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शुक्रवार, 1 मई 2015

भविष्य के भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों की आबादी

प्यू रिसर्च सेंटर की हालिया ;2 अप्रैल 2015 की रपट में आने वाले वर्षों में भारत की आबादी के संबंध में कुछ पूर्वानुमान दिये गये हैं। रपट के अनुसार, सन् 2050 तक भारत में हिंदुओं की आबादी, वर्तमान 79.5 प्रतिशत से घटकर 76.7 प्रतिशत रह जायेगी जबकि मुसलमानों की आबादी, 18 प्रतिशत के करीब हो जाएगी। सन् 2050 में भारतीय मुसलमानों की संख्या, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में उनकी आबादी से ज्यादा हो जाएगी। इस पूर्वानुमान से व्यथित साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को यह सलाह दी है कि वे कम से कम चालीस बच्चे पैदा करें जबकि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज की चाहत है कि हर हिंदू महिला कम से कम चार बच्चों की मां हो। समय.समय पर दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों के नेता, हिंदू महिलाओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर 'राष्ट्रसेवा' करने की सलाह देते रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो स्वयं 'ब्रह्मचारी' हैं।
अगर हम इन पूर्वानुमानों को सही मानें तो हमें यह विचार करना होगा कि भारत की मुस्लिम आबादी में हिंदुओं की तुलना में, अधिक तेजी से बढ़ोत्तरी क्यों हो रही है। क्या इसका कारण इस्लाम है ? अगर इस्लाम के कारण भारत की मुस्लिम आबादी बढ़ रही है तो फिर पाकिस्तान और इंडोनेशिया, जिनकी मुस्लिम आबादी अभी भारत की मुस्लिम आबादी से अधिक है, में भी इस समुदाय की आबादी उतनी ही तेजी से बढ़नी चाहिए जितनी कि भारत में। जबकि भारतीय मुसलमानों की आबादी, अन्य देशों की मुस्लिम आबादी की तुलना में अधिक तेजी से ब़ढ़ रही है। जाहिर है कि इस्लाम इसका कारण नहीं हो सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो 2050 में भी पाकिस्तान और इंडोनेशिया में भारत की तुलना में अधिक संख्या में मुसलमान होते। इससे यह साफ हो जाता है कि आबादी में बढ़ोत्तरी का संबंध धर्म से नहीं है। भारत में भी देश के अलग.अलग क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि दर अलग.अलग है। उदाहरणार्थ, केरल के मलाबार तट और उत्तरप्रदेश.बिहार क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि दरों में भारी अंतर है। हिंसाग्रस्त कश्मीर घाटी में पिछले दशक में हिंदू आबादी की वृद्धि दर,मुस्लिम आबादी से अधिक रही है।
दूसरा तर्क यह है कि मुसलमान, परिवार नियोजन के साधन नहीं अपनाते क्योंकि उनका धर्म इसका निषेध करता है। अपनी पुस्तक'फैमिली प्लानिंग एंड लीगेसी ऑफ इस्लाम' ;परिवार नियोजन और इस्लाम की विरासत में काहिरा के इस्लामिक विद्वान ए आर ओमरान इस मिथक का जोरदार खंडन करते हैं कि इस्लाम, परिवार नियोजन के विरूद्ध है। उनके अनुसारए कुरान में गर्भधारण रोकने के उपायों पर प्रतिबंध की बात कहीं नहीं कही गई है। तुर्की व इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों मेंए परिवार नियोजन के विभिन्न तरीके काफी लोकप्रिय हैं। उदाहरणार्थ, तुर्की में प्रजनन.योग्य दंपत्तियों में से 63 प्रतिशत परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं और इंडोनेशिया के मामले में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत है। भारत में प्रजनन.योग्य आयु वर्ग के ऐसे मुस्लिम दपंत्तियों, जो परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं, का प्रतिशत 1970 में 9 ;हिंदू 14 प्रतिशत और 1980 में 22.5 प्रतिशत ;हिंदू 36.1 प्रतिशत था। ये आंकड़े सन् 1985 में बड़ौदा स्थित ओपरेशन रिसर्च ग्रुप द्वारा किए गए सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इनसे यह स्पष्ट है कि हिंदुओं की तरह,मुसलमान दंपत्तियों में भी परिवार नियोजन के साधन अपनाने वालों की संख्या व प्रतिशत लगभग बराबर गति से बढ़ रहे हैं। 
डॉ. राकेश बसंत आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ाते हैं और अर्थशास्त्री हैं। वे सच्चर समिति के सदस्य भी थे। उनका कहना है कि 'वर्तमान में मुसलमानों की प्रजनन दर, देश की औसत प्रजनन दर से केवल 0.7 अधिक है। जहां औसत प्रजनन दर 2.9 है वहीं मुसलमानों के मामले में यह 3.6 है।' वे कहते हैं कि देश के 37 प्रतिशत मुसलमान गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करते हैं जबकि भारत की आबादी में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने वालों का औसत 48 प्रतिशत है। इस प्रकार, गर्भ.निरोधकों के इस्तेमाल के मामले में मुसलमान,औसत से लगभग 10 प्रतिशत नीचे हैं। परंतु इसमें भी क्षेत्रीय विभिन्नताएं हैं। उनकी रपट के अनुसार, शिक्षा और सामाजिक.आर्थिक विकास के साथए गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल बढ़ता जाता है और यह सभी समुदायों के बारे में सही है।
फिर आखिर क्या कारण है कि देश की मुस्लिम आबादी, हिंदुओं की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। आइए,हम हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर में क्षेत्रीय विभिन्नताओं पर नजर डालें। मोटे तौर पर उन दक्षिणी राज्यों में, जहां साक्षारता की दर अधिक है जैसे तमिलनाडुए कर्नाटक और केरल, हिंदू आबादी में वृद्धि की दर, उत्तरी राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से कहीं कम है। भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान अपने समुदायों की बस्तियों में रहते हैं और उनकी आमदनी औसत से कम है। जैसा कि सच्चर समिति की रपट से स्पष्ट है,मुसलमानों के साथ रोजगार और व्यवसाय के अवसरों के मामले में भेदभाव किया जाता है। नतीजा यह है कि उनकी आर्थिक स्थिति या तो स्थिर है या गिर रही है। जहां एक ओर पूरा देश आर्थिक दृष्टि से संपन्न बन रहा है वहीं मुसलमानों के मामले में स्थिति उलट है।
इस असमानता व भेदभाव के अतिरिक्तए मुसलमान सांप्रदायिक हिंसा का शिकार भी बन रहे हैं जिसके कारण उनमें असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है और वे अपने समुदाय की बस्तियों में सिमट रहे हैं। इन सब कारणों से मुसलमान पुरातनपंथी मौलानाओं के प्रभाव में आ रहे हैं, जो उनसे यह कहते हैं कि इस्लाम,परिवार नियोजन के खिलाफ है।
भारतीय मुसलमानों का बड़ा तबका धर्मांतरित अछूत शूद्रों का है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही बहुत खराब थी। इसके अतिरिक्त, उनकी बेहतरी के लिए सरकारें कुछ खास नहीं कर रही हैं। नतीजा यह है कि इस समुदाय के कम पढ़े.लिखे वर्ग में ज्यादा बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी में कमी आई है परंतु इसके एकदम अलग कारण हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू बड़ी संख्या में भारत में बस गए हैं और यह क्रम अभी भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी बहुत ही कम है और वहां उनका उत्पीड़न भी किया जाता है। इसलिए भारत के मुसलमानों और पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं की तुलना नहीं की जा सकती। वैसे तो,पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिकता की समस्या है और भारत के धार्मिक बहुसंख्यक, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हैं और उत्पीड़न व अत्याचार के शिकार हैं।
जब मैं आईआईटी मुंबई में पढ़ाता था तब मैंने स्वयं यह देखा था कि चपरासियों और मेहतरों की तुलना में प्रोफेसरों के बच्चों की संख्या कम होती थी। इसी तरह,मुंबई में जो परिवार झुग्गी बस्तियों में रहते हैं.चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों.उनके तुलनात्मक रूप से अधिक बच्चे होते हैं। अतः यह साफ है कि किसी दंपत्ति के कितने बच्चे हैं या होंगे, यह उसके धर्म पर नहीं बल्कि उसकी सामाजिक.आर्थिक.शैक्षणिक हैसियत पर निर्भर करता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के अलग.अलग देशों में स्थितियां अलग.अलग हैं और उनका परस्पर तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि वंचित समुदायों के प्रति हम सहानुभूति और सद्भाव रखें और आबादी में वृद्धि की समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में समझें और उसके उचित निदान के लिए कार्य करें।
-राम पुनियानी

