगेज कि ग़ालिब ने अपनी शायरी को सोमनाते-खयाल क्यों कहा इसकी किसी तहरीर से इसका पता नहीं चलता।
(सोमनाते-खयाल, पृ . 21-22)
    सरदार जाफ़री ने उसका रिश्ता अठारहवीं शताब्दी की हिन्दू-मुस्लिम मिश्रित संस्कृति से जोड़ा है जिसके लिए मुअल्ला में दशहरा, दीवाली का प्रबन्ध किया जाता था। फूलवालों की सैर में जोगमाया के मन्दिर और कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के मजार पर पंखा चढ़ाया जाता था और हज़रत निजामुद्दीन औलिया के मजार पर बसन्त का त्यौहार मनाया जाता था। लेकिन इसका एक सबब और हो सकता है। सोमनाथ हिन्दुओं का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मन्दिर था जिसे हिन्दुओं के काबे की हैसियत हासिल थी। मन्दिर के साथ बुतों और असनाम की परस्तिश का तसव्वुर वाबस्ता है। उर्दू शायरी में बुतों और सनम से इश्क एक ऐसा विषय है जिस पर विभिन्न शायरों के अशआर मिल जाएँगे और जिनकी उपासना इश्क की एक मंजिल की हैसियत रखती है, इसीलिए ग़ालिब अपने खयाल को सोमनाथ के खयाल से ताबीर करते हैं जहाँ इंसान का सर खालिक की अजमत के आगे झुक जाता है। ग़ालिब इसीलिए अपनी शायरी को ‘सोमनाते-खयाल’ करार देते हैं और उसकी नैरंगियों के तमाशे के लिए हर एक को आने की दावत देते हैं। यहाँ तवज्जो एक और बात की तरफ जाती है कि मन्दिर में विभिन्न कुदरत और ताकत रखने वाले असनाम (देवता) सजे होते हैं जो कि अलग-अलग ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह सब एक मन्दिर का हिस्सा होते हैं। बड़े शिवालयों में शिवलिंग के अलावा इन देवताओं की मूर्तियाँ होती हैं। ग़ालिब अपनी शायरी को ‘सोमनाते-खयाल’ कहकर उन तमाम ताकतों, रंगीनियों और दिलआराइयों जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती उन पर अपनी कुदरत का इजहार करते हैं। सरदार जाफ़री ने ‘मसनवी चिरागे-दैर’ को ग़ालिब की अपने वतन हिन्दुस्तान से वालिहाना मुहब्बत का इजहार करार दिया है। बनारस हिन्दुओं का पवित्र शहर है और शेख अली हजीं की तरह ग़ालिब भी इस शहर पर फरेफ्तां हैं। लेकिन दोनों के इश्क और फरेफ्तगी में बड़ा फर्क है इसलिए ग़ालिब के लिए बनारस हिन्दुस्तान की सांस्कृतिक और सौन्दर्यात्मक रंगीनियों का चित्रण, बहिश्त खुर्रम व फिरदौस मामूर और काबाए हिन्दुस्तान है। ग़ालिब की शायरी के समझने और उससे आनन्दित होने के लिए सरदार जाफ़री ने जो पैमाना निश्चित किया है वह बेहद अहम है। इसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि -
    इसकी शायरी से लुत्फअन्दोज होने के लिए केवल शाब्दिक अर्थों से वाकिफ होना काफी नहीं, शेरों को बार-बार पढ़ना भी जरूरी है। फिर शब्द अक्षरों के मजमूए की शक्ल में नहीं बल्कि तस्वीरों की शक्ल में पहचाने जाएँगे। आदमियों के चेहरों की तरह आहिस्ता-आहिस्ता मानूस होंगे और अपनी शखि़्सयत को जाहिर करेंगे फिर शब्दों का सौती लोच महसूस होगा और उनके बाहमी टकराव की झंकार से कान आशना होंगे तब जाकर मानवी तरन्नुम और दाखिली आहंग के दरवाजे खुलेंगे और शाब्दिक मफहूम से गुजरकर शायराना मफहूम तक पहुँचने का रास्ता मिलेगा। वफ़ा का शब्द महबूब की जुल्फ़ों की तरह महक उठेगा और सर्वे चिरागाँ रक्स करता नजर आएगा-जुनून जुस्तजू बन जाएगा, जिसकी राहें कभी जि़्ान्दाँ की जंजीरें रोकेंगी और कभी दैरो-हरम की दीवारें जिन्होंने अपने अन्दर शौक की दरमान्दगी को सजा रखा है और मैखाना मुकम्मल इंसानियत की मंजिल बनकर सामने आएगा। फिर दीवाने-ग़ालिब के हर-हर वरक़ पर उसके तख़य्युल की मख़लूक अँगड़ाइयाँ लेने लगेगी। उसके सरापानाज़ महबूब आँखों के सामने मुस्कुराएँगे और दुनिया ज्यादा खूबसूरत हो जाएगी और इंसान ज्यादा काबिले-अहतराम।
