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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

इतिहास का संघीकरण

   नई सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रित हमला इतिहास पर हुआ है, क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गए एक लेख-‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अरीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिए सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक, सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
    इतिहास लेखन को वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत करती है। इस लेख में आउटलुक को दिए साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-
‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
    वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा किया गया है। जोकि भ्रामक है।    वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास ने एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सकें। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनाई है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किए उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
    इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नई नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डाॅ0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमे जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह से स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।
इतिहास का पुनर्लेखन-
    इतिहास के पुनर्लेखन पर पूछे गए एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जाएगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आएगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 ‘भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है।
    वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंस का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पुनर्लेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायकों को परिभाषित किया जाएगा।
ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’
    प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जाएगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जाएगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वहीं दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं। वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ यह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गौरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया।
    यह सत्य है कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किंवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दुत्व का महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टि’ के नाम पर फाँसी की सजा सुनायी जा रही है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जाएगी।
प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’
    सुदर्शन राव जी ने ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नामक एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है-पहला इन महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
    प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावों का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे महाकाव्य समाज को समझने के एक स्रोत हो सकते हंै। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था। ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के आधार पर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानांे और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दुआंे के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या
    अयोध्या पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव  ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जाएगें और भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी
    प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाए तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे-यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी होते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अँगूठा कैसे और क्यों माँगा गया। गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिए होंगे। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है, जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिए यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमाँस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करें।
इतिहास बनाम धर्म
    इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वहीं धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी हैं। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब ने यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरों को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरांे का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण।
    खैर 1972 मंें स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य के ‘इतिहास बोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाएँगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।
 -अनिल यादव
   मो0 0945429233
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014

शनिवार, 27 सितंबर 2014

आईसीएचआर के अध्यक्ष का ‘इतिहास बोध’

नयी सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रीत हमला इतिहास पर हुआ है क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद(आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गये एक लेख- ‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अ रीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने
लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक-सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
इतिहास लेखन की वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत होती है। इस लेख में आउटलुक को दिये साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-
‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात् विद्वानों द्वारा किया गया है। जोकि भ्रामक है।
वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सके। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री
प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनायी है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किये उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नयी नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डा0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमें जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।
इतिहास का पुर्नलेखन-
इतिहास के पुर्नलेखन पर पूछे गये एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जायेगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आयेगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है।
वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंश का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है
कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पूर्नलेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायको को परिभाषित किया जायेगा।
ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’-
प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जायेगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जायेगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वही दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं।
वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ वह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गोरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया।
यह सत्य कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दूत्व की महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टी’ के नाम फांसी की सजा सुनाया जा रहा है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जायेगी।
प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’-
सुदर्शन राव जी ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नाम एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है-
पहला इनकी महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावो का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे  महाकाव्य समाज को समझने का एक स्रोत हो सकता है। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था।
‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के आधारपर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानो और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दूओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या-
अयोध्या पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव जी ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जायेगें ओर भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
  प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी-
  प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाये तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे- यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी रहते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अंगूठा कैसे और क्यों मांगा गया।
गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिये होगें। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मतुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है,
जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिये यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमांस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करेगें?
इतिहास बनाम धर्म-
  इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वही धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब ने सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी है। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरो को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरो का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण।
खैर 1972 में  स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा  के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य का ‘इतिहासबोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल
समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलायेगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।
-अनिल यादव
मो0 09454292339
लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाश्य

रविवार, 6 जनवरी 2013

इतिहास के पन्नो से निकलते सबक .......

महान राष्ट्रवादी विपिनचंद्र पाल ने कहा था कि --- ' देश को नया रिफार्म यानी सुधार नही चाहिए अपितु री--- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | आज इस राष्ट्र को ऐसे ही पुनर्गठन की आवश्यकता है | इंग्लैंड को भारतीय सरकार की नीति -- निर्माण का अधिकार छोड़ देना चाहिए | '

देश के इतिहास में , 1905 में अंग्रेज वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा किये गये बंगाल के विभाजन के बाद खड़े हुए राष्ट्रीय आन्दोलन को राष्ट्रीयता के पहले उभार के रूप में देखा जा सकता है | इसका यह मतलब नही है कि इससे पहले ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी आन्दोलनों का कोई राष्ट्रीय चरित्र नही था | एकदम था | लेकिन वह राष्ट्रीयता पुराने या मध्ययुगों  के मूल्यों मान्यताओं पर आधारित थी | उदाहरण -- 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम देश में विद्यमान सामन्ती मूल्यों मान्यताओं के साथ ब्रिटिश दासता को जड़ मूल से खत्म कर देने का स्वतंत्रता संग्राम था | हालाकि यह बात भी एकदम सच है कि बीसवी शताब्दी में शुरू हुए आधुनिक युग के राष्ट्रीय आंदोलनों , 19 वी शताब्दी के उन्ही आन्दोलनों व संघर्षो की पृष्ठ्भूमिया आधार पर ही पनपे तथा आगे बढे |

1905 में ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन के इस महान राष्ट्रवादी उभार ने न केवल देशवासियों में आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना का रक्त संचार कर दिया , अपितु देशवासियों के भीतर ब्रिटिश राज के हिमायतियो और विरोधियो के बीच अन्तरभेद व विरोध को भी तेज कर दिया | यहाँ तक कि बंग -- भंग के विरोध की अगुवाई कर रही कांग्रेस पार्टी में भी आन्दोलन के प्रमुख मुद्दों और उसके उद्देश्य को लेकर ऐतिहासिक विभाजन हो गया | वह आज कल की राजनितिक पार्टियों के भीतर चल रहे सत्ता -- स्वार्थी विभाजन जैसा नही था , बल्कि वह राष्ट्रवादी आन्दोलनों  के प्रमुख मुद्दों को लेकर उसकी दिशा या लक्ष्य के सवाल पर हुआ था |जहा बालगंगाधर तिलक , विपिनचंद्र पाल तथा लाला लाजपत राय जैसे गरम दलीय कांग्रेसी नेताओं के प्रमुख मुद्दों में बंगाल विभाजन के साथ विदेशी मालो का बहिष्कार करने , स्वदेशी मालो को अंगीकार करने तथा राष्ट्रीय शिक्षा लेने और स्वराज पाने पर जोर था | वही गोपाल कृष्ण गोखले तथा मदन मोहन मालवीय जैसे नरम दलीय नेताओं का बंगाल विभाजन के विरोध के स्वदेशी को अपनाने पर ही प्रमुख जोर था | जहा गरम दलीय कांग्रेस का प्रमुख लक्ष्य स्वराज था वही नरम- दल का प्रमुख लक्ष्य ब्रिटिश हुकूमत के भीतर हिन्दुस्तानियों के लिए ज्यादा अधिकार पद -- प्रतिष्ठा को प्राप्त करना था |

यहाँ हम इतिहास के पन्नो से गरम दलीय नेताओं के -- खासकर बाल -- पाल -- लाल के महत्वपूर्ण कथन यहाँ उद्घृत कर रहे है | ये उद्धरण हमने बी . एल . ग्रोवर तथा यशपाल की पुस्तक '' आधुनिक भारत का इतिहास '' से लिया है ----

बाल गंगाधर तिलक का यह कथन तो सर्वविदित है कि -- ' स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे | ' कोई भी समझ सकता है कि तिलक का प्रमुख लक्ष्य स्वराज था | उन्होंने अपने इसी ऐतिहासिक कथन के साथ यह भी कहा था कि -- '' स्वराज व स्वशासन , स्वधर्म के लिए आवश्यक है | स्वराज के बिना कोई सामाजिक सुधार नही हो सकता , न ही कोई औद्यगिक प्रगति या कोई उपयोगी शिक्षा ही हो सकती है और न ही राष्ट्रीय जीवन की  परिपूर्णता खड़ी हो सकती है |

विपिनचंद्र पाल ने कहा था कि -- '' देश को नया रिफार्म यानी सुधार नही चाहिए अपितु री- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | आज इस राष्ट्र को ऐसे ही पुनर्गठन की आवश्यकता है | इंग्लैण्ड को भारतीय सरकार की नीति -- निर्माण का अधिकार छोड़ देना चाहिए और एक विदेशी सरकार को जो कानून चाहे , वह बना सकने का अथवा अपनी इच्छा से शासन करने के अधिकार को त्याग देना चाहिए | उन्हें अपनी इच्छा से कर लगाने और अपनी इच्छा से धन को व्यय करने के अधिकार को भी छोड़ना होगा | ....

लाला लाजपत राय ने कहा कि -- '' जैसे दास की कोई आत्मा ( अर्थात स्वविवेक नही रह जाता ) उसी तरह से दास जाति ( अर्थात राष्ट्र की ) कोई आत्मा नही रह जाती | फिर इस आत्मा के बिना मनुष्य पशु के समान है | इसलिए इस आत्मा को जागृत करने के लिए स्वराज परम आवश्यक है और सुधार तथा उत्तम राज्य इसके विकल्प नही हो सकते | ...............

इनके अलावा राष्ट्रवादी क्रांतिकारी दर्शन व व्यवहार के प्रति समर्पित रहे महान राष्ट्रवादी  व दार्शनिक श्री अरविन्द घोष का कहना था कि -- '' राजनितिक स्वतंत्रता राष्ट्र के जीवन का श्वास है | बिना राजनितिक स्वतंत्रता के सामाजिक तथा शैक्षणिक सुधार , औद्योगिक प्रसार , राष्ट्र की नैतिक उन्नति इत्यादि की बात सोचना मुर्खता की चरम सीमा है | '