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

क्या मोदी मध्यमार्गीय बन गए हैं?

दि इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख ;मोदी द मोडरेट   में आशुतोश वासर वार्ष्णेय लिखते हैं,मोदी की शैली भले ही वाजपेयी जैसी न हो परंतु कुल मिलाकर,पिछले कुछ महीनों मेंए उनके चुनाव अभियान के दौरान, वे वाजपेयी की लीक के नेता ही नजर आते हैं। अपने दावे के समर्थन में वार्ष्णेय लिखते हैं कि मोदी ने अपने एक चुनावी भाषण में मौलाना आजाद को श्रृद्धांजलि अर्पित की,उन्होंने दलित पार्टियों के साथ गठबंधन किया,जिनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो उनके खिलाफ बोलते रहे हैं और उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि गुजरात का हज कोटा पूरा भर जाता है जबकि बिहार और उत्तरप्रदेश में ऐसा नहीं होता क्योंकि गुजरात के मुसलमानों की तुलना में, बिहार और उत्तरप्रदेश के मुसलमान पिछड़े हुए हैं। वार्ष्णेय का यह दावा है कि उक्त तीनों उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि मोदी पूरी तौर पर न सहीए परंतु काफी हद तक, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से हट गए हैं। यहां पर दो प्रश्न हैं। पहला यह कि क्या उक्त तीनों उदाहरणों से ऐसा जाहिर होता है कि मोदी उग्र हिंदू राष्ट्रवादी नहीं रह गए हैं। और दूसरे, अगर ऐसा है, तो क्या यह केवल चुनावी रणनीति है या मोदी की विचारधारा में सचमुच परिवर्तन आया है।
उदारवादियों के एक तबके को उम्मीद है कि भारत जैसे विभिन्नताओं से भरे देश का शासन चलाने की जिम्मेदारी उठाने वाली किसी भी दक्षिणपंथी पार्टी के लिए अपने तेवर नरम करना आवश्यक होगा और उसे मजबूरी में मध्यमार्गी पार्टी बनना होगा। वार्ष्णेय के कहने का अर्थ यह है कि गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरियों के चलते,वाजपेयी और भाजपा को मध्यमार्गी नीतियां अपनानी पड़ीं और ऐसा ही मोदी को करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि ऐसी आशा करना व्यर्थ है क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवादी, राज्य को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जिसका इस्तेमाल भारत और हिन्दुओं को एकसार राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित करने के लिए किया जा सकता है। शनैः शनैः देश की सांस्कृतिक विविधता को समाप्त कर दिया जाएगा, उदारवादी, प्रजातांत्रिक मूल्यों से किनारा कर लिया जायेगा और अंततः देश, हिन्दू राष्ट्र में बदल जाएगा जो कि एक एकाधिकारवादी.सांस्कृतिक राज्य होगा। भारतीय समाज,विविधताओं से परिपूर्ण है। जातिगतए धार्मिक, नस्लीय, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताएं इतनी अधिक हैं कि समाज को पुनर्गठित करने के लिए यह आवश्यक होगा कि लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। इसके लिए, शैक्षणिक संस्थानों,संचार माध्यमों और नौकरशाही व सरकारी तंत्र, विशेषकर पुलिस, का इस्तेमाल किया जाए। जो भी दल सत्ता में रहता है उसका इन तीनों ही संस्थाओं पर जबरदस्त प्रभाव व नियंत्रण रहता है।
मीडिया और शैक्षणिक संस्थाओं का इस्तेमाल समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने के लिए किया जाता है। दूसरी ओरए विविधता के प्रति असहिष्णुता विकसित की जाती है व सुरक्षाबलों और गुंडा ब्रिगेडों का इस्तेमाल उन समूहों या समुदायों के विरूद्ध किया जाता है जो कि अपनी विविधता बरकरार रखने का साहस या इरादा प्रदर्षित करते हैं। जाहिर है कि इस रणनीति का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक समुदाय बनता है। उसके विरूद्ध हिंसा में बढोत्तरी होती है क्योंकि उसकी ओर से उसके विशिष्ट पारिवारिक कानूनों, खानपान की आदतों, त्योहार मनाने के तरीकों आदि में हस्तक्षेप का विरोध होता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों की विविधता पर अलगाववादी मानसिकता का लेबल चस्पा कर दिया जाता है और यह कहा जाता है कि वे 'हिन्दू राष्ट्र' की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। मृदु शक्ति ;मीडिया व शैक्षणिक संस्थान; व कठोर शक्ति ;सुरक्षाबल व नौकरशाही का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जाता है। उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे ढेर सारे बच्चे पैदा कर अपने संख्याबल में वृद्धि कर रहे हैं। यह कहा जाता है कि वे बंग्लादेशी घुसपैठिये हैं, आतंकवादी हैं,मंदिरों का ध्वंस करने वाले हैं और हिन्दू संस्कृति को नष्ट कर देना चाहते हैं। यह भी आरोप लगाया जाता है कि देश के मुस्लिम शासकों ने जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाया था। मृदु शक्ति व कठोर शक्ति के द्वारा अल्पसंख्यकों की वर्तमान पीढ़ी से, उसके पूर्वजों द्वारा किए गए कथित अपराधों का बदला लेने को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जाता है।
परंतु राज्य द्वारा पूरे समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने का विरोधए अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ही नहीं होता। समाज के कई दूसरे वर्ग, जैसे निम्न व मध्यम जातियां, पिछड़े इलाकों के रहवासी, महिलाएं, आदिवासी,लैंगिक अल्पसंख्यक व अन्य कई वर्ग भी इसके विरोध करते हैं।

