गुरुवार, 6 सितंबर 2012

लोकतंत्र

क्या यही हमारा लोकतंत्र ?
क्या यही हमारी सत्ता है ?
वे सोच रहे, क्या-क्या खाएं,
हमको न जूठा पत्ता है ।।1।।

हैं चोर-लुटेरे महलों में,
हमको न टूटी छानी है।
देखो-देखो दुनिया वालों,
भारत की अजब कहानी है ।।2।।

धर्म-अधर्म के बीच खिंची,
अब नहीं रह गयी रेखा है।
गिरगिट जैसा रंग बदलते,
नेताओं को देखा है ।।3।।

नाम, दान, स्नान तुम्हारा ,
लटका, झटका, टटका है।
मंजिल कैसे मिल पायेगी 
जब 'पथिक' ही पथ का भटका है ।।4।।

-गुरु प्रसाद सिंह मृगेश


बी .एल . यादव "पथिक"
ग्राम व पोस्ट- बडेल 
जिला- बाराबंकी 
मो- 9795180883

4 टिप्‍पणियां:

विजय राज बली माथुर ने कहा…

सराहनीय एवं दिग्दर्शक विचार।

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बढ़िया भाव |

Vinay Prajapati ने कहा…

:)

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हिंदी टायपिंग टूल हमेशा रखें कमेंट बॉक्स के पास

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (08-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!