(ग़ालिब का सोमनाते-ख़याल, पृ. 14)
    सरदार जाफ़री ने ग़ालिब की व्याख्या के सिलसिले में जो उसूल वज़्ाा किए हैं उनकी रोशनी में सिर्फ ग़ालिब ही नहीं किसी भी शायर के क़लाम को ज्यादा बेहतर तरीके पर समझा जा सकता है और उससे लुत्फ़-अन्दोज़ हुआ जा सकता है। सरदार जाफ़री का यह विश्लेषण बुनियादी तौर पर काव्य-आलोचना के स्तर को निर्धारित करता है।
    सरदार जाफ़री का एक बड़ा काम ‘इक़बाल शनासी’ है। इक़बाल सरदार जाफ़री की निगाह में उर्दू के सबसे अहम शायर और एशियाई जागरूकता के प्रवर्तक हैं। तक्सीमे-मुल्क के बाद हिन्दुस्तान के सरकारी और साम्प्रदायिक समुदायों ने सबसे पहले सवालिया निशान इक़बाल पर लगाया। उसके राजनैतिक कारण हमारा विषय नहीं है। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने उन्हें बिल्कुल प्रतिष्ठान का शायर बना दिया। एक पाकिस्तानी आलोचक ने क़लामे-इक़बाल और फि़क्रे-इक़बाल के साथ पाकिस्तान में क्या ज्यादतियाँ हुईं, उसको बयान करते हुए लिखा है कि -
    पाकिस्तान में तो खैर शुरू ही से इक़बाल को प्रतिष्ठिान से नत्थी कर दिया गया और जहाँ एक तरफ क़लामे-इक़बाल कव्वालों के दस्ते-तसर्रुफ़ से महफ़ूज न रह सका, वहीं फिक्रे-इक़बाल की विस्तृत व्याख्या का कबाला (कागज) ब-हक़े-सरकार लिख दिया था अर्थात् जो विचारधारा इस्लामाबाद के हुक्मरानों की रही उसी रंग की ऐनक, तनख़्वाहदार बुद्धिजीवियों और प्रसार व प्रकाशनों के संस्थानों ने शेरे-इक़बाल की व्याख्या और फि़क्रे-इक़बाल के विस्तार के लिए पहन ली।
(मजहर जमील, अफ़कार, कराँची: सरदार जाफ़री नम्बर, पृ. 572)
    जब दोनों जगह यह सूरते-हाल हो तो किस तरह इक़बाल को समझा या उनकी फि़क्र की गहराइयों तक पहुँचा जा सकता था? सरदार जाफ़री ने साम्प्रदायिकता और राजनैतिक संकीर्णता के ऐसे माहौल में इक़बाल की पुनव्र्याख्या का काम किया और इक़बाल की असली महानता और महŸाा और प्रगतिशील पहलुओं से सिर्फ उर्दूदाँ तबक़े को ही नहीं बल्कि पूरे देश को अवगत कराया। मैं उनके इस काम को इसलिए बहुत ज्यादा महŸव देता हूँ कि दो दृष्टिकोणीय अतिरेकों के दरम्यान पहली बार फि़क्रे-इक़बाल की सही कदरो-कीमत को निर्धारित करने का उन्होंने मार्ग प्रदर्शित किया।
    सरदार जाफ़री की निगाह में इक़बाल का सबसे बड़ा हथियार वह खुदी है जिससे वह बड़ी ताक़तों के मुक़ाबले के लिए इंसान को तैयार करते हैं। वह ‘ममोले’ में शहबाज (बाज़) से लड़ जाने की ताकत पैदा करना चाहते हैं। शहबाज इक़बाल के यहाँ हरकत व हरारत का प्रतीक है, जो क़ौमों के खून में गर्मी पैदा करता है और अमल और जद्दोजहद पर आमादा करता है। इन दोनों अलामतों (प्रतीकों) अर्थात् ‘खुदी’ और शहबाज को अगर उस वातावरण और सामाजिक परिस्थितियों में देखें तो उनके अस्ल मानी खुलते हुए नजर आएँगे और सरदार जाफ़री के इस जुमले कि ‘इक़बाल एशियाई बेदारी की अलामत हैं’ की हक़ीक़त को समझा जा सकेगा, इक़बाल की इस महŸाा को हमारी संकीर्णता ने नहीं समझने दिया। कुछ प्रगतिवादियों ने भी इक़बाल