स्पष्ट है कि इन सभी राष्ट्रवादियो के लिए स्वराज का अर्थ विदेशी नियंत्रण से मुक्त स्वतंत्रता का था , जिसमे अपने राष्ट्र की नीतियों तथा प्रबन्धन में स्वराज की अवधारणा रखते हुए ब्रिटेन के साथ इस देश को लूट -- पाट के बनते -- बढ़ते रहे आर्थिक सम्बंधो को समाप्त करने की बात नही कही गयी थी | लेकिन उन्होंने उस राष्ट्रीय आन्दोलन में विदेशी मालो के बहिष्कार तथा स्वदेशी को अंगीकार करने के नारे व कार्यक्रम को तथा राष्ट्रीय शिक्षा को प्रमुख मुद्दा बनाकर यह स्पष्ट कर दिया था कि वे राष्ट्र के आर्थिक , शैक्षणिक व सांस्कृतिक जीवन में विदेशी मालो . सामानों और विदेशी शिक्षा पर निर्भरता नही बल्कि राष्ट्र का आत्मनिर्भरतापूर्ण स्वराज चाहते है |
सवाल है कि राष्ट्रवादियो और भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियो के ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वराज और फिर पूर्ण राष्ट्र्मुक्ति के उद्देश्यों व क्रियाकलापों को आज सुनने , जानने की कोई आवश्यकता है या नही ? अगर उसकी आवश्यकता है तो किसे है ? यानी समाज के किस हिस्से को है ? इस राष्ट्र के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से को ? या विभिन्न पेशो , स्तरों में बटे जनसाधारण समाज को ? नि:सन्देह देश का धनाढ्य उच्च राजनितिक एवं गैर राजनितिक हिस्सा यह काम नही कर सकता | कयोंकि यही वह हिस्सा है जो 1947 के बाद से ब्रिटेन , अमेरिका जैसे लुटेरे साम्राज्यी देशो के साथ संबंधो को बढाते हुए तथा उनसे पूंजी व तकनीक आदि से अधिकाधिक सहयोग -- सहायता लेते हुए उनकी हिदायतों व सलाहों , शर्तो , नीतियों को मानता और लागू करता रहा है | फिर पिछले बीस सालो से वह अन्तराष्ट्रीय वैश्वीकरणवादी नीतियों को डंकल प्रस्ताव आदि को राष्ट्रीय नीतियों व कानूनों के रूप में लागू करते हुए राष्ट्र में विदेशियों को बेलगाम एवं अधिकार पूर्वक आगमन का भरपूर सहयोग व समर्थन करता रहा है | उन्हें देश के धनाढ्य व उच्च हिस्सों के साथ अधिकाधिक अधिकार सम्पन्न बनाता रहा है | लेकिन इसी के साथ इस पूरे दौर में जनसाधारण को अधिकाधिक साधनहीन अधिकारहीन भी बनाता रहा है |
इसलिए यह बात निश्चित हो चुकी है कि राष्ट्र के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से का अब राष्ट्र -- हित व जन -- हित की नीतियों को बनाने व लागू करने का काम नही कर सकते | उन्हें अब उसकी कोई आवश्यकता नही रह गयी है | वे महज देश व विदेश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के हितो -- स्वार्थो की अधिकाधिक पूर्ति वाली नीतियों , कानूनों को लागू करने और संचालित करने का ही काम कर सकते है | उन्हें उसी को आगे बढाने वाले '' रिफार्म '' यानी '' सुधार ''  चाहिए |
लेकिन इन नीतियों सुधारों के कुपरिणामो को जीवन में संकट के रूप में भोगते जा रहे जनसाधारण को आज ऐसे जनविरोधी रिफार्म यानी सुधार की नही बल्कि राज और समाज का जनहित में री -- फ़ार्म यानी पुनर्गठन चाहिए | विदेशी लूट को लगातार बढाने वाली अन्तराष्ट्रीय या विदेशी नीति नही बल्कि राष्ट्रीय जीवन और जनजीवन के हित की राष्ट्रवादी जनवादी नीति व कानून चाहिए | राष्ट्र -- हित एवं जनहित का पूरा अधिकार चाहिए | उसे लागू करने वाली स्वराज व जनराज की व्यवस्था चाहिए | विदेशी लूट को लगातार बढाने वाली विदेशी सम्बन्ध नही चाहिए बल्कि ऐसे सम्बन्ध से राष्ट्र को मुक्ति चाहिए मुक्त राष्ट्र के साथ नए राष्ट्रिय व अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध चाहिए | वस्तुत: इसी लक्ष्य को लेकर हम इतिहास के पन्नो को पलट भी रहे है और उन्हें आपको सूना भी रहे है |

हमे अपने राष्ट्र के लिए एक नया  मुक्ति पथ खोलना होगा |

 -सुनील दत्ता
पत्रकार

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

इतिहास के आईने में दिल्ली

'' दिल्ली दिलवालों की '' भले ही कही जाति हो , पर यह सदियों से  '' जी हुजूरी '' से लेकर '' सरकार '' तक , संत्री से ले कर   '' मंत्री '' तक और '' नेता '' से ले कर  अभिनेता '' तक -- सभी के आकर्षण का केंद्र रही है , देशी ही नही विदेशी भी दिल्ली के दिल में समाने के लिए लालायित रहे है .  
इस दिल्ली की अपनी कोई संस्कृति हो या न  हो , किन्तु इसका अपना एक इतिहास अवश्य है , जिस में सम्पूर्ण भारत की झलक सहज ही देखी  जा सकती है . 
पौराणिक पृष्ठभूमि में दिल्ली का सम्बन्ध महाभारत कालीन पांड्वो की राजधानी इन्द्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है , वर्तमान दिल्ली में यमुना नदी के पश्चिमी  किनारे पर दिल्ली गेट के आसपास के इलाके की पहचान '' इन्द्रप्रस्थ '' के रूप में की गई है .

पौराणिक  कथाओं के अनुसार माना जाता है की यह स्थल धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर आदि पांड्वो को अपना आवास बनाने के लिए दिया था , तब इस का नाम '' खांडव वन '' था युधिष्ठिर ने अपने भाइयो की सहायता से वन को साफ़ कर  के , मय दानव से शानदार महल का निर्माण कराया था , स्वभावत: यहाँ धीरे -- धीरे बस्तिया बस्ती गई , जिन पर युधिष्ठिर का शासन चलता रहा , बाद में युधिष्ठिर हस्तिनापुर चले गये और वही से शासन सूत्र का संचालन करते रहे |
परवर्तीकाल  में इन्द्रप्रस्थ मौर्यों ,यौधेयो , कुषाणों आदि के शासन में भी रहा , किन्तु तब तक यह ' इंदरपत गाँव '' में बदल चुका था ,
ऐतिहासिक तथ्यों , ज्ञात अभिलेखों और पुरातात्विक  खुदाइयो से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर दिल्ली को ' सात बस्तियों का नगर '' माना जाता है , जो विभिन्न कालो में बनी .. इन में सबसे पुरानी बस्ती दसवी सदी के अंतिम चरण (993 )  में बसी थी , जिसे तोमर राजपूत अनगपाल  ने बसाया था और नाम रखा था '' ढिल्ली '' आधुनिक युग में इस की पहचान '' लालकोट '' के रूप में की गई है .

अनगपाल के बाद  कन्नौज  के  गहडवाल  शासको ने '' ढिल्ली '' पर अधिकार जमाया फिर क्रमश: अजमेर के चौहान राजा  अर्णोराज तथा विग्रहराज  बीसल देव चतुर्थ ( 115 -- 64 ) ने इसे कन्नौज के राजा से छीन लिया |
बीसल देव के बाद पृथ्वीराज चौहान ( 1177 -- 92 ) ने यहाँ शासन किया , पृथ्वीराज ने यहाँ '' रायपिथौरा '' के नाम से एक किला भी बनवाया था , पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज नरेश जयचंद के बीच लम्बे समय तक मन मुटाव चलता रहा , इस बीच पृथ्वीराज ने जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता -- संयुक्ता  से प्रेम विवाह भी कर लिया , जिस से और अधिक चिढ  कर जयचंद ने विदेशी हमलावर मुहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के विरुद्ध युद्ध लड़ने के लिए आमंत्रित किया |

पृथ्वीराज ने तरावली के मैदान में मुहम्मद गोरी को युद्ध में हराया , परन्तु गोरी ने 1192 में पृथ्वीराज पर विजय पाई और अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बनाया , उस ने 1210 तक दिल्ली पर राज्य किया , यद्यपि उस ने 1206 में मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद दिल्ली की जगह लाहौर को राजधानी बनाया था |

