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सोमवार, 21 मार्च 2016
मंगलवार, 18 अगस्त 2015
देश में झूठ - विदेश में झूठ - चुनाव में झूठ
उनसे कह दो, गुजरे हुए गवाहों से- झूंठ तो बोले, मगर झूंठ का सौदा न करे ===== जिसे यूएई की राजधानी में बनने वाला पहला मंदिर बताकर सरकार
द्वारा प्रचारित किया जा रहा है इस ऐतिहासिक फैसले के लिए मोदी ने यूएई
सरकार का शुक्रिया अदा किया, बताया जा रहा है कि इस मंदिर के लिए जमीन तो
वर्ष 2013 में ही एक अरब शेख ने दान दी थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 9 जुलाई 2013 की खबर के अनुसार, एक निवेश कंपनी के
मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नाज़ेम-अल-कुदसी के निमंत्रण पर स्वामीनारायण
संप्रदाय मंदिर के अधिकारियों ने अबूधाबी का दौरा भी किया था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया था, ‘भारतीय समुदाय
की लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई। प्रधानमंत्री की यात्रा पर यूएई सरकार ने अबू
धाबी में एक मंदिर बनाने के लिए जमीन आबंटित करने का फैसला किया।’
उन्होंने लिखा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए
यूएई नेतृत्व का शुक्रिया अदा किया।’
दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं.दुबई का पहला हिंदू मंदिर 1958 में बना था और यह एक मस्जिद के निकट है.
देश में झूठ, विदेश में झूठ, चुनाव में झूठ शायद नागपुर मुख्यालय की यही आदर्श और नैतिकता है. दुबई में मंदिर जमीन को लेकर सोशल मीडिया में भक्तों द्वारा तरहत-तरह की कहानियाँ लिखी जा रही हैं. जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है. दुबई में भी जाकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बता आये हैं. वहीँ, जेडीयू नेता के. सी. त्यागी ने कहा कि कल देर रात तक वो दुबई में थे, आत्मा उनकी बिहार में पड़ी हुई थी. और वो
दुबई से बिहार के मतदाताओं को राजनीतिक रिश्वत देने के लिए आरा पहुंचे. चुनाव में तरह-तरह की अफवाहों और झूठ बोले गए जिनका वास्तविकता से कोई मतलब ही नहीं था. बिहार में चुनाव शुरू हो रहे हैं सवा लाख करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने की बात शुरू कर दी जबकि यह पैकेज कहाँ और कैसे खर्च होगा उसका कोई प्लान भारत सरकार के पास नहीं है. बस काम चल रहा है किसी तरह से . सरकार चल रही है किसी तरह से.
सुमन
मंगलवार, 16 सितंबर 2014
बांटने वाली राजनीति के दो हथियार :नफरत फैलाने वाली भाषा और पितृसत्तात्मक मूल्य
पिछले आम चुनाव में विजय हासिल करने के बाद से भाजपा का चुनावी मुकाबलों में प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। आम चुनाव के बाद हुये उपचुनावों में पार्टी को करारी मात खानी पड़ी है। बिहार में भाजपा को परास्त करने में लालू.नीतीश मॉडल काम आया। उत्तरप्रदेश में उपचुनाव में क्या इस मॉडल को राज्य की राजनैतिक पार्टियां अपना सकीं हैंए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। भाजपा ने उत्तरप्रदेश में चुनावी विजय हासिल करने के लिए अपने पुराने हथियार.विभाजनकारी राजनीति.का जमकर इस्तेमाल किया। योगी आदित्यनाथ जहर उगलते पूरे प्रदेश में घूमे। इसके साथ हीए 'लव जिहाद' के नाम पर ढ़ेर सारी अफवाहें और झूठ फैलाये गये।
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के इस सीजन की शुरूआत, लोकसभा में योगी आदित्यनाथ के भड़काऊ भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में सांप्रदायिक दंगों के लिए मुसलमानों और केवल मुसलमानों को दोषी ठहराया। आगे भी वे इसी तर्ज पर बातें करते रहे। उन्होंने इस आशय के निराधार आरोप लगाये कि जिस इलाके में मुसलमानों की आबादी जितनी ज्यादा होती है वहां उतना ही तनाव और हिंसा होती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान, हिंसा की शुरूआत करते हैं और बाद में इसका फल भी भोगते हैं। भारत में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की व्यापक जांचें और विश्लेषण हुये हैं और इनके नतीजे, योगी आदित्यनाथ के आरोपों को झुठलाते हैं। लव जिहाद की तरफ इशारा करते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि अगर 'वे एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनायेंगे तो हम सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनायेंगे।' योगी आदित्यनाथ लगातार नफरत फैलाने वाली बातें कह रहे हैं और यह तब, जबकि प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि देश में हिंसा पर 10 साल तक पूर्ण रोक लगनी चाहिए।
आरएसएस.भाजपा गठबंधन को मानो लव जिहाद के नाम पर सोने की खान हाथ लग गई है। लव जिहाद को मुद्दा बनाने से उन्हें दोहरा लाभ हुआ है। जब वे यह कहते हैं कि मुस्लिम लड़कों को हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है तो एक ओर वे मुसलमानों का दानवीकरण करते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर उनका नियंत्रण और कड़ा होता है। इस प्रचार में यह निहित है कि हिंदू महिलाओं को आसानी से बहलाया.फुसलाया जा सकता है और वे अपनी जिंदगी के बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह,सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे के दो लक्ष्य एक साथ पूरे होते हैं। सांप्रदायिक राजनीतिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर पटकना चाहती है और साथ में समाज में महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं पर रोक लगाना भी उसके एजेण्डे में रहता है।
भाजपा और उसके साथी लव जिहाद का न सिर्फ भाषणों और वक्तव्यों के जरिये विरोध कर रहे हैं वरन् उन्होंने लव जिहाद का 'मुकाबला' करने के लिए मोर्चे बनाने भी शुरू कर दिये हैं। ऐसा ही एक मोर्चा मेरठ में गठित किया गया है और अन्य शहरों में भी इस तरह के संगठन बनाये जाने की चर्चा है। विहिप ने इस मुद्दे पर मोर्चा संभाल लिया है। विहिप का कहना है कि 'लव जिहाद के विरूद्ध हमारी लड़ाई का देशभक्त समर्थन करेंगे क्योंकि यह देश को एक दूसरे विभाजन की ओर ले जा रहा है।'संघ परिवार से जुड़ा एक अन्य संगठन धर्म जागरण मंच अचानक सक्रिय हो गया है और उसने एक अभियान चलाकर हिंदुओं से लव जिहाद के'खतरे' से लड़ने की अपील की है।
जहां तक लव जिहाद के जरिये हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाने के आरोप का संबंध है इसमें कोई दम नहीं है। मेरे एक मित्र, जो उत्तरप्रदेश में रहते हैंए ने बताया कि वे वहां लड़कियों के एक कालेज में किसी विषय पर भाषण देने गये थे। वहां पर उन्हें कालेज के एक युवा शिक्षक ने.जो हिंदू लड़कियों की रक्षा के लिए कटिबद्ध थे.बताया कि उनके इलाके में 6,000 से अधिक लड़कियां मुसलमान बन गई हैं। परंतु जब उनसे यह कहा गया कि वे उनमें से कम से कम 60 के नाम दे दें तो वे पीछे हट गये। उन्होंने कहा कि ये बात उनने सुनी थीं और इसलिए सच होंगी!
लव जिहाद के षड़यंत्र के संबंध में 15 रूपये कीमत की एक पुस्तिका भी जगह.जगह दिखलाई दे रही है। इस पुस्तिका का शीर्षक है 'हमारी महिलाओं को लव जिहाद के आतंकवाद से कैसे बचायें?'इसमें लव जिहाद के कुछ तथाकथित मामलों का वर्णन किया गया है। सभी विवरण लगभग एक से हैं। कोई मुस्लिम पुरूष स्वयं को हिंदू बताकर किसी हिंदू लड़की से प्रेम संबंध स्थापित कर लेता है। पुस्तिका में यह दावा किया गया है कि शादी हो जाने के बादए लड़कियों पर इस्लाम कुबूल करने का दबाव डाला जाता है। ऐसी लड़कियों को 'मुक्त' कराये जाने की जरूरत है।
लव जिहाद के मुद्दे पर कई बातें कही जा रही हैं परंतु इनमे से दो महत्वपूर्ण हैं। कई विश्लेषकों ने मोदी की राजनीति की तुलना हिटलर की राजनीति से की है। हिटलर ने भी जर्मनी के नागरिकों को यहूदियों का शत्रु बनाने के लिए इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था। यहूदियों को 'आतंरिक शत्रु' बताया जाता था। हिटलर की प्रचार मशीनरी यह कहती थी कि युवा यहूदी पुरूष, जर्मन लड़कियों को बहला.फुसलाकर आर्य नस्ल की शुद्धता को प्रदूषित कर रहे हैं और उनका उद्देश्य जर्मन राष्ट्र को गुलाम बनाना है।
भारत में आर्यसमाज और हिंदू महासभा ने सन् 1920 के दशक में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उस समय भी इन संस्थाओं ने हिंदू महिलाओं के सम्मान को बचाने का आह्वान करते हुए पर्चे निकाले थे जिनमें से एक का शीर्षक था 'हिन्दू औरतों की लूट'। इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया था।
क्या इस दुष्प्रचार का मुकाबला करने का कोई तरीका है? एक खबर यह है कि लव जिहाद के धुआंधार प्रचार में घिरे कुछ इलाकों के मुस्लिम युवकों ने सद्भाव का वातावरण निर्मित करने के लिए शांतिमार्च निकालने का निर्णय किया है। हमें उम्मीद है कि ऐसे ढे़र सारे मार्च निकाले जायेंगे और हमारे समाज को उस पागलपन से बचाया जायेगा जिस ओर उसे ढकेला जा रहा है।
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के इस सीजन की शुरूआत, लोकसभा में योगी आदित्यनाथ के भड़काऊ भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में सांप्रदायिक दंगों के लिए मुसलमानों और केवल मुसलमानों को दोषी ठहराया। आगे भी वे इसी तर्ज पर बातें करते रहे। उन्होंने इस आशय के निराधार आरोप लगाये कि जिस इलाके में मुसलमानों की आबादी जितनी ज्यादा होती है वहां उतना ही तनाव और हिंसा होती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान, हिंसा की शुरूआत करते हैं और बाद में इसका फल भी भोगते हैं। भारत में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की व्यापक जांचें और विश्लेषण हुये हैं और इनके नतीजे, योगी आदित्यनाथ के आरोपों को झुठलाते हैं। लव जिहाद की तरफ इशारा करते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि अगर 'वे एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनायेंगे तो हम सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनायेंगे।' योगी आदित्यनाथ लगातार नफरत फैलाने वाली बातें कह रहे हैं और यह तब, जबकि प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि देश में हिंसा पर 10 साल तक पूर्ण रोक लगनी चाहिए।
आरएसएस.भाजपा गठबंधन को मानो लव जिहाद के नाम पर सोने की खान हाथ लग गई है। लव जिहाद को मुद्दा बनाने से उन्हें दोहरा लाभ हुआ है। जब वे यह कहते हैं कि मुस्लिम लड़कों को हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है तो एक ओर वे मुसलमानों का दानवीकरण करते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर उनका नियंत्रण और कड़ा होता है। इस प्रचार में यह निहित है कि हिंदू महिलाओं को आसानी से बहलाया.फुसलाया जा सकता है और वे अपनी जिंदगी के बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह,सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे के दो लक्ष्य एक साथ पूरे होते हैं। सांप्रदायिक राजनीतिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर पटकना चाहती है और साथ में समाज में महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं पर रोक लगाना भी उसके एजेण्डे में रहता है।
भाजपा और उसके साथी लव जिहाद का न सिर्फ भाषणों और वक्तव्यों के जरिये विरोध कर रहे हैं वरन् उन्होंने लव जिहाद का 'मुकाबला' करने के लिए मोर्चे बनाने भी शुरू कर दिये हैं। ऐसा ही एक मोर्चा मेरठ में गठित किया गया है और अन्य शहरों में भी इस तरह के संगठन बनाये जाने की चर्चा है। विहिप ने इस मुद्दे पर मोर्चा संभाल लिया है। विहिप का कहना है कि 'लव जिहाद के विरूद्ध हमारी लड़ाई का देशभक्त समर्थन करेंगे क्योंकि यह देश को एक दूसरे विभाजन की ओर ले जा रहा है।'संघ परिवार से जुड़ा एक अन्य संगठन धर्म जागरण मंच अचानक सक्रिय हो गया है और उसने एक अभियान चलाकर हिंदुओं से लव जिहाद के'खतरे' से लड़ने की अपील की है।
जहां तक लव जिहाद के जरिये हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाने के आरोप का संबंध है इसमें कोई दम नहीं है। मेरे एक मित्र, जो उत्तरप्रदेश में रहते हैंए ने बताया कि वे वहां लड़कियों के एक कालेज में किसी विषय पर भाषण देने गये थे। वहां पर उन्हें कालेज के एक युवा शिक्षक ने.जो हिंदू लड़कियों की रक्षा के लिए कटिबद्ध थे.बताया कि उनके इलाके में 6,000 से अधिक लड़कियां मुसलमान बन गई हैं। परंतु जब उनसे यह कहा गया कि वे उनमें से कम से कम 60 के नाम दे दें तो वे पीछे हट गये। उन्होंने कहा कि ये बात उनने सुनी थीं और इसलिए सच होंगी!
लव जिहाद के षड़यंत्र के संबंध में 15 रूपये कीमत की एक पुस्तिका भी जगह.जगह दिखलाई दे रही है। इस पुस्तिका का शीर्षक है 'हमारी महिलाओं को लव जिहाद के आतंकवाद से कैसे बचायें?'इसमें लव जिहाद के कुछ तथाकथित मामलों का वर्णन किया गया है। सभी विवरण लगभग एक से हैं। कोई मुस्लिम पुरूष स्वयं को हिंदू बताकर किसी हिंदू लड़की से प्रेम संबंध स्थापित कर लेता है। पुस्तिका में यह दावा किया गया है कि शादी हो जाने के बादए लड़कियों पर इस्लाम कुबूल करने का दबाव डाला जाता है। ऐसी लड़कियों को 'मुक्त' कराये जाने की जरूरत है।
लव जिहाद के मुद्दे पर कई बातें कही जा रही हैं परंतु इनमे से दो महत्वपूर्ण हैं। कई विश्लेषकों ने मोदी की राजनीति की तुलना हिटलर की राजनीति से की है। हिटलर ने भी जर्मनी के नागरिकों को यहूदियों का शत्रु बनाने के लिए इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था। यहूदियों को 'आतंरिक शत्रु' बताया जाता था। हिटलर की प्रचार मशीनरी यह कहती थी कि युवा यहूदी पुरूष, जर्मन लड़कियों को बहला.फुसलाकर आर्य नस्ल की शुद्धता को प्रदूषित कर रहे हैं और उनका उद्देश्य जर्मन राष्ट्र को गुलाम बनाना है।
भारत में आर्यसमाज और हिंदू महासभा ने सन् 1920 के दशक में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उस समय भी इन संस्थाओं ने हिंदू महिलाओं के सम्मान को बचाने का आह्वान करते हुए पर्चे निकाले थे जिनमें से एक का शीर्षक था 'हिन्दू औरतों की लूट'। इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया था।
क्या इस दुष्प्रचार का मुकाबला करने का कोई तरीका है? एक खबर यह है कि लव जिहाद के धुआंधार प्रचार में घिरे कुछ इलाकों के मुस्लिम युवकों ने सद्भाव का वातावरण निर्मित करने के लिए शांतिमार्च निकालने का निर्णय किया है। हमें उम्मीद है कि ऐसे ढे़र सारे मार्च निकाले जायेंगे और हमारे समाज को उस पागलपन से बचाया जायेगा जिस ओर उसे ढकेला जा रहा है।
-राम पुनियानी
शनिवार, 1 मार्च 2014
उदारवादी हिन्दू धर्म बनाम संकीर्ण हिन्दुत्व
पिछले कुछ दशकों में अनेक किताबों पर कटु हमले हुए हैं और कई को प्रतिबंधित भी किया गया है। विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक समूहों की इस असहिष्णुता के लिए कई अलग-अलग कारण गिनाए जाते हैं। सलमान रूश्दी की पुस्तक द सेनेटिक वर्सेस, तस्लीमा नसरीन की लज्जा, सोनिया गांधी पर आधारित रेड साड़ी व ए.के. रामानुजन लिखित थ्री हण्ड्रेड रामायणास असहिष्णुता की शिकार हुई पुस्तकों में से कुछ हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ‘दूसरों’ की भावनाआंे को चोट पहुंचाने के बीच बहुत हल्की विभाजक रेखा होती है। कुछ राजनैतिक दल व संगठन, इस रेखा को अपनी मनमर्जी से खिसकाते भी रहते हैं। उदाहरणार्थ, हिन्दू दक्षिणपंथी सलमान रूश्दी या तस्लीमा नसरीन के लिए तो अभिव्यक्ति की आजादी चाहते हैं परंतु वे रामानुजन को यही स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। दूसरी ओर, मुस्लिम कट्टरपंथी बार-बार उनकी ‘‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचने’’ की बातें करते रहते हैं। वेंडी डोनीगर की पुस्तक द हिन्दूज: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है। हिन्दू दक्षिणपंथी चाहते हैं कि जो कुछ उनके राजनैतिक एजेन्डे में फिट नहीं बैठता, उसे धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला बताकर दबा दिया जाए। इस बढ़ती असहिष्णुता के कारण अभिव्यक्ति की आजादी तो सीमित हो ही रही है, इससे राजनैतिक-सामाजिक क्षेत्र में ‘तालिबानी’ तत्वों का प्रभाव भी बढ़ रहा है।
पेंग्विन ने अदालत के बाहर समझौता कर ‘द हिन्दूज...’ को बाजार में न लाने का निर्णय लिया है। यह देष के एक प्रतिष्ठित और षक्तिषाली प्रकाषक द्वारा उठाया गया निंदनीय कदम है। पेंग्विन के पास इतने
संसाधन हैं कि वह इस लड़ाई को देष के उच्चतम न्यायालय तक ले जा सकती थी और लेखक के अपने विचार अभिव्यक्त करने के अधिकार और पाठकों के उन विचारों को जानने के अधिकार की रक्षा कर सकती थी। पेंग्विन के निर्णय के विरोध में दो प्रतिष्ठित लेखकों, ज्योर्तिमय शर्मा व सिद्धार्थ वरदराजन ने पेंग्विन को उनके द्वारा लिखित पुस्तकें प्रकाशित न करने और उनके साथ हुए अनुबंध को रद्द करने के लिए कहा है। ‘द हिन्दूज...’ के विरूद्ध याचिका, दीनानाथ बतरा नामक व्यक्ति ने दायर की थी, जो कि ‘‘शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति’’ के मुखिया हैं। याचिका कहती है कि पुस्तक में ‘‘उथली और तोड़ी-मरोड़ी गई बातें कही गई हैं, उसमें तथ्यात्मक गलतियां हैं और वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।’’ याचिका में यह भी कहा गया है कि डोनीगर, ‘‘ईसाई मिशनरी हैं और उनका असली एजेण्डा हिन्दुओं को अपमानित करना और उनके धर्म की छवि को बिगाड़ना है।’’ दिलचस्प बात यह है कि डोनीगर ईसाई हैं ही नहीं। वे यहूदी हैं। अपनी पुस्तक के प्राक्कथन में वे कहती हैं, ‘‘वैकल्पिक इतिहास लिखने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यह बताना भी है कि महिलाओं व अछूत जैसे वर्गों-जिनके बारे में आमतौर पर कहा जाता है कि वे दमित थे, उनकी आवाज नहीं सुनी जाती थी और उन्होंने धार्मिक परंपराओं के विकास में कोई भूमिका अदा नहीं की-का असल में हिन्दू धर्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान था। मैं हिन्दू धर्म के उस पक्ष पर रोशनी डालना चाहती हूं, जिसे दबा दिया गया और जिसका मीडिया और पाठ्यपुस्तकों में कोई उल्लेख नहीं मिलता...यह पुस्तक दर्शन के बारे में नहीं है, यह ध्यान के बारे में नहीं है, यह कहानियों के बारे में है-जानवरों, अछूतों और महिलाओं की कहानियों के बारे में-जो यह बताती हैं कि हिन्दू धर्म ने बहुवाद को किस तरह नकारा।’’
पुस्तक के दो केन्द्रीय तत्व हैं। पहला है सेक्स से जुड़े तथ्यों का प्रस्तुतिकरण, जिन पर चर्चा को हिन्दू धर्म के स्व-घोषित ठेकेदारों ने वर्जित घोषित कर दिया है। हम जानते हैं कि खजुराहो और कोणार्क जैसी महान कृतियां, सेक्स से जुड़े मसलों पर केंद्रित हैं और जब तक हमारे समाज ने पाखंड का लबादा ओढ़कर इन कृतियों के असली चरित्र को नकारना षुरू नहीं किया था, तब तक उन्हें इसी रूप में देखा और स्वीकार किया जाता था। कालिदास की महान कृति ‘कुमारसंभवम्’ में शंकर-पार्वती की प्रणयक्रीडा का कामोत्तेजक वर्णन किया गया है। इसी तरह, आदि शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी‘, में देवी के सौंदर्य का विशद वर्णन है।
जहां तक डोनीगर की पुस्तक पर हमले का सवाल है, यह विहिप, बजरंगदल, शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अन्य संगठनों द्वारा, लंबे समय से की जा रही ऐसी ही हरकतों की ताजा कड़ी है। ये संगठन 1980 के दषक के बाद से अत्यंत आक्रामक हो गए हैं। इस दौरान धर्म से जुड़ी बातों के संबंध में आमजन भी अत्यंत संवेदनशील हो गए और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ी। यह दिलचस्प है कि एम.एफ. हुसैन द्वारा 1960 और 1970 के दशक में बनाए गए चित्रों पर हमले, 1980 के दशक में शुरू हुए, जब राममंदिर मुद्दे को लेकर आक्रामक हिन्दुत्व का उदय हुआ।
इस पुस्तक के विरूद्ध याचिका दायर करने वाले बतरा, आरएसएस की शैक्षणिक शाखा ‘विद्या भारती‘ के ‘अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान‘ के अध्यक्ष हैं। इसके पहले जिस पुस्तक पर संघ परिवार ने हल्ला बोला था वह थी ए. के. रामानुजन की थ्री हंडरेड रामायणास जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। इस छोटी सी पुस्तक में यह बताया गया है कि भगवान राम की कथा के कितने विभिन्न स्वरूप हैं। जाहिर है कि रामकथा के कई स्वरूपों के अस्तित्व को स्वीकार करने से राम मंदिर आंदोलन के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता। उसके भी पहले, आरएसएस के समर्थकों ने रामकथा के विभिन्न स्वरूपों पर ‘सहमत‘ द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी पर हमला किया था। इसी तर्ज पर, संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना ने अम्बेडकर की पुस्तक रिडल्स आॅफ राम एण्ड कृष्ण के प्रकाशन का भी विरोध किया था। इस पुस्तक में अम्बेडकर ने लिखा है कि वे राम और कृष्ण को भगवान नहीं मानते और उनकी पूजा नहीं करेंगे।
डोनीगर, लंदन विश्वविद्यालय में प्राच्य एवं अफ्रीकी अध्ययन की प्राध्यापक रही हैं। उन्होंने संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन में डाक्टरेट की दो उपाधियां हासिल की हैं और हिन्दू धर्म पर कई विद्वतापूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उनका कहना है कि देशज भाषाओं के धार्मिक साहित्य मंे समाज के वंचित वर्गों, महिलाओं व अछूतों के प्रति सहानुभूति व करूणा झलकती है। वे मनुस्मृति की कटु आलोचक हैं क्योंकि वह महिलाओं को दोयम दर्जा देती है। साथ ही वे वात्सायन के कामसूत्र की सराहना करती हैं, क्योंकि उसमें महिलाआंे का चित्रण संवेदनशीलता से किया गया है।
संघ और उससे जुड़े संगठनों का हिन्दू धर्म और उसके मूर्तिषास्त्र के विभिन्न संस्करणों का विरोध करना स्वाभाविक है। यह उनके राजनैतिक एजेन्डे का हिस्सा है। उनका जोर केवल हिन्दू धर्म के ब्राहम्णवादी संस्करण पर है और नाथ, तंत्र, भक्ति, षैव, सिद्ध आदि जैसी अन्य हिन्दू परंपराओं को वे नकारते हंै। आरएसएस-छाप हिन्दू धर्म का निर्माण, संघ के हिन्दुत्व प्रोजेक्ट का भाग है, जिसकी षुरूआत बिटिश काल में हुई थी। हिन्दुत्व, संघ की राजनैतिक विचारधारा है। हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म व परंपराओं की यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञों द्वारा की गई व्याख्या पर आधारित है। यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञ, एकेश्वरवादी थे और उनके एकेश्वरवाद की ओर झुकाव ने हिन्दू धर्म की उनकी व्याख्या को प्रभावित किया। वे हिन्दू धर्म की समृद्ध दार्षनिक, आध्यात्मिक व धार्मिक विविधता को समझ ही नहीं सके। उनकी धर्म की समझ एक पैगंबर के आसपास घूमती थी। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म अनेक परंपराओं का मिश्रण था और ये सारी परंपराएं उसमें एक साथ जीवित थीं। ब्राहम्णवाद उनमें से केवल एक परंपरा थी। ब्रिटिश काल में प्राच्य विद्वानों और ब्रिटिश शासकों ने केवल ब्राहम्णवादी धार्मिक साहित्य और मूल्यों को महत्व दिया। इससे जातिगत व लैंगिक भेदभाव को मजबूती मिली व ब्राहम्णवाद को हिन्दू धर्म का पर्याय मान लिया गया। इसी के चलते, अम्बेडकर ने कहा कि ‘हिन्दू धर्म ब्राहम्णवादी धर्मशास्त्र है‘। वे हिन्दू धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक असमानता की निंदा कर रहे थे। हिन्दू धर्म की ब्राहम्णवादी धारा के धुर विपरीत थी श्रमणिक धारा, जो पषिचिमी विद्वानों और ब्रिटिश नीति निर्माताओं के ज्ञान के क्षितिज पर कहीं थी ही नहीं।
शनैः-शनैः बेदम हो रहे हिन्दू जमींदारों और उच्च जातियों ने हिन्दुत्व की राजनीति शु रू कर दी। उन्होंने गौरवषाली हिन्दू परंपराओं के नाम पर जातिगत और लैंगिक यथास्थितिवाद को बनाए रखने का उपक्रम किया ताकि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उनका प्रभुत्व कायम रहे। स्वाधीनता संग्राम और उसके नेता महात्मा गांधी का हिन्दू धर्म, ब्राहम्णवादी-हिन्दुत्ववादी धारा से एकदम अलग था। वे उदारवादी श्रमणिक परंपरा के अधिक नजदीक थे। यह वह हिन्दू धर्म था, जिससे हिन्दुओं का बड़ा तबका जुड़ा हुआ था।
हिन्दू महासभा और आरएसएस का हिन्दुत्व चन्द तबकों तक सीमित था और इनमें मुख्य थे श्रेष्ठि वर्ग के ब्राहम्ण्वादी। इनका जोर उन मूल्यों पर था जो महिलाओं और दलितों को गरिमापूर्ण जीवन से वंचित करते थे। यही कारण है कि आरएसएस और उसका समर्थक श्रेष्ठि वर्ग, जाति और लिंग से जुड़े सामाजिक परिवर्तनों से दूर रहे और हिन्दू धर्म की उनकी संकीर्ण व्याख्या के अनुरूप, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देते रहे। आरएसएस ने अपने एजेन्डे के परिपालन में ‘शिक्षा बचाओ अभियान समिति‘ का गठन किया। यही संस्था एनडीए के शासनकाल में पुस्तकों के साम्प्रदायिकीकरण क लिए जिम्मेदार थी। यही वह संस्था है जो कई शैक्षणिक संस्थाओं, जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर व एकल विद्यालय शामिल हैं, के जरिए इतिहास की संकीर्ण व विघटनकारी व्याख्या को विद्यार्थियों के मनोमस्तिष्क में बैठा रही है। आश्चर्य नहीं कि डोनीगर की पुस्तक देखते ही वे ऐसे भड़के जैसे लाल कपड़ा देखने पर सांड भड़कता है। यह पुस्तक हिन्दुओं की समृद्ध, विविधवर्णी परंपराओं की चर्चा करती है और सेक्स से जुड़े मुद्दों पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं करती। डोनीगर उदारवादी हिन्दू धर्म की हामी हैं जबकि संघ चाहता है कि वह समाज पर अपना संकीर्ण हिन्दुत्व थोप दे। उदारवादी हिन्दू धर्म और संकीर्ण हिन्दुत्व के बीच संघर्ष ही इस पुस्तक के विषय में चल रही बहस के मूल में है।
-राम पुनियानी
पेंग्विन ने अदालत के बाहर समझौता कर ‘द हिन्दूज...’ को बाजार में न लाने का निर्णय लिया है। यह देष के एक प्रतिष्ठित और षक्तिषाली प्रकाषक द्वारा उठाया गया निंदनीय कदम है। पेंग्विन के पास इतने
संसाधन हैं कि वह इस लड़ाई को देष के उच्चतम न्यायालय तक ले जा सकती थी और लेखक के अपने विचार अभिव्यक्त करने के अधिकार और पाठकों के उन विचारों को जानने के अधिकार की रक्षा कर सकती थी। पेंग्विन के निर्णय के विरोध में दो प्रतिष्ठित लेखकों, ज्योर्तिमय शर्मा व सिद्धार्थ वरदराजन ने पेंग्विन को उनके द्वारा लिखित पुस्तकें प्रकाशित न करने और उनके साथ हुए अनुबंध को रद्द करने के लिए कहा है। ‘द हिन्दूज...’ के विरूद्ध याचिका, दीनानाथ बतरा नामक व्यक्ति ने दायर की थी, जो कि ‘‘शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति’’ के मुखिया हैं। याचिका कहती है कि पुस्तक में ‘‘उथली और तोड़ी-मरोड़ी गई बातें कही गई हैं, उसमें तथ्यात्मक गलतियां हैं और वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।’’ याचिका में यह भी कहा गया है कि डोनीगर, ‘‘ईसाई मिशनरी हैं और उनका असली एजेण्डा हिन्दुओं को अपमानित करना और उनके धर्म की छवि को बिगाड़ना है।’’ दिलचस्प बात यह है कि डोनीगर ईसाई हैं ही नहीं। वे यहूदी हैं। अपनी पुस्तक के प्राक्कथन में वे कहती हैं, ‘‘वैकल्पिक इतिहास लिखने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यह बताना भी है कि महिलाओं व अछूत जैसे वर्गों-जिनके बारे में आमतौर पर कहा जाता है कि वे दमित थे, उनकी आवाज नहीं सुनी जाती थी और उन्होंने धार्मिक परंपराओं के विकास में कोई भूमिका अदा नहीं की-का असल में हिन्दू धर्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान था। मैं हिन्दू धर्म के उस पक्ष पर रोशनी डालना चाहती हूं, जिसे दबा दिया गया और जिसका मीडिया और पाठ्यपुस्तकों में कोई उल्लेख नहीं मिलता...यह पुस्तक दर्शन के बारे में नहीं है, यह ध्यान के बारे में नहीं है, यह कहानियों के बारे में है-जानवरों, अछूतों और महिलाओं की कहानियों के बारे में-जो यह बताती हैं कि हिन्दू धर्म ने बहुवाद को किस तरह नकारा।’’
पुस्तक के दो केन्द्रीय तत्व हैं। पहला है सेक्स से जुड़े तथ्यों का प्रस्तुतिकरण, जिन पर चर्चा को हिन्दू धर्म के स्व-घोषित ठेकेदारों ने वर्जित घोषित कर दिया है। हम जानते हैं कि खजुराहो और कोणार्क जैसी महान कृतियां, सेक्स से जुड़े मसलों पर केंद्रित हैं और जब तक हमारे समाज ने पाखंड का लबादा ओढ़कर इन कृतियों के असली चरित्र को नकारना षुरू नहीं किया था, तब तक उन्हें इसी रूप में देखा और स्वीकार किया जाता था। कालिदास की महान कृति ‘कुमारसंभवम्’ में शंकर-पार्वती की प्रणयक्रीडा का कामोत्तेजक वर्णन किया गया है। इसी तरह, आदि शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी‘, में देवी के सौंदर्य का विशद वर्णन है।
जहां तक डोनीगर की पुस्तक पर हमले का सवाल है, यह विहिप, बजरंगदल, शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अन्य संगठनों द्वारा, लंबे समय से की जा रही ऐसी ही हरकतों की ताजा कड़ी है। ये संगठन 1980 के दषक के बाद से अत्यंत आक्रामक हो गए हैं। इस दौरान धर्म से जुड़ी बातों के संबंध में आमजन भी अत्यंत संवेदनशील हो गए और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ी। यह दिलचस्प है कि एम.एफ. हुसैन द्वारा 1960 और 1970 के दशक में बनाए गए चित्रों पर हमले, 1980 के दशक में शुरू हुए, जब राममंदिर मुद्दे को लेकर आक्रामक हिन्दुत्व का उदय हुआ।
इस पुस्तक के विरूद्ध याचिका दायर करने वाले बतरा, आरएसएस की शैक्षणिक शाखा ‘विद्या भारती‘ के ‘अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान‘ के अध्यक्ष हैं। इसके पहले जिस पुस्तक पर संघ परिवार ने हल्ला बोला था वह थी ए. के. रामानुजन की थ्री हंडरेड रामायणास जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। इस छोटी सी पुस्तक में यह बताया गया है कि भगवान राम की कथा के कितने विभिन्न स्वरूप हैं। जाहिर है कि रामकथा के कई स्वरूपों के अस्तित्व को स्वीकार करने से राम मंदिर आंदोलन के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता। उसके भी पहले, आरएसएस के समर्थकों ने रामकथा के विभिन्न स्वरूपों पर ‘सहमत‘ द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी पर हमला किया था। इसी तर्ज पर, संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना ने अम्बेडकर की पुस्तक रिडल्स आॅफ राम एण्ड कृष्ण के प्रकाशन का भी विरोध किया था। इस पुस्तक में अम्बेडकर ने लिखा है कि वे राम और कृष्ण को भगवान नहीं मानते और उनकी पूजा नहीं करेंगे।
डोनीगर, लंदन विश्वविद्यालय में प्राच्य एवं अफ्रीकी अध्ययन की प्राध्यापक रही हैं। उन्होंने संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन में डाक्टरेट की दो उपाधियां हासिल की हैं और हिन्दू धर्म पर कई विद्वतापूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उनका कहना है कि देशज भाषाओं के धार्मिक साहित्य मंे समाज के वंचित वर्गों, महिलाओं व अछूतों के प्रति सहानुभूति व करूणा झलकती है। वे मनुस्मृति की कटु आलोचक हैं क्योंकि वह महिलाओं को दोयम दर्जा देती है। साथ ही वे वात्सायन के कामसूत्र की सराहना करती हैं, क्योंकि उसमें महिलाआंे का चित्रण संवेदनशीलता से किया गया है।
संघ और उससे जुड़े संगठनों का हिन्दू धर्म और उसके मूर्तिषास्त्र के विभिन्न संस्करणों का विरोध करना स्वाभाविक है। यह उनके राजनैतिक एजेन्डे का हिस्सा है। उनका जोर केवल हिन्दू धर्म के ब्राहम्णवादी संस्करण पर है और नाथ, तंत्र, भक्ति, षैव, सिद्ध आदि जैसी अन्य हिन्दू परंपराओं को वे नकारते हंै। आरएसएस-छाप हिन्दू धर्म का निर्माण, संघ के हिन्दुत्व प्रोजेक्ट का भाग है, जिसकी षुरूआत बिटिश काल में हुई थी। हिन्दुत्व, संघ की राजनैतिक विचारधारा है। हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म व परंपराओं की यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञों द्वारा की गई व्याख्या पर आधारित है। यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञ, एकेश्वरवादी थे और उनके एकेश्वरवाद की ओर झुकाव ने हिन्दू धर्म की उनकी व्याख्या को प्रभावित किया। वे हिन्दू धर्म की समृद्ध दार्षनिक, आध्यात्मिक व धार्मिक विविधता को समझ ही नहीं सके। उनकी धर्म की समझ एक पैगंबर के आसपास घूमती थी। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म अनेक परंपराओं का मिश्रण था और ये सारी परंपराएं उसमें एक साथ जीवित थीं। ब्राहम्णवाद उनमें से केवल एक परंपरा थी। ब्रिटिश काल में प्राच्य विद्वानों और ब्रिटिश शासकों ने केवल ब्राहम्णवादी धार्मिक साहित्य और मूल्यों को महत्व दिया। इससे जातिगत व लैंगिक भेदभाव को मजबूती मिली व ब्राहम्णवाद को हिन्दू धर्म का पर्याय मान लिया गया। इसी के चलते, अम्बेडकर ने कहा कि ‘हिन्दू धर्म ब्राहम्णवादी धर्मशास्त्र है‘। वे हिन्दू धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक असमानता की निंदा कर रहे थे। हिन्दू धर्म की ब्राहम्णवादी धारा के धुर विपरीत थी श्रमणिक धारा, जो पषिचिमी विद्वानों और ब्रिटिश नीति निर्माताओं के ज्ञान के क्षितिज पर कहीं थी ही नहीं।
शनैः-शनैः बेदम हो रहे हिन्दू जमींदारों और उच्च जातियों ने हिन्दुत्व की राजनीति शु रू कर दी। उन्होंने गौरवषाली हिन्दू परंपराओं के नाम पर जातिगत और लैंगिक यथास्थितिवाद को बनाए रखने का उपक्रम किया ताकि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उनका प्रभुत्व कायम रहे। स्वाधीनता संग्राम और उसके नेता महात्मा गांधी का हिन्दू धर्म, ब्राहम्णवादी-हिन्दुत्ववादी धारा से एकदम अलग था। वे उदारवादी श्रमणिक परंपरा के अधिक नजदीक थे। यह वह हिन्दू धर्म था, जिससे हिन्दुओं का बड़ा तबका जुड़ा हुआ था।
हिन्दू महासभा और आरएसएस का हिन्दुत्व चन्द तबकों तक सीमित था और इनमें मुख्य थे श्रेष्ठि वर्ग के ब्राहम्ण्वादी। इनका जोर उन मूल्यों पर था जो महिलाओं और दलितों को गरिमापूर्ण जीवन से वंचित करते थे। यही कारण है कि आरएसएस और उसका समर्थक श्रेष्ठि वर्ग, जाति और लिंग से जुड़े सामाजिक परिवर्तनों से दूर रहे और हिन्दू धर्म की उनकी संकीर्ण व्याख्या के अनुरूप, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देते रहे। आरएसएस ने अपने एजेन्डे के परिपालन में ‘शिक्षा बचाओ अभियान समिति‘ का गठन किया। यही संस्था एनडीए के शासनकाल में पुस्तकों के साम्प्रदायिकीकरण क लिए जिम्मेदार थी। यही वह संस्था है जो कई शैक्षणिक संस्थाओं, जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर व एकल विद्यालय शामिल हैं, के जरिए इतिहास की संकीर्ण व विघटनकारी व्याख्या को विद्यार्थियों के मनोमस्तिष्क में बैठा रही है। आश्चर्य नहीं कि डोनीगर की पुस्तक देखते ही वे ऐसे भड़के जैसे लाल कपड़ा देखने पर सांड भड़कता है। यह पुस्तक हिन्दुओं की समृद्ध, विविधवर्णी परंपराओं की चर्चा करती है और सेक्स से जुड़े मुद्दों पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं करती। डोनीगर उदारवादी हिन्दू धर्म की हामी हैं जबकि संघ चाहता है कि वह समाज पर अपना संकीर्ण हिन्दुत्व थोप दे। उदारवादी हिन्दू धर्म और संकीर्ण हिन्दुत्व के बीच संघर्ष ही इस पुस्तक के विषय में चल रही बहस के मूल में है।
-राम पुनियानी
बुधवार, 24 जुलाई 2013
हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद
हिन्दू राष्ट्रवाद बनाम भारतीय राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बहस नई नहीं है। औपनिवेशिक दौर में, जब आजादी का आंदोलन, भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा और उसके मूल्यों को स्वर दे रहा था तब हिन्दुओं के एक तबके ने स्वयं को स्वाधीनता संग्राम से अलग रखा और हिन्दू राष्ट्रवाद और उससे जुड़े हुए मूल्यों पर जोर दिया।
यह बहस एक बार फिर उभरी है। इसका कारण है भाजपा.एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बतौर स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए आतुर नरेन्द्र मोदी द्वारा दिया गया एक साक्षात्कार ;जुलाई, 2013, जिसमें उन्होंने कहा कि वे हिन्दू पैदा हुए थे और वे राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! क्या इसी तर्क को थोड़ा सा आगे ले जाकर, मुसलमान नहीं कह सकते कि चूंकि वे मुसलमान के रूप में जन्मे थे और राष्ट्रवादी हैं इसलिए वे मुस्लिम राष्ट्रवादी हैं। यही बात ईसाई और सिक्ख भी कह सकते हैं। बिना किसी संदेह के यह कहा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति ने स्वयं को मुस्लिम या ईसाई राष्ट्रवादी बताया तो उसकी घोर विपरीत प्रतिक्रिया होगी।
मोदी का एक चीज को दूसरी चीज से जोड़कर यह कहना कि चूंकि वे राष्ट्रवादी हैं और हिन्दू हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, दरअसल, देश की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है। यह तर्क मोदी के पितृ संगठन आरएसएस की विचारधारा और कार्यशैली का हिस्सा है। औपनिवेशिक काल में, उद्योगपतियों, व्यवसायियों औद्योगिक श्रमिकों और शिक्षितों के नए उभरते वर्गों ने, एक मंच पर आकर कई संगठन बनाए। इनमें शामिल थे मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा, बाम्बे एसोसिएशन आदि। इन संगठनों को यह लगा कि उन्हें आपस में हाथ मिलाकर एक मिलाजुला राजनैतिक संगठन बनाना चाहिए। इसी के चलते, सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अस्तित्व में आई। दूसरी ओर, मुसलमान और हिन्दू जमींदारों और राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग ने भी, कांग्रेस की समावेशी राजनीति का विरोध करने के लिए एक मंच पर आने का निर्णय लिया। शनैः.शनैः कांग्रेस, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों की मुख्य वाहक बन गई। अस्त होते वर्ग तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तनों के कारण, अपने अस्तित्व को खतरे में महसूस कर रहे थे। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट को उन्होंने इस रूप में प्रस्तुत किया कि उनका धर्म संकट में है। उन्हें कांग्रेस का साम्राज्यवादी शासकों का विरोध भी पसंद नहीं आया। कांग्रेस ने उन सामाजिक समूहों की ओर से मांगें उठानी शुरू कर दीं जिनका वह प्रतिनिधित्व करती थी और जो असली भारत थे।
राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग का कहना था कि शासकों का विरोध करना और उनकी चरण वंदना न करनाए हमारे धर्म के विरूद्ध है और इसलिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। अस्त होते वर्गों ने ढाका के नवाब और काशी के राजा के नेतृत्व में, सन् 1888 में युनाईटेड इंडिया पेटियाट्रिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में, अंग्रेजों की कुटिल चालों के चलते, इस एसोसिएशन में शामिल मुस्लिम श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1906 में मुस्लिम लीग का गठन कर लिया व इसके समानांतर, हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1909 में पंजाब हिन्दू सभा बनाई और 1915 में हिन्दू महासभा। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा क्रमशः मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद की पैरोकार थीं। हिन्दू राष्ट्रवादियों की राजनैतिक विचारधारा बनी हिन्दुत्व,जिसे सावरकर ने सन् 1923 में अपनी पुस्तक हिन्दुत्व ऑर हू इज ए हिन्दू में प्रतिपादित किया। अंग्रेजों के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता था? वे जानते थे कि ये संगठन राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करेंगे। अतः उन्होंने पर्दे के पीछे से हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों को समर्थन देना जारी रखा।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित हो, सन् 1925 में आरएसएस का गठन किया गया, जिसका लक्ष्य था हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते पर चलकर, हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना। उभरते हुए नए भारत के प्रतिनिधि थे भगतसिंह, अम्बेडकर, गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद व अन्य, जिनका राष्ट्रवाद शुद्ध भारतीय था और स्वतंत्रता,समानता व बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित था। मुस्लिम लीग ने चुनिंदा मुस्लिम परंपराओं के आधार पर सामंती समाज के जातिगत और लैंगिक पदानुक्रम को मुसलमानों पर लादना चाहा। हिन्दू महासभा और आरएसएस ने मनुस्मृति जैसी प्रतिगामी पुस्तकों को अपना आदर्श बनाकरए इसी तरह की जाति व लिंग आधारित ऊँचनीच को प्रोत्साहित किया। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तबकों ने कभी आंजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया क्योंकि यह आंदोलन समावेशी था और धर्मनिरपेक्ष.प्रजातांत्रिक मूल्यों का हामी। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों ने इतिहास में अपने.अपने धर्मों के राजाओं.बादशाहों का महिमामंडन किया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। इसके चंद अपवाद भी थे, जिनपर राष्ट्रवाद का लेबिल चिपकाकर ये संगठन स्वाधीनता संग्राम में अपनी भागीदारी का दावा करते हैं।
गांधी द्वारा ब्रिटिश.विरोधी संघर्ष में आम लोगों को शामिल करने के प्रयास ने जिन्ना जैसे संविधानवादियों और हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे परंपरावादियों को मुख्य राष्ट्रीय धारा से और दूर कर दिया और सन् 1920 के बाद से वे स्वयं की ताकत बढ़ाने में जुट गए। हिन्दू राष्ट्रवादियों की 1920 के बाद से नीति एकदम साफ थी.अंग्रेजों का साथ दो और मुस्लिम राष्ट्रवादियों का विरोध करो। ठीक यही नीति मुस्लिम लीग की भी थी। वह कांग्रेस को हिन्दू पार्टी बताती थी। स्वाधीनता और उसके साथ हुए त्रासद बंटवारे के बाद, मुस्लिम लीगी तो पाकिस्तान चले गए परंतु वे भारत में अपने साथी इतनी संख्या में छोड़ गए कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता जीवित बनी रही। शनैः.शनैः हिन्दू महासभा और आरएसएस ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए। उन्होंने शुरूआत की महात्मा गांधी की हत्या से . उन महात्मा गांधी की, जो निःसंदेहए पिछली कई सदियों के सर्वश्रेष्ठ हिन्दू थे। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा की स्थापना की। ये राष्ट्रवादी सार्वजनिक क्षेत्र और सहकारी कृषि के विरोधी थे और उन्होंनेमुसलमानों का भारतीयकरण नाम से एक अभियान शुरू किया।
धार्मिक राष्ट्रवादियों के लिए पहचान से जुड़े मुद्दे हमेशा महत्ववपूर्ण रहे हैं।गाय हमारी माता है, राममंदिर, रामसेतु, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके आधार पर आम जनता की भावनाएं भड़काई गईं और उनमें जुनून पैदा किया गया। ये ताकतें बार.बार इस पर जोर दे रही हैं कि कांग्रेस के राज में तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में दंगे हुए हैं परंतु वे यह भुला देती हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ें दूसरे से घृणा करो की विचारधारा में हैं, जिन्हें साम्प्रदायिक धाराओं ने समाज में फैलाया है। साम्प्रदायिक हिंसा के कारण ही एक साम्प्रदायिक पार्टी सत्ता में आ सकी। साम्प्रदायिक दंगों के कारण ही धार्मिक आधार पर समाज का ध्रुवीकरण हुआ। मोदी का दावा है कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण होता ही है। परंतु वे इस तथ्य को अपेक्षित महत्व नहीं देते कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण, सामाजिक मुद्दों पर होता है जैसे अमेरिका का समाज रिपब्लिकनों और डेमोक्रेटों के बीच ध्रुवीकृत है। सामाजिक नीतियों और राजनैतिक मुद्दों के आधार पर ध्रुवीकरण, प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरी ओर,हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, धार्मिक पहचान के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण कर रहे हैं। इसकी तुलना अमेरिका या इंग्लैड में राजनैतिक ध्रुवीकरण से नहीं की जा सकती। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ है।
मोदी एक समर्पित स्वयंसेवक हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के पक्षधर हैं। वे इस तथ्य को जानबूझ कर तरजीह नहीं देना चाहते कि भारत के हिन्दू स्वयं को हिन्दू राष्ट्रवादी न कहते थे और ना कहते हैं। गांधी, नैतिक और सामाजिक दृष्टि से हिन्दू थे परंतु वे हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद मुस्लिम थे परंतु वे मुस्लिम राष्ट्रवादी नहीं थे। वे इस्लाम के महान अध्येता थे परंतु मुस्लिम राष्ट्रवादी शब्द उनके साथ कभी नहीं जुड़ा। स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत के सभी धर्मों के निवासियों ने भारतीय राष्ट्रवाद से नाता जोड़ा न कि धार्मिक राष्ट्रवाद से। आज भी सभी धर्मों के अधिकांश भारतीय, मोदी और उनके साथियों के विपरीत, धार्मिक राष्ट्रवादी नहीं हैं। वे भारतीय राष्ट्रवादी हैं।
हिन्दू राष्ट्रवादियों को जरूरत है राममंदिर की, भारतीय राष्ट्रवादियों को चाहिए स्कूल, विश्वविद्यालय और फैक्ट्रियां ताकि युवाओं को काम मिल सके। हिन्दू राष्ट्रवाद बांटने वाला और एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच दीवारें खड़ी करने वाला है। भारतीय राष्ट्रवाद समावेशी है और उसकी जड़ें इस दुनिया में हैं,दूसरी दुनिया में नहीं। दुर्भाग्यवश हिन्दू राष्ट्रवादी, पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर इतना शोर.शराबा कर रहे हैं कि गरीबों और समाज के हाशिए पर पटक दिए गए लोगों से जुड़े मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं। भारतीय राष्ट्रवाद, जो हमारे स्वाधीनता संग्राम से उपजा है, के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद एक चुनौती बन गया है। म्यंनमार और श्रीलंका में बौद्ध राष्ट्रवाद प्रजातांत्रिकरण की प्रक्रिया में रोड़ा बन गया है। मुस्लिम राष्ट्रवाद ने पाकिस्तान और कई अन्य देशों को बर्बाद कर दिया है।
ऐसा लग रहा है कि हम इतिहास की एक काली, अंधेरी सुरंग से गुजर रहे हैं, जब राजनीति में धर्म के घालमेल को न केवल स्वीकार्यता बल्कि कुछ हद तक सम्मान भी मिल गया है। यह भारत में तो ही रहा है दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी हो रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे देशवासी, धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच के फर्क को नहीं भूलेंगे।
हिन्दू राष्ट्रवाद समाज के कमजोर वर्गो की बेहतरी के लिए सकारात्मक कार्यवाही का विरोधी है और इसलिए अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण शब्द गढ़ा गया है। हिन्दू राष्ट्रवादी कतई नहीं चाहते कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए कुछ भी किया जाए। प्रधानमंत्री पद के इच्छुक सज्जन बहुत चतुर हैं। उनका यह कहना कि चूंकि वे हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, उनकी कुटिलता का एक और प्रमाण है। यह समाज को बांटने का उनका एक और भौंडा प्रयास है।
.-राम पुनियानी
यह बहस एक बार फिर उभरी है। इसका कारण है भाजपा.एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बतौर स्वयं को प्रस्तुत करने के लिए आतुर नरेन्द्र मोदी द्वारा दिया गया एक साक्षात्कार ;जुलाई, 2013, जिसमें उन्होंने कहा कि वे हिन्दू पैदा हुए थे और वे राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! क्या इसी तर्क को थोड़ा सा आगे ले जाकर, मुसलमान नहीं कह सकते कि चूंकि वे मुसलमान के रूप में जन्मे थे और राष्ट्रवादी हैं इसलिए वे मुस्लिम राष्ट्रवादी हैं। यही बात ईसाई और सिक्ख भी कह सकते हैं। बिना किसी संदेह के यह कहा जा सकता है कि अगर किसी व्यक्ति ने स्वयं को मुस्लिम या ईसाई राष्ट्रवादी बताया तो उसकी घोर विपरीत प्रतिक्रिया होगी।
मोदी का एक चीज को दूसरी चीज से जोड़कर यह कहना कि चूंकि वे राष्ट्रवादी हैं और हिन्दू हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, दरअसल, देश की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास है। यह तर्क मोदी के पितृ संगठन आरएसएस की विचारधारा और कार्यशैली का हिस्सा है। औपनिवेशिक काल में, उद्योगपतियों, व्यवसायियों औद्योगिक श्रमिकों और शिक्षितों के नए उभरते वर्गों ने, एक मंच पर आकर कई संगठन बनाए। इनमें शामिल थे मद्रास महाजन सभा, पुणे सार्वजनिक सभा, बाम्बे एसोसिएशन आदि। इन संगठनों को यह लगा कि उन्हें आपस में हाथ मिलाकर एक मिलाजुला राजनैतिक संगठन बनाना चाहिए। इसी के चलते, सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अस्तित्व में आई। दूसरी ओर, मुसलमान और हिन्दू जमींदारों और राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग ने भी, कांग्रेस की समावेशी राजनीति का विरोध करने के लिए एक मंच पर आने का निर्णय लिया। शनैः.शनैः कांग्रेस, भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों की मुख्य वाहक बन गई। अस्त होते वर्ग तेजी से हो रहे सामाजिक परिवर्तनों के कारण, अपने अस्तित्व को खतरे में महसूस कर रहे थे। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट को उन्होंने इस रूप में प्रस्तुत किया कि उनका धर्म संकट में है। उन्हें कांग्रेस का साम्राज्यवादी शासकों का विरोध भी पसंद नहीं आया। कांग्रेस ने उन सामाजिक समूहों की ओर से मांगें उठानी शुरू कर दीं जिनका वह प्रतिनिधित्व करती थी और जो असली भारत थे।
राजाओं.नवाबों के अस्त होते वर्ग का कहना था कि शासकों का विरोध करना और उनकी चरण वंदना न करनाए हमारे धर्म के विरूद्ध है और इसलिए अंग्रेजों के प्रति वफादारी को प्रोत्साहन देना आवश्यक है। अस्त होते वर्गों ने ढाका के नवाब और काशी के राजा के नेतृत्व में, सन् 1888 में युनाईटेड इंडिया पेटियाट्रिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में, अंग्रेजों की कुटिल चालों के चलते, इस एसोसिएशन में शामिल मुस्लिम श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1906 में मुस्लिम लीग का गठन कर लिया व इसके समानांतर, हिन्दू श्रेष्ठि वर्ग ने सन् 1909 में पंजाब हिन्दू सभा बनाई और 1915 में हिन्दू महासभा। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा क्रमशः मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्रवाद की पैरोकार थीं। हिन्दू राष्ट्रवादियों की राजनैतिक विचारधारा बनी हिन्दुत्व,जिसे सावरकर ने सन् 1923 में अपनी पुस्तक हिन्दुत्व ऑर हू इज ए हिन्दू में प्रतिपादित किया। अंग्रेजों के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता था? वे जानते थे कि ये संगठन राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करेंगे। अतः उन्होंने पर्दे के पीछे से हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों को समर्थन देना जारी रखा।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित हो, सन् 1925 में आरएसएस का गठन किया गया, जिसका लक्ष्य था हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते पर चलकर, हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना। उभरते हुए नए भारत के प्रतिनिधि थे भगतसिंह, अम्बेडकर, गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद व अन्य, जिनका राष्ट्रवाद शुद्ध भारतीय था और स्वतंत्रता,समानता व बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित था। मुस्लिम लीग ने चुनिंदा मुस्लिम परंपराओं के आधार पर सामंती समाज के जातिगत और लैंगिक पदानुक्रम को मुसलमानों पर लादना चाहा। हिन्दू महासभा और आरएसएस ने मनुस्मृति जैसी प्रतिगामी पुस्तकों को अपना आदर्श बनाकरए इसी तरह की जाति व लिंग आधारित ऊँचनीच को प्रोत्साहित किया। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तबकों ने कभी आंजादी के आंदोलन में भाग नहीं लिया क्योंकि यह आंदोलन समावेशी था और धर्मनिरपेक्ष.प्रजातांत्रिक मूल्यों का हामी। मुस्लिम और हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों ने इतिहास में अपने.अपने धर्मों के राजाओं.बादशाहों का महिमामंडन किया और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से सुरक्षित दूरी बनाए रखी। इसके चंद अपवाद भी थे, जिनपर राष्ट्रवाद का लेबिल चिपकाकर ये संगठन स्वाधीनता संग्राम में अपनी भागीदारी का दावा करते हैं।
गांधी द्वारा ब्रिटिश.विरोधी संघर्ष में आम लोगों को शामिल करने के प्रयास ने जिन्ना जैसे संविधानवादियों और हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे परंपरावादियों को मुख्य राष्ट्रीय धारा से और दूर कर दिया और सन् 1920 के बाद से वे स्वयं की ताकत बढ़ाने में जुट गए। हिन्दू राष्ट्रवादियों की 1920 के बाद से नीति एकदम साफ थी.अंग्रेजों का साथ दो और मुस्लिम राष्ट्रवादियों का विरोध करो। ठीक यही नीति मुस्लिम लीग की भी थी। वह कांग्रेस को हिन्दू पार्टी बताती थी। स्वाधीनता और उसके साथ हुए त्रासद बंटवारे के बाद, मुस्लिम लीगी तो पाकिस्तान चले गए परंतु वे भारत में अपने साथी इतनी संख्या में छोड़ गए कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता जीवित बनी रही। शनैः.शनैः हिन्दू महासभा और आरएसएस ने अपने पंख फैलाने शुरू कर दिए। उन्होंने शुरूआत की महात्मा गांधी की हत्या से . उन महात्मा गांधी की, जो निःसंदेहए पिछली कई सदियों के सर्वश्रेष्ठ हिन्दू थे। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने पहले जनसंघ और बाद में भाजपा की स्थापना की। ये राष्ट्रवादी सार्वजनिक क्षेत्र और सहकारी कृषि के विरोधी थे और उन्होंनेमुसलमानों का भारतीयकरण नाम से एक अभियान शुरू किया।
धार्मिक राष्ट्रवादियों के लिए पहचान से जुड़े मुद्दे हमेशा महत्ववपूर्ण रहे हैं।गाय हमारी माता है, राममंदिर, रामसेतु, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके आधार पर आम जनता की भावनाएं भड़काई गईं और उनमें जुनून पैदा किया गया। ये ताकतें बार.बार इस पर जोर दे रही हैं कि कांग्रेस के राज में तुलनात्मक रूप से अधिक संख्या में दंगे हुए हैं परंतु वे यह भुला देती हैं कि साम्प्रदायिक हिंसा की जड़ें दूसरे से घृणा करो की विचारधारा में हैं, जिन्हें साम्प्रदायिक धाराओं ने समाज में फैलाया है। साम्प्रदायिक हिंसा के कारण ही एक साम्प्रदायिक पार्टी सत्ता में आ सकी। साम्प्रदायिक दंगों के कारण ही धार्मिक आधार पर समाज का ध्रुवीकरण हुआ। मोदी का दावा है कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण होता ही है। परंतु वे इस तथ्य को अपेक्षित महत्व नहीं देते कि प्रजातंत्र में ध्रुवीकरण, सामाजिक मुद्दों पर होता है जैसे अमेरिका का समाज रिपब्लिकनों और डेमोक्रेटों के बीच ध्रुवीकृत है। सामाजिक नीतियों और राजनैतिक मुद्दों के आधार पर ध्रुवीकरण, प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। दूसरी ओर,हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी, धार्मिक पहचान के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण कर रहे हैं। इसकी तुलना अमेरिका या इंग्लैड में राजनैतिक ध्रुवीकरण से नहीं की जा सकती। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण, भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ है।
मोदी एक समर्पित स्वयंसेवक हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा के पक्षधर हैं। वे इस तथ्य को जानबूझ कर तरजीह नहीं देना चाहते कि भारत के हिन्दू स्वयं को हिन्दू राष्ट्रवादी न कहते थे और ना कहते हैं। गांधी, नैतिक और सामाजिक दृष्टि से हिन्दू थे परंतु वे हिन्दू राष्ट्रवादी नहीं थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद मुस्लिम थे परंतु वे मुस्लिम राष्ट्रवादी नहीं थे। वे इस्लाम के महान अध्येता थे परंतु मुस्लिम राष्ट्रवादी शब्द उनके साथ कभी नहीं जुड़ा। स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारत के सभी धर्मों के निवासियों ने भारतीय राष्ट्रवाद से नाता जोड़ा न कि धार्मिक राष्ट्रवाद से। आज भी सभी धर्मों के अधिकांश भारतीय, मोदी और उनके साथियों के विपरीत, धार्मिक राष्ट्रवादी नहीं हैं। वे भारतीय राष्ट्रवादी हैं।
हिन्दू राष्ट्रवादियों को जरूरत है राममंदिर की, भारतीय राष्ट्रवादियों को चाहिए स्कूल, विश्वविद्यालय और फैक्ट्रियां ताकि युवाओं को काम मिल सके। हिन्दू राष्ट्रवाद बांटने वाला और एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच दीवारें खड़ी करने वाला है। भारतीय राष्ट्रवाद समावेशी है और उसकी जड़ें इस दुनिया में हैं,दूसरी दुनिया में नहीं। दुर्भाग्यवश हिन्दू राष्ट्रवादी, पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर इतना शोर.शराबा कर रहे हैं कि गरीबों और समाज के हाशिए पर पटक दिए गए लोगों से जुड़े मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए हैं। भारतीय राष्ट्रवाद, जो हमारे स्वाधीनता संग्राम से उपजा है, के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद एक चुनौती बन गया है। म्यंनमार और श्रीलंका में बौद्ध राष्ट्रवाद प्रजातांत्रिकरण की प्रक्रिया में रोड़ा बन गया है। मुस्लिम राष्ट्रवाद ने पाकिस्तान और कई अन्य देशों को बर्बाद कर दिया है।
ऐसा लग रहा है कि हम इतिहास की एक काली, अंधेरी सुरंग से गुजर रहे हैं, जब राजनीति में धर्म के घालमेल को न केवल स्वीकार्यता बल्कि कुछ हद तक सम्मान भी मिल गया है। यह भारत में तो ही रहा है दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी हो रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हमारे देशवासी, धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद के बीच के फर्क को नहीं भूलेंगे।
हिन्दू राष्ट्रवाद समाज के कमजोर वर्गो की बेहतरी के लिए सकारात्मक कार्यवाही का विरोधी है और इसलिए अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण शब्द गढ़ा गया है। हिन्दू राष्ट्रवादी कतई नहीं चाहते कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए कुछ भी किया जाए। प्रधानमंत्री पद के इच्छुक सज्जन बहुत चतुर हैं। उनका यह कहना कि चूंकि वे हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, उनकी कुटिलता का एक और प्रमाण है। यह समाज को बांटने का उनका एक और भौंडा प्रयास है।
.-राम पुनियानी
बुधवार, 17 जुलाई 2013
मोदी जब भी बोलते हैं, देश को बांटने और भड़काने वाली भाषा बोलते हैं
नरेन्द्र मोदी जब भी बोलते हैं, देश को बांटने वाली बातें कहते हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्हांेने कम से कम तीन आपत्तजनक बातें कही हैं।
पहली आपŸिाजनक बात यह है कि उन्होंनेे सन् 2002 के राज्य प्रायोजित हत्याकांड में मारे गये लोगों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से की है। दूसरी आपŸिाजनक बात उन्होंने यह कही है कि वेहिन्दू राष्ट्रवादी हैं। तीसरी आपŸिाजनक बात यह कही कि कांग्रेस अपनी असफलताओं को छिपाने के लिये धर्मनिरपेक्षता का बुर्का ओड़ लेती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जो लोग कुत्तो को पालते हैं, उनके मरने पर उन्हें वैसा ही दुःख होता है जैसे उनके परिवार का कोई सदस्य चला गया हो। परन्तु यह भी एक वास्तविकता है कि जब कोई अपने दुश्मन के बारे में यह कहता है कि वह कुत्ते की मौत मरे तो वह उसके प्रति अपनी गहरी घृणा प्रगट कर रहा होता है। कुŸो की मौत बड़ी दर्दनाक होती है। बहुसंख्यक मामलों में उसे मृत्यु के पूर्व भारी यंत्रणा से गुजरना पड़ता है। इसलिये मोदी ने जब 2002 में हुई मौतों की तुलना कुत्ते के पिल्ले की मौत से की तो वे वास्तव में अपने मन की असली भावना को प्रगट कर रहे थे। वे मुसलमानों से अपने मन की गहराईयों से घृणा करते हैं। उनकी दिली इच्छा होगी कि सभी मुसलमानों को वैसी ही यंत्रणायुक्त मौत मिले, जैसी कुŸो को मिलती है। वैसे भी आज गुजरात में बहुसंख्यक मुसलमान जिस तरह की जिन्दगी जी रहे हैं जो आवारा कुŸो की होती है। अहमदाबाद जैसे शहर में भी मुसलमानों की लगभग सभी बस्तियों में आज भी वे सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं, जो एक नागरिक को मिलनी चाहिए। आज भी अनेक मुसलमान, जिन्हें 2002 में अपने गांव छोड़ने पड़े थे, वे वापस नहीं आ पाये हैं। मैंने स्वयं अहमदाबाद में मुसलमानों की एक ऐसी बस्ती देखी जिसकी गलियों में स्ट्रीट लाईट की व्यवस्था वहां के निवासियों को स्वयं करनी पड़ी थी। इस तरह के भेदभाव के अनेक उदाहरण गुजरात के अनेक क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं।
उसी इंटरव्यू में, जिसमें मोदी ने कहा था कि कुत्तो के पिल्ले की मौत पर भी उन्हें दुःख होता है, उन्होंनेे यह भी कहा था, ‘‘चूँकि मैं हिन्दू हूँ और राष्ट्रवादी हूं इसलिये मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूँ। राष्ट्रवादी का एक अर्थ राष्ट्रभक्त भी होता है। इस तरह, यह कहकर कि वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं, मोदी ने राष्ट्रभक्तों के बीच विभाजन की रेखा खींच दी है। यदि हमारे देश में राष्ट्रभक्ति की पहचान धर्म के आधार पर होगी तो हमारे देश में विभिन्न प्रकार के राष्ट्रभक्त हो जायेंगे। यदि इस देश के कुछ नागरिक हिन्दू नेशनलिस्ट हैं, तो फिर मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख, और बौद्ध और जैन नेशनलिस्ट भी होंगे। जब धर्म के आधार पर नेशनलिस्टों की पहचान होगी तब धर्म के आधार पर नेशन अर्थात राष्ट्र की पहचान भी होगी। इस तरह, हमारे देश में धर्म-आधारित अनेक राष्ट्र हो जायेंगे।
सबसे पहले विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि भारत में दो राष्ट्र हैं-एक हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र। इसी बात को जिन्ना ने भी दुहराया था। सच पूछा जाए तो सावरकर द्वारा दी गई राष्ट्रवाद की धर्म-आधारित परिभाषा ने ही हमारे देश का विभाजन किया था। फिर, सावरकर ने यह भी कहा था कि जिनकी जन्मभूमि और पुण्यभूमि भारत में है उन्हें ही भारत में रहने का अधिकार है। अर्थात जिन धर्मों की उत्पŸिा भारत में हुई थी उन्हें मानने वाले ही भारत में रह सकते हैं। इस तरह, भारत में हिन्दू, सिक्ख, बौद्ध और जैन ही रह सकते हैं। इस परिभाषा ने ही मुसलमानों के मन में शंका पैदा की और उन्हें लगा कि आजाद भारत में उन्हें देश का नागरिक नहीं समझा जायेगा। मुसलमानों के एक वर्ग में उत्पन्न इसी शंका का लाभ उठाकर पाकिस्तान का नारा दिया गया और अंततः हमारे देश का विभाजन हुआ।
हिन्दू राष्ट्रवादी या मुस्लिम राष्ट्रवादी कहना वैसा ही है जैसे एक समय प्लेटफार्म पर हिन्दू चाय और मुस्लिम चाय या हिन्दू पानी और मुस्लिम पानी की आवाजें लगती थीं। सच पूछा जाय तो स्वयं को हिन्दू राष्ट्रवादी कहकर, मोदी ने फिर देश के मानस को बांटने की कोशिश की है।
अभी कुछ दिन पहले, मोदी ने एक और विवादग्रस्त बयान दिया था। उन्होंने कहा कि जब भी कांग्रेस की आलोचना होती है कांग्रेस, धर्मनिरपेक्षता के बुर्के से अपना चेहरा ढंक लेती है। यह प्रायः देखा गया है कि मोदी जब भी कोई बात करते हैं या किसी की आलोचना करते हैं तो मुस्लिम प्रतीकों का उपयोग करते हैं। एक समय था जब वे कहा करते थे कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं परन्तु यह एक वास्तविकता है कि सभी आतंकवादी, मुसलमान हैं। मोदी अपने व्यवहार में, अपनी बातचीत के लहजे में, हिटलर की नकल करते हैं। हिटलर का एक सिद्धांत था कि एक झूठ की बार-बार पुनरावृŸिा करो तो वह आम आदमी को सच प्रतीत होने लगता है। इसलिए यह जानते हुए भी कि वे झूठ बोल रहे हैं, वे उसे बार-बार दुहराते हैं। उन्होंने एक झूठ और बोला है। वे देश की बढ़ती हुई आबादी का जिक्र करते हुए उसका दोष मुसलमानों पर थोपते हैं। इस बारे में वे मुसलमानों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘‘हम पांच, हमारे पच्चीस’’। इसका अर्थ होता है कि एक मुसलमान पुरूष की चार बीवियां होती हैं और फिर उनसे 25 संताने होती हैं। इससे बड़ा झूठ और कोई नहीं हो सकता। परन्तु मोदी जानते हैं कि एक झूठ को बार-बार कहने से वह सच प्रतीत होने लगता है। इस तरह, समस्या कुछ भी हो, वे उसका दोषरोपण मुसलमानों पर कर देते हैं।
मोदी को समझना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता, भारतीय राष्ट्र की बुनियाद है। सभी को उसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता रखनी चाहिए। धर्म निरपेक्षता मखौल की वस्तु नहीं है। मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं। स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया। संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरू गोलवलकर समेत सभी संघ प्रमुखों ने यह कहा है कि धर्मनिरपेक्षता, भारतीय राष्ट्र का आधार हो ही नहीं सकती। अभी भी संघ के नेताओं के भाषणों और उनके प्रकाशनों में धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाया जाता है। भारतीय जनता पार्टी समेत संघ से जुड़े अनेक संगठन, धर्मनिरपेक्षता में आस्था रखने वालों को छद्म धर्मनिरपेक्षवादी कहते हैं। इस तरह मोदी ने बुर्के को धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर, धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाया है। मोदी इस बात को भूल जाते हैं कि उन्होंने उस संविधान की रक्षा की शपथ ली है जिसका मूल आधार धर्मनिरपेक्षता है। इसके बावजूद यदि वे धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो सच पूछा जाए तो वे संविधान का अपमान करते हैं। और यदि ऐसा व्यक्ति जिसने स्वयं संविधान की रक्षा की शपथ ली है वह उस शपथ के विपरीत आचरण करे तो वह उस पद पर बने रहने की पात्रता खो देता है। जिस संविधान के प्रावधानों के अन्तर्गत वे विधायक और मुख्यमंत्री बने हैं, उस संविधान का मखौल बनाने का उन्हें अधिकार नहीं है।
-एल.एस.हरदेनिया
गुरुवार, 29 नवंबर 2012
नई सामाजिक पहचानो को महत्व देना आवश्यक है .
यह हिन्दू वह मुसलमान यह पंडित , वह ठाकुर , यह यादव , वह हरिजन आदि जैसे संबोधन अभी आम समाज में जनसाधारण की एक प्रमुख पहचान बने हुए है | एक दूसरे को इन्ही पहचानो , खासकर जातीय पहचानो के आधार पर ही संबोधित करने , बातचीत करने और हँसी -- मजाक करने का चलन गाँव से लेकर कस्बो तक में भी बना हुआ है |
बताने की जरूरत नही है कि ऐसे संबोधनों , पहचानो के साथ एक दूसरे के प्रति सदियों से बैठी उच्च व निम्न भावनाओं , लगावो के एकता व अलगावो के तथा दूरियों व नजदीकियों के दृष्टि कोणों का भी परिलक्षण , प्रसफुटन होता रहता है |
नि:सन्देह ऐसे प्रस्फुटन आधुनिक समाज में मौजूद पिछड़ेपन के पिछड़े संबंधो के प्रस्फुटन व परिलक्षण है ! इसमें भी कोई दो राय नही कि आज के समाज में खासकर भारत , पाक ,लंका , जैसे तमाम पिछड़े देशो में आधुनिक युग के साथ -- साथ भारी पिछडापन अभी भी मौजूद है |
जनसाधारण में पुराने युगों के आर्थिक -- सामाजिक आधार व सम्बन्ध अपने टूटते बदलते रूप व गुण के वावजूद खासी हद तक मौजूद है | उदाहरण --- इस देश में विभिन्न जातीय , पेशो व जातीय संबंधो ( खासकर शादी -- व्याह के संबंधो )
जातीय छोटे -- बड़ाई अलगाव -- दुराव आदि के रूप में तथा हिन्दू -- मुस्लिम , धार्मिक , साम्प्रदायिक अलगाव -- दुराव के रूप में |
लेकिन आम समाज में आधुनिक युग के नए -- नए कामो -- पेशो के पहचानो को तथा उनसे बने व बन रहे नए सामाजिक संबंधो को वैसी प्रमुखता न मिल पाने और उनमे पुराने युगों की पहचानो , संबंधो को ही ज्यादा प्रमुखता मिलने का प्रमुख कारण क्या है ? क्या उसका कारण समाज में विद्यमान पिछडापन ही है ? नही ! इसके अलावा इसका एक दूसरा सर्वप्रमुख कारण आधुनिक युग के उन राजनितिक व प्रचार माध्यमी प्रयासों में निहित है , जो लोगो में इन्ही पहचानो को प्रमुखता से बैठाने का काम करता रहता है | आधुनिक युग के पेशो , पहचानो व संबंधो समस्याओं को प्रमुखता नही देता है |
कहा जा सकता है कि इसमें वर्तमान दौर के राजनितिक व प्रचार माध्यमी हिस्सों की भूमिका कही ज्यादा है | हालाकि यह उन्ही की जिम्मेदारी थी कि वे समाज के शासकीय व प्रभावकारी हिस्से होने के नाते पिछड़ी स्थितियों , पहचानो व संबंधो को प्रमुखता से खड़ा करते | राष्ट्र व समाज के पिछड़ेपन को खत्म करते | पुराने युग की पहचानो को हटाने -- मिटाने के साथ नए युग की पहचानो को पनपाते बढाते | लेकिन उन्होंने अपने इस ऐतिहासिक
राजनितिक , सामाजिक एवं प्रगतिशील दायित्व को नही निभाया | उल्टे उन्होंने अपने धनाढ्य वर्गीय एवं परम स्वार्थी अर्थनीति तथा सत्ता स्वार्थी राजनीति के तहत आम जनता में उन्ही पुरानी पहचानो को ही बढावा देने का काम करते रहे | खासकर पिछले 30 -- 35 सालो से तो धर्म , जाति , इलाका भाषा के नए पुराने मुद्दों को उठाकर सत्ता स्वार्थी राजनीति को खड़ा करने का काम होता रहा है | उसके जरिये जनसाधारण को धर्म , सम्प्रदाय जाति -- उपजाति तथा इलाका -- भाषा आदि की गोलबंदी में बाटने -- तोड़ने का काम करते रहे है और करते भी जा रहे है |
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में विश्व कूटनीति के अमेरिकी व यूरोपीय विशेषज्ञ इसी राजनीति को विश्व पैमाने पर बढावा देने में दशको से लगे हुए है | वे इस कूटनीति को उसी तरह से बढाने और फैलाने में लगे हुए है जिस तरह वे नई आर्थिक नीतियों को साम्राज्यी पूंजी और साम्राज्यी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितो , स्वार्थो अनुसार पूरे विश्व में फैलाने बढाने में लगे हुए है | इसका सबूत यह भी है कि अमेरिका ने उदारीकरणवादी , वैविक्रानवादी तथा निजीकरणवादी आर्थिक नीतियों को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर बढावा देने के साथ 80 के दशक से ही धर्म , सम्प्रदाय , नस्ल , इलाका जाति , भाषा ,लिग के पहचानो की कूटनीति को भी फैलाना -- बढाना तेज किया गया |
90 के दशक के एकदम शरुआत में ही अमेरिकी विद्वान् व कूटनीतज्ञ सैम्युअल हटीगटन ने बहुचर्चित पुस्तक '' सभ्यताओं का संघर्ष '' के जरिये इसे और ज्यादा फैलाने तथा औचित्यपूर्ण साबित करने का काम किया | पिछले 30 -- 40 सालो से अमेरिका व उसके सहयोगियों द्वारा इसी कूटनीति को अर्थनीति के साथ चरण -- दर -- चरण आगे बढाया जाता रहा है |
स्वाभाविक बात है कि तब से आज तक देश की विभिन्न राजनितिक पार्टिया एवं प्रचार माध्यमी स्तम्भ अन्तराष्ट्रीय अर्थनीति व कूटनीति के सहयोगी बनकर नई आर्थिक नीतियों को निरंतर आगे बढाने का काम कर रहे है | धर्म सम्प्रदाय , जाति -- उपजाति तथा इलाका -- भाषा की पहचानो को उभारने के साथ -- साथ आधुनिक युग की पहचानो को मजदूरों -- किसानो तथा विभिन्न कामो ,, पेशो की पहचानो व संबंधो तथा समस्याओं को उपेक्षित करते रहे है | उसे दबाते रहे है |
इसीलिए हिन्दू धर्मवादी , मुस्लिम धर्मवादी या फिर विभिन्न जातियों की जातिवादी , अगड़ावादी , पिछड़ावादी , और दलितवादी राजनीत करने में लगी पार्टियों और उनके नेताओं से जनसाधारण में आधुनिक युग की नई पहचानो को प्रमुखता देने की अब कोई उम्मीद नही की जा सकती | फिर उनसे इस बात की भी कोई उम्मीद नही की जा सकती है कि वे अब जनसाधारण में एकता , बराबरी और भाईचारगी को स्थापित करने का कोई प्रयास भी कर सकते है |
इन स्थितियों में जनसाधारण के बीच जनतांत्रिक दृष्टिकोण व व्यवहार खड़ा करने की जिम्मेदारी स्वंय जनसाधारण तथा उसके उन प्रबुद्ध व ईमानदार लोगो पर आ गयी है | जिन्हें इस कूटनीति ने भ्रष्ट न किया हो | यह कार्यभार जनसाधारण के उन हिस्सों पर आ गया है , जो आधुनिक समाज में किसी व्यक्ति या समुदाय को प्रमुखत: उसके धार्मिक , जातीय व इलाकाई दृष्टि से न देखते हो |
बल्कि उसकी जगह वे उसे प्रमुखत: आधुनिक युग के तथा इस राष्ट्र के एक सदस्य के रूप में देखते हो | पुराने युगों की पहचानो व संबंधो के आधार पर नही बल्कि आधुनिक युग के बन रहे व बढ़ रहे सम्बन्धो के आधार पर देखते है |
इसका यह मतलब कदापि नही कि पुराने युग की पहचान या सम्बन्ध खत्म हो गये है | नही ! ऐसी बात एकदम नही है | पुराने युग के संबंधो , पहचानो के अंतरविरोधो को जानना , समझना और उसका यथासंभव समाधान करना भी नितांत आवश्यक है | लेकिन क्या उन्ही पिछड़ी पहचानो व दृष्टिकोणों के साथ यह काम किया जा सकता है ? एकदम नही ! उन आधारों पर तो आपसी भाईचारे का थोथा नारा लगाया जा सकता है , लेकिन दरअसल उसे स्थापित नही किया जा सकता | कोई भी व्यक्ति या संगठन यह काम आधुनिक युग की पहचानो दृष्टिकोणों को अपनाने तथा आत्मसात करने के साथ ही कर सकता है | उसी के जरिये ही कर सकता है |, जन साधारण समाज में एकता , भाईचारगी व बराबरी का बिदा उठाने वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह जरुर समझना होगा कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य की प्रमुख व बुनियादी पहचान आखिर क्या है ? एक धार्मिक , जातीय या इलाकाई समुदाय के रूप में लोगो के जीवन की बुनियादी आवश्यकताओ की पूर्ति नही हो सकती | उनकी पूर्ति समाज में मौजूद कामो के बटवारे और उन पर एक दुसरे की निर्भरता के जरिये ही हो सकती है और हो रही है | यह आपूर्ति हिन्दू -- हिन्दू , मुस्लिम -- मुस्लिम या ऐसे ही विभिन्न जातियों , इलाको के लोगो के जुडावो से नही बल्कि एक किसान , मजदूर , व्यापारी , अध्यापक , डाक्टर , वकील , उद्योगपति आदि के जुड़ाव में हो रही है | मतलब साफ़ है कि व्यक्ति या समुदाय का जीवन उसके हिन्दू या मुस्लिम होने से नही चल रहा है , बल्कि उसके किसान , मजदूर , दुकानदार , अध्यापक आदि होने के नाते चल रहा है | इन्ही कामो व पेशो से इनके बुनियादी जीवन की बुनियाद टिकी हुई है |
अत: सामाजिक जनतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि जनसाधारण के विभिन्न सामाजिक समुदायों में एक दूसरे के प्रति बैठे सदियों से पुराने दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है |
साथ ही उनके बीच मौजूद अन्तर्विरोध को जानने और पाटने -- घटाने का भी प्रयास किया जाए |
इसकी आवश्यकता इसलिए भी है कि वर्तमान समाज में विभिन्न सामाजिक समुदायों के जनसाधारण का आर्थिक आधार कमोवेश एक जैसा होता जा रहा है |
साथ ही टूटता भी जा रहा है | उन्हें महगाई , रोजी - रोजगार के संकटों में धकेलता जा रहा है | छोटी -- मोटी सम्पत्तियों के मालिको को भी सम्पत्तिहीन करता जा रहा है |
टूटते आर्थिक आधारों के साथ उन्हें एक ही प्लेटफार्म पर जमा करता जा रहा है | आधुनिक युग की अपनी बुनियादी समस्याओं के लिए एकजुट होने के आधार मुहैया कराता जा रहा है | लेकिन बिडम्बना यह है कि उनमे सदियों पुरानी धार्मिक , जातीय व अन्य सामाजिक अन्तर्भेद मौजूद है और अब उसका धन -- पूंजी सत्ता -- सरकार के लिए किया जा रहा स्वार्थी व विखंडनवादी इस्तेमाल उनके इस प्लेटफार्म के बीच भारी दीवार खड़ी करता जा रहा है | लोगो में पुरानी सामाजिक पहचानो व संबंधो को नए रूपों में और नए -- नए हथकंडो से जगाता और उन्हें बाटता जा रहा है | इसीलिए भी आज जनसाधारण समाज के लिए नई पहचानो व संबंधो को जानना व समझना और उन्हें आत्मसात करना आवश्यक एवं अपरिहार्य हो गया है |
-सुनील दत्ता
.पत्रकार
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012
पुजारियों की पैदावार
जानी-मानी समाजशास्त्री मीरा नंदा ने फ्रंटलाइन में 4-17 जुलाई, 2009 अंक में छपे इस लेख में दिखाया है कि किस तरह भारत की शासन व्यवस्था गले तक ब्राह्मणवादी कीचड़ में लिथड़ी हुई है. इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी दिखाया है कि किस तरह सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए शिक्षा और खास कर उच्च शिक्षा में ब्राह्मणवादी मूल्यों और व्यवहारों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. तरह-तरह के पाखंडी बाबाओं और पुरोहितों-देवताओं के इस दौर में किस तरह वित्त पूंजी और ब्राह्मणवादी हिंदू फासीवाद गले में गले डाले विकास कर रहे हैं, मीरा नंदा के इस आलेख में देखा जा सकता है. बर्बरता के विरुद्ध ब्लॉग से. अनुवाद: अमर
मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिए फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे-से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिए ताकि वह अपनी बातों को ‘वैज्ञानिक’ ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’ के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिए कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्ति आख़िर होती कहां से है? मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक संस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिए एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन संस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा। 2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिए जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।
इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिए नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।
मई, 2002 में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान (आर एस एस) को विश्वविद्यालय की मान्यता मिली। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थी अब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिए अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद, पुरी, जम्मू, त्रिचूर, जयपुर, लखनऊ, श्रिंगेरी, गरली, भोपाल, मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिए केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिए रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे संस्थाएं हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।
पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुए ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिए परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।
पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिए किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पीएच-डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिए अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालाएं छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।
ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिए कर रही है।
अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?
shabhar hashiya।blogspot।in/
मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिए फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे-से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिए ताकि वह अपनी बातों को ‘वैज्ञानिक’ ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’ के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिए कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्ति आख़िर होती कहां से है? मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक संस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिए एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन संस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिए लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा। 2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिए जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।
इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिए श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना (2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिए नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।
मई, 2002 में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान (आर एस एस) को विश्वविद्यालय की मान्यता मिली। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थी अब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिए अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद, पुरी, जम्मू, त्रिचूर, जयपुर, लखनऊ, श्रिंगेरी, गरली, भोपाल, मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिए केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिए रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे संस्थाएं हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।
पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुए ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिए परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।
पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।
महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिए किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पीएच-डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिए अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालाएं छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।
ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिए कर रही है।
अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?
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गुरुवार, 30 जून 2011
क्या कोई अपने को हिन्दू कहता है?
देश और विदेशों में कोई हिन्दू नहीं, यह शब्द केवल कागजों तक ही सीमित है।
यदि आप नम्बर एक दर्जे से पूछें कि आप कौन है? तब वे बताते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ। तब आप यह पूछें कि आप कौन से ब्राह्मण हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं शर्मा हूँ, मिश्रा हूँ, उपाध्याय हूँ, दीक्षित हूँ, भारद्वाज हूँ, कश्यप हूँ, पाण्डेय हूँ, शुक्ला हूँ, दूबे हूँ, द्विवेदी हूँ, तिवारी हूँ, त्रिपाठी हूँ, त्रिवेदी हूँ, चतुर्वेदी हूँ, चौबे हूँ, भट्टाचार्य हूँ, मुखर्जी हूँ, बनर्जी हूँ, चटर्जी हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं। लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसलिए वे अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे ब्राह्मण हैं, इसलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर दो दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं क्षत्रिय हूँ, तब आप पूछें कि आप कौन से क्षत्रिय हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं चौहान क्षत्रिय हूँ, राजपूत क्षत्रिय हूँ, भदौरिया क्षत्रिय हूँ, तोमर क्षत्रिय हूँ, राव क्षत्रिय हूँ, राय क्षत्रिय हूँ, सिंह क्षत्रीय हूँ, मैं शाही क्षत्रीय हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे क्षत्रिय हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर तीन दर्जे से पूछे कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं वैश्य हूँ। तब आप पूछें कि आप कौन से वैश्य हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं गुप्ता हूँ, अग्रवाल हूँ, माथुर हूँ, महाजन हूँ, अग्रहरि हूँ, मद्धेशिया हूँ, जायसवाल हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसी लिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे वैश्य हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हंै, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर चार दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे अपनी जातियाँ बताना प्रारम्भ कर देते हैं, मैं जार हूँ, गुर्जर हूँ, कायस्थ हूँ, सुनार हूँ, माली हूँ, यादव हूँ, कहार हूँ, बढ़ई हूँ, नाई हूँ, राठौर (तेली) हूँ, शाक्य हूँ, काछी हूँ, राजपूत लोधी हूँ, बघेल हूँ, जाटव (चमार) हूँ, कोरी हूँ, धोबी हूँ,
धानुक हूँ, खटीक हूँ, कोहरी हूँ, कुर्मी हूँ, वाल्मीकि (भंगी) हूँ और वे अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, लेकिन अपने को हिन्दू नहीं बताते हैं, क्यांेकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसीलिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। शूद्र होने के नाते अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि किसी के मुँह से, धोखे से हिन्दू शब्द निकल गया, तो इससे उसकी सन्तुष्टि नहीं होगी, उसे अपनी जाति बताओ, तब उसकी सन्तुष्टि और तसल्ली होगी।
ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई ‘चातुर्य वर्ण व्यवस्था’ को मानने वाला कोई भी आदमी अपने नाम के पीछे न हिन्दू लिखता है और न ही कहता है, तो फिर कौन हिन्दू है? फिर किसका नाम हिन्दू हैं?
जब कोई अपने आपको हिन्दू कहता और लिखता नहीं, तो फिर हिन्दू नहीं। हिन्दू नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू समाज नहीं। हिन्दू समाज नहीं, विश्वहिन्दू परिषद नहीं, विश्व हिन्दू परिषद नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दूस्थान नहीं, हिन्दूस्थान तो हिन्दुस्तान नहीं।
तो फिर इसका क्या नाम है और इसे क्या कहना चाहिए, ब्राह्मणों की व्यवस्था ही इसका असली नाम है और इसे ब्राह्मणों की व्यवस्था ही कहना चाहिए। ब्राह्मण संस्कृति और वर्तमान में ब्राह्मण राष्ट्र ही कहना चाहिए।
ब्राह्मणों (ब्राह्मण ऋषियों द्वारा बनाई गई) की यह एक ऐसी व्यवस्था है कि इसे न अनादि ही कहा जा सकता है, और न ही इसे बहुत प्राचीन ही कहा जा सकता है, न ही धर्म ही कहा जा सकता है और न इसे दर्शन ही कहा जा सकता है, न इसे संस्कृति ही कहा जा सकता है और न ही इसे मानवता का हितेषी ही कहा जा सकता है, न इसकी प्रशंसा की जा सकती है और न ही यह प्रशंसा करने के योग्य है।
यह तो ब्राह्मणों द्वारा समाज में फैलाई गई साजि़श का हिस्सा है। जिसने भारत की प्राचीन सभ्यता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। जिसने भारत की जनता में फूट का बीज बो दिया है। ब्राह्मणों द्वारा अन्ध विश्वास के प्रचार-प्रसार करने के कारण यह देश विदेशियों का हजारों वर्षों तक गुलाम रहा। ब्राह्मणी व्यवस्था के बराबर संसार की किसी भी दूसरी व्यवस्था ने इतनी असमानताओं को जन्म नहीं दिया। इस देश के सवर्ण लेखकों तथा अन्य लोगों की खोपड़ी में इस बात का भूत सवार है कि हिन्दुओं के कारण ही इस देश का नाम हिन्दुस्तान है। ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था को मानने वाला कोई भी आदमी अपने आपको न तो हिन्दू कहता है और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखता ही है, तो फिर इस देश का नाम हिन्दुस्तान नहीं है।
भारत का अर्थ हिन्दुस्तान, हमारे देश का प्राचीन नाम नहीं है। यह नाम विदेशियों द्वारा रखा गया है। ईरानियों ने सिन्धु नदी का नाम, बदलकर ‘हिन्दू’ रख दिया। यूनानियों ने इसका नाम ‘इण्डोस’ रखा, इससे हमारे देश का नाम इण्डिया पड़ गया। बहुत प्राचीन काल में इस देश का नाम जम्बूदीप था। बौद्ध ग्रन्थों तथा कतिपय मंत्रों जो विवाह आदि के अवसरों पर अब भी पढ़े जाते हैं में इस नाम का उल्लेख मिलता है। केवल इस देश की सीमा का निर्देश करने के लिए जम्बू द्वीप शब्द का प्रयोग होता था। इस देश का नाम जो उस समय की जनता को ज्ञात था, भारतवर्ष अथवा भरत का देश था। भरत दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र थे। उनके प्रभाव से इस देश का प्रत्येक भाग उद्दीप्त तथा प्रभावित था। इस कारण इस देश का नाम भारत है और इस देश का इतिहास, भारतवर्ष अथवा भारतीय इतिहास के नाम से इतिहास है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से इतिहास है। वर्तमान में इस देश का
संविधान, भारतीय संविधान के नाम से संविधान है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से संविधान है।
यदि वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान होता, तो फिर हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान होता। वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान है ही नहीं। इसीलिए हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान नहीं लिखा गया है।
विश्व में बौद्ध हैं। यदि आप पूछें कि आप कौन हैं? तो वे आपको उत्तर देंगे कि मैं बौद्ध हूँ, क्योंकि भगवान बुद्ध ने विश्व के मानव समाज को एकता, समता तथा स्वतंत्रता का ही उपदेश दिया है।
भगवान बुद्ध ने 563 ईसा पूर्व में एक ऐसी ‘व्यवस्था’ को जन्म दिया कि उसे हर हालत में अनादि और प्राचीन भी कहा जा सकता है, इसे ‘सद्धर्भ’ और ‘दर्शन’ भी कहा जा सकता है। इसे ‘संस्कृति’ और ‘कला’ भी कहा जा सकता है। इसे मानवता का हितैषी एवं शुभ ‘चिन्तक भी कहा जा सकता है। इसकी प्रशंसा भी की जा सकती है और यह प्रशंसा करने के योग्य है।
भगवान बुद्ध द्वारा फैलाई गई विश्व में इन्सानियत है। जिसने विश्व के मानव समाज को एकता के सूत्र में बाँधा है। जिसने विश्व के मानव समाज को सत्य, अहिंसा, शान्ति और समता का पाठ पढ़ाया है।
भगवान बुद्ध की ‘श्रेष्ठ व्यवस्था’, बौद्ध धर्म के बराबर संसार में कोई दूजी व्यवस्था नहीं है। जिसने विश्व में मानव समाज को सभ्यता और महा मानवता का पाठ पढ़ाया हो। वैसे तो भारतीय संविधान के अन्तर्गत, भारत बौद्ध राष्ट्र है, क्योंकि राष्ट्रीय चिन्ह पर अशोक चक्र (धम्मचक्र) है। डाक टिकटों, सिक्कों और नोटों पर अशोक के चार सिंह हैं ये भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक की वीरता तथा महानता के सूचक हैं। इसे स्वतंत्र भारत सरकार ने राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकार कर लिया है।
‘हिन्दू’ शब्द का सम्बन्ध धर्म से नहीं, इस शब्द का सम्बन्ध ‘सिन्धु नदी’ से है।
‘हिन्दू’ शब्द मध्ययुगीन है। श्री रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में ‘हिन्दू’ शब्द हमारे प्राचीन साहित्य में नही मिलता है। भारत में इसका सबसे पहले उल्लेख ईसा की आठवीं सदी में लिखे गए एक ‘तन्त्र ग्रन्थ’ में मिलता है। जहाँ इस शब्द का प्रयोग धर्मावलम्बी के अर्थ में नहीं किया गया जाकर, एक, ‘गिरोह’ या ‘जाति’ के अर्थ में किया गया है।
गांधी जी भी ‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी स्वीकार करते हुए कहते थे- हिन्दू धर्म का यथार्थ नाम, ‘वर्णाश्रमधर्म’ है।
हिन्दू शब्द मुस्लिम आक्रमणकारियों का दिया हुआ एक विदेशी नाम है। ‘हिन्दू’ शब्द फारसी के ‘गयासुललुगात’ नामक शब्दकोश में मिलता है। जिसका अर्थ- काला, काफिर, नास्तिक सिद्धान्त विहीन, असभ्य, वहशी आदि है और इसी घृणित नाम को बुजदिल लोभी ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया है।
हिंसया यो दूषयति अन्यानां मानांसि जात्यहंकार वृन्तिना सततं सो हिन्दू: से बना है, जो जाति अहंकार के कारण हमेशा अपने पड़ोसी या अन्य धर्म के अनुयायी का, अनादर करता है, वह हिन्दू है। डा0 बाबा साहब अम्बेडकर ने सिद्ध किया है कि ‘हिन्दू’ शब्द देश वाचक नहीं है, वह जाति वाचक है। वह ‘सिन्धु’ शब्द से नहीं बना है। हिंसा से ‘हिं’ और दूषयति से ‘दू’ शब्द को मिलाकर हिन्दू बना है।
अपने आपको कोई ‘हिन्दू’ नहीं कहता है, बल्कि अपनी-अपनी जाति बताते हैं।
-भिक्षु विमल कीर्ति महास्थविर
मो0:- 07398935672
यदि आप नम्बर एक दर्जे से पूछें कि आप कौन है? तब वे बताते हैं कि मैं ब्राह्मण हूँ। तब आप यह पूछें कि आप कौन से ब्राह्मण हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं शर्मा हूँ, मिश्रा हूँ, उपाध्याय हूँ, दीक्षित हूँ, भारद्वाज हूँ, कश्यप हूँ, पाण्डेय हूँ, शुक्ला हूँ, दूबे हूँ, द्विवेदी हूँ, तिवारी हूँ, त्रिपाठी हूँ, त्रिवेदी हूँ, चतुर्वेदी हूँ, चौबे हूँ, भट्टाचार्य हूँ, मुखर्जी हूँ, बनर्जी हूँ, चटर्जी हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं। लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसलिए वे अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे ब्राह्मण हैं, इसलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का ब्राह्मण बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर दो दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं क्षत्रिय हूँ, तब आप पूछें कि आप कौन से क्षत्रिय हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं चौहान क्षत्रिय हूँ, राजपूत क्षत्रिय हूँ, भदौरिया क्षत्रिय हूँ, तोमर क्षत्रिय हूँ, राव क्षत्रिय हूँ, राय क्षत्रिय हूँ, सिंह क्षत्रीय हूँ, मैं शाही क्षत्रीय हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे क्षत्रिय हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का क्षत्रिय बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर तीन दर्जे से पूछे कि आप कौन हैं? तो वे बताते हैं कि मैं वैश्य हूँ। तब आप पूछें कि आप कौन से वैश्य हैं? तब वे बताना प्रारम्भ कर देते हैं कि मैं गुप्ता हूँ, अग्रवाल हूँ, माथुर हूँ, महाजन हूँ, अग्रहरि हूँ, मद्धेशिया हूँ, जायसवाल हूँ और अपने को विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हैं, लेकिन अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं, क्योंकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसी लिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। वे वैश्य हैं, इसीलिए अपने आपको विभिन्न प्रकार का वैश्य बताते हंै, न कि हिन्दू।
यदि आप नम्बर चार दर्जे से पूछें कि आप कौन हैं? तो वे अपनी जातियाँ बताना प्रारम्भ कर देते हैं, मैं जार हूँ, गुर्जर हूँ, कायस्थ हूँ, सुनार हूँ, माली हूँ, यादव हूँ, कहार हूँ, बढ़ई हूँ, नाई हूँ, राठौर (तेली) हूँ, शाक्य हूँ, काछी हूँ, राजपूत लोधी हूँ, बघेल हूँ, जाटव (चमार) हूँ, कोरी हूँ, धोबी हूँ,
धानुक हूँ, खटीक हूँ, कोहरी हूँ, कुर्मी हूँ, वाल्मीकि (भंगी) हूँ और वे अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, लेकिन अपने को हिन्दू नहीं बताते हैं, क्यांेकि वे हिन्दू हैं ही नहीं। इसीलिए अपने आपको हिन्दू नहीं बताते हैं और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखते हैं। शूद्र होने के नाते अपनी विभिन्न प्रकार की जातियाँ बताते हैं, न कि हिन्दू।
यदि किसी के मुँह से, धोखे से हिन्दू शब्द निकल गया, तो इससे उसकी सन्तुष्टि नहीं होगी, उसे अपनी जाति बताओ, तब उसकी सन्तुष्टि और तसल्ली होगी।
ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई ‘चातुर्य वर्ण व्यवस्था’ को मानने वाला कोई भी आदमी अपने नाम के पीछे न हिन्दू लिखता है और न ही कहता है, तो फिर कौन हिन्दू है? फिर किसका नाम हिन्दू हैं?
जब कोई अपने आपको हिन्दू कहता और लिखता नहीं, तो फिर हिन्दू नहीं। हिन्दू नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू धर्म नहीं, हिन्दू समाज नहीं। हिन्दू समाज नहीं, विश्वहिन्दू परिषद नहीं, विश्व हिन्दू परिषद नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दुत्व नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू संस्कृति नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दू राष्ट्र नहीं, हिन्दूस्थान नहीं, हिन्दूस्थान तो हिन्दुस्तान नहीं।
तो फिर इसका क्या नाम है और इसे क्या कहना चाहिए, ब्राह्मणों की व्यवस्था ही इसका असली नाम है और इसे ब्राह्मणों की व्यवस्था ही कहना चाहिए। ब्राह्मण संस्कृति और वर्तमान में ब्राह्मण राष्ट्र ही कहना चाहिए।
ब्राह्मणों (ब्राह्मण ऋषियों द्वारा बनाई गई) की यह एक ऐसी व्यवस्था है कि इसे न अनादि ही कहा जा सकता है, और न ही इसे बहुत प्राचीन ही कहा जा सकता है, न ही धर्म ही कहा जा सकता है और न इसे दर्शन ही कहा जा सकता है, न इसे संस्कृति ही कहा जा सकता है और न ही इसे मानवता का हितेषी ही कहा जा सकता है, न इसकी प्रशंसा की जा सकती है और न ही यह प्रशंसा करने के योग्य है।
यह तो ब्राह्मणों द्वारा समाज में फैलाई गई साजि़श का हिस्सा है। जिसने भारत की प्राचीन सभ्यता को छिन्न-भिन्न कर दिया है। जिसने भारत की जनता में फूट का बीज बो दिया है। ब्राह्मणों द्वारा अन्ध विश्वास के प्रचार-प्रसार करने के कारण यह देश विदेशियों का हजारों वर्षों तक गुलाम रहा। ब्राह्मणी व्यवस्था के बराबर संसार की किसी भी दूसरी व्यवस्था ने इतनी असमानताओं को जन्म नहीं दिया। इस देश के सवर्ण लेखकों तथा अन्य लोगों की खोपड़ी में इस बात का भूत सवार है कि हिन्दुओं के कारण ही इस देश का नाम हिन्दुस्तान है। ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था को मानने वाला कोई भी आदमी अपने आपको न तो हिन्दू कहता है और न ही अपने नाम के पीछे हिन्दू लिखता ही है, तो फिर इस देश का नाम हिन्दुस्तान नहीं है।
भारत का अर्थ हिन्दुस्तान, हमारे देश का प्राचीन नाम नहीं है। यह नाम विदेशियों द्वारा रखा गया है। ईरानियों ने सिन्धु नदी का नाम, बदलकर ‘हिन्दू’ रख दिया। यूनानियों ने इसका नाम ‘इण्डोस’ रखा, इससे हमारे देश का नाम इण्डिया पड़ गया। बहुत प्राचीन काल में इस देश का नाम जम्बूदीप था। बौद्ध ग्रन्थों तथा कतिपय मंत्रों जो विवाह आदि के अवसरों पर अब भी पढ़े जाते हैं में इस नाम का उल्लेख मिलता है। केवल इस देश की सीमा का निर्देश करने के लिए जम्बू द्वीप शब्द का प्रयोग होता था। इस देश का नाम जो उस समय की जनता को ज्ञात था, भारतवर्ष अथवा भरत का देश था। भरत दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र थे। उनके प्रभाव से इस देश का प्रत्येक भाग उद्दीप्त तथा प्रभावित था। इस कारण इस देश का नाम भारत है और इस देश का इतिहास, भारतवर्ष अथवा भारतीय इतिहास के नाम से इतिहास है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से इतिहास है। वर्तमान में इस देश का
संविधान, भारतीय संविधान के नाम से संविधान है, न कि हिन्दुस्तान के नाम से संविधान है।
यदि वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान होता, तो फिर हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान होता। वास्तव में इस देश का नाम हिन्दुस्तान है ही नहीं। इसीलिए हिन्दुस्तान के नाम से इस देश का इतिहास और संविधान नहीं लिखा गया है।
विश्व में बौद्ध हैं। यदि आप पूछें कि आप कौन हैं? तो वे आपको उत्तर देंगे कि मैं बौद्ध हूँ, क्योंकि भगवान बुद्ध ने विश्व के मानव समाज को एकता, समता तथा स्वतंत्रता का ही उपदेश दिया है।
भगवान बुद्ध ने 563 ईसा पूर्व में एक ऐसी ‘व्यवस्था’ को जन्म दिया कि उसे हर हालत में अनादि और प्राचीन भी कहा जा सकता है, इसे ‘सद्धर्भ’ और ‘दर्शन’ भी कहा जा सकता है। इसे ‘संस्कृति’ और ‘कला’ भी कहा जा सकता है। इसे मानवता का हितैषी एवं शुभ ‘चिन्तक भी कहा जा सकता है। इसकी प्रशंसा भी की जा सकती है और यह प्रशंसा करने के योग्य है।
भगवान बुद्ध द्वारा फैलाई गई विश्व में इन्सानियत है। जिसने विश्व के मानव समाज को एकता के सूत्र में बाँधा है। जिसने विश्व के मानव समाज को सत्य, अहिंसा, शान्ति और समता का पाठ पढ़ाया है।
भगवान बुद्ध की ‘श्रेष्ठ व्यवस्था’, बौद्ध धर्म के बराबर संसार में कोई दूजी व्यवस्था नहीं है। जिसने विश्व में मानव समाज को सभ्यता और महा मानवता का पाठ पढ़ाया हो। वैसे तो भारतीय संविधान के अन्तर्गत, भारत बौद्ध राष्ट्र है, क्योंकि राष्ट्रीय चिन्ह पर अशोक चक्र (धम्मचक्र) है। डाक टिकटों, सिक्कों और नोटों पर अशोक के चार सिंह हैं ये भगवान बुद्ध और सम्राट अशोक की वीरता तथा महानता के सूचक हैं। इसे स्वतंत्र भारत सरकार ने राष्ट्रीय चिह्न के रूप में स्वीकार कर लिया है।
‘हिन्दू’ शब्द का सम्बन्ध धर्म से नहीं, इस शब्द का सम्बन्ध ‘सिन्धु नदी’ से है।
‘हिन्दू’ शब्द मध्ययुगीन है। श्री रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में ‘हिन्दू’ शब्द हमारे प्राचीन साहित्य में नही मिलता है। भारत में इसका सबसे पहले उल्लेख ईसा की आठवीं सदी में लिखे गए एक ‘तन्त्र ग्रन्थ’ में मिलता है। जहाँ इस शब्द का प्रयोग धर्मावलम्बी के अर्थ में नहीं किया गया जाकर, एक, ‘गिरोह’ या ‘जाति’ के अर्थ में किया गया है।
गांधी जी भी ‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी स्वीकार करते हुए कहते थे- हिन्दू धर्म का यथार्थ नाम, ‘वर्णाश्रमधर्म’ है।
हिन्दू शब्द मुस्लिम आक्रमणकारियों का दिया हुआ एक विदेशी नाम है। ‘हिन्दू’ शब्द फारसी के ‘गयासुललुगात’ नामक शब्दकोश में मिलता है। जिसका अर्थ- काला, काफिर, नास्तिक सिद्धान्त विहीन, असभ्य, वहशी आदि है और इसी घृणित नाम को बुजदिल लोभी ब्राह्मणों ने अपने धर्म का नाम स्वीकार कर लिया है।
हिंसया यो दूषयति अन्यानां मानांसि जात्यहंकार वृन्तिना सततं सो हिन्दू: से बना है, जो जाति अहंकार के कारण हमेशा अपने पड़ोसी या अन्य धर्म के अनुयायी का, अनादर करता है, वह हिन्दू है। डा0 बाबा साहब अम्बेडकर ने सिद्ध किया है कि ‘हिन्दू’ शब्द देश वाचक नहीं है, वह जाति वाचक है। वह ‘सिन्धु’ शब्द से नहीं बना है। हिंसा से ‘हिं’ और दूषयति से ‘दू’ शब्द को मिलाकर हिन्दू बना है।
अपने आपको कोई ‘हिन्दू’ नहीं कहता है, बल्कि अपनी-अपनी जाति बताते हैं।
-भिक्षु विमल कीर्ति महास्थविर
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