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शुक्रवार, 1 मई 2015

भविष्य के भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों की आबादी

प्यू रिसर्च सेंटर की हालिया ;2 अप्रैल 2015 की रपट में आने वाले वर्षों में भारत की आबादी के संबंध में कुछ पूर्वानुमान दिये गये हैं। रपट के अनुसार, सन् 2050 तक भारत में हिंदुओं की आबादी, वर्तमान 79.5 प्रतिशत से घटकर 76.7 प्रतिशत रह जायेगी जबकि मुसलमानों की आबादी, 18 प्रतिशत के करीब हो जाएगी। सन् 2050 में भारतीय मुसलमानों की संख्या, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में उनकी आबादी से ज्यादा हो जाएगी। इस पूर्वानुमान से व्यथित साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को यह सलाह दी है कि वे कम से कम चालीस बच्चे पैदा करें जबकि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज की चाहत है कि हर हिंदू महिला कम से कम चार बच्चों की मां हो। समय.समय पर दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों के नेता, हिंदू महिलाओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर 'राष्ट्रसेवा' करने की सलाह देते रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो स्वयं 'ब्रह्मचारी' हैं।
अगर हम इन पूर्वानुमानों को सही मानें तो हमें यह विचार करना होगा कि भारत की मुस्लिम आबादी में हिंदुओं की तुलना में, अधिक तेजी से बढ़ोत्तरी क्यों हो रही है। क्या इसका कारण इस्लाम है ? अगर इस्लाम के कारण भारत की मुस्लिम आबादी बढ़ रही है तो फिर पाकिस्तान और इंडोनेशिया, जिनकी मुस्लिम आबादी अभी भारत की मुस्लिम आबादी से अधिक है, में भी इस समुदाय की आबादी उतनी ही तेजी से बढ़नी चाहिए जितनी कि भारत में। जबकि भारतीय मुसलमानों की आबादी, अन्य देशों की मुस्लिम आबादी की तुलना में अधिक तेजी से ब़ढ़ रही है। जाहिर है कि इस्लाम इसका कारण नहीं हो सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो 2050 में भी पाकिस्तान और इंडोनेशिया में भारत की तुलना में अधिक संख्या में मुसलमान होते। इससे यह साफ हो जाता है कि आबादी में बढ़ोत्तरी का संबंध धर्म से नहीं है। भारत में भी देश के अलग.अलग क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि दर अलग.अलग है। उदाहरणार्थ, केरल के मलाबार तट और उत्तरप्रदेश.बिहार क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि दरों में भारी अंतर है। हिंसाग्रस्त कश्मीर घाटी में पिछले दशक में हिंदू आबादी की वृद्धि दर,मुस्लिम आबादी से अधिक रही है।
दूसरा तर्क यह है कि मुसलमान, परिवार नियोजन के साधन नहीं अपनाते क्योंकि उनका धर्म इसका निषेध करता है। अपनी पुस्तक'फैमिली प्लानिंग एंड लीगेसी ऑफ इस्लाम' ;परिवार नियोजन और इस्लाम की विरासत में काहिरा के इस्लामिक विद्वान ए आर ओमरान इस मिथक का जोरदार खंडन करते हैं कि इस्लाम, परिवार नियोजन के विरूद्ध है। उनके अनुसारए कुरान में गर्भधारण रोकने के उपायों पर प्रतिबंध की बात कहीं नहीं कही गई है। तुर्की व इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों मेंए परिवार नियोजन के विभिन्न तरीके काफी लोकप्रिय हैं। उदाहरणार्थ, तुर्की में प्रजनन.योग्य दंपत्तियों में से 63 प्रतिशत परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं और इंडोनेशिया के मामले में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत है। भारत में प्रजनन.योग्य आयु वर्ग के ऐसे मुस्लिम दपंत्तियों, जो परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं, का प्रतिशत 1970 में 9 ;हिंदू 14 प्रतिशत और 1980 में 22.5 प्रतिशत ;हिंदू 36.1 प्रतिशत था। ये आंकड़े सन् 1985 में बड़ौदा स्थित ओपरेशन रिसर्च ग्रुप द्वारा किए गए सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इनसे यह स्पष्ट है कि हिंदुओं की तरह,मुसलमान दंपत्तियों में भी परिवार नियोजन के साधन अपनाने वालों की संख्या व प्रतिशत लगभग बराबर गति से बढ़ रहे हैं। 
डॉ. राकेश बसंत आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ाते हैं और अर्थशास्त्री हैं। वे सच्चर समिति के सदस्य भी थे। उनका कहना है कि 'वर्तमान में मुसलमानों की प्रजनन दर, देश की औसत प्रजनन दर से केवल 0.7 अधिक है। जहां औसत प्रजनन दर 2.9 है वहीं मुसलमानों के मामले में यह 3.6 है।' वे कहते हैं कि देश के 37 प्रतिशत मुसलमान गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करते हैं जबकि भारत की आबादी में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने वालों का औसत 48 प्रतिशत है। इस प्रकार, गर्भ.निरोधकों के इस्तेमाल के मामले में मुसलमान,औसत से लगभग 10 प्रतिशत नीचे हैं। परंतु इसमें भी क्षेत्रीय विभिन्नताएं हैं। उनकी रपट के अनुसार, शिक्षा और सामाजिक.आर्थिक विकास के साथए गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल बढ़ता जाता है और यह सभी समुदायों के बारे में सही है।
फिर आखिर क्या कारण है कि देश की मुस्लिम आबादी, हिंदुओं की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। आइए,हम हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर में क्षेत्रीय विभिन्नताओं पर नजर डालें। मोटे तौर पर उन दक्षिणी राज्यों में, जहां साक्षारता की दर अधिक है जैसे तमिलनाडुए कर्नाटक और केरल, हिंदू आबादी में वृद्धि की दर, उत्तरी राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से कहीं कम है। भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान अपने समुदायों की बस्तियों में रहते हैं और उनकी आमदनी औसत से कम है। जैसा कि सच्चर समिति की रपट से स्पष्ट है,मुसलमानों के साथ रोजगार और व्यवसाय के अवसरों के मामले में भेदभाव किया जाता है। नतीजा यह है कि उनकी आर्थिक स्थिति या तो स्थिर है या गिर रही है। जहां एक ओर पूरा देश आर्थिक दृष्टि से संपन्न बन रहा है वहीं मुसलमानों के मामले में स्थिति उलट है।
इस असमानता व भेदभाव के अतिरिक्तए मुसलमान सांप्रदायिक हिंसा का शिकार भी बन रहे हैं जिसके कारण उनमें असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है और वे अपने समुदाय की बस्तियों में सिमट रहे हैं। इन सब कारणों से मुसलमान पुरातनपंथी मौलानाओं के प्रभाव में आ रहे हैं, जो उनसे यह कहते हैं कि इस्लाम,परिवार नियोजन के खिलाफ है।
भारतीय मुसलमानों का बड़ा तबका धर्मांतरित अछूत शूद्रों का है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही बहुत खराब थी। इसके अतिरिक्त, उनकी बेहतरी के लिए सरकारें कुछ खास नहीं कर रही हैं। नतीजा यह है कि इस समुदाय के कम पढ़े.लिखे वर्ग में ज्यादा बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी में कमी आई है परंतु इसके एकदम अलग कारण हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू बड़ी संख्या में भारत में बस गए हैं और यह क्रम अभी भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी बहुत ही कम है और वहां उनका उत्पीड़न भी किया जाता है। इसलिए भारत के मुसलमानों और पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं की तुलना नहीं की जा सकती। वैसे तो,पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिकता की समस्या है और भारत के धार्मिक बहुसंख्यक, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हैं और उत्पीड़न व अत्याचार के शिकार हैं।
जब मैं आईआईटी मुंबई में पढ़ाता था तब मैंने स्वयं यह देखा था कि चपरासियों और मेहतरों की तुलना में प्रोफेसरों के बच्चों की संख्या कम होती थी। इसी तरह,मुंबई में जो परिवार झुग्गी बस्तियों में रहते हैं.चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों.उनके तुलनात्मक रूप से अधिक बच्चे होते हैं। अतः यह साफ है कि किसी दंपत्ति के कितने बच्चे हैं या होंगे, यह उसके धर्म पर नहीं बल्कि उसकी सामाजिक.आर्थिक.शैक्षणिक हैसियत पर निर्भर करता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के अलग.अलग देशों में स्थितियां अलग.अलग हैं और उनका परस्पर तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि वंचित समुदायों के प्रति हम सहानुभूति और सद्भाव रखें और आबादी में वृद्धि की समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में समझें और उसके उचित निदान के लिए कार्य करें।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मोदी सरकार का विघटनकारी एजेण्डा