11211 में ऐबक के दामाद शमशुद्दीन ने पुन: लाहौर छोड़ कर  दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया 1236 में दिल्ली की गद्दी पर रजिया बेगम बैठी , दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली वह पहली महिला थी उन्होंने 1240 तक शासन किया ......
रजिया बेगम के बाद बहराम शाह (1240 -- 42 ) मसूद (1242 --46 ) नसुरुद्दीन ( 1246 -- 66 ) बलबम ( 1266-- 86 ) केकुबाद ( 1286-- 90 ) आदि ने दिल्ली पर राज्य किया था , केकुबाद के समय ही दिल्ली पर गुलाम वंश के शासन का अंत हो गया |
1290 में दिल्ली की बागडोर जलालुद्दीन खिलजी ने संभाली , खिलजी वंश के तीसरे शासक के रूप में अलाउद्दीन खिलजी 1296 में सत्तारूढ़ हुआ . अलाउद्दीन ने ही दिल्ली की दूसरी बस्ती की नीव डाली उस ने यहाँ सीरी फोर्ट का निर्माण कराया हौजखास भी उसी की देन है उस ने1296 से1316 तक शासन किया|
अलाउद्दीन के बाद 1320 तक दिल्ली की बागडोर शाह्बुद्धीन खिलजी , मुबारक और खुसरो  ने संभाली , 1320 में खुसरो के एक सरदार गाजी मलिक ने बगावत कर  दी , जिसमे खुसरो मारा गया और उस के साथ ही खिलजी वंश का शासकीय अंत हो गया
1320  में गाजी मलिक गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का सुलतान बना और उस ने यहाँ तुगलक वंशीय शासन की नीव डाली , 1414 तक यहाँ 11 तुग्लको ने राज्य किया जिन में से केवल तीन ने ही राज्य के विस्तार में योगदान  दिया , ग्यासुद्धीन तुगलक ( 1320-- 25 ) ने तुगलकाबाद बसाया जो दिल्ली की तीसरी बस्ती मानी जाती है |
1325 में मुहम्मद बिन तुगलक दिल्ली का शासक बना , उसने 1327 से 1330 तक अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरी और 130 से 1351 तक देवगिरी से दिल्ली बदल ली , इस दौरान 1328 में तरमाशीरी खा के नेतृत्व में मंगोल लूटपाट करते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे , मुहम्मद तुगलक ने उन्हें ढेर सारा धन दे कर वापस भेज दिया मुहम्मद तुगलक ने यहाँ पर '' जहापनाह '' नामक चौथी बस्ती बसाई , जो आज  खंडहर के रूप में नाम शेष है |
मुहम्मद तुगलक के उतराधिकारी फिरोजशाह तुगलक (1351-- 88 ) ) दिल्ली की पांचवी बस्ती '' फिरोजाबाद '' बसाई जो फिरोजशाह कोटला के नाम से प्रसिद्ध है फिरोजशाह की मृत्यु के बाद उस के पोते ग्यासुद्धीन ( 1388 -- 92 ) दूसरे पोते अबू  बकर तथा नासिरुद्धीन के नाम से मुहम्मद , हुमायु और महमूद ( 1392 -- 1398 ) ने दिल्ली पर शासन किया
महमूद शाह के शासनकाल में तैमुर लंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया 17 दिसम्बर 1398 को महमूद और तैमुर में जम कर  युद्ध हुआ जिस में तैमुर की जीत हुई और महमूद को भागना पडा , उस ने गुजरात में जा कर  शरण ली , इधर तैमुर लंग ने दिल्ली में जमकर लूटपाट की , लगभग तीन लाख लोगो को बंदी बनाया और चलता बना , वह दिल्ली में मात्र 15  दिन रहा
फरवरी 1492 में महमूद शाह की मृत्यु के बाद दौलत खा लोदी दिल्ली का शासक बना , किन्तु1414 में खिज्र खा ने उसे हटा कर  कैद कर  लिया और स्वंय शासक बन बैठा , खिज्र खा के बाद उसका बेटा मुबारक शाह तथा पोता मुहम्मद दिल्ली के शासक बने , मुहम्मद के बाद अलाउद्धीन आजम शाह ( 1445 ) सिंक्र लोदी ( 1489 ) और इब्राहिम लोदी (1517 ) ने दिल्ली का शासन संभाला
लाहौर के सूबेदार दौलत खा से इब्राहिम की कुछ अनबन हो गई , जिस से दौलत खा ने बाबर को दिल्ली पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया 21 अप्रैल 1526 को पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम को हराकर दिल्ली पर अधिकार कर  लिया और भारत में मुग़ल साम्राज्य की नीव रखी यद्दपि  बाबर का शासन केवल चार साल ( 1526 -- 1530 ) रहा , पर इस बीच उस ने देश में अनेक भवनों का निर्माण कराया
बाबर की मृत्यु के बाद उस का पुत्र हुमायु गद्दी पर बैठा , हुमायु ने पुराने किले और फिरोजशाह कोटला के मध्य दीनपनाह नामक एक बस्ती बसाई , जिसे ध्वस्त कर शेरशाह सूरी ने पुराना किला नामक दिल्ली की छठवी बस्ती बसाई , हुमायु का उतराधिकारी अकबर (1566-- 1605 ) और अकबर का जहागीर ( 1605 -- 1627 ) यद्यपि  इन दोनों ने बाबर और हुमायु की तरह आगरा को ही अपने शासन संचालन का केंद्र बनाया किन्तु दिल्ली और उस के आसपास के इलाको के विकास में भी योगदान दिया , बाद में अकबर ने आगरा और फतहपुर सिकरी को छोड़ कर  दिल्ली में ही डेरा डाल लिया |
यही प्रवृति शाहजहा की भी रही , उसने 1639 में दिल्ली में शाहजहानाबाद बसा कर  उसे राजधानी बनाया आजकल यह '' पुरानी दिल्ली '' के नाम से प्रसिद्ध है , यह दिल्ली की सातवी बस्ती है , जो कश्मीरी गेट , लाहौरी गेट और लालकिले के मध्य का क्षेत्र है |
1658 में औरंगजेब दिल्ली का शासक बना , उस ने 1707 तक दिल्ली पर राज्य किया औरंगजेब के बाद बहादुरशाह (1707 -- 12) जहादार्शाह ( 1712 -- 13 ) फरुखशियार ( 1713 -- 19 ), रफ़ी -- उद- दाराजात ( 1719 ) रफ़ी - उद-  दौला ( 1719 ) और मुहम्मद शाह बगश 1719 --48 ने दिल्ली की गद्दी संभाली
इसी दौरान 1739 में नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर  दिया , उस ने मुहम्मद बगश को बंदी बना कर  दिल्ली में 57 दिनों तक भारी लूटपाट की , वह अपने साथ लगभग 70 करोड़ का माल लुटा , जिस में कोहिनूर हीरा तथा शाहजहा द्वारा लगभग एक करोड़ रुपयों की लागत से बनवाये गये तख्ते ताउस '' भी शामिल थे
1748 में मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद अहमदशाह सम्राट बना , वह एक अयोग्य शासक था इसीलिए1754 में उसे गद्दी से उतार कर  उस की आँखे फोड़ दी गयी तब जहादर शाह का पुत्र अजिजुद्दौला आलमगीर दितीय के नाम से बादशाह बना 1757 में अहमदशाह अब्दाली ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा यहाँ अपना प्रतिनिधि नजीबुद्दौला को नियुक्त किया |
1757 से 1857 तक दिल्ली में शासको का प्राय: स्थायित्व नही रहा जो भी राजा बना , वह आपसी संघर्ष का शिकार हुआ जिस का दुष्परिणाम यह हुआ की 1803 में लार्ड लेक के नेतृत्व में दिल्ली पर अंग्रेजो का अधिकार हो गया और मुगल सम्राट शाह आलम की रक्षा का भार भी अंग्रेजो ने ले लिया
1806 में शाह आलम की मृत्यु के बाद उस के बेटे अकबर द्दितीय  (1806 -- 37 ) और उसके बाद बहादुरशाह द्दितीय ( 1837 -- 57) को गद्दी पर बैठाया गया , ये दोनों शासक ब्रिटिश सरकार के पेंशनधारी होने के कारण नाममात्र के ही सम्राट थे , एक तरह से उन के साम्राज्य की सीमा लाल किले तक ही सीमित  थी |
प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतीय सैनिको की तीन टुकडियो ने 11मई 1857 को दिल्ली से मेरठ पहुंच कर अंग्रेजो को खदेड़ दिया और बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित कर दिया , किन्तु 21 सितम्बर 1857 को अंग्रेजो ने दिल्ली पर पुन: कब्जा कर  लिया | और बहादुरशाह के पुत्र को मार दिया, बहादुरशाह जीनत महल और जवानबख्त  को नजरबंद क्र के रंगून भेज दिया जहा 1862 में बहादुरशाह का देहांत हो गया , अन्य विद्रोहीयो को चांदनी चौक पर फाँसी दे दी गयी | 1876 में रानी विक्टोरिया ने केसर - ए - हिंद ( भारत की साम्राज्ञी ) की उपाधि धारण की , इस अवसर पर लार्ड लिटन ने दिल्ली में एक बड़ा दरबार आयोजित किया , तब सभी भारतीय रियासतों के शासको को महारानी के प्रति सत्यनिष्ठा की शपथ  दिलाई गयी |
1911 में अंग्रेजो ने कलकत्ता के बदले दिल्ली के दक्षिण में बसी नई दिल्ली को राजधानी बनाया 1911 में ही यहाँ इंग्लैण्ड के राजा की ताज पोशी हुई 1911 से 1947 तक दिल्ली अंग्रेजो के शासन में रही 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के समय सत्ता हस्तांतरण दिल्ली स्थित संसद भवन में ही हुआ था | स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व उत्तर प्रदेश के शासन में था , स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह चीफ कमिश्नर द्वारा शासित प्रदेश बना , शीघ्र ही संविधान के अनुसार दिल्ली को '' सी '' श्रेणी का राज्य बनाने का आन्दोलन शुरू हुआ फलत: 1952 में यह '' सी '' श्रेणी  का राज्य बन गया |
कुल मिलाकर दिल्ली प्राचीनकाल से लेकर अब तक राजनितिक उथलपुथल का केंद्र तो रही है , दिल दहलाने वाली घटनाए भी होती रही है | हम वीर और साहसी होते हुए भी क्यों दुश्मनों से मात खाते रहे , क्या प्राचीनकाल से अब तक हम अपने पराजयों का कभी विश्लेषण किया है  और क्या आगे करेंगे |

-सुनील दत्ता
आभार ....स , विश्वनाथ

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

क्या ‘हिन्दू‘ हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है?