के क़लाम और पैग़ाम के सिर्फ सतही माने लिए और उन्हें भूतकाल की तरफ देखने वाला करार दिया। सरदार जाफ़री ने पहली बार इक़बाल की खूबियों और त्रुटियों दोनों को ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की और फि़क्रे-इक़बाल की ताकत, गहराई और तहदारी से अवगत कराया। उनका कहना है कि इक़बाल पूरी हिन्दुस्तानी शायरी में तन्हा शायर हैं जिसने पश्चिमी परम्पराओं, हिन्दू परम्पराओं और इस्लामी परम्पराओं तीनों से फायदा उठाया। उन्होंने‘ फलसफ़ा-ए-खुदी’ पर विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि -
    ख़ुदी वह बहर है जिसका कोई किनारा नहीं, इक़बाल का फ़लसफ़ा और शेर खुदी की तशरीह और तौजीह (व्याख्या) है इस मकसद के लिए उन्होंने बहुत सी इस्लामी परम्पराओं को रद्द किया (उदाहरणार्थ वहदतुल-वजूद) और बहुत से अफ़कार को नए अर्थ प्रदान किए। इस सिलसिले में उन्होंने पश्चिमी ज्ञान से भी फायदा उठाया और हिन्दू चिन्तन से भी।
(इक़बाल शनासी, सरदार जाफ़री, पृ. 13)
    अपने इस नतीजे पर पहुँचने की दलील के तौर पर वह खुद इक़बाल का लिखा हुआ ‘इसरारे-खुदी का दीबाचा’ (प्रस्तावना) नक़ल करते हैं जिसमें इक़बाल मशरिको-मगरिब के धारों का जायजा लेते हुए हिन्दू ज्ञानियों के खयालात का जिक्र करते हैं और अमल और तर्के-अमल के भाव को प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने इस दीबाचे में श्रीकृष्ण को एक प्रवर्तक और अमल और तर्के-अमल के अस्ल भाव को पेश करने वाला कहा है। इक़बाल हिन्दुस्तानी दर्शन का जिक्र करते हुए लिखते हैं-
    मानव जाति की जहनी तारीख में श्रीकृष्ण का नाम हमेशा अदब व आदर से लिया जाएगा कि इस महानतम इंसान ने एक निहायत दिलफरेब अन्दाज में अपने मुल्को-क़ौम की दार्शनिक परम्पराओं की आलोचना की और उस हक़ीक़त को आशकार (जाहिर) किया कि तर्के-अमल से मुराद ‘तर्के-कुल्ली’ (सब कुछ छोड़ना) नहीं है क्योंकि अमल तकाजाए-फितरत है और इसी से जिन्दगी का इस्तहकाम (मजबूती) है बल्कि तर्के-अमल से मुराद यह है कि अमल और उसके परिणाम से सम्बन्धित दिलबस्तगी न हो।
(इक़बाल, दीबाचा, इसरारे खुदी बहवाला इक़बाल शनासी, पृ. 15)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
    अर्थात् अमल तेरा काम है नतीजे की फिक्र करना तेरा काम नहीं है। नतीजे से इसी बेतअल्लुक़ी को इक़बाल तर्के-अमल का नाम देते हैं जो अमल का नकार नहीं बल्कि नतीजे से बेतअल्लुकी का इजहार है। इक़बाल के बारे में सरदार जाफ़री ने एक बड़ी विवेकपूर्ण बात कही है कि ‘इक़बाल को उनके वक्त ने पैदा किया लेकिन वह अपने जमाने से बड़े थे।’ मेरा खयाल है कि इस वाक्य में वह वाक्पटुता है जो इक़बाल के व्यक्तित्व और चिन्तन का परिधान धारण कर लेती है। सरदार जाफ़री ने लिखा है कि इक़बाल मुस्लिम जागरूकता (जागरण) के शायर थे। इसमें एशियाई इंसानी जागरूकता शामिल है। इक़बाल दरअसल जिस काल से सम्बन्ध रखते हैं वह सुधारात्मक विचारधारा का काल था और यह सुधार आन्दोलन अंग्रेजों की उस नीति के खिलाफ था जिसके अन्तर्गत समुदायों और तबकों में पूरा भारतीय समाज विभाजित हो गया था। इस आन्दोलन के पीछे भारतीयों के सम्पूर्ण मार्गदर्शन की कल्पना थी। उस समय के बड़े चिन्तक बात चाहे हिन्दू और मुस्लिम रूपकों में करते रहे हों लेकिन उनका उद्देश्य हिन्दुस्तानी जनता से था। इकब़ाल के क़लाम और फि़क्र का मूल्यांकन करते हएु सरदार जाफ़री ने इसी बात पर जोर दिया है कि-