इस साल मई में मोदी सरकार अपना एक साल पूरा कर लेगी। गुजरा सालए मुख्यतः, समाज में अलगाव और विघटन पैदा करने वाली राजनीति के नाम रहा। जहां मोदी का चुनाव अभियान विकास पर केंद्रित था वहीं उन्होंने सांप्रदायिक मुद्दे उठाने में भी कोई कोर.कसर बाकी नहीं रखी। बांग्लाभाषी मुसलमानों को बंगलादेशी बताया गया और 'पिंक रेवोल्यूशन'की चर्चा हुई। उद्देश्य था, अपरोक्ष रूप से मुसलमानों का दानवीकरण।
मोदी सरकार की नीतियों में हिंदू राष्ट्रवाद के भाजपाई एजेण्डे का खुलकर प्रकटीकरण हुआ। गणतंत्र दिवस 2015 के अवसर पर सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका से 'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवादी' शब्द गायब थे। केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने हिंदू धर्मग्रंथ 'भगवत गीता'  को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा देने की मांग की। एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने सभी मुसलमानों को हरामजादा बताया तो अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हैपतुल्लाह ने फरमाया कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं क्योंकि देश में उनकी खासी आबादी है। पौराणिक कथाओं को ऐतिहासिक बताया जा रहा है और मुंबई में एक आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 'प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और यहां तक कि मानव शरीर पर जानवरों के सिर के प्रत्यारोपण की तकनीक भी उपलब्ध थी'। इस साल आयोजित इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में ऐसे कई 'शोध प्रबंध' प्रस्तुत किए गए जिनमें इतिहास को फंतासी बना दिया गया।
पिछली एनडीए सरकार के शासनकाल में स्कूली पाठ्यपुस्तकों को सांप्रदायिक रंग दिया गया। ऐसी पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं जिनमें ऐतिहासिक घटनाओं का प्रस्तुतिकरण केवल और केवल धार्मिक व सांप्रदायिक दृष्टिकोण से किया गया था। अब एक बार फिर, शिक्षा के भगवाकरण की बात कही जा रही है। देश की शीर्ष अनुसंधान संस्थाओं में आरएसएस.हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर सुदर्शन राव की नियुक्ति इसी का उदाहरण है। प्रोफेसर राव की अकादमिक क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं है। उनका लेखन केवल कुछ ब्लागों तक सीमित है और वे जातिप्रथा को न्यायपूर्ण व उचित ठहराते हैं। उनका कहना है कि जातिप्रथा से किसी को कभी कोई शिकायत नहीं रही। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। जाहिर है कि यह वैज्ञानिक सोच और तार्किकता पर प्रहार होगा। हमारे संविधान में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है परंतु अनुसंधान व शिक्षण के क्षेत्रों में वैज्ञानिक सोच का मखौल बनाया जा रहा है और अंधविश्वासों व अंधश्रद्धा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
विचारधारा के स्तर पर भाजपा नेता और सांसद इस तरह की बातें कह रहे हैं जो भारतीय राष्ट्रवाद के सिद्धांतों और मूल्यों के खिलाफ हैं। भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया और केरल के एक भाजपा नेता ने कहा कि गोडसे ने जो कुछ किया वह ठीक था परंतु उसे गांधीजी की बजाए नेहरू की हत्या करनी थी। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनए गोडसे की मूर्तियां स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। सोनिया गांधी के संबंध में गिरिराज सिंह की नस्लीय टिप्पणी निहायत कुत्सित व घिनौनी थी। इसके पहले किसी मंत्री ने यह कहा था कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने वाली बातें लगातार कही जा रही हैं। पुणे में बाल ठाकरे के कुछ कार्टूननुमा चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने के बाद, हिंदू जागरण सेना के कार्यकर्ताओं ने मोहसिन शेख नाम के एक युवक, जो किसी आईटी कंपनी में काम करता था,को सड़क पर पीट.पीटकर मार डाला। साध्वी प्राची और साक्षी महाराज हिंदू महिलाओं को यह सलाह दे रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के पवित्र स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। जब सानिया मिर्जा को आंध्रप्रदेश का ब्रांड एंबेसेडर नियुक्त किया गया तब कई भाजपा नेताओं ने इसका यह कहकर विरोध किया कि वे पाकिस्तान की बहू हैं। भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि चर्चों और मस्जिदों को ढहाया जा सकता है। भाजपा से जुड़ी शिवसेना के संजय राऊत ने मांग की कि मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना चाहिए।
हम सब को याद है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने से पहले भी भाजपा और उससे जुड़े संगठन लवजिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को लेकर समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोल रहे थे। ये मुद्दे गुजरे वर्ष भी छाये रहे। दिल्ली,मुंबई के पास पनवेल व हरियाणा सहित देशभर के कई स्थानों पर चर्चों पर हमले हुए और इन हमलों के दोषियों को पकड़ने के लिए सरकार व पुलिस ने समुचित कार्यवाही नहीं की।
पिछले वर्ष देशभर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई। हां, एक फर्क जरूर था और वह यह कि हिंसा अब छोटे पैमाने पर की जाती है। कहीं एक दुकान जला दी जाती है तो कहीं किसी आराधना स्थल पर पत्थरबाजी होती है। इसके बाद हिंसा भड़कती है जिसके नतीजे में विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच अलगाव बढ़ता है। धार्मिक आधार पर समाज का विभाजन, असहनीय स्तर तक बढ़ चुका है। धार्मिक स्थलों पर हमले और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसाए हमारे संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की नींव को कमजोर कर रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अपने क्षोभ व दुःख को स्वर देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसा लगने लगा है मानो वे इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।
जब भी कोई गैर.जिम्मेदाराना व घृणा फैलाने वाली बात किसी व्यक्ति द्वारा कही जाती है तो भाजपा प्रवक्ता यह कहकर उससे पल्ला झाड़ लेते हैं कि जो कुछ भी कहा गया हैए वे संबंधित व्यक्ति के व्यक्तिगत विचार हैं। इसके अतिरिक्त, भाजपा यह दावा भी करती है कि विहिप,वनवासी कल्याण आश्रमए बजरंगदल आदि स्वतंत्र संगठन हैं जिनपर उसका कोई नियंत्रण नहीं है और ना ही उनके नेताओं द्वारा कही जाने वाली बातों के लिए वह जिम्मेदार है। जबकि सच यह है कि भाजपा और इन सभी संगठनों पर आरएसएस का पूर्ण नियंत्रण है और ये संघ परिवार के सदस्य हैं। ये सभी संगठन भाजपा के साथ मिलकर,हिंदू राष्ट्र के एजेण्डे को साकार करने के लिए सुनियोजित व समन्वित प्रयास कर रहे हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि ये सभी संगठन, जो तथाकथित रूप से 'स्वतंत्र'  हैं एक.सी बातें और एक.सी हरकतें कर रहे हैं। कई लोगों का यह कहना है कि ये संगठन कुछ अतिवादियों के समूह भर हैं। परंतु तथ्य यह है कि संघ परिवार ने सबको अलग.अलग जिम्मेदारी सौंपी हुई है और वे संघ के निर्देशन में ही काम कर रहे हैं। यह इस बात से भी जाहिर है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ये संगठन अत्यंत आक्रामक हो उठे हैं।
भाजपा, भारतीय राष्ट्रवादी विभूतियों, जिन्होंने साम्राज्यवाद.विरोधी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय राष्ट्र के विकास के लिए कार्य किया, को अपना बताने की कोशिश में जुटी हुई है। आरएसएस का कहना है कि महात्मा गांधी संघ से बहुत प्रभावित थे। संघ का यह दावा भी है कि अंबेडकर और आरएसएस के विचार एक से थे। ये झूठ सुनियोजित ढंग से व जानते.बूझते हुए मीडिया में 'प्लांट' किए जा रहे हैं क्योंकि आरएसएस के किसी नेता ने स्वाधीनता संग्राम में कभी कोई हिस्सेदारी नहीं की। यह प्रचार भारतीय राष्ट्र की मूल अवधारणा को कमजोर करने का प्रयास है। महात्मा गांधी को केवल स्वच्छता अभियान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और हिंदू.मुस्लिम एकता के लिए उनके संघर्ष को नजरअंदाज किया जा रहा है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि मोदी सरकार, हिंदू राष्ट्र के अपने एजेण्डे को त्याग कर,भारतीय संविधान में निहित मूल्यों को मजबूती देने का प्रयास करेगी। सत्ता पर काबिज लोगों को यह याद रखना चाहिए कि देश को बांटने के भयावह परिणाम हो सकते हैं।
-राम पुनियानी