पिछले कुछ दषकों में सामाजिक-राजनैतिक क्षेत्र में धार्मिक पहचान, एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। साम्प्रदायिक और कट्टरतावादी राजनीति के उदय से ‘हम कौन हैं‘-इस प्रष्न के कई नितांत घातक व स्पष्ट तौर पर निहित राजनैतिक स्वार्थों को साधने वाले उत्तर, जनता के मन में बैठा दिए गए हैं और इनसे समाज विभाजित हुआ है। हाल में (सितम्बर, 2012) आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि ‘‘जब हम ‘हिन्दू‘ षब्द का उपयोग करते हैं तो हमारा अर्थ होता है संपूर्ण भारतीय समाज, जिसमें हिन्दू, मुसलमान और ईसाई सभी षामिल हैं। ‘हिन्दू‘ षब्द हमारी पहचान और राष्ट्रीयता है।‘‘ क्या यह मान्यता सभी भारतीयों को स्वीकार्य होगी? इस मान्यता के दो पहलू हैं-पहला धार्मिक और दूसरा राजनैतिक-राष्ट्रीय।
क्या हम सब भारतीय हिन्दू हैं, जैसा कि भागवत साहब ने फरमाया है। यह सही है कि हिन्दू षब्द का इस्तेमाल आठवीं सदी में षुरू हुआ जब पष्चिम (ईरान-ईराक से) दिषा से आने वालों ने इस षब्द को गढ़ा। वे सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों को सिन्धू कहने लगे। चूंकि उनकी भाषा में ‘ह‘ अक्सर ‘स‘ के स्थान पर प्रयुक्त होता था इसलिए सिन्धू षब्द हिन्दू में बदल गया। अतः षुरूआती दौर में हिन्दू षब्द का भौगोलिक अर्थ था। बाद में अनेक धार्मिक परंपराओं जिनमें ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, सिद्ध व भक्ति षामिल हैं, के मानने वाले हिन्दू कहलाने लगे और हिन्दू षब्द इन विभिन्न धार्मिक परंपराओं के मानने वालों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में हिन्दू षब्द को भौगोलिक संदर्भ में लिया जाता है परंतु भारत और विष्व के अधिकांष देषों में हिन्दू अब एक धर्म विषेष का नाम बन गया है।
हिन्दू वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत अछूतों के साथ किए जाने वाले पषुवत व्यवहार से दुःखी हो अम्बेडकर ने कहा था कि ‘‘मैं हिन्दू पैदा हुआ था क्योंकि वह मेरे हाथ में नहीं था परंतु मैं हिन्दू के रूप में नहीें मरूंगा‘‘। उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया। जैसे-जैसे देष में भारतीय राष्ट्रीयता की भावना जागृत होना षुरू हुई, साम्प्रदायिक राजनीति ने अपने पंख फैलाने षुरू कर दिए। सामंतवादी वर्ग और राजा-महाराजा एकजुट हो गए और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीयता के प्रति अपने विरोध को धार्मिक रंग देने की कोषिष षुरू कर दी। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की जगह इन सामंती तत्वों और राजा-महाराजाओं ने मुस्लिम राष्ट्रीयता और हिन्दू राष्ट्रीयता की बातें करना प्रारंभ कर दिया। सन् 1888 मंे गठित युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएषन से ही धार्मिक राष्ट्रीयता में आस्था रखने वाले विभिन्न संगठन जन्मे। इस संस्था के संस्थापकों में ढाका के नवाब और काषी के राजा प्रमुख थे। बाद में कुछ मध्यमवर्गीय, पढे़लिखे लोग भी इस संस्था से जुड़ गए। युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएषन ही वह संगठन था जिसने मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को जन्म दिया।
चूंकि इस्लाम, पैगम्बर पर आधारित धर्म था इसलिए उसकी पुनव्र्याख्या की आवष्यकता नहीं थी। परंतु हिन्दू धर्म, विभिन्न धार्मिक परंपराओं का मिलाजुला स्वरूप था इसलिए उसे हिन्दू धार्मिक राष्ट्रवाद का आधार बनाने के लिए नए सिरे से व्याख्यित किए जाने की आवष्यकता थी। सावरकर ने हिन्दू धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि जिन लोगों की पुण्यभू और पितृभू  भारतवर्ष में है, वे सब हिन्दू हैं। यह हिन्दू की राजनैतिक परिभाषा थी क्योंकि सावरकर, हिन्दू राष्ट्रवाद के झंडाबरदार थे और वे इस राष्ट्रवाद से मुसलमानों और ईसाईयों को अलग रखना चाहते थे। सावरकर की हिन्दुओं की इस परिभाषा मंे जैन, बौद्ध और सिक्ख भी षामिल थे जिन्हें हिन्दू धर्म के विभिन्न पंथ बता दिया गया। इन धर्मों के मानने वालों को यह स्वीकार्य नहीं था। वे अपने-अपने धर्मों की अलग पहचान कायम रखने के इच्छुक थे और हिन्दू धर्म का हिस्सा बनना नहीं चाहते थे।
अतः यह कहना, जैसा कि भागवत कह रहे हैं, कि सभी बौद्ध, जैन, सिक्ख, भारतीय मुसलमान और भारतीय ईसाई हिन्दू हैं, सत्य से परे है। यह एक तरह से धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिन्दू पहचान और हिन्दू कर्मकाण्ड लादने की कोषिष है। कुछ इसी तरह की बात लगभग दो दषक पहले तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोषी ने कही थी। उन्होंने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं-मुसलमान अहमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रीस्त हिन्दू हैं इत्यादि।
आजादी के आंदोलन के दौरान राष्ट्रीयता की दो अवधारणाएं सामने आईं। एक थी भारतीय राष्ट्रीयता, जिसकी आधारषिला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों ने रखी थी। यह राष्ट्रीयता दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन-भारतीय स्वतंत्रता संग्राम- की नींव बनी। राष्ट्रीयता की इस अवधारणा में धर्म व्यक्तिगत मसला था जबकि राष्ट्रीयता का संबंध एक विषेष भौगोलिक सीमा के अंदर रहने वाले लोगों से था। अधिकांष भारतीयों ने राष्ट्रीयता की इसी परिभाषा को स्वीकार किया और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी की। स्वाधीनता संग्राम का उद्धेष्य ब्रिटिष साम्राज्यवाद से मुक्ति तो था ही उसने जातिगत और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ भी आवाज उठाई और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में आस्था प्रकट की। यही मूल्य आगे चलकर हमारे संविधान का हिस्सा बने। दूसरी राष्ट्रीयता थी धार्मिक राष्ट्रीयता, जिसे जमींदार और सामंती वर्ग ने पोषित किया और आगे चलकर जो दो समानांतर राष्ट्रीयताओं में बंट गई। इन दोनों समानांतर राष्ट्रीयताओं के लगभग एक से सिद्धांत थे। ये थीं हिन्दू राष्ट्रीयता (हिन्दू महासभा व आरएसएस) और मुस्लिम राष्ट्रीयता (मुस्लिम लीग)। ये दोनों राष्ट्रीयताएं न केवल आजादी के आंदोलन से दूर रहीं बल्कि उन्होंने इस आंदोलन को कमजोर करने की भरसक कोषिष की। वेर्“ “हमारी महान परंपराएं“ और “हमारा महान धर्म“ के नाम पर जातिगत और लैंगिक भेदभाव को बनाए रखने की कोषिष करती रहीं। ये दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं अपने इतिहास को पुरातनकाल सेे जोड़ती रहीं। मुस्लिम लीग का कहना था कि मोहम्मद बिन कासिम के सिंध में अपना राज्य स्थापित करने के समय से ही मुस्लिम अलग राष्ट्र हैं। जबकि हिन्दू राष्ट्रवादी यह दावा करते थे कि हिन्दू, अनादिकाल से एक राष्ट्र हैं।
राष्ट्रीयता को प्राचीन इतिहास से जोड़ना, तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। राष्ट्रीयता की अवधारणा का विकास ही पिछली दो-तीन सदियों में हुआ है जब राजाओं के साम्राज्य बिखरने लगे और औद्योगिकरण और षिक्षा से लोगों की सोच में बदलाव आया। राजसी काल के पहले का समाज एकदम अलग था और उसे किसी भी स्थिति में राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीयता की ये दोनों धार्मिक अवधारणाएं अपने-अपने धर्मों के राजाओं का महिमामंडन करती हैं और अन्य धर्मों के राजाओं का दानवीकरण। वे यह भूल जाती हैं कि संपूर्ण राजतंत्रीय व्यवस्था ही षोषण व सामाजिक ऊँच-नीच पर आधारित है।
स्वाधीनता संग्राम के समय से ही दोनों धार्मिक राष्ट्रीयताएं इतर धर्मों के लोगों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानती थीं। पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्रवाद के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है और भारत में भी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के परवान चढ़ने के साथ ही, अल्पसंख्यकों के बुरे दिन आ गए लगते हैं। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म पर्यायवाची नहीं हैं। हिन्दुत्व को मोटे तौर पर हम राजनैतिक इस्लाम का हिन्दू संस्करण मान सकते हैं। हिन्दुत्व एक तरह का ‘राजनैतिक हिन्दू धर्म‘ है। आरएसएस-हिन्दुत्व के सबसे प्रमुख विचारक एम. एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘व्ही आॅर अवर नेषनहुड डिफांइड‘ में कहा है कि ईसाईयों और मुसलमानों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा वरना उन्हें कोई नागरिक अधिकार नहीं मिलेंगे। दुर्भाग्यवष, भारत में साम्प्रदायिक हिंसा में तेजी से हुई बढ़ोत्तरी के साथ गोलवलकर की यह इच्छा कुछ हद तक पूरी होती दिखती है।
यह कहना कि हम सब हिन्दू हैं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को दबाकर रखने का राजनैतिक षड़यंत्र है और ऐसा कहने वाले जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच के रखवाले हैं। ऊँचनीच और असमानता, धर्म-आधारित सभी राजनैतिक विचारधाराओं का आवष्यक अंग होती है। हिन्दू धर्म को सभी भारतीयों की राष्ट्रीयता और पहचान से जोड़ना, भारतीय राष्ट्रवाद, स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और भारतीय संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है। भागवत तो केवल आरएसएस के उस राजनैतिक एजेन्डे को स्वर दे रहे हैं जिसका उद्धेष्य प्रजातंत्र का गला घोंटना और पीछे के रास्ते से गोलवलकर के सपने को साकार करने की कोषिष करना है। यह कहना कि सभी भारतीय हिन्दू हैं तो षुरूआत भर है। इसके बाद अल्पसंख्यकों से अपेक्षा की जावेगी कि वे हिन्दू कर्मकाण्ड अपनाएं, हिन्दू धर्मग्रंथों को पवित्र मानें और हिन्दू देवी-देवताओं की आराधना करें। अतः यह मानना एक भूूल होगी कि सभी भारतीय हिन्दू हैं, यह कहकर भागवत किसी उदारता का परिचय दे रहे हैं। वे तो हिन्दू पहचान को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लादना चाहते हैं। हिन्दू सारे भारतीयों की पहचान न थी, न है और न हो सकती है। वह केवल हिन्दुओं की धार्मिक पहचान है और ‘हिन्दू‘ कोई राष्ट्रीयता नहीं है। हम सबकी राष्ट्रीयता भारतीय है और हमारी अलग-अलग धार्मिक पहचानें हैं।