वाजपेयी की राजनैतिक मजबूरियां
गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी के चलते, वाजपेयी के शासनकाल में भाजपा ने यह बेहतर समझा कि वह ऐसे मुद्दों को न उठाए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय मुद्दे रहे हैं जैसे समान आचार संहिता,बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण और जम्मू कश्मीर को कुछ हद तक स्वायत्तता देने वाले संविधान के अनुच्छेद ३७० की समाप्ति। अगर भाजपा ने वाजपेयी शासन के दौरान अपने इस विघटनकारी एजेण्डे को लागू नहीं किया तो इसका कारण यह नहीं था कि उसकी राजनैतिक सोच में कुछ परिवर्तन आ गया था बल्कि इसका कारण यह था कि उसके पास इन कदमों को उठाने के लिए संसद में आवसश्यक बहुमत नहीं था। परंतु फिर भी, राज्य ने समाज को एकसार बनाने के अपनी परियोजना पर जमकर काम किया।
मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में मुरली मनोहर जोशी ने जे.एस. राजपूत को एनसीईआरटी का निदेशक नियुक्त किया। उन्होंने कई प्रतिष्ठित इतिहासविदों द्वारा लिखी पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया और इतिहास की किताबों का साम्प्रदायिकीकरण किया, उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवादियों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया और अनुदान के मामले में भेदभाव किया। जोशी ने विश्वविद्यालय स्तर पर ज्योतिष को एक विषय के रूप में शामिल किया और हिन्दू पंडितों को प्रशिक्षित करने के लिए पाठ्यक्रम विकसित करवाए। गुजरात ;व राजस्थान, जहां वसुन्धराराजे सिंधिया मुख्यमंत्री थीं में पाठ्यपुस्तकों में हिटलर की सरकार का गुणगान किया जाने लगा। इन पुस्तकों में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम की चर्चा तक नहीं की गई। वाजपेयी की सरकार के दौरान ही २००२ के गुजरात दंगे हुए और वाजपेयी ने दंगों के लिए मोदी द्वारा दिये गये
क्रिया.प्रतिक्रिया स्पष्टीकरण को अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराते हुए पूछाए परंतु गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस.६ कोच में आग किसने लगाई थी?
वाजपेयी सरकार के दौरान ही सन् १९९८ में गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिलों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में तेजी से बढोतरी हुई। इसकी प्रतिक्रिया में न तो सरकार ने पीडि़तों को मुआवजा दिया और ना ही दोषियों को सजा दिलवाने की कोशिश की। उलटे, वाजपेयी ने यह मांग की कि धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। जब भी भाजपा सत्ता में रहती है, हिन्दू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की हिम्मत बढ़ जाती है, उन्हें शासन से प्रोत्साहन मिलता है और राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल करने की पूरी छूट भी। कानून उन्हें छू भी नहीं पाता। खण्डवा में प्रोफेसर एस एस ठाकुर पर कथित एबीव्हीपी कार्यकर्ताओं ने हमला किया। साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर की मालेगांव में सन् २००८ में हुए धमाकों में संलिप्तता सामने आई। इसी तरह की अनेक घटनाएं देश के विभिन्न भागोंए विशेषकर भाजपा शासित प्रदेशों में हुईं। नौकरशाही में हिन्दू राष्ट्रवादियों की बडे पैमाने पर भर्ती की गई और उन्हें ऐसे पदों पर पदस्थ किया गया जिससे वे भाजपा के मूल एजेण्डे को लागू कर सकें।
हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूरी?
बंबई हाईकोर्ट के समक्ष कई चुनाव याचिकाएं दायर की गईं थीं जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि शिवसेना और भाजपा उम्मीदवारों ने महाराष्ट्र विधानसभा के सन् १९९५ के चुनाव में धर्म के नाम पर वोट मांगे और विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता उत्पन्न करने के प्रयास किए। इन आरोपों को हाईकोर्ट ने सही ठहराया। इसके बादए साम्प्रदायिक पार्टियों ने चुनाव के दौरान खुलकर धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद कर दिया। परंतु किसी पार्टी के असली चरित्र को सिर्फ इस आधार पर आंकना उचित न होगा कि वह चुनाव प्रचार के दौरान किन मुद्दों का इस्तेमाल करती है। अब ये पार्टियां दबे.छुपे ढंग से अपने साम्प्रदायिक संदेश को लोगों तक पहुंचाती हैं। सार्वजनिक तौर पर इन पार्टियों के उम्मीदवार व पदाधिकारी, धर्मनिरपेक्षता की बात करते नजर आते हैं परंतु इन पार्टियों से जुड़े संगठन समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के अपने एजेण्डे पर काम करते रहते हैं। भाजपा के उत्तरप्रदेश प्रभारी अमित शाह, अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर गए और मीडिया के जरिये उन्होंने लोगों तक यह बात पहुंचाई कि उन्होंने वहां प्रार्थना की कि उस स्थल पर एक भव्य रामजन्मभूमि मंदिर बने। विहिप ने उत्तरप्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से चैरासीकोसी परिक्रमा निकालने की कोशिश की। जब यह नहीं हो सका तब