शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण

पष्चिम ,बंगाल   चुनाव आयोग, हाईकोर्ट और 70 हजार पुलिसबलों की सक्रियता के बावजूद पंचायत चुनावों में हिंसा अबाध गति से जारी रही। राजनीति का इस प्रक्रिया में रूपान्तरण हो गया है। दलीय विचारधारा के बजाय बम की विचारधारा के आधार पर चीजें नियंत्रित की जा रही हैं।  लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाएँ असहाय और मूकदर्षक बनी हुई हैं। मानवाधिकार आयोग के आदेषों की राज्य सरकार सीधे अवहेलना कर रही है। 
       भारत के विभिन्न राज्य लोकतंत्र के अपराधीकरण और कारपोरेट लूट से परेश।न हैं लेकिन पष्चिम बंगाल में तो लोकतंत्र ही हिंसक हो उठा है, लोकतांत्रिक राजनैतिक दल हिंसक हो उठे हैं। लोकतंत्र में पहले यदा-कदा हिंसा होती थी लेकिन इन दिनों हिंसा का ताण्डव रोजमर्रा की बात है। 
     लोकतंत्र को हिंसक लोकतंत्र में तब्दील करने में वामदलों की अग्रणी भूमिका रही है। वामदलों ने अपने विरोधियों से निबटने और वाम विरोधियों ने भी वाम दलों से निबटने का पष्चिम बंगाल में जो रास्ता चुना है उसमें हिंसा और हिंसक गिरोह महत्वपूर्ण कारक तत्व हैं। इसके कारण प्रतिस्पर्धी हिंसा का दैनंदिन ताण्डव चल रहा है। आमतौर पर भारत के विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग बंगाली समाज को शांत-सुसभ्य समाज के रूप में जानते हैं लेकिन हिंसक लोकतंत्र का जो रूप यहाँ निर्मित हो रहा है वह समूचे देष के लिए अपषकुन है। यह बंगासी समाज की प्रचलित धारणाओं का विलोम रच रहा है। असल में हिंसक लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य को समझे बिना हाल ही में संपन्न पंचायतों के चुनाव और उसके परिणाम समझ में नहीं आ सकते।
    सामान्यतौर पर भारत के किसी भी राज्य में हिंसा व्यापक फिनोमिना कभी नहीं रही। लेकिन पष्चिम बंगाल में हिंसा फिलहाल जिस गति और शक्ति के साथ पैर जमा चुकी है उसके किसी तरह थमने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। हाल में संपन्न त्रिस्तरीय पंचायतों के चुनावों में चुनाव आयोग और कलकत्ता उच्चन्यायालय को निष्प्रभावी देखा गया। शासकदल तृणमूल कांग्रेस ने इन दोनों संवैधानिक संस्थाओं के आदेषों का निचले स्तर पर सचेत ढंग से उल्लंघन किया। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने शासकदल की मोटरसाइकिल रैलियों को अवैध घोषित कर दिया था लेकिन इसके बाबजूद ये रैलियाँ हर कस्बे और गाँव में निकाली गईं, इन रैलियों में इलाके के गुंडे-बदमाष हथियारबंद होकर शामिल हुए और स्थानीय लोगों में दहषत फैलाने का काम किया। कालांतर में चुनाव आयोग ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में षिकायत की थी, उस पर अदालत ने भी आदेष दिया लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने नहीं माना। अपराधियों का तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में इस तरह का खुला प्रदर्षन प0बंगाल के लिए नई घटना थी। पहले यह लोग पर्दे के पीछे रहकर समर्थन करते थे लेकिन ममता सरकार आने के बाद से उनकी सार्वजनिक मंचों, जलसों, ऑफिसों, रैलियों आदि में मौजूदगी बढ़ गई है। मोटरसाइकिल ब्रिगेड के नाम इन बदमाषों ने बाइकवाहिनी बनाई थी जिसका मुख्य काम था राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंक पैदा करके रखना। इन बदमाषों पर नियंत्रण के लिए चुनाव आयोग ने इनकी बाइक रैलियों पर पाबंदी लगाई, लेकिन उसका तृणमूल कांग्रेस ने पालन ही नहीं किया।