    इस ऐतिहासिक परिस्थिति का असर इक़बाल की मानसिक प्रवृŸिा पर पड़ना अनिवार्य था। जिस तरह स्वामी विवेकानन्द और अरविन्द घोष के देशप्रेम में हिन्दू आत्मवाद का मिश्रण था उसी तरह इक़बाल के देश प्रेम में इस्लामी आत्मवाद का मिश्रण था, लेकिन हिन्दू और मुस्लिम रूपकों के बावजूद वह साम्प्रदायिक नहीं थे। उनके जहन अध्यात्मवाद से बुलन्द थे। इक़बाल हों या टैगोर, उनके रूपक एक आफ़ाक़ी (व्यापक) हक़ीक़त की तरफ इशारा करते हैं। इससे बहस करते हुए सरदार जाफ़री ने इक़बाल के कई अशआर पेश करके उनके मतालिब की वजाहत की है जिसमें एक शेर की वजाहत दर्ज है-हक़ीक़ते अबदी है मकामे शब्बीरी बदलते रहते हैं अन्दाज कूफी व सामी इस शेर के सिलसिले में लिखते हैं कि -
    इस शेर में सारी रिवायत (परम्परा) वाक़ए कर्बला की है जो इस्लाम की तारीख़ में सदाकत (सच्चाई) और आज़ादी के लिए सबसे बड़ी कुर्बानी है लेकिन जो बात कही गई है वह मुसलमान तक महदूद नहीं है उसको गद्य की जुबान में यूँ बयान किया जाएगा कि सबसे बड़ी हक़ीकत कभी नहीं बदलती यद्यपि डिप्लोमेसी और राजनीति नए-नए चोले बदलती रहती है।
(इक़बाल शनासी, पृ. 27)
    इक़बाल सिर्फ उर्दू के ही नहीं, दुनिया के बड़े शायरों में हैं। उनके यहाँ जो फलसफ़याना (दार्शनिक) गहराई, कायनात और इंसान की समस्याओं की जो तस्वीर और जिन्दगी और कौमों के उत्थान और पतन की जो दास्तान है वह किसी दूसरे शायर के यहाँ नहीं है। इसलिए उनके कलाम को समझने और उसकी गहराइयों तक पहुँचने के लिए उसकी अलामतों और रूपकों के अर्थों को खोलने के लिए सिर्फ शब्दकोष का ज्ञान काफी नहीं है। सरदार जाफरी ने लिखा है-
    इक़बाल के व्यक्तित्व की रचना में कश्मीरी ब्राह्मण का दिमाग, मुसलमान का दिल, कुरानेकरीम की शिक्षाएँ, पश्चिमी शास्त्रों, हिन्दू दर्शन, जलालुद्दीन रूमी और ग़ालिब की शायरी औरमार्क्स -लेनिन की क्रान्तिकारी विचारधाराओं का समावेश है।
(इक़बाली शनासी, पृ. 28)
    ऐसे व्यक्ति की शायरी की व्याख्या में ज्ञान के साथ दिल और दिल के साथ नजर की भी जरूरत है और


  सरदार जाफरी को उच्च श्रेणी का कवि और प्रगतिशील आन्दोलन के पुरस्कर्ता की हैसियत से जो ख्याति और लोकप्रियता मिली, वह एक आलोचक की हैसियत से नहीं मिली। एक आलोचक की हैसियत से अगर कोई सन्दर्भ आया भी तो उनकी किताब ‘तरक़्क़ीपसन्द अदब’ की परिचर्चा में उलझकर रह गया। वह बुनियादी तौर पर शायर थे। उन्होंने शाब्दिक अर्थों में आलोचना की हैसियत से स्वयं को व्यक्त नहीं किया यद्यपि उन्होंने जो कुछ लिखा वह बहुत से सिक्काबन्द आलोचकों के लेखों से ज्यादा मान्य है। वस्तुतः सरदार जाफ़री को बहैसियत आलोचक समझने में कठिनाई इसलिए हुई कि वह अपने गद्य लेखों में अपने काव्यात्मक व्यक्तित्व से बिल्कुल भिन्न नजर आते हैं। इसीलिए उर्दू के उन आलोचकों ने भी उनकी तरफ तवज्जो नहीं दी जो आलोचना से ज्यादा विचारधारा को रूप देने का शिकार थे।
सरदार जाफरी ने ‘इक़बाल शनासी’ में इन्हीं औजारों का प्रयोग करके काव्य आलोचना की एक नई बुनियाद रखी है।
 मोबाइल: 09839009226
  -शारिब रुदौलवी
(उर्दू से लिप्यंतरण: कु. कहकशाँ लतीफ़)

 
 लोकसंघर्ष  पत्रिका  के मार्च २०१४ में प्रकाशित

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