जाट महापंचायत का आयोजन किया गया और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई। न तो मोदी और ना ही उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने इन गतिविधियों की निंदा की। क्या फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूर हो गये हैं? मोदी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वयं कहा कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं इस कारण वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। अगर केवल हिन्दू राष्ट्रवाद के सहारे भाजपा सत्ता में आ सकती होती तो वह केवल इसी का इस्तेमाल करती। हिन्दू राष्ट्रवाद, भाजपा की मूल विचारधारा है और वह इसका इस्तेमाल उन लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए किया जाता है जो कि कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं। इसके साथ.साथए भाजपा और आरएसएस के अन्य अनुषांगिक संगठन अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी काम करते रहते हैं। चुनाव के दौरान केवल हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा पर जोर देने से काम नहीं चलता। इसलिए इस विचारधारा को त्यागे बगैर, ये संगठन समाज के अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए कांग्रेस.विरोध, पाकिस्तान के प्रति आक्रामक तेवर व ३५ प्रतिशत युवा उम्मीदवारों को आकर्षित करने के लिए विकास की बातें करते हैं।
भाजपा के कांग्रेस विरोध का उद्देश्य प्रजातंत्र व प्रजातांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देना और राज्य को अधिक जवाबदेह बनाना नहीं है। भाजपा का कांग्रेस विरोध दो मुद्दों पर आधारित है पार्टी के अध्यक्ष के इटेलियन मूल का होने का मुद्दा ;गांधी परिवार पर इसलिए हमला किया जाता है क्योंकि वह पार्टी को एक रखे हुए है व उन कार्यक्रमों का विरोध,जो अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए चलाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों को पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण बताती है। सच तो यह है कि भाजपा का कांग्रेस विरोध भी उसके हिन्दू राष्ट्रवादी चरित्र का उदाहरण है। पाकिस्तान के खिलाफ विषवमन भी भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवादी राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा कर हिन्दू राष्ट्रवादी, मुसलमानों को आईएसआई का एजेण्ट निरूपित करना चाहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर जो पहला चुनाव मोदी ने लड़ा था वह मियां मुशर्रफ के खिलाफ था!
विज्ञापनों के जरिए भाजपा सरकारों द्वारा किए गए विकास कार्यों का ढोल बजाया जा रहा है। सच यह है कि इस तथाकथित विकास से केवल पूंजीपति और कारपोरेट संस्थान लाभांवित हुए हैं। उनके मुनाफे में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इस विकास से हाशिए पर पड़े समूहों विशेषकर किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों को कोई लाभ नहीं मिला है। विकास के फल का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुंचा है। इसलिए अगर ये पार्टियां चुनाव के दौरान हिंदु राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे के अलावा अन्य मुद्दों पर भी बात करती हैं तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे को त्याग दिया है। उनका मूल चरित्र वही है और वही रहेगा।   
आरएसएस व मोदी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के राजतिलक का भाजपा के सबसे सम्मानित नेता एल के आडवाणी ने विरोध किया था। सुषमा स्वराज, शत्रुध्न सिन्हा व यशवंत सिन्हा ने भी उस बैठक में भाग नहीं लिया था जिसमें मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में आडवाणी, राजनाथ सिंह व अन्य नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय गए और उन्हें मोदी को स्वीकार करना पड़ा। मोदी केवल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। वे आरएसएस के भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आरएसएसए हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। यह मानना भूल होगी कि आरएसएस ने मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन इसलिए किया ताकि वे हिन्दू राष्ट्रवाद की राह से हट सकें। आरएसएस ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं को मोदी के समर्थन में प्रचार अभियान में झोंक दिया है। अगर मोदी हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे से जरा भी हटेंगे तो आरएसएस तुरंत अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रचार अभियान से हटा लेगी। मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे पर कायम हैं, यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि उन्होंने सन् २००२ के दंगों के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया है।
-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