      इसी तरह अदालत ने राज्य सरकार को आदेष दिया कि चुनाव आयोग जितना पुलिसबल माँग रहा है उतना पुलिसबल दिया जाए और जिस दिन से तैनाती के लिए कह रहा है पुलिसबलों को तैनात कर दिया जाए लेकिन निचले स्तर पर अधिकांष इलाकों में नामांकन के समय पुलिसबल तैनात ही नहीं हो पाए क्योंकि चुनाव आयोग और राज्य सरकार का सुप्रीम कोर्ट में विवाद चल रहा था। फलतः  तृणमूल कांग्रेस ने विरोधी उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। इसका परिणाम यह निकला कि साढ़े छह हजार से ज्यादा तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बिना किसी प्रतिद्वंद्विता के ही पंचायतों के लिए चुन लिए गए। अदालत के आदेष के बावजूद निचले स्तर पर नामांकन पत्र दाखिल करने की तिथि तक उम्मीदवारों को सुरक्षा का माहौल प्रदान करने में चुनाव आयोग असफल रहा। चुनाव आयोग को राज्य सरकार ने मुकदमेबाजी में इस कदर उलझा दिया कि चुनाव प्रबंधन का काम गौण होकर रह गया।
      इस बार चुनाव आयोग के समस्त आदेषों की सत्तारूढ़ दल ने सचेत ढंग से अवहेलना की। तृणमूल कांग्रेस के विरोध में जो उम्मीदवार किसी तरह नामांकन पत्र दाखिल करने में सफल रहे उनमें से अधिकांष को डराने-धमकाने का अनवरत सिलसिला चलता रहा। तृणमूल कांग्रेस के अनेक स्थानीय नेताओं और मंत्रियों ने
विरोधी उम्मीदवारों के घर तक जलाए जाने का पब्लिक मीटिंग में आह्वान कर डाला और इसके बाद तो विरोधी उम्मीदवारों के घरों पर हमले तेज हो गए। तृणमूल कांग्रेस के हमलों में 50 से ज्यादा लोग चुनाव अभियान के दौरान मारे गए हैं इनमें से
अधिकांष वाम कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा सैकड़ों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हिंसा का आलम यह था कि चुनाव प्रचार के दौरान तकरीबन हर इलाके में हिंसा की घटना हुई।
       चुनाव से पहले आधे से ज्यादा पंचायत बूथों को चुनाव आयोग ने अतिसंवेदनषील घोषित कर दिया था इसके बावजूद चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने में चुनाव आयोग असफल रहा। तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने बूथ कैप्चरिंग में नया रिकॉर्ड बनाया, पहले बूथ लूटे गए और सैकड़ों मतदान केन्द्रों से वामदलों और कांग्रेस के प्रतिनिधियों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया। बाद में मतगणना के समय दोबारा  हिंसा और लूट हुई और मतगणना के लिए नियत वाम प्रतिनिधियों को बड़ी संख्या में गणनाकेन्द्रों के बाहर कर दिया गया और चुनाव आयोग के लोग असहाय देखते रहे। चुनाव आयोग के लोगों ने इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कोई सख्त कदम तक नहीं उठाए।
    पष्चिम बंगाल के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में उन इलाकों में तृणमूल कांग्रेस बड़ी संख्या में सीटें जीतने में सफल रही है जहाँ पर आतंक ज्यादा फैलाया गया और हिंसा ज्यादा हुई। उन इलाकों में उसका प्रदर्षन खराब या कम अच्छा रहा है जहाँ हिंसा कम हुई थी या नहीं हुई थी। मतगणना के समय गणनाकेन्द्रों पर मतपत्र छीनने और वाम प्रतिनिधियों को गणना केन्द्रों से खदेड़कर बाहर करने की अधिकांष घटनाएँ हावडा, वर्धमान, हुगली और उत्तर 24 परगना में हुईं।