 -राम पुनियानी




शनिवार, 19 नवंबर 2011

इतिहास से कटता- जुड़ता वर्तमान समाज

हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक ,जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे हैं और ना ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | हम वर्तमान युग के सामाजिक संबंधो को बहुत कम महत्व दे पा रहे हैं
किसी राष्ट्र का इतिहास उसे अपने देश व समाज की परिस्तिथियों से , उसके धरोहरों से उसके सामाजिक विशेषताओं गुणों , अवगुणों से परिचित कराता हैं | साथ ही वह उसे इतिहास का सबक भी सिखाता है | वर्तमान एवं भविष्य को बेहतर बनाने के प्रेरणाए देता हैं | मुख्यत: इसीलिए राष्ट्र व समाज के इतिहास को जानना जरूरी हैं | पर उससे भी ज्यादा जरूरी है की वर्तमान युग के राष्ट्र व समाज को , उसकी स्थितियों , परिस्थितियों एवं गतिविधियों को जाना जाय | क्योंकि हमे इतिहास का सबक वर्तमान युग में लागू करना है | उसी सीख - शिक्षा से वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाना है |अगर वर्तमान को जानने का गम्भीर प्रयास नही करते तो इतिहास हमारे लिए केवल शिक्षा का पढने - पढाने का प्रशंसा या निंदा आदि का ही विषय बनकर रह जाएगा | बदकिस्मती से आज कल हमारे समाज में यही कुछ हो रहा है | आज यह कहने वाले लोग मिल जायेगे की विगत इतिहास में हमारा देश सुख - वैभव ,धन - धान्य से भरा - पूरा रहा है , तो दूसरी तरफ यह कहने वाले भी मिल जायेगे की वर्तमान युग से पहले तो ज्यादातर लोगो को दोनों समय का भोजन भी नही नसीब हो पाता था | यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों को अपने अन्दर समाहित कर लेने का तथा शान्ति , सहृदयता व सहनशीलता का इतिहास रहा है , तो यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों के पराजय का कायरता का , सामाजिक जड़ता , कट्टरता और असहनशीलता का इतिहास रहा है |
इतिहास के इन्ही पाठो , प्रचारों और चर्चाओं के साथ अब एक नया दौर भी शुरू हुआ है |इतिहास को समाज व राष्ट्र के इतिहास के रूप में देखने तथा उसके राष्ट्रीय व सामाजिक गुणों , अवगुणों को समग्रता में जानने की जगह अब उसे धार्मिक , जातीय व इलाकाई समुदायों के रूप में देखने - बताने का दौर चल पड़ा है | ऐसा नही है कि इन आधारों पर इतिहास को देखने का काम पहले नही था | पहले भी था , पर उसका दायरा सीमित था | फिर ब्रिटिश राज के दौरान खड़े होते रहे राष्ट्रवादियो व क्रान्तिकारियो ने राष्ट्र व समाज कि ऐतिहासिक कमियों को बताते हुए उसे ठीक करने का कुछ न कुछ प्रयास भी किया |
वर्तमान दौर में इतिहास को समूचे राष्ट्र व समाज के इतिहास में प्रस्तुत करने की जगह मुख्यत:विभिन्न धार्मिक , जातीय , इलाकाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |इतिहास के वास्तविक या कल्पित व्यक्तियों , घटनाओं को महिमामंडित कर विभिन्न सामाजिक समुदायों को अपने - अपने इतिहास पर गर्व करने का पाठ -प्रचार चलाया जा रहा है | वर्तमान दौर के सामाजिक समुदायों की विशिष्टता को इतिहास से जोडकर देखा व बताया जा रहा है | विडम्बना यह है कि वर्तमान दौर में इतिहास से जोडकर देखने पहचानने की सामाजिक प्रक्रिया बढने - बढाने के साथ वर्तमान युग की स्थितियों में अपने को देखने पहचानने की प्रक्रिया धूमिल पडती जा रही है |हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक , जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे है और न ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | दूसरे शब्दों में कहे तो हम वर्तमान युग के सामाजिक सम्बन्धो को बहुत कम महत्व दे पा रहे है | सभी जानते है कि इस देश में आधुनिक युग की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के समय से हुई थी |कम्पनी राज और फिर 1858 के बाद के ब्रिटिश राज ने न केवल आधुनिक युग कि दासता को थोपे रखा अपितु इस देश को उसके पुराने इतिहास से , सामाजिक सम्बन्धो से भी काटकर अलग कर देने का काम शुरू कर दिया | उन्होंने राजशाही के दौर के राजकाज , शासन - प्रशासन को खत्म कर दिया | पुरानी कृषि व दस्तकारी पर आधारित अर्थव्यवस्था को भी छिन्न - भिन्न कर दिया समाज के पुराने सामाजिक सम्बन्धो को तोड़ते हुए आधुनिक युग के खरीद फरोख्त के बाजारवादी सम्बन्धो में बदलाव कि प्रक्रिया को आगे बढाने का काम किया | क्या ब्रिटिश दासता से पहले के इतिहास में राज व समाज के बदलाव का काम नही होता रहा है ? जरुर होता रहा है | पर अत्यंत धीमी गति से और थोड़े बहुत परिवर्तनों या कहिये सतही परिवर्तनों के साथ | उदाहरणार्थ ------इस देश कि प्राचीन कृषि , ग्रामीण एवं हस्तशिल्प कि व्यवस्था सदियों तक ज्यो क़ी त्यों या थोड़े बहुत विकास के साथ चलती रही | हिन्दू राजाओं ,बौद्ध राजाओं मुस्लिम बादशाहों का दौर आता जाता रहा , पर समाज व्यवस्था जस क़ी तस बनी रही | सत्ता के बदलाव के साथ समाज के सम्बन्धो में वस्तुत:कोई बदलाव नही हो पाया था | हिन्दू बोद्ध और मुस्लिम धर्म के बढ़ते प्रभावों के चलते समाज में धार्मिक बदलाव तो होता रहा पर समाज क़ी सदियों पुरानी अर्थव्यवस्था और उसमे कामो पेशो के विभाजन के साथ सदियों पुरानी उंचाई - निचाई , छोटे - बड़ाई तथा धार्मिक जातीय व इलाकाई अलगाव दुराव चलता रहा |इसकी जड़ता इस हद तक बनी रही क़ी मुस्लिम शासको के दौर्र में इस्लाम के फैलाव के वावजूद विभिन्न जातियों के रूप में मौजूदसामाजिक सम्बन्ध नही टूट पाए | इस्लाम के अनुयायियों तक में भी कुछ सुधारों के बावजूद सदियों पुरानी जातीय उचाई - निचाई बदस्तूर चलती रही | राज से लेकर समाज तक में यह स्थिति सदियों तक बनी रही | मध्य युग के इतिहास में राजाओं , बादशाहों के नाम चेहरे बदलने के साथ कोई महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव नही हो पाया | इसलिए लोगो का यह कहना मध्ययुग तक के लिए एकदम ठीक है कि कई बाहरी आक्रमणकारी आये गये पर हमारी सभ्यता संस्कृति ज्यो की त्यों बनी रही | यह न केवल इस भूभाग के सामाजिक जड़ता को बताती है बल्कि किसी महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव के प्रति बाहर से यहा आने वाले आक्रमणकारी की अक्षमता को भी दर्शाती है | फिर जब इतिहास की इसी सामाजिक जड़ता को समाज की खूबी बनाकर गाया सुनाया जाए तो वह वर्तमान युग में हमारी कूपमंडूकता को भी प्रदर्शित कर देती है | क्योंकि ढाई सौ साल पहले विदेशी यूरोपीय विशेषकर व्यापारियों के आगमन के बाद तथा उनकी आर्थिक , राजनीतिक, सैन्य शैक्षणिक व सांस्कृतिक प्रणालियों के लागू होने के बाद देश व समाज का चेहरा बदलने लग गया था और आज तक बदलता ही जा रहा है | हां यह बात एकदम ठीक है जिस तरह से उन्होंने आधुनिक औधोगिक व्यापारिक प्रणाली की स्थापना के साथ अपने देश के पुराने सामाजिक संबंधो का बदलाव किया था , वैसा उन्होंने इस देश को अपनी औपनिवेशिक लूट के लिए गुलाम बनाये रखना था | लेकिन इसके वावजूद अब सदियों पुरानी समाज व्यवस्था व उसके अंतर्गत चलते रहे सामाजिक संबंधो को टूटना बदलना अनिवार्य हो उठा था | बदलाव की वही प्रक्रिया निरंतर आगे बढती रही है | वह चाहे जितनी धीमी हो , विकृत हो , कष्टदायक हो , पर वह प्रक्रिया रुकने वाली नही हैं | इतिहास का पुराना दौर वापस लौटने वाला नही है |पुराने सम्बन्ध चलने वाले नही है और उनका टूटना व समाप्त होना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | इसीलिए अपने आप को इतिहास के सामुदायिक पहचानो , संबंधो के आधुनिक प्रतिनिधि के रूप में देखना कही से ठीक नही है | क्योंकि हम आधुनिक युग के प्रतिनिधि है |पुराने इतिहास से हम जुड़े जरुर है पर हम उसके प्रतिनिधि नही है | वर्तमान दौर की आवश्यकता यह है कि पुराने युगों के इतिहास कि टूटन से उसकी बढती दिशा दशा से प्रेरणा लेकर हम आधुनिक युग के सामाजिक पहचानो संबंधो को महत्व दें | किसी राजा , महाराजा या पुराने युग के योद्धा व विद्वान् से अपना रिश्ता जोडकर और उसे आगे कर हम समाज को आगे नही बढ़ा सकते | पर आधुनिक युग के संबंधो पहचानो को महत्व देकर और उसके लिए पुराने युगों से प्रेरणा लेकर हम उसे जरुर आगे बढ़ा सकते है |ब्रिटिश काल में देश के राष्ट्रवादियो ने अपने जाति धर्म की पहचान को नही बल्कि आधुनिक युग के राष्ट्रवादी पहचान को आगे करके स्वतंत्रता संघर्ष के लिए राष्ट्र को एकजुट करने का प्रयास किया था और उसमे काफी हद तक सफल भी हुए थे | आज हम वही प्रयास देश के शोषित - शासित जनसाधारण समाज के लिए कर सकते हैं | इतिहास से वर्तमान में चली आई सामाजिक दूरियों अलगावो को बनाये रखने या उस पर पर्दा डालने की जगह उसे स्पष्टतया स्वीकार करते हुए तथा जनसाधारण की वर्तमान दौर घराती समस्याओं के लिए देश के जनसाधारण को एकजुट करते हुए ही कर सकते है।
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

रविवार, 14 अगस्त 2011

आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 8


इक्कीसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का इक्कीसवाँ सम्मेलन त्रिची, तमिलनाडु में 28-31 जनवर 1983 को हुआ। मार्च 1983 को दिल्ली में 7वाँ गुटनिरपेक्ष सम्मेलन आयोजित होना था जिसके समर्थन में ए0आई0एस0एफ0 ने कई सेमिनारों, गोष्ठियों और बैठकांे का आयोजन किया। युवा दिवस के अवसर पर दिल्ली से हुसैनीवाला तक साइकिल रैली आयोजित की गई जिस पर पंजाब के खालिस्तानी नेता भिंडरवाले के भाई की देख-रेख में हमला किया गया। दोहरी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध सितम्बर 1983 में बनारस से देहरादून तक एक साइकिल जत्थे का आयोजन किया गया जिसमें 50 सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और यह जत्था 1400 किलोमीटर का सफर तय करके 20 दिनोें में देहरादून पहँुचा। जहाँ दून स्कूल के बाहर इस जत्थे पर जबरदस्त लाठीचार्ज हुआ और इसमें कई छात्र नेता घायल हुए अतुल कुमार अंजान के सिर पर भी काफी चोट आईं। बावजूद इस सबके आंदोलनकारी छात्रों को जेल में ठूस दिया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की गैर जनवादी रिपोर्ट के खिलाफ जहाँ मार्च 1983 में अखिल भारतीय प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया तो वहीं ए0आई0वाई0एफ0 के संसद मार्च में भी सक्रिय सहयोग किया। 13 सितम्बर को भी ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने मिलकर संयुक्त रुप से प्रतिरोध दिवस का आयोजन किया। जिसमें दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों से 5 हजार छात्रों ने भागीदारी की। इसके अलावा और 14 राज्यों में भी इसी दिन प्रतिरोध दिवस मनाया गया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1984 में हुई इंटरनेशनल यूनियन आॅफ स्टूडेन्ट्स की 14वीं कांग्रेस में सोफिया (बुल्गारिया) में शिरकत की तो वहीं 1985 में मास्को में संपन्न 12 वें अन्तर्राष्ट्रीय छात्र एवं युवा महोत्सव में भी भाग लिया।
बाइसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बाइसवाँ सम्मेलन 13-16 दिसम्बर 1985 को गुंटूर,
आन्ध्र प्रदेश में संपन्न हुआ। सम्मेलन के फौरन बाद 14 फरवरी 1986 को संगठन ने केन्द्र सरकार के शिक्षा पर नकारात्मक रुख वाले एक दस्तावेज के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। इसके बाद 13 सित्मबर 1986 को भी सरकार की नई शिक्षा नीति के खिलाफ प्रतिरोध दिवस मनाया। यह वह समय था जब देश में एक तरफ अलगाववादी, साम्प्रदायिक और जातिवादी ताकतंे सिर उठा रही थीं जो देश की एकता अखण्डता के लिए गंभीर खतरा था तो दूसरी तरफ आम आदमी बढ़ती महँगाई और सरकार की जन विरोधी नीतियों से परेशान था। ऐसे समय में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने संयुक्त रूप से ‘‘बचाओ भारत-बदलो भारत‘‘ नारे के तहत जनवरी से मार्च तक तीन साइकिल जत्थों के रूप में देश की एकता अखण्डता बनाए रखने के लिए और जनविरोधी नीतियांे के खिलाफ एक बड़े अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम का समापन 26 मार्च को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक रैली के रूप में हुआ जिसमें हजारों छात्रों नौजवानों ने भाग लिया।
0आई0एस0एफ0 की पचासवीं स्वर्ण जयन्ती
ए0आई0एस0एफ0 ने 50 साल पूरे होने पर लखनऊ में 12 से 14 अगस्त 1986 को बेहद शानदार तरीके से अपनी स्वर्ण जयन्ती मनाई। इस आयोजन की शुरुआत पहले दिन की बड़ी रैली से हुई। स्वर्ण जयन्ती समारोह का उद्घाटन महान स्वतंत्रता सेनानी बाबा पृथ्वी सिंह आजाद ने किया। 22 देशों के बिरादराना संगठनों के 27 प्रतिनिधियों ने भी इस समारोह में भागेदारी की। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना करने वालों में एक हरीश तिवारी के साथ एम0 फारुकी, ए0बी0 बर्धन, प्रशान्त सान्याल, विश्वनाथ मुखर्जी, गीता मुखर्जी, रमेश सिन्हा, सुनील सेनगुप्ता, शफीक नकवी, एच0के0 व्यास और प्रो0 संतोष भट्टाचार्य आदि आन्दोलन के कई वरिष्ठ साथियांे ने भी इस सम्मेलन में भाग लिया। समारोह के बहाने पुराने दिनों को याद करना, संगठन के लिए गौरवमयी पलांे को जीने के समान था और पुराने गौरव से मिलने का नए छात्रों का उत्साह भी उल्लेखनीय था।
इस यादगार समारोह के बाद ए0आई0एस0एफ0 ने नई शिक्षा नीति के खिलाफ आन्दोलन की फिर से कमान सँभाल ली। जहाँ सितम्बर 1988 में विरोध दिवस मना कर प्रतिरोध की शुरुआत की तो वहीं दिसम्बर 1986 को रेल रोको आंदोलन ने इस
विरोध को नई ऊँचाइयाँ दीं। 1988, छात्र युवा आंदोलन के उभार का समय था बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, केरल, मणिपुर, यू0पी0, आन्ध्र प्रदेश और दिल्ली में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। कर्नाटक, राजस्थान में भी आंदोलन और प्रदर्शन हुए तो वहीं हरियाणा, पंजाब और यू0पी0 में छात्र-युवा कंवेंशन भी हुए। इसी समय पंजाब में खालिस्तानी आंदोलन के कारण हालात बद से बदतर हो रहे थे। ए0आई0एस0एफ0 ने अन्य जनवादी और वामपंथी संगठनों के साथ मिलकर खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई की कमान सँभाली। ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 ने आतंकवाद का सामना करते हुए अपने कई साथियों की कुर्बानी दी। ठीक इसी समय आर0एस0एस0 और भा0ज0पा0 के नेतृत्व में साम्प्रदायिक ताकतें भी मजबूत हो रही थी। राम जन्मभूमि और बाबरी मजिस्द को मुद्दा बनाकर हिंदू और मुस्लिम साम्प्रदायिकों ने देश में राजनैतिक ध्रुवीकरण और साम्प्रदायिक विभाजन के एक नए युग की शुरुआत कर दी थी। देश की एकता अखण्डता को चुनौती देनी वाली इस साम्प्रदायिक विभाजन की राजनीति को भा0ज0पा0 की रथयात्रा ने साम्प्रदायिक सद्भाव की तबाही के रूप में बदल दिया। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरी धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के साथ मिलकर देश की एकता अखण्डता को बचाने के लिए सघन अभियान की शुरुआत की। यू0पी0 ए0आई0एस0एफ0 ने खासतौर पर धर्मनिरपेक्षता के लिए और साम्प्रदायिकता के खिलाफ राज्य व्यापी अभियान चलाया। यह वह समय था जब राजीव गाँधी अपनी साफ छवि के साथ सत्ता में आए थे परन्तु थोड़े दिन में ही उनकी यह छवि धूमिल हो चुकी थी। वाम और जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर ए0आई0एस0एफ0 ने इस दौरान एक जुझारू आंदोलन की शुरूआत की जिसके तहत दिल्ली में ‘‘राजीव गांधी गद्दी छोड़ो‘‘ के नारे के साथ 9 दिसम्बर 1987 को एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया गया। इसी कड़ी में आगे चलकर 15 मार्च 1988 को आयोजित भारत बंद में भी ए0आई0एस0एफ0 ने देश भर में शिक्षण संस्थानों को बंद करवाने में बड़ी भूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 ने 30 अगस्त के भारत बंद में भी महत्चपूर्ण भाूमिका अदा की। ए0आई0एस0एफ0 -ए0आई0वाई0एफ0 ने मंडल कमीशन के समर्थन में और शिक्षा एवं काम के अधिकार की माँग को लेकर 9 सितम्बर 1990 को संसद के सामने बोट क्लब पर प्रदर्शन किया।
इसके अलावा कई अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दांे को लेकर भी ए0आई0एस0एफ0 ने जुझारू आंदोलन किए। स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के 50 छात्रों ने लीबिया पर अमेरिकी हमले के विरोध में दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर पर कब्जा किया। 9 सितम्बर 1987 को नेल्सन मंडेला की आजादी और नस्लवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया। 2 अक्टूबर 1987 को दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया के प्रति एकजुटता दिवस के रूप में मनाया गया। इसी दिन दिल्ली ए0आई0एस0एफ0 के छात्र-छात्राओं ने ब्रिटिश काउंसिल पर कब्जा करके विरोध व्यक्त किया। नेल्सन मंडेला के जन्म दिवस के मौके पर उनकी रिहाई के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने ब्रिटिश काउंसिल के समक्ष प्रदर्शन किया और इसके अलावा केरल इकाई ने 50 हजार हस्ताक्षर करा कर विरोध व्यक्त किया। इसी बीच ए0आई0एस0एफ0 ने फिलीस्तीन के समर्थन में भी कईं कार्यक्रमों का आयोजन किया। 18 मई 1988 को फिर ए0आई0एस0एफ0 ने अमरीकन सेन्टर पर कब्जा करके फिलीस्तीन की संयुक्त राष्ट्र से सदस्यता समाप्त करने सम्बंधी बयान का विरोध किया। 8-15 दिसम्बर 1988 को ए0आई0एस0एफ0 केरल ने फिलीस्तीन सप्ताह के रूप में मनाया। 13 वें विश्व छात्र-युवा महोत्सव का आयोजन जुलाई 1987 में किया गया जिसकी तैयारी के लिए कई कार्यक्रम भारत में भी आयोजित किए गए।
23वाँ ए0आई0एस0एफ0 सम्मेलन
ए0आईएसएफ का 23वाँ सम्मेलन फरवरी 1991 में बोकारो में आयोजित किया गया। इस समय तक कई राजनैतिक बदलाव और आंदोलन देश भर के पैमाने पर हो रहे थे जिसमें ए0आई0एस0एफ0 ने सराहनीय एवं महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। 1991 का वह समय था जब नरसिंह राव सरकार विश्व बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के निर्देशन में देश में निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियाँ लागू कर रही थी। साथ ही दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों की प्रबल पैरोकार भा0ज0पा0 भी राम जन्मभूमि के अपने प्रतिक्रियावादी एजेंडे के द्वारा लोगांे का ध्यान भटका कर नई आर्थिक नीतियों को लागू करवाने में सहायक की भूमिका अदा कर रही थी। ऐसी स्थिति में ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने वाम जनवादी शक्तियों के साथ मिलकर कांग्रेस की नई आर्थिक नीतियों और भा0ज0पा0 के साम्प्रदायिक एजेंडे का एक साथ विरोध किया।
ए0आई0एस0एफ0 का 24वाँ सम्मेलन
7-9 फरवरी 1996 को हैदराबाद में संपन्न हुआ। ए0आई0एस0एफ0 ने दूसरे वामपंथी जनवादी छात्र संगठनों के साथ मिलकर 29 नवम्बर 1995 को अखिल भारतीय हड़ताल करके शिक्षा बचाओ आन्दोलन को आगे बढ़ाया। ए0आई0एस0एफ0 ने 1996 में देशभर में अपनी 60वीं सालगिरह मनाई। ए0आई0एस0एफ0 की छात्राओं ने 1998 में उड़ीसा में धरना आयोजित किया साथ ही देशभर में प्रतिक्रियावादी ताकतों के नारीवादी विरोधी रुख के खिलाफ कार्यक्रम आयोजित किए। 11 दिसम्बर 1998 को अखिल भारतीय छात्र हड़ताल का आयोजन किया गया।
ए0आई0एस0एफ0 का पच्चीसवाँ सम्मेलन
18-21 अक्टूबर 2000 को जालांधर में आयोजित किया गया था। 2000 विभिन्न मुद्दों पर ए0आई0एस0एफ0 के सक्रिय आंदोलनांे का साल था। तमिलनाडु का शिक्षा
अधिकार दिवस, आसाम का विधानसभा मार्च, कोल्लम का छात्र आन्दोलन, बैंगलोर का फाईन आर्टस छात्र आंदोलन, उड़ीसा बाढ़ राहत अभियान और कई राज्यों के सम्मेलन इस साल की मुख्य घटनाएँ थीं। ए0आई0एस0एफ0 ने 6 जुलाई 2001 को शिक्षा के भगवाकरण के खिलाफ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के समक्ष प्रदर्शन किया। ए0आई0एस0एफ0 ने 8-16 अगस्त 2001 में अलजीरिया में आयोजित 15 वें छात्र युवा महोत्सव में भाग लिया। ए0आई0एस0एफ0 की स्थापना के 65 वर्ष पूरे होने पर हैदराबाद में छात्र एवं युवा राष्ट्रीय महोत्सव का सफल आयोजन किया। बिहार ए0आई0एस0एफ0 ने शिक्षा बोर्ड में भ्रष्टाचार और फीस वृद्धि के खिलाफ विधानसभा का घेराव किया। महाराष्ट्र एस0एफ0 ने भी छात्रांे की विभिन्न समस्याओं को लेकर अक्टूबर 2002 में विधानसभा का घेराव किया। कुछ छात्र विरोध स्वरूप दर्शक दीर्घा से विधानसभा गैलरी में कूद गए। 29 नवम्बर 2002 को ए0आई0एस0एफ0 ने संसद चलो का नारा दिया जिसमें बड़ी संख्या में देशभर से छात्रों ने भाग लिया। केरल ए0आई0एस0एफ0 ने भी छात्रों की विभिन्न समस्याआंे को लेकर 2003 में विधानसभा का घेराव किया। पुलिस ने छात्रांे पर लाठीचार्ज किया और बड़ी संख्या में छात्रों को जेल में भी डाल दिया।
ए0आई0एस0एफ0 का छब्बीसवाँ सम्मेलन
छब्बीसवाँ सम्मेलन 3-6 जनवरी 2006 को चेन्नई में हुआ और सत्ताईसवाँ सम्मेलन 13-15 फरवरी 2010 को पंाडेचेरी में संपन्न हुआ। सम्मेलन का नारा था ‘‘शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण बन्द करो‘‘। 24 राज्यों के लगभग 1000 प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया। सम्मेलन में ‘‘ भारत में शिक्षा व्यवस्था का संकट‘‘ विषय पर एक सेमिनार का आयोजन भी किया गया जिसे सांसद व भा0क0पा0 राष्ट्रीय सचिव डी0 राजा और प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सदगोपालन ने संबोधित किया।
अब ए0आई0एस0एफ0 अपने 75 वर्षांे के गौरवशाली इतिहास को याद करने और भविष्य की चुनौतियों से संघर्षो की तैयारी करने के लिए 12-13 अगस्त 2011 को फिर से लखनऊ के उसी सर गंगा राम मेमोरियल हाॅल में अपनी 75वीं जयन्ती मनाने के लिए एकत्रित हो रहा है जहाँ 1936 में इसकी स्थापना हुई थी।
समाप्त

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 7


ए0आई0एस0एफ0 का अठारहवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का अठारहवाँ सम्मेलन दिल्ली में 21-23 दिसम्बर 1969 को सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में देशभर से 350 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन का उद्घाटन प्रो0 हीरेन मुखर्जी ने किया। सम्मेलन में शिक्षा एवं परीक्षा में सुधार, प्रबन्धन में छात्रों की भागीदारी, छात्र संघांे के गठन की अनिवार्यता, रोजगार या बेकारी भत्ता और 18 वर्ष की आयु में मताधिकार के सवालों पर एक माँग पत्र भी तैयार किया गया। 1969 में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी और आन्दोलन हुए। इसी दौर में भा0क0पा0, वामपंथ और इंदिरा कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार वी0वी0 गिरी देश के राष्ट्रपति चुने गए। 14 बैंकांे का राष्ट्रीयकरण किया गया और राजाआंे का प्रीवी पर्स भी इसी समय खत्म कर दिया गया। जिसका ए0आई0एस0एफ0 ने भारी स्वागत किया।
इसी समय देश की कई समस्याओं को लेकर भी राजनैतिक बहस का दौर शुरू हुआ। देश में व्याप्त विसंगतियांे, असमानताआंे और आर्थिक सामाजिक समस्याओं के
समाधान के लिए एक सामाजिक-आर्थिक रूपान्तरण की आवश्यकता थी जिसके लिए छात्र-युवा संगठनों में भी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर एक जबरदस्त बहस छिड़ी हुई थी। इन हालात में ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 के सामने भी यह महत्वपूर्ण सवाल था कि क्या उन्हंे वैज्ञानिक समाजवाद को अपने लक्ष्यों में शामिल करना चाहिए। इन्हीं सवालों पर बात करने के लिए जून 1969 को दिल्ली में दोनों संगठनांे की कैडर मीटिंग हुई। लम्बी बहस और चर्चा के बाद तय हुआ कि ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 को अपनी एक वैचारिक दिशा निर्धारित करते हुए वैज्ञानिक समाजवाद के लक्ष्यांे की ओर जाने के लिए छात्रों और युवाओं को वैचाारिक रूप से शिक्षित करना होगा। छात्रों और नौजवानों की एक अन्य कैडर मीटिंग जून 1971 में दिल्ली में हुई जिसमें सांगठनिक ढ़ाँचे और उसके कार्यों को लेकर चर्चा हुई।
भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में विघटन के कारण माक्र्सवादी विचारधारा को कई तरह के वैचारिक भटकावों से होकर गुजरना पड़ा। सी0पी0एम0 के उदय के साथ ही देश का परिचय माओवाद जैसे माक्र्सवादी भटकाव से हुआ। आज बेशक सी0पी0एम0 अपने आप को माओवाद की मुखर आलोचक और प्रमुख शत्रु सिद्ध करने की कोशिश करे परन्तु वास्तविकता यह है कि सी0पी0एम0 का निर्माण माओवादी दर्शन के आधार पर ही हुआ है। यह माओवाद ही है जिसने माक्र्सवाद के मूल सिद्धान्त द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की गलत एवं विध्वसंक परिभाषा दुनिया के सामने पेश की जिसके कारण पूरी दुनिया और विशेषकर तीसरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन को बिखराव का सामना करना पड़ा। देश में अतिवामपंथी नक्सलवाद भी इसी माकपाई संकीर्णता की देन रहा। इसी संकीर्णतावादी अतिक्रान्तिकारी दुस्साहस ने देश के छात्रों और नौजवानांे में एक राजनैतिक विभ्रम का प्रसार किया जिसका परिणाम पार्टी की टूट के बाद जन संगठनों के विघटन में भी दिखाई दिया। 1970 में एस0एफ0आई0 का निर्माण इसी संकीर्णता का परिणाम था।
वैचारिक प्रश्नांे प बहस की इस प्रक्रिया में एक ओर छात्र-युवा कैडर मीटिंग 20-22 मई को हैदराबाद में हुई। इन कैडर मीटिंगों में वैज्ञानिक समाजवाद, माक्र्सवाद, लेनिनवाद और अन्ततोगत्वा राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की संकल्पना को छात्र नौजवान संगठनों के संविधान में शामिल किए जाने का निर्णय हुआ। इन सवालांे पर औपचारिक फैसला ए0आई0एस0एफ0 के 19वें सम्मेलन में लिया गया।
19वाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का 19वाँ सम्मेलन 14-17 जनवरी 1974 को कोचीन में संपन्न हुआ। यह सम्मेलन अपने महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलावांे के कारण एक विशिष्ट आयोजन था। इस सम्मेलन के पूर्व एवं पश्चात् का समय देश और संगठन के लिए महत्वपूर्ण एवं प्रभावकारी घटनाओं और आंदोलनांे का समय था। जहाँ ए0आई0एस0एफ0 ने छात्रांे के जनवादी अधिकारांे के लिए और बेरोजगारी के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलनांे में सक्रिय और निर्णायक भूमिका अदा की, तो वहीं वाम, प्रगतिशील और जनवादी ताकतों के साथ मिलकर महँगाई, काला बाजारी और जमाखोरी के खिलाफ भी ए0आई0एस0एफ0 ने आंदोलनों में भाग लिया। यही वह समय भी था जब देश में जयप्रकाश नारायण का पार्टी विहीन जनवाद और सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन सर उठा रहा था। दक्षिणपंथी और फासीवादी शक्तियांे के कन्धों पर खड़ा यह आन्दोलन भ्रष्टाचार, महँगाई और बेकारी जैसे मुद्दों को लुभावने नारों में बदलकर आगे बढ़ा। इस आन्दोलन के खतरों को उजागर करने के लिए ए0आई0एस0एफ0 ने एक कंवेंशन का आयोजन 26-27 अप्रैल 1974 को पटना में किया। जिसमें कुछ सहयोगी जनवादी प्रगतिशील संगठनांे के साथ 2000 छात्रों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा पटना में आयोजित जे0पी0 आन्दोलन विरोधी रैली में लाखों की संख्या में लोगांे ने भाग लिया जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और नौजवान भी शामिल थे। आखिरकार यह आन्दोलन जे0पी0 और इंदिरा गांधी दोनांे के लिए अपने अपने वर्चस्व की लड़ाई में बदल गया। इंदिरा गांधी ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए देश में जून 1975 में आपात्तकाल की घोषणा कर दी। शुरुआत में आपातकाल का उपयोग दक्षिणपंथी, आर0एस0एस0 और जनसंघ जैसी ताकतों पर लगाम लगाने के लिए किया गया परन्तु बाद में यह जनवादी, प्रगतिशील और वामपंथी ताकतांे के भी दमन का औजार बन गया। ऐसी स्थिति में ए0आई0एस0एफ0 ने आपातकालीन दमन का पुरजोर विरोध किया। ए0आई0एस0एफ0 ने मेडिकल छात्रांे और जूनियर डाॅक्टरांे को लामबद्ध करने का महत्वपूर्ण काम किया। जिनका 26 अक्टूबर 1974 को अमृतसर में सम्मेलन करते हुए आॅल इण्डिया मेडिकोज फेडरेशन की स्थापना की गई।
आपातकाल के बाद का समय
इंदिरा गांधी को आपातकाल के दमन की सजा 1977 के चुनाव नतीजों में मिल गई। इंदिरा गांधी को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। जनसंघ और अन्य कई दलांे और गुटांे के घालमेल से बनी जनता पार्टी सत्ता में आई परन्तु जल्दी ही जनता पार्टी की वास्तविकता और विफलता लोगांे के सामने आ गई। जनता पार्टी लोगांे की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई, लोगांे में पार्टी के खिलाफ भारी असंतोष व्याप्त हो चुका था। अन्ततोगत्वा जनता पार्टी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और उसमें टूट हो गई। इसी जनता पार्टी की टूट से भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।
जनता पार्टी की जन विरोधी नीतियांे और संघीय ढ़ाँचे पर हमले की उसकी दक्षिणपंथी योजनाआंे के खिलाफ ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने देशव्यापी जुझारु आंदोलन चलाया। कई अवस्थाओं में चलते इस आंदोलन में कंवेंशन, हस्ताक्षर अभियान, घेराव और गिरफ्तारी हर एक तरीके से ए0आई0एस0एफ0 ने जनता पार्टी सरकार की दक्षिणपंथी नीतियों का विरोध किया। ए0आई0एस0एफ0 ने साम्राज्यवाद के खिलाफ और हिंद महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने के लिए भी इस बीच कई आंदोलन चलाए और क्यूबा में होने वाले छात्र-युवा महोत्सव की तैयारी के सिलसिले में भी देश भर में भारत-सोवियत युवा उत्सवांे का आयोजन किया गया।
बीसवाँ सम्मेलन
ए0आई0एस0एफ0 का बीसवाँ सम्मेलन 7-9 फरवरी 1979 को पंजाब के
लुधियाना में सम्पन्न हुआ। जनता पार्टी के दो वर्षों के विफल शासन के बाद ही देश में फिर से इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आई) की वापसी हो गई। इंदिरा गांधी राजनैतिक स्थायित्व का नारा देकर वापस सत्ता में आई थीं। मगर नतीजे इसके विपरीत जान पड़ रहे थे साम्प्रदायिक, अलगाववादी और विभाजक शक्तियाँ दिन प्रतिदिन मजबूत हो रही थीं। आर0एस0एस0, जमायत जैसी साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ ही खालिस्तान जैसी अलगाववादी शक्तियाँ देश की एकता अखण्डता के लिए लगातार गंभीर चुनौती बन रही थीं। ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने जनवादी अधिकारों के लिए और बेरोजगारी के खिलाफ 21-22 जुलाई 1979 से देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत की। ‘‘काम दो या जेल दो‘‘ नारे के तहत चला यह जुझारु आंदोलन छात्र एवं युवा संघर्षांे की ऐतिहासिक मिसाल है। इस आंदोलन में भाग लेते हुए हजारांे छात्र नौजवान गिरफ्तार किए गए जिनको लम्बे समय तक जेलांे में गुजारना पड़ा।
इसी दौरान ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 ने एक गौरवशाली परम्परा की शुरुआत की। 23 मई 1979 से शहीदे आज़म भगत सिंह, उनके साथियों राजगुरू और सुखदेव की शहादत को याद करते हुए हर साल 23 मार्च को शहीदी सप्ताह और शहीदी पखवाड़ा मनाने की शुरुआत ए0आई0एस0एफ0 और ए0आई0वाई0एफ0 द्वारा हुई। इस बीच ए0आई0एस0एफ0 ने कई जनवादी, धर्मनिरपेक्ष छात्र-युवा संगठनों से मिलकर धर्मनिरपेक्ष छात्र सम्मेलन, राष्ट्रीय एकता के लिए और मास्को ओलम्पिक के सर्मथन में सम्मेलनों का आयोजन किया। साथ ही 1981-82 के दौरान केरल, बंगाल, यू0पी0, बिहार, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उड़ीसा, मणिपुर और तमिलनाडु आदि में छात्र और नौजवानों की विभिन्न माँगों के समर्थन में धरना, प्रदर्शन, घेराव, रैली और जत्थों का आयोजन किया। इस दौर में ए0आई0एस0एफ0-ए0आई0वाई0एफ0 का ‘‘काम या जेल‘‘ छात्र-नौजवान आंदोलन की एक ऐतिहासिक उपलब्धि ही कहा जाएगा। हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करने की माँग को लेकर अगस्त 1981 को तिरूअनन्तपुरम में किया गया सम्मेलन भी संगठन का एक उल्लेखनीय आयोजन था।

क्रमश:

आल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन का इतिहास: महेश राठी भाग 6