चुनावी समीकरण और धर्मनिरपेक्ष मूल्य

उत्तरप्रदेश में फरवरी 2012 में हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। चुनाव परिणाम आने के पहले तक कांग्रेस यह दावा कर रही थी कि नतीजे विस्मयकारी होंगे अर्थात कांग्रेस का प्रदशर्न आशातीत रहेगा। नतीजों से यह साफ हो गया कि न तो कांग्रेस के दावों में कुछ दम था और न ही उसकी अपेक्षाएं यर्थाथपूर्ण थीं। चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी के नेतृत्व में उत्तरप्रदेश के कांग्रेस नेताओं ने जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया। मुसलमानों को आरक्षण का लालच दिया गया और बाटला हाऊस मुठभेड़ पर श्रीमती सोनिया गांधी के आंसुओं का विशद विवरण सुनाया गया। अब यह साफ है कि इन सबका मुस्लिम मतदाताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। अभी कुछ वषोर्ं पहले तक कांग्रेस के मुसलमानों ेजिसे पार्टी के विरोधी मुस्लिम वोट बैंक भी कहते हैंसे काफी सौहार्दपूर्ण संबंध थे। यह समझा जाता था कि चूंकि मुसलमान साम्प्रदायिक भाजपा का साथ नहीं दे सकते इसलिए उनके पास धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस का समर्थन करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
आईए, हम स्थिति का यर्थाथपरक विश्लेषण करें। यह सही है कि मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा यह अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए भाजपा को मत देने का विकल्प उपलब्ध ही नहीं है। भाजपा साम्प्रदायिक राजनीति की प्रतीक है और आरएसएस की राजनैतिक शाखा है। आरएसएस अपने परिवार की विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसी अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के अपने एजेन्डे पर काम कर रहा है। जहां तक साम्प्रदायिक हिंसा का सवाल है, सन 1984 के सिक्खविरोधी दंगों के दौरान कांग्रेस की भूमिका अत्यंत निंदनीय थी। मुसलमानों के कत्लओम और मुस्लिमविरोधी साम्प्रदायिक दंगों की भी कांग्रेस मूकदशर्क बनी रही। कांग्रेस ने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिए कभी कुछ नहीं किया तब भी नहीं जब वह सत्ताधारी गठबंधन में शामिल थी या अकेले सत्ता में थी। सन 1992-93 के मुंबई दंगों के पीड़ितों को नजरअंदाज करना और उन्हें हाशिए पर पटक देना कांग्रेस की इस कुत्सित प्रवॢत्ति के उदाहरण हैं। मक्का मस्जिद, मालेगांव, अजमेर, समझौता एक्सप्रेस आदि आतंकी हमलों के बाद कांग्रेसशासित राज्यों की सरकारों ने निर्दोष मुस्लिम युवकों को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन नौजवानों को गिरफ्तार किया गया, उन्हें शारीरिक प्रताड़ना दी गई, उनके कैरियर बर्बाद कर दिए गए और बाद में सुबूतों के अभाव में बिना कोई मुआवजा दिए उन्हें रिहा कर दिया गया। उनके सामाजिकआर्थिक पुनर्वसन के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए।
इन सब कमियों के बावजूद, मुस्लिम समुदाय को इस बात का अहसास है कि कांग्रेस उसकी उतनी बड़ी शत्रु नहीं है जितनी कि भाजपा। गुजरात में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के कत्लओम ने इस अहसास को और मजबूत किया है। गुजरात में राज्य के प्रजातांत्रिक शासनतंत्र का चरित्र रातोंरात फासीवादी बन गया और वह हिन्दू राष्ट्र के पैरोकारों के इशारों पर नाचने लगा। मुसलमान इस तथ्य से भी नावाकिफ नहीं हैं कि अंततः यह साबित हो गया है कि देश में हुए कई आतंकी हमलों के पीछे संघी विचारधारा वाले और संघ से जुड़े हुए लोग थे और भाजपा ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की।
सन 1998 से 2004 के बीच केन्द्र की एनडीए गठबंधन सरकार के कार्यकलापों पर नजर डालने से कांग्रेस और भाजपा के बीच का अंतर और स्पष्ट हो जाता है। यदि मुसलमान चुनावी मैदान में भाजपा के अस्तित्व को भूल भी जाएं तो भी हमें कांग्रेस के इस दावे की सूक्ष्मता से जांच करनी होगी कि वह एक धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्ध है। हम पाते हैं कि इस मामले में कांग्रेस का रिकार्ड मिश्रित रहा है। एक ओर कांग्रे्रस ने सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की निुयक्ति की जिससे मुसलमानों की आर्थिकसामाजिक बदहाली देश के सामने आ सकी। दूसरी ओर समिति व आयोग की सिफारिशों पर अमल की गति इतनी धीमी है कि यह समझ पाना ही मुश्किल है कि अमल की दिशा में कोई प्रयास हो भी रहा है या नहीं। आतंकित मुसलमानों को ऐसी सरकारी नीतियों की दरकार है जो उन्हें उस घुटन से मुक्ति दिला सकें जो उनके विरूद्ध भयावह हिंसा और उनके दानवीकरण से जन्मी है। मुसलमानों को उनके मोहल्लों में कैद कर दिया गया है। मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी सेवाओं में आरक्षण पाने की इच्छा रखता है परंतु इस सिलसिले में केवल चुनावी वायदों से उन्हें बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। विशेषकर तब जबकि वे सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र आयोग की रपटों को धूल खाते देख रहे हैं।