    तृणमूल कांग्रेस को 13 जिला परिषदों में जीत हासिल हुई। वाममोर्चे को जलपाईगुड़ी जिला परिषद में जीत हासिल हुई, वहाँ पर उसने 37 में से 23 सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में वाम ने 26 में से 13 सीट जीतीं, कांग्रेस ने 6 और तृणमूल कांग्रेस ने 5 सीट जीतीं। इस जिला परिषद को पहले कांग्रेस संचालित करती थी। मालदा में वाम ने 16, कांग्रेस ने 16 और तृणमूल कांग्रेस ने 6 सीट जीतीं। मुर्षिदाबाद जिला परिषद पर कांग्रेस का कब्जा हुआ, उसने 70 में से 42 सीटों पर जीत दर्ज की। नदिया में वाम ने 21 और तृणमूल कांग्रेस ने 25 सीटें हासिल कीं। पंचायत समितियों के चुनाव में वाममोर्चा ने जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, मालदा, मुर्षिदाबाद और नदिया की अधिकांष समितियों में जीत दर्ज की। राज्य के कुल 330 ब्लॉक में वाममोर्चा को 68, तृणमूल कांग्रेस को 219, कांग्रेस को 20 ब्लॉक में सफलता मिली। जबकि 20 ब्लॉक अनिष्चित नेतृत्व की अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस ने ब्लॉकस्तर पर 870 सीटें बिना किसी मुकाबले के ही जीत ली थीं, इन सीटों पर उसने विपक्षी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं करने दिया। मुर्षिदाबाद में वाममोर्चा ने 15 ब्लॉक समितियों में से अधिकांष पर जीत हासिल की। नदिया में 9 पंचायत समितियों में जीत हासिल की। उत्तर 24 परगना में सन् 2008 में वाम मोर्चा ने 4 पंचायत समितियों में चुनाव जीता था लेकिन इस बार के चुनाव में उसे 7 पंचायत समितियों में विजय मिली है। यह सब व्यापक आतंक के बावजूद हुआ है।
    ग्राम पंचायत स्तर के चुनावों में 3215 ग्राम पंचायत समितियों में वाममोर्चे को 749 ग्राम पंचायतों में विजय हासिल हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने 1812, कांग्रेस ने 240 और 393 ग्राम पंचायतें हंग यानी अर्निणीत अवस्था में हैं। उल्लेखनीय है कि ग्राम पंचायत समिति के चुनावों में सत्तारूढ दल ने बड़े पैमाने पर नामांकन पत्र ही दाखिल नहीं होने दिए इसके कारण तृणमूल कांग्रेस ने बिना चुनाव लड़े ही 5336 सीटें जीत लीं। असल संख्या इससे ज्यादा हो सकती है क्योंकि अनेक स्थानों पर उसने डमी या बोगस उम्मीदवार खड़े किए थे।
    मुर्षिदाबाद में  वाममोर्चे ने 102 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की, तृणमूल कांग्रेस ने 8, उत्तर 24 परगना में वाम ने 47 ग्राम पंचायतें 2008 में जीती थीं इस बार यह संख्या बढ़कर 60 हो गई है। दक्षिण 24 परगना में 94 और जलपाईगुड़ी में 58 ग्राम पंचायत समितियों में वाम विजयी रहा है। यहाँ तक कि पूर्वी मिदनापुर में, जो तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, वहाँ पर वाम मोर्चे ने 43 ग्राम पंचायतों में जीत दर्ज की है। नदिया में वाम ने 51 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल की है और 48 में नेतृत्व अनिष्चित है, यानी हंग की अवस्था है। सत्तारूढ़ दल के नियोजित आतंक के बावजूद कुल मिलाकर 9000  वाम उम्मीदवार त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में विजयी रहे हैं और यह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। इस प्रसंग में वामदलों और खासकर मा.क.पा. के सामने यह चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक दुर्बलताओं और भूलों को जल्दी से दुरुस्त करे। मा.क.पा. जितनी जल्दी अपनी कमियों को दूर करेगी उतनी ही जल्दी आम जनता का विष्वास अर्जित करने में मदद मिलेगी।
       बंगाल में लोकतंत्र का हिंसक लोकतंत्र में रूपान्तरण हो चुका है। यह लोकतंत्र के अपराधीकरण से आगे की अवस्था है। पंचायतों के चुनाव परिणाम आ गए हैं। विभिन्न इलाकों में पंचायतों का गठन भी हो चुका है, लेकिन गाँवों और कस्बों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। चुनाव से पहले हिंसा और चुनाव के बाद हिंसा यह इस राज्य के लोकतंत्र का सामान्य चरित्र है। हिंसा के बिना लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चुनावों की परिकल्पना एकदम असंभव है।
 -जगदीश्‍वर चतुर्वेदी          
मोबाइल: 09331762360

कोई टिप्पणी नहीं: