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शनिवार, 1 मार्च 2014

उदारवादी हिन्दू धर्म बनाम संकीर्ण हिन्दुत्व

पिछले कुछ दशकों में अनेक किताबों पर कटु हमले हुए हैं और कई को प्रतिबंधित भी किया गया है। विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक समूहों की इस असहिष्णुता के लिए कई अलग-अलग कारण गिनाए जाते हैं। सलमान रूश्दी की पुस्तक द सेनेटिक वर्सेस, तस्लीमा नसरीन की लज्जा, सोनिया गांधी पर आधारित रेड साड़ी व ए.के. रामानुजन लिखित थ्री हण्ड्रेड रामायणास असहिष्णुता की शिकार हुई पुस्तकों में से कुछ हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ‘दूसरों’ की भावनाआंे को चोट पहुंचाने के बीच बहुत हल्की विभाजक रेखा होती है। कुछ राजनैतिक दल व संगठन, इस रेखा को अपनी मनमर्जी से खिसकाते भी रहते हैं। उदाहरणार्थ, हिन्दू दक्षिणपंथी सलमान रूश्दी या तस्लीमा नसरीन के लिए तो अभिव्यक्ति की आजादी चाहते हैं परंतु वे रामानुजन को यही स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। दूसरी ओर, मुस्लिम कट्टरपंथी बार-बार उनकी ‘‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचने’’ की बातें करते रहते हैं। वेंडी डोनीगर की पुस्तक द हिन्दूज: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है। हिन्दू दक्षिणपंथी चाहते हैं कि जो कुछ उनके राजनैतिक एजेन्डे में फिट नहीं बैठता, उसे धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला बताकर दबा दिया जाए। इस बढ़ती असहिष्णुता के कारण अभिव्यक्ति की आजादी तो सीमित हो ही रही है, इससे राजनैतिक-सामाजिक क्षेत्र में ‘तालिबानी’ तत्वों का प्रभाव भी बढ़ रहा है।
पेंग्विन ने अदालत के बाहर समझौता कर ‘द हिन्दूज...’ को बाजार में न लाने का निर्णय लिया है। यह देष के एक प्रतिष्ठित और षक्तिषाली प्रकाषक द्वारा उठाया गया निंदनीय कदम है। पेंग्विन के पास इतने
संसाधन हैं कि वह इस लड़ाई को देष के उच्चतम न्यायालय तक ले जा सकती थी और लेखक के अपने विचार अभिव्यक्त करने के अधिकार और पाठकों के उन विचारों को जानने के अधिकार की रक्षा कर सकती थी। पेंग्विन के निर्णय के विरोध में दो प्रतिष्ठित लेखकों, ज्योर्तिमय शर्मा व सिद्धार्थ वरदराजन ने पेंग्विन को उनके द्वारा लिखित पुस्तकें प्रकाशित न करने और उनके साथ हुए अनुबंध को रद्द करने के लिए कहा है। ‘द हिन्दूज...’ के विरूद्ध याचिका, दीनानाथ बतरा नामक व्यक्ति ने दायर की थी, जो कि ‘‘शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति’’ के मुखिया हैं। याचिका कहती है कि पुस्तक में ‘‘उथली और तोड़ी-मरोड़ी गई बातें कही गई हैं, उसमें तथ्यात्मक गलतियां हैं और वह सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है।’’ याचिका में यह भी कहा गया है कि डोनीगर, ‘‘ईसाई मिशनरी हैं और उनका असली एजेण्डा हिन्दुओं को अपमानित करना और उनके धर्म की छवि को बिगाड़ना है।’’ दिलचस्प बात यह है कि डोनीगर ईसाई हैं ही नहीं। वे यहूदी हैं। अपनी पुस्तक के प्राक्कथन में वे कहती हैं, ‘‘वैकल्पिक इतिहास लिखने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यह बताना भी है कि महिलाओं व अछूत जैसे वर्गों-जिनके बारे में आमतौर पर कहा जाता है कि वे दमित थे, उनकी आवाज नहीं सुनी जाती थी और उन्होंने धार्मिक परंपराओं के विकास में कोई भूमिका अदा नहीं की-का असल में हिन्दू धर्म के विकास में महत्वपूर्ण योगदान था। मैं हिन्दू धर्म के उस पक्ष पर रोशनी डालना चाहती हूं, जिसे दबा दिया गया और जिसका मीडिया और पाठ्यपुस्तकों में कोई उल्लेख नहीं मिलता...यह पुस्तक दर्शन के बारे में नहीं है, यह ध्यान के बारे में नहीं है, यह कहानियों के बारे में है-जानवरों, अछूतों और महिलाओं की कहानियों के बारे में-जो यह बताती हैं कि हिन्दू धर्म ने बहुवाद को किस तरह नकारा।’’
पुस्तक के दो केन्द्रीय तत्व हैं। पहला है सेक्स से जुड़े तथ्यों का प्रस्तुतिकरण, जिन पर चर्चा को हिन्दू धर्म के स्व-घोषित ठेकेदारों ने वर्जित घोषित कर दिया है। हम जानते हैं कि खजुराहो और कोणार्क जैसी महान कृतियां, सेक्स से जुड़े मसलों पर केंद्रित हैं और जब तक हमारे समाज ने पाखंड का लबादा ओढ़कर इन कृतियों के असली चरित्र को नकारना षुरू नहीं किया था, तब तक उन्हें इसी रूप में देखा और स्वीकार किया जाता था। कालिदास की महान कृति ‘कुमारसंभवम्’ में शंकर-पार्वती की प्रणयक्रीडा का कामोत्तेजक वर्णन किया गया है। इसी तरह, आदि शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी‘, में देवी के सौंदर्य का विशद वर्णन है।
जहां तक डोनीगर की पुस्तक पर हमले का सवाल है, यह विहिप, बजरंगदल, शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अन्य संगठनों द्वारा, लंबे समय से की जा रही ऐसी ही हरकतों की ताजा कड़ी है। ये संगठन 1980 के दषक के बाद से अत्यंत आक्रामक हो गए हैं। इस दौरान धर्म से जुड़ी बातों के संबंध में आमजन भी अत्यंत संवेदनशील हो गए और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की प्रवृत्ति बढ़ी।  यह दिलचस्प है कि एम.एफ. हुसैन द्वारा 1960 और 1970 के दशक में बनाए गए चित्रों पर हमले, 1980 के दशक में शुरू हुए, जब राममंदिर मुद्दे को लेकर आक्रामक हिन्दुत्व का उदय हुआ।
इस पुस्तक के विरूद्ध याचिका दायर करने वाले बतरा, आरएसएस की शैक्षणिक शाखा ‘विद्या भारती‘ के ‘अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान‘ के अध्यक्ष हैं। इसके पहले जिस पुस्तक पर संघ परिवार ने हल्ला बोला था वह थी ए. के. रामानुजन की थ्री हंडरेड रामायणास जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा थी। इस छोटी सी पुस्तक में यह बताया गया है कि भगवान राम की कथा के कितने विभिन्न स्वरूप हैं। जाहिर है कि रामकथा के कई स्वरूपों के अस्तित्व को स्वीकार करने से राम मंदिर आंदोलन के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग जाता। उसके भी पहले, आरएसएस के समर्थकों ने रामकथा के विभिन्न स्वरूपों पर ‘सहमत‘ द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी पर हमला किया था। इसी तर्ज पर, संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा की गठबंधन साथी शिवसेना ने अम्बेडकर की पुस्तक रिडल्स आॅफ राम एण्ड कृष्ण के प्रकाशन का भी विरोध किया था। इस पुस्तक में अम्बेडकर ने लिखा है कि वे राम और कृष्ण को भगवान नहीं मानते और उनकी पूजा नहीं करेंगे।
डोनीगर, लंदन विश्वविद्यालय में प्राच्य एवं अफ्रीकी अध्ययन की प्राध्यापक रही हैं। उन्होंने संस्कृत एवं भारतीय अध्ययन में डाक्टरेट की दो उपाधियां हासिल की हैं और हिन्दू धर्म पर कई विद्वतापूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। उनका कहना है कि देशज भाषाओं के धार्मिक साहित्य मंे समाज के वंचित वर्गों, महिलाओं व अछूतों के प्रति सहानुभूति व करूणा झलकती है। वे मनुस्मृति की कटु आलोचक हैं क्योंकि वह महिलाओं को दोयम दर्जा देती है। साथ ही वे वात्सायन के कामसूत्र की सराहना करती हैं, क्योंकि उसमें महिलाआंे का चित्रण संवेदनशीलता से किया गया है।
संघ और उससे जुड़े संगठनों का हिन्दू धर्म और उसके मूर्तिषास्त्र के विभिन्न संस्करणों का विरोध करना स्वाभाविक है। यह उनके राजनैतिक एजेन्डे का हिस्सा है। उनका जोर केवल हिन्दू धर्म के ब्राहम्णवादी संस्करण पर है और नाथ, तंत्र, भक्ति, षैव, सिद्ध आदि जैसी अन्य हिन्दू परंपराओं को वे नकारते हंै। आरएसएस-छाप हिन्दू धर्म का निर्माण, संघ के हिन्दुत्व प्रोजेक्ट का भाग है, जिसकी षुरूआत बिटिश काल में हुई थी। हिन्दुत्व, संघ की राजनैतिक विचारधारा है। हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म व परंपराओं की यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञों द्वारा की गई व्याख्या पर आधारित है। यूरोपीय प्राच्य विशेषज्ञ, एकेश्वरवादी थे और उनके एकेश्वरवाद की ओर झुकाव ने हिन्दू धर्म की उनकी व्याख्या को प्रभावित किया। वे हिन्दू धर्म की समृद्ध दार्षनिक, आध्यात्मिक व धार्मिक विविधता को समझ ही नहीं सके। उनकी धर्म की समझ एक पैगंबर के आसपास घूमती थी। इसके विपरीत, हिन्दू धर्म अनेक परंपराओं का मिश्रण था और ये सारी परंपराएं उसमें एक साथ जीवित थीं। ब्राहम्णवाद उनमें से केवल एक परंपरा थी। ब्रिटिश काल में प्राच्य विद्वानों और ब्रिटिश शासकों ने केवल ब्राहम्णवादी धार्मिक साहित्य और मूल्यों को महत्व दिया। इससे जातिगत व लैंगिक भेदभाव को मजबूती मिली व ब्राहम्णवाद को हिन्दू धर्म का पर्याय मान लिया गया। इसी के चलते, अम्बेडकर ने कहा कि ‘हिन्दू धर्म ब्राहम्णवादी धर्मशास्त्र है‘। वे हिन्दू धर्म के नाम पर प्रचलित सामाजिक असमानता की निंदा कर रहे थे। हिन्दू धर्म की ब्राहम्णवादी धारा के धुर विपरीत थी श्रमणिक धारा, जो पषिचिमी विद्वानों और ब्रिटिश नीति निर्माताओं के ज्ञान के क्षितिज पर कहीं थी ही नहीं।
शनैः-शनैः बेदम हो रहे हिन्दू जमींदारों और उच्च जातियों ने हिन्दुत्व की राजनीति शु रू कर दी। उन्होंने गौरवषाली हिन्दू परंपराओं के नाम पर जातिगत और लैंगिक यथास्थितिवाद को बनाए रखने का उपक्रम किया ताकि सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में उनका प्रभुत्व कायम रहे। स्वाधीनता संग्राम और उसके नेता महात्मा गांधी का हिन्दू धर्म, ब्राहम्णवादी-हिन्दुत्ववादी धारा से एकदम अलग था। वे उदारवादी श्रमणिक परंपरा के अधिक नजदीक थे। यह वह हिन्दू धर्म था, जिससे हिन्दुओं का बड़ा तबका जुड़ा हुआ था।
हिन्दू महासभा और आरएसएस का हिन्दुत्व चन्द तबकों तक सीमित था और इनमें मुख्य थे श्रेष्ठि वर्ग के ब्राहम्ण्वादी। इनका जोर उन मूल्यों पर था जो महिलाओं और दलितों को गरिमापूर्ण जीवन से वंचित करते थे। यही कारण है कि आरएसएस और उसका समर्थक श्रेष्ठि वर्ग, जाति और लिंग से जुड़े सामाजिक परिवर्तनों से दूर रहे और हिन्दू धर्म की उनकी संकीर्ण व्याख्या के अनुरूप, हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देते रहे। आरएसएस ने अपने एजेन्डे के परिपालन में ‘शिक्षा बचाओ अभियान समिति‘ का गठन किया। यही संस्था एनडीए के शासनकाल में पुस्तकों के साम्प्रदायिकीकरण क लिए जिम्मेदार थी। यही वह संस्था है जो कई शैक्षणिक संस्थाओं, जिनमें सरस्वती शिशु  मंदिर व एकल विद्यालय शामिल हैं, के जरिए इतिहास की संकीर्ण व विघटनकारी व्याख्या को विद्यार्थियों के मनोमस्तिष्क में बैठा रही है। आश्चर्य नहीं कि डोनीगर की पुस्तक देखते ही वे ऐसे भड़के जैसे लाल कपड़ा देखने पर सांड भड़कता है। यह पुस्तक हिन्दुओं की समृद्ध, विविधवर्णी परंपराओं की चर्चा करती है और सेक्स से जुड़े मुद्दों पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं करती। डोनीगर उदारवादी हिन्दू धर्म की हामी हैं जबकि संघ चाहता है कि वह समाज पर अपना संकीर्ण हिन्दुत्व थोप दे। उदारवादी हिन्दू धर्म और संकीर्ण हिन्दुत्व के बीच संघर्ष ही इस पुस्तक के विषय में चल रही बहस के मूल में है। 
-राम पुनियानी

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

संकट में है कहने की आज़ादी और इंसान



मात्र एक माह के अर्से में कला की स्वतंत्रता तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर जितने आक्रमण हुए उसे विरल ही मानना चाहिए। किसी भी देश के इतिहास में ऐसी घटनाएं कम होती हैं। जयपुर के साहित्योत्सव में सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन की संभावित शिरकत को रोकने के लिए आरंभ हुआ अभियान, आशीष नन्दी के वक्तव्य से पैदा हुई उत्तेजना से शिद्दत इखि़्तयार करता हुआ, कमल हासन की फि़ल्म ,के विरोध में सक्रियता की डरावनी सघनता प्राप्त कर गया। इसका सबसे दर्दनाक पहलू कश्मीर में कुछ उत्साही किशोरियों के पहले राकबैंड ‘‘प्रगाश’’ पर प्रतिबन्ध लगाने की माँगों के रूप में सामने आया। यह अत्यंत ख़तरनाक स्थिति है। जिसके फ़लस्वरूप लेखन, दूसरे कला व संस्कृति कर्म से जुड़े लोगों तथा बौद्धिक वर्ग का चिंतित होना स्वाभाविक ही है। विचार और संवेदना का आहत होना भी उतना ही कु़दरती है।
    कृतियों पर प्रतिबन्ध लगाने रचनाकारों के बहिष्कार तथा कतिपय फि़ल्मों के किसी गीत या दृश्य को फि़ल्म से निकालने की माँगें पहले भी होती रही हैं। कोर्ट कचहरी भी हुई और जूता लात भी। प्रेमचंद सरीखे कथाकार को यदि घ्रणा का प्रचारक कहा गया तथा उनकी एक कहानी को लेकर मुक़दमा दायर हुआ तो कुछ वर्ष पूर्व ही उनके एक उपन्यास का सार्वजनिक तौर पर दाह संस्कार किया गया। अपनी तरह के अकेले शायर यगाना चंगेज़ी को उनका मुँह काला करके, गले में जूतों की माला पहनाकर यदि गदहे पर बिठा कर जुलूस निकाला तो कहानी संग्रह ‘‘अंगारे’’ के कहानीकारों पर मुक़दमा चलाने के लिए चन्दे जमा किए गये। रशीदजहाँ को तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ देने,नाक काट लेने की धमकियाँ दी गयीं तथा कहानी संग्रह को प्रतिबन्धित कराने के उद्देश्य से तीखा अभियान छेड़ा गया। संयोग से इस अभियान की शुरुआत रौशन ख़्यालों के शहर अलीगढ़ से हुई तो सआदत हसन मंटो की कुछ कहानियों के कथ्य को लेकर कथाकार के विरूद्ध सख़्त कार्यवाई करने तथा कहानियों के प्रचार-प्रसार को रोकने के लिए कुछ अख़बारों के सम्पादकों ने प्रशासन पर शर्मनाक दबाव बनाया। कुछ विद्वानों प्रशासनिक अधिकारियों, धर्मगुरुओं तथा रचनाकारों के समर्थन के कारण यह दबाव अधिक वज़नदार हो गया। चवालीस साल की मुख़्तसर सी जि़न्दगी में दस वर्षों पर मुहीत मुक़दमें बाज़ी की प्रताड़ना। वहीं नई आशाएं -आकांक्षाएं जगाने वाली इक्कीसवीं सदी के आरंभ ही में दीपा मेहता की फि़ल्म वाटर पर प्रतिबन्ध लगाने की मांग तो छोडि़ये, उसके निर्माण की प्रक्रिया पर ही वीभत्स, नितांत अश्लील कि़स्म का फासीवादी आक्रमण किया गया। फि़ल्म फ़ायर के विरूद्ध भी अभियान छेड़ा गया। उसके प्रदर्शन में बाधा पहुँचाई गयी।
    ख़्वाजा अहमद अब्बास को कम से कम अपनी तीन फि़ल्मों के प्रदर्शन के लिए, जिनमें शहर और सपना तथा नक्सलाइट भी शामिल हैं, कठिन संघर्ष करना पड़ा। फि़ल्म ‘‘आँधी’’ को आपातकाल के दौरान नायिका मंे इन्दिरा गाँधी की छवि दिखन के कारण प्रतिबन्धित किया गया। अमृतनाहट की फि़ल्म ‘‘कि़स्सा कुर्सी का’’ में राजनीतिक भ्रष्टाचार के एक्सपेाज़र के कारण प्रदर्शन से रोका गया, राहुल ढोलकिया की ‘‘गुजरात के दंगों पर आधारित फि़ल्म ‘‘परजानिया’’ के विरूद्ध भी उन्माद पैदा किया गया। वो गुजरात में प्रदेर्शन से वंचित रही। गुजरात सरकार के आमिर ख़ान से नाराज़गी के कारण तो नंन्दिता दास की फि़ल्म ‘‘गुजरात दंगांे’’ की पृष्ठभूमि के कारण ही गुजरात में दिखाये जाने से रोक दी गयी। आमिर ख़ान का अपराध मात्र इतना था कि वह नर्मदा बचाव आन्दोलन के समर्थन में मेघा पाटकर के साथ धरने पर बैठे थे। वह दंगांे के कारण मुख्यमंत्री की आलेचना भी कर चुके थे। रोक-टोक की इंतिहा यहाँ तक कि राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत होने के बावजूद राकेश शर्मा की फि़ल्म ‘‘द फाइनल साल्यूशन’’ रिलीज़ होने से ही वंचित रह गयी। बहुत अर्सा नहीं बीता जब प्रोफे़सर सुमित सरकार तथा के0एन0 पाणिक्कर द्वारा संपादित ‘‘टूवडर््स फ्रीडम’’ के खण्डों का प्रकाशन रुकवाने हेतु संाप्रदायिक मानसिकात के लोगों ने हर संभव प्रयास किए।
    ‘‘राही मासूम रज़ा’’ के उपन्यास आधा गाँव, प्रेमचंद की कुछ कहानियों व उपन्यास को पाठ्यक्रम से निकालने के समान ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गयी इतिहास की कुछ पुस्तकों को भी इतिहास की भोतरी समझ का शिकार होना पड़ा।
    राम के सम्बन्ध में अम्बेडकर के आलोचनात्मक आलेख के विरूद्ध ग़ैर दलितों का विक्षोभ भरा उत्ताप भी बहुत पुराना नहीं है। अंतराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के चित्रकार एम0एफ0 हुसैन के चित्रों तथा स्वयम् उन पर फ़ासीवादी हमलों की आक्रमकता का अनुमान इससे लग सकता है कि उन्हें हमेशा के लिए देश ही छोड़ देना पड़ा। आंध्रप्रदेश, केरल, महाराष्ट्र मंे कई नाटकों को सरकारी दमन का किशार होना पड़ा तो पंजाब में बलवन्त गार्गी के नाटक मंच पर आने से वंचित रहे, देश का सांस्कृतिक, बौद्धिक इतिहास अवसाद और शर्म के हादसों अनेकानेक साक्ष्यों से आहत है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष मंे हुए संघर्षों का भी लम्बा इतिहास है गंभीर ख़तरों के बावजूद लोग कलाकर्म की स्वायत्ता तथा कहने लिखने की आज़ादी के पक्ष में सक्रिय होते रहे हैं। जैसे कि कश्मीरी लड़कियों के राक बैंड ‘‘प्रगाश’’ के खिलाफ़ एक मुफ़्ती द्वारा दिये गये फ़तवे के निषेध में न केवल मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्लाह मुखर हैं बल्कि वहाँ का प्रशासन भी बैंड से सम्बद्ध लड़कियों को धमकी देने वाले युवकों के खि़लाफ़ उचित कार्यवाई भी की है। उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है। अलगाववादी नेताओं, अनेक धार्मिक गुरूओं, महिला संगठनों तथा बौद्धिक वर्ग ने भी बैंड के, गाने बजाने के अधिकार का समर्थन किया। इस तथ्य को कैसे नज़र अन्दाज़ किया जा सकता है कि न केवल भारतीय उपमहाद्वीप का संगीत बल्कि अनेक एशिया, अफ्रीक़ी व युरोपीय देशों का संगीत भी मुस्लिम महिलाओं के बहुमूल्य योगदान के कारण नये शिखरों की ओर जाते हुए अप्रतिम माधुर्य प्राप्त कर सका है। दरअस्ल हाल की ऐसी सभी घटनाओं को राजनीति प्रेरित मानने में संकोच नहीं होना चाहिए। ऐसी घटनाओं के पीछे निहित स्वार्थ की भी भूमिका रहती ही है।
    कश्मीर, जहाँ के जीवन में संगीत की व्यापक उपस्थिति है, गायन व नृत्य में पारंगत स्त्रियों का बड़ा समूह है, वहाँ केन्द्रीय मंत्री गु़लाम नबी आज़ाद की पत्नी भी अत्यंत लोकप्रिय गायिका है। संगीत में दक्ष पुरुषों की संख्या भी वहाँ अच्छी ख़ासी है। लोक संस्कृति की नितांत समृद्ध परम्परा वहाँ के संघर्षपूर्ण जीवन को उल्लास व मादकता देती है। हुब्बा ख़ातून को सर पर बिठाने तथा इस्लामी शुद्धतावाद का निषेध करने वाले सूफि़यों, के प्रति, जिन्होंने संगीत को आराधना की उच्चता दी, विराट भक्तिभाव से लबरेज़ समाज के लिए लड़कियों का राक बैण्ड भला असहनीय क्यों होने लगा? कट्टर धार्मिक लोगों के लिए यह स्थिति अवश्य अप्रिय हो सकती है। ध्यान देना चाहिए कि स्त्रियों केप्रति निरन्तर अधिक व्यापाक व क्रूर होती जाती हिंसा के उन्मूलन के लिए कारगर सिफ़ारिशें देने के उद्देश्य से गठित जस्टिस वर्मा समिति की वर्दीधारियों द्वारा की जाने वाली यौन हिंसा को क़ानून के दायरे में लाने की सिफ़ारिश को केन्द्र सरकार द्वारा महत्व न देने पर कश्मीर में असंतोष का वातावरण बना है। वर्दीधारियों द्वारा वीभत्स बलात्कार की अनेकानेक टीस भरी यादें लोगों को विचलित करती हैं। केन्द्र सरकार ने जस्टिस वर्मा की सिफ़ारिश को महत्व न देकर एक तरह से उमर अब्दुल्लाह के विरोधियों को राजनीति करने का आसान अवसर दे दिया है।
    यदि वह फ़तवे का विरोध या आलोचना करते तो धार्मिक हल्कों मंे पैदा हुए असंतोष व आक्रोश को व्यापक बनाने के जतन किए जा सकते थे और यदि वो फ़तवे के समर्थन में जाते तो उदार व गै़र मुस्लिम कश्मीरियांे सहित समूचे देश मंे उनकी छवि ख़राब होती  यहाँ तक कि उनकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर भी आंच आती, उमर अब्दुल्लाह ने राक बैण्ड, ‘‘प्रगाश’’ जिसका अर्थ प्रकाश होता है, के पक्ष में बयान देकर समूचे भारतीय समाज तथा राज्य व केन्द्र सरकारांे  को सकारात्मक संदेश दिया है। ठीक इसी प्रकार जयपुर साहित्योत्सव में बहुधा सलमान रुश्दी तथा तस्लीमा नसरीन को सादर आमंत्रित किए जाने के औचित्य को भी समझा जा सकता है। यह जानते हुए भी कि दोनों उल्लेखनीय लेखक तो हो सकते हैं, परन्तु महान् या एकदम कन्विन्सिंग नहीं। रचनाकार के रूप में दोनों का सम्मान व महत्व है। लेकिन उनके लेखन के कुछ अंशों से मुसलमानों की नाराज़गी एकदम निराधार भी नहीं है। संसदीय जनतंत्र में इस प्रकार की नाराज़गी के राजनैतिक इस्तेमाल की संभावनाएं सदैव बनी रहती हैं। चुनाव निकट हों तो यह संभावना पानी में भीगे चने के समान रोज़बरोज़ अधिक फूलती जाती है। मुम्बई में रूश्दी के उपन्यास पर बनी फि़ल्म के रिलीज़ के अवसर पर उन्हे बुलाएं जाने का औचित्य तो समझ में आता है, परन्तु जयपुर के साहित्योत्सव में इसकी अनिवार्यता औचित्य से परे है।
    जो लोग इस प्रकार के फैसलों से मुसलमानों के प्रचारित कट्टरपन को निरस्त करने या धुंधलाने की इच्छा पालते हैं, उन्हंे समझना चाहिए कि इससे कट्टरवादी-तत्ववादी शक्तियों ही को लाभ होता है। उन्हें अपना स्पेस व्यापक करने क मौक़ा हाथ आ जाता है। यदि कुछ हिन्दू संगठन ग़ैर भाजपाई सरकारों पर हिन्दुओं के साथ पक्षपात करने तथा उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का उत्तेजक आरोप लगाकर अपना जनाधार बढ़ाने का स्वप्न देख सकते हैं तो आखि़र  कुछ मुस्लिम नेता या संगठन क्यों चुप रहने लगे? भावना का यथार्थ केन्द्रीय तत्व के रूप में उपस्थित है ही। बुख़ारी और उवैसी की राजनैतिक आकांक्षाएं अपनी जगह, उल्लेखनीय मुस्लिम आबादी वाले अधिकांश शहरों-क़स्बों मंे धार्मिक नेताओं और संगठनों की आपसी प्रतिसस्पर्धा के कारण ऐसे अवसरों की प्रतीक्षा ही रहती हैं। यही कारण है कि वो अधिक से अधिक उग्र होने का प्रदर्शन करते हैं, जैसा कि आजकल तोगडि़या कर रहे हैं। कारणवश सामान्य मुसलमानों के साथ ही देश की जनता के बड़े हिस्से की बुनियादी समस्याएं नेपथ्य में चली जाती है और गै़र जरूरी मुद्दे प्रमुखता प्राप्त कर लेते हैं। लखनऊ को एक बड़े उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। उतना त्रासद यह नहीं है कि कश्मीर में नये संकल्पों के एक राक बैंड की मधुर लहरियां असमय कालातीत हो जायेंगी, बड़ी त्रासदी यह है कि यह स्थिति बहुत सी कश्मीरी लड़कियों के आगे बढ़ने के हौसलों तथा संभव धार्मिक अस्मिता के साथ आधुनिकता को आत्मसात करने के लिए छटपटाते कश्मीरी समाज के लिए सधन कुठाराघात साबित हो सकती है।
    विश्वरूपम को प्रतिबन्धित करने अथवा उसके कुछ दृश्यों को फि़ल्म से हटाने की शुरूआती माँगें मुख्य रूप से राजनीति प्रेरित थीं। तमिलनाडु मंे दो द्रमुकों की परस्पर राजनैतिक प्रतिस्पर्धा की छवियां इन माँगों में न्यस्त थीं। इन्हें छिपा पाना कठिन है। इस कारण भी कि जिस संेसरबोर्ड ने इस फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति दी उसमंे यू0पी0ए0 के सहयोगी, द्रमुक के एक सक्रिय मुस्लिम कार्यकर्ता मियां हसन महमूद जिन्ना महत्वपूर्ण सदस्य के रूप में मौजूद हंै। फि़ल्म के विरूद्ध आन्दोलन के उग्र होने का मतलब था कि मियाँ हसन महमूद की स्थिति का ख़राब होना, जो बहरहाल द्रमुख के लिए सुखद स्थिति नहीं होती, अन्नाद्रमुक की भी अपनी समस्याएं थीं। फि़ल्म पर प्रतिबन्ध लगाने अथवा उसके कुछ दृश्यों को हटाने की मांग करते  समय सकारात्मक सन्देशों पर आधारित कमल हासन की पूर्व फि़ल्मों, सामाजिक सरोकारों से सम्बद्ध उनकी सक्रियताओं तथा उनकी वैचारिक उदारता को भुलाते हुए जैसा कि आशीष नन्दी के साथ भी हुआ, इस तथ्य को भी नज़र अन्दाज़ कर दिया गया कि उसकी पटकथा तथा संवाद न केवल एक जुझारू दिवंगत माक्र्सवादी नेता के पुत्र अतुल तिवारी ने लिखे जो कि स्वयम् तो कम्युनिस्ट हैं ही, देश के तमाम संघर्षशील दबे कुचले वर्गों के साथ ही मुसलमानों के भी बड़े शुभचिंतक हैं। जन संचार माध्यमों के सोद्देश्य इस्तेमाल का विपुल अनुभव है उनके  पास। अवश्य ही इन उद्देश्यों की सकारात्मकता पर सन्देह नहीं किया जा सकता, फिर भी चूक या असावधानी तो किसी से भी हो सकती है। चूक की प्रमाणिकता को जांचे बिना फि़ल्म के विरूद्ध दमनात्मक आन्दोलन खड़ा करने से पहले गंभीर विचार विमर्श और संवाद को आवश्यक नहीं समझा गया। आखि़र देश के ज्यादातर हिस्सों के मुसलमानों ने फि़ल्म को मूल रूप में स्वीकार किया। धार्मिक संगठनों ने भी विशेष आपत्ति प्रकट नहीं की।
    गलत प्राथमिकताओं तथा ग़लत आन्दोलनों के कारण मुसलमानों की बहुत क्षति हुई है। उनकी छवि लगातार धुंधलाती गयी है। मुस्लिम नेता तथा धार्मिक गुरू आखिर सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशें लागू कराने का दबाव क्यों नहीं बना पा रहे हैं? वक़्फ़ बोर्डों तथा अल्पसंख्यक कल्याण निगमों, सम्बन्धित अन्य विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध वह कोई ठोस पहल करने में असफ़ल क्यों हैं? व्याप्त अशिक्षा को दूर करने के लिए वह कोई सघन परिणामपरक अभियान चला पाने में असमर्थ क्यों साबित हो रहे हैं?

    -शकील सिद्दीक़ी
   
   
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