चीनी आक्रमण के प्रतिफल स्वरूप लोगांे के बीच में कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति एक गलत संदेश गया। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में एक समाजवादी व्यवस्था थी और चीन के इस आक्रमण ने समाजवादी विचारधारा पर ही सवालिया निशान लगा दिया। चीनी कम्युनिस्ट नेतृत्व के इस निर्णय ने भारत की कम्युनिस्ट, प्रगतिशील एवं जनवादी ताकतांे के बीच एक स्पष्ट विभाजन की रेखा खींच दी थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी ऐसी शक्तियों ने विभाजक गतिविधयाँ तेज कर दीं। जिसके परिणाम स्वरूप 1964 में पार्टी में विभाजन हो गया और एक नई पार्टी भा00पा0एम0 का उदय हुआ। इस विभाजन ने 0आई0एस0एफ0 को भी एक गंभीर संकट में धकेल दिया।
वास्तव में यह चीनी संकट देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए दोहरा संकट लेकर आया। एक कम्युनिस्ट आन्दोलन में विभाजन और दूसरे आर0एस0एस0 जैसे देश की दक्षिणपंथी और फासीवादी ताकतों को कम्युनिस्ट, प्रगतिशील और जनवादी आन्दोलन पर हमले का सुनहरा मौका मिल गया था। 0आई0एस0एफ0 की नियमित गतिविधियों के लिए एक झटका था। विभाजक शक्तियों ने संगठन की सभी परम्पराओं, नियमों और विचारधारात्मक परम्पराओं को ताक पर रख कर सामानान्तर संगठन खड़ा करने का काम किया। उन्होनंे प्रत्येक स्तर पर सामानान्तर संगठन बनाने अपना साहित्य छापने, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ छापने का काम प्रारम्भ कर दिया। 0आई0एस0एफ0 को भारी नुकसान हो रहा था और यह नुकसान 0 बंगाल, आन्ध्र प्रदेश और केरल में कहीं अधिक था, हालाँकि यह नुकसान लगभग सभी राज्यांे में हो रहा था।
आर0एस0एस0 और जनसंघ ने इस मौके का देश भर में कम्युनिस्ट विरोधी माहौल बनाने में भरपूर लाभ उठाया। परन्तु 0आई0एस0एफ0 और भा00पा0 द्वारा चीनी आक्रमण की स्पष्ट निन्दा किए जाने से स्थिति काफी हद तक सँभली और साथ ही देश की अन्य प्रगतिशील ताकतों ने भी इस समय काफी सहायता की। सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारत पर चीनी आक्रमण की आलोचना की गई और देश के
प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के दक्षिणपंथी छलावांे में नही फँसने के कारण भी स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ। भा00पा0 से अलग होकर सी0पी0एम0 बनाने वाले पार्टी विभाजकांे ने छात्र आंदोलन सहित सभी जनांदोलनों में फूट की नींव रख दी थी। 1970 में 0आई0एस0एफ0 से टूटकर जाने वालों ने एस0एफ0आई0 नामक छात्र संगठन का गठन किया।
0आई0एस0एफ0 का पुनर्गठन 1964-66
0आई0एस0एफ0 के पुनर्गठन का निर्णय किया गया और 1964 में केरल, बिहार, आन्ध्र प्रदेश और चंडीगढ़ में राज्य सम्मेलनों का आयोजन किया गया। कई राज्यों में राज्य इकाइयों का गठन किया गया। हिंद महासागर में अमेरिकी नौसेना के प्रवेश के खिलाफ बिहार स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ने यू0एस0आई0एस0 पर प्रदर्शन किया। चीनी आक्रमण के अस्थाई प्रभाव के बाद यूथ स्टूडेन्ट्स आन्दोलन में फिर उभार दिखने लगा। 1965 में एक यूथ स्टूडेन्ट्स कैडर मीटिंग का आयोजन दिल्ली में किया गया। इस बैठक में आसाम, बंगाल, बिहार, उडीसा, पंजाब, आन्ध्र प्रदेश, केरल और दिल्ली में सम्पन्न राज्य सम्मेलनांे का विशेष उल्लेख किया गया। जब साठ के दशक में छात्र-नौजवान आन्दोलन में एक उभार दिखने लगा था उसी समय 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध की शुरुआत हो गई, जिसके कारण अंध राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी ताकतों को भारत-सोवियत संघ की दोस्ती के खिलाफ प्रचार का मौका मिल गया। परन्तु कामयाब ताशकंद संधि ने इस अभियान को विफल कर दिया। भारत-पाकिस्तान के इस युद्ध के समय 0आई0एस0एफ0 ने देश की रक्षा के लिए छात्रों और नौजवानों को आगे आने का आवाह्न किया। यह ऐसा समय था जिसमें विघटनकारी शक्तियाँ काफी सक्रिय हो र्गइं और भाषाई विघटनकारी शक्तियों ने हिन्दी और गैर हिन्दी लोगों के बीच तनाव पैदा करके भाषाई आधार पर दंगे भड़काने का काम किया।
पूरे देश में आर्थिक स्थितियाँ बद से बदतर हो रही थीं। सरकार ने आम जनता पर ढेरों कर लाद दिए थे। भारत ने इसी समय पी0एल0 480 समझौते के तहत अमेरिका से गेहूँ आयात किया। चैथी पंचवर्षीय योजना स्थगित कर दी गई। विश्व बैंक के दबाव में रुपये का अवमूल्यन किया गया। देश पर कर्ज 1300 करोड़ रुपए की बड़ी रकम तक पहँुच गया। बड़े पूँजीपतियों और एकाधिकारियों को बड़ी छूट दी गई जिससे उन्होनें खुले तौर पर आमजन के हितांे पर कुठाराघात कराने शुरू कर दिए। आम आवश्यकता की वस्तुओं के दामो में भारी बढ़ोŸारी हुई जिससे आम आदमी का जीना दूभर हो गया। सरकार की नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। छात्र और नौजवान बड़ी संख्या में सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कांे पर उतर रहे थे। सरकार के खिलाफ इस गुस्से की अभिव्यक्ति आम चुनावों में भी दिखाई पड़ रही थी। 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को 17 में से 9 राज्यांे में करारी हार का मुँह देखना पड़ा। इसके अलावा देश में छात्रांे और नौजवानांे ने कई महत्वपूर्ण आंदोलनों की अगुवाई की, इसमें बंगाल में 1965 का आंदोलन और बिहार का अगस्त आन्दोलन प्रमुख थे जिसमें सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण कई छात्रों ने अपनी जानों की कुर्बानी दी।
संयुक्त सम्मेलन
0आई0एस0एफ0 और 0आई0वाई0एफ0 ने 29 दिसम्बर 1965 से 3 जनवरी 1966 को पांडेचेरी में संयुक्त सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन ने भारत-पाक ताशकन्द समझौते का समर्थन करते हुए उसमें सोवियत संघ की भूमिका की भी सराहना की। इसी सम्मेलन में दोनों संगठनांे ने अपने आपको एक दूसरे से संबद्ध घोषित किया। जून 1966 में सरकार ने विश्व बैंक के दबाव में रुपए का अवमूल्यन किया जिससे पूरे देश में सरकार के खिलाफ आंदोलनांे की बाढ़ सी गई। 1966 में पूरे समय देश भर में आंदोलन चलते रहे सितम्बर 1966 में भा00पा0 ने संसद मार्च का नारा दिया जिसमें 0आई0एस0एफ0 ने बढ़-चढ़कर बड़ी तादाद में शिरकत की। सितम्बर-अक्टूबर 1966 में पूरे उत्तर प्रदेश में सरकार विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। जिसमें सैंकड़ांे छात्र नौजवान घायल हुए, दर्जनों शहीद हुए और 6000 के लगभग लोगों को जेल जाना पड़ा। कानपुर में एक कालेज प्रधानाचार्य की हत्या हो गई। हत्या के आरोप में कुछ छात्रों को जेल जाना पड़ा। स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ने इसके खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी। जिसके कारण छात्रांे का दमन शुरू हो गया और दो दिन तक कानपुर में गोलीबारी हुई। यू0पी0 के गर्वनर ने कहा कि यदि 0आई0एस0एफ0 अपना आंदोलन वापस नहीं लेता है तो इसी तरह दमन और गोलीबारी जारी रहेगी। प्रतिक्रिया स्वरूप यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया। 15 अक्टूबर 1966 को पूरे देश में प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया गया।
छात्रों की विभिन्न माँगांे के लिए 4 नवम्बर 1966 को एक व्यापक आधार वाली संयुक्त स्टूडेन्ट्स कमेटी का गठन किया। विभिन्न छात्र समस्याओं और माँगांे को लेकर कमेटी ने 18 नवम्बर 1966 को दिल्ली मार्च का निर्णय किया। सरकार ने इसे एक धमकी की तरह समझकर इस छात्र आंदोलन को कुचलने के उपाय शुरू किए। दिल्ली और आसपास के छात्र नेताओं को रातो-रात गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली आने के रास्ते बन्द कर दिए गए, दिल्ली की सीमाओं पर भी अवरोध खड़े किए गए। हजारों छात्रों को दिल्ली पहुँचने के रास्ते में ही पकड़ लिया गया। इसी कड़ी में पूरे बिहार में भी विरोध की आग भड़क उठी जो नवम्बर 1966 से जनवरी 1967 तक अभूतपूर्व ऊँचाई पर थी। विभिन्न राज्यों में भी राज्य स्तरीय छात्र एक्शन कमेटी का गठन किया गया। जिसने 8 दिसम्बर 1966 को माँग दिवस के रूप में मनाया। समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में पुलिस ने छात्रांे पर जबरदस्त ज्यादतियाँ कीं। पटना और उसके आसपास के इलाकों में भी बड़ी संख्या में छात्रांे की गिरफ्तारियाँ हुईं।
1967 के चुनाव और उसके बाद का समय
1967 में सम्पन्न चैथे आम चुनाव में आजादी के बाद कांग्रेस को पहली बार हार का मुँह देखना पड़ा। बहुमत राज्यांे में कांग्रेस की हार हुई, 17 में से 9 राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। बहुमत राज्यांे में विपक्षी सरकारांे का गठन हुआ, केरल और 0 बंगाल में वामपंथी सरकार का गठन हुआ। देश में बदलते इन हालातों के बीच सरकारी नीतियों के खिलाफ लगातार आन्दोलनांे का दौर जारी रहा। इसी बीच 17 नवम्बर 1969 को 0आई0एस0एफ0 और 0आई0वाई0एफ0 ने संयुक्त रूप से बेरोजगारी के खिलाफ अखिल भारतीय संसद मार्च का आवाह्न किया, जिसमें हजारों छात्रों और नौजवानों ने भागीदारी की। इसीके साथ लाखों हस्ताक्षरों के साथ छात्र और नौजवानों द्वारा तैयार एक माँग पत्र भी संसद को दिया गया। असल में यह बेरोजगारी के खिलाफ छात्र-युवा आंदोलन की तीसरी अवस्था थी, इससे पहले दिसम्बर 1968 में छात्र युवाओं ने दिल्ली में एक कंवेंशन आयोजित किया था और देश भर में बेरोजगारी के सवाल पर जत्थे निकाले गए थे।
क्रमश:

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