बुधवार, 24 जुलाई 2013

हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद

हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बहस नई नहीं है। औपनिवेशिक दौर में, जब आजादी का आंदोलन, भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा और उसके मूल्यों को स्वर दे रहा था तब हिन्दुओं के एक तबके ने स्वयं को स्वाधीनता संग्राम से अलग रखा और हिन्दू राष्ट्रवाद और उससे जुड़े हुए मूल्यों पर जोर दिया।
यह बहस एक बार फिर उभरी है। इसका कारण है भाजपा.एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बतौर स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए आतुर नरेन्द्र मोदी द्वारा दिया गया एक साक्षात्कार ;जुलाई, 2013, जिसमें उन्होंने कहा कि वे हिन्दू पैदा हुए थे और वे राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! क्या इसी तर्क को थोड़ा सा आगे ले जाकर, मुसलमान नहीं कह सकते कि चूंकि वे मुसलमान के रूप में जन्मे थे और राष्ट्रवादी हैं इसलिए वे मुस्लिम राष्ट्रवादी हैं। यही बात ईसाई और सिक्ख भी कह सकते हैं। बिना किसी संदेह के यह कहा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति ने  स्वयं को मुस्लिम या ईसाई राष्ट्रवादी बताया तो उसकी घोर विपरीत प्रतिक्रिया होगी।
मोदी का एक चीज को दूसरी चीज से जोड़कर यह कहना कि चूंकि वे राष्ट्रवादी हैं और हिन्दू हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, दरअसल, देश की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है। यह तर्क मोदी के पितृ संगठन आरएसएस की विचारधारा और कार्यशैली का हिस्सा है। औपनिवेशिक काल में, उद्योगपतियों, व्यवसायियों औद्योगिक श्रमिकों और शिक्षितों के नए उभरते वर्गों ने, एक मंच पर आकर कई संगठन बनाए। इनमें शामिल थे मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा, बाम्बे एसोसिएशन आदि। इन संगठनों को यह लगा कि उन्हें आपस में हाथ मिलाकर एक मिलाजुला राजनैतिक संगठन बनाना चाहिए। इसी के चलते, सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अस्तित्व में आई। दूसरी ओर, मुसलमान और हिन्दू जमींदारों और राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग ने भी, कांग्रेस की समावेशी राजनीति का विरोध करने के लिए एक मंच पर आने का निर्णय लिया। शनैः.शनैः कांग्रेस, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों की मुख्य वाहक बन गई। अस्त होते वर्ग तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तनों के कारण, अपने अस्तित्व को खतरे में महसूस कर रहे थे। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट को उन्होंने इस रूप में प्रस्तुत किया कि उनका धर्म संकट में है। उन्हें कांग्रेस का साम्राज्यवादी शासकों का विरोध भी पसंद नहीं आया। कांग्रेस ने उन सामाजिक समूहों की ओर से मांगें उठानी शुरू कर दीं जिनका वह प्रतिनिधित्व करती थी और जो असली भारत थे।
राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग का कहना था कि शासकों का विरोध करना और उनकी चरण वंदना न करनाए हमारे धर्म के विरूद्ध है और इसलिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। अस्त होते वर्गों ने ढाका के नवाब और काशी के राजा के नेतृत्व में, सन् 1888 में युनाईटेड इंडिया पेटियाट्रिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में, अंग्रेजों की कुटिल चालों के चलते, इस एसोसिएशन में शामिल मुस्लिम श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1906 में मुस्लिम लीग का गठन कर लिया व इसके समानांतर, हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1909 में पंजाब हिन्दू सभा बनाई और 1915 में हिन्दू महासभा। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा क्रमशः मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद की पैरोकार थीं। हिन्दू राष्ट्रवादियों की राजनैतिक विचारधारा बनी हिन्दुत्व,जिसे सावरकर ने सन् 1923 में अपनी पुस्तक हिन्दुत्व ऑर हू इज ए हिन्दू में प्रतिपादित किया। अंग्रेजों के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता था? वे जानते थे कि ये संगठन राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करेंगे। अतः उन्होंने पर्दे के पीछे से हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों को समर्थन देना जारी रखा।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित हो, सन् 1925 में आरएसएस का गठन किया गया, जिसका लक्ष्य था हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते पर चलकर, हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना। उभरते हुए नए भारत के प्रतिनिधि थे भगतसिंह, अम्बेडकर, गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद व अन्य, जिनका राष्ट्रवाद शुद्ध भारतीय था और स्वतंत्रता,समानता व बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित था। मुस्लिम लीग ने चुनिंदा मुस्लिम परंपराओं के आधार पर सामंती समाज के जातिगत और लैंगिक पदानुक्रम को मुसलमानों पर लादना चाहा। हिन्दू महासभा और आरएसएस ने मनुस्मृति जैसी प्रतिगामी पुस्तकों को अपना आदर्श बनाकरए इसी तरह की जाति व लिंग आधारित ऊँचनीच को प्रोत्साहित किया। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तबकों ने कभी आंजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया क्योंकि यह आंदोलन समावेशी था और धर्मनिरपेक्ष.प्रजातांत्रिक मूल्यों का हामी। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों ने इतिहास में अपने.अपने धर्मों के राजाओं.बादशाहों का महिमामंडन किया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। इसके चंद अपवाद भी थे, जिनपर राष्ट्रवाद का लेबिल चिपकाकर ये संगठन स्वाधीनता संग्राम में अपनी भागीदारी का दावा करते हैं।
गांधी द्वारा ब्रिटिश.विरोधी संघर्ष में आम लोगों को शामिल करने के प्रयास ने जिन्ना जैसे संविधानवादियों और हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे परंपरावादियों को मुख्य राष्ट्रीय धारा से और दूर कर दिया और सन् 1920 के बाद से वे स्वयं की ताकत बढ़ाने में जुट गए। हिन्दू राष्ट्रवादियों की 1920 के बाद से नीति एकदम साफ थी.अंग्रेजों का साथ दो और मुस्लिम राष्ट्रवादियों का विरोध करो। ठीक यही नीति मुस्लिम लीग की भी थी। वह कांग्रेस को हिन्दू पार्टी बताती थी। स्वाधीनता और उसके साथ हुए त्रासद बंटवारे के बाद, मुस्लिम लीगी तो पाकिस्तान चले गए परंतु वे भारत में अपने साथी इतनी संख्या में छोड़ गए कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता जीवित बनी रही। शनैः.शनैः हिन्दू महासभा और आरएसएस ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए। उन्होंने शुरूआत की महात्मा गांधी की हत्या से . उन महात्मा गांधी की, जो निःसंदेहए पिछली कई सदियों के सर्वश्रेष्ठ हिन्दू थे। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा की स्थापना की। ये राष्ट्रवादी सार्वजनिक क्षेत्र और सहकारी कृषि के विरोधी थे और उन्होंनेमुसलमानों का भारतीयकरण नाम से एक अभियान शुरू किया।
धार्मिक राष्ट्रवादियों के लिए पहचान से जुड़े मुद्दे हमेशा महत्ववपूर्ण रहे हैं।गाय हमारी माता है, राममंदिर, रामसेतु, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके आधार पर आम जनता की भावनाएं भड़काई गईं और उनमें जुनून पैदा किया गया। ये ताकतें बार.बार इस पर जोर दे रही हैं कि कांग्रेस के राज में तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में दंगे हुए हैं परंतु वे यह भुला देती हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ें दूसरे से घृणा करो की विचारधारा में हैं, जिन्हें साम्प्रदायिक धाराओं ने समाज में फैलाया है। साम्प्रदायिक हिंसा के कारण ही एक साम्प्रदायिक पार्टी सत्ता में आ सकी। साम्प्रदायिक दंगों के कारण ही धार्मिक आधार पर समाज का ध्रुवीकरण हुआ। मोदी का दावा है कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण होता ही है। परंतु वे इस तथ्य को अपेक्षित महत्व नहीं देते कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण, सामाजिक मुद्दों पर होता है जैसे अमेरिका का समाज  रिपब्लिकनों और डेमोक्रेटों के बीच ध्रुवीकृत है। सामाजिक नीतियों और राजनैतिक मुद्दों के आधार पर ध्रुवीकरण, प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरी ओर,हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, धार्मिक पहचान के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण कर रहे हैं। इसकी तुलना अमेरिका या इंग्लैड में राजनैतिक ध्रुवीकरण से नहीं की जा सकती। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ है।
मोदी एक समर्पित स्वयंसेवक हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के पक्षधर हैं। वे इस तथ्य को जानबूझ कर तरजीह नहीं देना चाहते कि भारत के हिन्दू स्वयं को हिन्दू राष्ट्रवादी न कहते थे और ना कहते हैं। गांधी, नैतिक और सामाजिक दृष्टि से हिन्दू थे परंतु वे हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद मुस्लिम थे परंतु वे मुस्लिम राष्ट्रवादी नहीं थे। वे इस्लाम के महान अध्येता थे परंतु मुस्लिम राष्ट्रवादी शब्द उनके साथ कभी नहीं जुड़ा। स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत के सभी धर्मों के निवासियों ने भारतीय राष्ट्रवाद से नाता जोड़ा न कि धार्मिक राष्ट्रवाद से। आज भी सभी धर्मों के अधिकांश भारतीय, मोदी और उनके साथियों के विपरीत, धार्मिक राष्ट्रवादी नहीं हैं। वे भारतीय राष्ट्रवादी हैं।
हिन्दू राष्ट्रवादियों को जरूरत है राममंदिर की, भारतीय राष्ट्रवादियों को चाहिए स्कूल, विश्वविद्यालय और फैक्ट्रियां ताकि युवाओं को काम मिल सके। हिन्दू राष्ट्रवाद बांटने वाला और एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच दीवारें खड़ी करने वाला है। भारतीय राष्ट्रवाद समावेशी है और उसकी जड़ें इस दुनिया में हैं,दूसरी दुनिया में नहीं। दुर्भाग्यवश हिन्दू राष्ट्रवादी, पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर इतना शोर.शराबा कर रहे हैं कि गरीबों और समाज के हाशिए पर पटक दिए गए लोगों से जुड़े मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं। भारतीय राष्ट्रवाद, जो हमारे स्वाधीनता संग्राम से उपजा है, के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद एक चुनौती बन गया है। म्यंनमार और श्रीलंका में बौद्ध राष्ट्रवाद प्रजातांत्रिकरण की प्रक्रिया में रोड़ा बन गया है। मुस्लिम राष्ट्रवाद ने पाकिस्तान और कई अन्य देशों को बर्बाद कर दिया है।
ऐसा लग रहा है कि हम इतिहास की एक काली, अंधेरी सुरंग से गुजर रहे हैं, जब राजनीति में धर्म के घालमेल को न केवल स्वीकार्यता बल्कि कुछ हद तक सम्मान भी मिल गया है। यह भारत में तो ही रहा है दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी हो रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे देशवासी, धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच के फर्क को नहीं भूलेंगे।
हिन्दू राष्ट्रवाद समाज के कमजोर वर्गो की बेहतरी के लिए सकारात्मक कार्यवाही का विरोधी है और इसलिए अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण शब्द गढ़ा गया है। हिन्दू राष्ट्रवादी कतई नहीं चाहते कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए कुछ भी किया जाए। प्रधानमंत्री पद के इच्छुक सज्जन बहुत चतुर हैं। उनका यह कहना कि चूंकि वे हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, उनकी कुटिलता का एक और प्रमाण है। यह समाज को बांटने का उनका एक और भौंडा प्रयास है।



.-राम पुनियानी

बुधवार, 17 जुलाई 2013

भारतीय मुस्लिम युवा: समानता व सुरक्षा की तलाश

अधिकांश समुदायों के युवाओं की आँखें भविष्य पर टिकी रहती हैं, विशेषकर उनके कैरियर पर। वे कड़ी मेहनत से अपने लिए एक गरिमापूर्ण और उनकी इच्छाओं को पूरा करने वाले भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं। यद्यपि सभी समुदायों के युवाओं को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ता है परन्तु भेदभाव के शिकार और समाज के हाशिए पर ढकेल दिए गए समुदायों के युवाओं के लिए जीवन संघर्ष कहीं अधिक कठिन होता है।
हाल में, लोकप्रिय लेखक चेतन भगत, जो अब काॅलमिस्ट बन गए हैं, ने एक जानेमाने दैनिक अखबार के जरिए, मुस्लिम युवाओं को उनके भविष्य और उन्हें उपलब्ध विकल्पों के बारे में बिन मांगे सलाह दी। यह सलाह, एक लेख के रूप में है, जिसका शीर्षक है, ‘‘लेटर फ्राम ए मुस्लिम यूथ’’। चेतन भगत का यह लेख, मुस्लिम युवाओं की स्थिति के प्रति उनकी संवेदनहीनता को उद्घाटित करता है। यह लेख मुसलमानों की बदहाली के लिए उन्हें ही दोषी करार देता है और दबी जुबान से उन्हें यह सलाह देता है कि वे नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं का पल्ला थाम लें। मोदी का नाम लेख में नहीं लिया गया है परन्तु चेतन भगत का इशारा क्या और किस तरफ है, यह साफ है।
मुस्लिम युवाओं को लेख की भाषा और उसमें कही गई बातें अपमानजनक लगीं और उन्होंने स्वयं को आहत महसूस किया। उनमें से कुछ ने इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की है, जो इन्टरनेट पर बहुत रूचि से पढ़ी जा रही है। इस प्रतिक्रिया में मुस्लिम समुदाय, और विशेषकर मुस्लिम युवाओं, के हालात का वर्णन किया गया है और लेख से उनकी भावनाओं को पहुंची चोट की  अभिव्यक्ति भी की गई है। मुस्लिम युवाओं को लगा गहरा धक्का और उनके अन्दर भरा हुआ गुस्सा, इस प्रतिक्रिया के पोर-पोर से झलक रहा है। इस प्रतिक्रिया को प्रस्तुत किया है ‘साय आॅफ मुस्लिम यूथ’ (मुस्लिम युवाओं की आह) नामक एक संगठन ने, जिसके सदस्यों को भी कई मुश्किलातों से गुजरना पड़ रहा है। इन मुस्लिम युवाओं ने हमारे प्रजातंत्र पर प्रश्न उठाया है। ‘‘अगर हमारा देश सचमुच प्रजातंत्र होता तो केवल देश की सामूहिक अन्र्तात्मा को संतुष्ट करने के लिए अफजल गुरू को फांसी पर नहीं लटकाया जाता। मुस्लिम युवाओं को अपराधी ठहराकर मारा जा रहा है और उनके हत्यारों को वीरता पदक मिल रहे हैं।’’ इस प्रतिक्रिया में इस आम धारणा का भी जोरदार खण्डन किया गया है कि मुसलमान, मौलानाओं के प्रभाव में है और यह कि वे एकराय होकर वोट देते हैं।
यह लेख भगत जैसे लेखकों द्वारा प्रचारित की जा रही मिथ्या धारणाओं का प्रभावी प्रत्युत्तर है। परंतु भगत ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जो मुस्लिम युवाआंे की पीड़ा को नहीं समझते। हमारे देश का एक अच्छा खासा तबका उसी किस्म की बेहूदा बातों पर यकीन करता है, जिन्हें भगत ने अपने लेख में दोहराया है। सच यह है कि पिछले तीन दशकों में, मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थिति में जो गिरावट आई है, वह इससे पहले शायद ही कभी आई हो। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें शामिल हैं भारतीय मुसलमानों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, विभाजन की त्रासदी, कच्चे तेल के स्त्रोतों पर कब्जा करने की अमेरिकी कोशिश से उपजा आतंकवाद और पश्चिमी मीडिया द्वारा गढ़ी गयी ‘इस्लामिक आतंकवाद’ की अवधारणा। इसके अतिरिक्त, साम्प्रदायिक राजनीति के उदय, धार्मिक पहचान की राजनीति और राज्यतंत्र के साम्प्रदायिकीकरण ने भी इसमें भूमिका निभाई है।
आज के भारतीय मुसलमानों में से अधिकांश के पूर्वज शूद्र थे, जिन्होंने सूफी संतों के प्रभाव में आकर इस्लाम को अपनाया। वे वर्ण और जाति व्यवस्था के अन्यायपूर्ण और दमनकारी  ढांचे से बाहर आना चाहते थे। ब्रिटिश राज में गरीब मुसलमानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि 1857 की क्रांति के बाद, अंग्रेजों ने अन्य समुदायों की तुलना में, मुसलमानों का अधिक दमन किया क्योंकि उनका मानना था कि इस क्रांति में मुसलमानों की भूमिका सबसे बड़ी थी। शनैः शनैः मुस्लिम समुदाय ने दमन और बदहाली के दौर से उबरना शुरू किया। कुछ लोगों ने आधुनिक शिक्षा पर जोर दिया, जिसके नतीजे में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया। परन्तु ये सभी प्रयास केवल मुसलमानों के श्रेष्ठि तबके, जिन्हें अशरफ कहा जाता है, तक सीमित रहे और अरजल नाम से जाने जाने वाले नीची जातियों के मुसलमानों की जिंदगी वैसी ही बनी रही जैसी सदियों से थी। अधिकांश मुसलमानों ने मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक अपीलों को दरकिनार करते हुए, स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया। मुस्लिम लीग की स्थापना जमींदारों और नवाबों के एक तबके ने की थी परंतु बाद में उसे सुशिक्षित व श्रेष्ठि वर्ग का समर्थन भी मिलने लगा। देश के विभाजन के बाद,  शिक्षित व्यवसायी और सरकारी नौकरियों में उच्च पदस्थ मुसलमान, पाकिस्तान चले गए। गरीब मुसलमानों में से बहुसंख्यक भारत में ही रह गए।