बाटला हाऊस मुठभेड़, उसकी गहन जांच कराने से यूपीए2 का इंकार और मुस्लिम युवकों को आतंकी करार देने के अभियान ने मुसलमानों को गहरा धक्का पहुंचाया है। मुसलमान आगे ब़ने के लिए, आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए और अपनी योग्यतानुसार काम पाने के लिए छटपटा रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि मुसलमानों के ये सपने पूरे हो सकें। बाटला हाऊस मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच कराने में कांग्रेस का रूचि न लेना यह दशार्ता है कि पार्टी में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा का भाव देने वाले कदम उठाने का राजनैतिक साहस नहीं है। श्रीमती सोनिया गांधी के आसुंओं से मुसलमानों की जानें बचने वाली नहीं हैं। दिल्ली के पड़ोस में स्थित कांग्रेसशासित राजस्थान में पुलिस का एक मस्जिद में घुसकर वहां मौजूद लोगों पर गोलियां चलाना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है।
ऐसा लगता है कि कांगे्रस नेतृत्व में ऐसे लोगों की अच्छीखासी तादाद है जो धर्मनिरपेक्षता के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध नहीं हैं। इस मामले में कांग्रेस अवसरवादी नीतियां अपनाती रही है। वह कुछ दूर तक तो आगे ब़ती है परंतु प्रजातांत्रिकधर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निर्णयात्मक कदम उठाने से झिझकती है। यह सर्वज्ञात है कि सरकारी तंत्र का जबरदस्त साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है और धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने के लिए दृ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। उत्तरप्रदेश में मुसलमानों के सामने दो विकल्प थेमुलायम सिंह और कांग्रेस। मुलायम सिंह ने भी कुछ समय के लिए कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था। ये वही कल्याण सिंह हैं जिनके मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद ़ढहाई गई थी। , के शासनकाल में उत्तरप्रदेश में मऊ और कुछ अन्य स्थानों पर दंगे भी हुए थे। इसके बावजूद मुसलमानों ने मुलायम सिंह को कांग्रेस की तुलना में कम बुरा समझाऐसा चुनाव नतीजों से जाहिर है।
क्या यह वही कांग्रेस है जिसके महात्मा गांधी और पंडित नेहरू जैसे नेताओं ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था? आज की कांग्रेस का ुलमुल रवैया और उसकी कथनी व करनी में फर्क मुसलमानो को स्वीकार्य नहीं है। कांग्रेस के युवा नेताओं के दिमागों में भी साम्प्रदायिकता का जहर भर गया है। क्या सवा सौ साल पुरानी इस पार्टी को यह आवश्यक नहीं लगता कि वह अपने कार्यकर्ताओं में धर्मनिरपेक्षता की समझ विकसित करे? क्या कांग्रेस को अपने सदस्यों को यह नहीं बताना चाहिए कि अल्पसंख्यकों के बारे में फैलाए गए मिथकों और पूर्वाग्रहों का सच क्या है? क्या कांग्रेस नेताओं को यह नहीं जानना चाहिए कि किस तरह महात्मा गांधी ने हिन्दूमुस्लिम एकता की खातिर अपनी जान न्यौछावर कर दी थी और कैसे पंडित नेहरू, बहुवादी मूल्यों की रक्षा के लिए एक चट्टान की तरह डटे रहे थे? किसी भी पार्टी का निर्माण करते हैं उसके आम कार्यकर्ता और उनकी सोच। जब वे देखते हैं कि उनकी पार्टी के नेतृत्व का रवैया ही ढुलमुल है तो वे यह समझ नहीं पाते कि वे साम्प्रदायिक राजनीति के प्रति क्या रूख अपनाएं और दंगों के शिकार मुस्लिम समुदाय के साथ कैसा व्यवहार करें, क्या संवाद रखें? उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम, कांग्रेस के लिए एक चेतावनी हैं। अगर उसे भारतीय प्रजातंत्र की रक्षा करने का महती उत्तरदायित्व निभाना है तो उसे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की विरासत पर चलना होगा, उनकी राह अपनानी होगी।
-राम पुनियानी