देश के विभाजन के समय मुसलमानों और दलितों की स्थिति लगभग एक सी थी। परंतु इसके बाद से इन दोनों समुदायों ने अलग-अलग राहें पकड़ लीं। डाॅक्टर अम्बेडकर के संघर्ष के कारण दलितों को शनैः-शनैः समाज में सम्मान मिलने लगा। उन्हें सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ भी मिला। इस सबसे दलित इस देश के समान नागरिक बनने की दिशा में काफी आगे बढ़ गए। परंतु मुसलमानों के भाग्य में यह सब नहीं था। उन्हंे विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाने लगा, उन्हें ‘दूसरा‘ बताकर नीची निगाहों से देखा जाने लगा और सरकारी सेवाओं में उनका प्रवेश लगभग असंभव हो गया। धीरे-धीरे सरकारी सेवाओं में उनकी उपस्थिति, उनकी आबादी के मान से बहुत कम हो गई। इस भेदभाव का एक प्रभाव यह हुआ कि समुदाय के युवाओं मंे पढ़ाई-लिखाई के प्रति आकर्षण समाप्त हो गया। उनकी मुसीबतों को और बढ़ाया साम्प्रदायिक हिंसा ने, जिसके कारण वे स्वयं को अत्यंत असुरक्षित महसूस करने लगे। देश की आबादी का 13-14 प्रतिशत होने के बावजूद, साम्प्रदायिक हिंसा में मरने वालों में उनका प्रतिशत 90 के आसपास पहुंच गया।
शाहबानो मामले और उसके बाद आक्रामक राममंदिर आंदोलन के साथ साम्प्रदायिक राजनीति परवान चढ़ने लगी और उसने मुस्लिम समुदाय को समाज के हाशिए पर फेक दिया। लोकसभा और विधानसभाओं में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व में तेजी से गिरावट आई। राममंदिर आंदोलन और उसके बाद हुई हिंसा ने समुदाय के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, आतंकवाद के उदय से समुदाय की यंत्रणा का एक नया दौर शुरू हुआ। अल्कायदा के जन्म, उसकी कश्मीर घाटी में घुसपैठ और 11/9/2001 से शुरू हुए मुसलमानों के दानवीकरण ने उनकी मुसीबतों मंे और इजाफा किया। अगर कहीं भी बम विस्फोट या आतंकी हमला हुआ है तो वह मुसलमानों ने किया होगा-यह जांच एजेन्सियों का एक प्रिय फार्मूला बन गया। इसका नतीजा यह हुआ कि हर बम विस्फोट के बाद, सैकड़ों मुस्लिम युवकों को हिरासत में ले लिया जाता और जब तक वे निर्दोष साबित होते, तब तक उनका भविष्य नष्ट हो चुका होता और उनके माथे पर आतंकवादी होने का स्थायी लेबिल चस्पा हो जाता। बाटला हाउस और इशरत जहां जैसी मुठभेड़ों ने मुसलमानों, विशेषकर युवाओं, की छवि को और धूमिल किया।
समाज में तो मुसलमान अपमान और भेदभाव का सामना कर ही रहे थे, राज्य, पुलिसतंत्र और नौकरशाही मंे भी उनके प्रति पूर्वाग्रहों ने गहरी जड़ें जमा लीं। हालत यह हो गई कि वे अपने मोहल्लों तक सीमित होने पर मजबूर हो गए और मिश्रित आबादी वाली कालोनियों में मकान खरीदना उनके लिए असंभव हो गया।
इन सारी मुसीबतों से लड़ते हुए  मुस्लिम युवाओं के एक बड़े हिस्से ने कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय से सूचना प्रौद्योगिकी और अन्य ऐसे व्यवसायों में अपना स्थान बनाया है जहां वे राज्य के संरक्षण के बिना भी आगे बढ़ सकते थे। कई ने फिल्मों और खेल की दुनिया में नाम कमाया। यह दिलचस्प है कि अमेरिका में भी दमित अफ्रीकी-अमेरिकियों का फिल्मों, संगीत और खेल में प्रदर्शन श्वेतों से बेहतर रहा है। भारत में भी इन्हीं क्षेत्रों में मुसलमानों की खासी उपस्थिति भी यह संकेत देती है कि वे भेदभाव के शिकार हैं।
इन हालातों में चेतन भगत जैसे लोग, जो मुसलमानों के हितचिंतक होने का दावा करते हैं परंतु हैं उनके शत्रु, उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि मुसलमान अपनी बदहाली के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं। जब किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है तो ऐसे ही लोग उसके लिए लड़की को दोषी ठहराते हैं। ‘‘उसमें कुछ न कुछ कमी रही होगी, उसने कुछ न कुछ गलत किया होगा‘‘, वे फरमाते हैं। पीडि़त को दोषी ठहराना, प्रतिगामी व संकीर्ण विचारधाराओं की विशेषता रही है। चेतन भगत के लेख से यह जाहिर है कि वे भी इन्हीं ताकतों के प्रतिनिधि हैं।

-राम पुनियानी

बुधवार, 9 मार्च 2011

वामपंथ को जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बनना होगा- अनिल राजिमवाले


(अनिल राजिमवाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शिक्षा विभाग से संबद्ध सुप्रसिद्ध माक्र्सवादी विद्वान बुद्धिजीवी हैं, जिनके असंख्य लेख, पुस्तक एवं पुस्तिकाएँ विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और प्रकाशन समूहों द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। उन्होंने समय-समय पर माक्र्सवादी दर्शन को नए वैज्ञानिक विकास से जोड़कर विकसित करने की कोशिश में अहम भूमिका अदा की है । इस लेख में दुनिया में उन्होंने कुछ वामपंथी माॅडलों, उनके बदलावों और परम्परागत वामपंथ की कमजोरियों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं और उनसे बातचीत के आधार पर यह लेख महेश राठी द्वारा लिखा गया है। )

भारतीय सन्दर्भों में वामपंथ को समझना पडे़गा कि चूक कहाँ हुई है? उसने अवसरों का फायदा क्यों नही उठाया? आजादी के बाद भारतीय राजनीति में वामपंथ का उभार एक शक्ति, एक विकल्प के रुप में हुआ जिसमें आगे चलकर ठहराव आ गया और अन्ततोगत्वा अब उसका जनाधार तुलनात्मक रूप से लगातार घट रहा है। केरल में 1957 में कम्युनिस्ट दुनिया में पहली बार चुनकर सत्ता में आए यह वामपंथी आंदोलन के लिए नया अनुभव और भारतीय वामपंथ का दुनिया के कम्युनिस्ट इतिहास में बड़ा योगदान था। तत्पश्चात पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार का चुना जाना और लम्बे समय तक शासन करना भी एक बड़ी उपलब्धि थी परन्तु भारतीय वामपंथ की यह उपलब्धियाँ देश की राजनीति में कोई विकल्प नहीं बन र्पाइं। हालाँकि उसने पूर्ण भूमि सुधार, कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने जैसे अच्छे काम भी किए। दरअसल देश में वामपंथ को माडल बनाने के मौके मिले जिसका कम्युनिस्ट फायदा नहीं उठा पाए। उन्हें समझना चाहिए था कि पूंजीवादी ढाँचे यानी पूँजीवादी संविधान के दायरे में रहते हुए वे क्या बेहतर कर सकते थे, जिससे वामपंथ को देश की राजनीति में एक विकल्प के तौर पर उभरने का मौका मिल पाता। इसके अलावा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान भारतीय संविधान की बहुत सारी बातें वाम जनवादी संघर्षांे का ही नतीजा हैं। मसलन भारतीय संविधान और गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी स्वरूप जिसे आज दक्षिणपंथी शक्तियाँ और पूँजीवादी लाख कोशिशों के बाद भी बदलवाने में सक्षम नहीं हो सके हैं।
इसी संविधान के दायरे में रहते हुए वामपंथ उन राज्यों में जहाँ वह सत्ता में है, विकास का एक नया एवं वैकल्पिक माॅडल तैयार कर सकता था। उसके पास शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाआंे का एक सार्वजनिक तंत्र विकसित करने का अवसर हमेशा था जिसका वामपंथ ने लाभ नहीं उठाया। वे सत्ताधारी राज्यों में सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का एक बेहतरीन माॅडल बनाकर पेश कर सकते थे। जिसके तहत राजकीय क्षेत्र के आॅटोमोबाइल्स का विकास कर सकते थे और ऐसा संभव है, यह मारुती के रूप में हमारे सामने एक उदाहरण है। सार्वजनिक क्षेत्र की यातायात व्यवस्था का विकास किया जाना चाहिए था, गौरतलब है कि पश्चिमी बंगाल की यातायात व्यवस्था का अधिकांश हिस्सा निजी हाथों में है। आज दिल्ली की मेट्रो जो देशभर में चर्चा का विषय है उसकी जगह उससे कहीं बहुत पहले बनी कलकत्ता की मेट्रो को
अधिक विकसित करके देशभर के सामने एक उदाहरण, एक माॅडल की तरह पेश किया जा सकता था। आज के बडे़-बड़े माल्स की जगह सुपर मार्केट्स का निर्माण किया जा सकता था जो पहले कईं जगह पर रहे भी हैं। वाम शासित राज्यांे खासतौर पर पश्चिमी बंगाल में बेहतर न्युनतम् वेतन देने और उसे ईमानदारी से लागू करवाने का विकल्प बनाकर देश के सामने एक प्रेरणाप्रद काम किया जा सकता था, जिसमें वामपंथ विफल रहा है। असल में एक वामपंथी सरकार को एक माडल की तरह होना चाहिए था। परन्तु अपनी कईं विशेषताओं के बावजूद पश्चिमी बंगाल दूसरे राज्यों से ज्यादा पिछड़ा राज्य बनकर रह गया। जिस कारण भ्रष्टाचार संस्थागत रूप धारण कर गया और एक विशेष सुविधा प्राप्त शासकीय वर्ग पैदा हो गया जिसने जनता को अन्ततोगत्वा अपना दुश्मन बना डाला। इससे यह भी सीख मिलती है कि एक सही वामपंथी मोर्चा और गलत वामपंथी मोर्चा चलाने में क्या फर्क होता है। वामपंथी मोर्चा केवल पार्टियों का नहीं आम तबको का, आम आदमी का मोर्चा होना चाहिए।
नई परिस्थितियों में काम करने के लिए और कामयाबी के लिए संसदीय व्यवस्था को मास्टर करना पडे़गा। जब तक वामपंथ इस व्यवस्था की खूबियों और खामियों को नही समझेगा तब तक इस व्यवस्था को अपने पक्ष, अपने फायदे में प्रयोग करने में नाकाम रहेगा। इसी संसदीय व्यवस्था के तहत ही दक्षिणपंथी शक्तियों को कमजोर किया जा सकता है क्योंकि दक्षिणपंथ बुनियादी तौर पर लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संसदीय व्यवस्था के खिलाफ होता है। यही कारण है कि दक्षिणपंथ समय-समय पर लोकतंत्र व संसदीय व्यवस्था की धर्मनिरपेक्ष एवं जनवादी परम्पराओं और अवधारणाओ पर हमले करता है। यह वामपंथ की जिम्मेदारी है कि वह संसदीय व्यवस्था की खूबियों का इस्तेमाल करे और दक्षिणपंथ को कमजोर करते हुए जनता के पक्ष में काम करने के लिए इस व्यवस्था का उपयोग करे और उसकी कमियों को दूर करने के लिए संघर्ष भी करे। वामपंथी जब संसदीय व्यवस्था में शामिल होते हैं तो उनके लिए सारे संदर्भ बदल जाते हैं और इन्हीं नए संदर्भों में वामपक्ष को समझना पडे़गा कि उन्हें इस व्यवस्था में काम कैसे करना पडे़गा। 1957 में संसदीय राजनीति में आने के साथ ही सत्ता में आया वामपंथ अभी भी संसदीय जनतंत्र को समझने में पिछड़ रहा है। गणतंत्र जनता का हथियार है और उसे जनता के अनुसार उसकी बेहतरी के लिए ही मास्टर करना पडे़गा क्योंकि जनता कोई काल्पनिक चीज नहीं है। इसके लिए वामपंथियों को अपना सांगठनिक ढाँचा भी बदलना पडे़गा और उसे खुला और जनवादी बनाना पडे़गा। कुछ भी छिपाकर आज के दौर में काम नहीं चलेगा, आज पूँजीवादी दल तक छिपा पाने में असमर्थ हैं। कुछ नेताओं और गुटों तक सांगठनिक सत्ता को नियन्त्रित एवं केंद्रित वाली कार्यप्रणाली को बदलना ही होगा। इसके अलावा भारत की बड़ी आबादी युवा है अब सवाल यह है कि उस युवा वर्ग को वामपंथ क्या ऑफर करता है, उसे देने के लिए उसके पास क्या है। इन सवालों को हल किए बगैर वामपंथ आगे नहीं बढ़ सकता है। इसके अलावा भ्रष्टाचार भी आज एक बड़ा सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार चलाई जा सकती है। सी0 अच्युतामेनन की सरकार ने 1969 में यह करके दिखा दिया जिससे सीख ली जा सकती है। इसके अलावा जनहित में भी कईं काम अच्युतामेनन सरकार ने किए जिनसे सीख ली जा सकती है, जैसे पूर्ण भूमि सुधार, सबको शिक्षा की उपलब्धि और दलितों के लिए एक लाख आवास आदि।

वामपंथी लैटिन अमरीकी माडल
लैटिन अमरीका के वामपंथ की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। उन्होंने पार्टी, सरकार और जनवाद से जुड़ी हुई कुछ स्थापित परम्पराओं और अवधारणाआंे को छोड़ा है। उन्होंने यह समझ लिया है कि नई परिस्थितियों में नए तबकों में कैसे काम किया जाना चाहिए। लैटिन अमरीका में एक तरह से वामपंथ का नवीनीकरण हुआ है, विशेषतया चुनावों के संदर्भ में उन्होंने शानदार कामयाबी हासिल की है। उन्होंने यह दिखा दिया है कि वर्तमान संसदीय ढाँचे को कैसे बेहतर ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए। इसीलिए कई वामपंथी नेता बार-बार चुनकर आ रहे हैं और उस पर कमाल यह कि लैटिन अमरीकी देशों की सेनाएँ भी उनका साथ दे रही हैं और जनता तो उनके साथ है ही। परम्परागत कम्युनिस्ट जहाँ-जहाँ वामपंथ के इस नवीनीकृत रूप के साथ हैं वहाँ वे सत्ता में है और वामपंथ के भागीदार हैं, मगर कुछ जगहों में कम्युनिस्ट इनके साथ नही हैं तो वहीं वे हाशिए पर हैं। इस वामपंथ की एक और विशेषता है कि इन बदलावांे मंे युवा और महिलाआंे की खास भागेदारी है और युवा और महिलाएँ अपने आप में कोई वर्ग नहीं हैं। पूरे लैटिन अमरीका के वामपंथी बदलाव में एक समान कारक भी हैं कि ये आंदोलन मूल रुप से साम्राज्यवाद
विरोधी हैं। लैटिन अमरीकी घटनाएँ पँूजीवाद की भीतरी संभावनाओं और इन संभावनाओं को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है, उसका नायाब उदाहरण हैं। ये वामपंथी आंदोलन पूँजीवाद को उखाड़ फेंकने का नारा नहीं दे रहे हैं, केवल साम्राज्यवाद विरोध का नारा दे रहे हैं। यहाँ वामपंथ समाज का स्वाभाविक हिस्सा बनकर उभरा है जिसे लोग अपने जीवन का अंग मानते हैं, यह इस वामपंथ में एक ऐतिहासिक बदलाव है। इस प्रकार इस वामपंथ ने क्रान्ति की परम्परागत अवधारणा को बदल दिया है।

दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ

दुनिया में वामपंथ के इन दो रूपांे के अलावा वामपंथ का तीसरा प्रयोग दक्षिण अफ्रीका है। इस दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ की जडे़ं उसकी आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में हैं। दक्षिण अफ्रीकी वामपंथ के अभिन्न अंग कम्युनिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह कभी भी दक्षिणी अफ्रीकी राष्ट्रीय आंदोलन से अलग नहीं हुई और राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी के प्रमुख हिस्से के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी हमेशा अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस का हिस्सा रही है। उसने आजादी के बाद कोई जल्दबाजी नहीं की और यही कारण है कि सरकार की नीतियों को दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी ने काफी हद तक प्रभावित किया है और यही कारण है कि उसने सरकार और देश में दक्षिणपंथ को आगे बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं दी है। सरकार संचालन और देश के विकास की नीतियों को प्रभावित करने के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टी दक्षिण अफ्रीका के राजनैतिक जीवन का स्वाभाविक अंग बनी रही और उसने कभी ऐसा महसूस नहीं होने दिया कि कुछ भी असामान्य हो रहा है। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी के अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस में बने रहने के कारण उसमें काफी लचीलापन और जनवादी व्यवहार विकसित हुआ है।


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