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

श्री श्री और आर्ट ऑफ पोलिटिक्स


जैसे-जैसे उत्तरप्रदेश विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे-वैसे बाबाओं और भगवानों का इस राज्य के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। उनके उप्र दौरों की संख्या में अचानक वृद्धि हो गई है। इनमें से अधिकतर गुरू, भ्रष्टाचार का जीजान से विरोध करने में अपनी आध्यत्मिक उर्जा व्यय कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं बाबा रामदेव एवं श्री श्री रविशंकर। श्री श्री इसके पहले अन्ना के साथ थे और अन्ना की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने अन्ना आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे अन्ना की जेल यात्रा के दौरान अन्ना और उनके साथियों के बीच संवाद सेतु थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ने अचानक आकाशवाणी के जरिए श्री श्री और बाबा रामदेव को देश में भ्रष्टाचार के फैलते मकड़जाल से अवगत कराया है और वे इसे जड़मूल से उखाड़ फेंकने में जुट गए हैं।
पिछले कुछ समय से बाबा रामदेव के प्रवचनों में भ्रष्टाचार-विरोध का एक परिषिष्ट अनिवार्य रूप से शमिल रहता है। इसी तरह, आर्ट ऑफ लिविंग के अविष्कारक श्री श्री अपने शिष्यों को यह बताते नहीं थकते कि भ्रष्टाचार का विरोध कितना जरूरी है। इसी बीच, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया है कि रामदेव, अन्ना और श्री श्री, दरअसल, आरएसएस के मोहरे हैं और वे समाज और चुनावी राजनीति में आरएसएस के एजेन्डे को लागू कर रहे हैं। रामदेव की भाजपा से नजदीकियां जगजाहिर हैं और कुछ समय पूर्व उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी गठित करने का विचार भी बनाया था। अलबत्ता, श्री श्री ने कभी इस भाषा में बात नहीं की और वे लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना है कि उनकी उत्तरप्रदेश यात्रा, उनके उस देशव्यापी कार्यक्रम का हिस्सा मात्र है जिसके अंतर्गत वे लोगों को यह शपथ दिलाते रहे हैं कि वे भ्रष्टाचार का विरोध करेंगे।

दिग्विजय सिंह गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं कि श्री श्री का राजनैतिक एजेन्डा है और वे आरएसएस की सी टीम हैं। क्या श्री श्री सचमुच राजनीति में दिलचस्पी ले रहे हैं? क्या वे संघ परिवार का हिस्सा हैं? यह तो साफ है कि श्री श्री ने न तो कभी शाखाओं में भाग लिया है और न ही बौद्धिकों में हिस्सेदारी की है। उन्हें खाकी हाफ पेन्ट पहनकर नमस्ते सदा वत्सले का गायन करते हुए भी कभी नहीं पाया गया। परंतु साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि श्री श्री चुनावी राजनीति को प्रभावित करने के लिए बनाई गई एक वृहद योजना का हिस्सा हैं। हमें यह समझना होगा कि चुनावी राजनीति केवल राजनैतिक हथियारों और तरीकों से नहीं की जाती। सामाजिक आंदोलनों और जनजागृति के कार्यक्रमों के जरिए भी चुनावी राजनीति का खेल खेला जाता है।

कोई भी कानून न तो सड़कों पर पारित किया जा सकता है और न ही उसे किसी समूह के दबाव में बनाया जा सकता है। यूपीए सरकार ने अन्ना टीम की मांगें लगभग मंजूर कर ली हैं और उन्हें पूरा करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। परंतु इसके बावजूद, अन्ना टीम सुबह-शाम यूपीए और कांग्रेस के खिलाफ आग उगल रही है और हिसार उपचुनाव में उसने खुलकर कांग्रेस उम्मीदवार का विरोध किया। ऐसा लगता है कि अन्ना आंदोलन के एजेन्डे में जनलोकपाल बिल और भ्रष्टाचार विरोध के अतिरिक्त कुछ और कार्यक्रम भी शामिल हैं। बाबाओं के इस समूह का कोई गहरा, छिपा हुआ एजेन्डा है और श्री श्री, इस समूह के महत्वपूर्ण सदस्य हैं। यूपीए सरकार पहले ही सूचना का अधिकार और नरेगा जैसे आमजनों का सशक्तिकरण करने वाले कानून बना चुकी है और भ्रष्टाचार-विरोधी कानून बनाने पर सहमत है। इसके बावजूद, अन्ना टीम और उससे जुड़े हुए बाबाओं का सरकार पर दबाव बढ़ाते जाना आश्चर्यजनक है। स्पष्टतः इस आंदोलन के पीछे कोई न कोई ऐसा उद्देश्य है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।

इस आंदोलन का राजनैतिक एजेन्डा उतना सीधा नहीं है जितना कि दिखलाई दे रहा है। क्या जनता को यह पूछने का हक नहीं है कि आध्यत्मिकता की आड़ में किसी ब्रांड विशेष की राजनीति को जनता पर क्यों थोपा जा रहा है? श्री श्री पिछले तीन दशकों में तेजी से उभरे हैं। युवावर्ग को उसके कार्यस्थल से जु़ड़े तनावों से मुक्ति दिलाने के लिए श्री श्री ने “सुदर्शन क्रिया“ का अविष्कार किया जो कि पुरातन भारतीय परंपरा के श्वास आधारित व्यायामों का परिष्कृत रूप है। आज वे स्वर्गीय भगवान सत्यसांई, आसाराम बापू, बाबा रामदेव आदि के क्लब में शामिल हैं। एक ओर ये बाबा मन को भुलावा देने वाली, यथार्थ से दूर ले जाने वाली “स्वस्थ बनो“ तकनीकों का प्रसार कर रहे हैं तो दूसरी ओर वे एक विशिष्ट सामाजिक ढांचे के पैरोकार बनकर भी उभरे हैं। धर्म के नाम पर की जा रही उनकी राजनीति में वंचितों, दलितों, महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों के लिए कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि वे नितिन गडकरी, नरेन्द्र मोदी, राम माधव और उनके जैसे अन्य लोगों के साथ खड़े दिख रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि इन सब का ध्यान इन दिनों उस राज्य पर केन्द्रित है जहां जल्दी ही चुनाव होने जा रहे हैं। उनकी राजनीति, एक तरह की हिन्दू राष्ट्र की राजनीति है जिसकी स्थापना के लक्ष्य को लेकर आरएसएस सन् 1925 से काम कर रहा है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन के नारे में कुछ भी गलत नहीं है। परंतु यह आश्चर्य की बात है कि हजारे, रामदेव और श्री श्री को भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का विचार एक साथ कैसे आया? यह भी महत्वपूर्ण है कि संघ प्रमुख ने यह दावा किया है कि उन्होंने अन्ना हजारे से यह मुद्दा उठाने का अनुरोध किया था। संघ के स्वयंसेवकों ने पूरे देश में इनके आंदोलन को समर्थन और सहयोग दिया। क्या यह मात्र संयोग है? कदापि नहीं। भ्रष्टाचार का विरोध करना अच्छी बात है परंतु क्या कारण है कि ये लोग दलितों पर अत्याचार, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर कुछ नहीं कहते। क्या ये समस्याएं महत्वपूर्ण नहीं हैं? इन बाबाओं को भोजन के अधिकार से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कभी यह कामना प्रगट नहीं की कि भारत साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त देश बने। हम सबको यह जानने में गहरी दिलचस्पी है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, दलितों के लिए आरक्षण व अन्य कई मुद्दों पर श्री श्री और संघ-भाजपा के विचारों में इतनी समानता क्यों और कैसे है?


-राम पुनियानी
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